पानी प पानी लिखे के कोशिश

पानी प पानी लिखे के कोशिश

By:
Posted: July 8, 2021
Category: संपादकीय
Comments: 0

संपादक- मनोज भावुक

विचार से बढ़ के ताकतवर दुनिया में कुछु नइखे। मन में जब जइसन विचार चलेला, देह आ चेहरा के हाव-भाव ओइसने हो जाला। विचार में सुख के दुःख आ दुःख के सुख में बदले के ताकत बा। महत्वपूर्ण ई बा कि हम कवनो घटना के कइसे देखत बानी। देखे के ताकत आँख में ना, विचार में होला। आँख त बस एगो कैमरा ह। असल चीज त मनवे बा। मन विचार के कारखाना ह।

मन कइसन बनी, ई बहुत कुछ माई-बाप पर भी निर्भर करेला। माई-बाप के पहिला गुरु कहल जाला। कुम्हार कहल जाला। संतान त माटी ह, जवना के सान के माई-बाप रूपी कुम्हार मुकम्मल शेप देला, मतलब लइकन के आदमी बनावेला। एगो बात दिल से कहsतानी। एह के रउरो मानब। केतनो बाउर माई-बाप होखे, क्रिमिनले काहें ना होखे, उहो ना चाही जे ओकर औलाद बुरा होखे। उहो चाहेला कि ओकर बेटा-बेटी इंसान बने।

बाकी परवरिश आ परिवेश दूनो के असर होला। माई-बाप के डीएनए त रहबे करेला। ओह गुणसूत्र से गुण-दोष त अइबे करेला। एही से नू औलाद के माई-बाप के छाया भा प्रतिरूप कहल जाला।

माई-बाप प लिखल आसान ना होला। जे रउरा के लिखले बा, ओकरा प रउरा का लिखब जी ? ओकरा के शब्द में कइसे बान्हब ? हं ! अपना जिंदगी के ओह लेखक खातिर संवेदना के चार गो शब्द समर्पित कर सकीले। एह अंक में उहे चार गो शब्द उकेरे के कोशिश कइल गइल बा। बाकिर ई कोशिश भी पानी प पानी लिखे के कोशिश जइसन बा।

‘’ माई-बाबूजी विशेषांक ‘’ के संपादन के दौरान केतना बार हमार आँख लोराइल बा, कह नइखीं सकत। एह अंक में किसिम-किसिम के दुनिया समाइल बा। दुःख के दरियाव बा। सुख के समुन्दर बा। हम केतना पंवड़ी ? कई बार त लागल कि डूब गइनी।

कुछ विद्वान लोग माई-बाबूजी के भगवान के प्रतिनिधि कहले बा। कहले बा कि चूँकि ईश्वर हर जगह नइखन पहुँच सकत, एह से उ माई-बाप के गढ़ले। कुछ लोग त इहाँ तक कहले बा कि का जाने भगवान होलें कि ना होलें, दुःख सुनेलें कि ना सुनेलें बाकिर माई-बाबूजी त बेकहले दुःख बूझ जालें आ छटपटा के, बेचैन होके, अपना के खपा-मिटा के भी अपना बाल-बच्चा के मदद करेलें। त माइये-बाबूजी नू साक्षात भगवान बाड़ें।

हमार कहनाम बा कि माई-बाबूजी अच्छा-बुरा हो सकेलें। उहो इंसाने हउअन। सरधा से ओह लोग के भगवान भले कह दीं भा मान लीं बाकिर ई साँच बा कि उ लोग भगवान ना ह। त अगर ओह लोग से कवनो भूल हो जाय त दिल बड़ा क के भुला जाये के चाहीं। इंसान से भूल होला। होखे के त भगवानो से होला। बाकिर केहू के आदर्श भा भगवान मनला प भूल के पचावल तनी कठिन होला, एह से आदमी के आदमिये मानल ठीक होई। रउरा अपना माई-बाबूजी के सरधा से भगवान मानीं भा पूजीं, एह में कवनो दिक्कत नइखे। आसिरबादे मिली। बाकी अंधभक्त मत बनीं। अंधभक्त त केहू के बनल ठीक ना ह। चेतना के द्वार हरदम खुला रहे के चाहीं। हमनी के शास्त्र में लिखल बा -

सुशीलो मातृपुण्येन, पितृपुण्येन चातुरः ।

औदार्यं वंशपुण्येन, आत्मपुण्येन भाग्यवान ।।

अर्थात- कवनों भी इंसान अपना माता के पुण्य से सुशील होला। पिता के पुण्य से चतुर होला। वंश के पुण्य से उदार होला आ अपना स्वयं के पुण्य से उ भाग्यवान बनेला।

त सौभाग्य प्राप्ति खातिर सत्कर्म त करहीं के पड़ी !

संतान के कर्म अइसन होखे कि माई-बाबूजी लोग ओकरा प गर्व करे आ दिल से दुआ देव अउर  माइयो-बाबूजी लोग अइसन होखे कि संतान उनका के आपन आदर्श माने आ पूजे खातिर बाध्य हो जाय, एही कामना के साथ -प्रणाम !

Hey, like this? Why not share it with a buddy?

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


About us

भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


Contact us



Newsletter

Your Name (required)

Your Email (required)

Subject

Your Message