विश्व साहित्य में माई-बाबूजी

विश्व साहित्य में माई-बाबूजी

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Posted: August 19, 2021
Category: आलेख
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डॉ. अनिल कुमार प्रसाद

माई-बाबूजी के बारे में लिखे के इच्छा हर आदमी के मन में रहेला। कुछ लोग संस्मरण के रूप में तs कुछ लोग कविता या कहानी में कुछ अइसन चरित्र के उकेर देला। उ चरित्र जीवन से ही उठावल रहेला लेकिन एतना जीवंत हो जाला कि ओह चरित्र में सभे आपन माई बाबूजी के आत्मीय छबि देखे लागेला। हम एह लेख में विश्व साहित्य में प्रसिद्ध कुछ माई बाबूजी के बारे में लिखब। एह बात के लिखे के दूगो कारण बा: पहिला तs मनोज भावुक जी के आग्रह आ दूसरे कि भोजपुरी के समृद्ध करे खातिर हमनी के बाहर निकले के पड़ी। कहे के मतलब देखे के पड़ी कि दुनिया में का भइल बा आ का हो रहल बा। एक दूसरा के भाषा आ  साहित्य के जानकारी भइला से एक भाषा आ साहित्य के पाठक गण के दूसरा भाषा आउर साहित्य के intercu।tura। competence में वृद्धि होला। एसे आज के कोरोना संतप्त दुनिया में भी g।oba। citizen बनेके अवसर आउर क्षमता मिल सकेला।

विश्व साहित्य एक अथाह सागर बा ओकरा में छुपल सब मोती-माणिक के एतना कम समय आ छोट लेख में डुबकी मार के बाहर ले आवल संभव नइखे फिर भी कुछ चमकत मोतीयन के हम रउआ सब के सामने प्रस्तुत कर रहल बानी। तs आईं हमनी के कुछ विश्व साहित्य में वर्णित बाबूजी आ माई लोग के बारे में जानल जाव।

सबसे ज्यादा प्रभावित करे वाला बाबूजी के चरित्र 19 वीं शताब्दी के फ़्रांस के विक्टर हुगो के  उपन्यास “ले मिसेराबल” के जाँ वालजाँ के बा। जाँ वालजाँ कोजेट के आपन बाबूजी ना  हउअन लेकिन अपना बच्चा से कही ज्यादा प्यार करsतारे, जान पर खेल के कोजेट के रक्षा करsतारे। अपना बहिन के सात बच्चन खातिर ब्रेड चोरावे के अपराध में जेल के सजा काट रहल जाँ वालजाँ प्यार, करुणा, मानवता, आशा आ विश्वास के प्रतिमूर्ति बाड़े।

19 वीं सदी के शुरुआत में बहुचर्चित उपन्यासकार जेन औसटेन के उपन्यासन में बाबूजी लोग के बहुत यथार्थवादी चित्रण भइल बा। एहि मे उनकर मशहूर उपन्यास “प्राइड एण्ड प्रेजुडिस” में चित्रित मिस्टर बेनेट के चरित्र एक अइसन आदमी के रूप में उभर के आइल बा जे अपना पत्नी के फूहड़पन से त्रस्त बा लेकिन आपन सीधापन, बुद्धिमत्ता, व्यंग्यात्मक हास्यप्रेम आउर मिलनसार व्यवहार के मरे नइखन देत। साथ ही अपना सबसे प्रिय बेटी एलिजाबेथ के मिस्टर कॉलिन्स अइसन फूहड़ आ बेवकूफ आदमी से शादी होखे से बचावत बाड़े आउर अपना बड़की बेटी जेन के भी शादी बिंगले से हो जाए में सहायता करत बाड़े।

1960 में प्रकाशित हारपर ली के लिखल “टु किल ए माकिंग बर्ड” में अटिकस फ्लिञ्च एक अइसन पिता बाड़े जे अकेले अपना बच्चन के पालन पोषण करsतारें एक व्यस्त अटर्नी  रहला के बावजूद। बहादुर, दयावान, लोग का कही के फेर में ना रह के, अपना बच्चन के अच्छा संस्कार देबे में विश्वास राखsतारे। अपना बच्चन के अनुशासित रखले बाड़े लेकिन ओह लोग के स्वाभाविक स्वतंत्रता में कोई बाधा नइखन बनत। अटिकस फ्लिञ्च एक आदर्श पिता के उदाहरण बाड़े।

मैथ्यू कथबर्ट के किरदार अमेरिकन साहित्य में पिता के एक क्लासिक उदाहरण बा। मृदुभाषी, सहृदय आ अत्यधिक शर्मिला मैथ्यू कथबर्ट एन शरले के गोद ले के आपन बेटी अइसन प्यार करsतारे। हालांकि दूनो के व्यक्तित्व में बहुत अंतर बा फिर भी जाँ वालजाँ से मैथ्यू कथबर्ट से तुलना हो सकेला।

इ. एम. फॉस्टर के 1908 में प्रकाशित उपन्यास “अ रूम विद अ व्यू” में इमरसन बहुत ही तेज, विचारवान आ अनूठा पिता बाड़न। उ अपना बेटा जार्ज आ उनकर प्रेमिका लूसी के हमेशा इहे सीख दे रहल बाड़न कि “be honest to yourse।f ।”

जब पिता पुत्र के संबंध के बात होखे आ तुर्गनेव के उपन्यास “फ़ादर्स एण्ड संज” के चर्चा ना होखे तs बहुत आश्चर्य के बात होई। एहिमे निकोलाई पेट्रोवईच एक रोमांटिक पिता बाड़े। उ अपना आ अपना बेटा के बीच में पीढ़ी के फर्क के हमेशा पाटे के कोशिश करsतारे। अंत में अपना बेटा अरकाडी के संगे उनकर जीवन अच्छा गुजरल। उनकर चित्रण एक अइसन इंसान के रूप में भइल बा जे जीवन के बहुत धैर्य आ जिंदादिली से जीयता।

अफ़गान अमेरीकन लेखक खालिद हुसैनी के उपन्यास “द काइटरनर” में एक पिता के बहुत भव्य वर्णन बा; ‘बाबा’ के उनकर बेटा अमीर के नजर से देखावल गइल बा। बाबा जेतना देखे में अच्छा इंसान बाड़े ओतने उनकर चरित्र ऊँचा स्तर के बा।

आ उहे बात हम गैबरियल गार्सिया मारकेज़ के उपन्यास “वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सोलीचुड” के बारे में भी कह सकेनी। होसे अरकडीओ बउएनडिया एक अइसन पिता बाड़न जे अपना कल्पना आ मेहनत से माकांडों नांव के एक गाँव बसा दे तारन। उ अपना तीन गो लरिकन के पालत बाड़न साथ ही रेबेका नाम के एगो यतीम लड़की के भी सहारा देतारें। बुढ़ापा में पागल हो गइला के बाद भी उनका तेजी में कमी नइखे आवत!

गैबरियल गार्सिया मारकेज़ के उपन्यास में अरसुला एक अइसन माई बाड़ी जेकरा दीर्घ जीवन आ परिवार के बाँध के रखे के जीवट के दौरान के अकेलापन के तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए संभवतः एह उपन्यास के नाम “वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सोलीचुड” दिहल बा।

डी. एच. लॉरेंस के उपन्यास “सन्ज एण्ड लवर्स” में मुख्य नायक पॉल मोरेल के माई ज्रट्रूड के पॉल खातिर बहुत मोह बा जवना के चलते पॉल के जिनगी अपना दू को प्रेम मिरियम आ क्लारा के बीच में डोलत रह जाता। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी एह उपन्यास के पढल गइल बा आ ईडीपस कॉम्प्लेक्स के चर्चा आलोचक लोग पॉल मोरेल आउर उनकर माई के भावनात्मक संबंध के लेके कइले बा लोग। जवना में महतारी के हमेशा ई डर बनल बा कि मिरियम या क्लारा से नजदीकी पॉल के उनकरा से अलग कर दी। लॉरेंस के जीवन में अइसन भइल बा, उ अपना “पियानो” कविता में अपना माई के अपना बचपन में जाके याद करsतारे।

लुइसा मे अलकोट, 19 वीं शताब्दी के अमेरिका के मशहूर लेखिका के उपन्यास “लिटल वीमेन” में मार्मि अपना चार बेटियन के अपना पति के घर में ना रहला पर जवन शिक्षा आउर संस्कार देतारी उ उनकर स्नेह, धैर्य आ बुद्धिमता दिखावता। पति लड़ाई के मैदान में बाड़न आ मार्मि सीमित साधन में आपन घर संभाल रहल बाड़ी। अपना बेटियन के, जेकरा के स्नेह से उ  ‘लीटल पिलग्रीमज़’ कहsतारी, काम में व्यस्त रहे के आग्रह करsतारी जब तक बाबूजी लड़ाई से घरे नइखन आ जात!

माई के जिक्र होखे आ मैक्सिम गोर्की के उपन्यास “मदर” के चर्चा ना होखे इ उचित कहाई ! पेलएगुएआ एक अइसन माई बाड़ी जे सब माई लोग लेखां अपना बेटा पावेल के भविष्य के लेके बहुत चिंतित बाड़ी लेकिन जब उनका पता लागत बा कि उनकर बेटा क्रांतिकारी लोग के साथे मिल के काम करsतारे त उ बहुत आश्वस्त हो जातारी।

नाइजेरियन लेखिका बूचि एमिचटा के उपन्यास “जॉयज़ ऑफ मदरहुड” में बाबूजी आ माई के बड़ा ही मार्मिक चित्रण बा। अगर एकर भोजपुरी अनुवाद होखे त एकर कुछ हिस्सा के वर्णन भोजपुरी क्षेत्र के भावना से मिलत जुलत बा जइसे बिआह के बाद जब बेटी  नु-ईगो अपना बाप वोकोचा अगवाडी से मिलतारी आ ओहि बेटी के बेटा लोग जियला पर पुछत नइखे, आ मुअला के बाद खूब खर्चा करके, लोग के दिखावे खातिर अंतिम संस्कार करता लोग। नु-ईगो के त्याग के चलते उनकर लरिका सब उच्च शिक्षा पावsता लोग लेकिन अपना महतारी के सुख नइखे दे पावत लोग।

अफ्रीकी उपन्यासकार चिनुआ अचेबे के उपन्यास “थिंग्स फ़ौल अपार्ट” के नायक ऑकोनकवो के जब मच्छर काटता तब उनका उनकर बचपन याद आवsता जब उनकर माई उनका के मच्छर आ कान के कहानी सुनवले रहली। नाइजेरिआ के इबो कबीला में छोट बच्चन के लोक–कथा के माध्यम से शिक्षा देवे के परंपरा बा। मच्छर आ कान के कहानी में एगो मच्छर बार बार कान के लगे आ के कुछ कहsता। उ कान से कहsता कि हम तहरा से बियाह करब ! एहिपर कान हँस के कहsतारी कि तु त नरकंकाल बाड़ तु त तुरते मर जइबs ! एही से आजो मच्छर कान के पास आके याद करावेला कि देखs अभी तक हम जियsतानी !

प्रेम चंद के उपन्यास “गोदान” में रउआ सभे होरी आ गोबर के बीच के पीढ़ी के अंतर के ओ लोग के भाग्यवाद आ आदर्शवाद के क्रमश: अंतर देखलहिं बानी लोग। सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के “सरोज-स्मृति” में एक बाप के करुणा आ असमर्थता आ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना के “दिवंगत पिता के प्रति” उद्गार आ जीवन-मूल्य बोध: ‘धक्का देकर किसी को आगे जाना पाप है'/ अत: तुम भीड़ से अलग हो गए’ से रउआ सब वाकिफ बानी ! शिवपूजन सहाय के बचपन के वर्णन जे समय में उहाँ के माई बाबूजी के स्नेह के देखवात बा इ सब रउआ लोगन से छुपल नइखे। महाश्वेता देवी के “हजार चौरासी की माँ” में ब्रती के माई सुजाता के रउआ भुलाइल ना होखेब। सुभाष यादव के ‘माई’ के तs रउआ सभे रोजे गुनगुनाइले: ‘केहू केतनों दुलारी लेकिन माई ना होई।’

विश्व साहित्य में कविता में भी माई बाबूजी के बहुत वर्णन भइल बा। आई सभे साथे-साथे साहित्य के सागर में गोता लगा के कुछ आउर मोतियन के चुन के जमा कइल  जाव !

18 वीं सदी के अंग्रेजी कवि रॉबर्ट बर्न्स अपना किसान पिता के अपना गीत (बैलड ) “माय  फादर” के बहुत ही सुन्दर वर्णन कइले बाड़न। उनकर पुश्तैनी जीविका के साधन खेती बारी ही रहे जे उ छोड़ दिहले, उनकर मृत्यु बहुत कम उम्र में हो गइल लेकिन उ आज भी स्कॉटलैंड के सबसे मशहूर कवि बाड़े।

इनकर कविता पढ़त घरी हमरा स्पैनिश आइरिश मूल के कवि शेमस हीनि के कविता “फॉलोवर” इयाद पड़ गइल हs! अपना गाँव में बाप खेत जोत रहल बाड़े आ उनकर बेटा गिरत पड़त ढिमलात उनका पीछे जा रहल बाड़े। आ जब उ लडिका बड़ होता तs खेत में आगे आगे उ हर जोतsता आ ओकरा छाया में बूढ़ा बाप पीछे पीछे चल रहल बाड़े ! एह कविता में बाप बेटा के परस्पर सही समय पर खयाल रखे के बारे में दिखावता। एक पीढ़ी से दूसरा पीढ़ी में खेती किसानी के गुण हस्तान्तरित हो जाता। साथ ही एह कविता में इ भी दिखावल जाता कि कइसे ई परंपरा विलुप्त होखे के कगार पर बा।

डी. एच. लॉरेंस के कविता “ब्यूटीफुल ओल्ड ऐज” हमेशा खातिर बहुत प्रासंगिक बा। लॉरेंस के   बुढ़ापा एक तरह के सेब (pippin) के तरह होखे के चाँही जेहिमे आदमी के झुर्रीदार शरीर में से ओह तरह के सुगंध निकले के चाँही जेकरा के महसूस करके ओकर बेटा बेटी आश्चर्य आ गौरव से कह सको कि हमार माई आ बाबूजी पूर्ण जीवन जियले बा लोग। एह कविता में बुढ़ापा के वर्णन पढ़ के हमरा हिन्दी के वरिष्ट कवि अरुण कमल जी के पंक्ति अनायास इयाद आ गइल हs,“ न विवशता न थकान न स्यापा / हो, तो जिंदगी की नोक हो बुढ़ापा ।”

टैगोर अपना माई के स्नेह से कम उम्र में ही वंचित हो गइल रहले। उनकर कविता में माई के प्रति स्नेह के बहुत ही मार्मिक चित्रण रहेला। उनकर कविता “ I Cannot Remember My Mother”  में अपना माई के प्रति अइसन भावनात्मक लगाव के वर्णन बा जे पढ़ के पाठक महसूस करता कि माई मरला पर अमर हो जातारी। उ जब आपन पार्थिव शरीर त्याग देतारी तब आउर उनकर दायरा बढ़ जाता आ उ हवा में, फूल में, मौसम में, आकाश में सब जगह मौजूद बाड़ी।

सिल्विया प्लाथ के “डैडी” कविता बहुत प्रसिद्ध आउर विवादित बा जेहिमे उ अपना बाबूजी के एक नाजी अफसर के अइसन खाका खिचले बाड़ी आ होलोकॉस्ट के बारे में वर्णन बा। लेकिन उनकर एगो कविता “द  मॉर्निंग सॉन्ग” बा जेकरा में उ आपन गर्भावस्था के चित्रित कइले बाड़ी। गर्भावस्था पर उनकर एगो आउर कविता बा “ए रीडल इन नाइन सिलैबल्स” जे खाली metaphors में लिखल बा, जेकरा में उ महतारी बनेके पहिले के अनुभव के बहुत ही रोचक आउर प्रभावशाली ढंग से कहsतारी ।

अमेरिका के मशहूर कवि आउर कहानीकार एडगर एलन पो के कविता अपना माई पर ना लिखके अपना पत्नी के ममी पर लिखल बा, “टु माय मदर” ! एह कविता में उ देखावsतारे कि आदमी के आपन माई के अलावा कोई दूसरा के माई से भी भावनात्मक नजदीकी हो सकेला। 20 वीं सदी के अंग्रेजी के कवि फिलिप लारकिन के कविता “मदर, समर एण्ड आय “ इ देखावsता कि अपना बाबूजी के मरला के बाद लारकिन के अपना माई के प्रति बहुत निष्ठा हो गइल।

हम आपन लेख के फिलिप लारकिन के बात से ही खतम करे के चाहब जे 20 वीं सदी के एक महत्वपूर्ण  कवि रहले। हम अपना लेख के भूमिका में कारण बतवले बानी कि विश्व साहित्य (अपना भाषा के साहित्य भी ओहि में समाहित बा ) काहे पढे के चाँही। खाली उहे कारण ना हो सकेला, रउआ सभे आउर भी कारण बता सकीले ! अब सवाल उठsता कि साहित्य में कल्पना के रंग दे के माई बाबूजी के बारे में काहे लिखाइल बा ? का जरूरत बा लिखे के ? हमरा समझ से साहित्य में केवल “न मातुः परदैवतम्” आ “सर्वदेवमय: पिता” ही माई बाबूजी के बारे में लिखे के कारण ना हो सके! फिलिप लारकिन जे बात कहsतारें उ खाली कविता पर ही नइखे लागू होत, साहित्य के सब विधा पर लागू होता, “I am a।ways trying to 'preserve' things by getting other people to read what I have written, and feel what I fe।t.” अगर अइसन बात ना रहित तs शेक्सपियर के नाटक “किंग लीयर” में एक बूढ़ा बाप के आपन बेटियन द्वारा घर से बाहर ना कइल जाइत जे आज भी एक मिथक बन के प्रासंगिक हो जाइत। अगर अइसन बात ना रहित तs भिखारी ठाकुर के “गबरघिचोर” नाटक में गबरघिचोर के माई अपना विवेक, ममता आ करुणा के परिचय ना देती ! हर देश के समाज आ संस्कृति एही संवेदना के थाती के सँजो के रखे के प्रयास करेला जवना के महत्वपूर्ण हिस्सा में माई आ बाबूजी लोग बसेला।

( परिचय- डॉ. अनिल कुमार प्रसाद यमन, लीबिया आ सऊदी अरबिया  में अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक आ अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष रहल बानी।  हिंदुस्तान, मध्य-पूर्व, चीन, अमेरिका आ यू. के. में आयोजित अन्तराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेले बानी। अंग्रेजी में कविता, कहानी आ आलोचना के किताब प्रकाशित बा। अंग्रेजी, हिन्दी आ भोजपुरी में लगातार लिखत रहेनी । )

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