राष्ट्रपिता के जय बोलऽ

राष्ट्रपिता के जय बोलऽ

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Posted: February 13, 2020
Category: कविता
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लेखक: श्री जगदीश ओझा 'सुन्दर'

एक बेरि भीतर का मन में मिला मिला सुर, लय बोलऽ
एक बेरि जन-जन मिलिजुलि के, राष्ट्रपिता के जय बोलऽ
अइसन बोलऽ नदिया बोले, परबत बोले बन बोले
अइलन बोलऽ गांव-गांव, नगरी-नगरी कन-कन बोलऽ
आजादी के एह बेरा में कइसन बा संसय बोलऽ
एक बेरि भीतर का मन से राष्ट्रपिता के जय बोलऽ
जेकरा एक इसारा पर, तरना के सउंसे देस चलल
जेकरा एक सहारा पर सुख चलल अवरि कवलेस चलल
आजु उदासी कइसन बा, ऊ कइसन रहे समय बोलऽ
एक बेरि जन-जन का सुर में राष्ट्रपिता के जय बोलऽ
अपना त्याग तपसिया से जेहल में सरग बनावल जे
अंगरेजन के जोर-जुलुम के गढ़ मुसकाइ गिरवले जे
दूबर-पातर काया भीतर कस बल रहे अजय बोलऽ
एक बेरि जन-जन का सुर में, राष्ट्रपिता के जय बोलऽ
सत्य अहिंसा अउरि प्रेम के आजु बताव मंत्र कहां?
साबरमती आसरम के ऊ सिद्ध कहां, ऊ सन्त कहां?
जेकरा कदम-कदम पर होखे जगती का बिसमय बोलऽ
एक बेरि भीतर का मन से राष्ट्रपिता के जय बोलऽ
उनुका उपदेसन के जिनगी भीतर आजु उतारऽना
आज पिता के धियान कइके आपन भाग सराहऽना
जब तूं उनकर बतिया मनबऽ होइ भाग्य उदय बोलऽ
एक बेरि भीतर का मन से राष्ट्रपिता के जय बोलऽ
आपन नेह ढार के सींचऽ हिन्द देस का माटी के
हिन्दी के दुलराइ से बाड़ऽ अपना मंडई टाटी के
तब हरिजन, किसान, मजदूर हो जइहें निरभय बोलऽ
एक बेरि भीतर का मन से राष्ट्रपिता के जय बोलऽ

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