भोजपुरी कविता में माई-बाबूजी

भोजपुरी कविता में माई-बाबूजी

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Posted: August 19, 2021
Category: आलेख
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डॉ. ब्रज भूषण मिश्र

 भारतीय संस्कृति में माई, बाबू आ गुरु के देव तुल्य मानल गइल बा- मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, गुरु देवो भव। जनम के पहिले से महतारी गरभ में नौ महीना ढोवेली आ जनम के साथ पाले पोसे के जिम्मेवारी उनके पर होला आ कुछुओ सीखे जाने के पहिला अवसर  उनकरे से मिलेला। बाबूजी बाल बच्चा के कइसे उनति बढ़ंती होई, एकर चिंता आ उतजोग करेलन। इहो बात बा कि सब माई बाप एके अइसन ना होखस। केहू-केहू  बाल बच्चन के ओइसन चिंता फिकिर ना करे, जइसन-तइसन हालत में छोड़ देवेला। बाकिर अइसन कम देखाई पड़ेला। अपने दुख-सुख काट के गँवई समाज में, अपना भोजपुरी समाज में माई-बाप बाल बच्चन के खेयाल  राखेला। ओह बाप-महतारी के मन में ई बात, ई उमेद रहेला कि बुढ़ापा अइला पर ओकर बचवा सब सहारा बनी, बुढ़ापा के लाठी बनी। बाकिर सब के सोच उमेद पर ओकर बाल-बच्चा खरा ना उतरे। बहुत संतति सयान भइला पर अपना माई आ बाबूजी के कइलका के इआद राखेला, उनकर कृतज्ञ रहेला। बाकिर, जइसे-जइसे समय बदलत जात बा, परिवार में, समाज में विसंगति पैदा होत जा रहल बा। केतने बाप महतारी पथराइल आँख से बहरवाँसू  संतान के बाट जोहत बा। जे अपना संतान के संगे रहत बा, ओह में से बेसी लोग के हालत नौकर-चाकर अस हो गइल बा। परिवार में ओकरा बात के कवनो मोल नइखे, ओकर कवनो सुनवाई नइखे। एह सब स्थिति पर भोजपुरी कवि लोग के नजर बा। ओह लोग के दृष्टि से कुछुओ नइखे बाँचल। एह में सबसे बेसी माई के चर्चा मिली। बाबूजी के चर्चा मिलेला, बाकिर  माई के तुलना में कम। कई कवि लोग के चरचा में दुनों लोग संगे मिल जइहें। आपसी संबंधन पर माई आ बाबूजी के तरफ के बात त मिलबे करी, संतानो लोग के बात के कवि लोग अहमीयत देले बा।

पारिवारिक संबंधन पर कवि राधा मोहन चौबे 'अंजन ' जी के कलम खूब चलल बा। संतान से उमेद, असरा  लगवला के संगे, ओह लोग खातिर कइल गइल जतन के इआद करावे के उदेसे उहाँ का गीत रचना कइले बानी। सीमा पर युद्धरत बेटन खातिर ओकरा संघतिया के हाथे  घर से  खाये-पीए के  सामान  भेजे के  चिंता  वाला  गीतो मिली। देखीं करेज के  खँखोर लेवे वाला गीत के कुछ पाँति –

         जहिया माई के गोदिया के याद आई रे
तहरी अँखिया  में  गंगा के पाट आई रे
भूखे रहि के कौर खिअवली, अपने मरि के तोहे जियवली,
सबके ओरहन सुनली मइया, बछरु पोसे जइसे गइया,
मइया चलि जइहें ना अइहें, कतनो केहू जतन करइहें,
तहिया मनवा के तहरा विषाद आई रे

'माई के जीव गाई अस पूत के जीव कसाई अस ' भोजपुरी कहावत ह। ई कहावत बहुते अनुभव के बाद बनल होई। चलल होई। देखीं अंजन जी ओह माई के ममता के कइसे शब्द में बन्हले बानी जे अपना सैनिक बेटा खातिर ओकरा संघतिया के मारफत खाये पिये के सामान आ संवाद भेजत बाड़ी –

लेले जइहs हमरो सामान हो, पूछिहें जवान सुगना !
सतुआ चिउरा के गठरी जल्दी दीहs पहुँचाई
भरुआ मरिचा  कोने ओह में दिहनी हम गठिआई
पइहें नाचे लागी खुसी से परान हो, पूछिहें जवान सुगना !
मत कहिहs कि मइया तोहर पाकल फल हो गइली
चिट्ठी दिहली काँपत रहली जात-जात रो गइली
ना त बेकल होइहें बाबू के परान हो, पूछिहें जवान सुगना !

अंजन जी के बाद के कवियन में ई विषय फरत फुलात रहल। संवेदना से भरल काव्य पंक्ति लोग के संवेदित करत रहल। देखीं,  ' ज्ञान गगरी ' के कवि माई के इआद करत का लिखले बाड़न -
    जब-जब इयाद आवे माई के दुलार हमरा।
तब-तब अँखिया से बहे महाधार हमरा।।
मइया हमके जनमवली, हमके गोदीए में सुतवली।
कतना कटली दुख दिन, कपड़ा रातो-दिन मलीन।।
कइली दूधवा दे के, जिनगी के तैयार हमरा।

लगभग एही जमीन पर, हरिद्वार प्रसाद किसलय के गीत बा। ऊपरके गीतवन के अनुगूंज बा, नया कुछुओ नइखे –

कबो सुन के  रोआईमईया  गोदिया  उठाई
लाल सुगना कही बोलत, लागे मिसरी रस घोरत
आँचर ढँक के पिअवलू दूध धार हमरा
जब जब इयाद आई माई के दुलार हमरा

1980-90 के बीच ब्रज किशोर दूबे के गीत ' बाबूजी के चिट्ठी’ बड़ा चरचा में रहल। 1989 ई. में दैनिक हिन्दुस्तान, पटना ओकरा के छपलहूँ रहे। कवनो बाप अपना परदेसी  एकलौता बेटा के जे बहरवाँसू हो के घर-परिवार के भुला  गइल बा, एगो चिट्ठी लिखत बा आ बेटा से अपना चाहना के बतावत बा, बहुते मार्मिक गीत बा। दू गो अंश देखीं –

अपना गाँव-घर के नेहिया जनि भुलइहs बबुआ
कबहूँ सपनो में सुधिया तू ले अइहs बबुआ

ठेंगुरी पर ढोवs तानी जिनगी के बोझा
करे मन रहितs नजरिया के सोझा
धन पाछे पून पहिले तू कमइहबबुआ

        बाड़ तूँ ही माई बाबू जी के आखिरी अलम
बा ओरात जात आँख अउरु ठेहुना के दम
धई के अँगुरी सिवाला में ले जइहs बबुआ

एही कालखंड में दू गो कवि लोग के रचना अइसन भेंटात बा जवना में बाबूजी व्यंग्य आ आक्रोश के शिकार बाड़न। प्रसिध्द कवि कुंज बिहारी कुंजन बाबूजी से परेशान हाल बेटा के, जे अभाव में बा आ लाजे लेहाजे बाबूजी के सेवा करत बा, के अभिव्यक्ति देले बाड़न -


का हो पूज्य पिताजी, बोलs अबहीं कहिया ले जियबs तूं ?
कहिया ले चवनपरास  खा-ऊपर से गोरस पियबs  तूं ?

का करबs अब देह बना के, भोरे मधु के पान करे ल।
सबसे पहिले मारी पलहथी, रोटी दाल जियान करे ल।
तलब छोड़ि एको पइसा ऊपर से कहीं परापत नइखे।
अपने मेहर लइकन के खरचा से कुछुओ बाँचत नइखे।

अरुण भोजपुरी के ओती घरी युवा दलित कवि के रूप में बड़ा चरचा रहे। उनकर एगो किताब आइल ' आजादी के अँजोर ' ( 1992 ई. )। एह छोट पुस्तिका में तीन गो समरपन बा आ जेकरा के समरपन कइल गइल बा, ओकरा पर आक्रोश व्यक्त कइल गइल बा। अपना पिता बसावन राम, जे डाक तार विभाग के अधिकारी रहलें के समर्पित करत कवि अपना असफलता खातिर दोषी ठहरवले बाड़न –


हमरो परसनाल्टी के जे डिसऑर्डर में डालल
हमरे ना गुरुओ पुरुखा के बात कबो ना मानल
ले लिहले गोतिया के जमीन, बड़का कइले खरखाही
घरवो के रोकले विकास बा इनकर अफसर-शाही

हीरा प्रसाद ठाकुर 1995 ई. में परदेस गइल बेटा के नेह बिसरला के कारण दुखी एगो माई के मानसिक दुख आ क्लेश के अपना कविता के विषय बनवले बाड़न –

      खुद भिंजलका पर सुतनी, तोहके सुखले सुतवनी,
आसवा रखनी, बबुआ काहे नेहिया बिसरल
कभी आध पेट खइनी, कभी माँग माँग खइनी,
दूध पिअवनी, बबुआ काहे नेहिया बिसरल

जयकांत सिंह ' जय ' नौकरीपेशा बेटा के ओह हलकानी के चित्रण कइले बाड़न जे समय से बेतन ना मिलला के कारन माई बाबूजी के जरूरत के समय से पूरा करे में अक्षम हो जात बा । अभाव के कारन माई बाबू जी के सेवा में खलल पड़त बा –


बाबूजी कहलें एह चस्मा के पावर कम बा।
दादी के दम्मा देखs कइले बेदम बा।।
माई के सब दाँत लगावल बहुत जरूरी।
हित नात कोहनाइल, के सुनो मजबूरी।।
दूर से देखेवाला सबका का का दिखत बा।
ई मनई अभाव में जीए के सीखत बा।।

शिवजी पांडेय ' रसराज ' माई के कृतज्ञता ज्ञापन में पारम्परिके बात कहले बानी, बाकिर कविता ढंग के उतरल बा –

ममता के अँचरा में, हमके छिपा के,
सीत घाम बरखा से, हरदम बचा के,
आफति के अदहन में खुद के उसिनली ऊ
बाकिर ना धीरज गँववली,
हमार माई धई के अँगुरी चलवली।

अर्जुन पाठक ' विकल ' आ माधव पांडेय 'निर्मल' पारम्परिके बात से माई के नेह आ छोह के चरचा कइले बाड़न, बाकिर विकल कवित्त में त निर्मल गीत में।
पहिले विकल के कवित्त देखीं –


माई के नेह कबो ना ओराई, हो जइहें पूत कपूत कसाई
सीपी में मोती समान सहेजेले, नव महीना में कोख जुड़ाई
बाबू के काजर तेल करे अउरी छाती के दूध से पोसत आई
ललना के बाउर नजर न लागे, सरसों अइंछ के धूईं जराई

अब निर्मल जी के गीत के अंश देखीं –

माई रे माई तोर छोहवा गंगाजल के समान।

नेहिया-दुलार के गगरिन लोर से
जिनगी के बेलिया फुलइलू ,
जिनिगी भर बबुआ के हँसी खुशी देवे खातिर
आपन देहिया सुखइलू,
करजा तोहार हिमगिरि से भी बड़ बाटे
निर्मल करीं हम बखान।

मनोज भावुक पिछला सदी के आखिरी दसक में भोजपुरी साहित्य के क्षेत्र में कदम रखलन। भोजपुरी में गीत गजल कविता में आपन खास पहचान बनवलें।  ना खाली कथ्य के दिसाईं बलुक शिल्प के दिसाईं ई नया तेवर आ त्वरा के संगे माई बाबूजी के साथे संतान के संबंध निर्वाह  आ उनका प्रति चिंता आ दायित्व बोध के अभिव्यक्ति दिहलन। भोजपुरी में माई बाबूजी विषयक जतना सामग्री ऊ परोसले बाड़न, ओतना आउर लोग के नइखे। हिंदी में डॉ. संजय पंकज के माँ पर सैकड़न दोहा के संग्रह - ' माँ है शब्दातीत ' छपल बा।  कवनो कवि के माँ पर ई सबसे बड़हन संग्रह हम मानत रहनी ह, बाकिर भोजपुरी में विविध रूप में मनोज भावुक उनका से बेसी लिखले बाड़न। माई खातिर, बाबूजी खातिर आ माई बाबूजी खातिर एकसाथ। सबसे पहिले माई पर केंद्रित उनकरा गजलन से दू तीन गो शेर-

बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल

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     हजारो गम में रहेले माई
तबो ना कुछुओ कहेले माई


बनल रहे घर बँटे ना आँगन
एही से सभकर सहेले माई

माई-बेटा के संबंध में आइल बदलाव के व्यंजना में लिखल मनोज भावुक के एगो गीत बहुत गवाइल बा, जवना के कुछ पाँति देखीं –

   बबुआ भइल अब सेयान कि गोदिए नू छोट हो गइल
माई के अँचरा पुरान, अँचरवे में खोट हो गइल

        ' चुलबुल चिरइया ' में बबुआ हेराइल
बोले कि बुढ़िया के मतिये मराइल
बाबा के नन्हकी पलनिया उजारे -
उठल रूपइया के जोर जिनिगिये नू नोट हो गइल

मनई केतनो बड़ा हो जाए, बाकिर जब-जब अफदरा में फँसेला, ठोकर आ दुत्कार खाला, तब माई के गोदी आ अँचरा के इआद दुलारेला। मनोज भावुक के दोहा देखीं-

दुनिया से जब जब मिलल ठोकर आ दुत्कार
तब तब बहुते मन परल माई तोर दुलार

बाबूजी के व्यक्तित्व आ स्थिति के बारे में मनोज भावुक जी के कविता कुछ अइसे फूटल बा  -

       बर पीपर के छाँव के जइसन बाबूजी
हमरा भीतर गाँव के जइसन बाबूजी

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  टुकी टुकी बाबूजी के बाग हो गइल
पतझड़ आइल अइसन दुलम साग हो गइल

                   x

बाबूजी के हालत बाटे  दिनवो काटे रतियो काटे
सभे अपना मन के बाटे
मनवा जब सभकर अरुआइल
काँव काँव के बोल सुनाइल
बाबूजी के घरवा कागे काग हो गइल

अफसर बेटा आ इंजिनियर पतोह के दुआरी बाबूजी आ माई के स्थिति नौकर आ दाई अस हो गइल बा। समय के एह साँच के भावुक जी बयान करत बाड़न –

बाबूजी के आँख पर / चढ़ गइल बा मोतियाबिंद
वाला चश्मा / तबो ऊ ढो ढो के पहुँचावत बाड़न /
चाउर-दाल, तर-तरकारी, घीव-गुड़ / -- अपना
बबुआ किहाँ / बबुआ अफसर नू बा शहर में / आ
बबुआ बो? / बबुआ बो कम्प्यूटर इंजिनियर हई /
दूनू बेकत बड़ी मानेला माई के / 'माई ' ले बढ़िया '
'
दाई ' कहाँ मिली ?

आसिफ रोहतासवी जी भोजपुरी के नामचीन गजलगो हईं। गजल जइसन सोभाव कोमल बा, बाकिर समय के तीख मीठ अनुभवन से लबरेज बानी। इहाँ के पहिलके गजल संग्रह - ' महक माटी के ' में पारिवारिक संबंध के ले के कई गो गजल संकलित बा। एह में बाबूजी के सरलपन,  नरिअर अस कठोरपन, मेहनती सुभाव, पारिवारिक चिंता से बेचैनी के आसिफ साहेब गुनले बानी आ कलमबद्ध कइले बानी। कुछ बानगी से पता चल जाई -

देखे में सीधा-साधा बउराह बुझालें बाबूजी
बाकिर भर गाँवें में अगहर नेक कहालें बाबूजी

     जीव अबहियों लरकाईं अस ना जे काहे काँपेला
जब-जब कवनो गलती पर तनिको खिसियालें बाबूजी

नोकरिहारा बेटा के बाबूजी के चिंता सतावत रहेला। बाल-बच्चा  पर  के बाबू जी के खीस माई पर उतरेला।  जाँगर थकलो पर गिरहथी के काम में लागल रहे वाला बाबूजी के एक-एक तसवीर सोझा खड़ा होता-

फिर सुरूहुरी धइले होई, खाँसत होइहें बाबूजी ,
सँउसे राती खटिया बइठल हाँफत होइहें बाबूजी।
थाक गइल बा जांगर, बाकिर जीव कहाँ मानत होई
धर चिंगुरल करिहाँय गहूँ जौ काटत होइहें बाबूजी
रघुआ के फकरुलई उनकर कइले होई नाकी दम
नित माई पर ओकर खीस उतारत होइहें बाबूजी

बेटा जब अफदरा में पड़ेला त बाबूजी के सीख काम आवेला-

डगमग डेग करेला जब जिनगी के ऊबड़ खाबड़ में
आपन अनुभव के बइसाखी आसिफ हाथ धरा जालें

माई अइसन जीव हई जे घर परिवार से गोतिया दयाद तक के कुशल मनावेली, रात दिन बाल बचवन आ माल मवेशियन के खेयाल राखेली  आ मरत खपत रहेली। माई के दिनचर्या के ले के आसिफ साहेब लिखत बानी –

नाती-पोता, पूत-पतोहू, गोतिया-नइया, टोल-पड़ोस
खातिर कतना देवता पीतर रोजे भाखेली माई
माल-मवेसी, गोबर-गोइठा के चक्कर में ठेंगुरी पर
' बखरी ले ओ ' बखरी तक भर दिन नापेली माई

माई बाबू के अपना पर पड़ल प्रभाव के बड़ा सहजे शायर सँकारत लिखले बाड़न –

माई-बाबूजी पर ' परल ' बानी
तब नू सीधा सहज सरल बानी

राम रक्षा मिश्र विमल जी के कविता पुस्तक ' फगुआ के पहरा ' में 'माई हो माई ' एगो गीत बा, जवना में बेटी बिअह के जब घर से जात बिया त माई के कइलका सब के इआद करत बिया आ आगे के कुछुओ सिखाई सोच में बिया –

केकरा से कइसे मिलीं कइसे बतिआईं
केकरा ले हँसी केकरा से मुसकाईं
आज ले सिखवलु दुनियादारी पाई-पाई
काल्हु के अब  सिखाई

माई के लेके केशव मोहन पांडेय अपना काव्य संग्रह  ' जिनगी रोटी ना ह ' में  चार-पाँच गो कविता लिखले बानी। परबे-तेवहारे माई के पास ना आवेवाला बेटा के लेके अपना दूधे के दोषी ठहरावे वाली माई के व्यथा व्यक्त करत लिखले बाड़न –

अब सचहूँ गाँव छूट गइल  / आ माई / अँचरा में मुँह लुकवा के/ धीरे से लोर पोंछेली / बेर - बेर / अपना दूधवे के कोसेली / कि ईहे खार हो गइल / कि हमरा कवल-करेजा के / हमरा बाबू के अइसन बेवहार हो गइल।

श्रीभगवान पाण्डेय ' निरास ' अपना कविता संग्रह - किसिम-किसिम के फूल में अपना परिजन लोग के इआद आ प्रार्थना कइले बानी। माई बाबूजी के गुन गावत दोहन में से कुछ नमूना देखीं –

आँगन के तुलसी रही, घर के रही सिंगार
माता जी संजीवनी, संझा-बाती  द्वार
कुशल  क्षेम घर में  रहे, बढ़त  रहे  परिवार
माई भूखत रहि गइल, छठ जितिया अतवार

       जीवन आपन गारि के, सिंचली दे के प्यार
कुल कुटुम्ब हरियर भइल, लहलहात परिवार
भूख गरीबी बेबसीकठिन समय के मार
ढाल बनल रोकत रहीं, जानल ना परिवार

जय शंकर प्रसाद द्विवेदी के कवितन में माई के चित्रण मिल जात बा। ' जबरी पहुना भइल ' संग्रह के दू कवितन से एक-एक  अंश देखीं  जवना में  बाल बच्चन खातिर संघर्ष  करे वाली माई कइसे अपने घर से बिलगावल जाली, मार्मिक चित्रण बा –

हरदम बेकल परान रहे ओकर
रहिया में कतनो लागे चाहे ठोकर
बिछली से हरदम बचावेले माई
नेहिया के नाता निभावेले माई
x

ओहि घर अँगना में तुलसी के पुरवा
संझा दियरी जरि जाय
सेही हो अँगनवा में अइली बहुरिया
माई के देली बिलगाय

कई कवि लोग अपना संग्रह के शुरुआत मंगलकामना के रूप में ईश वंदना के संगही माई बाबूजी के वंदना करेला, जवना से शास्त्रीय विधान के अनुसरन होला।  अवध किशोर अवधू ओह नियम के अनुसरन करत माई बाबू जी के वंदना कइले बाड़ें। कवित्त के अंश देखीं –

पवली मिठाई कहीं, अँचरा में बन्हली ऊ
कहीं होखीं हमरे के, खोज के खियवली
फटही लुगरिया पहिनले रहेली बाकी
हमरा के नया-नया कीनी के पेन्हवली
सहि-सहि घाम-सीत काम करें खेतवा में
सहली गजन बाकी हमके पढ़वली
हमरा निरोग रहे खतिरा ऊ घूमि-घूमि
देव देवी सबका के भरवा चढ़वली

       अँगुरी धराई के, चलावे के सिखवलs तूँ
गलती जो देखलs s हमके बरजलs
हमरा भविष्य के सँवारे हेतु रात-दिन
घाम से कबो तs कबो बरखा से बजलs
नेक राह पर हम चलीं खुशहाल रहीं
एही खतिरा तूँ भगवानो जी के भजलs
बाबूजी हो एतने ना परल जरूरत तs
कबो कबो लबदो से मारियो के सजलs

भोजपुरी में बाल साहित्य कम बा। कुछ एक कवि लोग यदा कदा बाल साहित्य रचत रहल बा। अगर बालपन में कवनो बात दिमाग में बइठ जाला त जल्दी ना निकले। एह से बाल साहित्य के रूप में परोसाइल रचना रुचि परिष्कार में काम करी। जलज कुमार अनुपम के 'अटकन चटकन ' में  ' माई '  कविता काम के बा –

जग में सबसे सुन्नर माई
जग में सबसे निमन माई

फूटेला जब-जब रोआई
माई के आँचर में मुँहवा छिपाईं

अब हम अपना एह आलेख के सुभाष चंद्र यादव के  ' माई ' गीत के कुछ पाँति से करे जा रहल बानी। ई गीत खूब पढ़ल, गावल, सुनल गइल बा -

जग में माई बिना केहुए सहाई ना होई
केहू कतनो दुलारी बाकिर माई ना होई
सुख दुख रतिया दिनवा सहली
मुख से कबहूँ कुछ ना कहली
उनका अँचरा से बढ़के रजाई ना होई
अपने सूखल पाकल खा के
रखली सबके भरम बचा के
उनकर रोंआ जे दुखाई त भलाई ना होई

जब तक भोजपुरी अपना लोक आ संस्कृति के ना भुलाई, तब तक माई आ बाबूजी के महत्त्व बरकरार रही। माई बाबूजी के गुन गवात रही, कविता-गीत लिखात गवात रही।

( परिचय- डॉ. ब्रज भूषण मिश्र भोजपुरी साहित्य आ संगठन में चालिसहन बरिस से लागल बानी। कविता, आलोचना, इतिहास, काव्यशास्त्र, अकादमिक लेखन, जनशिक्षा संबंधी लेखन, संपादन कार्य।)

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भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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