अपना घरे

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Posted: July 28, 2021
Category: आलेख
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 महेंद्र प्रसाद सिंह

हमार बाबूजी स्व. गोविन्द सिंह ( जनवरी 1900 से 15 जनवरी 1990 ), एगो बहुते आदर्श शिक्षक रहीं आ हमार माई स्व. जोन्हा देवी (1919  से 7 जुलाई 2014), एगो कुशल आ कर्मठ गृहिणी। बाबूजी आचार्य शिवपूजन सहाय के शिष्य रहनी आ अपना कैरियर के शुरुआत राजपूत हाई स्कूल छपरा में एगो शिक्षक के रूप में कइनी। कुछे साल बाद स्कूल के सचिव से मतभेद का चलते विद्यालय छोड़ि के ऊहाँ के उत्पाद विभाग में किरानी के रूप में ज्वाइन कइनी आ बड़ा बाबू होके 1962 में रिटायर कइनी। तब हम साढ़े दस साल के रहीं आ 7 वां कक्षा में हितनारायण क्षत्रिय विद्यालय, आरा में पढ़त रहीं। आठवां में हम अपना गाँवे, चाँदी आ गइनी आ बाबूजी खेती-बारी में लाग गइनी।

एगो गिरहथिन के सब काम करे आ जाने के अलावे हमरा माई के रामायण के चैपाई आ गीता के श्लोक पढ़े आ इयाद करे के सवख रहे। माई में कथा सुनावे के अद्भुत् हुनर रहे। ओकर कथा जादुई असर करत रहे। कथा का भाव के अनुसार माई के स्वर में गजबे उतार-चढ़ाव रहे आ ओइसहीं रहे भाव भंगिमा। लड़िकाईं में, कथा सुनत खानी, हम माई के एकटक से मुँह ताकत रहब आ कथा के संगे ओकर भाव में डूबत-उतरात रहब। कबो-कबो हमार तल्लीनता आ भाव देखि के माई अचके हँसे लागी। रात के खाना माई से कथा सुनत-सुनत हम खात रहीं।

सात साल के उमिर से हम बाबूजीए के साथे आरा रहत रहीं आ माई गाँव पर रहि के अनाज-पानी संगोरे-सरिआवे के काम सम्हारत रहे। बाबूजी के अंग्रेजी आ गणित बइुत बढ़ियाँ रहे। उहाँ के पढ़ावल अंग्रेजी का चलते हम हिन्दी मीडियम में 12 वीं पास करके बीएससी पार्ट वन से अंग्रेजी मीडियम में पढ़े आ लिखे के शुरू कइनी आ उहें के देन रहे कि हम सेल के मैनेजमेंट ट्रेनी (एडमिनिस्ट्रेशन) के रूप में बाद में जाके चयनितो भइनी। बचपने में हम बाबूजी के परम भक्त रहनी। जब हमरा बोखार लागे त बाबूजी रात भर बेना डोलावत रहि जाइब। जब हमरा पीठि में गम्हौरी हो जाए त एक हाथ से गम्हौरी सुहरावत आ दोसरका हाथ से बेना डोलावत रहब। बाबूजी खातिर हमनी के संबोधन रउवा से करे के सीखावल गइल रहे।

बाबूजी करीब 75 साल तक, एगो सजग किसान लेखा, सब खेत बधार घूमत-फिरत रहब आ ओकर जानकारी राखब। उहाँ का एह काम में हमनी के पूरा परिवार के सहयोग रहे। बाहरी सहयोग में बड़का भइया, हम आ बड़का भइया के दूनो लड़िका जे हमरा से क्रमशः 4 आ 8 साल छोट रहन स। भीतरी सहयोग रहे माई, बड़की भउजी आ हमरा तीन गो बहिन जवना में एगो हमरा से 2 साल बड़ आ दू गो हमरा से छोट रही जा। बाबूजी के बायां कलाई पर वेस्ट ऐण्ड वाच कम्पनी के घड़ी आ दहिना में बेंत के छड़ी पहचान रहे। बड़ होके जब हम आम के बगइचा के रखवारी करे जाइब त सबसे मीठका आम जवन टपकी ऊ बाबूजी खातिर ले आइब। अइसने रहे बाबूजी से प्रेम आ उहाँ के प्रति आदर। हम माई के सोझा बहुते बदमासी करत रहीं। बाबूजी के मालूम रहे कि उहाँ के गैरहाजिरी में हम बदमासी करीला बाकि कबो जनाए ना देत रहीं कि ओकर जानकारी उहाँ के बा। हमार कुल्हि उदण्डता माई के सोझा रहे। ऊ चाहे खाए के लेके होखे भा नेहाए के लेके होखे। मारो-पिटाई हम माईए से कबो-कबो खात रहीं। बाबूजी से त कबो ना खइनी। दण्ड देवे के काम कबो-कबो हमरा से साढ़े पाँच साल बड़ भाई (नगेन्द्र भइया) करत रहस। माई के मरला के कवनो गमे ना रहे।

कवनो विषय में नम्बर कम आवे त बाबूजी हमार निराशा आ दुःख के तुरंते दूर कर देत रहीं। ऊहाँ के बराबर कहब- ”असफलते सफलता के कुंजी ह। अगिला बेर बढ़ियाँ नम्बर आई, चिन्ता काहे कइले बाड़ऽ।“  बाबूजी के बात साँच होत गइल। खेती-बारी करे में हमार खूबे मन लागत रहे। हमरे सोहनी-कोड़नी करत देखिके गाँव के एक आदमी हमरा बाबूजी के सलाह दिहलन, ”चाचा खेती-बारी के काम करे में ई एकदम तेज बा। एकरा के खेतीए में लगाइब।“  बाबूजी कहनी- ”पढ़हूँ में ठीक बा। सब विषय में पास हो जाला“। जवन काम करे में हमार मन लागे ओकरे बाबूजी कबो रोके के कोसिस ना कइनी। छठवां कक्षा में जब हम पढ़त रहीं त एक बेर हमरा स्कूल से लवटत राह में एगो कलम मिल गइल। बाबूजी के निर्देशानुसार हम बिहान भइला प्राचार्य के कार्यालय में जमा कर अइनी।

किशोरावस्था में हम चाहें बगइचा में बइठ के मचान पर पढ़ी भा ओहिजा गारा-ईटा के घर बना के ओह में पढ़ीं भा मचान के नीचे माटी के घर बनाके, ओह में पढ़ी भा खेते, खरिहान लागल मड़ई आ मचान पर पढ़ी, बाबूजी के कवनो एतराज ना रहे। बाबूजी बस हमरे प्रोत्साहन देत रहीं। हमार बदमासी का ओर जब धेयान जाई त अइसे समझाइब जइसे कवनो नैतिक-सामाजिक पाठ पढ़ावत होखीं।

मातृभाषा भोजपुरी आ हिन्दी के प्रति उहाँ के बहुत प्रेम रहे। बाकि अंग्रेजी सीखे आ पढ़े पर उहाँ के बराबर जोर देत रहीं। हमार संघतिया चिरकावत रहन स-”एकर बाबूजी बैलनो से अंग्रेजीए में बतिआवेलन“। साइत उहां के मन में रहे कि आगे आवे वाला बरिसन में अंग्रजीए बुद्धि के बटखरा बनी। दुर्भाग्य से ऊ आजो सांच बा। हम बाबूजी लगे अंग्रेजी में आ माई लगे भोजपुरी में चिट्ठी लिखत रहीं। कई बेर बाबूजी अंग्रेजी सुधार के हमार चिट्ठी बापस भेज देत रहीं। बीएस.सी के इम्तिहान देके हम शत्रुंजय संगीत महाविद्यालय, आरा संगीत में नाम लिखवनी। स्व. चन्द्रषेखर पाठक जी हमार गुरु रहनीं। जे थोर बइुत गावे-बजावे से सीखनी ऊहें के असीरबाद से। बाबूजीओे सुर में भजन गावत रहीं। हमनी के नाटक देखे उहाँ के जरूर जात रहीं आ अच्छा अभिनय कइला पर बड़ाइयो करत रहीं।

बाबूजी आ माई दिव्य जीवन संघ, ऋशिकेश के संस्थापक स्वामी शिवानंद सरस्वती के शिष्य रहल लोग। नैतिक ज्ञान पर बबूजी के बहुते जोर रहत रहे। उहाँ के टेबुल पर स्वामी शिवानंद सरस्वती के लिखल किताब जरूर रहत रहे। जब हम ग्यारहवीं-बारहवी कक्षा में रहीं त गुरू जी के लिखल ”ब्रह्मचर्य साधना“ पढ़े के शुरू कइनी फेनु ”ध्यानयोग रहस्य“। बाबूजी हर महीना में गुरूजी के संपादन में प्रकाशित एगो अंग्रेजी पत्रिका मंगवावत रहीं जेकर नाम रहे ”डिवाइन लाइफ“। एह किताबन के प्रभाव हमरा जिनगी में हरमेसा रहल। जब हम बोकारो स्टील प्लांट में संपदा अधिकारी (आवास आबंटन) रहीं त गाँव-जवार के लोग उहाँ लगे पैरवी खातिर चहुँपे लागल। हमरा भिरी बाबूजी का ओर से केहू खातिर पैरवी त ना आइल बलुक एगो चिट्ठी आइल जे आजो हमरा लगे बा। ओकर सार रहे- ”जवन नैतिक पाठ तहरा के हम पढ़वले बानी ओकर परीक्षा के असली घड़ी आ गइल बा। हमरा उम्मेद बा कि तू ओह पर खरा उतरबऽ।“ उहाँ के विश्वास के हम ना तूरनी।

माई में अभिनय के जबरदस्त क्षमता रहे। जब हम बोकारो से दिल्ली अइनी त एक बेर माई से निहोरा कइनी आपन नाटक ”बिरजू के बिआह“ में बबुनी काकी के भूमिका अदा करे खातिर। माई तुरंत तैयार। बस एके गो शर्त रहे। गाँव के केहू ना नू आई देखे?  ‘ना’  सुनते माई तइयार। ओकरा बाद माई बबुनी काकी के बेर-बेर अभिनय कइके दिल्ली के दर्शक लोगिन का बीच आपन लोहा मनवा लेलस। सन् 2000 में माई भोजपुरी के पहिलका लघु फिल्म ”पहरूआ“ में हमरा साथे अभिनय कइलस। एह फिल्म के लेखक, पटकथा लेखक, आ सहायक निर्देशक हम रहीं। जब-जब माई के देखे के मन करेला हम ओह फिल्म के देख लिहिला। हालाँकि माई के सबसे यादगार अभिनय रहे, ”बिरजू के बिआह“ में बबुनी काकी के भूमिका में। विशेषकर ओह मंचन में जवन नवम्बर 2000 में, मावलंकर हाल, दिल्ली में भइल। अवसर रहे विश्व भोजपुरी सम्मेलन, दिल्ली, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना आ रंगश्री के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पहिलका विश्व भोजपुरी सम्मेलन जेकर मुख्य संयोजक रहनी डा. प्रभुनाथ सिंह जी। नाटक के जोरदार प्रस्तुति का बाद ग्रीन रूम में माई के जोहत बानी त पते ना। कहाँ गइल माई? भइया नाटक देखे आइल रहन, अपने संगे लिअइले त ना गइले? थोड़े देर बाद पता चलल कि माई त मंचे पर बइठल बाड़ी आ चारों ओर से पत्रकार लोगिन घेरले बा। माई इंटरभ्यू देत रही।

बेटा का रूप में माई-बाबूजी के संगे बीतावल सबसे सुखद आ संतोषप्रद क्षण रहे जब बाबूजी बोकारो आके हमरा संगे एक महीना रहीं आ हम रोज सुते के पहिले गोड़-हाथ दबाई आ गोड़ में सरसों तेल मालिश करीं। फेनु माई-बाबूजी के लिया के तीर्थाटन करावे गइनी। बाबूजी के आखिरी दिन में बिस्तर धइला का बाद उनकर नित्य क्रिया कर्म करवला के संतोष सबसे जास्ती रहल। हालाँकि ओकर अवसर दू चारे दिन मिलल फेनु त ऊहाँ के एह दुनियाँ के छोड़ गइनी। दुःख ई रहल कि अंतिम पेयान घड़ी हम ना रहीं।

खैर माई के आखिरी छव साल हमरे संगे दिल्ली में बीतल। सुखद स्मृति रहल उनके, सांझे-भोर 20-20 मिनट भजन सुनावल। माई से भइल अंतिम बातचीत हम हू-बहू नीचे देत बानी।

माई  -    बबुआ हो अब हम जाइब।

हम   -    कहवाँ?

माई  -    अपना घरे।

हम   -    चाँदी? (नरहीं चांदी, भोजपुर)

माई  -    अरे ना रे। अपना घरे।

हम   -    पिपरपाँती? (हमार मामा गाँव पिपरपाँती ह। लागल कि माई के आपन जन्मभूमि इयाद आवत बा।)

माई  -    अरे ना हो अपना घरे।

हम   -    नगेन्द्र भैया के घरे?

माई  -    अरे ना रे

हम   -    राम जी का घरे?

माई  -    हँऽऽ।

हम   -    त राम-राम करबू तबे नू रामजी अइहें लिआवे।

माई  -    त तूहीं नू करावऽ ल राम-राम।

हम माई के भजन करवावे लगनी। माइयो संगे-संगे गावे के कोसिस करत रहली। हम तब तक गावत रहनी जब तक फूट-फूट के रोवे ना लगनी। बुझाइल कि राम जी आ सीता जी आके सामने ठाढ़ हो गइलें। माई के ओठ हिलत रहे बाकि ‘राम’ आवाज ना सुनात रहे। बड़की दीदी आ बाकी परिवार के लोग राम-राम बोलवाले के कोसिस करत रहल। बिहान होके माई अपना घरे चल गइली।

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