माई बाबू के इयाद

माई बाबू के इयाद

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Posted: September 20, 2021
Category: कविता
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अखिलेश्वर मिश्र

माई बाबू के इयाद बहुत आवता,

ओ सब के ना रहल हमके सतावता।

हमरा जीवन के जवन प्यार से निखार मिलल,

उहे रह-रह के आज हमके रोवावता।।

 

हमरा कहियो ना कवनो बात के कमी भइलस,

कबो अभाव में अँखियन में लोर ना अइलस।

हमरा खातिर त बहुत कष्ट उठवनी लोगिन,

जब ले जियनी लोगन हमके ना कमी धइलस।।

 

माई बाबू के ऊ प्यार त कहियो ना मिली,

फूल मुरझा गइल सनेह के कहियो ना खिली।

मगर ओ प्यार के खुशबू अबहूँ गमकता,

फिर भी जरते रही मन में अभाव के तिल्ली।।

 

स्वर्ग से रउआ सभन नेह दे रहल बानी,

रउआ सभन के कहल आज तक ले हम मानी।

कबो पहाड़ ना दुःख के टूटे हमरा पर,

बिना कहले बचावे रउआ सभन आ जानी।।

 

पितर जे भी हमार स्वर्ग के वासी बानी,

आज ओ सबसे हाथ जोर हम कहत बानी।

आपन आशीष रउआ सभनि बनवले राखीं,

रउआ सभ का समक्ष शीश झुकावत बानी।।

 

 

 

 

2


संतति भइला के नाते, रउआ उनके सम्मान त दे दीं

माई-बाप के कुछ मत दीं, पर उनका के मुस्कान त दे दीं,

संतति भइला के नाते, रउआ उनके सम्मान त दे दीं।

उनका एकरा से अधिका, अउरी कुछऊ चहबो ना करी,

गर्व करे अपना संतति पर, मन में ई अभिमान त दे दीं।।

 

मातु-पिता उ सुंदर बट ह, जे संतति के देला छाया,

बेटा-बेटी के उन्नति खातिर, न्योछावर कर देला काया।

आपन सब कुछ राख क देला, संतति के मुस्कान के खातिर,

संतति अपना मातु-पिता के काहे समझे गैर-पराया।।

 

माई-बाप से लमहर, देवी-देवता कबहूँ केहू ना होला,

राम, रहीम, या राधा-सीता, चाहे शिवदानी बम भोला।

फिर भी लोगवा विचलित होके, संतति धर्म भुलाला काहे,

मन में गंदा भर के काहे, ऊपर पहिरे नीमन चोला।।

 

माई-बाप सबसे लमहर धन, ओसे बड़हन धन ना होला।

उनका वृद्धाश्रम जाके, रहऊँ के कबहूँ मन का होला?

जे दुस्साहस कर के, माई-बाबू जी के बाहर कर दे,

प्रभु चरनन में ओकरा खातिर, कहियो-कबो सरन ना होला।।

 

 

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