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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min660

मनुष्य के सबसे बड़ उपलब्धि बा कि ओकरा पास एगो विकसित दिमाग बा लेकिन साथ हीं सबसे बड़ परेशानियो के कारण इहे बा। दिमगवे नू तनाव के घर ह।

हाल हीं में भइल सर्वे के अनुसार दुनिया में 86 प्रतिशत लोग तनाव के शिकार बा। अपना देश भारत में त 89 प्रतिशत लोग ‘टेंशन’ में जीयsता। दुनिया में एतना नफरत फइलल कि तरह-तरह के बम आ मिसाइल बनल। प्यार आ मुहब्बत खातिर कुछ बनल कहाँ? प्यार के संदेश देवे वाला भा कोशिश करे वाला के त अक्सर जहर पियावल गइल।

कहे के मतलब कि दुनिया में ज्यादा डिस्ट्रक्टिवे लोग बा। दोसरा के परेशान, दुखी भा तनाव में देख के खुश होखे वाला लोग। एही से सिनेमो में अइसन दृश्य खूब देखावल जाला।

देश के भीतर जाति-धर्म-संप्रदाय-भाषा आदि के आधार पर जवन ग्रुप, गैंग आ खेमा बनल ओह में वैचारिक मतभेद मनभेद तक पहुंचल आ लोग एक-दुसरा के नीचा देखावे खातिर नीचता के स्तर पर उतरे लागल। राष्ट्र, मानवता आ समाज के हित के फिकिर छोड़ के सामने वाला के मान-मर्दन खातिर हुलेलेले में लाग गइल। एक-दुसरा के हौसला देवे के बजाय तनाव देवे में लाग गइल आ पूरा देश भा पूरा विश्व तनावग्रस्त हो गइल।

सवाल ई बा कि कवनों भी देश भा समाज जब एही सब में लागल रही त उ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आ सृजन पर कइसे फोकस करी?

विकास खातिर भा क्रियेशन खातिर एगो सकारात्मक माहौल जरूरी होला, तनावमुक्त मन जरूरी होला। इहाँ त तनाव हर आँगन भा शहरी फ्लैट के हर कमरा तक पहुँच गइल बा। ना यकीन होखे त कचहरी जाके डिवोर्स के केस देखीं। खेत के डंरार खातिर कपारफोरउअल आ मुकदमाबाजी देखीं। त ना पति-पत्नी में पटsता, ना सहोदर भाई में। समाज में त कुछ कुक्कुरन के गोल बनले बा जवन खाली निगेटिविटी फइलावे खातिर जनमल बाड़न स। आखिर हर 40 सेकेंड पर एगो आदमी आत्महत्या काहे करsता। ई हम नइखीं कहत, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के रिपोर्ट कहs ता। .. आ एह में ज्यादा नौजवाने लोग शामिल बा।

केहू के बेवक्त मूअल बहुत खतरनाक होला। ऊ अपना साथे परिवार में केतना लोग के मार देला, जिंदा लाश बना देला। एह से जहां तक संभव होखे, जइसे संभव होखे, अइसन मौत के रोके के कोशिश होखे के चाहीं। मित्र, परिवार अउर इंसानियत से भरल अन्य लोग भी अवसाद, विषाद, तनाव, निराशा आ पीड़ा में आकंठ डूबल लोग के साथे खड़ा होखे। ओकरा के अकेला मत छोड़े। ओकरा के समझा के, बुझा के, गला लगा के, बीच-बचाव क के, पंचायती क के, ओकरा साथे खड़ा होके, आर्थिक, मानसिक भा शारीरिक सहयोग क के ओकरा के बचावे, जिंदगी देवे। इहे मानवता ह।

राक्षसन के काम त दोसरा के तकलीफ में अट्टहास कइल ह। पीड़ित आदमी के भी एह सच्चाई के स्वीकार कर लेवे के चाहीं। एहू बात के पक्का यकीन होखे के चाहीं कि जे दोसरा खातिर गड्ढा खोदेला, ईश्वर ओकरा खातिर गड्ढा खोद देलें। ईश्वर के सत्ता पर भरोसा करे के चाहीं। एह से तनाव कम होई। हर युग में एह दुनिया में अच्छा आ बुरा आदमी रहल बा। एह से समस्या त रही। हमेशा रही, अलग-अलग रूप में। ओकर असर रउरा तन आ मन पर कम से कम पड़े, ओकरा खातिर अपना के अंदर से मजबूत करे के पड़ी। साधना करे के पड़ी। फॉर्गेट एंड फॉर्गिव के फार्मूला अपनावहीं के पड़ी। अपना दिमाग के प्यार के कटोरा बनावे के पड़ी। ओह में नफरत टिकी ना। नफरत ना रही त अवसाद, विषाद आ टेंशन ना रही। एकरा खातिर मेडिटेशन, मेडिकेशन, योगा, काउंसिलिंग, पूजा-प्रार्थना जवन जरूरी होखे कइल जाय।

जिंदगी तोहफा ह। वरदान ह। एकरा के असमय मौत से बचावल जाय। मौत से बेहतर बा चीखल-चिल्लाइल, गरियावल चाहे जी भर के रोअल। दुख भा तनाव के आउटलेट चाहीं। आँख में लोर के सूखल एगो सैलाब के दावत दिहल ह। हमरा कविता ‘’ यादें और चुप्पियां’’ के एगो अंश बा –

यादें और चुप्पियाँ एक दुसरे के directly proportional होतीं हैं

चुप्पियाँ ..यादों के समन्दर में डुबोती चली जाती हैं

कहते हैं .. खामोशी और बोलती है …..echo भी करती है .

पगला देती है आदमी को …..

इसलिए शब्दों का और आंसुओं का बाहर निकलना बहुत जरुरी है.

दिमाग से कचड़ा बाहर निकाले के यत्न होखे। विध्वंस कवनो रास्ता ना ह। सम्राट अशोक विध्वंस भी कइलें आ प्रेम भी। .. बाद में प्रेमे के रास्ता अपनवलें। बेटो-बेटी के प्रेमे के राह धरवले। प्रेमे ईलाज बा नफरत के। प्रेमे ईलाज बा तनाव के। दिमाग के प्रेम के कटोरा बना लीं। सब ठीक हो जाई। …बाकी खातिर दुर्गा मईया बाड़ी नू। जय माता दी!

नवरात्रि के हार्दिक शुभकामना!

प्रणाम !

मनोज भावुक


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1720

मनोज भावुक     

एगो गुलाम आदमी बाहरे से ना, भीतरो से गुलाम होला काहे कि ओकरा मन के भा मन से कुछुओ त होला ना। बलुक साँच कहीं त ओकर मन ओकर रहबे ना करेला। ओकरा त दोसरा के हिसाब से चले के पड़ेला।

… ठीक ओइसहीं नफरत आ कुंठा भरल मन के हालत होला। नफरत अपना हिसाब से आदमी के चलावेला। प्रेम में मन क्रिएटिव होला…कंस्ट्रक्टिव होला। नफरत में डिस्ट्रक्टिव।

आजादी के मूल में प्रेम बा। देश से प्रेमे रहे कि देश आजाद भइल। फेर से प्रेम पैदा कइल जाय। प्रेम रही त देश सुरक्षित रही। देश प्रगति करी। ना त जाति-पाति, धर्म-सम्प्रदाय, पार्टी-पउआ के दीवार पर नफरत के आग में देश धधकते बा।

प्रेम मानवीय गुण ह। नफरत दानवीय। प्रेम से भरल आदमी दोसरा के ह्रदय परिवर्तन क सकेला। नफरत से भरल आदमी नफरते पैदा करी। जहाँ नफरत रही, उहाँ आजादी रहिये नइखे सकत।

असली आजादी ह अपना के नफरत से मुक्त कइल। असली आजादी ह अपना के निगेटिविटी से मुक्त कइल। काहे कि जवना मन में ई सब रही उ मन उन्मुक्त कइसे रही? आज़ाद कइसे रही? उ त रात-दिन इर्ष्या, द्वेष, साजिश, सियासत आ नकारात्मकता के गुलामी के जंजीर में जकड़ल रही। उ जहाँ रही दुर्गंध फइलाई, जहर बोयी त जाहिर बा कि उहाँ खाली तनाव आ अशांतिये रही।

असली आजादी ह अमन हासिल कइल। अमन मन में। अमन समाज में। अमन देश में। जवना घर में दिन रात लड़ाई-झगड़ा होला, कुकुराहट होला, उ घर बर्बाद हो जाला। उहाँ कवनो क्रिएटिव काम होइए ना पावे। सभकर दिमाग दोल्हा-पाती में लागल रहेला।

वैचारिक मतभेद संभव बा बाकिर मतभेद के मतलब इर्ष्या, द्वेष, साजिश, लड़ाई ना ह। मतभेद के उदेश्य अल्टरनेटिव के सुझाव ह। विपक्ष के भूमिका सरकार के विरोधे कइल ना ह, बलुक देश के बेहतरी खातिर सरकार के सही निर्णय में साथो दीहल ह।

दरअसल, जेकरा अंदर दया, करुणा आ प्रेम के भाव ना होई, ओकरा ई कुल्ही बुझइबे ना करी। माता-पिता भी कई गो बिंदु पर, कई गो बात पर अपना संतान के विरोध करेलें बाकिर उ विरोध बेहतरी खातिर होला। बात बस अतने बा। एही भाव के समझे के बा। जेल भी सुधार खातिर बनल। कोर्ट भी दूनू पक्ष के बात निष्पक्ष होके सुने आ न्याय करे खातिर बनल बाकिर जहाँ-जहाँ करप्शन घूस गइल, उहाँ से नैतिकता गायब हो गइल आ साथ हीं असल आजादी ख़तम हो गइल।

अब देश जाति-पाति, गोल-गुट आ कई गो खेमा में बंट के विरोध करे खातिर विरोध करता। एह में सच्चा आदमी अकेला पड़ जाता। झूठा भा लबरा झूठ के भी अइसे आ एतना गावत बाड़न स कि लोग के झुठवे साँच लागे लागत बा। इहे खतरनाक बा।

दरअसल, आदमी के अंदर आदमीयत ना रही, दया, करुणा आ प्रेम के भाव ना रही त एही तरह के विरोध होई। विरोध करे खातिर विरोध। अइसना में चलनियो हँसेला सूप के जेकरा में सहत्तर गो छेद।

स्वार्थ, नफरत आ अहंकार के चलते देश आ समाज में उथल-पुथल बा। आजाद देश में आम आदमी घुटन महसूस करता। प्रेम, सौहार्द आ मानवता के संचार क के देश के हर नागरिक के आजादी के एहसास करावल जा सकता। प्रेम अंगुलीमाल के बदल देलस। डाकू रत्नाकर के महर्षि बाल्मीकि बना देलस। प्रेम में ह्रदय परिवर्तन के ताकत होला। जेकरा के आपन समझल जाई, ओकरा से प्रेम होखबे करी। कम से कम अपना-अपना ईगो के खोल से बहरी निकल के देश के हर नागरिक के आपन समझल जाय। असल आजादी इहे बा।

प्रणाम।


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1550

मनोज भावुक

अपना समय के बात, करेंट अफेयर्स आ  देश-विदेश आ समाज के तत्कालिक स्थिति पर बोलल आ विमर्श कइल पत्रकारिता के प्रधान धर्म ह।

हालाँकि “भोजपुरी जंक्शन” भोजपुरी साहित्य, सिनेमा, संगीत, राजनीति आ तीज-त्यौहार के समेटत, परंपरा आ आधुनिकता के समन्वय के नाम ह, एकर अधिकांश अंक विशेषांक के रूप में प्रकाशित भइल बा, तेहू पर हरेक अंक में एगो अनिवार्य स्तंभ देश के दशा-दिशा पर मुखर होके बोलत-बतियावत रहल बा, समय के राग सुनावत रहल बा। एह स्तंभ के नाम बा- सुनीं सभे आ लेखक बानी वरिष्ठ पत्रकार, पूर्व राज्य सभा सांसद आ एह पत्रिका के प्रधान संपादक श्री रवींद्र किशोर सिन्हा।

एही महीना में 22 सितंबर के सिन्हा जी के जन्मदिन बा त भोजपुरी जंक्शन परिवार ई तय कइलस कि काहे ना भोजपुरी जंक्शन के हर अंक में बिखरल अपना समय के दस्तावेज ” सुनीं सभे” के संग्रह करके एगो विशेषांक के रूप दे दिहल जाय। त लीं, “सुनीं सभे विशेषांक” सुनीं सभे, गुनीं सभे आ अपना बहुमूल्य सुझाव से अवगत कराईं सभे।

भोजपुरी में कविता, कहानी, नाटक आदि के संग्रह ढेर बा। जहाँ तक हमरा जानकारी बा, करेंट अफेयर्स पर भी लिखात रहल बा बाकिर उ संग्रह के रूप में नइखे आइल या बहुत कम आइल बा। एह लिहाज से ई संग्रह भोजपुरी के रचना संसार के समृद्ध करी आ एगो नया आयाम दी।

एह अंक के साथे भोजपुरी जंक्शन दुसरका साल में प्रवेश करsता। भोजपुरी जंक्शन के ई पचीसवां अंक ह। एकरा पहिले “हम भोजपुरिआ” के चौदह गो अंक निकल चुकल बा। एह सब अंक में से अधिकांश विशेषांके बा, जइसे कि महात्मा गाँधी विशेषांक, वसंत अंक, फगुआ अंक, चइता अंक, वीर कुँवर सिंह अंक, लोक में राम अंक, कोरोना विशेषांक, कोरोना कवितावली, चीन अंक, दशहरा अंक, छठ विशेषांक, गिरमिटिया अंक, रजिंदर बाबू अंक, किसान अंक, नया साल अंक, माई-बाबूजी विशेषांक, माई-बाबूजी कवितावली आ देशभक्ति अंक आदि।

एह सब अंक में “सुनीं सभे” अनिवार्य रूप से शामिल बा। इहाँ तक कि विशेषांक के विषय चाहे जे होखे, “सुनीं सभे” ओकरा से इतर देश आ समाज के वर्तमान स्थिति पर बात करत रहल बा। इहे एह स्तंभ के खासियत बा, खुशबू बा, अनोखापन बा।

‘’ सुनीं सभे ‘’ के लेखक श्री रवींद्र किशोर सिन्हा के पत्रकारिता के मूलाधार राष्ट्रीयता के भाव बा; जवना के गूँज-अनुगूँज एह विशेषांक में संकलित सब लेख में सुनाई पड़sता। एह संग्रह में संकलित सब लेख अपना-अपना समय के कहानी कहत बा। ‘’ सुनीं सभे ‘’ वाकई ध्यान से सुने लायक बा काहे कि ओह में देश आ समाज खातिर खाली चिन्ते नइखे, चिंता से मुक्ति के उपायो बतावल गइल बा। समस्या के समाधान भी सुझावल गइल बा।

एह से, एह स्तंभ के सब आलेख के संग्रह के रूप में परोसत अपार खुशी हो रहल बा। उम्मीद बा, अपने सभे के स्नेह-दुलार मिली।

अंत में, ‘’ सुनीं सभे ‘’ के लेखक सिन्हा जी के जन्मदिन के मंगलकामना।

प्रणाम।


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Hum BhojpuriaAugust 17, 20211min3020

माई-बाबूजी पॉवर हाउस होला लोग आ बेटा-बेटी ट्यूबलाइट। पॉवर हाउस से डिसकनेक्ट होके केहू अँजोर कइसे कर सकेला? लेकिन आजकल ई डिसकनेक्शन खूब देखे के मिलsता।

आखिर एह खून के रिश्ता में ई कइसन कसर बाटे। कादो, औलाद खातिर माई धरती हई आ बाबूजी आकाश। त का सांस्कृतिक प्रदूषण के असर एह धरती-आकाश पर भी पड़ल बा ?  … एह धरती-आकाश के गोदी में पलल-बढ़ल अपडेटेड, एडवांस, डेवलप्ड बबुआ-बबुनी खातिर आपन एगो शेर से बात आगे बढ़ावत बानी-

नेटे प देख लिहलस माई के काम-किरिया / बबुआ बा व्यस्त एतना, लंदन से आ न पाइल

संवेदनहीन काल-खंड में माता-पिता के प्रति संवेदना जगावे खातिर फादर्स डे आ  मदर्स डे मनावल जाला।

हर साल मई महीना के दुसरका रविवार के मदर्स डे आ जून महीना के तिसरका रविवार के फादर्स डे मनावल जाला। अब इतिहास खोजब त दुनों के अलग-अलग इतिहास बा बाकिर, एक लाइन में जबाब खोजब त जबाब बा कि  माई-बाप के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करे खातिर ई डे मनावल जाला।

हम पटना, दिल्ली, बम्बे, लंदन, आरा, बलिया  आ छपरा, सगरो के पैरेंटिंग आ चाइल्डहुड देखले बानी। आजकल कई जगे मोह-ममता आईसीयू में लउकत बा आ माई-बाबूजी के प्रति सम्मान खाली फेसबुक प। कई जगे त माई-बाप सबसे अधिक परेशान अपना औलाद से बाड़े आ औलाद के सबसे अधिक शिकायत अपना माइये-बाप से बा।

… आ एही सब शिकवा-शिकायत के बीच ई जवन फादर्स डे, मदर्स डे, वीमेंस डे, वैलेंटाइन्स डे आ फ्रेंडशिप डे बनल बा… उ बनल बा सोचे खातिर। हँ, ठहर के सोचें खातिर। उ खाली विश करे, कार्ड आ बुके देवे भा उत्सव मनावे खातिर नइखे बनल।

फादर्स डे आ मदर्स डे माई-बाबूजी आ बेटा-बेटी के आतंरिक संबंध पर सोच-विचार करे खातिर बनल बा। बइठ के सोचीं;  सोचीं तनी ठहर के कि का राउर माई-बाबूजी रउरा से खुश बा लोग !  रउरा प नाज़ करेला लोग ! ना करेला लोग त काहे ?  रउरा अपना माई-बाबूजी से खुश बानी?  कवनो बात के खीस त नइखे? बा त काहे ? खाली ‘’ हैप्पी फादर्स डे पापा ‘’ आ ‘’ हैप्पी मदर्स डे मम्मी ‘’ खातिर ई दिन त बनले नइखे। बनल बा कि जवन हैप्पी नइखे ओकरा के हैप्पी बनावल जाय। बाकिर खाली हैप्पी कहला से कुछुओ हैप्पी होला ना। ओकरा खातिर अपना कर्म से, व्यवहार से, वाणी से आ बुद्धि से कोशिश करे के पड़ेला।

हो सकेला कि अज्ञानता भा ओह क्षेत्र में अनुभवहीनता के चलते माई-बाबूजी के कवनो गलत निर्णय से रउरा जिंदगी में कष्ट भइल होखे मगर ई बात त सभे मानीं कि कवनो पेरेंट्स के इंटेंशन अपना बेटा-बेटी के प्रति ख़राब ना होला।

अच्छा-बुरा, कम-बेस, आगे-पीछे सबके बावजूद हमनी के भीतर जवन चेतना आ  विवेक बा, ज्ञानेन्द्रिय काम करत बाड़ी सन,  हमनी के  दुनिया के सब लीला देखत-बूझत-समझत बानी सन, ओकरा खातिर अपना माई-बाबूजी के धन्यवाद करे के चाहीं कि ना? आखिर ई जिंदगी त ओही लोग के दीहल ह आ जिंदगी के बदले कुछुओ दीहल कमे होई।

टेलीविजन के लोकप्रिय सिरियल रामानंद सागर कृत रामायण में राम लक्ष्मण से कहत बाड़े, ‘’ यदि किसी का पिता दुराचारी भी हो, चाहे संसार उसे त्याग भी दे, तो भी पुत्र का धर्म है कि वो अपने पिता को भगवान की तरह पूजे क्योंकि पिता मनुष्य का प्राणदाता होता है लक्ष्मण! जो पिता की भक्ति नहीं करते, देवता तो क्या, स्वयं भगवान भी उनकी पूजा को स्वीकार नहीं करता।‘’    

एह से अपना जन्मदाता के श्रवण कुमार बनीं भा मत बनीं, एतना त लाज-लिहाज रखीं कि कवनो महतारी-बाप के ई ना कहे के पड़े कि काश ! ई पैदा होखे के पहिलहीं मर गइल रहित।

संतान अपना माई-बाप के स्वाभिमान बने, एही शुभकामना के साथ- प्रणाम !

 


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Hum BhojpuriaJuly 8, 20211min3710

संपादक- मनोज भावुक

विचार से बढ़ के ताकतवर दुनिया में कुछु नइखे। मन में जब जइसन विचार चलेला, देह आ चेहरा के हाव-भाव ओइसने हो जाला। विचार में सुख के दुःख आ दुःख के सुख में बदले के ताकत बा। महत्वपूर्ण ई बा कि हम कवनो घटना के कइसे देखत बानी। देखे के ताकत आँख में ना, विचार में होला। आँख त बस एगो कैमरा ह। असल चीज त मनवे बा। मन विचार के कारखाना ह।

मन कइसन बनी, ई बहुत कुछ माई-बाप पर भी निर्भर करेला। माई-बाप के पहिला गुरु कहल जाला। कुम्हार कहल जाला। संतान त माटी ह, जवना के सान के माई-बाप रूपी कुम्हार मुकम्मल शेप देला, मतलब लइकन के आदमी बनावेला। एगो बात दिल से कहsतानी। एह के रउरो मानब। केतनो बाउर माई-बाप होखे, क्रिमिनले काहें ना होखे, उहो ना चाही जे ओकर औलाद बुरा होखे। उहो चाहेला कि ओकर बेटा-बेटी इंसान बने।

बाकी परवरिश आ परिवेश दूनो के असर होला। माई-बाप के डीएनए त रहबे करेला। ओह गुणसूत्र से गुण-दोष त अइबे करेला। एही से नू औलाद के माई-बाप के छाया भा प्रतिरूप कहल जाला।

माई-बाप प लिखल आसान ना होला। जे रउरा के लिखले बा, ओकरा प रउरा का लिखब जी ? ओकरा के शब्द में कइसे बान्हब ? हं ! अपना जिंदगी के ओह लेखक खातिर संवेदना के चार गो शब्द समर्पित कर सकीले। एह अंक में उहे चार गो शब्द उकेरे के कोशिश कइल गइल बा। बाकिर ई कोशिश भी पानी प पानी लिखे के कोशिश जइसन बा।

‘’ माई-बाबूजी विशेषांक ‘’ के संपादन के दौरान केतना बार हमार आँख लोराइल बा, कह नइखीं सकत। एह अंक में किसिम-किसिम के दुनिया समाइल बा। दुःख के दरियाव बा। सुख के समुन्दर बा। हम केतना पंवड़ी ? कई बार त लागल कि डूब गइनी।

कुछ विद्वान लोग माई-बाबूजी के भगवान के प्रतिनिधि कहले बा। कहले बा कि चूँकि ईश्वर हर जगह नइखन पहुँच सकत, एह से उ माई-बाप के गढ़ले। कुछ लोग त इहाँ तक कहले बा कि का जाने भगवान होलें कि ना होलें, दुःख सुनेलें कि ना सुनेलें बाकिर माई-बाबूजी त बेकहले दुःख बूझ जालें आ छटपटा के, बेचैन होके, अपना के खपा-मिटा के भी अपना बाल-बच्चा के मदद करेलें। त माइये-बाबूजी नू साक्षात भगवान बाड़ें।

हमार कहनाम बा कि माई-बाबूजी अच्छा-बुरा हो सकेलें। उहो इंसाने हउअन। सरधा से ओह लोग के भगवान भले कह दीं भा मान लीं बाकिर ई साँच बा कि उ लोग भगवान ना ह। त अगर ओह लोग से कवनो भूल हो जाय त दिल बड़ा क के भुला जाये के चाहीं। इंसान से भूल होला। होखे के त भगवानो से होला। बाकिर केहू के आदर्श भा भगवान मनला प भूल के पचावल तनी कठिन होला, एह से आदमी के आदमिये मानल ठीक होई। रउरा अपना माई-बाबूजी के सरधा से भगवान मानीं भा पूजीं, एह में कवनो दिक्कत नइखे। आसिरबादे मिली। बाकी अंधभक्त मत बनीं। अंधभक्त त केहू के बनल ठीक ना ह। चेतना के द्वार हरदम खुला रहे के चाहीं। हमनी के शास्त्र में लिखल बा –

सुशीलो मातृपुण्येन, पितृपुण्येन चातुरः ।

औदार्यं वंशपुण्येन, आत्मपुण्येन भाग्यवान ।।

अर्थात- कवनों भी इंसान अपना माता के पुण्य से सुशील होला। पिता के पुण्य से चतुर होला। वंश के पुण्य से उदार होला आ अपना स्वयं के पुण्य से उ भाग्यवान बनेला।

त सौभाग्य प्राप्ति खातिर सत्कर्म त करहीं के पड़ी !

संतान के कर्म अइसन होखे कि माई-बाबूजी लोग ओकरा प गर्व करे आ दिल से दुआ देव अउर  माइयो-बाबूजी लोग अइसन होखे कि संतान उनका के आपन आदर्श माने आ पूजे खातिर बाध्य हो जाय, एही कामना के साथ -प्रणाम !


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Hum BhojpuriaJune 11, 20211min2630

संपादक- मनोज भावुक

टीवी पर रात-दिन एगो ऐड आवsता, जे, मैंने अपने बच्चे को कोचिंग से निकालकर सोचिंग में डाल दिया है। खैर, ओह ऐड के संदर्भ दोसर बा बाकिर व्यापक फलक पर देखला पर ई बहुत कुछ सोचे-समझे खातिर मजबूर कs रहल बा।

एह कोरोने काल के देख लीहीं। लोग अपना राजनीतिक पार्टी, सम्प्रदाय, क्षेत्र, देश, परिवेश भा संस्थान से प्रत्यक्ष भा परोक्ष रुप से जवन ट्रेनिंग (कोचिंग) लेता, ओकरे हिसाब से स्टेटमेंट देता। व्यवहार करता। कोचिंग के ज्ञान भा पूर्वाग्रह से ऊपर उठ के सोचिंग के एक्सट्रीम पर उ जाते नइखे। ओशो के एगो किताब ‘’ नये भारत की ओर ‘’ में हम पढ़ले रहनीं जे, ” जिंदगी रटे हुए उत्तर नहीं चाहती। जिंदगी चाहती है विचारपूर्ण चेतना..”

कोचिंग भा स्कूल भा कॉलेज त एही खातिर बनले होला, जे आदमी सोचे के सीखे। ज्ञान त रॉ मटेरियल हs सोच खातिर। सोच के संबंध सिचुएशन से बा। सिचुएशन के हिसाब से सोचे के पड़ी।

कोरोना काल में सबसे जरूरी का बा ? जान बचावल। अपने ना, दोसरो के। जान बचावे खातिर सबसे जरूरी का बा ? अपना पार्टी-पउआ, संप्रदाय आ क्षेत्र के कोचिंग से बहरी निकल के सोचिंग में घूसल। जहवाँ आदमियत पर फोकस ढेर होखे। बाकिर लोग लाशो प सियासत कs रहल बा। मरणासन्न लोगन के परिवारन के मजबूर क के आपन तिजोरी भर रहल बा। दवा आ जीवन रक्षक सामान के कालाबाजारी कs रहल बा। आ ई सब करे वाला मनई कवनो अनपढ़ नइखन। ई लोग कोचिंग कइले बा। बाकिर एह लोगन के कोचिंग के ज्ञान सोचिंग ले जाते नइखे। गइल रहित त इहो लउकित कि ई रस्ता ओह लोगन के कहवाँ ले ले जाई। कर्म के अंतिम परिणामओ लउकित। माल आ मलाई के चक्कर में ई लोग राछछ बनल बा।

कोरोना काल में कालाबाजारी, जमाखोरी, ऑनलाइन ठगी आ हॉस्पिटल के मनमाना बिल से मिलल लग्जरी लाइफ एह लोग के सकून ना छीनत होई ?  इ सब ज्ञानी लोग हs। कोचिंग कइल लोग हs।

एने तीन दशक में कोचिंगे त बढ़ल बा। हर चीजवे के कोचिंग बा। हँसे के कोचिंग। रोवे के कोचिंग। नाचे के कोचिंग।. फिटनेस के कोचिंग। करियर के कोचिंग। पर्सनालिटी-डेवलपमेंट के कोचिंग। चले तक के लूर-ढङ सिखावे के कोचिंग। अतने ना, कोचिंग करावे के कोचिंग ! … दू का, दू का, दू का !

पढाई-लिखाई, फिटनेस, पर्सनालिटी-डेवलपमेंट आ करियर सबके कोचिंग-काउन्सिलिंग खुल गइल, बाकिर आदमी के आदमी बनावे वाली ब्रम्हचर्य आश्रम में जवन पढ़ाई-लिखाई होत रहे, ऊ गायब हो गइल। प्रोफेशनल प प्रोफेशनल कोर्स बढ़त गइल, ओकर कोचिंग बढ़त रहल। बाकिर आदमी आदमी से मशीन बन गइल। पइसा कमाए वाली मशीन। ऊ कोचिंग क के कमाता। पइसा कमाए का फेरा में ऊ पूरा बाई के बेग में धउर रहल बा। पेड़ कटाता। कंकरीट के जंगल में फ्लैट बुक होता। गला काट प्रतियोगिता क के करोड़न के कार किनातिया। करोड़न के डेस्टिनेशन-मैरीज होता। जेकरा लगे करोड़ नइखे उ करोड़ के चिंता में मुअsता। बाकिर, केहू के ई होश नइखे जे ई सब जिनगी खातिर संजीवनी तत्त्व ऑक्सीजन आ शुद्ध भोजन के कीमत प हो रहल बा। ई सभ सुख अछइत सुख नइखे। त तड़पीं ऑक्सीजन खातिर। पीहीं केमिकल वाला दूध। खाईं सुई घोंपल घेंवड़ा आ लउकी।

कोचिंग से जिनगी ना सुधरी ए चनेसर! … सोचिंग से सुधरी। अच्छा आहार तन खातिर आ अच्छा विचार मन खातिर सबसे जरुरी बा. .. आ तन-मन ठीक रही त कोचिंग के रस्ता सोचिंग ले जाई। तब आदमी आदमियत के साथे जिन्दा रही। बिना सोचिंग के कोचिंग त मानवता के दुश्मन, क्रिमिनल आ देशद्रोही पैदा करेला।

कोचिंग आ सोचिंग में कुछ मूलभूत फरक बा, ई समझे के जरुरत बा।

कोचिंग में दोसरा प निर्भर रहल जाला। जबकि सोचिंग आत्म निर्भर, आत्म मंथन आ  आत्मचिंतन के प्रकिया हs। सोचिंग ज्ञान के तत्त्व मन में बइठावल ह। जबकि कोचिंग बेबुझले-समझले सोझे रट्टा मारल हs।

कोचिंग के ज्ञान से धनओ कमाके मनई सुखले रहेला। जबकि सोचिंग के प्रकिया से आदमी कम रहलो में खुश रहेला। कोचिंग असंतोष बढावेला। सोचिंग संतोष देला।  ‘आत्म दीपो भवः’ के भाव जगावेला।

एही से कहsतानी, जे लइकन के कोचिंग में डाले से पहिले सोचिंग में डालीं। विचारपूर्ण चेतना आ मानवीय मूल्यन से भरल पूरल अदमिये एह धरती के बचइहें। मशीनी आदमी त विनाशे करी।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया… ईश्वर सबका के निरोग राखस…


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Hum BhojpuriaJune 1, 20211min3830

संपादक- मनोज भावुक

कोरोना पॉजिटिव होके कोरोना प लिखल आसान ना होला। हँथवा काँपे लागेला। काँपतो बा। लैपटपवा प बइठत बानीं आ लिखे खातिर जोर मारत बानीं त आँखी के सोझा अइसन केतना चेहरा नाँच जाता जे आज से दस दिन पहिले ले सङे हँसत-बोलत-बतियावत रहे आ आज ओह में से केहू के अस्थि विसर्जित कइल जाता, केहू के लाश गंगा जी में दहsता त केहू के लाश श्मशान घाट प अपना बारी के इन्तजार में बा। जीव धक्क दे हो जा रहल बा। आँख लोरा जाता। शब्द धुँआये लागsता। दिमाग सुन्न हो जा रहल बा। घंटन लैपटॉप के सोझा बइठल रहला के बादो कुछ लिखात नइखे।

दोसरा हाथ में मोबाइल बा। फेसबुक से भागल रहनी हँ। फेर फेसबुक प आ गइनीं। शुभचिंतक लोग मना करsता। बाकिर मन मानत नइखे। दोहरियाइ के आवे के पड़sता। शुतुर्मुग लेखा मुँह फेर लिहला से त होई ना। अपना खातिर भा दोसरा खातिर मददओ एहिजे माँगे के बा। कुछ लोग योद्धा जइसन दिन-रात मदद में त कुछ लोग गिद्ध जइसन नोंचे में लागल बा।

कुछ लोग बेमारी से ठीक होखे खातिर फेसबुक पर एक-दोसरा के शुभकामना देता। प्रार्थना आ दुआ में असर होला, करहीं के चाहीं। बाकिर जे सामर्थ्यवान बा ओकरा अपना हीत-मीत से इहो पूछ लेवे के चाहीं, जे, काहो दवा-बीरो आ टेस्ट आदि खातिर रूपया-पइसा बा नू ? काम धंधा चलsता नू ? नोकरी बाँचल बा नू ? पइसा के कमवा त पइसे से नू होई, ए चनेसर।

साल 2019 में चीन में पैदा भइल ई कोरोना वायरस सउँसे दुनिया के हिला देले बा। काम धंधा, व्यापार, बाजार सभ रुक गइल बा। मध्यम वर्ग के बहुलता वाला भारत अब रोटियो खातिर तरसे लागल बा। इ कोरोना जवन सउँसे साल बीस लील लिहलस, एकइसओ प आपन दाँत गड़वले बा।

शहर त शहर गाँवहूँ में ई बेमारी अबकी फइलल जाता। अपने घर वाला अपना आदमी के अर्थी नइखे छूअत। एह डरे जे ओकरो कोरोना मत हो जाव। प्रशासन के गुहार लगावे के पड़sता जे लाशन के अंतिम संस्कार के व्यवस्था कइल जाय। मुर्दा देहि के जवन गंजन हो रहल बा, न्यूज आ सोशल मीडिया पर ई कूल्हि देखि के दिल दहल जाता। ई कोरोना कौ सदियन में मानवता प आइल सबले बड़ त्रासदी बन के सोझा ठाढ़ बा।

बाकिर, ईहो ओतने साँच बा, जे अब कोरोना के वैक्सीन आ गइल बा। एकर सकारात्मक असरओ  लउक रहल बा। कोरोना के इलाज खातिर नया-नया दवाई खोजा रहल बा। ऑक्सीजन के किल्लत से मर रहल लोगन खातिर ऑक्सीजन के नया-नया प्लांट खुल रहल बा। विदेशन से मदद मिल रहल बा। त एह हिसाब से हमनियो के सकारात्मक रहे के चाहीं। ढेर छरिअइला से बेचैनिये नू बढ़ी। हँ, ऑक्सीजन आ इलाज के कमी से लाखन लोगन के जान गइल बा, ई तोपे जोग नइखे। कुछ लोग दवाई, ऑक्सीजन, एम्बुलेंस के कालाबाजारी में लागल बा। कुछ लोग दवाई आ उपकरण के मुहैया करावे के नाँव प ऑनलाइन ठगी क रहल बा। जबकि ई सभ के मालूम बा जे ई महापाप हs। सियासी खेला जवन बा तवन अलगे बा। हमरा आपन लिखल कुछ शेर ईयाद पड़sता –


अर्थी के साथ बाज रहल धुन बिआह के
अब एह अनेति पर केहू कहँवाँ सिहात बा

संवेदना के लाश प कुर्सी के गोड़ बा
मालूम ना, ई लोग का कइसे सहात बा

उ अदिमिये कइसन जेकरा में दया, प्रेम, करुणा आ  ममत्व के भाव ना होखे। मनुष्यता के त इहे सब पहचान हs। जेकरा में से इ सब गायब होला, उ अपराधी बन जाला। त का ई कोरोना काल आदमी के आदमी बना सकी ?

लोग कहsता जे कोरोना के तिसरको लहर आवे वाला बिया। जब ले कोरोना के समूल नाश ना होई, तले ई रक्तबीज बन के उगत रही। एही से हमनियो के माँ चंडी जइसन एकर विनाश करे खातिर एक सङे मिल के, एक दोसरा के सहयोग से, अपना अंदर के मनुष्यता के जीवित राखत उ सब करे के पड़ी जवन एकर नाश खातिर जरुरी बा।

कोरोना काल खातिर लिखल अपना संकल्प गीत से बात खतम कइल चाहबि –

नेह-नाता के ऑक्सीजन से 

मन के इम्यून के बढ़ावे के

जंग जीते के बा कोरोना से 

एही संकल्प के गोहरावे के

दुख त चारो तरफ पसरले बा

सुख के कुछ गीत अब कढ़ावे के

यार जहिया ले सांस साथे बा 

जिंदगानी के गीत गावे के


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Hum BhojpuriaMay 19, 20211min4860

संपादक- मनोज भावुक

शादी के सालगिरह पर अपना पत्नी के मुस्कुरात तस्वीर के साथे केहू पोस्ट डलले बा कि – ‘’ तुम्हारी मुस्कुराहट मेरे लिए ऑक्सीजन है और तुम वैक्सीन। सदा खुश रहना और साथ रहना। ‘’

चारो तरफ कोरोना के तांडव चलsता। सोशल मिडिया श्मशान घाट बनल बा। सगरो चीख-चिल्लाहट, रोना-रोहट, दहशत आ घबड़ाहट बा। अइसना में परिवार के साथ-सहयोग सबसे बड़ संबल बा। अब रउरा परिवार के दायरा केतना बड़ बा, ई त रउरा प निर्भर बा। मनुष्य जाति भी त एगो परिवारे ह। जहाँ तकले सँपरे निभावे के चाहीं।

1944 के आसपास बिहार में मलेरिया अउर हैजा महामारी के रूप में फइलल रहे। ओहू समय अइसने लाश के ढेर लागल रहे। आजेकल के तरह मउवत के डर आ  भय से लोग काँपत रहे। तब फणीश्वर नाथ रेणु के कहानी पहलवान की ढोलक के हीरो लुट्टन पहलवान ढोलक बजा-बजा के लोग में जिनिगी के प्रति भरोसा जगवलें।

गीत-संगीत स्ट्रेस बूस्टर ह। चिंता निवारक औषधि ह। एही भावना से एह कोरोना काल में ई चइता अंक रउरा के सउंपत बानी। ई चइता अंक कोरोना काल के एकांतवास में राउर जायका बदली, डर आ दहशत से दूर रख के राउर मनोरंजन करी आ हो सकेला कि लुट्टन पहलवान जइसन जिनिगी के प्रति भरोसो जगावे।

एह अंक में 35 गो कवियन के चइता-चइती संकलित बा। साथ हीं चइता-चइती के शास्त्रीयता अउर सिनेमा में ओकरा सौन्दर्य पर आलेख बा। दुनिया के सबसे बड़ नायक भगवान राम भी हिम्मत आ हौसला बढ़ावे खातिर एह अंक में बाड़े काहे कि चइते में उनकर जनम भइल रहे। रामजी के जनमे प केतना चइता बा।

एह संकलन के अधिकांश चइता वियोग श्रृंगार बा, पिया के पास ना रहला के पीड़ा आ ताना से भरल-

रतिया भइल बा नगीनिया हो रामा,  पिया घर नाहीं / तनिको ना सोहेला गहनवा हो रामा, पिया परदेसी / चुड़िया गिनत बीते रतिया हो रामा, पियवा ना अइलें / अगिया लगावे कोयलिया, हो रामा, अइलें ना सांवरिया

कवि भालचंद त्रिपाठी जी के नायिका के त पति के आगमन के सपना आवsता आ अचके नीन खुलला पर देखsतारी कि नाक के नथुनिया त तकिया में फँसल बा। ओही तरे शैल पाण्डेय शैल जी के नायिका पति के ना अइला का खीसी कोयल के सहकल छोड़ावे के बात करत बाड़ी।

गया शंकर प्रेमी जी के चइता में हास्य-व्यंग्य के रंग बा। इहाँ कोयलिया ठीक भिनुसहरे जरला पर नून दरत बिया। आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ के रचना में ननद-भौजाई के नोंक-झोंक के साथे भौजाई के महुआ बीने के ट्रेडिशन आ ननद के व्हाट्सएप चलावे के मॉडर्न अप्रोच देखे के मिलता।

चइता के चुनावी रंग भी बा- पहिले त सुध मुंह, पियवा ना बोले / महिला कोटा होते आगा पाछा डोले

/ बेरी-बेरी कहें दिलजनिया ए रामा, छुटली चुहनिया / पियवा के चाहीं परधानिया ए रामा, छुटली चुहनिया

सब कुछ के बावजूद वर्तमान से कटल कहाँ संभव बा। मन के कतनो भुलवाईं, कोरोना आँख का सोझा आके खड़ा होइये जाता। कई गो चइता में कोरोना समाइल बा आ जीव डेराइल बा त ओह में प्रार्थना बा, सलाह बा, चेतावनी बा आ चिंता बा।

एही चिंता के बीचे बलिया के कवि शशि प्रेमदेव जी के चइता बा- हम काटब गेहूं, गोरी कटिहs तूं मुसुकी ! / कटनी के काम आगा हाली-हाली घुसुकी !

भाई हो, काम के साथे-साथ जीवन में एही मुस्की के जरुरत बा। इहे ऑक्सीजन ह।  

जे ना चेती ओकरा खातिर डॉ. अशोक द्विवेदी जी त जिनिगी के सच्चाई कहते बानी- गते-गते दिनवा ओराइल हो रामा, रस ना बुझाइल

कोरोना काल में ई चइती फुहार अगर रउरा सब के तनिको आराम देता, होठ प मुस्की आ हियरा में हौसला देता त हमनी के कइलका सुकलान हो जाई। ईश्वर से प्रार्थना बा कि सबकर साँस बनल रहे, आस बनल रहे, साहस बनल रहे, सकून कायम होखे आ मन के अँगना में चइता गूँजत रहे।

जे-जे साथ छोड़ के हमेशा खातिर चल गइल ओकरा प्रति लोरभरल श्रद्धांजलि।


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Hum BhojpuriaApril 19, 20211min7370

संपादक- मनोज भावुक

परसाल होली पनछुछुर रहे काहे कि भारत में कोरोना वायरस के मामला रफ़्तार पकड़ल शुरू क देले रहे। लोग डेराइल शुरू क देले रहे।  ओकरा बाद स्कूल-कॉलेज बंद भइल, अंतरराष्ट्रीय उड़ान पर रोक लागल आ ओकरा बाद त मिललो-जुलला प रोक लाग गइल। लाग गइल लॉकडाउन आ सोशल एनीमल सोशल डिस्टेंसिंग के पालन करे लागल।

केतना राउंड के लॉकडाउन से गुजरत साल गुजरल। नया साल लागते कोरोना के टीका आइल। ख़ुशी के लहर दउड़ल कि मिल गइल संजीवनी बूटी। मिल गइल कवच-कुण्डल। बाकिर, आहि दादा.. कादो, कोरोना के दूसरा लहर चल देले बा। आ गइल बा। होली आवते फेरु आ गइल। कोरोनवा के का जाने होली से कवन बैर बा। होली रंग के त्यौहार ह आ ई रंगे में भंग करsता।

खैर, कई जगह लॉकडाउन लगा दिहल गइल बा। टीकाकरण अभियानो तेजी पकड़ले बा। नाक से नीचे मास्क पहिने आ सट-सट के बतियावे वाला लोग अलर्ट हो गइल बा। सरकारो से अलर्ट पर अलर्ट जारी होता। डॉक्टर लोग कहsता कि हमनी के पुरनका अनुभव से सीखे के चाहीं आ सभा-समारोह में जाके  सुपरस्प्रेडर बने से बचे के चाहीं।

अब लइका-बच्चा, स्कूलिहा-कवलेजिया होली के हुडदंग खातिर जवन योजना बनवले रहलें हं, उ त फेल होइये गइल। जीजो-साली आ देवर-भौजाई के प्लानिंग पर पानी फिरल। चनेसर च्चा बेसिये टेंसनिआइल बाड़े। होली मिले-जुले के त्यौहार ह आ मिललके-जुललका पर रोक बा। पतझड़ के बाद बसंत आवेला आ बसंत के साथे फगुआ बाकिर इहाँ त बसंत के साथे फेर से पतझड़ आ गइल। कोरोना के ई दुसरका लहर सब उत्साह आ उमंग के हरियरी चर गइल बा। बुझाते नइखे कि फगुनाहट ह कि कोरोनाहट। टिभियो पर त फाग से बेसी कोरोना राग सुनाता।

हालाँकि बंगाल में कोरोना राग से बेसी चुनावी राग बा। उहाँ त बुझाता कोरोनवा आत्महत्या कर लेले बा। उहवें ना जहाँ-जहाँ इलेक्शन होला, कोरोना उहाँ ना फटके। त हम कंफ्यूज हो जानी कि कोरोना के भगावे खातिर वैक्सीनेशन जरुरी बा कि इलेक्शन!

खैर, भोजपुरी जंक्शन में पूरा के पूरा फाग राग बा। एह अंक पर कोरोना-सोरोना के कवनो असर नइखे। ई कम्पलीट फगुआ विशेषांक बा। 5 दर्जन कवि लोग के होली गीत, भोजपुरी के साथे ब्रज के भी तड़का, बसंत के अइला से लेके फगुआ के बदलत रूप पर बात, बॉलीवुड आ भोजीवुड के फगुआ के गीत-संगीत पर चर्चा, होली-रस आ होलियाना संस्मरण के साथे अंत में इहो कि ‘’ भउजी देह अंइठली अउरी फागुन आय गइल ‘’ तक सब रस, सब रंग मतलब होली के फुल पैकेज। अब कोरोना काल में पढ़े पर त रोक बा ना, पढ़ीं आ आनंद लीं। इहो होली खातिर दस्तावेजे बा।


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Hum BhojpuriaMarch 18, 20213min8570

संपादक- मनोज भावुक

मार्च 2020 में आइल कोरोना महामारी पूरा साल आदमी के अस्तित्व के झकझोरत रहल. अभियो टीस मारते बा. एह दरम्यान बहुत कुछ सोचे-समझे खातिर आदमी मजबूर भइल. हमरो मन में उथल-पुथल रहल. बहुत कुछ पाकल, बहुत कुछ फूटल आ उ संपादकीय के पन्ना पर ओह कालखंड के दस्तावेज के रूप में अंकित-टंकित हो गइल. लीं पेश बा उ दस्तावेज. पढ़ी आ सोची-विचारीं.

अंक 4 – ए हो रामा…

फगुआ के बाद चइता अंक परोस रहल बानी। फगुआ अगर अंत हऽ त चइता शुरूआत। अंत आ शुरुआत के अद्भूत तालमेल ह फगुआ-चइता। एही संगम पऽ हमनी के नया साल के उद्गम बा। रउरा सभे के नया साल के शुभकामना।

नया साल के अइसन जश्न त दुनिया में कहीं मनावले ना जाला। दिनभर फगुआ गवाला आ 12 बजे रात के बाद उहे गोल, उहे समाज, उहे दरी, उहे तिरपाल, उहे ढोलक, उहे झाल, उहे हुड़का, उहे मजीरा, उहे पखावज, उहे झांझ, उहे तासा, उहे नगाड़ा, रंग- अबीर से पोतल, भांग में डूबल उहे लोग…ए हो रामा…शुरू क देवेला। माने फागुन खतम। चइत शुरू।…नया साल के आगाज।

बाकिर, फगुआ-चइता के बीच एह साल एगो कोरोना आ गइल बा। रंग में भंग के रूप में ई  कोरोना खाली भारत खातिर ना, संउसे दुनिया खातिर, मनुष्यता खातिर एगो खतरा बा। एकरा से निपटे खातिर एहतियात बरतल बहुते जरूरी बा।

कोरोना के चलते असो दिल्ली के होली पनछुछ्छुर रहल हऽ आ गांव के चइता इहां कहां? गांव के ईयाद आवऽता।

कटिया शुरू हो गइल होई। तीसी, मसूरी, खेसारी, लेतरी, सरसो, मटर उखड़ा गइल होई। रहर के ढेढ़ी, जौ-गेहूं के बाल, महुआ बारी के महुआ गांवे बोलावऽता। काली जी के मंदिरवा पऽ चइता-चइती त होते होई। कई गो लोक धुन आ लोक राग मन में गूंजऽता। लहर पऽ लहर उठता।

अंक 5-  कोरोना काल में रामायण क्रांति

टेलीविजन प टीकर चलsता कि लॉकडाउन में संयम सिखावे अइले श्रीराम। लक्ष्मण रेखा में रहे के मर्यादा सिखइहें श्रीराम।

दरअसल कोरोना महामारी के खिलाफ पूरा देश में  25 मार्च से 21 दिन के जवन लॉकडाउन भइल बा, ओह में 28 मार्च से दूरदर्शन पर सुबह-शाम रामानंद सागर कृत रामायण के प्रसारण शुरू भइल बा। तबे से कोरोना अउर राम के लेके बतकूचन चालू बा।

अइसहूं ई चइत के महीना हऽ। भगवान श्रीराम के जनम के महीना। अब राम से बड़ा नायक के बा ? जेतना राम पर लिखाइल बा, कहाइल बा, गवाइल बा आ मंचन भइल बा, सीरियल-सिनेमा बनल बा, ओतना कवना नायक पर काम भइल बा ?…आ बात खाली भइला के नइखे भावना के बा। जवना भावना से लोक में राम के स्वीकार कइल गइल बा, उ भाव दोसरा कवनो नायक के नइखे भेंटाइल। सांच कहीं त जीवन के हर भाव में राम बाड़े। राम हर काल में प्रासंगिक बाड़े। कोरोना काल में भी।

सांच पूछीं त राम रसायन आजो सब समस्या के समाधान बतावे में सक्षम बा। रामलीला आ रामचरित मानस आजो सबसे आसानी से समझ में आवे वाला दर्शन शास्त्र बा। सिनेमा – सीरियल खातिर सबसे इंटरेस्टिंग एक्शन बा, ड्रामा बा, इमोशन बा। मानी भा मत मानी राम के बिना राउर काम नइखे चले वाला।

आईं एक बेर फेर कोरोना महामारी से सम्पूर्ण विश्व आ मानवता के मुक्त करावे खातिर राम के नाव लीहल जाव। जय श्रीराम!

अंक 6  – लोक बनवले बा बाबू कुँवर सिंह के इतिहास पुरुष

कवनो चीज के कथा-कहानी के रूप में देखल आ ओकरा के भोगल दूनों दू गो बात ह। दूनों के मरम अलग होला।

अबहीं सउँसे विश्व में कोरोना महामारी के प्रकोप बा। भारत में भी लॉक डाउन चलsता। लोग दहशत में बा। घर में कैद बा। केहू के बाल-बच्चा कहीं फँसल बा त केहू के माई-बाप। डॉक्टर, पुलिस, पत्रकार जान-जोखिम में डाल के दिन रात सेवा में लागल बाड़े। ई दुख वर्तमान में भोगल जाता। अभी एकर पीड़ा इंटेंस बा। दस-बीस साल बाद, पचास साल बाद ई इतिहास हो जाई। कहानी हो जाई। डायनासोर युग के जुरासिक पार्क जइसन फिलिम हो जाई।

जइसे आजकल रोज हमनी के टीवी पर रामायण आ महाभारत देखत बानी जा। हमनी खातिर ई बस एगो कहानी बा, सीरियल बा। मजा ले तानी जा। मन बहलावsतानी जा। बाकिर एकरा के अगर रउरा सत्यकथा मानी त महसूस करीं ओह कष्ट के, ओह पीड़ा के जे रामायण के पात्र राम भोगलें, सीता भोगली, राजा दशरथ भोगलें भा लक्ष्मण जी के पत्नी उर्मिला भोगली भा महाभारत के पात्र पांडव भोगलें, कुंती भोगली। कहे के मतलब कि असली चीज महसूस कइल बा। ओह कालखंड में जाके अपना के ओह स्थिति में रख के महसूस कइल बा। तबे अंदर के इंसान ज्यादा समृद्ध, ज्यादा मानवीय होई।

ई अंक 1857 के गदर में बिहार के प्रतिनिधित्व करे वाला 80 बरिस के हीरो बाबू कुँवर सिंह के समर्पित बा, जेकरा बारे में प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार होम्स के भी लिखे के पड़ल कि ” युद्ध के समय कुँवर सिंह के उम्र अस्सी साल रहे, अगर उ जवान रहितन त अंग्रेजन के 1857 में ही भारत छोड़े के पड़ित।”

अंक 7- कोरोना के ओह पार …

बबुआ रे, ई देश-विदेश काहे बनल ?…काहे बन्हाइल बाँध सरहद के ?…दुनिया के ऊपर एके गो छत -आसमान आ एके गो जमीन-धरती। के कइलस टुकड़ा-टुकड़ा?…झगड़ा के गाछ के लगावल?  के बनावल नफ़रत के किला ?… का दो, धरती माई हई। माईयो टुकी-टुकी ???  ……एह टुकी-टुकी में हीं सारा समस्या के जड़ बा। टुकी-टुकी में वर्चस्व के लड़ाई बा। अहंकार, शक्ति-प्रदर्शन, धोखा, गद्दारी, जमाखोरी, साजिश, सियासत सब एह टुकी-टुकी में बा।  ‘ वसुधैव कुटुंबकम ‘ खाली नारा में बा आ मानवता में बानर नर से आगे निकल गइल बाड़न।

चीन के चेहरा देखीं। देखीं का, कोरोना शब्द बोलते भा सोचते चीन के क्रूर चेहरा नज़र का सामने नाचे लागता। चीन के चाल आ चक्रव्यूह सउँसे दुनिया समझ गइल बा। तनिक विचार करीं, चीन कोरोना वायरस के संक्रमण से जुड़ल सूचना दबवलस काहे?  दबवलस त दूर, अब त इहो सुने में आवता कि कोरोना वायरस के उत्पत्ति चीन के प्रयोगशाला बुहान इंस्टीच्यूट आफ वायरोलाजी में ही भइल बा। मतलब ई एगो मानव निर्मित वायरस बा।  अइसन काहे कइलस चीन ?… बात उहे, टुकी-टुकी वाला बा। चीन धरती के बाकी टुकड़ा के गैर समझलस, दुश्मन समझलस, बाजार समझलस। ‘ वसुधैव कुटुंबकम’ के राज, रहस्य आ सुख ओकरा भेजा में घुसबे ना कइल।

दरअसल हमनी के प्रेम कइल छोड़ देले बानी जा। प्रेमे सब बेमारी के ईलाज बा। प्रेम रही तबे    ‘ वसुधैव कुटुंबकम ‘ के रहस्य समझ में आई। प्रेम खाली आदमी के आदमी से ना… पशु, पंक्षी आ प्रकृति से भी।  त अब चिचिअइला आ छाती पिटला से का होई कि प्रकृति के हमनी के दोहन कइनी जा। ओकरा साथे अन्याय कइनी जा, ओकरे सजा  मिल रहल बा। गगनचुंबी टॉवर के पॉवर देखावे में संवेदना के महल खंडहर बन गइल, ओकरे सजा मिल रहल बा। जीवन से प्रेम गायब हो गइल त एह सूखल ढाँचा में  ‘ स्ट्रांग इम्यून सिस्टम ‘ रहो त रहो कइसे। फेर त कोरोना डायन खातिर जिनिगी के डंसल बहुत आसान बा। ई अलग-अलग रूप में आवते रही। …

विद्वान लोग के मत बा आ इतिहासो साक्षी बा कि हर महामारी के बाद हमनी के जागेनी जा। …जागल बानी जा। जगला पर कुछ समीकरण बदलेला। कुछ मान्यता टूटेला।  कुछ नया सामने आवेला। ई महामारी या त्रासदी कवनो पहिला बेर त आइल नइखे। प्लेग, ब्लैक डेथ आ स्पैनिश फ्लू के समय भी दुनिया हिल गइल रहे।  ओही तरे महामारी के बाद आर्थिक संकट के खड़ा भइल भी कवनो नया नइखे। चिंता, आर्थिक संकट के साथे साथ ओह संकट से समाज में उपजे वाला विषमता आ करप्शन के बा। चिंता, अपना सपना के मेहनत के कढ़ाही में रोजे पकावे वाला मजदूरन के अनाथ होके एने ओने छिछिअइला के बा।

कोरोना कवनो जाति, धरम, अमीर, गरीब के ना ह। तब्लीगी जमात के वजह से भारत में कोरोना के मरीज बढ़ल बाड़े। निःसंदेह दोषी के सजा मिले के चाहीं। बाकिर एकरा चलते हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य ना फइले के चाहीं।  सउँसे दुनिया में रोयेला आदमी त रुलाई एके जइसन होला। लोर के स्वाद एके जइसन होला। हंसी आ ठहाका भी एके जइसन होला। मानवीय अनुभूति के मानवता के आधार पर समझे के जरुरत बा। जात-पात, धर्म, भाषा, देश, क्षेत्र, सरहद के आधार पर ना। एह से, संकीर्ण राष्ट्रवाद से ऊपर उठ के मानवतावाद पर जोर देवे के होई। दुनिया के तमाम देशन के बीच निहित स्वार्थ से ऊपर उठ के एगो नया समीकरण आ संतुलन पर जोर देवे के होई। तबे मानव जाति  के अस्तित्व पर से खतरा टली।  अरे, जब अदिमिये ना रही त कवँची सरहद,  कवँची सेना, कवँची बाज़ार, कवँची व्यापार। रही जीव तबे नू पीही घीव।

एह से अभी विश्व कल्याण के भावना से काम करे के जरुरत बा। अइसन पहल पहिलहूँ भइल बा। संयुक्त राष्ट्र, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अउर विश्व बैंक  … के जनम संकट काल ( द्वितीय विश्व युद्ध ) के बादे भइल बा।…एहू महामारी के बाद कुछ तब्दीली आई। वैश्विक स्तर पर कुछ नया उपाय होई।

फिलहाल त घर में रहीं। लॉकडाउन आ सोशल डिस्टेंसिंग के पालन करीं। ओकरा बाद रोजी-रोजगार के सोचीं। प्रधानमंत्री जी जान आ जहान दूनू के बात करत बानी।  आत्मनिर्भरता के बात करत बानी।  गाँव प थोड़ा सा फोकस कइल जाय। अपना जड़ आ जमीन प।  जड़ से कट के फूल ना खिली।  खिलबो करी त उ प्लास्टिक आ कागजे के होई। बाकी सब त समय खुद ब खुद समझा दी।  समझावते बा।

ई अंक समय के दस्तावेज बा। भविष्य में जब कबो पीछे पलट के कोरोना काल के समझे के कोशिश कइल जाई त ओह समय ई अंक आज के समय के कहानी सुनाई। एह अंक में कवि, गायक, कथाकार, पत्रकार, चिकित्सक, समाजसेवी सबकर कोरोना के लेके उदगार बा, चिंता बा, चिंतन बा, सुर बा, स्वर बा, समस्या बा, समीक्षा बा। पढ़ीं। पढ़ाईं।

कोरोना के जगह अब करुणा बरिसे,  एही प्रार्थना के साथ।

 

अंक 8 – रेड, ऑरेंज आ ग्रीन जोन वाला आदमी

” लॉकडाउन समस्या नइखे। समस्या त भूख बा। ”  मदर्स डे पर बाते बात में ई बतिया समझा देलस माई। विश्व के तमाम माई के मने मन प्रणाम करत हम लॉकडाउन अउर भूख के बारे में सोचे लगनी। सोचे लगनी, पूर्वांचल के माई-दादी आ चाची-भउजी का बारे में जे पूरा जिनगी लॉकडाउन में काट देलस। ससुरा अइला के बाद घर के चौखट से बाहर ना निकलल। बाकिर उ लॉकडाउन खलल ना। काहे कि उ लॉकडाउन जीवन शैली या संस्कार रहे। घर के मान-मरजादा रहे आ ओही में आनंद रहे। एह से उ लॉकडाउन कबो लॉकडाउन लगबे ना कइल। लॉकडाउन में रहियो के माई-दादी आ चाची-भउजी अपना के रानी-महारानी महसूस कइल लोग। उहाँ बेबसी ना रहे। भूख भी ना रहे। ( पेटवे के ना,  मनवो के भूख होला। जेकरा एह व्यवस्था में घुटन महसूस भइल उ समय के साथे उन्मुक्त भी भइल।)

जहाँ भूख रहे, ई लॉकडाउन टूटल। ओही यूपी-बिहार में एगो अइसन तबका रहे आ अभियो बा, जेकरा घर के औरत के खेत-खरिहान में काम करे निकले के पड़ल, गाँव के दोसरा घर में काम करे निकले के पड़ल। उ लॉकडाउन में रहती त मर जइती। उहां भूख के समस्या रहे।

हमरा आपन एगो शेर मन पड़Sता-

पानी के बाहर मौत बा, पानी के भीतर जाल बा

लाचार मछरी का करो, जब हर कदम पर काल बा

आज प्रवासी मजदूरन के पीड़ा कुछ अइसने बा। उ भूख, बेमारी आ भविष्य के लेके भकुआइल बा। ओकर माथा काम नइखे करत अउर उ उजबुजा के मुंबई आ दिल्ली जइसन जगह से पैदले निकल पड़ल बा गाँव खातिर।

गाँव ओकरा के खींचत त बा बाकिर अँकवारी में ना भरी। गाँवों डेराइल बा। कोरोना के डर गाँव-शहर सबका धमनी-शिरा में पसर गइल बा। प्रधानमंत्री जी के बेसी जोर गाँव के बचावे पर बा। गाँव में कोरोना मत घुसे। एह से गाँव हर आवे वाला के शक के निगाह से देखsता। त गाँव के ओर बेतहाशा भागे वाला एह अभागन के लोर के पोंछी?   लोर के साथ हमरा जेहन में हमार अशआर इको कs रहल बा-

लोर पोंछत बा केहू कहां / गाँव अपनो शहर हो गइल …

सबसे बड़का शाप गरीबी / सबसे बड़का पाप गरीबी

डँसे उम्र भर,  डेग-डेग पर / बनके करइत साँप गरीबी

एह गरीब आ विवश लोग खातिर महीनन से बंद पड़ल रेल त आज (12 मई ) चालू हो गइल बाकिर एह लोग के जिनिगी के रेल पटरी पर कब आई, कब दौड़ी, पता ना ?

पीएम के सभ सीएम लोग से मीटिंग प मीटिंग चलsता। पांचवा बार बइठक भइल ह। केंद्र आ राज्य सरकार दुनों लागल बा। अभी ले दुनिया में 42 लाख आ भारत में 67152 से बेसी ममिला हो गइल बा कोरोना संक्रमण के। लॉकडाउन के तीसरा चरण (लगभग 55 दिन) ख़तम होखे वाला बा। अब जान के साथे जहानो के फिकिर बा। रोजी-रोजगार खातिर लॉकडाउन में कुछ ढील के बात होता। कबले बंद दरवाजा के भीतर से बाहर झाँकल जाई। कबो ना कबो त बाहर निकलहीं के पड़ी। बाकिर हँ,  .. अब त मास्क आ सोशल डिस्टेंसिंग के आदत डाल लेवे के चाहीं काहे कि कोरोना अचानक से छू मंतर ना हो जाई। ई अभी दुनिया के साथे आँखमिचौली खेलsता। संकट बड़हन बा त ओकर उपचारो बड़ा करे के पड़ी। सरकार के पास कवनो जादू के छड़ी नइखे कि एक बार में सब कुछ ठीक हो जाई। दोबारा व्यवस्था बनावे में समय लागी। समस्या के हल निकाले खातिर केंद्र,  राज्य अउर नागरिक सबके अपना-अपना हिस्सा के जिम्मेदारी उठावे के पड़ी।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी 12 मई 2020  के राष्ट्र के नाम सम्बोधन में ‘ आत्मनिर्भर भारत ‘ खातिर देश के आह्वान करत 20 लाख करोड़ रूपया के (भारत के जीडीपी के 10 % ) आर्थिक पैकेज के घोषणा कइले बानी।  साथ हीं ‘ लोकल’ उत्पाद खातिर ‘ वोकल’ होखे के मंतर देले बानी।

एह से जात-पात, धर्म-सम्प्रदाय, सरहद-सीमा से ऊपर उठ के मानवता के आधार पर सचेत रहत कोरोना से जंग लड़े के बा। अइसहूँ अभी त आदमी के तीने गो जात बा- रेड जोन वाला आदमी,  ऑरेंज जोन वाला आदमी आ ग्रीन जोन वाला आदमी….एही आधार पर ई. टिकट भा ‘’ सब ‘’ सहूलियत मिले के बा।

भारत के हर आदमी ग्रीन जोन वाला आदमी बन जाय,  भगवान से इहे गोहरावत बानी। रउरा सभ के जागे-जगावे, हिम्मत बढ़ावे, सचेत करे अउर समय के दस्तावेजीकरण खातिर प्रस्तुत बा कोरोना विशेषांक (भाग-2)। पढ़ीं। पढ़ाईं।

 

अंक 10- जिंदगी जंग ह, बोझ ना…

भोरे-भोरे गौरैया आँगन में चहकल / चाह के दोकानी के आँच बाटे लहकल  ….

आ ओही चाह के दोकानी प, चट्टी प कुल्हड़ में चाय सुड़ुक-सुड़ुक के पीयत दुनिया भर के बतकही, दुनिया भर के पंचायत, देश-विदेश के समस्या, निजी घात-भीतरघात सब शेयर होखे अपना यार के सङे, दिलदार के सङे, राजदार के सङे, साथी-संघाती के सङे। उ आउटलेटे अब गायब भइल जाता।

त मन के भीतर खउलsता तरह-तरह के बात। तरह-तरह के खीस-पीत। अवसाद-विषाद, कुंठा-क्रोध के अम्ल मन के बर्तन के पेंनिये गाएब कs देता। मन रीते लागsता। तबो मन के बुझात नइखे कि कवनो मनोचिकित्सक से मिल लिहल जाव। लागsता कि ई जवन होता, बहुत सामान्य बात बा। असहीं होला। बाकिर ई सामान्य घटना नइखे। जहर पीयत-पीयत मन आत्मघाती हो जाला। मन नॉर्मल ना रहे। नार्मल अवस्था में केहू पंखा से लटक के जान कइसे दे सकेला? केहू ख़ुदकुशी कइसे क सकेला?

कोरोना त आदमी के जान लेते बा। ई अवसाद, विषाद, फ्रस्ट्रेशन, अकेलापन भी मौत के मुँह में ढकेल रहल बा। हमरा दिलोदिमाग में बेर-बेर उ गीत गूँज रहल बा कि ”जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए”… बाहर से जे सुखी लउकsता, जेकरा पास धन-दौलत, शोहरत आ मान-सम्मान सब बा, उहो पंखा से लटक जाता। गरीबी से जे मू रहल बा, उ त मुअते बा। एकर मतलब कि आत्महत्या के सम्बन्ध अमीरी, गरीबी से नइखे, धन-दौलत आ शोहरत-सम्मान से नइखे। उ कवनो भितरिया चीज ह। शायद ओकर नाँव विलपॉवर ह। जिजीविषा ह। मन के ढिठई ह। मन के थेथर होखे के चाहीं। मन के चमड़ा मोट होखे के चाहीं जहँवाँ से अपमान, उपेक्षा आ दुःख के तीर परावर्तित हो जाव। कमजोर मन आत्मघाती हो जाला आ फेर उ अपने के खोर-खोर खाए लागेला।… मन बहरियो बहुत उत्पात मत मचावे, एकरे खातिर संत लोग योग, ध्यान, चिंतन आ सत्संग के राह बतवले बा ना त आदमी के मन आसाराम बापू हो जाला, रामरहीम हो जाला, शहाबुद्दीन हो जाला, निर्भया गैंग रेप के दोषी राम सिंह हो जाला।

मन ह का?  देह में ई कहँवाँ रहेला? ई कहल कठिन बा। दिल आ दिमाग के अस्तित्व त जीव विज्ञान में बा बाकिर मन … ?

बाकिर एतना त तय बा कि मन देह से अलगा के कवनो चीज नइखे तबे नू मन के पीड़ा देह के अस्तित्व के खतम क देता। एह से मन के मजबूत कइल जरुरी बा। तन के इम्म्यून सिस्टम के सङे-सङे मनो के इम्म्यून सिस्टम के स्ट्रांग कइल जरुरी बा। व्यायाम के साथ ध्यान आ योग भी जरुरी बा। स्ट्रेस के हैंडिल करे के कला सीखल जरुरी बा। मन आ तन दुनो स्तर पर अपना के फौलाद बनावे के पड़ी तबे सकून के चिरई एह जिन्दगी के अँगना में चहकी।

दुश्मन त मानी ना, साजिश करी। मन के तूरे के भरसक कोशिश करी। बाकिर हमनी के दादा-परदादा भा रामायण-महाभारत के पात्र अपना हक खातिर लड़े के सिखा गइल बाड़े ना कि सुसाइड करे के।

अपना क्षमता के हिसाब से ‘कुछ’ बने के कोशिश बेशक होखे के चाहीं बाकिर कोशिश अइसनो ना होखे के चाहीं कि उ पूरा ना भइला पर रउआ भितरी से टूटि जाईं। षङयंत्रकारी त हर जगहा, हर क्षेत्र में बाड़न। जरनियहपन त हर जगहा बा। एह से धीरज त धरहीं के पड़ी। संघर्ष त करहीं के पड़ी भाई ! कीड़ा फतिंगा भी अपना आखिरी दम तक अपना संघर्ष के लड़ाई लड़ेला। हर घड़ी हर कदम संघर्ष.. . अनथक साधना आ धीरज के काट केहू के लगे नइखे।

जिनिगी बा त सुख-दुःख त अइबे-जइबे करी। सुख के महफ़िल से इतर दुख के साथी चीन्हे के पड़ी। अइसन साथी जेकरा सामने बेफिक्र होके दिल खोलल जा सके। जेकरा कान्हा प मूड़ी ध के फूट-फूट के रोअल जा सके। जे बेकहले राउर दुख बूझे आ अपना जोर भर मदद करे। अइसन साथी मिलल मुश्किल बा। बाकिर दोसरा खातिर अइसन साथी त बनले जा सकत बा। ई अपना अख्तियार में बा। एहू से दुख कम होई। कुँवर बेचैन जी के एगो शेर बा-

तुम्हारे दिल की चुभन भी जरूर कम होगी / किसी के पाँव से काँटा निकालकर देखो

भाई हो, उदार बने के पड़ी। सहनशील बने के पड़ी। ‘’ नेकी कर दरिया में डाल ’’ के राहे चले के पड़ी। अनेरहूँ हँसे के पड़ी। अपनो प हँसे के पड़ी। गीत गावे के पड़ी। गुनगुनाये के पड़ी। हमार शेर बा कि ‘दुखो में ढूँढ ल ना राह भावुक सुख से जीये के / दरद जब राग बन जाला त जिनगी गीत लागेला।‘  मतलब, रउरा दुःख के आउटलेट रखे के पड़ी। अइसन नेह के बंधन भी चाहीं जॅऺहवाँ बेबातो के बात होखे, बेवकूफी भरल बात होखे, पागल नियर आदमी ठठा के हँसे। जहाँ दिल, दिमाग आ किडनी पर जोर ना पड़े। बिंदास होके संवाद होखे। जहँवाँ ई संदेह मत होखे कि एह में से केहू अपना मतलब के बात उचिला के कबो सेंटीमेंटल ब्लैकमेल करी। जहाँ दोस्ती में माई आ बेटा वाला ममता के, देवर-भउजाई वाला मजाक के आ पति-पत्नी वाला निजता आ खुलापन के रिश्ता होखे। अइसन दोस्त चाहीं। अइसन दुखहरन दोस्त। ना बाहर मिले त अपना भितरी खोजीं। बाकिर संवाद चालू रहे। हमार एगो दोहा बा,  ” भावुक अब बाटे कहाँ पहिले जस हालात / हमरा उनका होत बा, बस बाते भर बात।”  ई बाते भर बात वाला दीवार तुरियो के कुछ रिश्ता चाहीं, जहाँ नेह के बरसात में मन भींज के तरोताजा होत रहे। तब ना होई कवनो सुसाइड। ना होखिहें लोग आत्महंता। ना मरिहें कवनो सुशांत सिंह राजपूत। तब जिंदगी जंग भलहीं लागी, बोझ ना लागी।

तीन गो बात अउरी इशारा में। संयुक्त परिवार का ओर लौटल एकदम से संभव नइखे। बाकिर जहँवें बन पड़े, दुख त बाँटल जा सकेला। सूनल-सुनावल जा सकेला। एकल परिवार में त पति-पत्नी के बीच अनबन भा झगड़ा भइल होखो त हफ्तन सन्नाटा रहेला। दूनो के मन होखबो करो तबहूँ केहू फरियावे भा समझौता करावे वाला ना होला। दोसर बात, अपना जड़ का ओर सोचल जाव, जहँवाँ अपनन खातिर दरवाजा हर-हमेसा खुलल रहत रहे। अपॉइंटमेंट लेबे के औपचारिकता ना भइल करे। तीसर बात, दिन रात सोशल मीडिया के अनसोशल कोना में ढूकि के टेंशन बटोरला से नीमन बा जे छोट-छोट लइकन के सङे बइठ के लूडो खेलल जाव, भा प्रकृति के सङे रोमांस कइल जाव। प्रेम आ रोमांस.. ईहे कवनो तनाव के काट बा। अपना से, अपना माई-बाप से, भाई-बहिन से, परिवार से, देश आ समाज से अउर अपना सपनन से प्रेम करीं। प्रेम जीये के भूख देला, त जिंदगी खातिर लड़े के ताकत।

ना चली चीन के चाल

व्यक्तिगत दुःख-सुख आ शांति से इतर वतन के अमन बा। देश खुशहाल रही तबे ओह देश के नागरिक सुखी रहीहें। ई मुश्किल वक्त बा, व्यक्तिगत दुःख-सुख, पार्टी-नेता-जाति-धर्म से उठके सिर्फ अउर सिर्फ भारतीय बन के रहे के जरुरत बा। भारतीय सेना के पराक्रम आ शौर्य पर भरोसा रखीं ! आपन सैनिक 20 पर 43 मारत बाड़न। चीनी सेना के हालत ख़राब बा। सैनिक आ कूटनीतिक दुनों मोर्चा पर भारत चीन पर भारी बा। धूर्त आ चालबाज चीन खातिर भारत के पूरा तैयारी बा। हर देशभक्त तैयार बा। उ कोरोना से पहिले भारतीय चीन समर्थक के मारे खातिर उतावला बा अउर सीमा पर शेर के तरह दहाड़े आ ललकारे खातिर भी।

अंक 14- खुद के लवना के तरह रोज जरावत बानी… 

पेट में आग त सुनुगल बा रहत ए भावुक

खुद के लवना के तरह रोज जरावत बानी

कोरोना महामारी जब फइलल त एकर पड़े वाला असर प खूब बतकूचन होत रहे… बाकिर जइसे-जइसे दिन बीते लागल बतकूचन खतम हो गइल आ ओकर असर साक्षात सामने लउके लागल।  अब हालात ई बा कि कंपनी-कॉर्पोरेट में छंटनी के सीजन शुरू हो गइल बा, त कहीं नौकरी पेशा वाला लोग के वेतन दू-दू महीना के बकाया चले लागल बा। एक त कोरोना के डर ऊपर से पॉकिट में पइसा के अभाव। ई अइसन स्थिति बा जवना में मध्यवर्ग सबसे अधिका पिसाता। ऊ राशन खातिर भा अउरी कवनो खैरात में मिले वाला सुविधा खातिर लाइन में नइखे लाग सकत। स्कूल ऑनलाइऩ चल रहल बा त स्कूल फीस देबहीं के बा। फ्लैट के किराया के अलावा अउरी दोसर देनदारी कपार प चढ़ले बा। मकान के ईएमआई से लेके दवा-दारु तक सब बड़ले बा। एही में रात-बीरात जब कबो अँघी टूटsता त बुझाता कि मेल प टर्मिनेशन लेटर आइल बा। जे बेरोजगार हो गइल बा, ओकरा नया रोजगार के कवनो संभवना लउकते नइखे। अइसे में आदमी मानसिक, सामाजिक आ आर्थिक अवसाद में घिर रहल बा।

दरअसल दिल आ दिमाग के रास्ता पेट से होके जाला। पेट में आग लागी त ओकर लपट दिल आ दिमाग तक जइबे करी। जब लपट दिल आ दिमाग तक जाई त ओकर असर परिसंचरण तंत्र आ तंत्रिका तंत्र यानी कि दिल के धड़कन आ दिमाग के फड़कन पर पड़बे करी। बीपी बढ़ी आ दिमाग खराब होई। ख़राब दिमाग से सही निर्णय होला ना। आदमी अंड-बंड करे लागेला। त सउँसे देश में अंड-बंड के स्थिति उपजे के ढेर संभावना बा। ई बहुत बड़ त्रासदी बा जवन कोरोना लेके आइल बा। कोरोना खाली बेमारी ना जिनगी के राहु-काल बा।

कहल जाता कि जइसे दूसरा विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के परिदृश्य बदलल रहे ओइसही कोरोना के बाद दुनिया के परिदृश्य बदली। अब ई लउके लागल बा। कुछ सकारात्मक बदलाव लउकता त कुछ नकारात्मको बा। सकारात्मक पहलू ई बा कि कोरोना के डरे हीं सही, लोग अनियमित जीवनशैली से बाहर निकलल बा त नकारात्मक पहलू ई बा कि परिवारिक कलह, सामाजिक निराशा, अपराध में बढ़ोत्तरी जइसन चीज अब ढेर सामने आवता। भलही सरकार के ओर से अस्पतालन में कोरोना के इलाज के कथित तौर प बेहतर सुविधा मुहैया करावल गइल बा बाकिर एह कोरोना से उपजल मानसिक, सामाजिक व आर्थिक अवसाद में घिरल लोग के काउंसिलिंग खातिर अबहीं ले कवनो व्यवस्था नइखे लउकत। ई हाल खाली अपने देश के ना बलुक दुनिया के विकसित कहाये वाला देशन में भी अबहीं एकर भयावहता के ले के सत्ता प्रतिष्ठान में कवनो गंभीरता नइखे लउकत, जवन एगो बड़ खतरा के सिग्नल दे रहल बा।

आदमी के जिनगी चूल्हा हो गइल बा आ देह लवना। ओही में जरsता-धनsकता आदमी। एह लपट से मानवता के बचावे खातिर जल्दिये कुछ उपाय कइल जरुरी बा।

 

अंक 18- देश में अमन आ पेट में अन्न

एगो त घर में तनाव बा। बाहर कुक्कुर बोलsतारs सन। इन्हनीं के टेंशन त देलहीं बाड़न स, तवना में कउवन के काँव-काँव अलगे चल रहल बा। एही में बिहार में चुनाव बा। नारा से बेसी भोजपुरी गाना गूँजsता। कोरोना के चलते जे बेरोजगार भइल बा ओकरा असहीं अंघी नइखे लागत। भोर के अखबार सुरुज भगवान से बेसी लाल बा। हत्या से बेसी आत्महत्या के खबर लउकsता। ब्रम्हांड के सर्वश्रेष्ठ जीव आत्मघाती हो गइल बा। आखिर ई कइसन समय आ गइल बा हे दुर्गा मइया।

कइसे गोहराईं तोहरा के? लइका लेखा फूट-फूट के रोईं? रोईं भोंकार पार के? सीना चीर के देखाईं? का करीं? कइसे बुझबू कि हम दुखी बानी। हमार दुख तोहरा काहे नइखे लउकत? आकि चनेसरा लेखां तुहूँ मजा ले तारू?

चनेसरा त विपक्षी हs। हमरा अच्छाइयो में बुराइये देखेला। केतनो बड़का काम काँहें ना करीं, तारीफ़ के दू बोल ना बोली। हमरा जवना काम के उ निन्दा करता, ओकर आका भा गुरुजी लोग, ओही में डूबल बा। बाकिर उ ओह लोग के तलवा चाटsता। खैर, छोड़s, ई कुल्हि सियासी बात हs।

तू त माई हऊ। तू दिल के सब दरद बुझेलू। बस बहरिये बहरी भोकाल बा ए माई। भीतर खाली बा। कुछ बा ना। कइसे रही?  इहाँ भुँजवो खाये के बा, फँड़वो टोवे के बा। पेट खाली बा। खाली पेट में दिमगवो खाली हो जाला। दिमाग कामे नइखे करत। कुछ सूझते नइखे।

पंडी जी से पूछनी हँ। उहाँ के कहनी हँ जे राहू-केतु ठीक नइखे चलत। खैर, उहाँ के त कुंडली के आधार पर ग्रह के बात कहनी हँ।

हमरा त हई कुल्ही राहू-केतु लउकत बाड़न स। एगो जवन अपना देसवा के बाउंडरिया पर फँउकत बाड़न स ड्रैगनवा, ऊ। दोसर देस के भीतरे दोस्त के रूप में दुश्मन बनल घूमsतारs सन, भितरघतिया, ऊ। तीसर ऊ, जेकरा हर काम में नुक्से लउकsता, निगेटिव आदमी, ऊ। ए सगरी के बुद्धि ठीक करs ए माई।

अभी सबसे जरुरी बा – देश में अमन आ पेट में अन्न।

अमन द। अन्न द। निरोग करs। देशे के ना, सउँसे दुनिया के कोरोना मुक्त करs।

आम आदमी भूखे मूअता। सबका थाली में रोटी होखे आ आँखि में नींन, एह नवरात्रि में बस अतने प्रार्थना बा ए दुर्गा माई।

 

अंक 22- शुभ हो, मंगलमय हो नयका साल

साल 2020 … मनुष्य के औकात बतवलस। चिरई-चूरूंग, कुक्कुर-बिलार अँगना-दुअरा फुदुकत-कुदुकत रहल आ मानुष मुँह प जाबी (मास्क) लगवले घर में दुबुकल। आदमी सामाजिक प्राणी ह बाकिर ओकरे सामाजिक दूरी बना के रहे के पड़ल, पड़sता आ आगे देखीं, कब ले ?…

अभियो अमिताभ बच्चन फोनवा प बोलते बाड़े – ‘’ नमस्कार, हमारा देश और पूरा विश्व आज कोविड-19 की चुनौती का सामना कर रहा है। कोविड-19 अभी खत्म नहीं हुआ है, ऐसे में हमारा फर्ज है कि हम सतर्क रहें। इसलिए जब तक दवाई नहीं, तब तक कोई ढिलाई नहीं। ‘’

बच्चन साहेब के पहिले एगो जनाना बोलत रहे। ओकर बोलिया तनी मीठ लागत रहे। ई मर्दवा त पगला देले बाड़े। आदमी अपना काम में अझुरा के भुलाइयो जाता तले कवनो फोन अइला पर इनकर जबरिया कॉलर ट्यून कोरोना के ईयाद ताज़ा करा देता।

बाप रे बाप। ई कोरोना केतना लोग के नौकरी खइलस। केतना लोग के जिनगी। तबो नइखे अघात। तबो नइखे जात। कादो वैक्सीन खाई तबे जाई।

वैक्सीन के लेके तरह-तरह के कोशिश आ दावा त होते बा बाकिर अभी बहुत कुछ साफ़ नइखे… भारत में कोरोना वायरस वैक्सीन के परीक्षण अंतिम चरण में पहुंच चुकल बा आ वैक्सीन के उत्पादनो तेज़ी से हो रहल बा बाकिर ई आम आदमी तक आ ओकरा पॉकेट के पहुँच तक कब पहुंची, ई कहल अभी जल्दीबाजी होई। सरकार के कहनाम बा कि टीकाकरण एक महीना में शुरू हो सकsता। सीरम इंस्टीट्यूट कंपनी एस्ट्राजेनेका के साथ मिलके ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित वैक्सीन के उत्पादन कर रहल बा। ई टीका 70 से 90 प्रतिशत तक प्रभावी बतावल जाता।

खैर, हर बुरा समय के एगो सीमा होला। इहो जाई। जइबे करी।.. आ जब ई इतिहास हो जाई त पीछे पलट के हमनी के एह महामारी के देखब जा त बहुत कुछ लउकी।

लउकी उ काफिला जवना में मरद-मेहरारू लइका-बच्चा के गोदी टंगले पैदले बम्बई से बिहार चल देले रहे। मास्क लगाके पूड़ी बाँटत लोग के फोटो त फेसबुक हर साल देखाई। लाश प भइल सियासत भी सिहरन पैदा करत रही। कादो, बुरा दौर के बाद आदमी जागेला आ ओकरा में मानवता लौटेला पर इहो ओतने साँच बा कि आदमी से हेहर-थेथर दोसर कवनो प्राणी नइखे। श्मशान घाट पर संवेदनशील भइल इन्सान घाट से बहरी निकलते संवेदनहीन होके तोर-मोर करत देखल गइल बाड़न।

खैर, साल 2020 जाता। 2021 आवsता। हमरा नइखे लागत कि कैलेण्डर बदलला से कुछ बदली भा बदलेला बाकिर हँ, दुख, परेशानी, दुर्घटना, ठेस, ठोकर, महामारी आदमी के या त मार देला या त माँज देला, तरास देला। तप के आदमी अउरो चमकेला, निखरेला आ ओकर जिनगी सोना बन जाला। अगर दुख बड़लो बा त दुखी भइला से कुछ होई ना। हम त इहे कहेब कि –

दुखो में ढूंढ लs ना राह भावुक सुख से जीये के

दरद जब राग बन जाला त जिनिगी गीत लागेला

नया साल में बेहतर के उम्मीद कइल जाय…



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भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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