आदि शंकराचार्य के अमर योगदान

आदि शंकराचार्य के अमर योगदान

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Posted: March 21, 2022
Category: आलेख
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विनय बिहारी सिंह

एमे कौनो दू राय नइखे कि आदि शंकराचार्य सनातन धर्म के एने-ओने छिंटाइल विचारधारा के एकीकरण क दिहले। उनकर जनम केरल के मालाबार इलाका के कालड़ी गांव में नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में भइल रहे। पिता- शिवगुरु आ माता- आर्याम्बा परम ईश्वरभक्त रहे लोग। शंकराचार्य के जन्म सातवीं शताब्दी के मानल जाला। बाकिर एगो मान्यता बा कि उनुकर जनम 508 ईसा पूर्व आ मृत्यु 474 ईसा पूर्व भइल रहे। त हमनी के एकरा पर ढेर सोचला के जरूरत नइखे। ईहे मानि के चलेके बा कि आदि शंकराचार्य ईश्वर के एगो अवतार रहले। काहें से कि ऊ सिरिफ 32 साल के आयु तक जियले। एही बीच में ऊ अद्वैत वेदांत के ठोस आधार बना दिहले, विविध विचारधारा के एकीकरण कइले, उपनिषद आ वेदांत के सूत्र के व्याख्या कइले, बिसेस रूप से ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडुक्य, ऐतरेय, तैतीर्य, वृहदारण्यक आ छांदोग्य उपनिषद के विलक्षण भाष्य लिखले, ब्रह्मसूत्र के व्याख्या कइले, चारो दिशा में चार गो पीठ- ज्योतिष्पीठ (बद्रीनाथ, उत्तराखंड), गोवर्धनपीठ (पुरी, उड़ीसा), शारदापीठ (द्वारका, गुजरात), आ श्रृंगेरीपीठ (मैसूर, कर्नाटक) में स्थापित कइले। एकरा अलावा ऊ दसनामी (दस प्रकार के) संप्रदाय बनवले, जवना के नांव ह- गिरि, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, तीर्थ आ आश्रम। एही से उनुका के ढेर लोग भगवान शिव के अवतार भी कहेला।

आदि शंकराचार्य के जनम के लेके एगो बड़ा रोचक प्रसंग बा। कहल जाला कि माता आर्यांबा आ पिता शिवगुरु के कई साल ले कवनो संताने ना भइल। लागत रहे कि अब माता आर्याम्बा बिना संताने के रहि जइहें। घर के लगिए एगो शिव जी के मंदिर रहे। दूनो परानी ओही मंदिर में पूजा आ ध्यान करे बइठि गइल लो आ ठानि लिहल लो कि जब तक भगवान शिव के पुत्र पैदा होखे खातिर आसिरबाद ना मिली ऊ लोग ओहिजा से टस से मस ना होखिलो। चाहे मृत्यु काहें ना हो जाउ। त कहल जाला कि भगवान शिव कृपा सिंधु हउवन, किरपा के सागर। एह दूनो परानी के बिना खइले-पियले कठिन तप देखि के शिव जी के मन पसीज गइल। ऊ प्रकट हो गइले आ कहले कि बर मांग लोग, का चाहीं। कहाला कि भगवान के सब मालूम रहेला कि के का चाहता। बाकिर उनुकर लीला अइसन ह कि ऊ भक्त के मुंह से ओकर कामना सुने के चाहेले। त शिवगुरु जी कहलन कि प्रभु, हमनी के कौनो संतान नइखे। किरपा करीं आ एगो पुत्र प्राप्ति के आशिरबाद दे दीं। भगवान शिव कहले कि तोहरा लोगन के लइका होखी। बाकिर एगो शर्त बा- तू ढेर उमिर के लइका चाह तार त ऊ बुद्धिमान ना होखी। कम उमिर के लइका होई बाकिर ऊ परम बिदवान होखी। कइसन लइका चाह तार। शिवगुरु स्वयम परम विद्वान रहले, उनुकर माता भी विद्वान रहली। तुरंते कहले- प्रभु, कमे उमिर के लइका दीं, जवन परम विद्वान होखे। तब माता आर्याम्बा के कोख में आदि शंकराचार्य आ गइले। बाकिर उनुका जनम के कुछए महीना बाद पिता शिवगुरु के देहांत हो गइल। जनम के पहिले शिवगुरु अपना मेहरारू आर्याम्बा के वेद-पुराण के पवित्र प्रसंग आ धार्मिक, आध्यात्मिक कथा सुनवले ताकि आदि शंकराचार्य के कान में ई कुल बाति जाउ। आदि शंकराचार्य के आठ बरिस उमिर भइल त उनुका वेद, पुराण, उपनिषद आदि के परम ज्ञान हो चुकल रहे। उनुका मन में परम वैराग्य के भाव उठल। ओही घरी ऊ अपना महतारी से आज्ञा ले के गुरु के खोज आ साधना खातिर घर छोड़ि दिहले।

उनुकरा संन्यास लिहला के भी एगो कहानी बा। घर का लगे अलवाई नदी बहत रहे। ओही में माई-बेटा नहाए गइल लोग। अचानके आदि शंकराचार्य के एगो गोड़ मगरमच्छ पकड़ि लिहलसि। उनुकरा माई के त जइसे पराने निकलि गइल। ऊ रोए लगली। त आदि शंकराचार्य कहले कि ए माई तूं हमरा के संन्यास के आज्ञा दे देबू त ई मगरमच्छ से बांचे खातिर हम प्रार्थना कर सकतानी। माई कहली कि ठीक बा। तू संन्यास ले लीह। बाकिर तोहार जान बांचि जाउ। ज्योंही माई संन्यास के आज्ञा दिहली, मगरमच्छ आदि शंकराचार्य के गोड़ छोड़ि दिहलस। लोग कहेला कि भगवाने मगरमच्छ के रूप में आइल रहले।

आदि शंकराचार्य गुरु के खोज में निकलले त उनुका मन में गहिर आस्था रहे कि गुरु जरूर मिलिहें। ऊ पैदले, नंगे पैर जगह-जगह भ्रमण कइलन। कठिन खोज के बाद आखिरकार हिमालय के बद्रीनाथ के एगो आश्रम में गुरु गोविंद भगवत्पाद से भेंट होइए गइल। आदि शंकराचार्य के बुझा गइल कि ईहे हमार गुरु हउवन। गुरु पुछले कि तूं के हव। आदि शंकराचार्य कहले कि एह शरीर के पिता के नाम शिवगुरु ह। बाकिर हम के हईं, ईहे जाने खातिर हम रउवां शरण में आइल बानी। विनम्र प्रार्थना बा कि हमरा के शिष्य बना लीं। गोविंद भग्वतपाद जी जानत रहले कि ई हमार शिष्य के लायक लइका बा। ओह दिन से आदि शंकराचार्य ओह आश्रम के निवासी हो गइले आ अद्वैत दर्शन के शिक्षा प्रारंभ हो गइल। शिक्षा पूर्ण भइल त ई देश भर के भ्रमण कइलन आ जगह-जगह आपन चेला (शिष्य) बनवलन। बनारस में मंडन मिश्र जइसन विद्वान के शास्त्रार्थ में हरा दिहलन आ उनका के आपन चेला बनवलन।

एक बार के बात ह कि आदि शंकराचार्य गंगा में नहा के अपना चेला लोगन के साथे वापस आवत रहले। सामने से एगो मइल-कुचइल चांडाल चारि गो कुकुर ले के आवत रहे। चेला कहलन स कि चांडाल रास्ता से हटि जा, हमनी के गुरु जी गंगा असनान क के आवतारे। चांडाल सामने आके ठिठकि के रुकि गइल। कहलसि कि हमरा देहि के रउवां सब चांडाल कहतानी। बाकिर हमार आत्मा त ओइसने बा जइसन राउर बा। त केकरा के हटे के कहतानी, देह के कि आत्मा के? रउवां सब त विद्वान हईं सभे। आत्मा पवित्र ह। आदि शंकराचार्य के लागल कि ई कौनो साधारण व्यक्ति ना ह। ऊ तुरंते हाथ जोड़ि के चांडाल के प्रणाम कइले आ कहले कि महाराज रउवां के हईं, रउवां निश्चय रूप से मनुष्य के रूप में कौनो देवता हईं। ई सुनते चांडाल भगवान शिव के रूप में बदलि गइल। भगवान शिव के गुरु आ चेला लोग चरण छुअल लोग आ धन्य भइल लोग। चारि गो कुकुर चारि गो वेद के रूप प्रकट भइलन स।

शंकराचार्य के आनंद के कौनो ठेकाना ना रहे। शिव जी कहलन कि तोहरा के हम आसिरबाद दे तानी कि तू ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखब। तब तक ले ऊ भगवत् गीता पर भाष्य लिखि चुकल रहले। त ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखत के बेरी एगो अउरी घटना भइल। नदी से नहा के आदि शंकराचार्य वापस लौटत रहलन त एगो साधु उनुका से ब्रह्मसूत्र के एगो श्लोक के अर्थ पुछलसि। आदि शंकराचार्य ओकर अर्थ बतवलन। एह पर ऊ साधु उनुका से शास्त्रार्थ करे लागल। आठ दिन ले शास्त्रार्थ भइल। शंकराचार्य के लागल कि ई कौनो साधारण साधु ना हउवन। ऊ हाथ जोड़ि के प्रार्थना कइलन कि रउवां आपन असली परिचय दीं। रउवां के हईं? तब पता चलल कि ऊ ब्रह्मसूत्र के रचयिता वेदव्यास हउवन। आदि शंकराचार्य के त आनंद के ठेकाना ना रहे। वेदव्यास उनुका के कहले कि तू हमरा ब्रह्मसूत्र के सही-सही व्याख्या कर रहल बाड़। जा तोहरा के हमार आशीर्वाद बा।

आदि शंकराचार्य सचहूं ईश्वर के अवतार रहले। उनुका बारे में जेतना लिखाउ कमे कहाई। कहल जाला कि ऊ 262 से ज्यादा ग्रंथ लिखले बाड़े। हमनी के धन्य बानी जा कि ओह धरती पर जनम लेले बानी जा जहां परम पवित्र ईश्वर के अवतार आदि शंकराचार्य के जन्म भइल रहे।  अंत में 32 बरिस के उमिर में ऊ केदारनाथ में आपन शरीर छोड़ि दिहले, महासमाधि में लीन हो गइले।

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