काहे खातिर फादर्स डे आ काहे खातिर मदर्स डे

काहे खातिर फादर्स डे आ काहे खातिर मदर्स डे

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Posted: August 17, 2021
Category: संपादकीय
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माई-बाबूजी पॉवर हाउस होला लोग आ बेटा-बेटी ट्यूबलाइट। पॉवर हाउस से डिसकनेक्ट होके केहू अँजोर कइसे कर सकेला? लेकिन आजकल ई डिसकनेक्शन खूब देखे के मिलsता।

आखिर एह खून के रिश्ता में ई कइसन कसर बाटे। कादो, औलाद खातिर माई धरती हई आ बाबूजी आकाश। त का सांस्कृतिक प्रदूषण के असर एह धरती-आकाश पर भी पड़ल बा ?  ... एह धरती-आकाश के गोदी में पलल-बढ़ल अपडेटेड, एडवांस, डेवलप्ड बबुआ-बबुनी खातिर आपन एगो शेर से बात आगे बढ़ावत बानी-

नेटे प देख लिहलस माई के काम-किरिया / बबुआ बा व्यस्त एतना, लंदन से आ न पाइल

संवेदनहीन काल-खंड में माता-पिता के प्रति संवेदना जगावे खातिर फादर्स डे आ  मदर्स डे मनावल जाला।

हर साल मई महीना के दुसरका रविवार के मदर्स डे आ जून महीना के तिसरका रविवार के फादर्स डे मनावल जाला। अब इतिहास खोजब त दुनों के अलग-अलग इतिहास बा बाकिर, एक लाइन में जबाब खोजब त जबाब बा कि  माई-बाप के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करे खातिर ई डे मनावल जाला।

हम पटना, दिल्ली, बम्बे, लंदन, आरा, बलिया  आ छपरा, सगरो के पैरेंटिंग आ चाइल्डहुड देखले बानी। आजकल कई जगे मोह-ममता आईसीयू में लउकत बा आ माई-बाबूजी के प्रति सम्मान खाली फेसबुक प। कई जगे त माई-बाप सबसे अधिक परेशान अपना औलाद से बाड़े आ औलाद के सबसे अधिक शिकायत अपना माइये-बाप से बा।

... आ एही सब शिकवा-शिकायत के बीच ई जवन फादर्स डे, मदर्स डे, वीमेंस डे, वैलेंटाइन्स डे आ फ्रेंडशिप डे बनल बा... उ बनल बा सोचे खातिर। हँ, ठहर के सोचें खातिर। उ खाली विश करे, कार्ड आ बुके देवे भा उत्सव मनावे खातिर नइखे बनल।

फादर्स डे आ मदर्स डे माई-बाबूजी आ बेटा-बेटी के आतंरिक संबंध पर सोच-विचार करे खातिर बनल बा। बइठ के सोचीं;  सोचीं तनी ठहर के कि का राउर माई-बाबूजी रउरा से खुश बा लोग !  रउरा प नाज़ करेला लोग ! ना करेला लोग त काहे ?  रउरा अपना माई-बाबूजी से खुश बानी?  कवनो बात के खीस त नइखे? बा त काहे ? खाली ‘’ हैप्पी फादर्स डे पापा ‘’ आ ‘’ हैप्पी मदर्स डे मम्मी ‘’ खातिर ई दिन त बनले नइखे। बनल बा कि जवन हैप्पी नइखे ओकरा के हैप्पी बनावल जाय। बाकिर खाली हैप्पी कहला से कुछुओ हैप्पी होला ना। ओकरा खातिर अपना कर्म से, व्यवहार से, वाणी से आ बुद्धि से कोशिश करे के पड़ेला।

हो सकेला कि अज्ञानता भा ओह क्षेत्र में अनुभवहीनता के चलते माई-बाबूजी के कवनो गलत निर्णय से रउरा जिंदगी में कष्ट भइल होखे मगर ई बात त सभे मानीं कि कवनो पेरेंट्स के इंटेंशन अपना बेटा-बेटी के प्रति ख़राब ना होला।

अच्छा-बुरा, कम-बेस, आगे-पीछे सबके बावजूद हमनी के भीतर जवन चेतना आ  विवेक बा, ज्ञानेन्द्रिय काम करत बाड़ी सन,  हमनी के  दुनिया के सब लीला देखत-बूझत-समझत बानी सन, ओकरा खातिर अपना माई-बाबूजी के धन्यवाद करे के चाहीं कि ना? आखिर ई जिंदगी त ओही लोग के दीहल ह आ जिंदगी के बदले कुछुओ दीहल कमे होई।

टेलीविजन के लोकप्रिय सिरियल रामानंद सागर कृत रामायण में राम लक्ष्मण से कहत बाड़े, ‘’ यदि किसी का पिता दुराचारी भी हो, चाहे संसार उसे त्याग भी दे, तो भी पुत्र का धर्म है कि वो अपने पिता को भगवान की तरह पूजे क्योंकि पिता मनुष्य का प्राणदाता होता है लक्ष्मण! जो पिता की भक्ति नहीं करते, देवता तो क्या, स्वयं भगवान भी उनकी पूजा को स्वीकार नहीं करता।‘’    

एह से अपना जन्मदाता के श्रवण कुमार बनीं भा मत बनीं, एतना त लाज-लिहाज रखीं कि कवनो महतारी-बाप के ई ना कहे के पड़े कि काश ! ई पैदा होखे के पहिलहीं मर गइल रहित।

संतान अपना माई-बाप के स्वाभिमान बने, एही शुभकामना के साथ- प्रणाम !

 

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