मत बाँटs थोक के भाव पीएचडी के डिग्री

मत बाँटs थोक के भाव पीएचडी के डिग्री

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Posted: May 19, 2021
Category: सुनीं सभे
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  आर.के. सिन्हा

दिल्ली विश्वविद्यालय के हालिया संपन्न 97बेवाँ दीक्षांत समारोह में 670 डॉक्टरेट के डिग्री देहल गइल। मतलब ई कि ई सब पी.एच.डी. धारी अब अपना नाम के आगे डॉ. लिख सकsता। का ये सब के शोध पहिले से स्थापित तथ्यन से कुछ हट के रहे ?  बेशक, उच्च शिक्षा में शोध के स्तर अहम होला। एही से इहो तय कइल जाला कि पीएचडी देवे वाला विश्वविद्यालय के स्तर कवना तरह के बा। अगर अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नालॉजी (एमआईटी), कोलोरोडा विश्वविद्लाय, ब्रिटेन के कैम्ब्रिज अउर आक्सफोर्ड विश्वविद्लायन के लोहा सारा दुनिया मानेला त कवनों त बात होइबे नु करी ? ई सिर्फ अखबारन में विज्ञापन देके दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्लाय नइखे बनल। ये सबके नाम उनके विद्यार्थियन द्वारा कइल मौलिक शोध के कारण ही बा।

बड़ा सवाल ई बा कि का हमरा इहाँ हर साल जे थोक के भाव से पीएचडी के डिग्री देहल जाला, ओकर आगे चल के समाज या देश के कवनों रूप में लाभ भी होला ?  सिर्फ दिल्ली विश्वविद्लाय एक वर्ष में 670 पीएचडी के डिग्री देले बा। अगर देश के सब विश्वविद्लायन से अलग-अलग विषयन में शोध करे वाला रिसर्चर के मिले वाला पीएचडी के डिग्री के बात करीं त ई आंकड़ा हर साल हजारन में पहुँच जाई। मतलब हरेक दस साल के दौरान देश में लाखों नया पीएचडी प्राप्त करे वाले पैदा हो ही जाला लोग। का ये शोध करे वाला लोग के शोध भी मौलिक होला ?  का ओ सब में कवनों ये तरह के स्थापना कइल गइल होला जवन नया होला ?  ई सवाल पूछल एसे भी जरूरी बा, काहे कि हर साल केन्द्र आ राज्य सरकार बहुत मोट राशि पीएचडी खातिर शोध करे वाला शोधार्थी सब पर व्यय करेला। ये लोग के शोध के दौरान ठीक-ठीक राशि दिहल जाला ताकि इनके शोध कार्य में कवनों तरह के व्यवधान या अड़चन ना आवे अउर इनकर जीवन यापन भी चलत रहे। निश्चय ही उच्च कोटि के शोध से ही शिक्षण संस्थानन के पहचान बनेला। जे संस्थान अपना शोध अउर ओकर क्वालिटी पर ध्यान ना देवे ओके कभी गंभीरता से ना लिहल जाला।

देश में सबसे अधिक पीएचडी के डिग्री तमिलनाडू, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में देहल जाला। मानव संसाधन मंत्रालय के 2018 में जारी एक रिपोर्ट पर यकीन कइल जाय त ओ साल तमिलनाडू में 5,844 शोधार्थियन के पीएचडी देहल गइल। कर्नाटक में पाँच हजार से कुछ अधिक शोधार्थी पीएचडी के डिग्री लेवे में सफल रहे। उत्तर प्रदेश में 3,396 शोधार्थियन के ई डिग्री मिलल। बाकी राज्य भी पीएचडी देवे में कवनों बहुत पीछे नइखे। भारत में साल 2018 में 40.813 नया पीएचडीधारी सामने अइलन। आखिर एतना शोध भइला के लाभ केकरा मिल रहल बा? शोध पूरा भइला अउर डिग्री लेहला के बाद ओ शोध के का होला? का एमे से एकाध प्रतिशत शोध के प्रकाशित करे खातिर कवनों प्रकाशक तैयार होले ? कवनों प्रतिष्ठित अखबार के नजर भी ओ शोधन पर जाला ? का हमरा इहाँ शोध के स्तर सच में स्तरीय या विश्व स्तरीय होला ?  ई बहुत जरूरी सवाल बा। ये पर गंभीरता से बात कइल भी जरूरी बा। जवन भी कहीं हमरा इहाँ शोध के लेके कोई भी सरकार या विश्वविद्यालय बहुत गंभीरता के भाव ना राखे।

भारत में जब उच्च शिक्षा संस्थानन के शुरुआत भइल तबो क्वालिटी रिसर्च के बहुत महत्व ना देहल गइल। निराश करे वाली बात ई बा कि हमनीं शोध पर कायदे से कभी फोकस हीं ना कइनीं। अगर हर साल हजारन शोधकर्ता लोग के पीएचडी के डिग्री मिल रहल बा त फेर ये लोग के विश्व स्तर पर सम्मान काहे नइखे मिलत। माफ करेम हमनीं के आईआईटी संस्थानन के चर्चा भी बहुत होला। इहाँ पर भी हर साल बहुत से विद्यार्थी के पीएचडी मिलेला। का अपना कवनों आईआईटी या इंजीनियरिंग कॉलेज के केहू छात्र के उनका मूल शोध खातिर नोबेल पुरस्कार के लायक मानल गइल? ना नू। अगर रउआ अकादमिक दुनिया से जुड़ल बानीं त रउआ जानते होखेम कि अपना इहाँ शोध के मतलब होला पहिले से प्रकाशित सामग्री के आधार पर ही आपन रिसर्च पेपर लिख लेहल। राउर काम खतम। इहे वजह बा कि शोध में नयापन के घोर अभाव देखाई देला। ई सच में एक घोर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बा कि अपना इहाँ पर शोध के प्रति हर स्तर पर उदासीनता के भाव बा। शोध ये खातिर कइल जाला ताकि पीएचडी मिल जाए आ फेर एक अदद नौकरी। रउआ अमेरिका के उदाहरण लीं। उहाँ के विश्वविद्लायन में मूल शोध पर जोर दिहल जाला। एही चलते उहाँ के शोधार्थी लगातार नोबेल पुरस्कार जीत पावे में सफल रहेलन।

ये बहस के तनि अउर व्यापक क दे तानी। अपना फार्मा कंपनियन के ही लीं। ई लोग नया दवा ईजाद करे पर होखे वाला रिसर्च पर केतना निवेश करेला?  ई मुनाफ़ा के अनुपात में बहुत ही कम राशि शोध पर लगावेला। इहे हालत अपना स्वास्थ्य क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम सबके रहल बा। इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल लिमिटेड (आईडीपीएल) के हीं बात कर लीं। एकर स्थापना 1961 में कइल गइल रहे, जेकर प्राथमिक उद्देश्य आवश्यक जीवनरक्षक दवाइयन में आत्मनिर्भरता हासिल कइल रहे। पर एकरा करप्शन के कारण घाटा पर घाटा भइल। इहाँ भी कबो कवनों महत्वपूर्ण शोध ना भइल। अब देखीं कि भारत में शोध खातिर सुविधा त बहुत बढ़ल, इंटरनेट के सुविधा सभी शोधार्थियन के आसानी से उपलब्ध बा, प्रयोगशाला सबके स्तर भी सुधरल बा, सरकार शोधकर्ता सबके आर्थिक मदद भी करेला। एकरा बावजूद अपना इहाँ शोध के स्तर घटिया ही हो रहल बा। त फेर हम काहे एतना सब पीएचडी के डिग्री बांटते ही जा रहल बानीं? आखिर हम साबित का करे के चाह रहल बानीं ? हम अइसन अनेक शोधार्थियन के जान रहल बानीं जे कुछ साल तक अपना विश्वविद्लायन से पीएचडी करे के नाम पर पैसा लिहलस अउर उहाँ के छात्रावास के भी भरपूर इस्तेमाल कइलस। ओकरा बाद उ बिना शोध पूरा कइले अपना विश्वविद्लाय के छोड़ देहलस या उहें बइठ के राजनीति करे लागल।

एक बात समझ लीं कि हमनीं के शोध के गुणवत्ता पर बहुत ध्यान देवे के होई। ओ शोधार्थियन से बचे के होई जे दायें-बायें से कापी-कट आ पेस्ट क के आपन शोध थमा देला। ये मानसिकता पर तत्काल से रोक लागे के चाहीं। शोध के विषय तय करे के एक मात्र मापदंड इहे होखे कि एसे भविष्य में देश अउर समाज के का लाभ होई ? शोधार्थियन के गाइड्स पर भी नजर रखल जाए कि उ कवना तरह से अपना शोधार्थी के सहयोग कर रहल बाड़ें। बीच-बीच में शिकायत मिलत रहल बा कि कुछ गाइड्स अपना शोधार्थियन के प्रताड़ित करत रहेला लोग। ये सब बिन्दुअन पर भी ध्यान दिहल जाए।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)

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