कोरोना काल का आदमी के आदमी बना सकी ?

कोरोना काल का आदमी के आदमी बना सकी ?

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Posted: June 1, 2021
Category: संपादकीय
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संपादक- मनोज भावुक

कोरोना पॉजिटिव होके कोरोना प लिखल आसान ना होला। हँथवा काँपे लागेला। काँपतो बा। लैपटपवा प बइठत बानीं आ लिखे खातिर जोर मारत बानीं त आँखी के सोझा अइसन केतना चेहरा नाँच जाता जे आज से दस दिन पहिले ले सङे हँसत-बोलत-बतियावत रहे आ आज ओह में से केहू के अस्थि विसर्जित कइल जाता, केहू के लाश गंगा जी में दहsता त केहू के लाश श्मशान घाट प अपना बारी के इन्तजार में बा। जीव धक्क दे हो जा रहल बा। आँख लोरा जाता। शब्द धुँआये लागsता। दिमाग सुन्न हो जा रहल बा। घंटन लैपटॉप के सोझा बइठल रहला के बादो कुछ लिखात नइखे।

दोसरा हाथ में मोबाइल बा। फेसबुक से भागल रहनी हँ। फेर फेसबुक प आ गइनीं। शुभचिंतक लोग मना करsता। बाकिर मन मानत नइखे। दोहरियाइ के आवे के पड़sता। शुतुर्मुग लेखा मुँह फेर लिहला से त होई ना। अपना खातिर भा दोसरा खातिर मददओ एहिजे माँगे के बा। कुछ लोग योद्धा जइसन दिन-रात मदद में त कुछ लोग गिद्ध जइसन नोंचे में लागल बा।

कुछ लोग बेमारी से ठीक होखे खातिर फेसबुक पर एक-दोसरा के शुभकामना देता। प्रार्थना आ दुआ में असर होला, करहीं के चाहीं। बाकिर जे सामर्थ्यवान बा ओकरा अपना हीत-मीत से इहो पूछ लेवे के चाहीं, जे, काहो दवा-बीरो आ टेस्ट आदि खातिर रूपया-पइसा बा नू ? काम धंधा चलsता नू ? नोकरी बाँचल बा नू ? पइसा के कमवा त पइसे से नू होई, ए चनेसर।

साल 2019 में चीन में पैदा भइल ई कोरोना वायरस सउँसे दुनिया के हिला देले बा। काम धंधा, व्यापार, बाजार सभ रुक गइल बा। मध्यम वर्ग के बहुलता वाला भारत अब रोटियो खातिर तरसे लागल बा। इ कोरोना जवन सउँसे साल बीस लील लिहलस, एकइसओ प आपन दाँत गड़वले बा।

शहर त शहर गाँवहूँ में ई बेमारी अबकी फइलल जाता। अपने घर वाला अपना आदमी के अर्थी नइखे छूअत। एह डरे जे ओकरो कोरोना मत हो जाव। प्रशासन के गुहार लगावे के पड़sता जे लाशन के अंतिम संस्कार के व्यवस्था कइल जाय। मुर्दा देहि के जवन गंजन हो रहल बा, न्यूज आ सोशल मीडिया पर ई कूल्हि देखि के दिल दहल जाता। ई कोरोना कौ सदियन में मानवता प आइल सबले बड़ त्रासदी बन के सोझा ठाढ़ बा।

बाकिर, ईहो ओतने साँच बा, जे अब कोरोना के वैक्सीन आ गइल बा। एकर सकारात्मक असरओ  लउक रहल बा। कोरोना के इलाज खातिर नया-नया दवाई खोजा रहल बा। ऑक्सीजन के किल्लत से मर रहल लोगन खातिर ऑक्सीजन के नया-नया प्लांट खुल रहल बा। विदेशन से मदद मिल रहल बा। त एह हिसाब से हमनियो के सकारात्मक रहे के चाहीं। ढेर छरिअइला से बेचैनिये नू बढ़ी। हँ, ऑक्सीजन आ इलाज के कमी से लाखन लोगन के जान गइल बा, ई तोपे जोग नइखे। कुछ लोग दवाई, ऑक्सीजन, एम्बुलेंस के कालाबाजारी में लागल बा। कुछ लोग दवाई आ उपकरण के मुहैया करावे के नाँव प ऑनलाइन ठगी क रहल बा। जबकि ई सभ के मालूम बा जे ई महापाप हs। सियासी खेला जवन बा तवन अलगे बा। हमरा आपन लिखल कुछ शेर ईयाद पड़sता -


अर्थी के साथ बाज रहल धुन बिआह के
अब एह अनेति पर केहू कहँवाँ सिहात बा

संवेदना के लाश प कुर्सी के गोड़ बा
मालूम ना, ई लोग का कइसे सहात बा



उ अदिमिये कइसन जेकरा में दया, प्रेम, करुणा आ  ममत्व के भाव ना होखे। मनुष्यता के त इहे सब पहचान हs। जेकरा में से इ सब गायब होला, उ अपराधी बन जाला। त का ई कोरोना काल आदमी के आदमी बना सकी ?

लोग कहsता जे कोरोना के तिसरको लहर आवे वाला बिया। जब ले कोरोना के समूल नाश ना होई, तले ई रक्तबीज बन के उगत रही। एही से हमनियो के माँ चंडी जइसन एकर विनाश करे खातिर एक सङे मिल के, एक दोसरा के सहयोग से, अपना अंदर के मनुष्यता के जीवित राखत उ सब करे के पड़ी जवन एकर नाश खातिर जरुरी बा।

कोरोना काल खातिर लिखल अपना संकल्प गीत से बात खतम कइल चाहबि –

नेह-नाता के ऑक्सीजन से 

मन के इम्यून के बढ़ावे के

जंग जीते के बा कोरोना से 

एही संकल्प के गोहरावे के

दुख त चारो तरफ पसरले बा

सुख के कुछ गीत अब कढ़ावे के

यार जहिया ले सांस साथे बा 

जिंदगानी के गीत गावे के

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