स्व. शैलजा कुमारी श्रीवास्तव – एक परिचय

स्व. शैलजा कुमारी श्रीवास्तव - एक परिचय

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Posted: August 13, 2021
Category: आलेख
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ज्योत्स्ना प्रसाद

जन्मतिथि- 19 अक्टूबर 1927        पुण्यतिथि- 31 दिसम्बर 1989


‘अपि स्वर्णमयी लङ्का न में लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । । ’

ई कथन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के ह। एह कथन से ही ई बात प्रमाणित हो जाता कि सनातन धर्म आ भारतीय परम्परा में माता के केतना ऊँचा स्थान बा? बाकिर एकर अर्थ ई ना भइल कि माता के महत्त्व के कवनों धर्म-विशेष के चौहद्दी में बाँध के देखल जाव।  काहेकि प्राय: हर धर्म में माता के स्थान बहुत ऊँचा बा। मुस्लिम परम्परा में भी मानल जाला- ‘माँ के क़दमों के नीचे है जन्नत। ’ वइसे ही मरियम के बिना यीशु मसीह के कल्पना ही ना कइल जा सकेला। एह से हर धर्म में ही ना बल्कि जीव-जन्तु में भी अपना माता के प्रति विशेष लगाव देखल जाला। आखिर केहू के अपना माता के प्रति लगाव रहे काहे ना ? माता ही ऊ माध्यम हई जे ईश्वर-अंश के अपना गर्भ में धारण करेली, ओह अंश के कष्ट सहके भी शरीर प्रदान करेली। ओकरा दु:ख-सुख में शामिल होली। एह से कवनों बच्चा अपना सुख में महतारी के इयाद करे चाहे ना लेकिन दु:ख के छाया पड़ते ऊ सबसे पहिले अपना माई के ही इयाद करेला। एही से त महतारी के भगवान के दूसरा रूप भी कहल जाला।

हम अपना माई के अम्मा कहत रहनी। हमरा अम्मा शैलजा कुमारी श्रीवास्तव (जन्म- 19 अक्टूबर 1927- मृत्यु- 31 दिसम्बर 1989) के जन्म पिलुई, दाउदपुर, सारण (बिहार) के एगो सम्पन्न, शिक्षित आ प्रतिष्ठित परिवार में भइल रहे। उहाँ के प्रारम्भिक शिक्षा अपना गाँव में यानी पिलुई में ही भइल रहे जबकि माध्यमिक शिक्षा सीवान से भइल। चूँकि शैलजा जी के परिवार पढ़ल-लिखल रहे, उहाँ के बाबूजी उर्दू-फारसी-अरबी के शायर आ विद्वाने भर ना रहनी स्वयं एम. ए., एल. एल. बी. भी कइले रहनीं। एह से अपना बेटी के उच्च शिक्षा देबे खातिर उहाँ के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस भेजनीं। जहाँ से शैलजा जी स्नातक कइनीं आ साहित्याचार्य के परीक्षा-बिहार संस्कृत समिति से स्वर्ण पदक के साथे उत्तीर्ण कइनीं। जवना के बाद ही शैलजा जी दिघवलिया (सीवान) निवासी रसिक बिहारी शरण (एम. ए., एल. एल. बी.) के चौथा लड़िका (पाँचवीं संतान) श्री महेन्द्र कुमार (एम. ए., एम. काम., डीप. एड.) से परिणय-सूत्र में बँध गइनीं। बाकिर अपना शादी के बाद भी उहाँ के आपन पढ़ाई जारी रखते हुए पटना विश्वविद्यालय से डिप-एड कइनीं आ बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से संस्कृत में एम. ए. कइनीं।

शैलजा जी बिहार में शिक्षा विभाग के विभिन्न पदन के शोभा बढ़ावत अंत मे प्राचार्या, महिला प्रा० शिक्षक शिक्षा-महाविद्यालय, सीवान के साथे-साथे जिला विद्यालय निरीक्षिका, सारण-सह-सीवान एवं गोपालगंज के पद से 31-10-85 के सेवनिवृत्त हो गइनीं। शैलजा जी अपना घर-गृहस्ती आ नौकरी के साथे-साथे साहित्य-सेवा में भी सदा सक्रिय रहत रहनीं।  एकर प्रमाण ई बा कि सन् 1970 में उहाँ के पुरनका सारण जिला भोजपुरी साहित्य-सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष रहनीं त सन् 1972 में कानपुर भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में सचिव के पद पर चयनित भइनीं। सन् 1977 में उहाँ के अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के तिसरका अधिवेशन सीवान में स्वागत-समिति के संयुक्त सचिव के पद पर चयनित भइनीं। ऊहई उहाँ के अ. भा. भो. महिला साहित्य सम्मेलन 1977 के स्वागत मंत्री के पद के शोभा भी बढ़वनीं। सन् 1981 में तिसरका जिला महिला भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षता कइनीं।

शैलजा जी के साहित्य-सेवा के मद्दे नज़र उहाँ के सन् 1984 में साहित्य संचेतना द्वारा सम्मानित कइल गइल रहे। सन् 1990 में भोजपुरी निबन्ध संग्रह ‘चिन्तन कुसुम’ पर अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन द्वारा चित्रलेखा पुरस्कार से मरणोपरांत उहाँ के पुरस्कृत कइल गइल।

चिन्तन कुसुम (भोजपुरी निबन्ध संग्रह, 1981) के अलावा उहाँ के दू गो अउर प्रकाशित किताब लोकप्रिय भइल - कादम्बरी (वाणभट्ट के ‘कादम्बरी’ पर आधारित भोजपुरी में लिखल कथा, 2003) आ श्रद्धा-सुमन (भोजपुरी-हिन्दी-उर्दू कविता संकलन, 2016)।

गोरा रंग, मध्यम कद-काठी, सिन्दूर से भरल मांग, माथा पर बिंदी, कमर के नीचे तक लटकत एगो लम्बा चोटी या कभी जुड़ा बनवले, सिल्क या सूती साड़ी में सीधा पल्ला कइले शैलजा जी के देखते कोई सहज ही समझ सकत रहे कि उहाँ के सादगी के प्रतीक हईं।

शैलजा जी बचपन से ही प्रखर बुद्धि के रहनीं। उहाँ के मिडिल स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा में भी विशेषता के साथे उत्तीर्ण भइल रहनीं। पारिवारिक माहौल भी साहित्यिक रहे। बाकिर सीवान में ओह समय चूँकि लड़कियन के स्कूल ना रहे। एह से बुझाइल कि उहाँ के पढ़ाई में व्यवधान आ जाई। बाकिर अइसन भइल ना। काहेकि उहाँ के 1934 में डी.ए. वी. स्कूल सीवान में नाम लिखा गइल। शैलजा जी के कविता लिखे के क्षमता के एहसास पहिला बेर एही स्कूल में भइल। जब स्कूल में नशाखोरी के रोके खातिर कविता बनावे के छात्र-छात्रा से कहल गइल। शैलजा जी अपना ओही उमिर में जे कविता लिखनी ओकर बानगी देखीं-

ताड़ी दारू गाँजा भाँग पिअला के फल इहे, घरवा में खरची ना देहिया पर लुगवा

नाहीं जो तूँ मनब पिअल नाहीं छोड़ब त, उड़ि जइहें देह रूपी पिंजड़ा से सुगवा

बाकिर शैलजा जी के एह प्रतिभा में पर लागल उहाँ के बनारस अइला के बाद। इहाँ शैलजा जी के आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, पं. बदरीनाथ शुक्ल जइसन चोटी के लोगन से शिक्षा ग्रहण करे के अवसर मिलल। आज त ई बात सोचिए के हमनी रोमांचित हो जाइले कि शैलजा जी के निराला के कविता स्वयं निराला जी से पढ़े के अवसर मिलल रहे। एही के साथे सीवान के पं. नागेंद्रचार्योपाध्याय आ पं. कृष्णचंद्र झा के देख-रेख में शैलजा जी के पढ़ाई-लिखाई चले लागल। शैलजा जी के मेहनत रंग ले आइल आ उहाँ के साहित्याचार्य के परीक्षा में स्वर्णपदक प्राप्त भइल। पढ़ाई के क्रम में शैलजाजी पर संस्कृत के साहित्यकार लोगन के प्रभाव पड़ल। एही बात के पाण्डेय कपिल जी कहतानी- ‘शैलजा जी के अध्ययन के क्षेत्र व्यापक आ बहुवर्णी रहे, बाकिर संस्कृत साहित्य से उनका विशेष लगाव रहे। ऊ वाल्मीकि, कालिदास, हाल, माघ, शूद्रक, श्रीहर्ष, भवभूति, बाणभट्ट, जयदेव, भोज, मुरारि, बिल्हण आ पंडितराज जगन्नाथ के गहन अध्ययन कइले रहली।’ संस्कृत-साहित्य के एह शीर्ष के रचनाकार लोगन के अध्ययन-मनन करे के अवसर मिलला के नतीजा ई भइल कि शैलजा जी के गद्य में ही ना पद्य में भी संस्कृत के प्रभाव देखल जा सकेला। शैलजा जी के बारे में अक्षयवर दीक्षित जी लिखतानीं- ‘ई काव्य रचना बचपने से करत रहली। कविता के अलावे गद्य लेखन में ई खूब निपुण रहली। गद्यों में निबन्ध लिखे में इनका आनन्द आवे। इनका निबन्ध के संग्रह ‘चिन्तन कुसुम’ महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ बाटे। इनकर सबसे महत्त्वपूर्ण काम ई भइल जे बाणभट्ट के कादम्बरी-जवन संस्कृत साहित्य में कठिन भाषा के ग्रन्थ मानल जाला- के शैलजा जी भोजपुरी में सरिया-सरिया के, फरिया-फरिया के टुकड़न में कथा लिख दिहली। ई पुस्तक पढ़ि के केहू कादम्बरी के कथा समझ सकेला।’ उहाँ के आगे लिखतानी- भोजपुरी खातिर ऊ दिन सुदिन होई जब इनकर कविता संग्रह प्रकाशित होई।’

‘कादम्बरी’ के भूमिका में गोविन्द झा जी शैलजा जी के भाषा के ‘फुदकती-थिरकती-सी’ भाषा कहतानी। इहाँ के ‘कादम्बरी’ के बारे में लिखतानीं- ‘प्रस्तुत कादम्बरी भले ही बाणभट्ट की कादम्बरी की प्रतिच्छवि हो, पर इसकी छवि नि: सन्देह इसकी अपनी है- ऐसी छवि जो बाणभट्ट की महनीय देव-वाणी में नहीं, भोजपुरी- जैसी लोकवाणी में ही उतर और निखर सकती है। बाणभट्ट की कादम्बरी राज-दरबार के लिए है तो प्रस्तुत कादम्बरी जनता-दरबार के लिए। .. यह तो भोजपुरी की कादम्बरी न तो आज के कथा-साहित्य में रखी जा सकती है, न लोक-साहित्य में। विनम्र शब्दों में और निश्छल रूप में यह कादम्बरी की काया नहीं आत्मा है और इसी रूप में इसकी उपयोगिता है, इसकी पठनीयता है।’

‘चिंतन कुसुम के भूमिका में आ. विश्वनाथ सिंह लिखतानी- ‘शैलजा जी कवि आ कहानीकारो हई। इनका भोजपुरी-हिन्दी-कविता के कुछ नमूना उदाहरण का रूप में एह पुस्तक में जगह-जगह मिली। बाकी ई समझे में कवनो कठिनाई नइखे कि इनका व्यक्तित्व के प्रधान रूप अध्ययन, भावन आ चिन्तन का तंतुअन से बनल बा। शैलजा जी के अध्ययन के क्षेत्र काफी व्यापक बा। संस्कृत, अँगरेजी, उर्दू, हिन्दी आ भोजपुरी-काव्य के अनुशीलन के साथे-साथे एक ओर लोकगीतन का लालित्य से आ दोसरा ओर योग आउर भक्ति का आध्यात्मिक तत्वन से लेखिका के जवन समृद्ध मानस निर्मित भइल बा ओकर परिणत स्वरूप एह चिन्तन कुसुम मे मिलsता। इनका दार्शनिक अध्ययन का विस्तार में गीता, उपनिषद् अउर हठयोग, नादयोग से लेके बाइबिल तक के समावेश बा।’

पाण्डेय कपिल जी चिन्तन कुसुम के आमुख में लिखतानी- ‘चिंतन के अइसन फूल त पाण्डित्ये का गाछ पर फुला सकेला। शैलजा जी के विदुषी व्यक्तित्व के आयाम बहुत व्यापक बा। —एह विशिष्ट कृति खातिर श्रीमती शैलजा कुमारी श्रीवास्तव जी भोजपुरी-जगत के साधुवाद के पात्र बानीं।’

डॉ. रमाशंकर श्रीवास्तव काव्य-संकलन ‘अमराई’ में शैलजा जी के गीतन के मधुरता, प्रवाहमयी भाषा आ मनोहारी भाव-बिम्बन के सराहना करत लिखले बानी- ‘शैलजा जी मधुर गीतों की कवयित्री थीं । ’

प्रो. अनिल कुमार प्रसाद लिखतानीं- ‘..शैलजा जी का शब्द-चयन तो अद्भुत है ही लेकिन शब्दों की सरसता एवं लयबद्धता से जो उस कविता में संवाद के स्तर पर वातावरण तैयार हो रहा है वो उत्कृष्ट और काबिलेतारीफ है । ’

उर्दू और अंग्रेजी के प्रसिद्ध आलोचक डॉ. अफरोज अशरफी जी के मानना बा- ‘शैलजा जी अपनी कविताओं में न केवल बहुभाषी होने का प्रमाण देती हैं बल्कि जीवन के उस रंग को भी बधाई का पात्र समझती हैं जो बहार के हाथों से फिसल कर अपने दु:ख में समाया हुआ है। उनकी कविता निरंतर जीवन से की गई संवाद की कविता है। उन्हें ज़िंदगी से शिकवा भी है और चाहत के पायदान पर पाँव रखने का गिला भी। ’

शैलजा जी एगो प्रतिभाशाली रचनाकार रहनीं जेकरा भोजपुरी, हिन्दी आ उर्दू पर समान रूप से अधिकार रहे। उहाँ के गद्य-पद्य में सम्भाव से रचना करत रहनी। बाकिर कविता में इहाँ के बहुत मन रमत रहे। इहाँ के कविता के क्षेत्र बहुत व्यापक रहे। जवना के विषय प्राय: समसामयिक, पारिवारिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आ अपना कार्यक्षेत्र से संबंधित रहत रहे।  घर-परिवार में केहू के शादी-बिआह होखे त शैलजा जी एगो सेहरा जरूर लिखत रहनी।  अपना कार्यक्षेत्र में केहू के आगमन या विदाई समारोह होखे त शैलजा जी के स्वागत या विदाई गीत के बिना ऊ पूरा ही ना हो पावत रहे। इहाँ तक कि अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के ‘स्वागत गान’ ही ना ‘अधिवेशन तिसरका के शोर भइल बा’ भी ऊहें के लिखले रहनी जवना पर भइल एक्शन सौंग अधिवेशन के समय धूम मचा देहले रहे ।

शैलजा जी चूँकि स्वयं एगो नारी रहनी आ महिला कॉलेज के प्रचार्या भी रहनी एह से नारी के अनेक समस्या के नजदीक से देखे आ समझे के उहाँ के मौक़ा मिलल रहे। एही कारण से शैलजा जी के अनेक कविता में नारी के दर्द के यथार्थ चित्रण भइल बा। बाकिर एकर अर्थ ई ना भइल कि उहाँ के सिर्फ नारीवादी दृष्टिकोण रहे। समाज के जहाँ कहीं भी विद्रुप आ असामान्य घटना उहाँ के आँख के सामने से गुजरे, चाहे कोई अइसन बात जे उहाँ के चुभत होखे तब शैलजा जी के कलम चले लागे। एह से रायबरेली से राजनारायण से इन्दिरा गाँधी के हार पर उहाँ के कलम मौन ना रह पावल आ ना ही ओह समय ही रह पावल जब मोरारजी भाई के मंत्रि परिषद में कवनों महिला के मंत्री ना बनावल गइल। उहाँ के लिखतानी-

है जयप्रकाश का यह प्रकाश, पर प्रभा ‘प्रभा’ की क्षीण हुई

केन्द्रीय-मंत्री-परिषद-गरिमा, महिला विहीन श्रीहीन हुई

शैलजा जी समाज में नारी के प्रतिष्ठा पावे खातिर ओकरा के अपना मातृत्व के रक्षा के साथ ही शक्ति सम्पन्न भी देखे के चाहत रहनीं। एह से उहाँ के मान्यता रहे कि नारी के एह पुरुष-प्रधान समाज में छुई-मुई आ पुरुष के हाथ के कठपुतली बनला से काम ना चली काहे कि ‘क्लीवत्व उपासक’ दुनिया के ‘नामर्द’ बनावे में लागल बा। बाकिर नारी यदि अपना सहज गुण आ मातृत्व के साथ ही शक्तिशाली रही त समाज में पुरुष-वर्ग में ओकर अपमान करे के साहस ना हो पाई-

अधरों पर हो मुस्कान मगर आँखों में फिर चिनगारी हो,

हो एक हाथ में सृष्टि और दूजे में प्रलय कटारी हो

यह रूप तुम्हारा देख पुरुष अपमान नहीं कर पायेगा,

तुम माता बन जाओ तो जग संतान स्वयं बन जायेगा

अपना समाज में तिलक-दहेज एगो अइसन समस्या हो गइल बा जवना चलते कइगो घर बरबाद हो गइल। बेटिहा के घर-दुआर भी बेचा जाता, भाई-बाप सड़क पर आ जाता तबों ना बेटहा के लिस्टे पूरा हो पावता आ ना ही ओकर बेटी ओह घर में सुख से रह पायी एकरे कवनों गारंटी मिल पावता। एही विषय पर शैलजा जी के ‘दहेजवा’ शीर्षक एगो प्रसिद्ध कविता बा। ओकर बानगी रउओ देखीं-

 

पपिहा के बोली सुनि कसके करेजवा से,

फेरी-फेरी कर भिनसार रे दहेजवा

नैनन लाज अँसुवन धुली गइले से,

अरथी सजल मनुहार रे दहेजवा

चिटुकी सेनुर लागीं खुँटवे बन्हइली से,

सहलो ना जाला अब घात रे दहेजवा

नवल कुसुम रस भँवरा लोभइले से,

सेज सुन साले आधी रात रे दहेजवा

 

‘मृदुला-स्मृति’ शीर्षक कविता शैलजा जी अपना बड़ बेटी के असामयिक मृत्यु पर लिखले रहनीं। ई कविता भोजपुरी के संभवत: अकेला शोक-गीत ह। जइसे निराला के ‘सरोज-स्मृति’ के हिन्दी के एकमात्र शोक-गीत के गौरव प्राप्त बा वइसे ही ‘मृदुला-स्मृति के भी प्राप्त बा।  शैलजा जी के काव्य-संग्रह ‘श्रद्धा-सुमन’ के समर्पित भी उनकरे के कइल गइल बा ।

बिसरी ना सुरतिया तोहार मुरतिया झलकते रही

टूटी गइले मन के कगार नयनवा छलकते रही

खंडहर मनवा हमार जियरा दहकते रही

पुरल ना मनवा के आस करेजवा कसकते रही

शैलजा जी के काव्य-संसार बड़ा व्यापक रहे। जवना में प्रकृति-वर्णन, नायक-नायिका भेद, हृदय के भाव, ईश्वर से प्रार्थना, मुक्तक, ग़ज़ल, शोकगीत आदि ही सिर्फ़ ना रहे बल्कि ‘कविता चुराई हम कविजी कहाई ले’, चीट के भरोसा पर फारम भराइल बा, ‘कोर्ट-मैरेज’ जइसन विषय पर भी बड़ा रोचक आ मनोरंजक कविता भी बा।

शैलजा जी के ‘चिन्तन-कुसुम’ ग्यारहगो निबन्ध के एगो संग्रह ह। जवना में साहित्यिक आ आध्यात्मिक विषयन पर निबन्ध बा। एह संग्रह के अध्ययन-मनन से ही एह बात के एहसास हो जाई कि उहाँ के अध्ययन के क्षेत्र केतना व्यापक रहे। एह निबंधन में एक ओर उहाँ के जीवन के अनुभव बा त दोसरा ओर लोकगीतन के लालित्य बा। एह सब के बीच में योग-भक्ति आ दर्शन के ज्वार-भाटा भी रह-रह देखे के मिल जाई।

शैलजा जी के साहित्यिक निबन्ध में ई कहल गइल बा कि मनुष्य स्वभाव से ही सौंदर्यप्रेमी होला। एही सौंदर्यवृति के तृप्त करे खातिर अद्भुत प्राकृतिक-सौन्दर्य के रचना भइल बा। उहाँ के अपना निबन्ध में लीक से हट के अपना मैलिक चिन्तक होखे के गवाही भी देतानी।  भारतीय साहित्य में काव्यानन्द के ब्रह्मानन्द के सहोदर कहल गइल बा। जबकि शैलजा जी के मानना ई बा कि काव्यानन्द ब्रह्मानन्द से श्रेष्ठ बा। काहेकि काव्यानन्द ब्रह्मानन्द के तरह आत्मगत एवं संसार निरपेक्ष ना होके निर्वैक्तिक आउर जीवन सापेक्ष होला।

शैलजा जी के जीवन-दर्शन आध्यात्मिक बा। उहाँ के मानना ई बा कि जीवन के लक्ष्य ह बिंदु के सिंधु में मिलन, ब्रह्मानन्द के प्राप्ति आ सत्य के संसाधन। उहाँ के विचार से स्वाद आदमी के बहुत बड़ा शत्रु ह। आदमी के अपना इन्द्रिय के गुलाम ना होखे के चाही। काहेकि हमार ई भौतिकवादी अभिवृद्धि ही मानव के जबरदस्ती विनाश के ओर घसीट रहल बा।  जबले समाज के एह सोच में बदलाव ना आई हमनी के संतोष आ सच्चा सुख नसीब ना होई।

एह संतोष आ सुख खातिर आदमी के अपना धूरी के ओर लौटे के ही पड़ी। तबही हमार आ हमरा समाज के कल्याण होई। अन्यथा हम आपना लालसा के मकड़जाल में एह तरह से उलझत चलल जायेब कि ओह में से हमार निकलल असंभव हो जाई।

अंत में हम सिर्फ़ इहे बात कहे के चाहेब कि शैलजा जी ओह चंद रचनाकारन में से एक हईं जेकर रचना उहाँ के साहित्य के क्षेत्र में उभरला के साथ ही आचार्य शिवपूजन सहाय जइसन स्वनाम धन्य साहित्य-सर्जक के एतना प्रभावित कइलस कि उहाँ के आपना आशीर्वाद स्वरूप शैलजा जी के प्रोत्साहित करत उहाँ पर एक लेख लिख देहनीं।

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