संपादकीय में समाइल कोरोना

संपादकीय में समाइल कोरोना

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Posted: March 18, 2021
Category: संपादकीय
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संपादक- मनोज भावुक

मार्च 2020 में आइल कोरोना महामारी पूरा साल आदमी के अस्तित्व के झकझोरत रहल. अभियो टीस मारते बा. एह दरम्यान बहुत कुछ सोचे-समझे खातिर आदमी मजबूर भइल. हमरो मन में उथल-पुथल रहल. बहुत कुछ पाकल, बहुत कुछ फूटल आ उ संपादकीय के पन्ना पर ओह कालखंड के दस्तावेज के रूप में अंकित-टंकित हो गइल. लीं पेश बा उ दस्तावेज. पढ़ी आ सोची-विचारीं.

अंक 4 - ए हो रामा...

फगुआ के बाद चइता अंक परोस रहल बानी। फगुआ अगर अंत हऽ त चइता शुरूआत। अंत आ शुरुआत के अद्भूत तालमेल ह फगुआ-चइता। एही संगम पऽ हमनी के नया साल के उद्गम बा। रउरा सभे के नया साल के शुभकामना।

नया साल के अइसन जश्न त दुनिया में कहीं मनावले ना जाला। दिनभर फगुआ गवाला आ 12 बजे रात के बाद उहे गोल, उहे समाज, उहे दरी, उहे तिरपाल, उहे ढोलक, उहे झाल, उहे हुड़का, उहे मजीरा, उहे पखावज, उहे झांझ, उहे तासा, उहे नगाड़ा, रंग- अबीर से पोतल, भांग में डूबल उहे लोग...ए हो रामा...शुरू क देवेला। माने फागुन खतम। चइत शुरू।...नया साल के आगाज।

बाकिर, फगुआ-चइता के बीच एह साल एगो कोरोना आ गइल बा। रंग में भंग के रूप में ई  कोरोना खाली भारत खातिर ना, संउसे दुनिया खातिर, मनुष्यता खातिर एगो खतरा बा। एकरा से निपटे खातिर एहतियात बरतल बहुते जरूरी बा।

कोरोना के चलते असो दिल्ली के होली पनछुछ्छुर रहल हऽ आ गांव के चइता इहां कहां? गांव के ईयाद आवऽता।

कटिया शुरू हो गइल होई। तीसी, मसूरी, खेसारी, लेतरी, सरसो, मटर उखड़ा गइल होई। रहर के ढेढ़ी, जौ-गेहूं के बाल, महुआ बारी के महुआ गांवे बोलावऽता। काली जी के मंदिरवा पऽ चइता-चइती त होते होई। कई गो लोक धुन आ लोक राग मन में गूंजऽता। लहर पऽ लहर उठता।

अंक 5-  कोरोना काल में रामायण क्रांति

टेलीविजन प टीकर चलsता कि लॉकडाउन में संयम सिखावे अइले श्रीराम। लक्ष्मण रेखा में रहे के मर्यादा सिखइहें श्रीराम।

दरअसल कोरोना महामारी के खिलाफ पूरा देश में  25 मार्च से 21 दिन के जवन लॉकडाउन भइल बा, ओह में 28 मार्च से दूरदर्शन पर सुबह-शाम रामानंद सागर कृत रामायण के प्रसारण शुरू भइल बा। तबे से कोरोना अउर राम के लेके बतकूचन चालू बा।

अइसहूं ई चइत के महीना हऽ। भगवान श्रीराम के जनम के महीना। अब राम से बड़ा नायक के बा ? जेतना राम पर लिखाइल बा, कहाइल बा, गवाइल बा आ मंचन भइल बा, सीरियल-सिनेमा बनल बा, ओतना कवना नायक पर काम भइल बा ?...आ बात खाली भइला के नइखे भावना के बा। जवना भावना से लोक में राम के स्वीकार कइल गइल बा, उ भाव दोसरा कवनो नायक के नइखे भेंटाइल। सांच कहीं त जीवन के हर भाव में राम बाड़े। राम हर काल में प्रासंगिक बाड़े। कोरोना काल में भी।

सांच पूछीं त राम रसायन आजो सब समस्या के समाधान बतावे में सक्षम बा। रामलीला आ रामचरित मानस आजो सबसे आसानी से समझ में आवे वाला दर्शन शास्त्र बा। सिनेमा - सीरियल खातिर सबसे इंटरेस्टिंग एक्शन बा, ड्रामा बा, इमोशन बा। मानी भा मत मानी राम के बिना राउर काम नइखे चले वाला।

आईं एक बेर फेर कोरोना महामारी से सम्पूर्ण विश्व आ मानवता के मुक्त करावे खातिर राम के नाव लीहल जाव। जय श्रीराम!

अंक 6  - लोक बनवले बा बाबू कुँवर सिंह के इतिहास पुरुष

कवनो चीज के कथा-कहानी के रूप में देखल आ ओकरा के भोगल दूनों दू गो बात ह। दूनों के मरम अलग होला।

अबहीं सउँसे विश्व में कोरोना महामारी के प्रकोप बा। भारत में भी लॉक डाउन चलsता। लोग दहशत में बा। घर में कैद बा। केहू के बाल-बच्चा कहीं फँसल बा त केहू के माई-बाप। डॉक्टर, पुलिस, पत्रकार जान-जोखिम में डाल के दिन रात सेवा में लागल बाड़े। ई दुख वर्तमान में भोगल जाता। अभी एकर पीड़ा इंटेंस बा। दस-बीस साल बाद, पचास साल बाद ई इतिहास हो जाई। कहानी हो जाई। डायनासोर युग के जुरासिक पार्क जइसन फिलिम हो जाई।

जइसे आजकल रोज हमनी के टीवी पर रामायण आ महाभारत देखत बानी जा। हमनी खातिर ई बस एगो कहानी बा, सीरियल बा। मजा ले तानी जा। मन बहलावsतानी जा। बाकिर एकरा के अगर रउरा सत्यकथा मानी त महसूस करीं ओह कष्ट के, ओह पीड़ा के जे रामायण के पात्र राम भोगलें, सीता भोगली, राजा दशरथ भोगलें भा लक्ष्मण जी के पत्नी उर्मिला भोगली भा महाभारत के पात्र पांडव भोगलें, कुंती भोगली। कहे के मतलब कि असली चीज महसूस कइल बा। ओह कालखंड में जाके अपना के ओह स्थिति में रख के महसूस कइल बा। तबे अंदर के इंसान ज्यादा समृद्ध, ज्यादा मानवीय होई।

ई अंक 1857 के गदर में बिहार के प्रतिनिधित्व करे वाला 80 बरिस के हीरो बाबू कुँवर सिंह के समर्पित बा, जेकरा बारे में प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार होम्स के भी लिखे के पड़ल कि '' युद्ध के समय कुँवर सिंह के उम्र अस्सी साल रहे, अगर उ जवान रहितन त अंग्रेजन के 1857 में ही भारत छोड़े के पड़ित।''

अंक 7- कोरोना के ओह पार ...

बबुआ रे, ई देश-विदेश काहे बनल ?...काहे बन्हाइल बाँध सरहद के ?...दुनिया के ऊपर एके गो छत -आसमान आ एके गो जमीन-धरती। के कइलस टुकड़ा-टुकड़ा?…झगड़ा के गाछ के लगावल?  के बनावल नफ़रत के किला ?... का दो, धरती माई हई। माईयो टुकी-टुकी ???  ……एह टुकी-टुकी में हीं सारा समस्या के जड़ बा। टुकी-टुकी में वर्चस्व के लड़ाई बा। अहंकार, शक्ति-प्रदर्शन, धोखा, गद्दारी, जमाखोरी, साजिश, सियासत सब एह टुकी-टुकी में बा।  ' वसुधैव कुटुंबकम ' खाली नारा में बा आ मानवता में बानर नर से आगे निकल गइल बाड़न।

चीन के चेहरा देखीं। देखीं का, कोरोना शब्द बोलते भा सोचते चीन के क्रूर चेहरा नज़र का सामने नाचे लागता। चीन के चाल आ चक्रव्यूह सउँसे दुनिया समझ गइल बा। तनिक विचार करीं, चीन कोरोना वायरस के संक्रमण से जुड़ल सूचना दबवलस काहे?  दबवलस त दूर, अब त इहो सुने में आवता कि कोरोना वायरस के उत्पत्ति चीन के प्रयोगशाला बुहान इंस्टीच्यूट आफ वायरोलाजी में ही भइल बा। मतलब ई एगो मानव निर्मित वायरस बा।  अइसन काहे कइलस चीन ?... बात उहे, टुकी-टुकी वाला बा। चीन धरती के बाकी टुकड़ा के गैर समझलस, दुश्मन समझलस, बाजार समझलस। ' वसुधैव कुटुंबकम' के राज, रहस्य आ सुख ओकरा भेजा में घुसबे ना कइल।

दरअसल हमनी के प्रेम कइल छोड़ देले बानी जा। प्रेमे सब बेमारी के ईलाज बा। प्रेम रही तबे    ' वसुधैव कुटुंबकम ' के रहस्य समझ में आई। प्रेम खाली आदमी के आदमी से ना... पशु, पंक्षी आ प्रकृति से भी।  त अब चिचिअइला आ छाती पिटला से का होई कि प्रकृति के हमनी के दोहन कइनी जा। ओकरा साथे अन्याय कइनी जा, ओकरे सजा  मिल रहल बा। गगनचुंबी टॉवर के पॉवर देखावे में संवेदना के महल खंडहर बन गइल, ओकरे सजा मिल रहल बा। जीवन से प्रेम गायब हो गइल त एह सूखल ढाँचा में  ' स्ट्रांग इम्यून सिस्टम ' रहो त रहो कइसे। फेर त कोरोना डायन खातिर जिनिगी के डंसल बहुत आसान बा। ई अलग-अलग रूप में आवते रही। ...

विद्वान लोग के मत बा आ इतिहासो साक्षी बा कि हर महामारी के बाद हमनी के जागेनी जा। ...जागल बानी जा। जगला पर कुछ समीकरण बदलेला। कुछ मान्यता टूटेला।  कुछ नया सामने आवेला। ई महामारी या त्रासदी कवनो पहिला बेर त आइल नइखे। प्लेग, ब्लैक डेथ आ स्पैनिश फ्लू के समय भी दुनिया हिल गइल रहे।  ओही तरे महामारी के बाद आर्थिक संकट के खड़ा भइल भी कवनो नया नइखे। चिंता, आर्थिक संकट के साथे साथ ओह संकट से समाज में उपजे वाला विषमता आ करप्शन के बा। चिंता, अपना सपना के मेहनत के कढ़ाही में रोजे पकावे वाला मजदूरन के अनाथ होके एने ओने छिछिअइला के बा।

कोरोना कवनो जाति, धरम, अमीर, गरीब के ना ह। तब्लीगी जमात के वजह से भारत में कोरोना के मरीज बढ़ल बाड़े। निःसंदेह दोषी के सजा मिले के चाहीं। बाकिर एकरा चलते हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य ना फइले के चाहीं।  सउँसे दुनिया में रोयेला आदमी त रुलाई एके जइसन होला। लोर के स्वाद एके जइसन होला। हंसी आ ठहाका भी एके जइसन होला। मानवीय अनुभूति के मानवता के आधार पर समझे के जरुरत बा। जात-पात, धर्म, भाषा, देश, क्षेत्र, सरहद के आधार पर ना। एह से, संकीर्ण राष्ट्रवाद से ऊपर उठ के मानवतावाद पर जोर देवे के होई। दुनिया के तमाम देशन के बीच निहित स्वार्थ से ऊपर उठ के एगो नया समीकरण आ संतुलन पर जोर देवे के होई। तबे मानव जाति  के अस्तित्व पर से खतरा टली।  अरे, जब अदिमिये ना रही त कवँची सरहद,  कवँची सेना, कवँची बाज़ार, कवँची व्यापार। रही जीव तबे नू पीही घीव।

एह से अभी विश्व कल्याण के भावना से काम करे के जरुरत बा। अइसन पहल पहिलहूँ भइल बा। संयुक्त राष्ट्र, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अउर विश्व बैंक  ... के जनम संकट काल ( द्वितीय विश्व युद्ध ) के बादे भइल बा।...एहू महामारी के बाद कुछ तब्दीली आई। वैश्विक स्तर पर कुछ नया उपाय होई।

फिलहाल त घर में रहीं। लॉकडाउन आ सोशल डिस्टेंसिंग के पालन करीं। ओकरा बाद रोजी-रोजगार के सोचीं। प्रधानमंत्री जी जान आ जहान दूनू के बात करत बानी।  आत्मनिर्भरता के बात करत बानी।  गाँव प थोड़ा सा फोकस कइल जाय। अपना जड़ आ जमीन प।  जड़ से कट के फूल ना खिली।  खिलबो करी त उ प्लास्टिक आ कागजे के होई। बाकी सब त समय खुद ब खुद समझा दी।  समझावते बा।

ई अंक समय के दस्तावेज बा। भविष्य में जब कबो पीछे पलट के कोरोना काल के समझे के कोशिश कइल जाई त ओह समय ई अंक आज के समय के कहानी सुनाई। एह अंक में कवि, गायक, कथाकार, पत्रकार, चिकित्सक, समाजसेवी सबकर कोरोना के लेके उदगार बा, चिंता बा, चिंतन बा, सुर बा, स्वर बा, समस्या बा, समीक्षा बा। पढ़ीं। पढ़ाईं।

कोरोना के जगह अब करुणा बरिसे,  एही प्रार्थना के साथ।

 

अंक 8 - रेड, ऑरेंज आ ग्रीन जोन वाला आदमी

'' लॉकडाउन समस्या नइखे। समस्या त भूख बा। ''  मदर्स डे पर बाते बात में ई बतिया समझा देलस माई। विश्व के तमाम माई के मने मन प्रणाम करत हम लॉकडाउन अउर भूख के बारे में सोचे लगनी। सोचे लगनी, पूर्वांचल के माई-दादी आ चाची-भउजी का बारे में जे पूरा जिनगी लॉकडाउन में काट देलस। ससुरा अइला के बाद घर के चौखट से बाहर ना निकलल। बाकिर उ लॉकडाउन खलल ना। काहे कि उ लॉकडाउन जीवन शैली या संस्कार रहे। घर के मान-मरजादा रहे आ ओही में आनंद रहे। एह से उ लॉकडाउन कबो लॉकडाउन लगबे ना कइल। लॉकडाउन में रहियो के माई-दादी आ चाची-भउजी अपना के रानी-महारानी महसूस कइल लोग। उहाँ बेबसी ना रहे। भूख भी ना रहे। ( पेटवे के ना,  मनवो के भूख होला। जेकरा एह व्यवस्था में घुटन महसूस भइल उ समय के साथे उन्मुक्त भी भइल।)

जहाँ भूख रहे, ई लॉकडाउन टूटल। ओही यूपी-बिहार में एगो अइसन तबका रहे आ अभियो बा, जेकरा घर के औरत के खेत-खरिहान में काम करे निकले के पड़ल, गाँव के दोसरा घर में काम करे निकले के पड़ल। उ लॉकडाउन में रहती त मर जइती। उहां भूख के समस्या रहे।

हमरा आपन एगो शेर मन पड़Sता-

पानी के बाहर मौत बा, पानी के भीतर जाल बा

लाचार मछरी का करो, जब हर कदम पर काल बा

आज प्रवासी मजदूरन के पीड़ा कुछ अइसने बा। उ भूख, बेमारी आ भविष्य के लेके भकुआइल बा। ओकर माथा काम नइखे करत अउर उ उजबुजा के मुंबई आ दिल्ली जइसन जगह से पैदले निकल पड़ल बा गाँव खातिर।

गाँव ओकरा के खींचत त बा बाकिर अँकवारी में ना भरी। गाँवों डेराइल बा। कोरोना के डर गाँव-शहर सबका धमनी-शिरा में पसर गइल बा। प्रधानमंत्री जी के बेसी जोर गाँव के बचावे पर बा। गाँव में कोरोना मत घुसे। एह से गाँव हर आवे वाला के शक के निगाह से देखsता। त गाँव के ओर बेतहाशा भागे वाला एह अभागन के लोर के पोंछी?   लोर के साथ हमरा जेहन में हमार अशआर इको कs रहल बा-

लोर पोंछत बा केहू कहां / गाँव अपनो शहर हो गइल ...

सबसे बड़का शाप गरीबी / सबसे बड़का पाप गरीबी

डँसे उम्र भर,  डेग-डेग पर / बनके करइत साँप गरीबी

एह गरीब आ विवश लोग खातिर महीनन से बंद पड़ल रेल त आज (12 मई ) चालू हो गइल बाकिर एह लोग के जिनिगी के रेल पटरी पर कब आई, कब दौड़ी, पता ना ?

पीएम के सभ सीएम लोग से मीटिंग प मीटिंग चलsता। पांचवा बार बइठक भइल ह। केंद्र आ राज्य सरकार दुनों लागल बा। अभी ले दुनिया में 42 लाख आ भारत में 67152 से बेसी ममिला हो गइल बा कोरोना संक्रमण के। लॉकडाउन के तीसरा चरण (लगभग 55 दिन) ख़तम होखे वाला बा। अब जान के साथे जहानो के फिकिर बा। रोजी-रोजगार खातिर लॉकडाउन में कुछ ढील के बात होता। कबले बंद दरवाजा के भीतर से बाहर झाँकल जाई। कबो ना कबो त बाहर निकलहीं के पड़ी। बाकिर हँ,  .. अब त मास्क आ सोशल डिस्टेंसिंग के आदत डाल लेवे के चाहीं काहे कि कोरोना अचानक से छू मंतर ना हो जाई। ई अभी दुनिया के साथे आँखमिचौली खेलsता। संकट बड़हन बा त ओकर उपचारो बड़ा करे के पड़ी। सरकार के पास कवनो जादू के छड़ी नइखे कि एक बार में सब कुछ ठीक हो जाई। दोबारा व्यवस्था बनावे में समय लागी। समस्या के हल निकाले खातिर केंद्र,  राज्य अउर नागरिक सबके अपना-अपना हिस्सा के जिम्मेदारी उठावे के पड़ी।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी 12 मई 2020  के राष्ट्र के नाम सम्बोधन में ' आत्मनिर्भर भारत ' खातिर देश के आह्वान करत 20 लाख करोड़ रूपया के (भारत के जीडीपी के 10 % ) आर्थिक पैकेज के घोषणा कइले बानी।  साथ हीं ' लोकल' उत्पाद खातिर ' वोकल' होखे के मंतर देले बानी।

एह से जात-पात, धर्म-सम्प्रदाय, सरहद-सीमा से ऊपर उठ के मानवता के आधार पर सचेत रहत कोरोना से जंग लड़े के बा। अइसहूँ अभी त आदमी के तीने गो जात बा- रेड जोन वाला आदमी,  ऑरेंज जोन वाला आदमी आ ग्रीन जोन वाला आदमी....एही आधार पर ई. टिकट भा ‘’ सब ‘’ सहूलियत मिले के बा।

भारत के हर आदमी ग्रीन जोन वाला आदमी बन जाय,  भगवान से इहे गोहरावत बानी। रउरा सभ के जागे-जगावे, हिम्मत बढ़ावे, सचेत करे अउर समय के दस्तावेजीकरण खातिर प्रस्तुत बा कोरोना विशेषांक (भाग-2)। पढ़ीं। पढ़ाईं।

 

अंक 10- जिंदगी जंग ह, बोझ ना...

भोरे-भोरे गौरैया आँगन में चहकल / चाह के दोकानी के आँच बाटे लहकल  ....

आ ओही चाह के दोकानी प, चट्टी प कुल्हड़ में चाय सुड़ुक-सुड़ुक के पीयत दुनिया भर के बतकही, दुनिया भर के पंचायत, देश-विदेश के समस्या, निजी घात-भीतरघात सब शेयर होखे अपना यार के सङे, दिलदार के सङे, राजदार के सङे, साथी-संघाती के सङे। उ आउटलेटे अब गायब भइल जाता।

त मन के भीतर खउलsता तरह-तरह के बात। तरह-तरह के खीस-पीत। अवसाद-विषाद, कुंठा-क्रोध के अम्ल मन के बर्तन के पेंनिये गाएब कs देता। मन रीते लागsता। तबो मन के बुझात नइखे कि कवनो मनोचिकित्सक से मिल लिहल जाव। लागsता कि ई जवन होता, बहुत सामान्य बात बा। असहीं होला। बाकिर ई सामान्य घटना नइखे। जहर पीयत-पीयत मन आत्मघाती हो जाला। मन नॉर्मल ना रहे। नार्मल अवस्था में केहू पंखा से लटक के जान कइसे दे सकेला? केहू ख़ुदकुशी कइसे क सकेला?

कोरोना त आदमी के जान लेते बा। ई अवसाद, विषाद, फ्रस्ट्रेशन, अकेलापन भी मौत के मुँह में ढकेल रहल बा। हमरा दिलोदिमाग में बेर-बेर उ गीत गूँज रहल बा कि ''जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए''... बाहर से जे सुखी लउकsता, जेकरा पास धन-दौलत, शोहरत आ मान-सम्मान सब बा, उहो पंखा से लटक जाता। गरीबी से जे मू रहल बा, उ त मुअते बा। एकर मतलब कि आत्महत्या के सम्बन्ध अमीरी, गरीबी से नइखे, धन-दौलत आ शोहरत-सम्मान से नइखे। उ कवनो भितरिया चीज ह। शायद ओकर नाँव विलपॉवर ह। जिजीविषा ह। मन के ढिठई ह। मन के थेथर होखे के चाहीं। मन के चमड़ा मोट होखे के चाहीं जहँवाँ से अपमान, उपेक्षा आ दुःख के तीर परावर्तित हो जाव। कमजोर मन आत्मघाती हो जाला आ फेर उ अपने के खोर-खोर खाए लागेला।... मन बहरियो बहुत उत्पात मत मचावे, एकरे खातिर संत लोग योग, ध्यान, चिंतन आ सत्संग के राह बतवले बा ना त आदमी के मन आसाराम बापू हो जाला, रामरहीम हो जाला, शहाबुद्दीन हो जाला, निर्भया गैंग रेप के दोषी राम सिंह हो जाला।

मन ह का?  देह में ई कहँवाँ रहेला? ई कहल कठिन बा। दिल आ दिमाग के अस्तित्व त जीव विज्ञान में बा बाकिर मन ... ?

बाकिर एतना त तय बा कि मन देह से अलगा के कवनो चीज नइखे तबे नू मन के पीड़ा देह के अस्तित्व के खतम क देता। एह से मन के मजबूत कइल जरुरी बा। तन के इम्म्यून सिस्टम के सङे-सङे मनो के इम्म्यून सिस्टम के स्ट्रांग कइल जरुरी बा। व्यायाम के साथ ध्यान आ योग भी जरुरी बा। स्ट्रेस के हैंडिल करे के कला सीखल जरुरी बा। मन आ तन दुनो स्तर पर अपना के फौलाद बनावे के पड़ी तबे सकून के चिरई एह जिन्दगी के अँगना में चहकी।

दुश्मन त मानी ना, साजिश करी। मन के तूरे के भरसक कोशिश करी। बाकिर हमनी के दादा-परदादा भा रामायण-महाभारत के पात्र अपना हक खातिर लड़े के सिखा गइल बाड़े ना कि सुसाइड करे के।

अपना क्षमता के हिसाब से ‘कुछ’ बने के कोशिश बेशक होखे के चाहीं बाकिर कोशिश अइसनो ना होखे के चाहीं कि उ पूरा ना भइला पर रउआ भितरी से टूटि जाईं। षङयंत्रकारी त हर जगहा, हर क्षेत्र में बाड़न। जरनियहपन त हर जगहा बा। एह से धीरज त धरहीं के पड़ी। संघर्ष त करहीं के पड़ी भाई ! कीड़ा फतिंगा भी अपना आखिरी दम तक अपना संघर्ष के लड़ाई लड़ेला। हर घड़ी हर कदम संघर्ष.. . अनथक साधना आ धीरज के काट केहू के लगे नइखे।

जिनिगी बा त सुख-दुःख त अइबे-जइबे करी। सुख के महफ़िल से इतर दुख के साथी चीन्हे के पड़ी। अइसन साथी जेकरा सामने बेफिक्र होके दिल खोलल जा सके। जेकरा कान्हा प मूड़ी ध के फूट-फूट के रोअल जा सके। जे बेकहले राउर दुख बूझे आ अपना जोर भर मदद करे। अइसन साथी मिलल मुश्किल बा। बाकिर दोसरा खातिर अइसन साथी त बनले जा सकत बा। ई अपना अख्तियार में बा। एहू से दुख कम होई। कुँवर बेचैन जी के एगो शेर बा-

तुम्हारे दिल की चुभन भी जरूर कम होगी / किसी के पाँव से काँटा निकालकर देखो

भाई हो, उदार बने के पड़ी। सहनशील बने के पड़ी। ‘’ नेकी कर दरिया में डाल ’’ के राहे चले के पड़ी। अनेरहूँ हँसे के पड़ी। अपनो प हँसे के पड़ी। गीत गावे के पड़ी। गुनगुनाये के पड़ी। हमार शेर बा कि 'दुखो में ढूँढ ल ना राह भावुक सुख से जीये के / दरद जब राग बन जाला त जिनगी गीत लागेला।‘  मतलब, रउरा दुःख के आउटलेट रखे के पड़ी। अइसन नेह के बंधन भी चाहीं जॅऺहवाँ बेबातो के बात होखे, बेवकूफी भरल बात होखे, पागल नियर आदमी ठठा के हँसे। जहाँ दिल, दिमाग आ किडनी पर जोर ना पड़े। बिंदास होके संवाद होखे। जहँवाँ ई संदेह मत होखे कि एह में से केहू अपना मतलब के बात उचिला के कबो सेंटीमेंटल ब्लैकमेल करी। जहाँ दोस्ती में माई आ बेटा वाला ममता के, देवर-भउजाई वाला मजाक के आ पति-पत्नी वाला निजता आ खुलापन के रिश्ता होखे। अइसन दोस्त चाहीं। अइसन दुखहरन दोस्त। ना बाहर मिले त अपना भितरी खोजीं। बाकिर संवाद चालू रहे। हमार एगो दोहा बा,  " भावुक अब बाटे कहाँ पहिले जस हालात / हमरा उनका होत बा, बस बाते भर बात।''  ई बाते भर बात वाला दीवार तुरियो के कुछ रिश्ता चाहीं, जहाँ नेह के बरसात में मन भींज के तरोताजा होत रहे। तब ना होई कवनो सुसाइड। ना होखिहें लोग आत्महंता। ना मरिहें कवनो सुशांत सिंह राजपूत। तब जिंदगी जंग भलहीं लागी, बोझ ना लागी।

तीन गो बात अउरी इशारा में। संयुक्त परिवार का ओर लौटल एकदम से संभव नइखे। बाकिर जहँवें बन पड़े, दुख त बाँटल जा सकेला। सूनल-सुनावल जा सकेला। एकल परिवार में त पति-पत्नी के बीच अनबन भा झगड़ा भइल होखो त हफ्तन सन्नाटा रहेला। दूनो के मन होखबो करो तबहूँ केहू फरियावे भा समझौता करावे वाला ना होला। दोसर बात, अपना जड़ का ओर सोचल जाव, जहँवाँ अपनन खातिर दरवाजा हर-हमेसा खुलल रहत रहे। अपॉइंटमेंट लेबे के औपचारिकता ना भइल करे। तीसर बात, दिन रात सोशल मीडिया के अनसोशल कोना में ढूकि के टेंशन बटोरला से नीमन बा जे छोट-छोट लइकन के सङे बइठ के लूडो खेलल जाव, भा प्रकृति के सङे रोमांस कइल जाव। प्रेम आ रोमांस.. ईहे कवनो तनाव के काट बा। अपना से, अपना माई-बाप से, भाई-बहिन से, परिवार से, देश आ समाज से अउर अपना सपनन से प्रेम करीं। प्रेम जीये के भूख देला, त जिंदगी खातिर लड़े के ताकत।

ना चली चीन के चाल

व्यक्तिगत दुःख-सुख आ शांति से इतर वतन के अमन बा। देश खुशहाल रही तबे ओह देश के नागरिक सुखी रहीहें। ई मुश्किल वक्त बा, व्यक्तिगत दुःख-सुख, पार्टी-नेता-जाति-धर्म से उठके सिर्फ अउर सिर्फ भारतीय बन के रहे के जरुरत बा। भारतीय सेना के पराक्रम आ शौर्य पर भरोसा रखीं ! आपन सैनिक 20 पर 43 मारत बाड़न। चीनी सेना के हालत ख़राब बा। सैनिक आ कूटनीतिक दुनों मोर्चा पर भारत चीन पर भारी बा। धूर्त आ चालबाज चीन खातिर भारत के पूरा तैयारी बा। हर देशभक्त तैयार बा। उ कोरोना से पहिले भारतीय चीन समर्थक के मारे खातिर उतावला बा अउर सीमा पर शेर के तरह दहाड़े आ ललकारे खातिर भी।

अंक 14- खुद के लवना के तरह रोज जरावत बानी... 

पेट में आग त सुनुगल बा रहत ए भावुक

खुद के लवना के तरह रोज जरावत बानी

कोरोना महामारी जब फइलल त एकर पड़े वाला असर प खूब बतकूचन होत रहे... बाकिर जइसे-जइसे दिन बीते लागल बतकूचन खतम हो गइल आ ओकर असर साक्षात सामने लउके लागल।  अब हालात ई बा कि कंपनी-कॉर्पोरेट में छंटनी के सीजन शुरू हो गइल बा, त कहीं नौकरी पेशा वाला लोग के वेतन दू-दू महीना के बकाया चले लागल बा। एक त कोरोना के डर ऊपर से पॉकिट में पइसा के अभाव। ई अइसन स्थिति बा जवना में मध्यवर्ग सबसे अधिका पिसाता। ऊ राशन खातिर भा अउरी कवनो खैरात में मिले वाला सुविधा खातिर लाइन में नइखे लाग सकत। स्कूल ऑनलाइऩ चल रहल बा त स्कूल फीस देबहीं के बा। फ्लैट के किराया के अलावा अउरी दोसर देनदारी कपार प चढ़ले बा। मकान के ईएमआई से लेके दवा-दारु तक सब बड़ले बा। एही में रात-बीरात जब कबो अँघी टूटsता त बुझाता कि मेल प टर्मिनेशन लेटर आइल बा। जे बेरोजगार हो गइल बा, ओकरा नया रोजगार के कवनो संभवना लउकते नइखे। अइसे में आदमी मानसिक, सामाजिक आ आर्थिक अवसाद में घिर रहल बा।

दरअसल दिल आ दिमाग के रास्ता पेट से होके जाला। पेट में आग लागी त ओकर लपट दिल आ दिमाग तक जइबे करी। जब लपट दिल आ दिमाग तक जाई त ओकर असर परिसंचरण तंत्र आ तंत्रिका तंत्र यानी कि दिल के धड़कन आ दिमाग के फड़कन पर पड़बे करी। बीपी बढ़ी आ दिमाग खराब होई। ख़राब दिमाग से सही निर्णय होला ना। आदमी अंड-बंड करे लागेला। त सउँसे देश में अंड-बंड के स्थिति उपजे के ढेर संभावना बा। ई बहुत बड़ त्रासदी बा जवन कोरोना लेके आइल बा। कोरोना खाली बेमारी ना जिनगी के राहु-काल बा।

कहल जाता कि जइसे दूसरा विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के परिदृश्य बदलल रहे ओइसही कोरोना के बाद दुनिया के परिदृश्य बदली। अब ई लउके लागल बा। कुछ सकारात्मक बदलाव लउकता त कुछ नकारात्मको बा। सकारात्मक पहलू ई बा कि कोरोना के डरे हीं सही, लोग अनियमित जीवनशैली से बाहर निकलल बा त नकारात्मक पहलू ई बा कि परिवारिक कलह, सामाजिक निराशा, अपराध में बढ़ोत्तरी जइसन चीज अब ढेर सामने आवता। भलही सरकार के ओर से अस्पतालन में कोरोना के इलाज के कथित तौर प बेहतर सुविधा मुहैया करावल गइल बा बाकिर एह कोरोना से उपजल मानसिक, सामाजिक व आर्थिक अवसाद में घिरल लोग के काउंसिलिंग खातिर अबहीं ले कवनो व्यवस्था नइखे लउकत। ई हाल खाली अपने देश के ना बलुक दुनिया के विकसित कहाये वाला देशन में भी अबहीं एकर भयावहता के ले के सत्ता प्रतिष्ठान में कवनो गंभीरता नइखे लउकत, जवन एगो बड़ खतरा के सिग्नल दे रहल बा।

आदमी के जिनगी चूल्हा हो गइल बा आ देह लवना। ओही में जरsता-धनsकता आदमी। एह लपट से मानवता के बचावे खातिर जल्दिये कुछ उपाय कइल जरुरी बा।

 

अंक 18- देश में अमन आ पेट में अन्न

एगो त घर में तनाव बा। बाहर कुक्कुर बोलsतारs सन। इन्हनीं के टेंशन त देलहीं बाड़न स, तवना में कउवन के काँव-काँव अलगे चल रहल बा। एही में बिहार में चुनाव बा। नारा से बेसी भोजपुरी गाना गूँजsता। कोरोना के चलते जे बेरोजगार भइल बा ओकरा असहीं अंघी नइखे लागत। भोर के अखबार सुरुज भगवान से बेसी लाल बा। हत्या से बेसी आत्महत्या के खबर लउकsता। ब्रम्हांड के सर्वश्रेष्ठ जीव आत्मघाती हो गइल बा। आखिर ई कइसन समय आ गइल बा हे दुर्गा मइया।

कइसे गोहराईं तोहरा के? लइका लेखा फूट-फूट के रोईं? रोईं भोंकार पार के? सीना चीर के देखाईं? का करीं? कइसे बुझबू कि हम दुखी बानी। हमार दुख तोहरा काहे नइखे लउकत? आकि चनेसरा लेखां तुहूँ मजा ले तारू?

चनेसरा त विपक्षी हs। हमरा अच्छाइयो में बुराइये देखेला। केतनो बड़का काम काँहें ना करीं, तारीफ़ के दू बोल ना बोली। हमरा जवना काम के उ निन्दा करता, ओकर आका भा गुरुजी लोग, ओही में डूबल बा। बाकिर उ ओह लोग के तलवा चाटsता। खैर, छोड़s, ई कुल्हि सियासी बात हs।

तू त माई हऊ। तू दिल के सब दरद बुझेलू। बस बहरिये बहरी भोकाल बा ए माई। भीतर खाली बा। कुछ बा ना। कइसे रही?  इहाँ भुँजवो खाये के बा, फँड़वो टोवे के बा। पेट खाली बा। खाली पेट में दिमगवो खाली हो जाला। दिमाग कामे नइखे करत। कुछ सूझते नइखे।

पंडी जी से पूछनी हँ। उहाँ के कहनी हँ जे राहू-केतु ठीक नइखे चलत। खैर, उहाँ के त कुंडली के आधार पर ग्रह के बात कहनी हँ।

हमरा त हई कुल्ही राहू-केतु लउकत बाड़न स। एगो जवन अपना देसवा के बाउंडरिया पर फँउकत बाड़न स ड्रैगनवा, ऊ। दोसर देस के भीतरे दोस्त के रूप में दुश्मन बनल घूमsतारs सन, भितरघतिया, ऊ। तीसर ऊ, जेकरा हर काम में नुक्से लउकsता, निगेटिव आदमी, ऊ। ए सगरी के बुद्धि ठीक करs ए माई।

अभी सबसे जरुरी बा – देश में अमन आ पेट में अन्न।

अमन द। अन्न द। निरोग करs। देशे के ना, सउँसे दुनिया के कोरोना मुक्त करs।

आम आदमी भूखे मूअता। सबका थाली में रोटी होखे आ आँखि में नींन, एह नवरात्रि में बस अतने प्रार्थना बा ए दुर्गा माई।

 

अंक 22- शुभ हो, मंगलमय हो नयका साल

साल 2020 ... मनुष्य के औकात बतवलस। चिरई-चूरूंग, कुक्कुर-बिलार अँगना-दुअरा फुदुकत-कुदुकत रहल आ मानुष मुँह प जाबी (मास्क) लगवले घर में दुबुकल। आदमी सामाजिक प्राणी ह बाकिर ओकरे सामाजिक दूरी बना के रहे के पड़ल, पड़sता आ आगे देखीं, कब ले ?...

अभियो अमिताभ बच्चन फोनवा प बोलते बाड़े – ‘’ नमस्कार, हमारा देश और पूरा विश्व आज कोविड-19 की चुनौती का सामना कर रहा है। कोविड-19 अभी खत्म नहीं हुआ है, ऐसे में हमारा फर्ज है कि हम सतर्क रहें। इसलिए जब तक दवाई नहीं, तब तक कोई ढिलाई नहीं। ‘’

बच्चन साहेब के पहिले एगो जनाना बोलत रहे। ओकर बोलिया तनी मीठ लागत रहे। ई मर्दवा त पगला देले बाड़े। आदमी अपना काम में अझुरा के भुलाइयो जाता तले कवनो फोन अइला पर इनकर जबरिया कॉलर ट्यून कोरोना के ईयाद ताज़ा करा देता।

बाप रे बाप। ई कोरोना केतना लोग के नौकरी खइलस। केतना लोग के जिनगी। तबो नइखे अघात। तबो नइखे जात। कादो वैक्सीन खाई तबे जाई।

वैक्सीन के लेके तरह-तरह के कोशिश आ दावा त होते बा बाकिर अभी बहुत कुछ साफ़ नइखे... भारत में कोरोना वायरस वैक्सीन के परीक्षण अंतिम चरण में पहुंच चुकल बा आ वैक्सीन के उत्पादनो तेज़ी से हो रहल बा बाकिर ई आम आदमी तक आ ओकरा पॉकेट के पहुँच तक कब पहुंची, ई कहल अभी जल्दीबाजी होई। सरकार के कहनाम बा कि टीकाकरण एक महीना में शुरू हो सकsता। सीरम इंस्टीट्यूट कंपनी एस्ट्राजेनेका के साथ मिलके ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित वैक्सीन के उत्पादन कर रहल बा। ई टीका 70 से 90 प्रतिशत तक प्रभावी बतावल जाता।

खैर, हर बुरा समय के एगो सीमा होला। इहो जाई। जइबे करी।.. आ जब ई इतिहास हो जाई त पीछे पलट के हमनी के एह महामारी के देखब जा त बहुत कुछ लउकी।

लउकी उ काफिला जवना में मरद-मेहरारू लइका-बच्चा के गोदी टंगले पैदले बम्बई से बिहार चल देले रहे। मास्क लगाके पूड़ी बाँटत लोग के फोटो त फेसबुक हर साल देखाई। लाश प भइल सियासत भी सिहरन पैदा करत रही। कादो, बुरा दौर के बाद आदमी जागेला आ ओकरा में मानवता लौटेला पर इहो ओतने साँच बा कि आदमी से हेहर-थेथर दोसर कवनो प्राणी नइखे। श्मशान घाट पर संवेदनशील भइल इन्सान घाट से बहरी निकलते संवेदनहीन होके तोर-मोर करत देखल गइल बाड़न।

खैर, साल 2020 जाता। 2021 आवsता। हमरा नइखे लागत कि कैलेण्डर बदलला से कुछ बदली भा बदलेला बाकिर हँ, दुख, परेशानी, दुर्घटना, ठेस, ठोकर, महामारी आदमी के या त मार देला या त माँज देला, तरास देला। तप के आदमी अउरो चमकेला, निखरेला आ ओकर जिनगी सोना बन जाला। अगर दुख बड़लो बा त दुखी भइला से कुछ होई ना। हम त इहे कहेब कि –

दुखो में ढूंढ लs ना राह भावुक सुख से जीये के

दरद जब राग बन जाला त जिनिगी गीत लागेला

नया साल में बेहतर के उम्मीद कइल जाय...

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