माई-बाबूजी: हिन्दी आ भोजपुरी कविता के आंखिन से

माई-बाबूजी: हिन्दी आ भोजपुरी कविता के आंखिन से

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Posted: August 19, 2021
Category: आलेख
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डा. सुनील कुमार पाठक

भारतीय वाङ्मय में भारतीय संस्कृति के मान्यता के अनुरूप माता-पिता के बहुत श्रद्धा आ सम्मान के नजर से देखल गइल बा। भारतवर्ष में अइसन मान्यता रहल बा कि जवन माई अपना गर्भ में अनेक पीड़ा आ कष्ट सहके आपन संतान जनमावेली आ फेरू ओकरा के बचपन से पाल-पोस के सियान करेली उनकर दरजा मानव समाज में काफी ऊंचा मानल जाई। ओइसहीं बचपन से लेके पूरा जिनिगी अपना संतति के पाले पोसे वाला, ओकरा के बराबर अपना आशीर्वचन आ शुभकामना से परिपोसन करेवाला बाबूओजी के मानव जीवन में बहुते ऊंचा स्थान प्राप्त बा। जगद्गुरु शंकराचार्य जी देवी वंदना में लिखले बानीं- "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।" पुत्र कुपुत्र भले हो जाए मगर माता कुमाता नैइखी हो सकत। संस्कृत के एगो श्लोक में एगो मादा पशु जवन शिकारी के पकड़ में अइला पर ओकरा से इहे बिनवत बिया कि-
"आदाय मांसमखिलं स्तनवर्जमंगे/मा मुञ्च वागुरिक याहि कुरु प्रसादम्।/
अद्यापि शष्पकवलग्रहणानभिज्ञः/मद्वर्त्मचञ्चलदृशःशिशवो मदीयाः।"
मतलब कि "हे शिकारी! हमरा देह के हर भाग के काट के अलग कर द बाकिर हमरा दूनू स्तनन के छोड़ द। काहे कि हमार छोटका बचवा जवन कि अबहीं घासो खाये के शुरू नइखे कइले ऊ बड़ी आकुलता से हमार बाट जोहेला आ हम ओकरा के दूध ना पिआइब त ऊ मर जाई। एहसे हमरा दूनू स्तनन के मत काटs। एह श्लोक में एतना मार्मिकता छिपल बा कि पशुलोक के एह बात से मानव समुदायो के असीम प्रेरणा मिल रहल बा। कवनो प्राणी जगत् में माई-बाप के प्रति ओकर संततियन में अथाह प्रेम आ श्रद्धा पावल  जाला। काहे कि माई बापो एह देश में आजीवन अपना संतानन खातिर एगो विराट छायादार वृक्ष लेखां होला, एगो प्रकाश-स्तंभ खानीं होला जवन संकटन के कइसनो अंधकार में सदा मार्गदर्शन करत रहेला। भारतीय संस्कृत शास्त्रन में "मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः, गुरु देवो भवः" के जवन सूक्ति मिलेला ओह में भारतीय संस्कृति के आत्मा छिपल बिया। ई मातृभावना भारत में एतना व्यापक आ महत्तम रूप में पिरोवल गइल बा कि देश के माटी, नदी,पर्वत, पवन,वनस्पति-सगरी देवता के निवास मानल गइल बा। अथर्ववेद में त पूरा धरती के कन-कन के मातृभावना से देखत सरधा से शीश झुकावल गइल बा- "माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्याः।" यानी कि ई पूरा धरती हमनीं के माता हई आ हमनीं इनकर संतान। धरती के मातृभाव से देखला पर मन के हर तरे के विकार सहजे दूर हो जाई। एगो दोसर श्लोक में त जनम देबेवाला माता-पिता के धरती आ आसमानो ले ज्यादा पूज्य बतावल गइल बा- "भूमेः गरीयसी माता स्वर्गात् उच्चतर पिता।" एगो संस्कृत श्लोक संध्याकाल के
दीपक चनरमा के प्रातःकाल के दीपक सूरज के,तीनू लोक के दीपक धरम के आ कुल के
दीपक सुपुत्र के बतावत मानव समाज के मंगलकामना कइले बा।
सुपुत्र माता पिता के आसिरबाद हासिल करे खातिर बराबरे प्रयत्नशील रहेला, जिम्मेदार माता-पितो के ई धरम बतावल गइल बा कि -"माता शत्रुः पिता बैरी ये न बालो न पठितः। न शोभते सभा मध्ये हंस मध्ये बको यथाः।" -ऊ अपना संतान के सुशिक्षा देके देश आ समाज खातिर एगो जिम्मेदार नागरिक के रूप में तैयार करो।
संस्कृत में अनेक महाकाव्य, नाटक, नीतिश्लोक, धर्म आ नीति विषयक सूक्तियन आदि में माता पिता के सरधा से परिपूर्ण रहे के शिक्षा दिहल गइल बा।

हिन्दी काव्य में माई-बाबूजी

जहाँ तक हिन्दी काव्य के सवाल बा एहूजा माता-पिता के प्रति सम्मान भाव राखे खातिर ओकरा औलादन के प्रेरित कइल गइल बा आ दोसरका तरफ एगो जिम्मेदार पालक-पोसक के रूप में माई बाबूजी के बेवहार करे के सीख दिहल गइल बा।

गोस्वामी तुलसीदास जी के लेखनी भगवान श्री रामचंद्र जी के सदाचारी बतावत ई कह रहल बिया कि- "प्रातकाल उठि के रघुनाथा मातु पिता गुरु नावहिं माथा।" प्रभु श्रीराम के ई आचरण बेहद प्रेरणादायक बा जवन कम-से-कम एतना त बतावते बा कि भारतीय संस्कृति में माता-पिता खातिर ओकर संतान के का आचरण होखे के चाहीं।

सूरदासजी के त हिन्दी में वात्सल्य रस के उद्भावक आ सम्राटे मानल गइल बा। अइसन कहल गइल बा कि सूरदास अपना पदन में मातृहृदय के कोना-कोना छानि मरले बाड़ें। सूरदास के एगो पद में मातृहृदय के मनोविज्ञान देखल जा सकत बा-"जसोदा हरि पालना झुलावै/हलरावै दुलराइ मल्हावै जोई सोई कछु गावै/ मोरे लाल को आइ निंदरिया काहे न आनि सुहावै।"- एह पद में जसोदा मैया के हृदय के बेबसी, वात्सल्य आ विह्वलता देखे लायेक बा। जइसे तइसे जोड़-जाड़ के, कुछऊ गा-गुनगुना के अपना बचवन के सुतावे वाला तौर-तरीका अधिकतर भारतीय परिवार में आजो ओइसहीं जारी बा।

खड़ी बोली हिन्दी के राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त भारतीय नारी जीवन के जवन चित्र उरेहले बाड़ें ओह से नारी के मातृरूपे के छवि ज्यादा उभर रहल बा-"अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी / आंचल में है दूध और आंखों में पानी।" -आंचल में दूध (वात्सल्य) आ आंख में पानी (लज्जा, वेदना) से भरल भारतीय नारी के जवन चित्र एजवा रचाइल बा ओह से ओकरा मातृछवि के दीप्ति भरपूर प्रकट हो रहल बा। एगो दोसर कविता में जहाँ बेटा अपना माई से कहानी कहे के निहोरा कर रहल बा, कवि मैथिली शरण जी के हृदय के भावातुरता आ तर्कशीलता के मनोहारी रूप देखे लायक बा- " मां कह एक कहानी / बेटा! समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी/ कहती है मुझसे यह चेटी / तू मेरी नानी की बेटी / कह मां कह लेटी ही लेटी /राजा था या रानी? / मां कह एक कहानी।" -एह कविता में माई के 'नानी के बेटी' चेटी द्वारा बतावल गइला से बालक के हृदय में कौटुम्बिकता के जवन एगो भावना रच-बस जात बिया, ओह से माई के प्रति ओकर सरधा त उमड़ते बा, एगो स्वस्थ भारतीय परिवार के मजबूती के प्रयासो झलकत बा।

जयशंकर प्रसाद अपना महाकाव्य 'कामायनी' भारतीय नारी के सरधा से भरल जवन चरित्र-चित्रण कइले बाड़ें, ओहू में नारी के मातृरूपे के प्रधानता बा- "नारी! तुम केवल श्रद्धा हो/ विश्वास-रजत-नग पगतल में / पीयूष स्रोत-सी बहा करो / जीवन के सुन्दर समतल में।"

रामधारी सिंह दिनकर अपना एगो कविता में लिखले बाड़ें- "विवश देखती मां, आंचल से नन्ही जान तड़प उड़ जाती / अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज बज्र की छाती।" अपना शिशु के दूध पिलावे बदे मतारी के ई प्राणांतक बेचैनी कवि के मातृहृदय के सच्चा पारखी भइला के निसानी बा।

आधुनिक हिन्दी साहित्य में गीतन आ गजलन के साथे-साथे समकालीन कवितो में माता-पिता पर कवि सब खूब लेखनी चलवले बा। यश मालवीय आ योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' के  गीत-पंक्तियन के देखल जा सकत बा जवना में वर्तमान जिनिगी के भाग-दौड़, संयुक्त परिवार के विखंडन, भौतिकता के प्रकोप के तौर पर कौटुम्बिक जीवन में उभर रहल स्वार्थपरता, लालच, छल-प्रपंच, गैरजबाबदेही, आत्मकेन्द्रित चिन्तन आदि के प्रवृति बढ़ल जा रहल बा, फलस्वरूप समाज, परिवार आ माई-बाप के प्रति सम्मान के भावना कमजोर पड़त जा रहल बा- "फूली सरसों नहीं रही / अब खेतों में मन के / पिता नहीं  हैं अब नस-नस / क्या कंगन सी खनके / रास्ता थकी हुई यादों का / छेंक रही है मां। × × × जाती हुई धूप संध्या की / सेंक रही है मां / अपना अप्रासंगिक होना देख रही है मां। "(यश मालवीय) "फर्ज निभाती रही उम्र भर / बस पीड़ा भोगी / हाथ पैर जब शिथिल हुए तो / हुई अनुपयोगी / धूल चढ़ी सरकारी फाइल / जैसी है अब मां / किसको चिन्ता किस हालत में / कैसी है अब मां। "(योगन्द्र वर्मा व्योम) बाकिर डा. कुंअर बेचैन के एगो गीत में माई के प्रति सम्मान के भावना कमजोर पड़त बिल्कुल नइखे दिखत-"मां! / तुम्हारे सजल आंचल ने / धूप से हमको बचाया है / चांदनी का घर बनाया है। × × × मां! / तुम्हारे प्रीति के पल ने / आंसुओं को भी हंसाया है / बोलना मन को सिखाया है।"

शायर मुनव्वर राणा दुनिया भर में मां पर लिखल अपना शायरी के बल पर खूब नाम -यश कमइले बाड़न। उनकर कुछ शेर त लोग के जुबान पर अइसन रच-बस गइल बा कि ऊ अगर आउरो कुछ नाहियो लिखले रहितें त खाली एकनिये के बल पर बरिसन तक अदबी रूचि के जमात में जिन्दा रहिहें। बतौर बानगी कुछ शेरन के देखल जा सकत बा- "किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई / मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई। × × × इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है / मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है। × × × अभी जिन्दा है मां मेरी मुझे कुछ नहीं होगा / मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है। × × × खाने की चीजें मां ने भेजी है गांव से / बासी भी हो गई हैं तो लज्जत वही रही। × × × मेरा बचपन था मेरा घर था खिलौने थे मेरे / सर पे मां-बाप का साया भी गजल जैसा था।"

-मुनव्वर साहब के एह शेरनो में अइसन रवानगी आ ताजगी भरल बा कि ओकर तासीर कबो फींका नइखे पड़ सकत।

समकालीन हिन्दी कवितो में कवि माता-पिता खातिर सम्मान के भाव दिखवले बा। जहाँ कहीं माई-बाप के प्रति अनादर भा उपेक्षा कवि के दिखल बा ओकरा के ऊ समय आ परिस्थिति के प्रभाव मनला के बावजूदो हिकारत के नजर से देखले बा। समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि राजेश जोशी के 'मां कहती है' शीर्षक कविता के एह पंक्तियन में माई के अपना संतान के प्रति आत्मीय अनुराग के जवन चित्रण भइल बा ऊ हृदय के शीतलता प्रदान करे वाला बा- "सोने से पहले / मां / टूइयां के तकिये के नीचे / सरौता रख देती है / बिन नागा / मां कहती है / डरावने सपने इससे / डर जाते हैं।"  आधुनिक वैज्ञानिक युगो में माई सब के एह बेवहार में शायिदे कहीं अंतर आइल होखे। चंद्रकांत देवताले जी मां के हाथ के परोसाइल खाना के इयाद करत कहत बाड़ें- "वे दिन बहुत दिन दूर हो गए हैं / जब मां के बिना परसे पेट भरता ही नहीं था।" समकालीन कविता के एगो प्रतिष्ठित कवि एकांत श्रीवास्तव मतारी के भूत आ भविष्य के जोड़त ई बता रहल बाड़े कि ऊ भावी चेतनो के निरन्तर झकझोरत रही आ मनुष्यता के पहचान मिटे ना दी-"शताब्दियों से उसके हाथ में सूई और धागा है / और हमारी फटी कमीज / मां फटी कमीज पर पैबंद लगाती है / और पैबंद पर काढ़ती है / भविष्य का फूल।"
(मां  -एकांत श्रीवास्तव)

समकालीन कविता के कईगो कवयित्री माई-बाबूजी पर बहुत शानदार आ मार्मिक रचना कइले बा लोग। रंजना जायसवाल आ निवेदिता के पंक्तियन के बानगी देखे लायक बा-

(क)- "तुम्हारा आंचल / कितना बड़ा था मां / समा जाते थे जिसमें / मेरे सारे खेल / सारे सपने / सारी गुस्ताखियाँ / मेरा दामन कितना छोटा है मां / नहीं समा पाता जिसमें / तुम्हारा बुढ़ापा।"(मां-2, रंजना जायसवाल)

(ख)- "बच्चे एक दिन कहेंगे / यह वही उजाला है जिससे हमारी मां ने / सूरज से चुराया था / बादलों से छिपाया था / हवा के थपेड़ों से बचाया था / वह रोशनी है यह जिससे रोशन है इंसान। "('मां के लिए'-निवेदिता)

भोजपुरी काव्य में माई-बाबूजी

भोजपुरी काव्य के इतिहास में माई-बाबूजी पर खूब लिखाइल बा। भोजपुरी लोकगीतन में खास करके बिआह-शादी, सोहर आदि से जुड़ल संस्कार गीतन में बाबा, माई-बाबूजी के मरजाद, ओह लोग के महत्व अपना संतान के साथे जुड़ाव आदि के बहुत मार्मिकता से उरेहल गइल बा। एह लोकगीतन में भारत के लोक संस्कृति के सुछवि आ सुरभि देखे लायक बा। एगो सोहर गीत में संतान जनमला पर बाबा-इया, माई-बाबूजी आ सकल परिवार में छाइल खुशी आ उमंग के देखल-परखल जा सकत बा- "जुग जुग जीयस ललनवा भवनवा के भाग जागल हो / ए ललना लाल होइहें कुलवा के दीपक / महलिया उठे सोहर हो।"  एगो भोजपुरी सोहर में राजा दशरथ के फरमान पर एगो हिरन जंगल से मंगावल गइल बा। हिरनी राजमहल आके रानी कोसिला से मांस रीन्हला के बाद  हिरन के छाल मांगत बिया ताकि ओकर खाल गाछि में टांग के ओकरा इयाद के कइसहूं जोगा सके। बाकिर कोसिला रानी रामचंद्र जी खातिर डुग्गी छवावे के आपन इरादा बतावत ओकरा के लवटा देत बाड़ी। भोजपुरी के एह सोहर गीत में हिरनी के मर्मान्तक पीड़ा के जइसे उरेहाई भइल बा, ऊ संवेदना के तार-तार झंकृत कर देबे वाला बा- "आंगन सून चोउकिया बिना मंदिल दियरा बिना हो, ललना ओइसन सून बिरदाबन एक रे हरिना बिना हो।" एजवा एगो पशु के पीड़ा के जरिये कोशिला रानी के नारीत्व आ मातृत्व भावना, मानवीय संवेदना आ चेतना के झकझोरे के अद्वितीय प्रतीकात्मक प्रयास भइल बा। एगो विवाह गीत में बेटी के प्रति बाबा आ माई-बाबूजी के अनुराग आ बिछुड़न के वेदना देखे लायक बा-"हमरो सीता हो बेटी / आंखि के पुतरिया / दिनवा हरेलू हो बेटी / भूखिया रे पियसिया / रतिया हरेलू हो बेटी / पापा आंखि हो निंदिया।"(भोजपुरी के विवाह गीत-भगवान सिंह भास्कर)

भोजपुरी के केतना महाकाव्य, गीत, गजल, मुक्तक आदि में माई-बाबूजी के वात्सल्य आ प्रेम आउर संतान सब के ओह लोग के प्रति सरधा के व्यापक आ मार्मिक वर्णन भइल बा। ओकर चलताऊ उल्लेख से ई आलेख काफी विस्तार के मांग करी। बाकिर एजवा उचित बुझात बा कि आधुनिक भोजपुरी कवियन के कुछ हाल फिलहाल के रचनन के आधार पर ई मूल्यांकन कइल जाव कि माई बाप खातिर आज के संतानन में केतना ले आदर आ अनुशासन के भाव भरल बा आ युगीन परिस्थितियन के विसंगति आ तेजी से भाग रहल दुनिया में आत्मकेन्द्रित हो रहल मनुष्य खातिर ई रिश्ता अब केतना ले उपयोगी, आवश्यक, प्रासंगिक आ सांस्कृतिक क्षरण के रोके वास्ते जरूरी हो गइल बा। अपना अध्ययन के समकालीन महत्व बरकरार राखे खातिर हम भोजपुरी जंक्शन के एह अंके में प्रकाशित कुछ रचनन पर अपना के केन्द्रित करे के चाहब। ई आलेख एह अंक में प्रकाशित रचनन के समीक्षा नइखे, बलुक एह अंक के जवन रचना हमरा बतकही के साझेदारी में माकूल पड़ल बाड़ी सं ओकनिये के हम एह आलेख में उद्धृत कर पवले बानीं। वैसे एह अंक के सगरी रचना अपना-अपना रंग-रूप में बेजोड़ आ 'को बड़ छोट कहत अपराधू' के मनःस्थिति में डाल देबे लायक बाड़ी सं जवनन के ऐतिहासिक महत्व दिन-पर -दिन बढ़त जाई।

अशोक द्विवेदी भोजपुरी साहित्य के गद्य आ पद्य दूनू  के विविध विधा में आपन लेखनी से अनुपम योगदान देले बानीं। उहां के एगो छंदमुक्त कविता बिया- "आज बहुत इयाद आवत बिया माई" अद्भुत वितान में फइलल कविता बिया ई रचना। कवनों भारतीय भाषा के रचना साथे पांत में पूजाये लायक कविता बिया ई।

अशोक जी के कविता- "आज बहुत इयाद आवऽतिया माई' कवि में गार्हस्थिक बिम्बन के जरिये माई के जवन रूप खड़ा कइल गइल बाज बहुत इयाद आवऽतिया माई! /माई दलान में बइठल अनाज फटकत/ गोहूँ से सरसों आखत/ अँगना में बइठि के चाउर बीनत/पहँसुल से हाली हाली/साग चीरत/बाल्टी का पानी से बरतन धोवत/कोठरी, दलान आ अँगना से/ लेले दुआरी ले झारत-बहारत/गाई का गोबर से घर लीपत/गोइंठा से चूल्हि सुनुगावत/ × × × माई कबो खलिहा ना लउके/ छछात स्रम के देवी, हऽ माई/ नीन खुलला से सुत्ता परला ले/ जब कबो गोहरवनी/ओकर बोली सुनाइल/हमके आजु ले ई ना बुझाइल/कि कब जागल माई/आ कब उँघाइल ?/नीन भर सुतबो कइलस कि ना/ कबो माई।" × × × एह अनचीन्ह शहर में/दिन भर लथरइला का बाद/जब अगल बगल नइखे लउकत/ केहू आपन नइखे सुनात कहीं/केनियो शुभकामना के असीसहमके फेरु/बहुत इयाद आवतिया माई!"

-एह पूरा कविता में स्मृति बिम्बन के खूब इस्तेमाल भइल बा आ एगो जवन 'यूटोपिया' रचाइल बा ओहू में जथारथ के अनदेखी से भरसक बचे के कोसिस भइल बा। माई के हाथ के खाना के एगो अलगे सवाद होला चूंकि ओमें ओकर नेह सउनाइल रहेला। माई के कोरा आ माई के हाथ के कौर-दूनू कबो भुलाइल नइखे जा सकत- "हमके लागल बा बहुत जोर से भूखि/बेचैन हो गइल बिया माई /अँचरा का खूँट से पकड़ि के /जरत बटुली चूल्हि से उतारत/परई से थरिया में मांड़ पसावत/जरत भात में से बीनि बीनि/आलू मीसि के हाली-हाली/चोखा बनावत/ बाँहि से पोंछत लिलार क पसेना/कटोरी में कलछुत से/दाल निकालत/ माई परोसि रहत बिया/गरम गरम खाना/हमरा खातिर!/साँच कहीं त/ माई के परोसल खाना के/मुकाबला संसार के/कवनो खाना ना कर सके।" -अशोक द्विवेदी के एह कविता से समकालीन भोजपुरी कविता के एगो अइसन ऊंचाई मिलल बा जवन आधुनिक भाव-बोध के साथे-साथ पारम्परिक जीवनदायी मूल्यन के जोगवले चलत रहे के प्रेरणा दे रहल बा।

भगवती प्रसाद द्विवेदी के कवितो- 'बाबूजी' में समकालीनता के पकड़े के भरपूर कोसिस भइल बा। बाबूजी के अनुपस्थिति के मतलब समुझावे खातिर कविता जवना बिम्बन के सहारा लेत बिया ऊ भोजपुरी मन-माटी के अनुकूल रचाइल बा। एह कविता में एगो पंक्ति बिया-"शेषनाग अस छतर तनले छाता के।"  "छतर तनले छाता"  -ई प्रयोग अर्थग्रहण में पाठक के परेशान कर सकत बा।

भोजपुरी में गीत-गजल लिखेवाला युवा कवि मनोज भावुक अपना समझदारी आ काव्य-प्रतिभा से बराबरे चकित करत रहल बाड़न। माई-बाबूजी पर ऊ खूब लिखले बाड़ें, आ खूबी के साथ लिखले बाड़ें। अपना कहन, ट्रीटमेंट, लोकप्रचलित मुहावरन के प्रयोग, प्रचलित शब्दने में नया-नया अर्थन के पिरोवत अनुपम भाव-सौन्दर्य रच देबे के क्षमता आदि में उनकर सानी नइखे। मनोज भावुक के "बर-पीपर के छाँव के जइसन बाबूजी"  शीर्षक एगो नवगीत में बाबूजी के मौजूदगी के महत्व बतावत कवि कहत बा-

"बर-पीपर के छाँव के जइसन बाबूजी / हमरा भीतर गाँव के जइसन बाबूजी / छूटल गाँव, छिटाइल लावा भुंजा के / नेह लुटाइल साथी रे एक दूजा के / शहर-शहर में जिनिगी छिछिआइल, माँकल / बंजारा जिनिगी, धरती धीकल, तातल / पाँव पिराइल मन थाकल रस्ता में जब / मन के भीतर पाँव के जइसन बाबूजी / दुःख में प्रभु के नांव के
जइसन बाबूजी।"


-एगो गजल में मनोज माई के मौन के जरिये ओकरा ममत्व के जइसन मुखरता सिरिजले बाड़ें, ऊ गौर करे लायक बा- "हजारो गम में रहेले माई/तबो ना कुछुओ कहेले माई / हमार कपड़ा, कलम आ कापी / सईंत-सईंत के धरेले माई / बनल रहे घर बंटे न आंगन / एही से सभकर सहेले माई।"

-माई के अरमान आजो होला कि ओकरा औलादन में मन-मुटाव होके घर-आंगन के बांट-बखरा के नउबत मत आ जाव, बाकिर आज ई एगो सुखावह कल्पना भर रहि गइल बा। माई त सब सह के रहे खातिर तइयार बिया बाकिर ओकर बचवो होखस सं तब नूं!

आनंद संधिदूत जी अपना  नवबोधी काव्य विवेक के बल पर बहुत सुन्दर रचना लेके बराबर हाजिर होत रहीले। प्रसाद गुण से भरल एगो सीधा-सहज गीत में उहां के संदेश साफ बा-"पालि पोसि जे बड़ा कइल / ओकरा के जिन बिसरइह / ओकर चरन-धूलि अपना माथे से रोज लगइह / माई-बाबू के न भूलि के भूलइह बबुआ।"

मनोज भावुके लेखां सुभाषचंद्र यादव के कवितो में माई के चुप्पीये में ओकर असीम वेदना भरल बा- "केहू केतनो दुलारी बाकिर माई ना होई/ × × × सुख दुःख रतिया दिनवां सहली/कबहीं मुँह से कुछ ना कहली/उनका अंचरा से बढ़ि के रजाई ना होई।" एह अंक के सगरी कवितन पर अलग से एगो आलेख जरूरी बा जवना से वर्तमान समय में माई-बाबूजी के साथे भारतीय कौटुम्बिक जीवन के महत्व रेखांकित हो सके आ भारत के सांस्कृतिक बोध रूपायित हो सके।

एह संक्षिप्त अनुशीलन के क्रम में हमरा ई जरूर बुझाइल बा कि भोजपुरी कविता कवनों विषय, भावधारा, वैचारिकता भा शिल्पगत निपुणता के दिसाईं अपना कवनो फारमेट में कवनों भारतीय भाषा के कविता से पिछुआत नइखे दिखत, कहीं-कहीं त अपना लोक संवेदना के बल-बूते,  ई आपन एगो ताजगी भरल, मजिगर, मर्मस्पर्शी आ नया सुघर छवि लेके उभरे में कामयाब रहल बिया।

(परिचय- डॉ. सुनील कुमार पाठक  हिन्दी आ भोजपुरी के चर्चित कवि आ समीक्षक बानी। 'नेवान', 'कविता का सर्वनाम', 'उमड़े निबंध मेघ' आ 'छवि और छाप:राष्ट्रीयता के आलोक में भोजपुरी कविता का पाठ' आदि इहाँ के प्रमुख कृति बाड़ी सं। ) 

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