एक्के डाँट में आत्मनिर्भर हो गइनी

एक्के डाँट में आत्मनिर्भर हो गइनी

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Posted: August 13, 2021
Category: आलेख
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गीता चौबे गूँज 

लड़कपन के भी का दिन रहे! ना कवनो चिंता, ना फिकिर आ ना कवनो जवाबदेही। बस मस्ती के दिन आ चैन के नींद। खा-पिअ, खेल आ सुतऽ। तनी-मनी टहल-टिकोरा केकरो कऽ दऽ आ फेन छुट्टी…। ओही लइकाईं के एगो अइसन  घटना भइल जवन हमरा के आत्मनिर्भर बनावे में मील के पत्थर साबित भइल।

ई बात ओह समय के ह जब हम करीब आठ-नौ बरिस के होखब। हमरा इयाद बा हम तीसरा क्लास में पढ़त रहीं। पढ़े-लिखे के अलावा आउर कवनो काम ना रहे। हमार माई के अपना लइकिन के पढ़ावे के खूब सवख रहे, काहे कि उनका पढ़े के ना मिलल रहे। एह से ऊ आपन सपना आपन बेटी लोग के पढ़ा के पूरा कइल चाहत रही। स्कूल जाए से पहिले रोज एक घंटा सबेरे आ स्कूल से अइला प रात के भोजन से पहिले दू घंटा पढ़े के नियम बनवले रही। ऊ अकेले सब खाएक-पानी बनइहन। कतनो अकाज होत रही बाकी हमनी के पढ़ाई प से उठे ना दिहन।  भिनसहरा से ले के रात गइला तक अकेले खटत रहिहन आ एहि में हमार चोटी करे के भी  टाइम निकाल लेत रही।

तब हमार केश खूब लंबा आउर घना रहे। जे देखत रहे से हाह मारे लागत रहे कि 'अरे बाप रे! हती गो लइकी के हते-हते बार…!'

सभके मुँह से अइसन बात सुन के हमरा बड़ी खीस बरे आ डरो लागे कि कतहूँ नजर ना लाग जाए। एह से हम आपन बार कबो खोल के ना रखत रहीं। हरदम रिबन से दू गो चोटी जवना के ऊपरे मोड़ के फुदेना लगा दियात रहे… ओइसहि माई से बँन्हवा लेत रहीं। जाह दिन स्कूल ना जाए के रहत रहे ओह दिन चोटी ना खुले। शनिचर के बान्हल चोटी सोमारे के खुलत रहे। काहे कि अपने बान्हे ना आवत रहे आ माई के एतवार के फुर्सत ना रहत रहे। माई कहस कि स्कूल जाहिं के नइखे त बार का खोले के बा।

भोरे-भोरे रोज के भागाभागी घर-घर के कहानी रहबे करेला। कोइला के एकछिया चूल्हा प खाना बनत रहे। भोरे-भोरे माई उठ के घर बहार के चूल्हा लीपिहन आ दाल-भात तरकारी, भुजिया आउर बाबूजी के रोटी ( बाबूजी रोटी-भात दूनो खात रहीं ) बना दिहें। कबो-कबो हमरा पढ़े में मन ना लागी त पूछब कि ए माई कुछ करवावे के होखे त कहऽ, हम मदद क देब। बाकी ऊ जान जइहन कि ई पढ़े से बचे खाती बहाना बनावतिया। तुरंत कहिहन कि तू जा, हम कऽ लेब।

बाबूजी के साढ़े नौ बजे कवलेज जाए के रहत रहे आ हमनी के चारों भाई-बहिन के स्कूल जाए के। पहिले ए गो बाथरूम रहत रहे। पारा-पारी लाइन लागले रहत रहे। आपन चोटी गुँथवावे खातिर हम माई के पीछे-पीछे चलत रहब। बाबूजी के खाएक दे के माई हमार चोटी गूँथ देत रही। बाबूजी के ओड़ावन माँगे से पहिले हमार चोटी गुँथा जात रहे। माई के अफरातफरी कतनो रही बाकि ऊ आतना सलीका आ धीरज से सभ काम करिहन कि सभ काम शांति से बेरा प हो जात रहे।

ओह दिना हम स्कूल के गृहकार्य करे में तनिका देर कऽ देनी। बाबूजी के खाएक दे के माई कहली कि जल्दी आव तोर चोटी गुँथ दीहीं। बाकि हमार काम खत्म ना भइल रहे। हम कहनी कि तू ओडावन दे लऽ हम ककही ले के आवतानी। माई ओड़ावन दे के बाबूजी के पंखा हाँके लगली। हम ओहिजे ककही ले के चल गइनी कि ओड़ावन दे लेलू त हमार चोटी गुँथ द। चोटी जब गुँथा गइल त हम झहरा के जइसहीं खड़ा भइनी लाम बार के गुच्छा उड़ के बाबूजी के थरिया में। अब त हमरा कटले खून ना। बाबूजी के थरिया में एके कौर बचल रहे बाकी बार गिरला प केकरो मन घिना जाई। बाबूजी के थरिया छन्नाक से भूइंया पऽ फेंकाइल आ  बाबूजी के दहाड़ अइसन लागल कि कान के पर्दा फाड़ दीही…

"कईंची कहाँ बा रे? ले आव तऽ… अबहिं एकर बार काट के फेंक दे तानी। ना रही बार, ना गुँथाई चोटी…।"

हमार बड़का भइया तुरंत कईंची ले के हाजिर हो गइलन। भइया के हाथ में कईंची देख के हम चलनी पराय। पलंग के नीचे घुस गइनी। देरी तक हमरा कान में बाबूजी के डाँट सुनाई देत रह गइल। एही चक्कर में कवलेज के देरी हो गइल त माइयो के खूब डाँट पड़ल कि लइकिन के माथा प चढ़ा के रखले बाड़ी। बबुआ बना के रखले बाड़ी।

ओह दिन हम स्कूल ना गइनी आ ओकरा बाद बाबूजी के खाए के बेरी कबो उनका सोझा ना गइनी आउर आपन बार अपने से बान्हे के सीख लेनी। शुरू-शुरू में टेंढ़ बांगुच बन्हात रहे बाकी कुछे दिन में खूब नीमन बँन्हाए लागल। ओकरा बाद हम बारे बान्हल का, आपन दोसरो काम अपने से करे लगनी।  हमरा बड़ी ग्लानि भइल कि हमरा चलते माई के डाँट पड़ल।

एह घटना के सकारात्मक प्रभाव पड़ल कि हम पढ़ाई के साथे साथे माई के काम में हाथ बँटावे  लगनी। बाद में सभे खूब चिढ़ावे कि एके डाँट में आत्मनिर्भर बने के मिसाल आउर कतहूँ ना मिली।

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