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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min370

हम का करब कह के

के मानीं?

 

के कही कि हमरो

एगो कहानी बा!

 

राम अस ना

त रावणो अस ना

कन्हइया अस ना

त कंसो अस ना।

 

अजातशत्रु,चन्द्रगुप्त, हर्षवर्द्धन भा

पल्लवराज महेन्द्रवर्मन-

केहू के छिटिको भर नइखे

हमार जिनिगी के सात पुश्त

हम जानत बानीं।

 

गाँधी, सुबास, भगत, आजाद

चाहे एकदम पीछे चलीं त

भक्त प्रहलाद

केहू के जिनगी के कुछुओ

हमरा जिनगी से नइखे जुटत

त कइसे कह दीं

आपन वजन बढ़ा के कुछुओ?

 

आन्ही में उड़त

सूखल कोंढ़ी

केने जाई

केने बिलाई

के बता सकत बा?

 

खपड़ा वाला घर में

भइल रहलीं हम

माई कहत रहे

हमरा से बड़ एगो भाई भइल

मुअले भइल

हमार जनम भइल त

चनरमा के उगरह हो गइल रहे

हम आजु ले गरहने में

गोताइल बानीं

गोर पैदा भइल रहीं

बाकिर करिखे पोताइल बानीं

सवखे लागत रह गइल

तनियो-मनी पेट फुललगर होइत

से ना भइल।

 

जनमे से

अपना भार से बेसी

भार से जँताइल बानीं

कुछ कहींला त लोग कहेला

करियट्ठा मनसपापी ह

देख-देख जरेला।

 

हमार रोज-रोज के मुअलका

केहू के लउके ना।

 

हमरा जिनगी में

ताकीं मत, महाराज!

हमार जिनगी केहू से ना मिली।

 

ठीक बा कि मनरेगा वाला

मजूर हम ना हईं

त गद्दी के नासूरो त ना हईं

देश के माटी, हवा, पानी

जइसे सबके ह

ओइसे हमरो

जहिया मूअब ओही में मिलब

पइसा होई त

जिअते काम-किरिया सपरा देब

मुअला के बाद के

कवनो विधान में

हमरा विश्वास ना ह

अब ई रउआ प बा कि

हमरा के का कहब!

 

ओइसे हम

खाली एगो बात कहब

हमरा के केहू ऊ ना कहल

जे हम रहीं

अब रउए बताईं

हम का कहीं?


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min280

सुरेश कांटक

का कहीं ए हरिचरना के माई

जिनगी बेहाल भइल होत ना कमाई

चारो ओरी ताकतानी केहू ना सहाई

कइसे के बाल बाचा जिनगी बचाईं

 

सगरो बाजार बंद कइसे का बेचाई

बंद इसकूल बाटे होखे ना पढ़ाई

करजो भेटात नइखे आवेला रोआई

सँझिया सबेर कइसे चुल्हवा जोराई

का कहीं ए हरिचरना के माई !

 

हीत नाता कामे नाहीं आवे कवनो भाई

लागेला कि दुनिया बनल बा कसाई

मुअलो प अब केहू कामे नाहीं आई

दूरे दूरे सभे रहे के से हम बताईं

का कहीं ए हरिचरना के माई !

 

सगरो बढ़ल जाता बड़े बड़े खाई

रतिया अन्हरिया में पड़े ना दिखाई

अस मन करेला जहर हम खाईं

बाकिर तोर मुँह परि जाला दिखलाई

का कहीं ए हरिचरना के माई !

 

बबुआ बेमार बाटे मिले ना दवाई

देखे सभ लोग बाकिर भीरी नाहीं आई

लीलेला समइया बनल बैरी बाबू माई

कांटक के करेज कुहुँकेला कसमसाई

का कहीं ए हरिचरना के माई !

 


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min290

डॉ. दीप्ति

श्रद्धा, शक्ति

सम्मान के प्रतीक नारी

लांछन, शोषण

अपमान के प्रतीक नारी।

मूरत बनाके

थोप दीं मंदिर में

चढाईं फूल, अच्छत्

आ गाईं-

तू हीं हऊ लछिमी,

मेधा, प्रतिभा, बुद्धि, सरस्वती, आदिशक्ति भवानी।

 

मन में जब आ जाये

सड़क पर खींच के आंचर

आ साड़ी फाड़ दीं-

धनका दीं एकरा के

काहे कि ..अबला ह नारी

अन बोलता गाय खानी

कुछुओ ना कही।

 

ई समाज हवे

दुमुहँआ साँप-

कब काट ली भरोसा नइखे

टुटलो पर दाँत विष के

ई फोंफ मारी-

कालिया दही खानी

खद बद करेला अपने जहर से

मनई के मन!!

 

लोभ के पांकी में सनाइल

ई अहंकार के पुतला

ना धरती बा एकरा लगे

ना मुट्ठी भर आकाशे बा,

काहे कि एकरा

सपना पर तनिको विश्वास नइखे,

नारी प्रतिष्ठा बढत बा

बाकी

ओकर आपन का बा???

उत्थान हो रहल बा,

नारियन के……

नारियन के सपना बुना रहल बा,

बाकी सपना पर तनिको

विश्वास नइखे!

अपना सपना पर विश्वास नइखे।।


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20213min240

डॉ. ब्रजभूषण मिश्र

” भोजपुरी साहित्य के गौरव ” स्तम्भ में दिवंगत साहित्य सेवियन के संक्षिप्त परिचय के सिलसिला पीछला कई अंकन से जारी बा। अब तक निम्नलिखित 93 गो दिवंगत साहित्यकारन के संक्षिप्त परिचय रउरा पढ़ चुकल बानी। ओह 93 गो साहित्यकार लोगन के लिस्ट पढ़ीं आ फेर आगे बढ़ीं। – संपादक

अंक 11 में –    

1- महापंडित राहुल सांकृत्यायन

2- दूधनाथ उपाध्याय

3- महिन्दर मिसिर

4- रघुवीर नारायण

5- भिखारी ठाकुर

6- मनोरंजन प्रसाद सिंहभाग

7- महेन्द्र शास्त्री

8- दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह ‘ नाथ ‘

9- राम विचार पांडेय

10- डॉ. उदय नारायण तिवारी

11- धरीक्षण मिश्र

 

 

 

अंक 12 में

 

12-  प्रसिद्ध नारायण सिंह

13- रघुवंश नारायण सिंह

14- राम बचन द्विवेदी ‘ अरविंद ‘

15- डॉ. कमला प्रसाद मिश्र ‘ विप्र ‘

16 -शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी

17- हवलदार त्रिपाठी ‘ सहृदय’

18- डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय

19- विश्वनाथ प्रसाद ‘ शैदा’

20- पांडेय नर्मदेश्वर सहाय

21- कुलदीप नारायण राय ‘ झड़प’

22- पं. गणेश चौबे

 

अंक 13 में

23 – डॉ.स्वामी नाथ सिंह

24- राघव शरण मिश्र ‘ मुँहदूबर ‘

25- जगदीश ओझा ‘ सुन्दर ‘

26- रामनाथ पाठक ‘ प्रणयी ‘

27- मोती बी ए

28- महेश्वराचार्य

29- ईश्वर चंद्र सिन्हा

30- रामनाथ पांडेय

31- राधा मोहन राधेश

32- हरेन्द्रदेव नारायण

33- मास्टर अजीज

 

अंक 14 में

34- पांडेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह

35- बिसराम

36- भुवनेश्वर प्र. श्रीवास्तव ‘ भानु’

37- बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव ‘ ढीबरी लाल’

38- रुद्र काशिकेय / गुरु बनारसी

39- श्याम बिहारी तिवारी ‘ देहाती ‘

40- रामदेव द्विवेदी ‘अलमस्त ‘

41- राहगीर

42- दूधनाथ शर्मा  ‘ श्याम ‘

43-  दंडी स्वामी विमलानंद ‘ सरस्वती ‘

44- राम बचन लाल श्रीवास्तव

 

 

 

 

 

अंक 15 में – ( भोजपुरी जंक्शन – अंक 1 )

45- कुंज बिहारी  ‘ कुंजन ‘

46- प्रभुनाथ मिश्र

47- रामजियावन दास ‘ बावला ‘

48- सिपाही सिंह ‘ श्रीमंत ‘

49- डॉ. विवेकी  राय

50- भोला नाथ गहमरी

51- अविनाश चंद्र ‘ विद्यार्थी ’

52- प्रो. सतीश्वर सहाय वर्मा  ‘ सतीश ‘

53- डॉ. बसंत कुमार

54- अर्जुन सिंह ‘अशांत ‘

55- अनिरुद्ध

अंक 21 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 7 )

56- सन्त कुमार वर्मा

57- रमाकांत द्विवेदी ‘रमता

58- डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘ बेसुध ‘ उर्फ चतुरी चाचा

59-  पद्मश्री रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ उर्फ लोहा सिंह

60- प्राचार्य विश्वनाथ सिंह

61- पद्मभूषण विद्यानिवास मिश्र

62- डॉ. जितराम पाठक

 

 

अंक 22 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 8 )

63- रमेश चंद्र झा

64- गौरीशंकर मिश्र ‘ मुक्त ‘

65- प्राध्यापक अचल

66- पं. नर्मदेश्वर चतुर्वेदी

67- शारदानंद प्रसाद :

68- उमाकांत वर्मा

69- अक्षयवर दीक्षित

70- पांडेय कपिल

अंक 31 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 17 )

71- रामजी सिंह ‘ मुखिया ‘

72- विन्ध्याचल प्रसाद श्रीवास्तव

73- डॉ. अनिल कुमार राय ‘ आंजनेय ‘

74- डॉ. धीरेन्द्र बहादुर ‘ चाँद ‘

75- डॉ. विश्वरंजन

76- नरेन्द्र रस्तोगी ‘ मशरक ‘

77- नरेन्द्र शास्त्री

 

 

अंक 32 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 18 )

78- डॉ. रसिक बिहारी ओझा ‘ निर्भीक ‘

79- परमेश्वर दूबे शाहाबादी

80- राधा मोहन चौबे ‘ अंजन ‘

81- गणेश दत्त ‘ किरण ‘

82- डॉ. प्रभुनाथ सिंह

83- गिरिजा शंकर राय  ‘ गिरिजेश ‘

84- चंद्रशेखर मिश्र

85- पशुपति नाथ सिंह

 

अंक 40 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक  )

86- रामजी पांडेय अकेला
87- कैलाश गौतम

88- कुबेरनाथ मिश्र ‘ विचित्र ‘

89- प्रो. ब्रजकिशोर

90- जगन्नाथ

91- हरि शंकर वर्मा

92- डॉ० बच्चन पाठक सलिल

93- जमादार भाई

 

अब आगे पढ़ीं —

 

 94- बालेश्वर राम यादव

बालेश्वर राम यादव के जनम उ. प्र. के बलिया जिला के जगदेवाँ गाँव में 05 दिसम्बर, 1937 ई. के भइल रहे आ निधन 17 सितम्बर,1917 ई. के रायरंगपुर, उड़िसा में हो गइल। इहाँ के पिताजी के नाम शिव बालक यादव आ माता के नाम तेतरी देवी रहे। परिवार गोपालक रहे आ उहे विरासत में बालेश्वर जी का मिलल रहे। मगर रुचि पढ़ाई में रहे। बालेश्वर राम जी के पिता जमशेदपुर में खटाल चलावत रहीं आ दूध के कारोबार करत रहीं। मैट्रिक पास कइला के बाद आगे के पढ़ाई खातिर बालेश्वर राम जी जमशेदपुर चल अइनी। जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज से बी. ए. कइनी आ रॉची विश्वविद्यालय, रॉची से हिंदी में एम. ए. कइलीं। उहाँ का बी. एड. भी कइलीं। काव्यलोक, जमशेदपुर नाम के संस्था उहाँ के मानद ‘ विद्यालंकार’ के उपाधि देले रहे। पढ़ाई-लिखाई के बाद जमशेदपुर के अंगरेजी इसकूलन में हिन्दी शिक्षक रूप में कार्य कइनी। राउर विवाह उड़िसा के रायरंगपुर के आस पास रामदुलारी जी से भइल। ओकरा बाद सरकार का रायरंगपुर के ब्वायज हाई इसकूल में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गइल, जहाँ से 1995 ई. में सेवा निवृत्त भइनी। जहाँ तक साहित्यिक रुचि के सवाल बा, ऊ हाई इसकूल में पढ़त खानी रामचरित मानस पढ़ला आ गाँव में दस बेर ओकर पाठ करके सुनवला से जागल। अपने के आवाज़ अतना सुरीला रहे कि लोग मोहा जात रहे। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना आ गठन के पाछे राउर एही सुकंठ गायकी के कमाल रहे। को-ऑपरेटिव कॉलेज के कैम्पस में 1955 ई. में डॉ. बच्चन पाठक सलिल सहित अउर संहतिया लोग के बीचे बालेश्वरराम जी के आवाज़ गूँजत रहे – ‘मोरे पिछुअरवा सिरिसिया के गछिया, झहर-झहर करे पात कि निंदियो ना आवे हो राम ‘। ई आवाज़ कॉलेज के भोजपुरिया अध्यापक डॉ. सत्यदेव ओझा आ मेजर चंद्रभूषण सिन्हा के कान में पड़ल आ भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना भइल, जवना के महासचिव डॉ सलिल बनावल गइलीं आ बालेश्वर राम जी सचिव। भोजपुरी हिंदी में लिखल पढ़ल जारी रहल। भोजपुरी में तीन गो किताब छपल  —  ‘ भोजपुर के रतन ‘ ( गीत संग्रह, 1957 ई.),       ‘गाँव के माटी ‘ ( उपन्यास , 1973 ई. ) आ ‘ कृष्ण चरित पीयूष ‘ ( महाकाव्य , 2011ई. )।  पत्नी रामदुलारी यादव के अनुरोध पर ‘महाभागवत पुराण ‘ के कथा के भोजपुरी भाषा मे दोहा – चौपाई – सोरठा में छंदबद्ध करत ‘ कृष्णचरित पीयूष ‘ महाकाव्य रचाइल। हिंदी में  ‘ मेरी लाली ‘ (1997 ई. ) आध्यात्मिक गीत संग्रह बा। दू गो हिंदी पत्रिका- ‘ पुष्पांजलि ‘ आ ‘ तरंग ‘ रायरंगपुर से संपादित करत रहलीं। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद आ ललित कला मंच ( रायरंगपुर ) से सम्बद्ध रहलीं। भोजपुरी समाज, बिष्टुपुर, जमशेदपुर; जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद ; गुरुमंच, विद्यालय परिवार, रायरंगपुर आ ललित कला मंच, रायरंगपुर अपने के सम्मानित कइलस।

 

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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min450

मनोज भावुक

भादो चल रहल बा, अबे कुछ दिन पहिले सावन बीतल ह। ई दुनु महीना सबसे ढेर बरखा खातिर जानल जाला। ई महीना किसान के होठे मुस्की लिआवेला, त गोरी के अपना प्रेमी के इयाद में तड़पावेला। कहल जाला कि सावन में बड़ा त्योहार अउरी उत्सव होला त भादो आवते सब बंद हो जाला। भादो के लेके कई गो लोकोक्ति भी बा। जइसे भादो में काम धंधा चौपट हो जाला। कुछ लोग कहेला कि ‘का हो, एहि आँखि भादो खेपबs! कहे के माने कि भादो के भीषण बरखा खाली बूंदे ना विपत्ति के ओला भी ले आवेला। एगो इहो मुहावरा फेमस बा कि सावन में जनमलs आ भादो में बाढ़ आइल आ कादो अइसन बाढ़े ना देखनी। खैर…

ई सावन-भादो से सिनेमा उद्योग हमेशा मलाइये चांपेला। गाना बा, ‘मेरे नैना सावन भादो, फिर भी मेरा मन प्यासा’। बाकिर सिनेमा आ संगीत के मन एही मौसम में त प्यास बुझावेला।

सिनेमा में बारिश के ऊपर बहुते फिलिम बनल बा। कई गो फ़िल्मन के नामे बरखा के ऊपर रखाइल बा। कई गो फ़िल्मन में बारिश के गीत ओकर मुख्य आकर्षण बा आ ओकर बॉक्स ऑफिस बिजनेस पर बड़ा प्रभाव छोड़ले बा। कुछ फ़िल्मन में बारिश के इर्द गिर्द ही कहानी भा पटकथा बुनल बा। कई गो में बारिश के दृश्य क्लाइमेक्स के सीन बनल बा। अक्सर फ़िल्मन के फाइट सीन में गंभीरता देखावे खातिर बारिश के प्रयोग कइल जाला। फिल्मकारन खातिर बारिश एगो अइसन डिवाइस बा कि जब फ़िल्म के कवनो दृश्य में वीभत्सता लिआवे के होला, शोक लिआवे के होला त बारिश के इस्तेमाल कइल जाला। रउआ अक्सर देखले होखब, फ़िल्म के कवनो विशेष किरदार के मृत्यु भइल त बरखा होखे लागी, अगर कवनो किरदार बहुत उदास बा, टूट गइल बा त बरखा होखे लागी। इहाँ तक कि हॉलीवुड में भी मुख्य किरदारन के मरला पर जब लोग ओकनी के अंतिम क्रिया कइल जाला त बरखा के माहौल सेट रहेला ताकि सीन में इंटेंसिटी आवे। आ ई सच बा कि बरखा दृश्य में गहनता लिआवेला। रउआ सभे एह बात के मानब कि जवन बरखा कवनो कवनो दृश्य में खुशी अउरी उन्माद के कारण बनेला, हीरो-हिरोइन के बीच प्यार के बिया पोंगावेला; उहे बरखा कबो मातम के गवाह बनेला त कबो क्रूरता अउरी हिंसा के समर्थक बनेला।

इहे बा बरखा के अनेक रूप, जवना के फ़िल्मकार लोग बढ़िया से बूझेला अउरी परिस्थिति के हिसाब से प्रयोग करेला। चलीं कुछ फ़िल्मन के मिसाल ले लिहल जाव जहाँ बरखा के दृश्य फ़िल्म के कहानी के विकास खातिर बड़ घटक बनल। 1959 के फ़िल्म ‘कागज के फूल’ देखले होखब। फ़िल्म में निर्देशक के भूमिका निभा रहल गुरुदत्त जब एगो बेसहारा सुंदर युवती शांति से मिलsतारें त बरखे बरसत बा। दिल्ली के उ रात के बरखा में बेचारी एगो युवती के बरखा में भीजत देख गुरुदत्त आपन कोट दे देतारें। उनके किरदार टैलेंट स्काउटिंग खातिर आइल रहत बा जवन अपना फिलिम के हीरोइन खोज रहल बा। बाद में उ युवती जब बम्बई जा तिया त उनके कोट लौटावत बिया आ एही क्रम में अइसन घटना होत बा कि गुरुदत्त के शांति में आपन फ़िल्म के हीरोइन लउक जात बिया। असहीं फ़िल्म ‘थ्री इडियट्स’ में बारिश के दू जगह बखूबी प्रयोग भइल बा। पहिला जब एगो मेधावी इंजीनियरिंग छात्र जॉय लोबो पढ़ाई आ प्रिंसिपल के प्रेशर में आत्महत्या कर लेता तब ओकरा अंतिम क्रिया के टाइम बरखा के इस्तेमाल बा। दुसरका जब फ़िल्म के क्लाइमेक्स बा। अति-स्वाभिमानी प्रिंसिपल के बड़ बेटी के जब डिलीवरी के टाइम आवsता अउरी भीषण बरखा के चलते चारु ओर पानी भर जाता, कवनो उपाय नइखे रहत कि ओके हॉस्पिटल ले जाइल जाव तब हीरो रैंचो ओही बरखा के त्रासदी के बीच डिलीवरी करवावत बा। ई दृश्य एक तरह से फ़िल्म के क्लाइमेक्स ही बा। एकरा बादे सब कुछ बदल जाता।

फ़िल्म ‘तुम मिले’ इमरान हाशमी अउरी सोहा अली खान के फ़िल्म ह जवन मुम्बई में 2005 में आइल भयंकर बाढ़ के आस-पास सेट बा। फ़िल्म में हीरो हीरोइन पहिले से एक दूसरा के साथे रहि चुकल बाड़ें। फेर अचानक 6 साल बाद मुम्बई में भारी बरखा के चलते भीषण बाढ़ में फँसल एक दूसरा से मिलत बाड़ें। पूरा फ़िल्म एही बाढ़ से जीवटता के लड़ाई पर बा। ई फ़िल्म भी बड़ा देखल गइल। बारिश के बैकड्रॉप में ताल फ़िल्म सेट बा। पूरा फ़िल्म में जेतना भी दृश्य पहाड़ के बा, उहाँ बरखा के बहुते देखावल गइल बा। एकर कारण ई भी बा कि ओहसे पहाड़न के खूबसूरती बढ़ जाता। ‘ताल से ताल मिला’ गाना के के भुला सकेला। लगान फ़िल्म के ‘बरसो रे मेघा-मेघा’ किसानन के उ दर्द बयां कइले बा कि कइसे सूखा के बेरा किसान हरदम आसमान के ओर आंख टिकवले रहेला।

 

राज कपूर साहब के त 1949 में बरसात नाम के फ़िल्म आइल, जवन बहुत हिट रहल। फ़िल्म श्री 420 में राज साहब बरखा में ही ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ गवलें। फ़िल्म छलिया (1960) के गाना ‘डम डम डिगा डिगा’ त राज साहब के हिट गीतन में बटले बा, आजुओ लोग के जुबान पर बा। हालांकि बरसात नाम से दु गो फिलिम अउरी आइल। साल 1995 में बॉबी देओल, ट्विंकल खन्ना के आ फेर साल 2005 में बॉबी देओल, विपाशा बसु अउरी प्रियंका चोपड़ा के।

‘टिप-टिप बरसा पानी’ गाना में बरसत पानी अउरी पियर साड़ी में नाचत रवीना आ करिया कोट में नाचत अक्षय सभकरा इयाद होइयें। ई गाना त बूझी जे सिनेमा में बरखा के पर्याय बन गइल बा।


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min460

 

अतुल कुमार राय

बात पिछला साल के ह। पश्चिम टोला के शशांकवा के बियाह मार्च में तय भइल। तब तक ना जाने कहाँ से ई माटीलगना कोरोना आ गइल। पंडित जी लइका-लइकी के बाप से कहनी कि जजमान,ढेर मत सोचीं। लइका-लइकी के देह से जून में एगो साइत बनत बा,कहीं त रख दी ?

लइका के बाबूजी कहनी कि ए समधी जी जवन डेट बा,तवन बटले बा।रउरा ढेर मत सोची… बियाह तय करीं..ले आवs हो कागज पर हल्दी छूआवs”

लेकिन ई का ?….लइका कइलस बवाल!

जून के गर्मी सोच के ओकर मिज़ाज उखड़ गइल। कहलस कि ना बाबूजी,जून में त एकदम बियाह ना होई। हम तनी और बरदाश के दवाई खा लेब लेकिन बियाह हमार जाड़ा में होई।

उ का बात बा कि जाड़ा में काफी आराम रहेला…!

बाऊजी कहलन, ” रे बउचट तू जवन मेहरी के मुँह देख के आराम सोचत बाड़े,तवन सोच-सोच के हमार चानी के सगरो बार पाक गइल। बियाह के एक-डेढ़ साल बाद जाड़ा-गर्मी और बरसात सब एक्के लेखा लागेला रे बबुआ। बात मान जो, अपना मन के बेसी होशियार ना बनल जाला…”

लइका कहलस कि ना बाबूजी मेहरारु के बड़ा मन बा गोवा में हनीमून मनावे के। जाड़ा में ही सही रही।

खैर,लइका-लइकी के बाबूजी मान गइल लो।

नवम्बर 2020 में शादी के दिन रखा गइल।

तबसे लइका अँकवारी में तकिया लेके उंगली पर महीना गिनत सुते लागल…!रात-रात भर सगरी दू जीबी डाटा वीडियो कॉल में जियान होखे लागल।

एने नवंबर कहे कि हम अइबे ना करब। लइका कहे कि ए करेजा अब सगरी फीलिंग फफाता ! मंदिर पर जवन भजन सुनतानी, उहो डीजे लेखा लागत बा। चार किलोमीटर दूर कहीं बैंड बाजा बाजता त अइसन बुझाता कि हमरा बियाहे में बाजता।

लइकी बैंगलोर में नौकरी करत रहे..धीरे से कहलस कि प्लीज स्टॉप..लेट्स टॉक सम स्प्रिचुअल थिंग्स..अदरवाइज आई नॉट विल एबल टू स्लीप!

लइका मेहरारु के बात मान लिहलस और एगो आध्यात्मिक प्रश्न पूछलस, “ए करेजा हमरा ख़ातिर तू करवा चौथ के बरत रहबू, हम तहरा ख़ातिर का भूखब हो ?”

मेहरारु कहलस कि कुछ नहीं टाइम से बर्तन धो देना वही मेरे लिये सबसे बड़ा व्रत है।”

खैर, इहे कुल बतियावत सितंबर आ गइल। अब लइका के दू जीबी डाटा रात के बदले दुपहरिया में ख़तम होखे लागल…!

अक्टूबर बीतल और नवम्बर आइल त भइल दुर्घटना।

पता चलल कि होखे वाली मेहरारु के बड़का बाबा के देहान्त हो गइल.. अब का होइ हो शशांक, तब बियाह ना होई…?

साइत बढ़िया नइखे.. अब मई 2021 में होई।

आही दादा!  मई सुनते लइका के ऑक्सीजन लेवल 70 से नीचें जाए लागल। मेहरारु से कहलस कि बतावs ना हो सगरी गोवा के ख़्वाब माटी में मिल गइल..अब का होई ? तहरो बाबा के हमार बियहवे के समय डेट मिलल ह..?

मेहरारु फेर समझदारी देखवलस, “जैसे छह महीने बर्दास्त किया…छह महीने और सही.. खूबसूरत चीजें थोड़ी मेहनत के बाद मिलें तो और प्रसन्नता होती है, लेट्स एंज्वाय दिस टाइम! ”

आही हो दादा ! अब का एंज्वाय करीं हो…

मेहरारू के ई बात लइका के करेजा में पत्थर लेखा लागे लागल..

लेकिन अभी-अभी ताजा जानकारी तक!

पिछला 12 मई के लइका के बियाह रहल ह.. !

बियाह बड़ा बढ़िया से भइल बा.. लेकिन दुःख के बात बा कि बियाह बाद लइका पाजीटिव होके क्वारंटाइन हो गइल बा।

आगे के सगरी कार्यक्रम पर ब्रेक लागल बा। ककन भी नइखे छूटल!

अब लइका जल्दी से निगेटिव होखे ख़ातिर दिन भर में तेरह हाली काढ़ा पियत बा। आतना जोगासन कर देले बा कि रामदेव बाबा ओकरा आगे हाथ जोड़ देले बाड़े कि कहीं पतंजलि मुनि प्रगट ना हो जास !

ओने मेहरारु आजुओ वीडियो कॉल पर बतियाके दिलासा देतिया.. ” आएंगे अच्छे दिन, जरूर आएंगे…!

लेकिन लइका का करो ? घर में जस-जस पायल और चूड़ी के छन-छन आवाज सूनाता, तस-तस ओकरा करेजा के नस में छन-छन करत बा…!

चौदह दिन, चौदह बरिश के बनवास लेखा बीत रहल बा।

मेहरारु कहत बिया कि इससे तो अच्छा था कि मैं भी पाजीटिव हो जाती…

लइका के ना कुछ कहले कहाता, न रहले रहाता।

लेकिन लइका के बाउजी रोज खिड़की पर से पूछत बाड़े..!

“काहो इंजीनियर साहेब, कहत रहनी न कि बड़-जेठ के बात मानल जाला..अब ना जइबा गोवा..ना मनइबा हनीमून.. ?

लइका का करो… उदास बा.. और मने मन कहता.

जो रे कोरोना तोर माटी लागो.. !


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20216min520

डा. स्वर्ण लता

भोजपुरी बालगीत विविधता  से भरल बा बाकिर भोजपुरी साहित्य के इतिहास में एह विषय पर चरचा खोजलो पर ना मिलेला। लोक साहित्य में बालगीत एकल गीत आ समूह गीत दुनो रूप में मिलेला। मुख्य रूप से बालगीत मनोरंजन के साधन हऽ। भोजपुरी बालगीत में खेल खेलवना, खेलवनिया पर गीत प्रचुर मात्रा में पावल जाला। चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह भोजपुरी बाल गीतन के आठ भाग में बॅटले बानी ओकरा में खेलावे के गीत-खेलवना एगो प्रमुख भाग बा। खेल गीत खेलत खा बालक/बालिका/ किशोर/ किशोरी के द्वारा गावल जाला बाकिर खेलवना फुसलवना, अझुरवना गीत परिवार के बड़-बुजूर्ग सदस्य आ नजदीकी रिश्तेदार द्वारा गावल जाला। खेल गीत बालक बालिका, किशोरी/किशोर, के होला तब खेलवना, फुसलवाना, बझवना, अझुरवना गीत बालक, बालिका, किशोर, किशोरी खातिर होला। मतलब कि बालक के पारिवारिक बड़-बुजूर्ग आ रिश्तेदार द्वारा जवना गीतियन के सस्वर लय-ताल मे, कोमल से कोमल आ सुमघुर आवाज में गावल जाला ओही पारंपरिक गीतियन के खोज के, अध्ययन करि के एहिजा राखल गइल बा। पारंपरिक बाल गीत प्राकृतिक नदी के धारा अस होले जवन कवनो घेरा के ना माने आ एक कियारी से दोसर तीसर कियारी में, एक ताल तलइया से दोसर-तीसर ताल तिलइया में मांकत रहेले स। एह गीतियन के गावत, खेलावत, फुसुलावत, अझुरावत, बझावत बडो़-बुजूर्ग के व्यायाम हो जाला। एह भाग के गीतियन के सुने खातिर लइका-लइकी बड़ बुजूर्ग के घेरले रहेलन सं। एह से बूढ़ो-बूढी के मनसायन रहेला, घर में शांति रहेला। पढ़े आ सीखे खातिर बइठे के आदत लइकन/लइकिन में  स्वाभाविक रूप से पनपेला। बड़-बुजूर्ग के छोट-मोट टहल-टिकोरो हो जाला। बड़-बुजूर्ग के आ रिश्तेदार के अनुभव/ज्ञान के लाभ अगिला पीढी में स्थानातंरित होत रहेला। एह गीतियन से जवन अनुभव/सीख मिलेला उ भावी जिनगी में  काम के साबित होला। बालक/बालिका के ज्ञान क्षितिज के विस्तार बिना अतिरिक्त मेहनत, समय के स्वाभविक रूप  से हो जाला। जवन भावी जिंदगी के सफर में आइल समस्यन के हल करे  में मददगार साबित होला। ओह में से कुछ बाल गीतन के नीचे देल जा रहल बा।

  1. अंतर मंतर घोघा साड़ी।

कोठी तर पितिआइन बाड़ी।।

से दुख देले बाड़ी।

से दुख लेले जास।। 

एह गीत के चोट लगला पर रोवत लइका चुप करावे खातिर गावल जाला। भोजपुरी क्षेत्र में लोग भूत-प्रेत डायन ओझा पर विश्वास करेलन। हालाकि ई आदमी युगीन लोक आस्था ह बाकिर एह वैज्ञानिक उपलब्धियनो के युग में नेस्त-नाबुत नइखे भइल। कहल जाला कि गोतिया आ दाल गलावे कि चीज ह। पितिआइन सामने से ना छिप के वार कइले बाड़ी। उन्हुंकरे मंतर मरला से चोट लागल बा। जे दोसरा के राह में कांटा बोवेला ओकरो राह कंटकित हो जाला। ए बाबू तू चूप हो जा। रोवला से कुछ ना होई। तू देख लिहs तहार पितिआइन खुद एक दिन चोटिल हो जइहें। छू  कहत मतारी चोटिल जगह पर मुंह से फूंक मार देली। यानि विश्वास धरावेला कि ऊ डायन हई तऽ हमहूं ओझाई के मंतर जानिला। झार देनी, उन्हूंकर मंतर खा गइनी।

बहुत महीनी से बालमन में सीख भरल गइल बा कि दोसरा के बेमतलब ना तंग करे के चाहीं ना तऽ दुख देबहूँ वाला के एक ना एक दिन दुखित होखे के पड़ेला। दुख में विचलित ना होखे के चाहीं। महात्मा बुद्व कहले बाड़न कि संसार में दुख बा तऽ दुख दूरो करे के साधन बा। दुख देवेवाला बा तऽ दुख दूरो करे वाला बा।

  1. अरर बरर के पतवा,

बिलइया चाटे पतवा,

चाटत चाटत बिलइया,

गइल पिछुअरिया

कुकुरा धरलेलस,

भर अंकवरिया,

छोड़ छोड़ कुकुरा

अब ना आइब

तोरा पिछुअरिया।।

एह गीत में एगो बिलाई बिया जवन दोसरा के हकमारी कर के ओकर खाद्य पदार्थ लेके राजा के पिछुआरी में भाग के जाके खाए लागल। ऊ समझत रहे कि राजा के पिछुआरी में केहू ना आई। बाकिर पिछुआरी में खटका भइला पर राजा अपना कुकुर के लिलकार देलन आ ऊ धरि के बिलार राम के भभोरे लागल। बिलाई कान धरि के उठ बइठ करे लगली कि माफ कर दऽ अब से हम इहंवा कबो ना आइब।

एह गीत में सीख भरल बा कि केहू गलत काम कतनो सुरक्षित जगह पर छिप के करी ऊ सजाय से बांच ना सके। आदमी सामाजिक प्राणी हऽ ओकरा दोसरा के हक ना हथवसे के चाहीं। समरस समाज के निर्माण बदे आगे चलके बालक/ बालिका काम करे, इहे कामना गीतकार के मन में होई-गीत के रचना करत खा।

  1. आगे मइया कलावती।

सिर पर देबो पउती।

गंगा पार बियाह देबो।

आवे के ना जाए के।

टुसुर टुसुर रोव के।।

कवनो रोवत लइकी के समझावल गइल बा एह गीत में कि चोट लागल बा तऽ ठीक हो जाई। साथ साथ धमकावल जात बा कि चुप हो जा ना तऽ रोवले चाहत बाडू तब दूर देश में माथा पर थोड़ा सा सामान देके बियाह करिके भेज देब जहंवा से आ ना सकबू आ जिंदगी भर बइठ के रोवत रहबू। बालमन में सीख भरल गइल बा एह गीत में कि रोवत रहे से समस्या के हल ना होई आ समय बर्बाद होई यानि समय बेसकीमती होला ओकरा के बर्बाद ना करे के चाहीं।

  1. आव रे खेदन चिरइया

    गुलगुल अंडा पार

तोहरा अंडा मे आग लागो

  बाबू के खेलाव।।

  1. आव रे गइया अगरी,

दूधवा दे भर गगरी,

बबुआ पीही भर गगरी।।

दूध पिआवत खा लइका / लइकी छेरिआ जालिस। दूध पीअल ना चाहेलीस तब उपरांकित गीत गा गा के गीत में फुसला-फुसला के लइका / लइकी के दूध पियावल जाला। दूध पिआवे वाला जानत बा कि पीआवत खा जोर जबरदस्ती ना करे के चाहीं नाही तऽ पाचन क्रिया गड़बड़ा जाई। एही से अपना गीत में अझुरा के दूध पिआवे ला। बालक / बालिका के सुंदर शरीर के कामना मतारी-बाप के, भाई-बहिन के मन में रहेला।

  1. आहा जी आहा, दू गोड़ दू बांहा,

पीठ पर पोंछ नाचे, ई तमासा कहां ?

छोट लइका / लइकी के खेलवनिया दूनो हाथ से उछाल उछाल लोकि-लोकि के गावेला। ऊ चाहेला कि अइसन बेला में बालक / बालिका के मन बाझ के बहल जाय। बालक/बालिका के हंसला पर खेलवनिया के आनंद के शब्दन मे व्यक्त ना कइल जा सके। ऊ हनुमान अस बलिष्ट शरीर के ध्यान दिला के ओकरा के शक्तिमान बनावे के कामना करेला।

  1. ए बबुआ। तू कथी के?

खने सोना, खने रूपा के ।

बाबू चउवा चनन के,

पितिया पीताम्बर के,

मातारी हऽ लवंग के,

लोग बिराना माटी के ?

………………………?

  1.  ए बाबू तोहार बाबा कइसन?

कुर्सी ऊपर राजा अइसन।

ए बाबू तोर इया कइसन

मचिया बइठन रानी अइसन।

ए बाबू तोहार बाबू कइसन ?

कुर्सी बइठल कलक्टर जइसन।

ए बाबू तोर फुआ कइसन।

बेग लटकवले मेम जइसन। 

ए बाबू तोर माई कइसन?

घर घर घूमत बिलाई जइसन।

इहे गीत जब माई आ चाची गावेली तब फुआ के जगह पर  चाची  आ माई के जगहो पर फुआ गावेली। छने छने छेरिआत लइका के कांहा पर पार के फुआ खेलावेली आ गा गा के बझावे के प्रयास करेली। एह गीत मे कुल खानदान के मान मर्यादा  के ओर ध्यान लगावल जाला। एकरा प्रति हमेशा चौकस चेतना बालमन, अचेतन, में भरल जाला। बाबा घर के सर्वोच्च स्थान पर होले। जीवनानुभव से पाकल। सर्वशक्तिमान घर-परिवार के मालिक एही से उन्हूंका के राजा कहल गइल बा। अइसने राजा के पत्नी रानी बन के पूजन जाली। संपूर्ण व्यवस्था के कर्ता पिता परिवार में जिलाधीश के हैसियत वाला होला। जेकर भाई कलक्टर होई ओकर बहिन सान से अकड़ के मेम अस चलबे करी। बबुआ के फुआ माई के ननद भइली, ननद भउजाई में हंसी-मजाक बराबर से चलत आइल बा। इहां पर गीत में हास्य में पुट देल गइल बा। एही के तहत बबुआ के माई के घर घर घुमत बिलाई कहल गइल बा। एक तरह से गीत में बेमतलब ना घूमे के हिदायत दिहल गइल बा। जवन जीवन में सीख के अनमोल भीख दे रहल बा।

गीत सं 7 के देखल जाय। बबुआ के तनी भर ओठ बिजकावते मातारी के करेज करकरा के फाटे लागेला। ऊ कांही पर पार के गीत गावे लागेली। स्नेह के उतुंग चोटी पर पहुंच के देह गेह के सुधि हेरा जाला। मातारी बदे सबसे सुंदर बबुआ होले आ बबुआ खातिर मतारी। उत्तम रूपक पल पल पर बिटोरत-छिटांत रहेला। गीत में बाबू चउआ चनन के कही के निर्माता के प्रति अगाध स्नेह आ आदर के भाव उकेरल गइल बा। पितिया यानि चाचा के पीतांबर  कहल गइल बा। पीताम्बर भगवान विष्णु/ कषण के पहिरन हऽ। पावन चंदन चर्चित बेदी पर पीताम्बर धारण करिके बइठले पर दूनों के मान मर्यादा बढेला। बाप-चाचा में अभेद भाव राखे के, भाईचारा राखे के परोक्ष रूप से बतावल गइल बा। साथे साथे चेतावल गइल बा कि अपना बाप-पितिया अस मिल-जूल के रहब तबे जीवन में सफल होईब। एह से हमेश ख्याल रही कि तू का हवऽ।

  1. कांची कुची कउआ खाय।

घी के लोंदा बबुआ खाय।।

बबुआ/बबुनी के तेल लगा के आंख मुंह पोछत गीत के गा-गा के बझावल जाला। एह गीत में कहल गइल बा कि काम निकाले खातिर ठकुरसुहाती बोलल अनुचित ना हऽ। तेल लगावे वाला/वाली के बबुआ/बबुनी के गीत में अझुरा के स्थिर राखलो मकसद रहेला ताकि आंख-कान खोदाय मत।

  1. चमन अइसन चुमन अइसन।

महना जुआठ अइसन। 

तेलिया के झंवड़ा दुबरा। 

                       हमार बाबू कुमना।।

तेल लगावत खा ई गीत गा-गा के बाबू के स्थिर राखे के कामना राखल जाला।

  1. काहे तू रोवलिस बुची रे ?

पाएंट ला कि टोपी ला ?

  1. गलर गलर पुआ पाकेला।

चिलरा खोईछा नाचेला।।

जो रे चिलरा खेत खरिहान।

लेके अइहे कनकजीर धान ।।

ओही धान के चुरा कुटइबो। 

बाभन-बिसुन भोजन करइबो।।

बभना के पूत दिही असीस। 

जीय बबुआ लाख बरीस।।

13 घुघुआ घुघेली, आतम चउरा ढेरी।

पत्ता उडिआइल जाय, बिलइया खदेड़ले जाय। 

चल लइके दानापुर, दानापुर में का बा ?

लाल लाल सिपहिया बा, दूनो कान कटावल बा,

  परती में बेलावल बा। परती में सुगवा,

बिनेला खटोलवा, ओह पर सूते मामा-मामी,

बीच में बालकवा।

ए……….बहू हंडिया-पतुकी सहरले रहिहऽ

  बबुआ जात बा भड़ाक

मामा के छंवड़ा रोवत बा। 

केरा दूगो जोहत बा।

रोवे दे खकचोदा के 

नाचे दे पंवरिया के,

देखे दे महाजन के। 

  1. घुघुआ माना, उपजे धाना।।

बाबू के छेदा दे नाक दूनो काना।।

भा

घुघुआ माना, उपजे धाना,

अइहें बचिया के मामा

छेदा दिहें काना

पेन्हा दिहें बाला

नया भीत गिरेले, पुराना भीत उठेले,

सम्हरिहे बुढिया, छिपा लोटा।

भा

घुघुआ माना उपजे धाना,

धनि धनि अइले बबुआ के मामा,

 बबुआ के नाक कान-कान दूनो छेदवले,

सोनरा के देले भर सूप धाना

सोनरा के पूतवा देला असीस

बबुआ जीए लाख बरीस। 

   अथवा

घुघुआ माना मनेर से, अरवा चावल डेढ सेर

बबुआ खाई दूध भतवा, बिलइया चाटी पतवा

पत्ता उडिया गइल, बिलाइया लजा गइल।।

बालक/बालिका के हाथ-पांव तनिक दीढ़ हो जाला। ऊ बइठे लागेला।

ओकर गर्दन-मुंडी दीढ़ हो जाले तब खेलवनिया चीताने सूत के अपना दूनो गोड़वन के पेट-छाती पर मोड़ के ओकरे पर बालक के बइठा के ओकर दूनो हाथ अपना हथवन से धरि के उपरांकित घुघुआ-गीतियन के गा के खेलावेला।

राम आ कृष्णा के माई अपना शाही सामर्थ के बल पर अपना पूत के सोना के पलना पर झुलावत होइहें बाकिर भोजपुरिया खेलवनिया के पांवे पलना बनि गइल बा। एही पांव पलना पर जीवन के शास्वत संगीत गा के अपना पूत के मन-प्राण में जीवन के सार तत्व बइठावत बाड़ी। एह गीत में ई बतावल गइल बा कि आदमी के विवेक हर दम जागल रहे के चाहीं। उड़िआत पतई के पाछा-पाछा धावल आ दोसरा के जूठ पतल चाटल नीच कर्म हऽ। जातो जाला आ  भातो ना भेंटाय। नया भीत गिरेले, पुराना भीत उठेले में महात्मा कबीर के उल्टवांसी के शिल्प शैली में जीवन के अनिवार्य परिवर्तन के बात बतलावल गइल बा यानि परिवर्तन प्रकृति के शास्वत नियम हऽ जवना के देख के घबड़ाए के ना चाहीं। नया-पुरान आ पुरान-नया होत रहेला। एकरा के रोकल संभव नइखे। आदमी के अमर करे के प्रयास युग-युग से होत आ रहल बा आजो हो रहल बा। अविष्कार सतत चलत रहेवाली प्रक्रिया हऽ, चलत रही एहू में दू राय नइखे। आदमी अमरत्व प्राप्त करे लागी तब जल-जमीन-हवा के समस्या कइसे हल होई? एकर कल्पनो अबहीं ना कइल जा सके। सुख दुख में समभाव से रहल ज्ञानी आदमी के काम हऽ।

एह गीत में अंग्रजी राज के गंध बा। कहल जात बा कि दानापुर चलल जाय तब सवाल उठत बा कि उहंवा जाके का मिली? जवाब जन्मत बा कि उहां चल के सैनिक बनल जाई। देस में कवनो राजा महराजा रह नइखन गइल। भर्ती हो रहल बा। उहंवा भर्ती हो गइला पर सभ दुख दलिदर भाग जाई। बाकिर सुनेवाला, प्रतिरोध करत कहत बा कि ना ना। ई अनुचित होई। जे लोक भर्ती होके अंग्रजी सेवा में बा। ऊ धर्म के विरोध काम कइला के चलते समाज से बहिस्कृत कर दीहल गइल बा। स्वधर्में मरन…….के याद करावल गइल बा-एह गीत में। बहाल लोग के ना धर्म रह गइल बा ना जात। ऊ लोग जात धर्म के बंधन से अलग बा।

धान के पइआ फेंके लाएक होला बाकिर आदमी के पइया फेंकल ना जाय। रचल खटोला पर मामा मामी के बीच बालक बिहंस सकेला।   खकचोदा  में एगो व्यंग भरल बा। द्वेश के भाव के दखल अंदाज नइखे। घर में जब बालक के रोवाई सुनाई, ऊ बिहंसी तब पांव नचबे करी। महाजन दीदा भर के निहार लेस कि पूत पवला के खुशी धनी गरीब के घर में एक समान होला। आपन पूत सभका प्यारा होला। पूत के जवान होखते दुख भाग जाई। सुख-दुख में समभाव राखे के, जीवन समर में हरवे हथियार के हरदम चौकस रहे के, निर्माण के जुझारू उत्साह राखे के चटक रंग भरल बा-एह गीत में। हार के हार मान के जीवन जंग से पराइल कायर के काम हऽ।

  1. चंदा मामा। आरे आव, बारे आव,

नदिया किनारे आव

सोना के कटोरवा में

दूध-भात ले ले आव

बबुआ के मुहंवा में घूट।।

खाना, खाए में कवनो बालक नाकुर-नुकुर करे लागेला, मुँह के पास कवर ले गइला पर रोए लागेला, मुंह हटा-हटा लेला तब खिआवे वाला आदमी लइका के घर के बाहर भा छत पर ले जाके चंदा के देखा-देखा के उपरांकित गीत गा गा के कवरे कवर खाना खिआ देला। ए गीत में नजदीकी रिश्तेदार के संपन्न के बखान आ बालक के सुख-चैन के कामना भरल बा। खात खा मन चंचल ना रहे के चाहीं। शांति के साथ खाना खइले पर नीक से देहे लागेला, ई खिआवे वाला के मन में बा। एही से ऊ बहला, फुसला, खेला-खेला के खाना खिला रहल बा कवनो तरह के जोर जबरदस्ती नइखे करत। एह में सुख समृद्वि के कामना भरल बा।

  1. चुप्प रहs चुप्प रहs बालबचना

बाप-माई गलहू चिचोर कोड़ना

सांझी खानी देख लीहs भर अंगना

उहंवा से ले अइहें भर ढ़कना

मोटरी पटक दिहें भर अंगना

दूधवा पिआ दिहें तीन ढ़कना।।

  1. ते तइया, ते तइया, बाबू तइया,

तेल के घटाई चढ़ो, बाबू के मोटाई,

बाबू कोतल सन, बाबू कोतल सन,

धोबिया के पाठ सन, तेली के जुआठ सन,

गंगा जी के सेवार सन,

काचर-कुचर कउआ खाई, घी के लडु बबुआ खाई,

दिनो दिन होखस बीस, बबुआ जीअस लाख बरीस।

मतारी-बहिन, चाची, मामी भा फुआ दादी के मुंह से बहला के तेल लगावत खा ई वात्सल्य के गीत गावल जाला। एह गीत में लइका के सोगहग विकास के कामना कइल गइल बा। बालमन के प्रौढ़ प्रौढ़ चीज से परिचित करावे के प्रयास कइल गइल बा। अइसने बने के सीख देल गइल बा।

  1. तोर मइया ना डोलावे

तेर बाप ना डालावे

तेाके हमहीं डोलाई

एह गीत में मइया बाप के जगह पर मउसी, मउसा, आजी-बाबा, चाचा चाची फुआ-फुफा लगा के गावल जाला। आकास में उड़त चिरई आ झुला झुलत किशोरियन के देख के झूले खातिर लइका जिद करेला। बाप मतारी कवनो कारण बस लइका के मांग पूरा ना कर पावे तब दोसर केहू नजदीकी रिश्तेदार एक हाथ लइका के दूनो गोड़ आ एक हाथ से ओकर दूनो बांह धरि के झुलावत आ गावत रहेला। एह गीत के द्वारा हमरा समुझ से लइका के अवचेतन में ई भाव भरल गइल बा कि अपना नजदीकी से नजदीकी आदमी के मददगार ना बनलो पर समाज के केहू ना केहू आगे आके मदद कर सकेला एह से खाली अपना नजदीकी रिश्तेदार के अलावे दोसरो केहू के गैर ना समझे के चाहीं।

  1. बबुआ के मइया अउरी, भर हाड़ी रिंहेली जउरी,

अपने खाली कठवतिया में बबुआ के देली उलदिया मे।।

तेही खातिर बाबू हमार रूसेलन 

उलदी कठउती के दूसेलन,

रूसल रूसल बाबू ममहर जाय,

उहंवा से अनले कनकजीर धान,

ओही धान के चुड़ा कुटाईब,

कमकजीर के चुड़ा सोरहिया-दूध,

खालऽ बबुआ जइब बड़ी दूर।।

  1. बबुआ के मामा अइले, घोड़ा पर कि हाथी पर?

कुकर  भुकत आवेला, बानर नाचत आवेला। 

चीलर काटत आवेला, सुअर देखत आवेला। 

बइठ मामा चैकी पर, अडरे मडेर के झोपड़ी

कउआ रे कहंरिया, मइनी के बजनिया 

छोटकी के तेल देनी, बड़की के आग

उठ रे जटिनिया, बेटी भइली तमासा

मामा कउआ नीचे दाढी

अब ना मामा जीही, गुड़ गुड़ हुक्का पीही। 

बबुआ के मामा आवेले 

घोड़ा पर कि हाथी पर ?

कुकुर भूंकत आवेला

बानर नोचत आवेला

चीलर काटत आवेला

सुअर देखत आवेला। 

लइकन के अपना मामा से बहुत प्रेम होला। बबुआ के मामा से बबुआ के बाप पितिया के मजाक के रिश्ता होला। एही से मामा के नांव पर उपरांकित गीतियन में हास्य व्यंग भरल गइल बा।

20 सुगवा धनवा खात बा

मार बेटी भक्षनी, गोड़ में देवो पैजनी,

खाए के देबो भोजनी

गंगा पर बिआह देब

आवे के ना जाए के 

टुसुर टुसुर रोवे के ।।

21 हाल हाल बबुआ, कुरूई में ढेबुआ

बाप दरबरूआ, मातारी अकसरूआ,

माई तोहार गइली चिचोर खनना,

सांझी खानी अइहे तऽ भर अंगना।

आदमी देखो भा आपन आंख मुंदी लेवो बाकिर वातावरण के प्रभाव से ऊ बाच ना सके। हवा-पानी हमेशा आपन प्रभाव सीधे भा घुमा के डालत रहेला। घर में द्वेष पैदा करिके सोना के कटोरा केहू ले भागल। भोजन करे-करावे बदे बाच गइल काठ के उलदी। आदमी के खून में बइठल सोना के कटोरा के संस्कार अबहीं भुलाइल नइखे। लइका के रूसले एक मात्र अस्त्र होला, जवना के प्रयोग बालगीतन में जगहे-जगह पावल जाला। चहबचा के जगह पइसा जोगा के राखे बदे माटी के कुरूई बांच गइल बा। गरदन में गुलामी के फंदा डालके दरबार कइला के बादो पेट नइखे भरत। घर-आंगन में बालक के अकसरूआ छोड़ि के भंवरा-भंवरा धाके मतारी के सामने चिचोर खने के मजबूरी सर पर सवार बा। घर के तंगेहाली से लइका ममहर जाके नीमन खाए लाएक धान ले आवत बा। एह बात में सहयोग के स्नेहिल भावना के पावल जाता। साथे-साथ भोजपुरिया संस्कृति के सुगंध भरल बा कि विवाहोपरांतो भाई अपना बहिन के भुला-त्यागि ना देवेला आ मौका पर मदद करे में आना-कानी ना करे। धरती पर उपलब्ध जानवरन में सनातनी आदमी खातिर गाय सबसे पावन-पवित्र जानवर होले। ओकरो में सोरही। जवना के पोंछ के बाल के चंवर बनेला। गाइ के स्थान उंच पीढा पावेला। बाकिर ई प्रजाती दूर हिमालय क्षेत्र में पावल जाले, भोजपुरी क्षेत्र में ना। इहां सोरही के अर्थ सोरह नीमन गुण लक्षण वाणी  समझल जाए के चाहीं। चुड़ा-दूध खा के यानि सहयोग पा के, मंजिल के दूरी बता के जीवन या़त्रा के प्रति प्रोत्साहन देल गइल बा। मिथिला क्षेत्र के गीत रहित तब चूड़ा-दूध के बदला मे चूड़ा-दही रहित। ई गीत मोतिहारी (बेतिया) तरफ के हऽ ना तऽ चुड़ा-दूध के बदला दूध-भात गावल जाइत। ऊ इलाका मीथिला से सटल क्षेत्र हऽ ऐ्ही से भात ना चूड़ा रखल गइल बा। बालपन में लइकन में कल्पना के बहुलता रहेला। धीरे धीरे वास्तविकता से परिचित करावेले सुझाव मनौवैज्ञानिक सच्चाई द्वारा उपरांकित दूनो गीतियन में मनो वैज्ञानिक भाव के उतारल गइल बा। मनौवैज्ञानिक कसउटी पर कसाला पर दूनो गीत खरा बाड़ीस।

पारंपरिक बाल गीत बालक बालिका में संस्कार के जड़ रोपे में त मददगार होखबे करेला साथ ही बचपन में अभाव का होला ई ना जाने देवे। ऊपर वर्णित गीतन से स्पष्ट बा कि गीतन के रचना बाल मनोविज्ञान के आधार पर कइल गइल रहे जे आजो प्रासंगिक बा।


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20215min380

[ 18 अक्टूबर, 2008 के नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया का ओर से भोजपुरी भाषा और साहित्यविषय पर विहार माध्यमिक शिक्षक संघ, पटना के सभागार में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में पठित आलेख।  –  संपादक ]

पत्र-पत्रिकन में भोजपुरी के प्रवेश के स्थिति तब बनल, जब कि भारतेन्दु मंडली के कुछ भोजपुरी भाषी साहित्यकार भोजपुरी में रचना करे लगले। रामकृष्ण वर्मा ‘बलवीर’, तेगअली ‘तेग’, खड्ग बहादुर मल्ल आ फेर, आगे चलके, दूधनाथ उपाध्याय, रघुवीर नारायण जइसन कवियन के भोजपुरी रचनन के प्रकाशन से लोगन के ध्यान भोजपुरी साहित्य का ओर आकृष्ट भइल। सन् 1886 के आसपास काशी से प्रकाशित पत्रिका ‘गोरस’ में राधाकृष्ण सहाय के भोजपुरी नाटक ‘दाढ़ के दरद’ प्रकाशित भइल। सितम्बर 1814 में महावीर प्रसाद द्विवेदी ‘सरस्वती’ जइसन हिन्दी के प्रतिष्ठित पत्रिका में ‘अछूत की शिकायत’ शीर्षक से हीरा डोम के भोजपुरी कविता प्रकाशित कइले। हिन्दी के पत्रिकन में जब-तब भोजपुरी के रचना प्रकाशित करेके सिलसिला तबे से चलत आइल। आगे चलके कुछ द्विभाषिओ पत्रिका निकलली स, जवना में हिन्दी का साथे-साथे भोजपुरिओ के रचना प्रकाशित होत रहली स। आजो अइसन कुछ द्विभाषी पत्रिका प्रकाशित हो रहल बाड़ी स।

भोजपुरी में पत्रिका प्रकाशित करे के पहिलका प्रयास जयपरगास नारायण ‘बगसर समाचार’ नाम के पत्रिका से कइले। सरस्वती पुस्तकालय, बगसर से प्रकाशित ई पत्रिका पहिले कैथी अक्षर में छपल। दू अंकन के बाद ई भोजपुरी पत्रिका देवनागरी अक्षर में प्रकाशित होखे लागल। ई पत्रिका 1918 तक निकलला के बाद बन्द हो गइल।

भोजपुरी के पत्रिका निकाले के अगिला प्रयास आचार्य महेन्द्र शास्त्री द्विमासिक पत्रिका ‘भोजपुरी’ के सम्पादन करके कइले। भोजपुरी-कार्यालय कदमकुआँ, पटना से प्रकाशित एह पत्रिका में प्राय: हर विधा के रचनन के समावेश भइल रहे। बाकिर, सिर्फ एक अंक के प्रकाशन के बाद ई पत्रिका बंद हो गइल।

सन् 1949 में अवध बिहारी ‘सुमन’ के सम्पादन में ‘कृषक’ नाम के एगो साप्ताहिक पत्र भोजपुरी भाषा में प्रकाशित भइल! इहे अवध बिहारी ‘सुमन’ आगे चलके संन्यासी होके दण्डिस्वामी विमलानन्द सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध भइले, जे ‘बउधायन’ नाम के महाकाव्य भोजपुरी में लिखले। ‘कृषक’ असल में भोजपुरिया किसान-मजदर के पत्रिका रहे। एकर लोक-गीत विशेषांक एह पत्रिका के उल्लेखनीय उपलब्धि रहे। एक साल तक निकलला का बाद ई पत्रिका बन्द हो गइल।

कुछ बरिस के चुप्पी का बाद, सन् 1952 में आरा से ‘भोजपुरी’ नाम के मासिक पत्रिका के प्रकाशन शुरू भइल। एकर प्रवेशांक अगस्त, 1952 में निकलल। क्राउन आकार के चालीस पृष्ठ के एह पत्रिका के पूर्ण साहित्यिक पत्रिका होखे के गौरव मिलल। एकरा पहिलका पाँच अंकन के सम्पादन प्रो. विश्वनाथ सिंह कइले रहले, बाकिर एह पत्रिका के प्रबन्ध सम्पादक आ कर्ता-धर्ता रघुवंश नारायण सिंह से वर्तनी के बारे में कवनो बिन्दु पर विवाद हो गइला का वजह से प्रो. विश्वनाथ सिंह एकर सम्पादन छोड़ दिहले आ रघुवंशे नारायण सिंह एकर सम्पादक हो गइले। एक सौ पृष्ठ के एकर लोक साहित्य अंक बहुते पुष्ट विशेषांक रहे, जवना का चलते एह पत्रिका के साहित्यिक स्वीकृति मिले लागल। सन् 1958 तक ई नियमित प्रकाशित होत रहल। भोजपुरी साहित्य के विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान मानल जाई।

आठ बरिस तक नियमित प्रकाशन के बाद, आर्थिक कठिनाई का चलते एकरा प्रकाशन में गतिरोध होखे लागल, आ आखिरकार, ई बन्द हो गइल।

कुछ बरिस बाद, पटना से सन् 1963 से 1965 तक एकर फेर से प्रकाशन होत रहल, बाकिर आर्थिक कठिनाई से एकरा प्रकाशन में फिर रुकावट हो गइल।

फेर, रघुवंश नारायण सिंह, तिसरका झोंक में एकर प्रकाशन 1973 से 1974 तक कइले। बाकिर, आखिरकार, समुचित साधन का अभाव में एकर प्रकाशन बन्दे हो गइल। भोजपुरी साहित्य के विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान मानल जाई। ई भोजपुरी के अनेक अइसन लेखक पैदा कइलस, जेकरा योगदान से भोजपुरी भाषा के अनुपम साहित्यिक समृद्धि सुलभ भइल।

आरा से ‘गाँव-घर’ नाम के पाक्षिक पत्रिका के नियमित प्रकाशन भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव ‘भानु’ के सम्पादन में दू बरिस ले होत रहल। ओकरा बाद, ई पत्रिका अनियमित होखत-होखत, आखिरकार, बन्दे हो गइल|

सन् 1960 में पटना में ‘भोजपुरी परिवार’ नाम के संस्था बनल, जवना के आचार्य शिवपूजन सहाय के आशीर्वाद प्राप्त रहे। एही भोजपुरी परिवार’ के तत्वावधान में त्रैमासिक ‘अँजोर’ के प्रकाशन सन् 1960 से शुरू भइल। एकर सम्पादक रहले पाण्डेय नर्मदेश्वर सहाय आ सहायक सम्पादक रहले अविनाश चन्द्र विद्यार्थी। डिमाई आकार के चालीस पृष्ठ के ई पत्रिका 1969 ई. तक लगातार प्रकाशित होखत रहल, बाकिर एकर प्रधान सम्पादक आ ‘भोजपुरी परिवार’ के अध्यक्ष पाण्डेय नर्मदेश्वर सहाय के निधन के बाद एकर प्रकाशन बन्द हो गइल। भोजपुरी साहित्य के सर्वतोमुखी विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान मानल जाई।

आनन्द मार्ग के सामाजिक संगठन ‘प्रोग्रेसिव फेडरेशन ऑफ इंडिया’ 1964 में गाजीपुर से ‘भोजपुरी समाचार’ नाम के एगो समाचार साप्ताहिक के प्रकाशन शुरू कइलस, जेकर सम्पादक रहले जरदारी। ईहे पत्रिका आगे चलके ‘भोजपुरी वार्ता’ नाम से गोरखपुर से प्रकाशित होखे लागल, जेकर सम्पादक रहले आचार्य प्रतापादित्य। कुछ समय बाद, एकर प्रकाशन मोतिहारी से अर्ध-साप्ताहिक रूप में होखे लागल आ तब एकर सम्पादक भइले देवदत्त। बाद में, पटना से एकर प्रकाशन दैनिक पत्र का रूप में होखे लागल। बाकिर, आनन्द मार्ग पर प्रतिबन्ध लाग गइला से प्रकाशन में गतिरोध आ गइल आ एकरा के बन्द कर देबे के पड़ल। कुछ साल बाद, 1993 ई. में, एकर फेर से प्रकाशन विनोद कुमार देव का सम्पादन में शुरू भइल, बाकिर साल-भर से आगे एकरा के चलावल सम्भव ना हो सकल।

वाराणसी के सुप्रसिद्ध भोजपुरी संस्था ‘भोजपुरी संसद’ 1964 ई. में ‘भोजपुरी कहानियाँ’ नाम से मासिक पत्रिका के प्रकाशन शुरू कइलस। पहिले एकर सम्पादक रहले डॉ. स्वामीनाथ सिंह। बाद में, प्रो. राजबली पाण्डेय आ गिरिजाशंकर राय ‘गिरिजेश’ एकर सम्पादक भइले। ‘गिरिजेश’ के सम्पादन में ई पत्रिका एक-से-एक कहानीकार त पैदा कइबे कइलस, भोजपुरी के पाठको-वर्ग तइयार कइलस। भोजपुरी के ई पहिलकी पत्रिका रहे, जवना के अपेक्षित मार्केटिंग भइल आ जवना के वितरण के बीड़ा ए.एच.ह्वीलर जइसन नामी कम्पनी उठवलस। सन् 1966 तक ई पत्रिका लोकप्रिय बनल रहल, बाकिर आगे एकर प्रकाशन कईएक वजह से बन्द हो गइल।

भोजपुरी संसद, वाराणसी सन् 1968 में त्रैमासिक ‘पुरवइया’ के प्रकाशन शुरू कइलस, जेकर सम्पादक रहले राजबली पाण्डेय। बाकिर उचित व्यवस्था के अभाव में ई पत्रिका एक साल बाद बन्द हो गइल।

सन् 1964 में, दूगो आउर मासिक पत्रिकन के प्रकाशन शुरू भइल- छपरा से ‘माटी के बोली’ आउर आरा से ‘भोजपुरी साहित्य’। ‘माटी के बोली’ के सम्पादक रहले सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’, बच्चू पाण्डेय आ विश्वरंजन। दू अंक निकलला का बाद ‘माटी के बोली’ के प्रकाशन बन्द हो गइल, त 1969 में एकर प्रकाशन विश्वनाथ प्रसाद का सम्पादन में फेर शुरू भइल, बाकिर कुछ अंकन के बाद एकरा के आउर आगे चला सकल आर्थिक कारण से सम्भव ना हो सकल।

आरा से डॉ. जितराम पाठक के सम्पादन में भोजपुरी साहित्य’ 1968 ई. तक प्रकाशित भइल। आगे चलके, भोजपुरी साहित्य मंडल, बक्सर के मुखपत्र के रूप में एकर प्रकाशन सन् 1975 से 1977 तक जितरामे पाठक के सम्पादन में होत रहल। ई पत्रिका भोजपुरी साहित्य के रचनात्मक स्तर के ऊँच उठावे में महत्वपूर्ण योगदान कइलस, जेकर श्रेय एकरा विद्वान् सम्पादक डॉ. पाठक के देवे के होई।

‘हमार बोल’ नामक बत्तीस पृष्ठ के पत्रिका मासिक रूप में निकलल रहे, जे दू-तीन अंक निकलला का बाद बंद हो गइल।

जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् के अनियतकालिक पत्रिका ‘लुकार’ के प्रकाशन सन् 1965 में शुरू भइल। अंक-1 से 19 तक, विभिन्न व्यक्तियन के सम्पादन में, एकरा के चक्रमुद्रित करके प्रकाशित कइल गइल। ओकरा बाद, अंक 20 से ई पत्रिका प्रेस में छपे लागल, जेकर सम्पादन गंगा प्रसाद ‘अरुण’ करे लगले। अट्ठाइसवाँ अंक से एकरा सम्पादन के भार अजय कुमार ओझा उठा रहल बाड़े आ गंगा प्रसाद ‘अरुण’ प्रधान सम्पादक के भूमिका निभा रहल बाड़े। सन् 2008 तक ‘लुकार’ के चौंतीस अंक प्रकाशित हो चुकल रहे। ओकरा बाद ई पत्रिका बन्द हो गइल।

सन् 1966 में आरा से हरेराम तिवारी ‘चेतन’ के सम्पादन में ‘आँतर’ नाम के पत्रिका निकलल रहे, जवना के पाँच अंक प्रकाशित भइल रहे। फेर सन् 1999 में ‘चेतने’ के सम्पादन में राँची से एकर एगो अंक हस्तलिखित रूप में निकलल, जवना के सौ गो हस्तलिखित प्रति तइयार करा के वितरित कइल गइल रहे।

सन् 1968 में सर्वानन्द के सम्पादन में ‘जागल पहरुआ’ नाम के एगो पत्रिका, छपरा से, प्राउटिस्ट फोरम ऑफ इंडिया का ओर से प्रकाशित भइल रहे, जे कुछे अंक निकल के बन्द हो गइल।

‘भोजपुरी जनपद’ नामक पत्रिका के प्रकाशन सन् 1968 में भोजपुरी साहित्य मंदिर, वाराणसी से राधामोहन ‘राधेश’ के सम्पादन में शुरू भइल रहे। सन् 1970-72 के दौरान एह पत्रिका के नियमित प्रकाशन होत रहल। कुछ बरिस बंद रहला का बाद, 1977 से 1981 तक ले एकर चार-पाँच अंक निकल सकल। शुरुआत में, एकरा सम्पादन से सिपाही सिंह ‘श्रीमंत’ भी जुड़ल रहले।

सन् 1971-72 के दौरान ‘राधेश’ जी ‘पहरुआ’ नाम के साप्ताहिक अपना सम्पादन में निकलले रहले। भोजपुरी साहित्य मन्दिर जइसन प्रकाशन संस्थान आ ‘भोजपुरी जनपद’ आउर ‘पहरुआ’ जइसन पत्रिकन के संचालक राधामोहन ‘राधेशे’ जी रहले, जे आपन पैत्रिक सम्पत्ति बेंच-बेंच के एह प्रकाशनन के आगे बढ़ावत गइले। इहाँ तक ले कि ऊ अपना गाँव के पैत्रिक घर तक ले बेंच दिहले आ भोजपुरी साहित्य के आपन जिनिगी समर्पित करत परलोकवासी हो गइले।

सन् 1969 में विनोदचन्द्र सिनहा के सम्पादन में वाराणसी से ‘काशिका’ नाम के पाक्षिक बड़ आकार में निकलल रहे। ओही साले, छिन्दवाड़ा (मध्यप्रदेश) से क्राउन आकार में अड़तालीस पृष्ठ के पत्रिका ‘भोजपुरी समाज’ भोलानाथ सिंह के सम्पादन में आ डॉ. रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’ के सम्पादन में ‘हिलोर’ नाम के पत्रिका आरा से प्रकाशित भइल रहली स। एह तीनों पत्रिकन के कुछुए-कुछ अंक निकल सकल, आ ई पत्रिका बन्द हो गइली स। हँ, ‘हिलोर’ के कुछ अंक 1979 में गयो से (गया से भी) निकलल रहे।

सन् 1971 में पटना से ब्रह्मानन्द मिश्र के सम्पादन में ‘भोजपुरी टाइम्स’ नाम के समाचार साप्ताहिक-प्रकाशित भइल, बाद में जवना के नाम ‘भोजपुरी संवाद’ कर दिहल गइल रहे। एक-डेढ़ बरिस ले अनियमित रूप में प्रकाशित होखत-होखत, आखिरकार, ई साप्ताहिक बन्द हो गइल। सन् 1972 में आरा से ‘टटका’ नाम के पाक्षिक रमाशंकर पाण्डेय के सम्पादन में निकलल। सन् 1976 से एकर नाम ‘टटका राह’ हो गइल रहे। कुछ समय बाद बन्द हो गइल।

सन् 1992 ई. में ‘सरायकेला अनुमंडल भोजपुरी समाज’ (अब झारखंड में) के मुखपत्र के रूप में ‘ललकार’ के प्रकाशन रामवचन तिवारी के संचालन में शुरू भइल, जेकर सम्पादक रहले डॉ. बच्चन पाठक ‘सलिल’ । सन् 1978 से एह पत्र के नाम ‘जनता ललकार’ हो गइल। 1982-83 तक ई पत्र निकलत रहल, बाकिर रामवचन तिवारी के निधन के बाद बन्द हो गइल।

सन् 1982-83 में बीरगंज (नेपाल) से श्री दीपनारायण मिश्र के सम्पादन में त्रैमासिक ‘सनेस’ के प्रकाशन शुरू भइल। ओही घड़ी हुगली (पश्चिम बंगाल) से राममूर्ति पराग आ चन्द्रकान्त के सम्पादन में ‘अँजोरिया’ (द्विमासिक) के प्रकाशन शुरू भइल। ‘सनेस’ दू बरिस ले निकलत रहल, त ‘अँजोरिया’ के दुइये अंक निकल सकल।

भोजपुरी साहित्य सदन, सीवान से पहिले त्रैमासिक आ बाद में मासिक रूप में प्रकाशित ‘माटी के गमक’ विमल कुमार सिंह ‘विमलेश’ के सम्पादन में सन् 1973 से प्रकाशित होत रहल। दू-तीन बरिस के उमिर वाला ई त्रैमासिक/मासिक जबतक निकलल, नियमित निकलल। सन् उनइस सौ तिहतरे में चितरंजन के सम्पादन में आरा से ‘चटक’ निकलल। 1974 में कांचरापाड़ा (पश्चिम बंगाल) से रवीन्द्र कुमार शर्मा के सम्पादन में मासिक ‘भिनसार’ निकलल, जेकर उमिर दू अंक के प्रकाशन तकले सीमित रहल।

सन् 1975 में पाण्डेय कपिल आ नागेन्द्र प्रसाद सिंह के सम्पादन में ‘लोग’ त्रैमासिक के प्रकाशन भइल। तीन अंक निकलला का बाद पाण्डेय कपिल एकरा सम्पादन से अलग हो गइले, त नागेन्द्र प्रसाद सिंह 1979 से ‘भोजपुरी उचार’ नाम से एकर प्रकाशन आगे बढ़वले आ कुछ अंक के प्रकाशन के बाद ई बन्द हो गइल। एही साले, ‘गोहार’ नामक पत्रिका राकेश कुमार सिंह के सम्पादन में आरा से निकलल। आगे चलके एकर दूगो अंक लखनऊ से प्रकाशित भइल।

सन् 1976 के साल भोजपुरी में पत्र-पत्रिका के प्रकाशन का दिसाई विशेष महत्व के रहल, काहे कि एह साल कईगो पत्रिका कई जगह से निकलली स। एह समय तक अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के गठन हो चुकल रहे आ एकर पहिलका अधिवेशनो प्रयाग में, हिन्दी साहित्य सम्मेलन के मंच पर, डॉ. उदय नारायण तिवारी के अध्यक्षता में आयोजित हो चुकल रहे। बिहार विश्वविद्यालय के लंगट सिंह कॉलेज में भोजपुरी के पढ़ाइओ शुरू हो चुकल रहे। एह सब वजहन से भोजपुरी के साहित्यकार लोगन में नया उत्साह आइल रहे।

एही साल (1976) से पटना से भोजपुरी संस्थान के तत्वावधान में ‘उरेह’ त्रैमासिक पाण्डेय कपिल का सम्पादन में प्रकाशित होखे लागल, जवना का माध्यम से भोजपुरी में नवलेखन के बढ़ावा मिलल। पाँच बरिस ले नियमित निकलला का बाद एकर प्रकाशन अर्थाभाव का चलते बन्द हो गइल।

अनियतकालिक पत्रिका ‘अहेरी’ के प्रकाशन अवधेश नारायण आ शंभुशरण राम के सम्पादन में मुजफ्फरपुर से भइल। वीरगंज (नेपाल) से दीपनारायण मिश्र के सम्पादन में ‘समाद’ प्रकाशित भइल। मुजफ्फरपुर से ओमप्रकाश सिंह के सम्पादन में मासिक ‘भोजपुरिहा’ के प्रकाशन शुरू भइल। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक मुखपत्र ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ डॉ. वसन्त कुमार के सम्पादन में प्रकाशित भइल। वार्षिक रूप में एह पत्रिका के दू अंक निकलल, जवना से भोजपुरी में शोध के प्रवृत्ति के बढ़ावा मिलल।

सन् 1980 से ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ के त्रैमासिक रूप में निकाले के आउर शोध-समीक्षा का अलावे एकरा में रचनात्मको साहित्य के बढ़ावा देवे के निर्णय लिहल गइल। एकर प्रधान सम्पादक ईश्वरचन्द्र सिनहा आ सम्पादक पाण्डेय कपिल भइले। सन् 1984-85 का दौरान एकर चार गो अंक निकलल आ ई पत्रिका आपन पहचान कायम कर लिहलस। फेर, दिसम्बर, 1986, दिसम्बर, 1987 आ अक्टूबर, 1988 में एकरे एक-एक विशेषांक-क्रमश: रघुवीर नारायण जन्मशताब्दी विशेषांक, भिखारी ठाकुर जन्म शताब्दी विशेषांक आ सम्मेलन-अध्यक्ष-विशेषांक का रूप में प्रकाशित भइल।

जनवरी, 1990 से ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ मासिक रूप में नियमित निकले लागल, जेकर प्रकाशन आजो जारी बा। जनवरी, 1990 से दिसम्बर, 2001 तक ले एह पत्रिका के सम्पादन पाण्डेय कपिल कइले। एह बारह बरिस का दौरान एह पत्रिका के अनेक महत्वपूर्ण विशेषांक निकलल, जइसे- राहुल सांकृत्यायन रचनावली-विशेषांक, हाइकू-विशेषांक, लघुकथा-विशेषांक, गीत- विशेषांक, दोहा-विशेषांक, भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका संदर्भ-विशेषांक।

जनवरी, 2002 से एह पत्रिका के सम्पादन प्रो. ब्रजकिशोर कर रहल बाड़े आ सह-सम्पादक बाड़े डॉ. जीतेन्द्र वर्मा। प्रो. ब्रजकिशोर के सम्पादन-काल में अबतक एह पत्रिका के कई गो महत्वपूर्ण विशेषांक प्रकाशित भइल बा, यथा- डॉ. विवेकी राय-विशेषांक, डॉ. आंजनेय-विशेषांक, संत दुनिया राम-विशेषांक। भोजपुरी के रचनात्मक सक्रियता के आगे बढ़ावे में ई पत्रिका महत्वपूर्ण योगदान करत रहल बा।

सन् 1977 में लगभग नौ गो भोजपुरी पत्रिकन के शुरुआत भइल। जमशेदपुर से माधव पाण्डेय ‘निर्मल’ के सम्पादन में ‘भोजपुरी संसार’ के दू अंक निकलल। पटना में अवस्थित गैर-सरकारी भोजपुरी अकादमी का ओर से समाचार बुलेटिन का रूप में भोजपुरी समाचार’ के कई अंक निकलल, जेकर सम्पादन हवलदार त्रिपाठी ‘सहृदय’ आ भैरवनाथ पाण्डेय कइले रहले। कलकत्ता से ऋषिदेव दूबे आ अनिल ओझा ‘नीरद’ के सम्पादन में ‘भोजपुरी मिलाप’ के तीन अंक निकलल। आरा से डॉ. रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’ के सम्पादन में मासिक ‘कलश’ निकलल, जे आगे चलके अनियतकालिक हो गइल। ब्रजकिशोर दीक्षित ‘ब्रजेश’ के सम्पादन में सीवान से ‘मोजर’ के प्रकाशन भइल, जे तीन अंक के बाद बन्द हो गइल। पटना से प्रो. तैयब हुसैन ‘पीडित’ के सम्पादन में ‘डेग’, मोतिहारी से रजनीकान्त ‘राकेश’ के सम्पादन में ‘डगर’ (बाद में जेकर नाम ‘डहर’ हो गइल रहे), आ इलाहाबाद से शशिभूषण लाल के सम्पादन में ‘चोट’ जइसन प्रगतिशील विचारधारा के पत्रिका निकललीसन, जे कुछ-कुछ अंक निकल के बन्द हो गइलीसन।

एही साल (1977 ई.) कलकत्ता के पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद् का ओर से त्रैमासिक ‘भोजपुरी माटी’ के प्रकाशन शुरू भइल, जेकर सम्पादक रहले कृष्णबिहारी मिश्र। सन् 1980 से ई पत्रिका प्रो. शिवनाथ चौबे के सम्पादन में मासिक रूप से प्रकाशित होखे लागल। भोजपुरी साहित्य के रचनात्मक विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान भइल। ई मासिक पत्रिका लगभग लगातार निकलत जा रहल बिया। पिछला कई बरिस से एह पत्रिका के सम्पादन अनिल ओझा ‘नीरद’ करत रहले। कई बरिस बाद, अब ई पत्रिका सभाजीत मिश्र के सम्पादन में प्रकाशित हो रहल बा। भोजपुरी में रचनात्मक साहित्य के श्रीवृद्धि में एह पत्रिका के अनुपम योगदान के नकारल नइखे जा सकत।

सन् 1978 में भोजपुरी के चार गो नया पत्रिकन के प्रकाशन शुरू भइल। पटना से प्रो. ब्रजकिशोर के सम्पादन में ‘भोजपुरी कथा-कहानी’, बिहार सरकार द्वारा गठित भोजपुरी अकादमी के पत्रिका ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’, जेकर सम्पादक आचार्य विश्वनाथ सिंह भइले, लखनऊ से राकेश कुमार सिंह के सम्पादन में त्रैमासिक ‘सनेहिया’, आउर ढोंढस्थान (सारन) से प्रो. वैद्यनाथ विभाकर के सम्पादन में अनियतकालिक ‘पपीहरा’। ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’ कुछ समय तक अकादमी के कार्यकारी निदेशक चित्तरंजन के सम्पादन में, फिर आगे चल के अकादमी के उपनिदेशक नागेन्द्र प्रसाद सिंह के सम्पादन में प्रकाशित भइल आ फेर बंद हो गइल। एकर अंतिम कुछ अंक काफी दबीज आ विशिष्ट रहले स। नागेन्द्र प्रसाद सिंह के सेवा-निवृत्ति के बाद एकर प्रकाशन बंद रहल ह, बाकिर, एह साल 2008 में फेर से एकर प्रकाशन डॉ. शिववंश पाण्डेय के सम्पादन में शुरू भइल रहे। अबहीं ई पत्रिका बन्द बा।

सन् 1979 में दू गो नया पत्रिका अइली स- दिघवा दुबौली (गोपालगंज) से गौरीकान्त ‘कमल’ के सम्पादन में पाक्षिक ‘लाल माटी’ आ बलिया से डॉ. अशोक द्विवेदी के सम्पादन में ‘पाती’ । शुरू में ‘पाती’ के चार अंक निकलला का बाद गतिरोध आ गइल आ पत्रिका बन्द हो गइल। फेर अगिला साल 1992 से नया कलेवर में एकर प्रकाशन होखे लागल। डॉ. अशोक द्विवेदी के सम्पादकीय ऊर्जा ‘पाती’ के जे विशिष्टता प्रदान कइले बा, ऊ भोजपुरी साहित्य खातिर महत्वपूर्ण अवदान साबित भइल बा। अबतक प्रकाशित ‘पाती’ के पचास-साठ अंक भोजपुरी के अनेक प्रतिभाशाली रचनाकारन के उजागर कइले बा।

जनवरी, 1980 से अप्रैल, 1987 तक नोखा (रोहतास) के साहित्य-कला-मंच के तत्वावधान में ‘झनकार’ नाम के पत्रिका के प्रकाशन जवाहर लाल ‘बेकस’ के व्यवस्था में भइल रहे, जेकर सम्पादक रहले फणीन्द्रनाथ मिश्र। ई हिन्दी आ भोजपुरी के मिलल-जुलल पत्रिका रहे। ओकरा बाद एह मासिक के प्रकाशन पटना से ‘पनघट’ के नाम से, जवाहर लाल ‘बेकस’ के सम्पादन में, होखे लागल आ एकरा में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खण्ड होखे लागल। सन् 1996 में ‘पनघट’ के प्रकाशन बंद हो गइल रहे। बाकिर, जनवरी, 1999 से त्रैमासिक रूप में फेर से एकर प्रकाशन ‘बेकस’ के सम्पादन में होखे लागल, जवना में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खंड पहिलहीं जइसन रहे लागल। एही त्रैमासिक रूप में ‘पनघट’ के नियमित प्रकाशन इनके सम्पादन में आजो जारी बा।

सन् 1980 में भोजपुरी के कुछ आउर नया-नया पत्रिका प्रकाश में अइली स- मुजफ्फरपुर से वाल्मीकि विमल के सम्पादन में पाक्षिक ‘भोजपुरी के गमक’; पटना से शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी के सम्पादन में भोजपुरी समाचार’; कुल्हड़िया (भोजपुर) से महेन्द्र गोस्वामी के सम्पादन में मासिक ‘आपन गाँव’; मोतिहारी से साँवलिया विकल के सम्पादन में मासिक ‘जोखिम’ आ जमशेदपुर से परमेश्वर दूबे शाहाबादी के सम्पादन में अनियतकालिक ‘साखी’ । एक-दू अंक निकल के ई सब पत्रिका बन्द हो गइली सन। ‘साखी’ के ‘परमेश्वर दूबे शाहाबादी स्मृति विशेषांक’ के सम्पादन डॉ. रसिक बिहारी ओझा ‘निर्भीक’ कइले रहलें।

सन् 1981 में छपरा से डा. धीरेन्द्र बहादुर चाँद के सम्पादन में ‘झकोर’, मठनपुरा (सीवान) से श्रीवास्तव प्रदीप कुमार ‘प्रभाकर’ के सम्पादन में ‘कचनार’ आउर दिनारा (भोजपुर) से अरुण भोजपुरी के सम्पादन में ‘तरई’ नाम के पत्रिका निकललीसन, जिनकर कुछ-कुछ अंक निकल पावल आ ई सब प्रत्रिका बन्द हो गइली सन।

सन् 1982 में छपरा से रामनाथ पाण्डेय आ डॉ. वीरेन्द्र नारायण पाण्डेय के सम्पादन में कहानी-पत्रिका ‘चाक’ के कुछ अंक निकलल, जवना से भोजपुरी में कहानी-लेखन के गतिविधि में सकारात्मक हलचल भइल बाकिर कुछए अंक के प्रकाशन का बाद ई विशिष्ट पत्रिका बन्द हो गइल।

एही साल (1982 में) गोरखपुर से मैनावती देवी श्रीवास्तव ‘मैना’ के सम्पादन में त्रैमासिक ‘सोनहुला माटी’, भलुनीधाम (रोहतास) से डॉ. नंदकिशोर तिवारी के सम्पादन में त्रैमासिक ‘माई के बोली’ आउर बडकी नैनीजोर (भोजपुर) से महेश्वराचार्य के सम्पादन में त्रैमासिक ‘दियरी’ के प्रकाशन शुरु भइल। बाकिर ई तीनू पत्रिका अल्पजीवी साबित भइली स। एही साल, पतरातू थर्मल पावर के वार्षिकी ‘भोजपुरी परिवार पत्रिका’ के प्रकाशन भइल रहे, जवना के सम्पादक रहले अनिरुद्ध दूबे, विपिन बिहारी चौधरी आ ब्रजभूषण मिश्र।

सन् 1983 में बीरगंज (नेपाल) से ‘सगुन’ नाम के पत्रिका विजय प्रकाश बीन के सम्पादन में निकलल, बाकिर आगे ना चल सकल। एही साल, छपरा से प्रो. हरिकिशोर पाण्डेय के सम्पादन में ‘कसौटी’ नाम के समीक्षा-पत्रिका निकलल। एह पत्रिका के सिर्फ चारे-पाँच अंक त निकल सकल, बाकिर भोजपुरी में समीक्षा के विकास का दिसाईं आपन अमिट छाप छोड़ गइल। एही साल, छपरा से अर्द्धन्दु भूपण के सम्पादन में बालोपयोगी त्रैमासिक ‘नवनिहाल’ के प्रकाशन शुरू भइल, जवना के उमिर कुछुए अंक ले सीमित रहल।

हरिद्वार (उत्तरप्रदेश) से डॉ. सच्चिदानन्द शुक्ल के सम्पादन में ‘भोजपुरी सनेस’ के प्रकाशन 1984 में शुरू भइल। एक अंक के बाद एकर नाम बदल के भोजपुरी आँगन’ कर दिहल गइल। तीन-चार अंक के बाद ई पत्रिका बन्द हो गइल। उनइस सौ चौरासिये में आरा से डॉ. रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’ के सम्पादन में ‘आपन भाषा’ के त्रैमासिक प्रकाशन शुरू भइल, बाकिर एकर दुइये अंक निकल सकल। एह पत्रिका के महिलांक निकाले के योजना रहे, जे कार्यान्वित ना हो पावल।

सन् उनइस सौ तिरासिये में, पटना से कुशवाहा कुसुम के सम्पादन में त्रैमासिक ‘पुजारिन’, दिघवारा (सारन) से प्रियव्रत शास्त्री ‘प्रीतेश’ के सम्पादन में ‘भोजकंठ’ आउर पटना से शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी आ रासबिहारी पाण्डेय के सम्पादन में भोजपुरी भाषा सम्मेलन पत्रिका’ के प्रकाशन शुरू भइल, बाकिर दू-तीन अंक निकलत-निकलत ई तीन पत्रिका बंद हो गइलीसन। बाद में, सन् 1993 में रासबिहारी पाण्डेय देवघर से ‘भोजपुरी भाषा सम्मेलन पत्रिका’ के फेर से शुरूआत कइले आ उनका जिनिगी-भर ई पत्रिका नियमित निकलत रहल, हालाँकि एकर भाषा-नीति विवादास्पद बनल रहल।

सन् 1985 में हरविलास नारायण सिंह के सम्पादन में पटना से ‘लटर-पटर’ आ विश्वनाथ भोजपुरिया के सम्पादन में ‘दिआ’ मासिक के प्रकाशन होखे लागल, बाकिर एह पत्रिकन के उमिर कुछुए अंक ले सीमित रहल।

सन् 1986 में बरौली (गोपालगंज) से दिनेश कुमार पाण्डेय ‘दिवाकर’ के सम्पादन में मासिक ‘आरती’, ढोंढस्थान (सारन) से प्रो. वैद्यनाथ विभाकर के सम्पादन में ‘भोजपुरी भारती’ आउर अरदेवा (सारन) से रामाज्ञा प्रसाद सिंह ‘विकल’ के सम्पादन में त्रैमासिक ‘कलेवा’ के प्रकाशन शुरू भइल, बाकिर एह सब पत्रिकन के उमिर कुछ-कुछ अंक तकले रहल।

सन् 1987 में साहेबगंज (मुजफ्फरपुर) से डॉ. ब्रजभूषण मिश्र के सम्पादन में ‘कोइल’ के मासिक प्रकाशन शुरू भइल। डॉ. धीरज कुमार भट्टाचार्य के आर्थिक सहयोग से ई पत्रिका अप्रैल, 1992 तक नियमित निकलत रहल।

एह अवधि में पटना से पशुपतिनाथ सिंह के सम्पादन में भोजपुरी कलम’ नाम के पत्रिका निकलल। प्रगतिशील विचारधारा आ तेवरदार भाषा-शैली का वजह से ई पत्रिका चर्चा में रहल, बाकिर आर्थिक वजहन से एकर प्रकाशन कुछुए अंक के बाद रुक गइल। सन् 1989 में मुजफ्फरपुर से कुमार विरल के सम्पादन में ‘हिरामन’ नाम के पत्रिका के दू अंक निकलल। एकरा बन्द भइला पर कुमार विरले के सम्पादन में ‘भोजपुरी आवाज’ नाम के पत्रिका निकलल, जें एके अंक ले सीमित रह गइल।

मई 1988 में लखनऊ से ‘भोजपुरी लोक’ नाम के मासिक पत्रिका डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य के सम्पादन में निकलल आ बारह बरिस ले निरन्तर निकलत रहल। ई हिन्दी आ भोजपुरी के द्विभाषी पत्रिका रहे, जवना में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खण्ड रहत रहे। हिन्दीओ खण्ड में भोजपुरी भाषा-साहित्य-संस्कृति विषयक सामग्री छपत रहे।

सन् 1988 में छपरा से बैकुण्ठ नारायण के सम्पादन में ‘पाँति-पाँति’ आउर जमालपुर से अशोक ‘अश्क’ के सम्पादन में ‘बटोहिया’ के प्रकाशन शुरू भइल। ‘बटोहिया’ के कथा-अंक बहुत सफल आयोजन रहे। अनियतकालिक रूप में ‘बटोहिया’ के कुछ अंक जब-तब निकले, बाकिर, आखिरकार, ई पत्रिका बंद हो गइल। 1989 में बेतिया (पश्चिमी चम्पारण) से चतुर्भुज मिश्र के सम्पादन में ‘हालचाल’ निकलल, बाकिर दू-तीन अंक से आगे ना चल सकल।

सन् 1990 में गोरयाकोठी (सीवान) से सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ के सम्पादन में ‘बिगुल’ के प्रकाशन शुरू भइल आ बरिसन ले निकलत रहल। एकर कविता-अंक आ लघुकथा-अंक विशेष चर्चित भइले सन। श्री अक्षयवर दीक्षित पर एकर विशेषांको बहुत अच्छा निकलल। ‘बिगुल’ का प्रकाशन से सैकड़न लेखक प्रकाश में अइलन। एही साल, साहेबगंज से ‘भोजपुरी त्रैमासिक’ नाम के पत्रिका कमलेश्वर प्रसाद पाठक का सम्पादन में निकलल रहे, जवना के उमिर दू अंक ले सीमित रहल।

सन् 1991 में बक्सर से विजयानन्द तिवारी के सम्पादन में त्रैमासिक ‘जगरम’ के प्रकाशन शुरू भइल, जे काफी अरसा ले जारी रहल। एह पत्रिका के ‘खोलकदास’ शीर्षक स्थायी स्तम्भ खूब चर्चित रहल। एह पत्रिका के लोक-साहित्य अंक बहुत पुष्ट आ स्तरीय रहे।

सन् 1991 में ही, बोकारो स्टील सिटी से ‘इंगुर’ नाम के त्रैमासिक रामनारायण उपाध्याय के सम्पादन में प्रकाशित भइल रहे। ई त्रैमासिक अल्पजीवी त जरूर रहे, बाकिर जवने दू-तीन अंक निकलल, ऊ साहित्यिक दृष्टि से स्वस्थ आ पुष्ट रहे।

सन् 1992 में बक्सर से प्रभंजन भारद्वाज के सम्पादन में ‘लहार’ आ 1993 में लखनऊ से सत्येन्द्रपति त्रिपाठी के सम्पादन के भोजपुरी के बोली’ नाम के पत्रिका प्रकाशित भइली स, जे कुछ अंक निकलला का बाद बंद हो गइली सन।

सन् 1994 में बरौली (गोपालगंज) से सच्चिदानन्द श्रीवास्तव के सम्पादन में त्रैमासिक ‘बायेन’ के प्रकाशन भइल, जेकर दू गो अंक निकलल। एही साल, आशापड़री (बक्सर) से चन्द्रधर पाण्डेय ‘कमल’ के सम्पादन में ‘भोजपुरी लहर’ के प्रकाशन शुरू भइल, जेकर सात गो अंक निकलल रहे।

सन् 1995 में बीरगंज (नेपाल) से गोपाल ‘अश्क’ के सम्पादन में ‘गमक’ के प्रकाशन भइल रहे, जेकर चार-पाँच अंक निकलल रहे। एही साल, हीरालाल अमृतपुत्र, मदन प्रसाद आ जयकान्त सिंह ‘जय’ के सम्पादन में ‘उगेन’ नाम के पत्रिका के कईगो अंक निकलल रहे।

सन् 1996 में सेतु न्यास (मुम्बई) द्वारा संचालित विश्व भोजपुरी सम्मेलन, देवरिया (उत्तरप्रदेश) के त्रैमासिक पत्रिका ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ के प्रकाशन डॉ. अरुणेश ‘नीरन’ के सम्पादन में शुरू भइल। सुन्दर, सुभेख आ पृथुलकाय एह विशिष्ट त्रैमासिक के सन् 2008 तक अट्ठाईस गो अंक प्रकाशित हो चुकल बा, जवना में कहानी-विशेषांक, धरोहर-विशेषांक, स्त्री-विशेषांक, कविता-विशेषांक आउर संस्मरण-विशेषांक अतिशय महत्व के बाटे। भोजपुरी भाषी क्षेत्र के हिन्दी आ संस्कृत के विद्वान आ साहित्यकार लोगन के कलम से भोजपुरी के रचना लिखवावे में एकर सम्पादक का बहुते सफलता मिलल बा, जेकरा खातिर ऊ बधाई के पात्र बाड़े।

एही साल, कॉलेज शिक्षकन के भोजपुरी संस्था ‘भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद’ का ओर से एही नाम के एगो पत्रिका डॉ. प्रभुनाथ सिंह का सम्पादन में प्रकाशित भइल रहे। बाकिर आगे एकर प्रकाशन ना हो सकल।

1997 में भगवान सिंह ‘भास्कर’ के सम्पादन में सीवान से ‘बयार’ नाम के पत्रिका निकलल रहे, जेकर छव गो अंक प्रकाशित भइल रहे।

सन् 1998 में दिल्ली से महेन्द्र प्रसाद सिंह के सम्पादन में नाटक आ रंगमंच पर केन्द्रित एगो अनियतकालिक पत्रिका ‘विभोर’ के प्रकाशन शुरू भइल, जेकर सात-आठ अंक सन् 2008 तक प्रकाशित हो चुकल बा।

सासाराम (रोहतास) से डॉ. नन्दकिशोर तिवारी के सम्पादन में ‘सुरसती’ नाम के पत्रिका सन् 1999 से ही प्रकाशित हो रहल बा। सन् 2008 तक एकर लगभग पचीस अंक प्रकाशित हो चुकल रहे। अबो जब-तब एकर अंक देखे में आवेला।

एह अवधि में निकलेवाली एगो विशिष्ठ मासिक पत्रिका रहे बलिया से प्रकाशित होखे वाली ‘भोजपुरी विकास चेतना’, जेकर सम्पादक रहले डॉ. राजेन्द्र भारती। अइसे त ई पत्रिका बरिसन पहिले शुरू भइल रहे, बाकिर तुरन्ते बंद हो गइल आ फेर कई बेर शुरू आ बन्द होत रहल। बाकिर राजेन्द्र भारती के सम्पादन में एकर निरन्तरता एगो लम्बा समय तक बनल रहे आ एकर साहित्यिक स्तरो श्लाघनीय बनल रहल।

जुलाई, 1999 से ‘कविता’ नाम के त्रैमासिक पत्रिका भोजपुरी साहित्य प्रतिष्ठान, पटना से नियमित रूप में प्रकाशित होत रहल बा, जेकर सम्पादक हवे कविवर जगन्नाथ आ सह-सम्पादक हवे भगवती प्रसाद द्विवेदी। अबतक एकर बावन गो अंक प्रकाशित हो चुकल बा। वित्त-पोषण के अभाव का चलते 52 अंक के लोकार्पण का बाद, एकर त्रैमासिक प्रकाशन बंद कर दिहल गइल बा, एह संकल्प का साथे कि एकर वार्षिक प्रकाशन कइल जाई। विविध भावबोध आ विविध शिल्प-शैली के उत्कृष्ट कवितन का अलावे कविता-विषयक लघु निबन्ध आ कविता-पुस्तकन के समीक्षा से लैस ई पत्रिका भोजपुरी कविता के उत्कर्ष के प्रति समर्पित रहल बा।

अगस्त, 2000 में सीवान से भगवान सिंह ‘भास्कर’ के सम्पादन में ‘उड़ान’ नामक पत्रिका प्रकाशित भइल रहे, मगर दू अंक से आगे ना बढ़ सकल। जनवरी-मार्च 2001 में ‘महाभोजपुर’ नाम के पत्रिका विनोद कुमार देव का सम्पादन में सज-धज से निकलल, बाकिर आगे ओकर प्रकाशन ना बढ़ सकल।

विश्व भोजपुरी सम्मेलन के राष्ट्रीय इकाई के तत्वावधान में पटना से ‘भोजपुरी विश्व’ नाम के पत्रिका के प्रकाशन कई बरिस ले रहल बा, जेकर प्रधान सम्पादक रहले डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय आ सम्पादक बाड़े डॉ. लालबाबू तिवारी। डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय के निधन के बाद ई पत्रिका देखे में ना आइल।

जमशेदपुर से अजय कुमार ओझा के सम्पादन में ‘निर्भीक संदेश’ नामक त्रैमासिक पत्रिका सन् 2002 से प्रकाशित हो रहल बा। ई द्विमासिक पत्रिका ह, जवना में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खण्ड रहेला। सुरुचिसम्पन्नता आ नियमितता एह पत्रिका के विशेषता बा।

सन् 2006 से लखनऊ से ‘भोजपुरी संसार’ नामक त्रैमासिक के नियमित प्रकाशन होत रहल। श्रीमती आशा श्रीवास्तव एकर सम्पादक बाड़ी आ मनोज श्रीवास्तव एकर समन्वयक सम्पादक बाड़े। सुरुचिसम्पन्नता आउर सुन्दर गेटअप-मेकअप के ई मनोहारी पत्रिका आम लोगन में बहुत लोकप्रिय रहल बा। भोजपुरी के कुछुए पत्रिका अइसन बाड़ी सन, जवना के उत्तर भारत के विभिन्न शहरन के पत्रिका का स्टालन पर देखल जा सकेला। ‘भोजपुरी संसार’ अइसन कुछ पत्रिकन में से एगो रहे। बाकिर अब ई पत्रिका देखे में नइखे आवत।

सन् 2007 में मुजफ्फरपुर से ‘भोर’ नाम के एगो त्रैमासिक के प्रकाशन शुरू भइल, जवना के चार गो अंक निकल सकल। एह पत्रिका के प्रधान सम्पादक रहले डॉ. ब्रजभूषण मिश्र आ सम्पादक रहले डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’। एकरा प्रकाशन में तत्काल गतिरोध हो गइल बाकिर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर में भोजपुरी के पढ़ाई होखे का चलते एह पत्रिका में छात्रोपयोगी सामग्री के समावेश से उमेद कइल जा सकेला कि एकर प्रकाशन में आइल गतिरोध जल्दिए खतम हो जाई।

जुलाई-सितम्बर, सन् 2008 से ‘परास’ नाम के एगो त्रैमासिक के प्रकाशन तेनुघाट (झारखण्ड) से होत रहल। निबन्ध, कहानी, कविता आदि सब विधन से लैस एह पत्रिका के सम्पादक बाड़े डॉ. आसिफ रोहतासवी। एकर स्तरीय प्रकाशन जारी बा, जेकर श्रेय एकरा सम्पादक के बा।

एह पत्र-पत्रिकन का अलावे, भोजपुरी के सम्मेलनन के अवसर पर प्रकाशित स्मारिको सभन अनियतकालिक पत्रिकन खानी बढ़िया सामग्री पाठकन खातिर परोसत रहल बाड़ी सन।

हिन्दी के दैनिक पत्र ‘आज’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘राँची एक्सप्रेस’, ‘नवभारत’, ‘प्रभात खबर’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘जनसत्ता’, ‘दैनिक जागरण’, ‘भोजपुरी फोरम’ जइसन अखबार समय-समय पर भा धारावाहिक रूप से भोजपुरी भाषा-साहित्य-संस्कृति विषयक ज्ञानवर्धक आ रोचक सामग्री परोस के भोजपुरी के पत्रकारिता के आ भोजपुरी के साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्कर्ष के प्रोत्साहित कइले बाड़े स। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के बिलासपुर (मध्यप्रदेश) में आयोजित आठवाँ अधिवेशन के अवसर पर ‘बिलासपुर टाइम्स’ नामक दैनिक पत्र आपन विशेषांक त निकललहीं रहे, पूरा-के-पूरा विशेषांक भोजपुरिए- भाषा में निकलले रहे।

एह पत्र-पत्रिकन के अलावा नवंबर, 2008 से श्री विनोद कुमार तिवारी के संपादन में जमशेदपुर से मासिक समाचार-पत्रिका ‘गाँव-घर’ के प्रकाशन हो रहल बा। एगो आउर नया तिमाही ‘भोजपुरिया अमन’ के भी प्रकाशन उहें से होत रहल, बाकिर अब ओकर अंक देखे में नइखे आवत।

भोजपुरी पत्रकारिता के विवेचन से एक बात साफ बा कि भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन में साहित्यिके सामग्री प्रस्तुत करे पर विशेष ध्यान दिहल जात रहल बा। साहित्येतर समाचार, सूचना, रपट आदि के समावेश भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन में कमे होत रहल बा। कुछेक समाचारप्रधान पत्रिका निकललो बा, त ओह में भोजपुरी के साहित्यिके प्रगति भा गतिविधि के स्थान मिलल बा। देश-दुनिया के साहित्येतर खबरन के समावेश इन्हनी में ना के बराबर होत रहल बा।

बाकिर, एह अभाव के पूर्ति का दिसाईं एगो अत्यन्त महत्वपूर्ण डेग एही साल 2008 में अरिन्दम चौधरी उठवले बाड़े ‘द संडे इंडियन’ के भोजपुरी संस्करण प्रकाशित कइके। ई समाचार-साप्ताहिक पत्रिका अंग्रेजी, हिन्दी, उर्द, बंगला, तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयानम, गुजराती, मराठी, असमिया, उड़िया आ पंजाबी का साथे-साथे भोजपुरिओ में प्रकाशित होखे लागल बा। ‘द संडे इंडियन’ जइसन समाचार-साप्ताहिक के भोजपुरीसंस्करण प्रकाशित करके भारत के संविधान-स्वीकृत भाषा सभन का पाँत में भोजपुरी के प्रकारान्तर से प्रतिष्ठित करेके जे महत्कार्य कइल गइल बा, ओकरा खातिर भोजपुरीभाषी जनता सदैव आभारी रही। उमेद कइल जा सकेला कि एह से प्रेरणा पाके भोजपुरी में कुछ समाचार-साप्ताहिक आउरो प्रकाशित होइहेंसन। भोजपुरी में कवनो दैनिको समाचार पत्र प्रकाशित होखे, एकर कल्पना त आउरो सुख देबेवाला बा।

(सभारलेखाञ्जलिसे )


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min1250

आर.के. सिन्हा

भारत के महिला आ पुरुष हॉकी टीम के टोक्यो ओलंपिक खेल में चमत्कारी प्रदर्शन पर सारा देश गर्व महसूस कर रहल बा I  भारत के हॉकी प्रेमी के आँख एतना शानदार प्रदर्शन देखे खातिर तरस गइल रहे। पर तनी देखीं कि पुरुष अउर महिला हॉकी टीम के अधिकतर खेलाड़ी जेकर संबंध देश के छोट-छोट शहर, कस्बा आ गाँव से रहे ई कमाल कर दिखवलस। जेकरा पास खेल के आधारभूत ढांचा तक नसीब नइखे उहे खिलाड़ी अपना दुनू हॉकी टीम में लाजवाब खेल देखा रहल बा। ई खिलाड़ी लोग हरियाणा के शाहबाद मारकंडा, उत्तराखंड के हरिद्वार, झारखंड के खूंटी, पंजाब के अमृतसर के गांव अउर दूसर अनाम जगह से संबंध रखे ला लो। पर एह लोग में जीत आ आगे बढ़े के जज्बा सच में अदभुत बा।

भारत के महिला हॉकी टीम दुनिया में अभी तक नौंवी रैंकिंग पर बा। उ क्वार्टर फाइनल में दुनिया के नंबर एक रैकिंग टीम आस्ट्रेलिया के हरा दिहलस। अमृतसर के पास के एक गांव मिद्दी कलां के बेटी गुरुजीत कौर भारत खातिर विजयी गोल दगली। उ एक बहुत छोट किसान के बेटी हई। लेकिन अब त उनका के सारा देश जानता। एक के बाद एक चमत्कार कर रहल भारतीय हॉकी टीम के कप्तान रानी रामपाल हरियाणा के कुरुक्षेत्र के छोट से कस्बा शाहबाद मारकंडा से संबंध रखेली। उनकर पिता दिहाड़ी मजदूर रहलन। रानी के पिता रामपाल जी हमरा के एक बार बतावत रहलन कि जब रानी हॉकी खेलल शुरू कइली त उनका से शाहबाद मारकंडा में बहुत से लोग कहे लागल कि, “रानी छोटहन पैंट पहिर के हॉकी खेले खातिर जाली। तोहार माली हालत खराब बा। कइसे उनका खातिर हॉकी के किट वगैरह दिलवा पइबs। सवाल वाजिब रहे। हालांकि ई हमरा अंदर एक अलग तरह के जज्बा पैदा कर दिहलस संघर्ष करे के। हम रानी खातिर जवन भी कर सकत रहनी उ कइनीं।” रानी के 2010 के जूनियर वर्ल्ड कप हॉकी चैंपियनशिप में सबसे बेहतरीन खिलाड़ी के सम्मान मिलल रहे। ऊ तब से ही भारत के हॉकी टीम खातिर खेल रहल बाड़ी।

आख़िरकार, केतना लोग वंदना कटारिया के नाम भारत के दक्षिण अफ्रीका पर विजय से पहिले सुनले रहल। ओह पूल ए के मैच में उ तीन गोल दगले रहली। एह तरह से ऊ भारत के पहिला महिला हॉकी खिलाड़ी बन गइली जे ओलंपिक में एक मैच में तीन गोल कइल। हरिद्दार से कुछ दूर स्थित रोशनाबाद कस्बे के वंदना के पिता तमाम अवरोधन के बावजूद उनका के हॉकी खेले खातिर प्रेरित कइले। वंदना के हॉकी सेंस गजब के बा। पिता भेल के फैक्टरी में मामूली सा नौकरी करत रहले। वंदना के ‘डी’ के भीतर निशाना अचूक ही रहेला।

उ भारत के तरफ से लगातार खेल रहल बाड़ी। लेकिन, एह कीर्तिमानन के बीच वंदना के गरीबी अउर अभाव के सामना त करहीं के पड़ल

दरअसल, भारत के महिला हॉकी खिलाड़ी सबके कथा, परी कथा जइसन नइखे। एमे अभाव, गरीबी अउर समाज के विरोध आ आलोचना भी शामिल बा। एमे से अधिकतर के पास बचपन में खेले खातिर ना त जूता रहे आ ना हॉकी किट। अगर ई लोग शिखर पर पहुँचल आ अपना देश के सम्मान दिलववलस त एकरा खातिर इनकर खेल के प्रति जुनून आ कुछ करे के जिद ही त रहे। अगर बात भारत के पुरुष हॉकी टीम के करीं त ओकर अधिकतर खिलाड़ी भी अति सामान्य परिवार से बाड़ें। ये भारतीय टीम में कवनों भी खिलाड़ी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या कवनों भी बड़ा महानगर या संपन्न परिवार से नइखे। महानगरन में त खेल के विकास पर लगातार निवेश होत रहल बा। पर ये शहरन से कवनों खिलाड़ी सामने नइखे आवत। अगर दिल्ली के बात करीं त इहाँ पर दादा ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम से लेके शिवाजी स्टेडियम तक हॉकी के विश्व स्तरीय स्टेडियम बा। एमे एस्ट्रो टर्फ वगैरह के सारी सुविधा बा। पर भारतीय हॉकी टीम में एक भी दिल्ली के खिलाड़ी नइखे। इहे दिल्ली पूर्व में हरबिंदर सिंह, मोहिन्दर लाल, जोगिन्दर सिंह (सब 1964 के टोक्यो ओलंपिक विजयी टीम के खिलाड़ी), एम.के. कौशिक (1980 के गोल्ड मेडल विजयी टीम के सदस्य), आर.एस.जेंटल जइसन खिलाड़ी निकलले बा। पता ना अब का हो गइल बा दिल्ली के युवा लोग के I

आर.एस.जेंटल 1948 (हेलसिंकी),1952 (लंदन) अउर 1956 (मेलबर्न) में भारतीय हॉकी टीम के मेंबर रहलें। उ आपन शुरुआती हॉकी कश्मीरी गेट में खेललन। उ कमाल के फुल बैक रहलन। उ 1956 के मेलबर्न ओलंपिक खेल में टीम के कप्तान भी रहलें। उनहीं के फील्ड गोल के बदौलत भारत पाकिस्तान के फाइनल में शिकस्त दिहलस। जेंटल बेहद रफ-टफ खिलाड़ी रहलन। विरोधी टीम के खिलाड़ियन के कई बार धक्का मारत आगे बढ़त रहलें। एही से कई बार उनका के खिलाड़ी कहत रहले “प्लीज, बी जेंटल”। एही से उनकर नाम ही जेंटल हो गइल।

कुल मिला के ई बात त समझ ही लेवे के चाहीं कि अब बडहन सफलता बड़ शहरन के बपौती ना रहल। बड़ शहरन में बड़ स्टेडियम अउर दोसर आधुनिक सुविधा त जरूर बा, पर जज्बा छोटे शहर आ गाँव वालन में भी कम ना होला। ई लोग अवरोधन के पार करके सफल हो रहल बा लो। ये लोग में अर्जुन दृष्टि बा। ई जवन भी करेला लो, ओमे आपन पूरा ताकत झोंक देला लोग। ई लो सोशल मीडिया पर आ पार्टिन में बिजी ना रहेला। नया भारत में सफलता के स्वाद सभ राज्यन के छोट शहरन के बच्चन के भी अच्छा तरह लाग गइल बा। मेरठ, देवास, आजमगढ़, खूंटी, सिमडेगा आ दूसर शहरन में बच्चन के खेल के मैदान में अभ्यास करत देखल  जा सकेला। अगर इहाँ पर छोट शहरन से संबंध रखे वाला बच्चन के अभिभावक के कुर्बानी के बात ना होई त बात अधूरे रह जाई। जब सारा समाज ई मानता कि क्रिकेट के अलावा कवनों खेल में करियर नइखे फिर भी कुछ माता-पिता अपना बच्चन खातिर तमाम तरह से संघर्ष करते रहेला लो।

एक बात अवश्य कहेम कि सफलता खातिर सुविधा जरूरी बा, पर खेलन में या जीवन के कवनो भी क्षेत्र में सफलता खातिर जुनूनी भइल कहीं ज्यादा अनिवार्य बा। कुछ लोग ई कह देला कि धनी परिवार के बच्चा खेल में आगे नइखे जा सकत। ऊ लोग मेहनत करे से बचे ला। इहो सरासर गलत सोच बा। मत भूलीं कि भारत के पहिलका ओलंपिक के गोल्ड मेडल शूटिंग में अभिनव बिन्द्रा ही दिलववले रहले। उ खासे धनी परिवार से संबंध रखेलन। उनकर पिता उनका के अनेक सुविधा दिहलन आ अभिनव मेहनत करके अपना के साबित कर दिहलन। सफलता खातिर पहिला शर्त ई बा कि खिलाड़ी में जीते के इच्छा शक्ति होखे।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं)


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min660

मनुष्य के सबसे बड़ उपलब्धि बा कि ओकरा पास एगो विकसित दिमाग बा लेकिन साथ हीं सबसे बड़ परेशानियो के कारण इहे बा। दिमगवे नू तनाव के घर ह।

हाल हीं में भइल सर्वे के अनुसार दुनिया में 86 प्रतिशत लोग तनाव के शिकार बा। अपना देश भारत में त 89 प्रतिशत लोग ‘टेंशन’ में जीयsता। दुनिया में एतना नफरत फइलल कि तरह-तरह के बम आ मिसाइल बनल। प्यार आ मुहब्बत खातिर कुछ बनल कहाँ? प्यार के संदेश देवे वाला भा कोशिश करे वाला के त अक्सर जहर पियावल गइल।

कहे के मतलब कि दुनिया में ज्यादा डिस्ट्रक्टिवे लोग बा। दोसरा के परेशान, दुखी भा तनाव में देख के खुश होखे वाला लोग। एही से सिनेमो में अइसन दृश्य खूब देखावल जाला।

देश के भीतर जाति-धर्म-संप्रदाय-भाषा आदि के आधार पर जवन ग्रुप, गैंग आ खेमा बनल ओह में वैचारिक मतभेद मनभेद तक पहुंचल आ लोग एक-दुसरा के नीचा देखावे खातिर नीचता के स्तर पर उतरे लागल। राष्ट्र, मानवता आ समाज के हित के फिकिर छोड़ के सामने वाला के मान-मर्दन खातिर हुलेलेले में लाग गइल। एक-दुसरा के हौसला देवे के बजाय तनाव देवे में लाग गइल आ पूरा देश भा पूरा विश्व तनावग्रस्त हो गइल।

सवाल ई बा कि कवनों भी देश भा समाज जब एही सब में लागल रही त उ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आ सृजन पर कइसे फोकस करी?

विकास खातिर भा क्रियेशन खातिर एगो सकारात्मक माहौल जरूरी होला, तनावमुक्त मन जरूरी होला। इहाँ त तनाव हर आँगन भा शहरी फ्लैट के हर कमरा तक पहुँच गइल बा। ना यकीन होखे त कचहरी जाके डिवोर्स के केस देखीं। खेत के डंरार खातिर कपारफोरउअल आ मुकदमाबाजी देखीं। त ना पति-पत्नी में पटsता, ना सहोदर भाई में। समाज में त कुछ कुक्कुरन के गोल बनले बा जवन खाली निगेटिविटी फइलावे खातिर जनमल बाड़न स। आखिर हर 40 सेकेंड पर एगो आदमी आत्महत्या काहे करsता। ई हम नइखीं कहत, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के रिपोर्ट कहs ता। .. आ एह में ज्यादा नौजवाने लोग शामिल बा।

केहू के बेवक्त मूअल बहुत खतरनाक होला। ऊ अपना साथे परिवार में केतना लोग के मार देला, जिंदा लाश बना देला। एह से जहां तक संभव होखे, जइसे संभव होखे, अइसन मौत के रोके के कोशिश होखे के चाहीं। मित्र, परिवार अउर इंसानियत से भरल अन्य लोग भी अवसाद, विषाद, तनाव, निराशा आ पीड़ा में आकंठ डूबल लोग के साथे खड़ा होखे। ओकरा के अकेला मत छोड़े। ओकरा के समझा के, बुझा के, गला लगा के, बीच-बचाव क के, पंचायती क के, ओकरा साथे खड़ा होके, आर्थिक, मानसिक भा शारीरिक सहयोग क के ओकरा के बचावे, जिंदगी देवे। इहे मानवता ह।

राक्षसन के काम त दोसरा के तकलीफ में अट्टहास कइल ह। पीड़ित आदमी के भी एह सच्चाई के स्वीकार कर लेवे के चाहीं। एहू बात के पक्का यकीन होखे के चाहीं कि जे दोसरा खातिर गड्ढा खोदेला, ईश्वर ओकरा खातिर गड्ढा खोद देलें। ईश्वर के सत्ता पर भरोसा करे के चाहीं। एह से तनाव कम होई। हर युग में एह दुनिया में अच्छा आ बुरा आदमी रहल बा। एह से समस्या त रही। हमेशा रही, अलग-अलग रूप में। ओकर असर रउरा तन आ मन पर कम से कम पड़े, ओकरा खातिर अपना के अंदर से मजबूत करे के पड़ी। साधना करे के पड़ी। फॉर्गेट एंड फॉर्गिव के फार्मूला अपनावहीं के पड़ी। अपना दिमाग के प्यार के कटोरा बनावे के पड़ी। ओह में नफरत टिकी ना। नफरत ना रही त अवसाद, विषाद आ टेंशन ना रही। एकरा खातिर मेडिटेशन, मेडिकेशन, योगा, काउंसिलिंग, पूजा-प्रार्थना जवन जरूरी होखे कइल जाय।

जिंदगी तोहफा ह। वरदान ह। एकरा के असमय मौत से बचावल जाय। मौत से बेहतर बा चीखल-चिल्लाइल, गरियावल चाहे जी भर के रोअल। दुख भा तनाव के आउटलेट चाहीं। आँख में लोर के सूखल एगो सैलाब के दावत दिहल ह। हमरा कविता ‘’ यादें और चुप्पियां’’ के एगो अंश बा –

यादें और चुप्पियाँ एक दुसरे के directly proportional होतीं हैं

चुप्पियाँ ..यादों के समन्दर में डुबोती चली जाती हैं

कहते हैं .. खामोशी और बोलती है …..echo भी करती है .

पगला देती है आदमी को …..

इसलिए शब्दों का और आंसुओं का बाहर निकलना बहुत जरुरी है.

दिमाग से कचड़ा बाहर निकाले के यत्न होखे। विध्वंस कवनो रास्ता ना ह। सम्राट अशोक विध्वंस भी कइलें आ प्रेम भी। .. बाद में प्रेमे के रास्ता अपनवलें। बेटो-बेटी के प्रेमे के राह धरवले। प्रेमे ईलाज बा नफरत के। प्रेमे ईलाज बा तनाव के। दिमाग के प्रेम के कटोरा बना लीं। सब ठीक हो जाई। …बाकी खातिर दुर्गा मईया बाड़ी नू। जय माता दी!

नवरात्रि के हार्दिक शुभकामना!

प्रणाम !

मनोज भावुक



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भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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