माई-बाबूजी के रूप-गुण बिसर ना पावे

माई-बाबूजी के रूप-गुण बिसर ना पावे

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Posted: July 28, 2021
Category: आलेख
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 मार्कण्डेय शारदेय

माई-बाबूजी के रूप-गुण बिसर ना पावे। बाबूजी के कद सामान्य आ रंग गोर रहल, बाकिर माई के रंग विशेष गोर रहे। ओकरा जइसन सुन्दर हमरा घर में कवनो पतोह ना आइल लोग। दूनो बेकत पान के शौकीन रहन। बाबूजी पान लगावसु तs माइयो के देसु आ माई पान लगावे तs बाबुओजी के देउ। पनबट्टा पासे रहत रहे।

हमार बाबूजी (पुण्यश्लोक रामचन्द्र मिश्र) अइसन घर में जनमलें, जहँवा कुछुओ के कमी ना रहे। जवन कमी रहे, ऊ बुझाये लायेक बा। पुरुखा रहल लोग हs तs का कहाउ! सुनले रहीं जे  डुमराँव महराजा के ओर से पाँच सौ बिगहा जमीन दान में मिलल रहे। उनुकर बाबूजी, माने हमार बाबा तीन भाई रहलें। तीनो भाइयन में छोटका बाबा के देहे बस, बाबुएजी रहन। सुनले रहीं जे बड़का बाबा के सासाराम के पास मलवार में साइत अढ़ाई सौ बिगहा जमीन ससुरारी से मिलल रहे आ ऊ ओहिजे रहत रहलें।

तीनो बाबा में से हम केहू के ना देखले रहीं। महल्ला-टोला के बूढ़-पुरनिया लोग खूब बिरुदावली बखानसु। सुनले रहीं जे बड़का बाबा अपना समय के ग्रेजुएट रहलें। अउर बाबा कतना पढ़ल रहलें, पता ना। बाकिर अतना तs बुझइबे करsता जे ऊहो दूनो भाई लगभग ओही तरे पढ़ल-लिखल होई लोग। दूर के ढोल सोहावन होला। बड़का बाबा एहिजा ना रहत रहन, साइत एहीसे उनुकर गीत ढेर गावसु लोग।

हमरा होश में खाली हमार मइया (दादी) रही। बाबा लोग साइत धन के तीन गतियन के बारे में नीके जानत रहलें। तीनो के एके मत रहे; खूब भोग होखे के चाहीं। राजा के दीहल अतना जमीन, बढ़िया घर-दुआर, बाग-बगइचा, हाथी, बग्घी रहला से समुझस लोग जे लक्ष्मी कबो छोड़िये ना सकसु। खूब खा, पीयs, मौज उड़ावs। बस; तीनो जाना के ईहे हाल रहे। खानदान के एगो लइका बाबूजी के पढ़ाई-लिखाई से केहू के कवनो मतलब ना रहल।

मझिला बाबा के ससुरारी गिरिधर बराँव रहे। ओह परिवार में बढ़िया-बढ़िया संस्कृत के पण्डित-विद्वान भइलें। बाबूजी के उनुकर चचेरा मामा अपना केने ले गइलें। ओहिजे पढ़ाई शुरू भइल। फिर कुछ दिन डुमराँव तs कुछ दिन बनारस पढ़ते बियाह हो गइल।

सुनले रहीं भा बाबुओजी कहत रहन जे जब जमीनदारी-प्रथा खत्म होखे लागल तs डेढ़-दू सौ बिगहा उनुको नामे जमीन कs दियाइल। बड़का बाबा पान खाये में और मौज में मलवार के सभ मिल्कियत गँवा गइलें। मझिलो बाबा के ऊहे हाल। केहू के नोकरी-चाकरी भा कवनो काम करे के प्रवृत्ति ना रहल। रजइसी रहल। जमीन बेचत-बेचत जब हमरा बाबा के नाँव के जायदाद लगभग ओरा गइल तs कुछ समझ आइल। ऊ कवनो स्कूल में पढ़ावे गइलें। कs दिन पढ़वलें;  पता ना। एक दिन हेडमास्टर कहलें, ‘मिसिरजी! होह क्लास में चल जाईं’। उनुका बेजाँइ लागल। उनुकर अहंकार जाग गइल। साइत पहलवानियो के शौकीन रहन ऊ। हेडमास्टर के उठाके पटक देलें आ कहलें, ‘महराजा हमार पाँव पूजेलें आ तू हमरा के आर्डर देब’! तब से बचल-खुचल बेंच-बेंचिके आराम से खात-खियावत रहलें।

लक्ष्मीजी के आवे में चाहे जवन समय लागे, बाकिर जाये में समय कमे लागेला। बाढ़ के पानी आके पूरा डुबा देला, बाकिर जलदिये ससरि जाला। ठीक ऊहे भइल। सभ जायदाद समाप्त हो गइल। चिन्ता बढ़ल, बाकिर बाबूजी के नामे कइल जमीन पs डीठि लागल। आखिर अतना बड़ले बा तs का सोचेके बा! बबुआ थोड़े नकरिहें। नकरिहें तs कँड़इहें।

एक दिन कहलें, ‘सुनs दस बिगहा जमीन बेचे खातिर एगो से बात कs लेले बानी। चल के रजिस्ट्री कs दs’।

दस बिगहा बेंचा गइल। कुछ दिन ऐश भइल। फिर दस बिगहा, फिर दस बिगहा; कबो-कबो बीसो बिगहा।

बाबूजी पितृभक्ति में भा डरे उनुकर आदेश पालत गइलें। अब अन्तिम बीस बिगहा बचल रहे। गाँव-जवार के लोग भा माइयो बाबूजी के समुझावे कि सभ जमीन चल जाई तs लइकन खातिर का रही!  हम तs ना, बाकिर हमार भइया लोग हो गइल रहलें। साइत बड़के भइया। एह बेरी बाबूजी मुँह खोललें, कहलें, ‘बाबूजी! लइका-फइका बाड़ें सँs, ओहनियो खातिर कुछ चाहीं नू’!

तs ऊ कहलें, ‘तू बाड़s नू! ई जमीन तहार तs हs ना! ओहनिन खातिर तू काफी बाड़s। हमरा विश्वास बा। परिवार सम्हार लेबs। चलs; लिख दs’।

लिखा गइल। बेचा गइल।

फिर का का बिचाइल आ का का भइल, बड़ बात नइखे। बात बड़ ई बा जे राजा के पुरोहिताई में अब रस कमे रहल। बाबूजी आपन हालात डुमराँवराज के मैनेजर उदार आ प्रभावशाली व्यक्तित्व (पुण्यश्लोक सुग्रीव सिंह) से कहलें। ऊ बहुत सूझ-बूझवाला रहन। ऊ ओह समय नगरपालिका के अध्यक्षो रहन। एगो स्कूल में मास्टरी में लगा देलें। बाबूजी कइसहूँ-कइसहूँ ट्युशन आ जजमनिका कराके परिवार के पाले लगलें।

बाद में कबो बाबूजी से बात होखे तs कहसु कि हमरा बाबूजी के आशीर्वाद हs जे अपना परिवार के हम कवनो तरे पाल रहल बानी। ऊ जवन कइलें, एक ओर आ उनुकर कहलें, ऊ सबसे बढ़के बा। उनुकर आशीर्वादे हs, जवन फरsता।

हमार माई (रामेश्वरी देवी) मुश्किल से दूसरा-तीसरा पढ़ल होई। बाकिर, मैनेजिंग पावर बाबुओजी से बढ़के रहल। बलुक, चलती ओकरे रहे। का बनी आ का ना बनी; एकर निर्णये ना, लइकन के पढ़ाई के व्यवस्थो कइसे होखी, कहाँ से करजा मँगाई, केकरा केने गहना बन्हकी रखाई; सभ पs ओकरे निर्देशन काम करत रहे। घर से बाहर निकले ना। हमरा उमिर के लइकनो के सामने घूघ तनले रहे। बाकिर, के कब कहाँ गइल आ कब आइल; सभ जानकारी।

ऊ एगो बात हमेशा कहे, ‘दोस्त अइसन हित ना आ दोस्त अस सतरू’। ओकरे प्रभाव रहे जे हमरा साथे पढ़निहारो से अधिका घनिष्ठता ना भइल। साँच कहीं तs केहू पकिया दोस्त ना भइल।

माई तs माई होइबे करेले, ओकरे कहाउत सुनले रहीं,  ‘माई के जिउआ गाइ अस आ पूता के जिउआ कसाई अस’।

ई तs मातृत्व हs, बाकिर ओकरा पs लइकन के कुयोग से बचाहूँ के जिम्मेदारी रहल। एह वजह से कठोरो रहल। एगो घटना याद आवsता। हमार भइया चौकी पs लेटल-लेटल महल्ला के लइकन के मुँहें सुनल गारिन के अभ्यास करत रहन। माई आइल आ खूब जोर के तमाचा मरलस। ओकरा बाद से कवनो भाइन के मुँहे कबो गारी ना निकले। आजुओ हमनी पs ई प्रभाव बा।

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