अविश्वास मन के सपना के

अविश्वास मन के सपना के

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Posted: October 22, 2021
Category: कविता
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डॉ. दीप्ति

श्रद्धा, शक्ति

सम्मान के प्रतीक नारी

लांछन, शोषण

अपमान के प्रतीक नारी।

मूरत बनाके

थोप दीं मंदिर में

चढाईं फूल, अच्छत्

आ गाईं-

तू हीं हऊ लछिमी,

मेधा, प्रतिभा, बुद्धि, सरस्वती, आदिशक्ति भवानी।

 

मन में जब आ जाये

सड़क पर खींच के आंचर

आ साड़ी फाड़ दीं-

धनका दीं एकरा के

काहे कि ..अबला ह नारी

अन बोलता गाय खानी

कुछुओ ना कही।

 

ई समाज हवे

दुमुहँआ साँप-

कब काट ली भरोसा नइखे

टुटलो पर दाँत विष के

ई फोंफ मारी-

कालिया दही खानी

खद बद करेला अपने जहर से

मनई के मन!!

 

लोभ के पांकी में सनाइल

ई अहंकार के पुतला

ना धरती बा एकरा लगे

ना मुट्ठी भर आकाशे बा,

काहे कि एकरा

सपना पर तनिको विश्वास नइखे,

नारी प्रतिष्ठा बढत बा

बाकी

ओकर आपन का बा???

उत्थान हो रहल बा,

नारियन के......

नारियन के सपना बुना रहल बा,

बाकी सपना पर तनिको

विश्वास नइखे!

अपना सपना पर विश्वास नइखे।।

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