सन्तावन के गदर आ बाबू कुँवर सिंह

सन्तावन के गदर आ बाबू कुँवर सिंह

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Posted: September 27, 2021
Category: आवरण कथा
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डाॅ० भोला प्रसाद आग्नेय

११ मई १८५७ के अभी भोर के किरिन दिल्ली के सड़कन पे उतरहीं वाली रहे तवले मेरठ से आइल सिपाहियन के एगो दल जमुना पार क के दिल्ली में घुस गइल. एक दिन पहिले इहे दल मेरठ में आपन अंग्रेज अफसर के आदेश माने से इनकार करत ओकर हत्या क देले रहे.ई दल लालकिला में जा के मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर से रहनुमाई करे खातिर अपील कइलन. अपील स्वीकार करत बहादुर शाह जफर खुद के शहनशाह-ए- हिंदुस्तान घोषित क दिहलन.

ईस्ट इंडिया कम्पनी के पाले कुल २ लाख ३२ हजार २२४ सिपाही रहलन जवना में से तकरीबन आधा सिपाही रेजिमेंट छोड़ के विद्रोही हो गइल रहलन. आ ३४ वीं नेटिव इन्फैन्ट्री के जवान बलिया निवासी मंगल पांडे त अपना सार्जेंट मेजर के गोली मार दिहलन जवना के कारण अंग्रेज उनके फांसी दे दिहलन स  . ए तरे दिल्ली पे कब्जा होते विद्रोह के लहर कानपुर, लखनऊ, बनारस , इलाहाबाद, बरेली, जगदीश पुर, पूणे, झांसी तक ले फइल गइल. अंग्रेजन के गोड़ के नीचे से धरती सरके लागल. स्थानीय सामन्त, नवाब भा राजा लोग नेतृत्व के जिम्मेदारी ले लिहल लोग. अंग्रेजी हुकूमत के हाथे ई लोग बहुते सतावल जा चुकल रहे लोग. एसे सभे असंतुष्ट रहे लोग. मोका मिलते सभे विद्रोहियन के साथे आ गइल.

कानपुर में अंतिम मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक बेटा लखनऊ में बेगम हज़रत महल आ बरेली में रुहेलखंड के पहिले के शासक के उत्तराधिकारी खान बहादुर रहनुमाई कइलन. झांसी में सिपाहियन के नेतृत्व रानी लक्ष्मीबाई अपना हाथ में ले लिहलिन. विद्रोह के ई लहर उत्तर भारत, पश्चिम आ मध्य भारत के कुछ हिस्सन में चल पड़ल. खाली दक्षिण भारत एसे अलग थलग रहल. ओने के सिपाही अपना के अंग्रेजन के प्रति निष्ठावान बनवले रहलन.

ए विद्रोह के कारण ई रहल कि अंग्रेजन के जवन सेवा शर्त रहल ओसे हिन्दू मुस्लिम दूनों के धार्मिक भावना के ठेस पहुंचत रहे. एकरे अलावे वेतन आ पदोन्नति में गोरा काला के भेद रखल जात रहे. टैक्स के वसूली में जनता पे तरह तरह के अत्याचार होत रहे. एसे आम जनता अंग्रेजन के विरोधी हो उसेउ हो गइल रहे.

बिहार के जगदीशपुर के जमींदार बाबू कुंवर सिंह के अंग्रेज अपना कूटनीति के जरिये दिवालियेपन के कगार पर पहुंचा देले रहलन. इनकर मय सम्पत्ति छीन लेले रहलन स, इनके बार बार अपील कइलो पर उन्हनीं पे कवनो असर ना पड़त रहे. एसे बाबू कुंवर सिंह भीतरे भीतर अंग्रेजन के विरोधी हो गइल रहलन आ मोका के तलाश में रहलन ओ घरी इनके उमिर अस्सी साल रहे.

१२ जून १८५७ के बिहार रेजिमेंट के तीन गो सिपाही कमांडर के आदेश माने से इनकार क दिहलन. ओ तीनों सिपाहियन के अंग्रेज हाथी के पीठ पे बइठा के नीचे ढकेल के मुआ दिहलन. एकरे जवाब में ०३ जुलाई १८५७ के पटना में सेना के एगो टुकड़ी कैप्टन डी० आर० लायल के हत्या क दिहलस. एसे खिसिया के अंग्रेज १६ गो देश भक्तन के फांसी दे दिहलन स एकर नतीजा ई भइल कि २५ जुलाई १८५७ के दानापुर सैनिक छावनी में विद्रोह हो गइल आ अइसने मोका के तलाश में बाबू कुंवर सिंह रहलन.

वीरवर बाबू कुंवर सिंह के नेतृत्व में आजादी के दीवाने वीर सैनिक जगदीशपुर से आरा आ के खजाना लूट लिहलन आ बंदी गृह के नष्ट क दिहलन. पूरा शाहाबाद बाबू कुंवर सिंह के अधीन हो गइल. २९ जुलाई १८५७ के कैप्टन डनवर के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना आरा पहुंचल बाकिर बाबू कुंवर सिंह वृकयुद्ध शैली अपना के अपना के बचा लिहलन. आधी रात में आक्रमण क के कैप्टन डनवर के साथे अनेक अंंग्रेजी सिपाहियन के मौत के घाट उतार दिहलन. एकरे बाद बंगाल से अंग्रेजी सेना के मेजर विसेंट आयर आपन सेना के साथे आरा पहुँच गइलन. बाबू कुंवर सिंह के साथे मेजर आयर से घमासान युद्ध भइल आ २-३ अगस्त के आरा पर फिनु अंग्रेजन के कब्जा हो गइल.

मेजर आयर के जीत से बाबू कुंवर सिंह हतोत्साहित ना भइलन. अपने सेना के नया आयाम देवे खातिर सासाराम, रोहतास, मिर्जापुर, रीवां, बांदा, कालपी आ कानपुर होत मार्च १९५८ में लखनऊ पहुँच गइलन. अवध के नवाब आजमगढ़ के शासनाधिकार के साथे आजमगढ़ भेज दिहलन. २२ मार्च १९५८ के बाबू कुंवर सिंह कोलोनल मिलमैन के सेना के पराजित क के आजमगढ़ के अंग्रेजन से मुक्त करा दिहलन.१५ अप्रैल १९५८ के घात लगा के जनरल लुगाई बाबू कुंवर सिंह पे आक्रमण क दिहलस बाकिर ओहू के कुंवर सिंह भारी शिकस्त दिहलन.

अगिला दिने बाबू कुंवर सिंह अपना गृह जनपद आरा आवे के प्रोग्राम बनवलन. बलिया जनपद के नगरा, सिकंदर पुर होत मनियर आ के आपन पड़ाव डललन. २० अप्रैल १९५८ के कैप्टन डगलस जवन नगरा से इनकर पीछा करत रहे आक्रमण क दिहलस. ओइजो बाबू कुंवर सिंह ओके पराजित करत अपना सेना के साथे शिवपुर घाट के ओर चल दिहलन. रास्ता में पचरुखी देवी मंदिर पे कुंवर सिंह के ताक में अंग्रेजी सेना बइठल रहे. ओइजो घमासान युद्ध भइल. ए युद्ध में बाबू कुंवर सिंह अपना साथी सिद्धा सिंह के साथे १०६  गो अंग्रेज सिपाहियन के मूड़ी काट काट के एगो नाला में फेंकत गइलन. ओह नाला ओही से आजुवो मूड़ कटला नाला कहल जाला.

२१ अप्रैल १९५८ के बाबू कुंवर सिंह शिवपुर घाट से गंगा पार करत नाय से जात रहलन तवले अंग्रेजन के सेना नाय पर गोली चलावे शुरू क दिहलस. बाबू कुंवर सिंह के बायां हाथ में गोली लाग गइल. अंग्रेजन के गोली के जहर पूरा शरीर न फइले पावे एसे भारत माँ के वीर आ साहसी सपूत बाबू कुंवर सिंह आपन बायां हाथ काट के गंगा मइया के समर्पित क दिहलन.आ ओह पार जा के हाथी से अपन गांवे जगदीशपुर पहुँच गइलन.

बाबू कुंवर सिंह के घायल जान के कैप्टन ली ग्रैंड २३ अप्रैल १९५८  के जगदीशपुर पर आक्रमण क दिहलस बाकिर अंग्रेजी सेना के पराजित होखे के पड़ल आ कैप्टन ली ग्रैंडो मरा गइलन. भारत माता के अइसन वीर सपूत बाबू कुंवर सिंह अपने बीमारी से २६ अप्रैल १९५८ के सदा के नींद सुत गइलन. उनके वीरता के अइसन अमिट छाप पड़ल बा कि आजुवो भोजपुर आ ओकरे आस पास के लइका खेल खेल में गावेलन स  - चल कबड्डी आरा जहाँ कुंवर सिंह मरदाना.

सुप्रसिद्ध कवि मनोरंजन प्रसाद सिन्हा अपना कविता में कहले बाडन---

अस्सी वर्ष की हड्डी में जागा जोश पुराना था.

सब कहते हैं कुंवर सिंह बड़ा वीर मरदाना था.

( परिचय- डाॅ० भोला प्रसाद आग्नेय, कवि, कथाकार, नाटककार, निबंधकार एवं कलाकार, आकाशवाणी व दूरदर्शन तथा पूर्व प्रवक्ता, मुरली मनोहर टाउन इंटर कॉलेज बलिया उ०प्र०)

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