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Hum BhojpuriaSeptember 6, 20211min2430

मनोज भावुक

( एक )

कविता

अबो जे कबो छूटे लोर आंखिन से

बबुआ के ढॉंढ़स बंधावेले माई

आवे ना ऑंखिन में जब नींद हमरा त

सपनो में लोरी सुनावेले माई

बाबूजी दउड़ेनी जब मारे-पीटे त

अँचरा में अपना लुकावेले माई

छोड़ी ना, बबुआ के मन ठीक नइखे

झूठहूं बहाना बनावेले माई

 

भेजे में जब कबो देर होला चिट्ठी त

पंडीजी से पतरा देखावेले माई

रोवेले रात भर, सूते ना चैन से

भोरे भोरे कउवा उचरावेले माई

 

जिनिगी के अपना ऊ जिनिगी ना बूझेले

´बबुए नू जिनिगी ह´ बोलेले माई

दुख खाली हमरे ऊ सह नाहीं पावेले

दुनिया के सब दुख ढो लेले माई

 

´जिनिगी के दीया´ आ ´ऑंखिन के पुतरी´

´बुढ़ापा के लाठी´ बतावेले माई

´हमरो उमिरिया मिले हमरा बबुआ के´

देवता-पितर गोहरावेले माई

 

( दू )

गीत

बबुआ भइल अब सेयान कि गोदिए नू छोट हो गइल

माई के अँचरा पुरान, अँचरवे में खोट हो गइल।

 

गुटु- गुटु गोदिया में दूध-भात खाइल

मउनी बनल अउरी भुइयाँ लोटाइल।

नेहिया– दुलरवा के बतिया बेकारे –

टूटल पिरितिया के डोर कि मन में कचोट हो गइल।

 

‘चुलबुल चिरइया’ में बबुआ हेराइल

बोले कि बुढ़िया के मतिये मराइल।

बाबा के नन्हकी पलनिया उजारे –

उठल रुपइया के जोर जिनिगिये नू नोट हो गइल।

 

भरल-पूरल घरवा में मन खाली-खाली

दियरी जरे पर मने ना दीवाली ।

रतिया त रतिया ई दिनवो अन्हारे –

डूबल सुरूज भोरे- भोर करेजवे में चोट हो गइल।

 

( तीन )

गजल

हजारो गम में रहेले माई

तबो ना कुछुओ कहेले माई

 

हमार बबुआ फरे-फुलाये

इहे त मंतर पढेले माई

 

हमार कपडा, कलम आ कॉपी

सँइत-सँइत के धरेले माई

 

बनल रहे घर, बँटे ना आँगन

एही से सभकर सहेले माई

 

रहे सलामत चिराग घर के

इहे दुआ बस करेले माई

 

बढे उदासी हिया में जब-जब

बहुत-बहुत मन परेले माई

 

नजर के काँटा कहेलीं रउरा

जिगर के टुकडा कहेले माई

 

‘मनोज’ हमरा हिया में हरदम

खुदा के जइसन रहेले माई

 

( चार )

फ़िल्मी गीत

( फिल्म- मेहंदी लगा के रखना-3 )

अँचरा छोड़ा के चल काहे दिहले

एतना दूर ए माई

अब के बबुआ, बबुआ कहिके हमके पास बोलाई

तोरा बिना जीही, जीही कइसे

तोरा बिना जीही, जीही कइसे

तोर बउरहवा रे माई

रे माई

तोरा बिना जीही, जीही कइसे

तोर बउरहवा रे माई

 

माई….माई…माई…

 

मन के दरदिया, अब के बूझी, अब के पोछी अँखिया से लोर

केकरा आगे फूट के रोअब, के समझी सिसकी के शोर

बिन कहले दुखवा जे बूझे, बिन कहले दुखवा जे बूझे

अइसन के हो पाई… रे माई..

तोरा बिना जीही, जीही कइसे

तोर बउरहवा रे माई

 

दुनिया के मेला में काहें तू हमसे छोड़वले हाथ रे

हमरा के भी लेले चलते, ले चलते अपने साथ रे…

खूँटा उखड़ गइल बा गईया के

खूँटा उखड़ गइल बा गईया के

अब इ बछड़ुआ कहवाँ जाई

रे माई…

तोरा बिना जीही, जीही कइसे

तोर बउरहवा रे माई

 

( पाँच )

दोहा 

माई रे ! जाई कहां, देवता पूजल तोर।

कहियो त होइबे करी, हमरो खातिर भोर।।

दुनिया से जब-जब मिलल ठोकर आ दुत्कार ।

तब-तब बहुते मन परल माई तोर दुलार।।

 

( छः 

कुछ फुटकर शेर

बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल

माई रे, अपना घर के उ आंगन कहाँ गइल

 

ना परे मन घर कबो बबुआ के भलहीं

रोज बुढिया भोर में कउवा उचारे

 

पडे जब डांट बाबू के, छिपीं माई का कोरा में

अजी इ बात बचपन के मधुर संगीत लागेला

 

धन दौलत सब तू ले ल

माई हमरा बखरा में

 

ए बबुआ नइखे हमरा डॉलर-फालर के काम

रहs आंख के सोझा हरदम माई कहे हमार

 

मझधार से हम बाँच के अइनी किनार पर

देवास पर भगवान से भखले होई माई



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