world-war-1-2.jpg

Hum BhojpuriaApril 27, 20221min990

आर.के. सिन्हा

रूस के हमला से तार-तार हो रहल यूक्रेन से आ रहल खबर अउर तस्वीरन के देख के कवनों भी संवेदनशील व्यक्ति के दिल दहल सकsता। रूसी सेना लगातार हमला बोल रहल बा। एसे जान-माल के बड़ स्तर पर तबाही हो रहल बा। बम वर्षा से मानवता मर रहल बा। विश्व बिरादरी के तमाम अपील से बेरपवाह रूस, यूक्रेन पर हल्ला बोल रहल बा। काहे ना कवनों भी मसला के हल वार्ता से निकलता। अगर बातचीत के बाद हल नइखे निकलत त समझ लीं दूनू में से कवनों पक्ष शांति अउर अमन के लेके गंभीर नइखे। उ लोग दुनिया के हर अहम शहरन में बनल ओ कब्रिस्तानन के नइखे देखले जहां पर पहिला, दूसरा विश्वयुद्ध चाहे फेर कवनों अन्य जंग के शहीद चिर निद्रा में बा। पिछला 100-125 साल में विभिन्न जंग में करोड़न लोग के जान गइल बा। आखिर केहू के का मिल गइल एतना लोग के मार देहला के बाद भी। युद्ध के विरूद्ध साहिर लुधियानवी के कालजयी नज्म के कुछ हिस्सा के पढ़ लीं-

“ख़ून अपना हो या पराया हो, नस्ल-ए-आदम का ख़ून है/ आख़िर जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में, अम्न-ए-आलम का ख़ून है/ आख़िर बम घरों पर गिरें कि सरहद पर, रूह-ए-तामीर ज़ख़्म खाती है।”

बेशक, जंग के विचार पर एतना करारा हमला शायद ही कवनों दोसर लेखक कइले होखे।

अगर रउआ राजधानी में रह रहल बानीं त रउआ धौलाकुआं के करीब दिल्ली वार सिमिट्री में जरूर जाए के चाहीं। इहवाँ चौतरफा हरियाली के बीच पहिला आ दूसरा विश्वयुद्ध के योद्धा चिरनिद्रा में बा लोग। ई कब्रिस्तान एगो हरा-भरा मैदान के जइसन लागेला, जेमे कुछ भाग में क्रम से योद्धा लोग के कब्र बा। ये कब्रन पर संगमरमर के पत्थर पर युद्ध में प्राण के आहुति देवे वाला सैनिक सबके संक्षिप्त परिचय मिलेला।

ये सब शहीद लोग के आयु के पढ़ के मन उदास हो जाला। ई लोग 22 से 25 साल तक के बा। जरा सोंची कि युद्ध के विभीषिका के कारण भरल जवानी में ई सब जान गंवा बइठल। इनकर भी माता-पिता होइहें, इनकर भी भाई-बहन अउर आपन करीबी लोग होई। दिल्ली वार सिमिट्री में 1951 में इलाहाबाद, कानपुर, देहरादून आ लखनऊ से कब्रन के अवशेष इहाँ पर ले आइल गइल रहे। ई सभे प्रथम विश्व युद्ध के शहीद रहे। एने ग्यारह सौ से अधिक कब्र बा। ई कब्रिस्तान बीच-बीच में आबाद हो जाला, जब इहाँ पर पर्यटक लोग के कवनों जत्था आ जाला। ई जत्था प्राय: ब्रिटेन, कनाडा चाहे अमेरिका के नागरिक के ही होला।

दिल्ली वार सिमिट्री में गोरखा रेजिमेंट से जुड़ल अंग्रेज सैनिक सबके भी समाधी बा। रउआ ये तरह के कब्रिस्तान भारत के कई शहरन के अलावा सिंगापुर, थाईलैंड वगैरह में भी मिल जाई। सिंगापुर के कब्रिस्तान में पंजाब रेजिमेंट के सैकड़न सिपाही लोग के कब्र बा, जे पहिला या दूसरा विश्वयुद्ध में शहीद भइल।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री पीएम बोरिस जॉनसन कह रहल बाड़ें कि रूस दूसरा विश्वयुद्ध के बाद यूरोप में सबसे बड़हन जंग के तैयारी कर रहल बा। येसे पहिले दुनिया दू गो विश्वयुद्ध झेल चुकल बा अउर ओ दूनू जंग में जेतना तबाही मचल रहे, उ तीसरा विश्वयुद्ध में मचे वाला कहीं विनाशकारी तबाही के भयानक तस्वीर देखा रहल बा। दूनू विश्वयुद्ध में दुनिया में ना सिर्फ करोड़न लोग के मौत भइल, बल्कि ज्यादातर देशन में भुखमरी, बेरोजगारी आ भारी महंगाई जइसन हालत बन गइल रहे।

समूचा दुनिया देख रहल बा कि यूक्रेन पर रूस के ताबड़तोड़ हमला से तबाही मच रहल बा। ये युद्ध आ तबाही के बीच यूक्रेन के आम नागरिक डरल-सहमल बाड़ें। हमला के वजह से टूटल-बिखरल घर अउर जगह-जगह लागल आग से बचत-भागत लोग दिखाई दे रहल बा। बुजुर्ग से लेकर बच्चन के बेबसी उनके भींजल आंख में साफ देखल जा सकेला। यानी यूक्रेन में स्थिति बेहद भयावह हो चुकल बा।

हम 1971 के युद्ध एगो पत्रकार के रूप में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) जाके कवर कइले रहीं। उहाँ हम युद्ध से भइल तबाही के अपना आँखी से देखले रहनीं। हजारन-लाखन बेकसूर इंसान शहीद भइल रहे आ असंख्य विकलांग। लाखन बंगाली बच्चियन अउर महिला सबके पाकिस्तानी सैनिक बलात्कार कइले रहे! हमनीं ओ युद्ध में विजयी त भइनी पर कवना कीमत पर। ओ जंग के अलावा भारत के 1948 आ 1965 में पाकिस्तान से अउर 1962 में चीन से जंग हो चुकल बा। कारगिल अउर श्रीलंका में भी भारतीय सेना के हजारन शूरवीर लोग देश खातिर आपन जान के नजराना पेश कइले बा। लेकिन, जरा ओ परिवार के बारे में भी सोचल जाय जेकरा परिवार के कवनों सदस्य जंग में शहीद होला

ये सब जंग में शहीद भइल जवान लोग के नाम इंडिया गेट में बनल राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में अंकित बा। इंडिया गेट त पहिले विश्वयुद्ध में शहीद भइल भारतीय सैनिक सबके याद में ही बनल रहे। इंडिया गेट के युद्ध स्मारक में ओ वीर लोग के नाम भी अंकित बा जे श्रीलंका में 1987 में भारतीय शांति रक्षा सेना (आईपीकेएफ) के हिस्सा रहे। ओ शहीद लोग में राजधानी के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज (यूसीएमएस) में पढ़ल मेजर (डॉ.) अश्वनी कान्वा भी रहले। उ भारतीय शांति रक्षा सेना (आईपीकेएफ) के साथ 1987 में जाफना, श्रीलंका गइल रहलन। उ 3 नवंबर, 1987 के अपना कैंप में घायल भारतीय सैनिक सबके इलाज में जुटल रहले। ओ मनहूस दिन शाम के वक्त उनका पता चलल कि हमरा कुछ जवानन पर कैंप के बाहर हीं हमला हो गइल बा। उ फौरन उहाँ पहुंचले। उ जब ओ लोग के फर्स्ट एड देत रहलन तब आसपास छिपके बइठल लिट्टे के आतंकी सब उनका पर गोली बरसा देहलस। उनका तीन गोली लागल। दोसरा के इलाज करे वाला के फर्स्ट एड देवे वाला कोई ना रहे।

काश, लिट्टे जेनेवा संधि के उल्लंघन ना कइले रहित त उ शहीद ना होखते। बेहद हैंडसम मेजर अश्वनी के शादी खातिर लड़की ढूंढल हीं जात रहे, जब उ शहीद भइले। उ कॉलेज के टॉपर रहले। ये उदाहरण के देहला के मकसद ई बा कि युद्ध में अनगिनत मासूम लोग भी मारल जाले। ई स्थिति बेहद चिन्तनीय बा।

बुद्ध और गांधी के देश भारत के रूस-यूक्रेन युद्ध के समाप्त करवावे के दिशा में सक्रिय पहल करे के होई। ये संकट से दुनिया के सबसे बड़हन लोकतंत्र भारत अछूता नइखे रह सकत। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बड़हन पहल करत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से फोन पर बातचीत कइले आ शांति के दिशा में कदम बढ़ावे के कहलन। मोदी अउर पुतिन के बीच करीब 20 मिनट तक बातचीत भइल। भारत के युद्ध के विरुद्ध माहौल बनावे के दिशा में त्वरित आ प्रभावी पहल करहीं के चाहीं।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


123154258_1235.jpg

Hum BhojpuriaMarch 21, 20221min1600

आर.के. सिन्हा

लता मंगेशकर के शरीर पूरा हो गइल। सरस्वती पूजा के अगिला दिन विदा होत लता मंगेशकर के देख के लागल जइसे मां सरस्वती अबकी बार अपना सबसे प्रिय पुत्री के ले जाये हीं स्वयं आइल रहली। लता मंगेशकर के हमनीं के बीच ना रहला के मतलब बा कि वाग्देवी के एगो वरद लौ बुझ गइल बा। लता जी अपना निर्दोष सुर से भारतीय संगीत वांग्मय के समृद्ध बनवली। उ हमनी के भाव कातर, अहिंसक, रचनात्मक अउर आशावान बनावे में मदद कइली। उनकर साधना आत्म यज्ञ के तरह रहे।

सुरकोकिला लता मंगेशकर किम्वदंती के पर्याय बन चुकल बाड़ी। उनका गीतन के कद्रदान दुनिया भर में मौजूद बा। जेतना लोकप्रिय उ अपना देश भारत में रहली, ओतने लोकप्रियता उनका सरहदी मुल्क पाकिस्तान में भी मिलल। उनकर आवाज़ अउर गायकी के खुबसूरती बा कि पर्दा पर कमसिन नायिका लोग के शोखी, चंचलता, अल्हड़पन व रूठे-मनावे के अभिव्यक्त करे में जेतना जीवंतता महसूस कइल जाला, ओतने हीं भावप्रवणता मां-बहिन पर फिल्मावल गाना में देखे के भी मिलेला।

27 जनवरी, 1963 के दिल्ली में लता मंगेशकर नेशनल स्टेडियम में जब आपन अमर गीत गवली त हजारन लोग रोवत रहे। उहवाँ चीन के साथ भइल जंग में शहीद भइल जवानन के इयाद में एगो कार्यक्रम आयोजित कइल जात रहे। ओ जंग के परिणाम के कारण देश हताश रहे। लता मंगेशकर जइसहीं ‘ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी…”  गवली त उहाँ उपस्थित अपार जन समूह के साथ-साथ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के आंख भी नम हो गइल रहे

ख़ालिस हिन्दी गीत के तौर पर ज्योति कलश छलके जइसन कालजयी प्रस्तुति बा त ऐ मालिक तेरे बंदे हम जइसन गीत निराशा के क्षणो में गहन अंधकार से निकले के रौशनी देला। गांधीवादी जीवन दर्शन के प्रभाव ये प्रस्तुति में झलकेला। ई गीत चेतना के स्पंदित कर आश्वस्ति के भाव जगावेला। अध्यात्म के स्तर पर परंपरागत जीवन मूल्य-बोध के असर के बावजूद आशावाद के ज़िंदा राखे के पाठ ह। अइसन स्वच्छ निर्मल मन के व्यक्तित्व दुर्लभ होला जइसे लता जी रहली। संस्कृत के श्लोकन के गायन होखे चाहे रामचरितमानस के गायन होखे चाहे उर्दू के गजल होखे, चाहे बांगला के कवनों गीत होखे, उ एक समान सहजता से सुमधुर स्वर में गाके श्रोतागण के कुछ क्षण में ओही स्वप्नलोक में पहुंचा देत रहली। उ अपना स्वर के साथे हमेशा हमनीं के पास अमर रहियें, समय कवनों भी आवे। उनकर स्वर कबो ना लडखड़ाइल, उनके आवाज में उहे ताजगी रहल जवन कवनों बच्चा के आवाज में होला. उ शुद्ध चरित्र अउर निर्मल मन के स्वामिनी रहली। उनकर प्रशंसा आ श्रद्धांजलि में शब्द नइखे मिलत। मृत्यु हमेशा शोक के विषय ना होला। मृत्यु जीवन के पूर्णता ह। लता जी के जीवन जेतना सुन्दर रहल, उनकर मृत्यु भी ओतने हीं सुन्दर भइल। उनके जइसन सुन्दर अउर धार्मिक जीवन विरले के हीं प्राप्त होला। लगभग पांच पीढ़ी उनका के मंत्रमुग्ध हो सुनले बा आ हृदय से सम्मान देले बा।

 

उनकर पिता जी जब अपना अंतिम समय में घर के बागडोर उनके हाँथ में थमवले, तब उ तेरह वर्ष के नन्ही जान के कंधे पर छोट-छोट चार बहन-भाई के पालन के जिम्मेवारी रहे। लता जी आपन समस्त जीवन ओ चारू के समर्पित कर देहली। आ अब जब उ गइली ह त उनकर परिवार भारत के सबसे सम्मानित प्रतिष्ठित परिवार में से एक बा। कवनों भी व्यक्ति के जीवन एसे अधिक सफल का होई? लता मंगेशकर के पवित्र शख्सियत के हीं परिणाम रहे कि आजाद भारत के सभ राष्ट्रपति अउर प्रधानमंत्री उनका से आदरभाव से मिलत रहे। उनकर कद देश के कवनों भी नागरिक से बड़ा रहे। देश के पहिला राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से लेके मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अउर पहिला प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु से लेके नरेन्द्र मोदी से उनकर निजी संबंध रहे। उ जब राज्यसभा सदस्य रहली तब हीं उनके भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजल गइल रहे। ई बात साल 2001 के ह। उनका पद्म भूषण 1969 में, पद्म विभूषण 1999 में आ दादा साहेब फाल्के पुरस्कार 1989 में मिल गइल रहे। जाहिर बा, उ ये सब पुरस्कार के लेवे खातिर भी राजधानी आवत रहली। लता मंगेशकर 1983 में राजधानी के इंद्रप्रस्थ स्टेडियम में आपन पसंदीदा गीत सुना के दिल्ली के कृतज्ञ  कइले रहली। ओ कार्यक्रम के आयोजन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) कइले रहे ताकि कपिल देव के नेतृत्व में वर्ल्ड कप क्रिकेट चैंपियन बनल भारतीय टीम के खिलाड़ी सबके पुरस्कृत कइल जा सके। लता जी इहाँ कार्यक्रम पेश कइला के बदला में एक पइसा भी ना लिहली। ओ कार्यक्रम में उ रहें ना रहें हम महका करेंगे… – ऐ मालिक तेरे बंदे हम… अजीब दास्तां है ये… मेरी आवाज ही पहचान है… आज फिर जीने की तमन्ना है… जइसन आपन अमर गीत सुनवले रहली। येही बीच जब से उनकर राज्यसभा के कार्यकाल 2005 में समाप्त भइल त फिर उ संभवत: एने ना अइली। केतना अद्भुत संयोग बा कि अपना लगभग सत्तर बरिस के गायन कैरियर में लगभग 36 भाषा में हर रस/भाव के 50 हजार से भी अधिक गीत गावे वाली लता जी अपना पहिला आ अंतिम हिन्दी फिल्मी गीत के रूप में भगवान के भजन हीं गवले बाड़ी। ‘ज्योति कलश छलके’ से ‘दाता सुन ले’ तक के यात्रा के सौंदर्य इहे बा कि लताजी ना कबो अपना कर्तव्य से डिगली ना अपना धर्म से! ये महान यात्रा के पूर्ण भइला पर हमनीं के रोम रोम रउआ के प्रणाम कर रहल बा लता जी। हमनीं जेतना चाहीं ये बात पर गर्व कर सकेनीं कि हमनीं अपना जीवनकाल में लता मंगेशकर के देखले सुनले बानीं।

 

( लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


india-japan.jpg

Hum BhojpuriaFebruary 15, 20221min2480

आर.के. सिन्हा

भारत-जापान संबंध खातिर मौजूदा साल 2022 मील के पत्थर बा। दरअसल दूनू देशन के बीच 1950 में ही सकारात्मक राजनयिक संबंध के श्रीगणेश हो गइल रहे। दूनू देशन के भगवान बुद्ध के अलावा शांति, अहिंसा अउर भाईचारा के संदेश ही करीब ले आइल रहे। बौद्ध धर्म के अलावा जापान में गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगौर के भी बहुत सम्मान कइल जाला। एकरा साथ ही टोक्यो यूनिवर्सिटी में हिन्दी के अध्यापन साल 1908 से ही चालू हो गइल रहे। भारत से बाहर सबसे पहिले हिन्दी के टोक्यो यूनिवर्सिटी में ही पढ़ाई चालू भइल रहे। भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष के दौरान भी जापान के शाही सेना सुभाष चन्द्र बोस के आजाद हिन्द फौज के सहायता प्रदान कइले रहे। त ये तरे से भारत अउर जापान के कई बिन्दु करीब ले आवेला।

दरअसल जापान ओ देशन में से नइखे जे कवनों भी व्यापारिक संबंध बनावे में अन्य देश के शोषण करे के संबंध में सोचत होखे। जापान भारत के विगत सत्तर साल के दौरान विभिन्न परियोजना के धन उपलब्ध करावे में खुले हाथ मदद कइले बा। अब जापान के मदद से ही भारत में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट आ रहल बा। जापान दोसरा देशन के जवना दर पर ऋण देला, ओसे काफी कम दर पर भारत के मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना खातिर जरूरी राशि मुहैया करा रहल बा। ऋण वापसी के मियाद भी 25 बरिस के जगह 50 बरिस राखल गइल बा। आर्थिक दिक्कत से जूझ रहल दिल्ली मेट्रो रेल निगम के चउथा फेज के निर्माण में तेजी ले आवे खातिर जापानी कंपनी जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी मदद के हाथ बढ़वले बा। ई कंपनी चउथा चरण के ट्रैक के निर्माण के वास्ते आर्थिक मदद देवे खातिर तइयार हो गइल बा। ये बाबत जरूरी प्रक्रिया भी शुरू हो गइल बा। मानल जा रहल बा कि आर्थिक मदद मिलते ही दिल्ली मेट्रो के चउथा चरण के निर्माण कार्य में अउर तेजी आई। कोरोना वायरस संक्रमण के चलते 22 मार्च 2020 से अचानक बंद भइल दिल्ली मेट्रो फेर 7 सितंबर से शुरू हो गइल, लेकिन ये बीच ओकरा 1500 करोड़ रूपया के आसपास घाटा हो गइल। अइसना में नया प्रोजेक्ट खातिर आर्थिक दिक्कत आवत रहे।

भारत में जापान के दर्जनों कम्पनी अरबों रुपया के निवेश कइले बा। लेकिन ओ लोग पर केहू कवनों ये तरे के आरोप ना लगा सकल बा, जवना से केहू उनके मंशा पर सवाल खड़ा करत होखे। दिल्ली, मुंबई, गुरुग्राम, नोएडा वगैह में हजारों जापानी नागरिक भारत के विकास में आपन योगदान दे रहल बा। भारत में रहे वाला जापानी नागरिक भारत के उज्जवल भविष्य के ले के बेहद आशावादी बाड़े। ई जापानी होंडा सिएल कार, होंडा मोटरसाइकिल, मारुति, फुजी फोटो फिल्मस, डेंसो सेल्ज लिमिटेड, डाइकिन श्रीराम एयरकंडशिंनिंग, डेंसो इंडिया लिमिटेड समेत लगभग दू दर्जन जापानी कंपनियन के भारत के विभिन्न भाग में स्थित दफ्तरन अउर फैक्ट्रियन में काम करेले। ई लो भगवान बुद्ध के अनुयायी त हइले ह। ई लो भारतभूमि के गौतम बुद्ध के भूमि होखे के कारण ही पूजनीय माने ला। ई लो मानेला कि भगवान बुद्ध के जीवन समाज से अन्याय के दूर करे खातिर समर्पित रहे। उनके करुणा भावना ही उनका के विश्व भर के करोड़न लोगन के हृदय तक पहुँचवलस। ये जापानी लोग में भी भारतीय संस्कार ही बा। ई लोग आदतन मितव्ययी होले। ई लो भी भारतीय के तरह ही संयुक्त परिवार के संस्था के महत्व देलें। अगर कुछ जापानी एक-दोसरा के करीब रहेलें, तब ई लोग कार पूल करके ही दफ्तर गइल पसंद करेलें। त ई कहल जा सकता कि आमतौर पर दूनू देशन के नैतिकता मिलत-जुलत बा।

निश्चित रूप से जापान भारत के विशेष मित्र के दर्जा देला। ये संबंध के मजबूती देवे में भगवान गौतम बुद्ध के आशीर्वाद भी बा। एही से जापान भारत से अपना के भावनात्मक स्तर पर करीब पावेला। जापान से भारत में हर साल हजारों के संख्या में बुद्ध धर्म के माने वाले तीर्थयात्री आवेलें। ई लोग सामान्यतः बोधगया-राजगृह-सारनाथ-वाराणसी जालें। बोधगया आवे वाले जापानी पर्यटक सारनाथ भी अवश्य जालें। सारनाथ में गौतम बुद्ध बुद्धत्व प्राप्त कइला के बाद आपन पहिला उपदेश देले रहले। बौद्ध अनुयायियन के गौतम बुद्ध के जन्मस्थली भारत के ले के आकर्षण स्वाभाविक बा।

बोधगया-राजगीर-नालंदा सर्किट देश के सबसे खासमखास पर्यटन स्थलन में मानल जाला। राजधानी के इंद्रप्रस्थ पार्क में स्थित विश्व शांति स्तूप के व्यवस्था करेली कात्सू सान। उ मूलतः जापानी हई। उ सन 1956 में ही भारत आ गइल रहली, भारत अउर बुद्ध धर्म के करीब से जाने के इरादे से। एक बार भारत अइला के बाद इहाँ पर उनकर मन ये तरह से लागल कि फेर ऊ इहाँ पर बसे के ही निर्णय ले लिहली। उ भारत के संसार के आध्यात्मिक विश्व गुरु माने ली। कात्सू जी धारा प्रवाह हिन्दी बोले ली। ऊ हिन्दी प्रसिद्ध साहित्यकार काका साहेब कालेकर जी से सीखले रहली। उ राजधानी में सरकार के तरफ से होखे वाला सर्वधर्म प्रार्थना सभा के बीतल दशकन से एक स्थायी अंग बाड़ी। आगामी 30 जनवरी के गांधी जी के बलिदान दिवस पर राजघाट में होखे वाला प्रार्थना सभा में भी ऊ भाग लिहें। उ कहेली कि भारत- जापान मैत्री अटूट बा, काहे कि एकर आधार भगवान बुद्ध बाड़ें जे भारत से बाड़ें।

भारत-जापान संबंध पर बात करत चीनी दृष्टिकोण के नजरअंदाज नइखे कइल जा सकत। जापान के उपप्रधानमंत्री के तौर पर तारो असो 2006 में भारत के दौरा पर आइल रहले। ओ समय उ कहले रहले, अतीत के 1500 साल से भी ज़्यादा समय से इतिहास के अइसन कवनों वाक़या नइखे जब चीन के साथे हमनीं के संबंध ठीकठाक रहल होखे। ये बीचे, भारत अउर चीन के संबंध भी कतई मौत्रीपूर्ण नइखे मानल जा सकत।  चीन भारत के बहुत बड़हन हजारन एकड़ जमीन पर कब्जा जमवले बा। भारत-चीन के बीच सीमा विवाद हल होखे के नाम ही नइखे ले रहल, काहे कि, चीन के नीति कभी पारदर्शी रहले नइखे। उ भारत के शत्रु पाकिस्तान के परम मित्र भी ह। त भारत-जापान के चीन के ले के स्थिति भी लगभग एके बा। एसे दूनू देशन के चीन के भी हर स्तर पर मुकाबला करे के होई।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं। )


img118.jpg

Hum BhojpuriaDecember 10, 20211min2690

आर.के. सिन्हा

कश्मीर के वादी फिर से मासूमन के खून से लाल हो रहल बा। उहाँ पर धरतीपुत्र कश्मीरी केमिस्ट माखन लाल बिंद्रा से लेके बिहार के भागलपुर से काम के खोज में गइल गरीब वीरेन्द्र पासवान अउर दू अध्यापकन के गोली से भून दिहल गइल। पासवान के अलावा, सभ के मारल गइला पर त पूरा देश में शोक व्यक्त कइल जा रहा बा, पर पासवान के मौत पर उनका घरवालन भा कुछ अपना लोग के अलावा केहू सामने ना आइल। बिहार के भागलपुर के रहे वाला पासवान आतंकियन के गोली के शिकार हो गइलन। वीरेंद्र पासवान के अंतिम संस्कार झेलम किनारे दूधगंगा श्मशान घाट पर कर देहल गइल। श्रीनगर के मेयर जुनैद अजीम मट्टू के ये संवेदनहीन बयान के पढ़ीं जेमे उ कह रहल बाड़ें कि हम भागलपुर में ना, इहवें श्रीनगर में उनका (पासवान) भाई आ अन्य परिजन के पास सांत्वना व्यक्त करे जाएम।

केतना महान काम कर रहल बाड़े मट्टू साहब। ई सब बोलत में उनके जमीर उनका के रोकलस तक ना। उ पासवान के श्रीनगर में रहे वाला संबंधी लोग से मिले के वादा करत रहले, जे शायद ही श्रीनगर में ढूढ़ला से मिलिहेंI पासवान के घरवालन के मुआवजा के तौर पर सवा लाख रुपया के अनुग्रह राशि प्रदान कर देहल गइल बा। भागलपुर के रहे वाला वीरेंद्र पासवान अक्सर गर्मी के दौरान कश्मीर में रोजी रोटी कमाये आवत रहलन। उ श्रीनगर के मदीनसाहब, लालबाजार इलाके में ठेला पर स्वादिष्ट गोल गप्पा बनाके बेंचत रहले। उनका हत्या के जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट आफ जम्मू कश्मीर नामक संगठन लेले बा। लेकिन, कवनों मानवाधिकार संगठन या कांग्रेस, आप, सपा, बसपा जइसन कवनों दल अब तक मांग नइखे कइले कि पासवान के घर के कवनों सदस्य के सरकारी नौकरी देहल जाय। या उनका के भी लखीमपुर खीरी के दंगाइयन के तरह पचासों लाख के सौगात देहल जायI का आतंकियन के हाथे मारल गइल पासवान के परिवार के सिर्फ सवा लाख रुपया के राशि देहल हीं पर्याप्त बा?

कड़वी सच्चाई त ई बा कि देश के कवनों भी भाग में बिहार के नागरिक के मारल गइला या अपमानित कइल गइला पर कवनों खास प्रतिक्रिया ना होला। अफसोस कि ई ना देखल जाला कि बिहारी जहाँ भी जाला उहाँ पर उ पूरा मेहनत से जी-जान लगाके काम करेला। रउआ जम्मू-कश्मीर या अब केन्द्र शासित प्रदेश हो गइल लद्दाख के भी एक चक्कर लगा लीं। रउआ दूर-दराज के इलाकन में अंडमन से लक्षद्वीप, हिमाचल से अरुणाचल तक बिहारी मजदूर निर्माण कार्य में लागल मिलिहें। लेह-करगिल मार्ग पर सड़क अउर दोसरा निर्माणाधीन परियोजनन में बिहारी सख्त विपरीत जलवायु में भी काम करत मिलिहें। कुछ समय पहिले हमरा कुछ मित्रन के लेह जाये के अवसर मिलल रहे। उहाँ पर आम गर्मी के मौसम में भी काफी ठंड रहे। उहाँ तापमान 12 डिग्री के आसपास ही दिन में भी रहत रहे। सुबह-शाम त पूछीं मत ! दिन में भी जैकेट या स्वेटर पहिनल जरूरी बा। एह कठिन हालात में भी रउआ अनेक बिहारी गुरुद्वारा पत्थर साहब के आसपास मिल जइहें। उनका चेहरा पर उत्साह भरल रहेला। उ पराया जगहन के भी अपना ही माने लागेला। गुरुद्वारा पत्थर साहब के बहुत महान मानल जाला, काहे कि इहाँ बाबा नानक आइल रहीं।

रउआ लेह आ एकरा आसपास के होटलन आ बाजारन में भी बहुत से बिहारी मेहनत मशक्कत करत देखाई दे जइहें। ई लोग सुबह से लेके देर शाम तक काम करत रहलें। ये निर्दोष सब पर हमला कइला के का मतलब बा। ये सबके या दोसरा मासूम लोगन के उ मार रहल बाड़ें, जे अपना के कवनों इस्लामिक संगठन के सदस्य बतावेलें। अब जरा देखीं कि कश्मीर में ताजा घटना सब के बाद कवनों भी मुस्लिम नेता या मानवाधिकार संगठन या कश्मीरियत के बात करे वाला राजनेता तेजी से बढ़त हिंसक वारदातन के निंदा ना कइलस। ई सब लोग भी ई अच्छा तरह समझ लेव कि सिर्फ ई कहला से त बात ना बनी कि इस्लाम भी अमन के हीं मजहब ह। ई त इनका सिद्ध करे के होई I इनका अपना मजहब के कठमुल्लन से दू-दू हाथ करे के होई।

बहरहाल, वीरेंद्र पासवान त कश्मीर में भी बिहार से रोजी रोटी कमाये हीं आइल रहलें। ऊ गरीब केहू के का बिगड़ले रहले। जब गोलियन से छलनी वीरेन्द्र पासवान के शव मिलल त उनक मुँह पर मास्क तक लागल रहे। अपना घर से हजारन किलोमीटर दूर कश्मीर रोजी रोटी के तलाश में गइल पासवान के शरीर में कोरोना त जा ना पवलस, पर आतंकियन के बुलेट शरीर के छलनी कर देहलस। पासवान परिवार, लालू यादव के परिवार या केहू के भी एतना फुर्सत नइखे कि उ उनका मौत के निंदा भर हीं कर देव। कवनों दलित नेता, कवनों बुद्धिजीवी या ह्यूमन राईट वाला आगे ना आइल। ई कवनों पहिला बार नइखे भइल जब अपनहीं देश में कवनों गरीब बिहारी के साथ अइसन घटना भइल होखे। कुछ साल पहिले मणिपुर में भी बिहारियन के साथे मारपीट के घटना बढ़ल रहे। ओ लोग के मारल  देश के संघीय ढांचा के ललकरला के समान बा। ई स्थिति हर हालत में रुके के हीं चाहीं। एकरा के ना रोकल गइल त देश बिखराव के तरफ हीं बढ़ीं।

एही तरे से बिहारियन पर देश के अलग-अलग भाग में हमला होत रहल बा। अगर बात असम के करीं त उहाँ पर ये हमलन के पीछे उल्फा आतंकवादियन के भूमिका होला। दरअसल जब भी उल्फा के केंद्र के सामने आपन ताकत देखावे के होला, उ निर्दोष हिंदी भाषी (बिहार या यूपी वालन) के हीं निशाना बनावे लागेला। पूर्वोत्तर के दू राज्यन क्रमश: असम आ मणिपुर में हिन्दी भाषियन के कई वर्ष से मारल जात रहल बा। ई हिन्दी भाषी पूर्वोत्तर में सदियन से बसल बाड़ें। असम आ मणिपुर में हिन्दी भाषियन के आबादी लाखन में बा। ई लोग असमिया तथा मणिपुरी हीं बोलेला। ई लोग पूरे तरह से ओइजा के ही हो गइल बा। बस एक तरह से इनके अपने पुऱखन के राज्यन से भावनात्मक संबंध भर हीं बँचल बा।

दिल्ली में अपना मुख्यमंत्रित्वकाल के दौरान स्वर्गीय शीला दीक्षित भी एक बार राजधानी के समस्यन खातिर उत्तर प्रदेश आ बिहार से आके बसेवाले लोगन के ज़िम्मेदार ठहरा देले रहली। ई बात 2007 के ह जब शीला दीक्षित कहले रहली कि दिल्ली एगो संपन्न राज्य बा आ इहाँ जीवनयापन खातिर बिहार आ उत्तर प्रदेश से बड़ संख्या में लोग आवेला आ इहवें बस जाला। ये कारण से इहाँ के मूलभूत सुविधा के उपलब्ध करावल कठिन हो रहल बा। सवाल ई बा कि का बिहारी देश के कवनों भी भाग में रहे-कमाये खातिर स्वतंत्र नइखे? अब अइसनके बात केजरीवाल भी करें लागल बाड़ेI

बिहार के रउआ देश के ज्ञान के केन्द्र चाहे राजधानी मान सकेनीं। महावीर, बुद्ध अउर चार प्रथम शंकराचार्य लोग में एक (मंडन मिश्र) अउर भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तक के बिहार देहले बा। ज्ञान प्राप्त करे के जिजीविषा हरेक बिहारी में सदैव बनल रहेला। बिहारी खातिर भारत एक पत्रिव शब्द ह। उ सारा भारत के हीं मानेला। उ मधु लिमये, आचार्य कृपलानी से लेके जार्ज फर्नाडींज के आपन नेता मानत रहल बा अउर बिहार से लोकसभा में भेजत रहल बा। का बिहारी के भारत के कवनों भी भाग में ये तरह से मारल-पीटल जाई?

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईंI )


img278.jpg

Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min2990

आर.के. सिन्हा

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जा के बाद भयंकर हाहाकार मचल बा। उहाँ सरेआम कत्लेआम चालू बा। नतीजा, ज्यादातर स्थानीय अफगानी नागरिक भी कहीं अउर जाके बसे के चाह रहल बा। उनका अफगानिस्तान में अब अपना बीबी बच्चन के साथे एक मिनट भी रहल सही नइखे लागत। अफगानिस्तान से बहुत सारा हिन्दू-सिख समुदाय के लोग भारत आ रहल बा। उनका इहाँ पर सम्मान के साथ शरण भी मिल रहल बा। पर अफगानिस्तान के मुसलमानन के इस्लामिक देश अपना इहाँ शरण देवे खातिर आगे नइखे आवत। सब केहू ये लोग के अपना इहाँ शरण देवे या शरणार्थी के रूप में जगह देवे से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से मना कर देले बा। दुनिया के इस्लामिक देशन के अपना के नेता माने वाला पाकिस्तान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरत, तुर्की आ बहरीन जइसन देश या त चुप हो गइल ह या फिर ऊ लोग अपना अफगानिस्तान से लागे वाली सरहदन के ज्यादा मजबूती से घेर लेले बा। चौकसी बढ़ा दिहले बा ताकि कोई घुसपैठ ना कर सके। ले-दे के सिर्फ शिया बहुल ईरान ही ये अफगानियन खातिर आगे आइल बा। इहाँ पहिले से ही लगभग साढ़े तीस लाख सुन्नी अफगानी शरणार्थी रहेला। ईरान के तीन तरफ से सीमा अफगानिस्तान से मिलेला। शिया शासित ईरान के भारी संख्या में सुन्नी शरणार्थियन के शरण देहल वाकई काबिले तारीफ बाI

अफगानिस्तान संकट में धूर्त पड़ोसी पाकिस्तान के काला चेहरा खुल के सामने आ रहल बा। ऊ अपना अफगानिस्तान से लागल सरहदन पर सेना के तैनात कर देले बा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कह रहल बाड़े कि हमरा इहाँ त पहिलहीं से लाखन अफगानिस्तानी शरणार्थी बाड़ें। हम अब अउर ना लेम। त फेर पाकिस्तान अपना के सारी दुनिया के मुसलमानन के रहनुमा काहे मानता। अफगानिस्तान संकट के बहाने पाकिस्तान के दोहरा चरित्र के समझल आसान होई। पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के मुसलमानन के हक खातिर सारी दुनिया के मुसलमानन के आये दिन खुल के आह्वान करत रहेला। ऊ संयुक्त राष्ट्र से ले के तमाम अन्य मंचन पर भारत के घेरे के भी नाकाम कोशिश करेला। लेकिन पाकिस्तान ई त बताओ कि उ अफगानिस्तान के मुसलमानन के अपना इहाँ शरण काहे नइखे देत? का कुछ हजार मुसलमानन के अउर आ जाए से पाकिस्तान में भुखमरी के हालात पैदा हो जाई?

पाकिस्तान त बांग्लादेश में रहे वाला अपना बेसहारा उर्दू भाषी बिहारी मुसलमान नागरिकन के भी अपना इहाँ लेवे के तैयार नइखे जे 1971 के बांग्ला देश आजादी के लड़ाई में पाकिस्तानी सेना के खुल के साथ दिहले रहे आ अभी शरणार्थी कैंपन में आपन जिंदगी काट रहल बा। पाकिस्तान के मालूम बा कि सिर्फ ढाका में एक लाख से अधिक बिहारी मुसलमान शरणार्थी कैम्पन में नारकीय जिंदगी गुजार रहल बाड़ें। बिहारी मुसलमान 1947 में देश के बंटवारे के वक्त पाकिस्तान चल गइल रहलें। जब तक बांग्लादेश ना बनल रहे तब तक त इनका कवनों दिक्कत ना रहे। पर बांग्लादेश बनते बंगाली मुसलमान बिहारी मुसलमानन के आपन जानी दुश्मन माने लागल। वजह ई रहे कि बिहारी मुसलमान तब पाकिस्तान सेना के खुल के साथ देत रहे जब पाकिस्तानी फौज पूर्वी पाकिस्तान में बंगालियन के ऊपर कत्लेआम मचावत रहे। इयाद करीं कि बिहारी मुसलमान ना चाहत रहे कि पाकिस्तान कभी भी बंटे।

ई लोग 1971 में मुक्ति वाहिनी के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सेना के खुल के साथ देले रहे। तब से ही इनका के बांग्लादेश के आम लोगन द्वारा नफरत के निगाह से देखल जाला। ओइसे ई बांग्लादेश में अभी भी लाखन के संख्या में बाड़ें अउर नारकीय यातना सहे के मजबूर बाड़ें। ई लोग पाकिस्तान जाए के भी चाहेला। पर पाकिस्तान सरकार ये लोग के अपना देश में लेवे के कत्तई तैयार नइखे। जरा सोंची कि कवनों जब देश अपनही देशभक्त नागरिकन के लेवे से मना कर दे। ई घटियापन पाकिस्तान ही कर सकेला। चीन में प्रताड़ित कइल जा रहल मुसलमानन के दर्द भी ओकरा सुनाई नइखे देत।

जब भारत धारा 370 के खतम कइलस त तुर्की अउर मलेशिया भी पाकिस्तान के साथ सुर में सुर मिलाके बात करत रहे। ऊ लोग भारत के निंदा भी करत रहे। मलेशिया के तब के राष्ट्रपति महातिर मोहम्मद कहत रहले, हम ई देख के दुखी बानी कि जवन भारत अपना के सेक्युलर देश होखे के दावा करेला, ऊ कुछ मुसलमानन के नागरिकता छीने खातिर क़दम उठा रहल बा। अगर हम अपना देश में अइसन करीं, त हमरा पता नइखे कि का होई? हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री आ अस्थिरता होई आ हर कोई प्रभावित होई। महातिर एक तरह से अपना देश के लगभग 30 लाख भारतवंशियन के खुल के चेतावनी भी देत रहले। ई दुनू देश पाकिस्तान के कहला पर संयुक्त रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलत रहे। पर ई दुनू मुल्क भी अफगानियन के अपना इहाँ रखे खातिर तइयार नइखे। अब इनका इस्लामिक प्रेम के हवा निकल गइल।

दुनिया भर में फइलल 57 इस्लामिक देशन के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के ईरान के छोड़ शेष सदस्य अपना तरफ से अफगानिस्तान के शरणार्थियन के हक में मानवीय आधार पर सामने नइखे आवत। कुल मिला के अफगानिस्तान संकट ओआईसी के खोखलापन के भी उजागर कर देलेबा। ई लोग सिर्फ इजराईल आ भारत के खिलाफ ही बोले आ बयान देवे के जानेला। अगर रउआ करीब से इस्लामिक देशन के आपसी संबंध के देखेम त समझ में आ जाई कि ये सबके एकता दिखावा भर खातिर बा। इयाद करीं कि रोहिंग्या मुसलमानन के म्यांमार के सबसे करीबी पड़ोसी बांग्लादेश शरण देवे से साफ इंकार कर दिहलस। बांग्लादेश के एक मंत्री मोहम्मद शहरयार कहलन कि ई रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश के सुरक्षा खातिर गम्भीर खतरा बाड़ें। हमरा इहाँ पहिले भी कई घटना घट चुकल बा। इहे कारण बा कि हम उनका लेके सावधान बानीं।

रोहिंग्या मुसलमानन के जाने वाला बतावेलें कि ई रोहिंग्या जल्लाद से कम ना ह। ई म्यामांर में बौद्ध कन्या सबसे बलात्कार के बाद उनकर हत्या कर के उनका अतडिंयन के निकाल फेंके से भी गुरेज ना करे लोग। इनके कृत्य के इनका देश में पता चलल त म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमान के खदेड़ल जाये लागल रहे। एकरा बाद से इनके हाथ-पैर फूले लागल बा आ ई लोग बांग्लादेश आ भारत में शरण के भीख माँगे लागल। हालांकि इनका के कवनों इस्लामिक देश त सिर छिपावे के जगह ना देवे। पर भारत में इनका हक में तमाम सेक्युलरवादी सामने आवत रहल बा। एही से ही ई लोग भारत में कई राज्यन में घुस भी गइल बा। बहरहाल, बात होत रहलs ह इस्लामिक देशन के अफगान संकट के लेके बनल नीति के। अब कोई कम से कम ई मत कहे कि इस्लामिक देशन में आपस में बहुत प्रेम आ सौहार्द बा।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


images-50.jpeg

Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min4190

आर.के. सिन्हा

भारत के महिला आ पुरुष हॉकी टीम के टोक्यो ओलंपिक खेल में चमत्कारी प्रदर्शन पर सारा देश गर्व महसूस कर रहल बा I  भारत के हॉकी प्रेमी के आँख एतना शानदार प्रदर्शन देखे खातिर तरस गइल रहे। पर तनी देखीं कि पुरुष अउर महिला हॉकी टीम के अधिकतर खेलाड़ी जेकर संबंध देश के छोट-छोट शहर, कस्बा आ गाँव से रहे ई कमाल कर दिखवलस। जेकरा पास खेल के आधारभूत ढांचा तक नसीब नइखे उहे खिलाड़ी अपना दुनू हॉकी टीम में लाजवाब खेल देखा रहल बा। ई खिलाड़ी लोग हरियाणा के शाहबाद मारकंडा, उत्तराखंड के हरिद्वार, झारखंड के खूंटी, पंजाब के अमृतसर के गांव अउर दूसर अनाम जगह से संबंध रखे ला लो। पर एह लोग में जीत आ आगे बढ़े के जज्बा सच में अदभुत बा।

भारत के महिला हॉकी टीम दुनिया में अभी तक नौंवी रैंकिंग पर बा। उ क्वार्टर फाइनल में दुनिया के नंबर एक रैकिंग टीम आस्ट्रेलिया के हरा दिहलस। अमृतसर के पास के एक गांव मिद्दी कलां के बेटी गुरुजीत कौर भारत खातिर विजयी गोल दगली। उ एक बहुत छोट किसान के बेटी हई। लेकिन अब त उनका के सारा देश जानता। एक के बाद एक चमत्कार कर रहल भारतीय हॉकी टीम के कप्तान रानी रामपाल हरियाणा के कुरुक्षेत्र के छोट से कस्बा शाहबाद मारकंडा से संबंध रखेली। उनकर पिता दिहाड़ी मजदूर रहलन। रानी के पिता रामपाल जी हमरा के एक बार बतावत रहलन कि जब रानी हॉकी खेलल शुरू कइली त उनका से शाहबाद मारकंडा में बहुत से लोग कहे लागल कि, “रानी छोटहन पैंट पहिर के हॉकी खेले खातिर जाली। तोहार माली हालत खराब बा। कइसे उनका खातिर हॉकी के किट वगैरह दिलवा पइबs। सवाल वाजिब रहे। हालांकि ई हमरा अंदर एक अलग तरह के जज्बा पैदा कर दिहलस संघर्ष करे के। हम रानी खातिर जवन भी कर सकत रहनी उ कइनीं।” रानी के 2010 के जूनियर वर्ल्ड कप हॉकी चैंपियनशिप में सबसे बेहतरीन खिलाड़ी के सम्मान मिलल रहे। ऊ तब से ही भारत के हॉकी टीम खातिर खेल रहल बाड़ी।

आख़िरकार, केतना लोग वंदना कटारिया के नाम भारत के दक्षिण अफ्रीका पर विजय से पहिले सुनले रहल। ओह पूल ए के मैच में उ तीन गोल दगले रहली। एह तरह से ऊ भारत के पहिला महिला हॉकी खिलाड़ी बन गइली जे ओलंपिक में एक मैच में तीन गोल कइल। हरिद्दार से कुछ दूर स्थित रोशनाबाद कस्बे के वंदना के पिता तमाम अवरोधन के बावजूद उनका के हॉकी खेले खातिर प्रेरित कइले। वंदना के हॉकी सेंस गजब के बा। पिता भेल के फैक्टरी में मामूली सा नौकरी करत रहले। वंदना के ‘डी’ के भीतर निशाना अचूक ही रहेला।

उ भारत के तरफ से लगातार खेल रहल बाड़ी। लेकिन, एह कीर्तिमानन के बीच वंदना के गरीबी अउर अभाव के सामना त करहीं के पड़ल

दरअसल, भारत के महिला हॉकी खिलाड़ी सबके कथा, परी कथा जइसन नइखे। एमे अभाव, गरीबी अउर समाज के विरोध आ आलोचना भी शामिल बा। एमे से अधिकतर के पास बचपन में खेले खातिर ना त जूता रहे आ ना हॉकी किट। अगर ई लोग शिखर पर पहुँचल आ अपना देश के सम्मान दिलववलस त एकरा खातिर इनकर खेल के प्रति जुनून आ कुछ करे के जिद ही त रहे। अगर बात भारत के पुरुष हॉकी टीम के करीं त ओकर अधिकतर खिलाड़ी भी अति सामान्य परिवार से बाड़ें। ये भारतीय टीम में कवनों भी खिलाड़ी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या कवनों भी बड़ा महानगर या संपन्न परिवार से नइखे। महानगरन में त खेल के विकास पर लगातार निवेश होत रहल बा। पर ये शहरन से कवनों खिलाड़ी सामने नइखे आवत। अगर दिल्ली के बात करीं त इहाँ पर दादा ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम से लेके शिवाजी स्टेडियम तक हॉकी के विश्व स्तरीय स्टेडियम बा। एमे एस्ट्रो टर्फ वगैरह के सारी सुविधा बा। पर भारतीय हॉकी टीम में एक भी दिल्ली के खिलाड़ी नइखे। इहे दिल्ली पूर्व में हरबिंदर सिंह, मोहिन्दर लाल, जोगिन्दर सिंह (सब 1964 के टोक्यो ओलंपिक विजयी टीम के खिलाड़ी), एम.के. कौशिक (1980 के गोल्ड मेडल विजयी टीम के सदस्य), आर.एस.जेंटल जइसन खिलाड़ी निकलले बा। पता ना अब का हो गइल बा दिल्ली के युवा लोग के I

आर.एस.जेंटल 1948 (हेलसिंकी),1952 (लंदन) अउर 1956 (मेलबर्न) में भारतीय हॉकी टीम के मेंबर रहलें। उ आपन शुरुआती हॉकी कश्मीरी गेट में खेललन। उ कमाल के फुल बैक रहलन। उ 1956 के मेलबर्न ओलंपिक खेल में टीम के कप्तान भी रहलें। उनहीं के फील्ड गोल के बदौलत भारत पाकिस्तान के फाइनल में शिकस्त दिहलस। जेंटल बेहद रफ-टफ खिलाड़ी रहलन। विरोधी टीम के खिलाड़ियन के कई बार धक्का मारत आगे बढ़त रहलें। एही से कई बार उनका के खिलाड़ी कहत रहले “प्लीज, बी जेंटल”। एही से उनकर नाम ही जेंटल हो गइल।

कुल मिला के ई बात त समझ ही लेवे के चाहीं कि अब बडहन सफलता बड़ शहरन के बपौती ना रहल। बड़ शहरन में बड़ स्टेडियम अउर दोसर आधुनिक सुविधा त जरूर बा, पर जज्बा छोटे शहर आ गाँव वालन में भी कम ना होला। ई लोग अवरोधन के पार करके सफल हो रहल बा लो। ये लोग में अर्जुन दृष्टि बा। ई जवन भी करेला लो, ओमे आपन पूरा ताकत झोंक देला लोग। ई लो सोशल मीडिया पर आ पार्टिन में बिजी ना रहेला। नया भारत में सफलता के स्वाद सभ राज्यन के छोट शहरन के बच्चन के भी अच्छा तरह लाग गइल बा। मेरठ, देवास, आजमगढ़, खूंटी, सिमडेगा आ दूसर शहरन में बच्चन के खेल के मैदान में अभ्यास करत देखल  जा सकेला। अगर इहाँ पर छोट शहरन से संबंध रखे वाला बच्चन के अभिभावक के कुर्बानी के बात ना होई त बात अधूरे रह जाई। जब सारा समाज ई मानता कि क्रिकेट के अलावा कवनों खेल में करियर नइखे फिर भी कुछ माता-पिता अपना बच्चन खातिर तमाम तरह से संघर्ष करते रहेला लो।

एक बात अवश्य कहेम कि सफलता खातिर सुविधा जरूरी बा, पर खेलन में या जीवन के कवनो भी क्षेत्र में सफलता खातिर जुनूनी भइल कहीं ज्यादा अनिवार्य बा। कुछ लोग ई कह देला कि धनी परिवार के बच्चा खेल में आगे नइखे जा सकत। ऊ लोग मेहनत करे से बचे ला। इहो सरासर गलत सोच बा। मत भूलीं कि भारत के पहिलका ओलंपिक के गोल्ड मेडल शूटिंग में अभिनव बिन्द्रा ही दिलववले रहले। उ खासे धनी परिवार से संबंध रखेलन। उनकर पिता उनका के अनेक सुविधा दिहलन आ अभिनव मेहनत करके अपना के साबित कर दिहलन। सफलता खातिर पहिला शर्त ई बा कि खिलाड़ी में जीते के इच्छा शक्ति होखे।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं)


img124.jpg

Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min3320

आर.के. सिन्हा

राहुल गांधी के राजनीति में अइले काफी समय हो गइल बा। कहे खातिर त उ अपना के जन्मजात राजनीतिज्ञ आ नेता मानेलें। पर ऊ वोह तरे से परिपक्व अभी भी नइखन भइल जइसे उनका से देश अपेक्षा करत रहे। ऊ 2004 से ही लोकसभा के सदस्य बाड़न। उनका सियासत में भारतीय जनता पार्टी के नेता लोग से इस्तीफा मांगल बेहद अहम बा। उनका लागेला कि केहू इस्तीफा दे या ना दे, उनका त इस्तीफा माँगते रहे के चाहीं। उ आत्म मुग्ध भी हो गइल बाड़ें। उनका गलतफहमी हो गइल बा कि ऊ कोरोना वैक्सीन के लाभ-हानि से लेके शेयर बाजार तक के उठा पटक के गहराई से जानेलें। राहुल गांधी हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह से भी इस्तीफा मांग लिहलें। पेगासस मामला में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी गृहमंत्री के इस्तीफा मांगत कहले कि उनकर फोन टेप कइल गइल बा। एसे गृहमंत्री अमित शाह के इस्तीफा देवे के चाहीं। अब बताईं भला कि संचार मंत्रालय के मामला में गृह मंत्री के का सरोकार?

अब ओ दिन के बात कइल जाय जब राफेल सौदा के लेके कांग्रेस हंगामा मचावत रहे। तब राहुल गांधी राफेल सौदा में कथित घोटाला के लेके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलत हर रोज  उनका से इस्तीफा के मांग करत रहले। राहुल गांधी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के एक लाख करोड़ रुपए के सरकारी ऑर्डर देवे के मामला में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से भी इस्तीफा मांग चुकल बाड़े। अपने सभन के इयाद होई कि सरकार कहले रहे कि एचएएल के एक लाख करोड़ रुपए के ऑर्डर दिहल गइल। ये पर राहुल गांधी, रक्षामंत्री पर झूठ बोले के आरोप जड़ देले रहलें। राहुल गांधी कहले रहले कि रक्षामंत्री सदन में अपना बयान के समर्थन में दस्तावेज पेश करस चाहे इस्तीफा देस। अब साल 2015 में चलल जाय। तब राहुल गांधी ललित मोदी मामला में ओह समय के देश के विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के इस्तीफा के मांग कइल शुरू क देले रहले। राहुल गांधी, सुषमा स्वराज पर बयान देत मीडिया से कहले कि सुषमा स्वराज  “क्रिमिनल एक्ट कइले रहली” अउर क्रिमिनल एक्ट करे वाला के सीधे जेल भेजे के चाहीं। हालांकि तब भाजपा उनका पर पलटवार करत बोलल कि राहुल गांधी के साथे दिक्कत इहे बा कि ऊ अपना के हर विषय के जानकार समझे लागल बाड़े। एकरा बाद उ कुछ समय तक चुप हो गइल रहले। लेकिन एकाध सप्ताह के बाद ही फेर चालू हो गइले I

वास्तव में ई कवनों भी इंसान खातिर बहुत गंभीर स्थिति ह कि ऊ अपना के सर्वज्ञानी माने लागेला। राहुल गांधी कोरोना महामारी से लेके राफेल डील आ दोसर तमाम मुद्दन पर बोलते रहल बाड़े। कोरोना के चेन के तूरे खातिर जब प्रधानमंत्री मोदी देश में लॉकडाउन लगावे के आह्वान कइले त राहुल गांधी कहत रहले कि एह कदम से देश के भारी क्षति होई। ऊ एह बात पर भी संदेह जतावत रहले कि उनका शक बा कि कोवैक्सीन कोरोना से लड़े में मददगार साबित होई कि ना। उनका लागल रहे कि वैक्सीन के खरीद अउर वितरण में उनका से बेहतर रणनीतिकार केहू देश में नइखे। ऊ 8 अप्रैल 2021 के प्रधानमंत्री मोदी के एगो पत्र लिख के कहsतारे -राज्यन खातिर वैक्सीन के खरीद में हमरा से राय ना लिहल गइल। उ ओही पत्र में सरकार से वैक्सीन के खरीद अउर वितरण में राज्यन के अधिक सक्रिय भूमिका के मांग कर रहल बाड़े। लेकिन राहुल गांधी के माई अउर कांग्रेस के अध्यक्ष सोनिया गांधी विपक्ष के 11 अन्य नेता लोग के साथ मिल के सरकार से मांग करsतारी कि केन्द्र सरकार राज्य सरकारन खातिर भी वैक्सीन के खरीद करे।

राहुल गांधी के बयान से इहे लागsता कि उनका शेयर बाजार के दूर-दूर तक कवनों समझ नइखे। ऊ तब खुश नइखन होत जब आपन शेयर बाजार 3 खरब रुपया (3 ट्रिलियन डॉलर) के आंकड़ा पार कर लेता। कवनों दोसर नेता होइत त एपर ट्वीट क के कहित कि भारत में इक्विटी संस्कृति पैर जमा रहल बा। ई सामान्य सा बात बा जब कोरपोरेट जगत इक्विटी के माध्यम से धन इकठ्ठा करे लागेला त ओकर बैंकन पर निभर्रता घट जाला। पूरी दुनिया में शेयर बाजार के निवेशक कवनों कंपनी के शेयर खरीदे से पहिले ओ कंपनी के पूर्व के प्रदर्शन आ भविष्य़ के संभावना के आकलन करेला। अब ऊ दिन ना रहल जब कवनों कंपनी के बेहतर बिक्री के आधार पर ओके श्रेष्ठ मान लिहल जात रहे। अब ओही कंपनी के बेहतर मानल जाला जेकर शेयरन के स्टॉक मार्केट में भरपूर मांग होला। पर कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के शेयर बाजार में उछाल में सिर्फ बुराई ही नजर आवेला। राहुल गांधी के निशाना पर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) लगातार रहेला। ऊ एकरा शेयर के उछाल से बहुत दुखी हो जाले। उनका बुझाला कि कवनों कंपनी के शेयरन में उछाल तब होला जब ओके सरकार के तरफ से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मदद मिलत रहेला। अब उनका के के बताओ कि जब कवनों सूचीबद्ध कंपनी के शेयरन में उछाल आवेला त ओकर लाभ त सब अंशधारक लोग के मिलेला। ओकरा से खाली प्रमोटर के ही चांदी ना होला। ओमे एलआईसी अउर सरकारी बैंकन के म्युच्युअल फंड भी शामिल रहेला।

राहुल गांधी के ई पता नइखे कि पिछला एक साल में इंडियन आयल कोरपोरेशन लिमिटेड (आईओसी) के शेयर 86 रुपया से 110 रुपया तक पहुंच गइल रहे। एही तरे स्टेट बैंक के शेयर भी 185 रुपया से 420 रुपया हो गइल बा। राहुल गांधी, कांग्रेस आ देश हित में होई कि उ थोड़ा ही सही पर पढ़स-लिखस भी। ऊ लोग सरकार के जन विरोधी नीतियन के कस के विरोध करो, सड़क पर उतरो आ जेल यात्रा भी करो। एगो विपक्षी नेता से ई त अपेक्षित होइबे करेला। पर ऊ त लगातार सरकार के कवनों मंत्री के इस्तीफा मांगत रहेले। उनका कवनों सलाहकार के चाहीं कि उ उनका के समझावे कि उनका चाहला से केहू भी इस्तीफा ना दी। हँ, अगर उ लोग पढ़ के लिख के सरकार के घेरी आ कवनों तर्कसंगत बात करिहें त उनकर सुनल जाई। उनकर देश के जनता के बीच साख भी बनी। फिलहाल त उनके बयान अउर भाषण के पढ़-सुन के निराशा ही होला। डर भी लागेला कि का उ कबो धीर-गंभीर होइहें, हो सकिहें आकि अपना बाल्यावस्था में ही रह के बाल सुलभ विनोद करत रहिहें?

( लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं। )


brics-summit-1-1.jpg

Hum BhojpuriaJuly 8, 20211min6840

आर.के. सिन्हा

ई साफ बा कि ब्रिक्स जइसन मंच एही खातिर बनले बा ताकि एह में शामिल देश एक-दोसरा के साथे सहयोग करे। ई लोग आपस में जुड़ेला भी एही खातिर काहेकि ये लोग में विभिन्न मसलन पर आपसी सहमति होला, चाहे एकरा खातिर सदिच्छा बनल रहेला। पर कोरोना काल के दौरान देखे में आ रहल बा कि ब्रिक्स देशन के एकमात्र सदस्य चीन अन्य सहयोगी देशन से, खासतौर पर भारत आ ब्राजील के कोरोना से लड़े में कतई साथ नइखे देत। ये दूनू देशन में कोरोना के कारण भारी नुकसान भी हो रहल बा। पिछले साल नवंबर में ब्रिक्स सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग कहले रहलन कि कोरोना संक्रमण पूरा विश्व में काफी तेजी से फइल रहल बा। कोरोना संक्रमण के इलाज खातिर चीनी कम्पनी अपना रूसी भागीदारन के साथ काम कर रहल बा। ओही जा उ दक्षिण अफ्रीका अउर भारत के साथ सहयोग करे खातिर भी तैयार बा। का चीन के एतना भर कह देहला से काम हो जाई?

जिनपिंग त ये समय में भी भारत के साथ सीमा पर लड़े के मूड में देखाई देत रहले। एही से उनकर ई कहल कि उनकर देश भारत से सहयोग खातिर तैयार बा समझ से परे बा। उनका अपना देश में उनका दावा के अनुसार कोरोना के संकट खत्म सा हो चुकल बा। उहाँ जिंदगी अब सामान्य हो रहल बा। तब उ पूरा विश्व के या कम से कम ब्रिक्स के सदस्य देशन के ई काहे नइखन बतावत कि कोरोना पर कवना तरे से काबू पावल जा सकेला? का चीन के ई देखाई नइखे देत कि भारत ये समय कवना घोर संकट से गुजर रहल बा? एकरा बावजूद उनका तरफ से भारत के कवनों मदद नइखे मिलत, ई साबित कर रहल बा कि उ ब्रिक्स आंदोलन के मजबूत करे के प्रति गंभीर नइखन। उ ब्रिक्स के एक अन्य सदस्य देश रूस से ही कुछ सीख ले लितन। रूस में बनल वैक्सीन के पहिलका खेप (डेढ़ लाख डोज) भारत पहुंच चुकल रहे। दोसर खेप भी जल्दी ही पहुंच जाई। रशियन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट फंड भारत में ये वैक्सीन के उपलब्ध करावे खातिर डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज से हाथ मिलवले बा। स्पूतनिक वी टीका के दुनियाभर के 50 से ज्यादा देश अप्रूवल दे चुकल बा।

ब्रिक्स के संबंध में कहल जाला कि ई उभरत अर्थव्यवस्था के संघ ह। एह में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका बा। ब्रिक्स के स्थापना 2009 में भइल रहे। एके 2010 में दक्षिण अफ्रीका में शामिल कइला गइला के वजह से पहिले “ब्रिक” ही कहल जात रहे। रूस के छोड़ के ब्रिक्स के सभी सदस्य विकासशील या नव औद्योगीकृत देश ही बाड़े जेकर अर्थव्यवस्था विश्व भर में आज के दिन सबसे तेजी से बढ़ रहल बा। दुनिया के 40 फीसद से अधिक आबादी ब्रिक्स देशन में ही रहेला। कहे खातिर त ब्रिक्स के सदस्य देश वित्त, व्यापार,  स्वास्थ्य, विज्ञान अउर प्रौद्योगिकी, शिक्षा, कृषि, संचार, श्रम आदि मसलन पर परस्पर सहयोग के वादा करत रहल बा। पर चीन भारत के साथ हमेशा दुश्मन जइसन व्यवहार करत रहल बा। ई बात कोरोना काल के समय त अउर शीशा के तरह साफ हो गइल बा।

कोरोना के दूसरा लहर में अचानक संक्रमण के मामला में बढ़ोतरी से भारत स्वास्थ्य व्यवस्था के मोर्चा पर जूझ रहल बा। ये जानलेवा बीमारी से निपटे खातिर भारत के चीन कतई साथ नइखे देले। हालांकि भारत आजकल भी ओकरा से काफी सामान आयात कर रहल बा। उदाहरण के रूप में भारतीय कम्पनियन के द्वारा चीनी विनिर्माता सब से खरीदे जाये वाली ऑक्सीजन कंसंट्रेटर जइसन कुछ कोविड-19 मेडिकल सप्लाई महंगा हो गइल बा। हांगकांग में भारत के महावाणिज्य दूत प्रियंका चौहान हाल में चीन से मेडिकल सप्लाई के कीमत में बढ़ोतरी रोके खातिर कहले रहली। भारत से ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के मांग कुछ ही समय में कई गुना बढ़ गइल बा।

केहू माने भा ना माने, पर चीन एक नंबर के घटिया देश बा। चीन के आतंकवाद के मसला पर भी रवैया कभी साफ ना रहल। उ हर मामला पर पाकिस्तान के साथ देत रहल बा। चीन कहले रहे, आतंकवाद सब देशन खातिर एक आम चुनौती बा। पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अपना आजादी के लड़ाई में जबरदस्त प्रयास आ बलिदान कइले बा। एकरा खातिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के ओकर सम्मान करे के चाहीं अउर पहचान भी करे के चाहीं। जब समूचा विश्व बिरादरी पाकिस्तान पर आतंकवाद के ले के सख्त कदम उठावे खातिर दबाव बनावेला, तब दुष्ट चीन पाकिस्तान के बेशर्मी से बचावे में लाग जाला।

बेशक, ब्रिक्स दुनिया से कोरोना से बचाव आ आतंकवाद के खत्म करे के स्तर पर एक लमहर मुहिम चला सकत रहे। पर अभी तक ओकर कदम ये लिहाज से तेज रफ्तार से नइखे बढ़ल। ई दुखद बा कि संसार के एतना महत्वपूर्ण संगठन एह सवालन पर कमजोर हीं रहल। लेकिन, ई कहे के होई कि चीन से लोहा लेवे में आस्ट्रेलिया मर्दानगी देखाके आगे रहल। एही खातिर चीन आस्ट्रेलिया से व्यापारिक समझौतन पर चल रहल सब गतिविधियन पर अनिश्चितकाल खातिर रोक लगा देले बा। बीजिंग आस्ट्रेलिया से कोयला, आयरन, गेहूं, वाइन सहित केतने सामान के आयात के भी फिलहाल बंद कर देले बा। सवाल ई बा कि ब्रिक्स के बाकी देश चीन से काहे ना पूछेला कि उ कोरोना काल में अपना सहयोगी देशन के साथ काहे नइखे खड़ा?  उ ब्रिक्स के साथी देशन के हित चाहsता कि ना?

खैर, ई कष्टकारी समय भारत खातिर अब एगो अवसर बन सकsता। भारत खातिर दुनिया के मैन्यूफैक्चरिंग हब बने के अवसर बा। भारत चाहे त चीन के खिलाफ दुनिया भर में फइलल नफरत के इस्तेमाल अपना खातिर एक बड़हन आर्थिक अवसर के रूप में कर सकsता। भारत के ये अवसर के कदापि छोड़े के ना चाहीं। ई संभव होई जब हम दुनिया भर के कंपनियन के अपना इहाँ निवेश खातिर सम्मानपूर्वक बुलायेम। हमनीं के सरकारी विभागन में फैलल भ्रष्टाचार अउर लालफीताशाही खत्म होई। केन्द्र आ राज्य सरकारन के ये दिशा में कठोर फैसला लेवे के होई। कोरोना काल के बाद से चीन में काम करे वाला सैकड़न बहुराष्ट्रीय कम्पनी उहाँ से आपन दुकान बंद कर रहल बा। भारत के ओ कंपनियन के अपना इहाँ बुलावे के चाहीं लेकिन आकर्षक शर्तन पर।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं)


07rules-articleLarge.jpg

Hum BhojpuriaJune 11, 20211min6520

  आर.के. सिन्हा

प्रमुख अमेरिकी बैंक सिटी बैंक के भारत में आपन कारोबार समेटे के फैसला कुछ गंभीर सवाल खड़ा कर रहल बा। आखिरकार काहे विदेशी बैंकन के भारत में पैर उखड़ रहल बाटे? इनका खातिर भारत  काहे कठिन स्थान साबित हो रहल बा कारोबार करे के लिहाज से? सिटी बैंक के कहनाम बा कि ग्लोबल स्ट्रैटजी के हिस्सा के रूप में उ भारत में आपन कंज्यूमर बैंकिंग बिजनेस बंद करे जा रहल बा। सिटी बैंक भारत में प्रवेश क के 1985 में कंज्यूमर बैंकिंग बिजनेस शुरू कइलस। अगर पीछे मुड़ के देखीं त पता चलsता कि बैंक ऑफ अमेरिका 1998 में, एएनजे ग्रिंडलेज बैंक 2000 में, एबीएन ऑमरो बैंक 2007 में, ड्यूश बैंक 2011 में, आईएनजी 2014 तथा ओबीएस ने 2015 में आपन भारत के कारोबार के या त कम कइलस या बंद कर दिहलस। एचएसबीसी 2016 में आपन कामकाज बंद त ना कइलस लेकिन अपना शाखा सबके तादाद बहुत ही कम कर दिहलस ।

विदेशी बैंकन के साथ सबसे बड़ समस्या ई रहेला कि इ सिर्फ मुंबई, दिल्ली, बैंगलुरू, कोलकता, चैन्नई जइसन महानगरन अउर अहमदाबाद, गुरुग्राम, चंडीगढ़, इंदौर जइसन बड़ नगरन अउर शहरन में ही कार्यरत रह के ही अपना खातिर मोट मुनाफा के उम्मीद करे ले। ई गिनती भर के शाखा ही खोले ले। ई सोचे ले कि एटीएम खोले भर से बात बन जाई। ये एटीएम के शाखा के विकल्प के रूप में देखे ले। ई सोच बिल्कुल सही नइखे। इनका समझ ही ना आवे कि आम हिन्दुस्तानी के बैंक में जाके  बैंक कर्मी से आपन पास बुक या एफडी पॉलिसी के अपडेट करवावे में ही आनंद मिलेला। उहाँ पर उनका बैंक के नया स्कीमन के बारे में भी पता चलेsला।

बैंकिग सेक्टर के जानकार लोग जान रहल बा कि जवन बैंक जेतना नया शाखा खोलेले उ ओतने हीं जनता के बीच में या कहीं कि अपना ग्राहकन के पास पहुंच जाले। स्टेट बैंक आ एचडीएफसी बैंक के राजधानी के व्यावसायिक हब कनॉट प्लेस इलाके में ही लगभग 10-10 शाखा कार्यरत बा। एही तरे से कई प्रमुख भारतीय बैंक भारत के छोट-छोट शहरन, कस्बा अउर गांवन तक में फइलल बा। एचडीएफसी, कोटक महेंद्रा बैंक, आईसीआईसाई बैंक त प्राइवेट बैंक ह। फिर भी इनका पता बा कि ई सब ओही स्थिति में आगे जाई जब भारत के सभी हिस्सन में आपन शाखा या एटीएम खोली। ई सब एही दिशा में आगे बढ़ रहल बाड़े।

रउआ बता दीं कि का कवनों विदेशी बैंक बिहार के किसान के ट्रेक्टर खरीदे या आंध्र प्रदेश के युवा उद्यमी के अपना कारोबार चालू करे खातिर लोन दिहलस ? का केहू के इयाद बा कि एएनजे ग्रिंडलेज बैंक, एबीएन ऑमरो बैंक, ड्यूश बैंक, आईएनजी चाहे आरबीएस कभी झारखंड के ग्रामीण इलाकन, छतीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकन या फिर उड़ीसा के सुदूर इलाकन में आपन कवनों शाखा खोलले होखे ? अगर ना खोललस त काहे ना खोललस ? का इनका खातिर भारत के मतलब सिर्फ कुछ एक गिनती भर के शहर बा। ई त कवनों बात ना भइल। इनका भारत में आपन कारोबार करे के अधिकार बा। इनका इहो भी अधिकार बा कि इ भारत में कारोबार करके मुनाफा भी कमास। आखिर ई लोग निवेश भी करबे होला। लेकिन ए लोग के सिर्फ अउर सिर्फ मुनाफा के लेके ना सोचें के चाहीं। साँच बात इ बा कि ई विदेशी बैंक त मोट जेब वाले लोग खातिर आपन आकर्षक सेवा लेके आवेलन। इनकर टारगेट उ ग्राहक पढ़ल लिखल आधुनिक नौजवान भी होले जवन मोटी सैलरी पर नौकरी करेले। सिटी बैंक कंज्यूमर बैंकिंग बिजनेस में क्रेडिट कार्ड्स, रीटेल बैंकिंग, होम लोन जइसन सेवा देत रहलन। ये समय भारत में सिटी बैंक के 35 शाखा बा। गौर करीं कि सिर्फ 35 शाखा के साथ चल रहल “सिटी बैंक” के वित्त वर्ष 2019-20 में 4,912 करोड़ रुपया कर शुद्ध लाभ भइल रहे जवन एकरा पूर्व के वित्त वर्ष में 4,185 करोड़ रुपया रहे।

भारत में भारतीय रिजर्व बैंक सर्वोच्च बैंकिंग नियामक अथॉरिटी बा। आरबीआई देश में बैंकिंग व्यवस्था खातिर नियम बनावेला अउर देश के मौद्रिक नीति के बारे में फैसला लेला। भारत के बैंकिंग क्षेत्र में पांच तरह के बैंक काम करेला। ई निजी क्षेत्र के बैंक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, विदेशी बैंक, ग्रामीण बैंक आ कोऑपरेटिव बैंक के रूप में जानल जाला। अगर बात प्राइवेट क्षेत्र के बैंकन से शुरू करीं त हमार प्रमुख प्राइवेट बैंक बा; एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, इंडसइंड बैंक अउर एक्सिस बैंक आदि। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ओकरा के कहल जाला जेमे मेजोरिटी हिस्सेदारी (51%) सरकार के पास होला। एमे पंजाब नेशनल बैंक, भारतीय स्टेट बैंक आ सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया आदि आवेला। अब बात करतानी विदेशी बैंकन के। भारत खातिर विदेशी बैंक दो प्रकार के होला। पहिले, उ बैंक जवन भारत में आपन ब्रांच खोलेला आ दोसर उ बैंक जवन भारत में अपना प्रतिनिधि बैंकन के शाखा के माध्यम से बिज़नेस करेला। ये बैंकन में स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, अमेरिकन एक्सप्रेस अउर सिटी बैंक आदि आवेला। एकरा अलावा, भारत में विभिन्न ग्रामीण बैंक अउर कोपरेटिव बैंक भी सक्रिय बा। इनके ग्राहक संख्या भी लाखन में बा।

एक बिन्दु पर साफ राय रखे के जरूरत बा कि ओ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकन में कामकाज के स्तर के बहुत बेहतर करे के जरूरत बा जेकरा के हम सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कहीं ने। इनका स्थिति से त सारा देश वाकिफ बा। बैंकिंग अपने आप में आम जनता से जुड़ल सेवा के क्षेत्र ह। ई सेवा क्षेत्र में ही आवेला। इहाँ पर त उहे बैंक आगे जाई जवन अपना ग्राहकन के बेहतर सुविधा दी, जेकर अधिक से अधिक शाखा होई। ओकर अफसर आ बाकी स्टाफ अपना ग्राहकन के हित के ध्यान राखी। कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक त एही खातिर ही जनता के बीच जमल बा, काहे कि उनका भारत सरकार से भी मोटा बिजनेस मिल जाला। अगर सरकार उनका के अपने रहमो करम पर छोड़ दे त ई लोग पानी भी ना मागीं। भारत के बाजार अपने आप में अनंत सागर के तरह बा। एमे सबका खातिर काम करे के जगह बनावे अउर कमाये के पर्याप्त अवसर बा। पर भारत के बाजार में उहे बैंक टिकी जवन ग्राहकन के बेहतर सुविधा दी अउर जिनकर उपस्थिति महानगरन से ले के गांव-कस्बन तक में होई।

 (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


img710-1280x853.jpg

Hum BhojpuriaJune 1, 20211min6440

आर. के. सिन्हा

छत्तीसगढ़ में माओवादियन के दानवी कृत्य के कारण सारा देश के गुस्सा वाजिब ही बा। माओवादियन के साथ मुठभेड़ में सुरक्षा बल के 22 जवान शहीद हो गइलन। मुठभेड़ स्थल पर पड़ल जवानन के शव के देखके हरेक हिन्दुस्तानी के कलेजा फाटल जात रहे। पिछला कुछ साल में छत्तीसगढ़ में ई माओवादियन के सबसे बड़ा हमला मानल जा रहा बा। माओवादी सब जे तरह के क्रूरता दिखलवले बा उ दिल दहला देवे वाली राक्षसी अउर पाशविक कृत्य बा। माओवादियन के ई दुस्साहसपूर्ण लोकतंत्र विरोधी कार्रवाई पूरा देश खातिर एक गंभीर चुनौती बा। ई देश पूर्व के दशकन में पंजाब, असम आ पूर्वोत्तर भारत में भी हिंसक पृथकतावादी आंदोलनन के देखले बा आ सफलतापूर्वक कुचलले भी बा। पर ये आतंकवादियन आ गैंगस्टर अपराधियन से भी खतरनाक माओवादियन के काहे नष्ट नइखे कर पा रहल? का देश शासन के संकल्प में कवनों स्तर पर कवनों कमी बा? ई बात पहिले सही भी हो पर आज के दिन त कतई सही ना मानल जाई।

एतना जरूर बा कि माओवादियन के ताजा कार्रवाई के बाद सुरक्षा एजेंसियन के एक बार अपना रणनीति पर फेर से विचार करहीं के होई। ये तरह के रणनीति बनावे के होई जेसे कि माओवादिन के पूरी तरह कुचलल जा सके। रणनीति अइसन बने कि ओ सब के जल्दी से जल्दी खत्म कइल जा सके। बहरहाल, लागत त इहे बा कि अब छतीसगढ़ चाहे कवनों अन्य राज्य में माओवादी लोग बाँची ना। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कह चुकल बाड़े कि शहीद जवानन के मौत के बदला लिहल जाई। गृह मंत्री अमित शाह भी इहे बात दुहरवले बाड़े। माओवादी लोग बताओ कि ई उनका कौना किताब में लिखल बा कि बेगुनाह जवानन के डायनामाइट से उड़ा दिहल जाए? अगर इहे उनका मार्क्सवाद के भाषा बा त हमार सेना अउर अर्धसैनिक बल उनका ये मार्क्सवाद के पूरी तरह नेस्तनाबूद करे में सक्षम बा। तैयार हो जा लोग अब अपना मौत खातिर।

मिल रहल जानकारी त चीख-चीख के इहे कह रहल बा कि बीजापुर के हमला सामान्य ना रहे। कहल जा रहल बा कि सुरक्षा बल के पास भी 20 दिन पहले से सूचना रहे, कुख्यात हिड़मा अउर ओकरा टीम के उपस्थिति के लेके। याद करीं 2010 में बस्तर में 76 सीआरपीएफ के जवान शहीद भइल रहलन। रिटायर्ड डीजी राम मोहन द्वारा कइल गइल जांच में पता चलल रहे कि सुरक्षा बल के एक वायरलेस सेट नक्सलियन के पास रहे अउर ओकरे से उनके पास फोर्स के तमाम मूवमेंट के जानकारी मिलत रहे। ओ समय फोर्स के नेतृत्व जवना डीआईजी, सीआरपीएफ के पास रहे, उहे आज ओ इलाका के आईजी भी बतावल जा रहल बाड़े। एतना बड़ा चूक के बावजूद सीआरपीएफ के ओ अफसर के प्रमोशन भइल आ फेर ओही इलाके में बहाली भी। वापस लौटत दल के अंतिम टुकड़ी पर घात लगावल, ई गत 10 साल के 7वीं घटना ह। आखिर ई छापेमारी योजना कइसे बनल? केम्प में बैकअप फोर्स काहे ना तैयार रहे? 24 घंटा तक हमनी के अपना शहीदन के शव आ फंसल जवानन के काहे ना निकाल पवनी सन ? नक्सलियन के पास पहिलहीं से अपने साथियन के शवन के निकाले खातिर ट्रैक्टर भी तैयार रहे। उनका साथे 1200 लोग जमा रहे। लेकिन, ऑपरेशन के हेड के पास एकर खबर तक कइसे ना पहुंचल ? ये सब सवालन के जवाब खोजे के होई।

अब जरा ओ शख्स के बारे में जान लीं जेकरा नाम से छत्तीसगढ़ के जंगलन में खौफ रहेला, जे अपना के आदिवासियन के मसीहा कहेला। ओकर नाम कमांडर माडवी हिडमा ह। ओकरे अगुवाई में 2010 में भइल रहे दंतेवाड़ा हमला। 2017 के सुकमा हमला के भी उहे देले रहे अंजाम। हाल में उहे इ भयानक खूनी खेल खेललस 3 अप्रैल के बीजापुर अउर सुकमा जिला के सीमा पर। ओकर 400 खूंखार कैडर जोनागुड़ा पहाड़ी के जंगलन में सीआरपीएफ के सुरक्षा बलन के जवानन पर तीन ओर से घेर के हमला कइलस, जवन ओ नक्सलियन के घेरे खातिर रवाना भइल रहे। हिडमा के उम्र के बारे में केहू के ठीक से पता नइखे। अइसे ओकर उम्र 40 साल के आसपास बतावल जाला। सुकमा अउर बीजापुर के बीच पार्वती गांव में जनमल हिडमा कुछ खास पढ़ल-लिखल भी नइखे। सुरक्षा बलन के अब ये खूनी दरिंदा के मारs हीं के होई। सवाल इ उठता कि हिडमा तक सुरक्षा बल आज तक काहे ना पहुंच पावल। छत्तीसगढ़ पुलिस के एगो सीनियर अफसर एकर वजह बतावेले, ‘बेहद शातिर ह हिडमा। उ अपने आसपास कई घेरा बना रखले बा। सबसे अंदरूनी घेरे में ही करीब 200 कैडर होला। एमे से ज्यादातर त ओकरा बचपन के साथिए बाड़े। ई बाहरी घेरा वालन के भी ओकरा पास फटके ना देला।

माओवादियन के यदि लागsता कि उनका साथे कवनों भी स्तर पर कहीं भी अन्याय भइल बा, त उ लोग लोकतांत्रिक तरीका से अहिंसक आंदोलन करके अपना मांगन के मनवा सकेले। सत्याग्रह के रास्ता भी अपना सकेले। एतना त समझ ही लेवे के चाहीं कि अब चूंकि उ लोग लोकतंत्र के रास्ता पर चले के राजी नइखे त उनका कठोर सजा त मिलबे करी जइसे कवनों भी देशद्रोही के मिलेला। का ई लोग भारत के राजसत्ता से लोहा ली? पहिले पैंट पर बेल्ट लगावे के त ठीक से सीख लेव लोग, फिर बात करस। भारत के राजसत्ता के मतलब इनका ठीक से समझहीं के होई। ई लोग नइखे जानत कि तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा के दशकन से भारत डंका के चोट पर अपना इहाँ शरण दे रखले बा अउर माओवाद के आका चीन लाल-पीला हो के भी कुछ नइखे कर पा रहल। बस बीच-बीच में कसमसा भर रहल बा। ये राजसत्ता से ई माओवादी का खाक टक्कर लीहें। ई सरेआम लूट, दादागीरी आ हफ्ता वसूली के धंधा करेले। इहे ह इनकर माओवाद। उनके आका के भी मालूम बा कि उ भारत के राजसत्ता से कभी भी लोहा नइखन ले सकत। पर भोला-भाला ग्रामीण सबके अपना जाल में फंसा के उनका के भीड़ के जबरदस्ती आगे क के खूनी खेल खेलत रहल बा लोग।

माओवादियन के लेके आज पूरा देश एक राय रख रहल बा। अब ये लोग के समूल नष्ट करहीं के होई। ई देश के दुश्मन आ आस्तीन के सांप हउवन। इनकर जल्दी से जल्दी खात्मा कइल ही देश हित में होई। इनके हिमायतियन के भी ठीक तरह से कसे के होई। हिमायतियन से आशय ओ तथाकथित मानवाधिकारवादियन से बा जे ये माओवादियन के हक में लगातार बोलेले। अंत में एगो सवाल करे के मन कर रहल बा कि का कम्युनिस्ट चीन, रूस या पूंजीवादी अमेरिका या जापान जइसन पूंजीवादी लोकतंत्र में भी गुंडागर्दी करे वाला माओवादी पनप सकेले आ आपन खूनी खेल खेल सकेले ? ना नू ?  त फेर भारत में इ कइसे पनप रहल बाड़े। राजनीतिक इच्छा शक्ति के कमी से अबतक ई होत रहल बा। लेकिन, मोदी जी के राज में त इ संभव नइखे दिखत।

( लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)



About us

भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


Contact us



Newsletter

Your Name (required)

Your Email (required)

Subject

Your Message