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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min1250

आर.के. सिन्हा

भारत के महिला आ पुरुष हॉकी टीम के टोक्यो ओलंपिक खेल में चमत्कारी प्रदर्शन पर सारा देश गर्व महसूस कर रहल बा I  भारत के हॉकी प्रेमी के आँख एतना शानदार प्रदर्शन देखे खातिर तरस गइल रहे। पर तनी देखीं कि पुरुष अउर महिला हॉकी टीम के अधिकतर खेलाड़ी जेकर संबंध देश के छोट-छोट शहर, कस्बा आ गाँव से रहे ई कमाल कर दिखवलस। जेकरा पास खेल के आधारभूत ढांचा तक नसीब नइखे उहे खिलाड़ी अपना दुनू हॉकी टीम में लाजवाब खेल देखा रहल बा। ई खिलाड़ी लोग हरियाणा के शाहबाद मारकंडा, उत्तराखंड के हरिद्वार, झारखंड के खूंटी, पंजाब के अमृतसर के गांव अउर दूसर अनाम जगह से संबंध रखे ला लो। पर एह लोग में जीत आ आगे बढ़े के जज्बा सच में अदभुत बा।

भारत के महिला हॉकी टीम दुनिया में अभी तक नौंवी रैंकिंग पर बा। उ क्वार्टर फाइनल में दुनिया के नंबर एक रैकिंग टीम आस्ट्रेलिया के हरा दिहलस। अमृतसर के पास के एक गांव मिद्दी कलां के बेटी गुरुजीत कौर भारत खातिर विजयी गोल दगली। उ एक बहुत छोट किसान के बेटी हई। लेकिन अब त उनका के सारा देश जानता। एक के बाद एक चमत्कार कर रहल भारतीय हॉकी टीम के कप्तान रानी रामपाल हरियाणा के कुरुक्षेत्र के छोट से कस्बा शाहबाद मारकंडा से संबंध रखेली। उनकर पिता दिहाड़ी मजदूर रहलन। रानी के पिता रामपाल जी हमरा के एक बार बतावत रहलन कि जब रानी हॉकी खेलल शुरू कइली त उनका से शाहबाद मारकंडा में बहुत से लोग कहे लागल कि, “रानी छोटहन पैंट पहिर के हॉकी खेले खातिर जाली। तोहार माली हालत खराब बा। कइसे उनका खातिर हॉकी के किट वगैरह दिलवा पइबs। सवाल वाजिब रहे। हालांकि ई हमरा अंदर एक अलग तरह के जज्बा पैदा कर दिहलस संघर्ष करे के। हम रानी खातिर जवन भी कर सकत रहनी उ कइनीं।” रानी के 2010 के जूनियर वर्ल्ड कप हॉकी चैंपियनशिप में सबसे बेहतरीन खिलाड़ी के सम्मान मिलल रहे। ऊ तब से ही भारत के हॉकी टीम खातिर खेल रहल बाड़ी।

आख़िरकार, केतना लोग वंदना कटारिया के नाम भारत के दक्षिण अफ्रीका पर विजय से पहिले सुनले रहल। ओह पूल ए के मैच में उ तीन गोल दगले रहली। एह तरह से ऊ भारत के पहिला महिला हॉकी खिलाड़ी बन गइली जे ओलंपिक में एक मैच में तीन गोल कइल। हरिद्दार से कुछ दूर स्थित रोशनाबाद कस्बे के वंदना के पिता तमाम अवरोधन के बावजूद उनका के हॉकी खेले खातिर प्रेरित कइले। वंदना के हॉकी सेंस गजब के बा। पिता भेल के फैक्टरी में मामूली सा नौकरी करत रहले। वंदना के ‘डी’ के भीतर निशाना अचूक ही रहेला।

उ भारत के तरफ से लगातार खेल रहल बाड़ी। लेकिन, एह कीर्तिमानन के बीच वंदना के गरीबी अउर अभाव के सामना त करहीं के पड़ल

दरअसल, भारत के महिला हॉकी खिलाड़ी सबके कथा, परी कथा जइसन नइखे। एमे अभाव, गरीबी अउर समाज के विरोध आ आलोचना भी शामिल बा। एमे से अधिकतर के पास बचपन में खेले खातिर ना त जूता रहे आ ना हॉकी किट। अगर ई लोग शिखर पर पहुँचल आ अपना देश के सम्मान दिलववलस त एकरा खातिर इनकर खेल के प्रति जुनून आ कुछ करे के जिद ही त रहे। अगर बात भारत के पुरुष हॉकी टीम के करीं त ओकर अधिकतर खिलाड़ी भी अति सामान्य परिवार से बाड़ें। ये भारतीय टीम में कवनों भी खिलाड़ी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या कवनों भी बड़ा महानगर या संपन्न परिवार से नइखे। महानगरन में त खेल के विकास पर लगातार निवेश होत रहल बा। पर ये शहरन से कवनों खिलाड़ी सामने नइखे आवत। अगर दिल्ली के बात करीं त इहाँ पर दादा ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम से लेके शिवाजी स्टेडियम तक हॉकी के विश्व स्तरीय स्टेडियम बा। एमे एस्ट्रो टर्फ वगैरह के सारी सुविधा बा। पर भारतीय हॉकी टीम में एक भी दिल्ली के खिलाड़ी नइखे। इहे दिल्ली पूर्व में हरबिंदर सिंह, मोहिन्दर लाल, जोगिन्दर सिंह (सब 1964 के टोक्यो ओलंपिक विजयी टीम के खिलाड़ी), एम.के. कौशिक (1980 के गोल्ड मेडल विजयी टीम के सदस्य), आर.एस.जेंटल जइसन खिलाड़ी निकलले बा। पता ना अब का हो गइल बा दिल्ली के युवा लोग के I

आर.एस.जेंटल 1948 (हेलसिंकी),1952 (लंदन) अउर 1956 (मेलबर्न) में भारतीय हॉकी टीम के मेंबर रहलें। उ आपन शुरुआती हॉकी कश्मीरी गेट में खेललन। उ कमाल के फुल बैक रहलन। उ 1956 के मेलबर्न ओलंपिक खेल में टीम के कप्तान भी रहलें। उनहीं के फील्ड गोल के बदौलत भारत पाकिस्तान के फाइनल में शिकस्त दिहलस। जेंटल बेहद रफ-टफ खिलाड़ी रहलन। विरोधी टीम के खिलाड़ियन के कई बार धक्का मारत आगे बढ़त रहलें। एही से कई बार उनका के खिलाड़ी कहत रहले “प्लीज, बी जेंटल”। एही से उनकर नाम ही जेंटल हो गइल।

कुल मिला के ई बात त समझ ही लेवे के चाहीं कि अब बडहन सफलता बड़ शहरन के बपौती ना रहल। बड़ शहरन में बड़ स्टेडियम अउर दोसर आधुनिक सुविधा त जरूर बा, पर जज्बा छोटे शहर आ गाँव वालन में भी कम ना होला। ई लोग अवरोधन के पार करके सफल हो रहल बा लो। ये लोग में अर्जुन दृष्टि बा। ई जवन भी करेला लो, ओमे आपन पूरा ताकत झोंक देला लोग। ई लो सोशल मीडिया पर आ पार्टिन में बिजी ना रहेला। नया भारत में सफलता के स्वाद सभ राज्यन के छोट शहरन के बच्चन के भी अच्छा तरह लाग गइल बा। मेरठ, देवास, आजमगढ़, खूंटी, सिमडेगा आ दूसर शहरन में बच्चन के खेल के मैदान में अभ्यास करत देखल  जा सकेला। अगर इहाँ पर छोट शहरन से संबंध रखे वाला बच्चन के अभिभावक के कुर्बानी के बात ना होई त बात अधूरे रह जाई। जब सारा समाज ई मानता कि क्रिकेट के अलावा कवनों खेल में करियर नइखे फिर भी कुछ माता-पिता अपना बच्चन खातिर तमाम तरह से संघर्ष करते रहेला लो।

एक बात अवश्य कहेम कि सफलता खातिर सुविधा जरूरी बा, पर खेलन में या जीवन के कवनो भी क्षेत्र में सफलता खातिर जुनूनी भइल कहीं ज्यादा अनिवार्य बा। कुछ लोग ई कह देला कि धनी परिवार के बच्चा खेल में आगे नइखे जा सकत। ऊ लोग मेहनत करे से बचे ला। इहो सरासर गलत सोच बा। मत भूलीं कि भारत के पहिलका ओलंपिक के गोल्ड मेडल शूटिंग में अभिनव बिन्द्रा ही दिलववले रहले। उ खासे धनी परिवार से संबंध रखेलन। उनकर पिता उनका के अनेक सुविधा दिहलन आ अभिनव मेहनत करके अपना के साबित कर दिहलन। सफलता खातिर पहिला शर्त ई बा कि खिलाड़ी में जीते के इच्छा शक्ति होखे।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं)


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min870

आर.के. सिन्हा

राहुल गांधी के राजनीति में अइले काफी समय हो गइल बा। कहे खातिर त उ अपना के जन्मजात राजनीतिज्ञ आ नेता मानेलें। पर ऊ वोह तरे से परिपक्व अभी भी नइखन भइल जइसे उनका से देश अपेक्षा करत रहे। ऊ 2004 से ही लोकसभा के सदस्य बाड़न। उनका सियासत में भारतीय जनता पार्टी के नेता लोग से इस्तीफा मांगल बेहद अहम बा। उनका लागेला कि केहू इस्तीफा दे या ना दे, उनका त इस्तीफा माँगते रहे के चाहीं। उ आत्म मुग्ध भी हो गइल बाड़ें। उनका गलतफहमी हो गइल बा कि ऊ कोरोना वैक्सीन के लाभ-हानि से लेके शेयर बाजार तक के उठा पटक के गहराई से जानेलें। राहुल गांधी हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह से भी इस्तीफा मांग लिहलें। पेगासस मामला में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी गृहमंत्री के इस्तीफा मांगत कहले कि उनकर फोन टेप कइल गइल बा। एसे गृहमंत्री अमित शाह के इस्तीफा देवे के चाहीं। अब बताईं भला कि संचार मंत्रालय के मामला में गृह मंत्री के का सरोकार?

अब ओ दिन के बात कइल जाय जब राफेल सौदा के लेके कांग्रेस हंगामा मचावत रहे। तब राहुल गांधी राफेल सौदा में कथित घोटाला के लेके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलत हर रोज  उनका से इस्तीफा के मांग करत रहले। राहुल गांधी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के एक लाख करोड़ रुपए के सरकारी ऑर्डर देवे के मामला में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से भी इस्तीफा मांग चुकल बाड़े। अपने सभन के इयाद होई कि सरकार कहले रहे कि एचएएल के एक लाख करोड़ रुपए के ऑर्डर दिहल गइल। ये पर राहुल गांधी, रक्षामंत्री पर झूठ बोले के आरोप जड़ देले रहलें। राहुल गांधी कहले रहले कि रक्षामंत्री सदन में अपना बयान के समर्थन में दस्तावेज पेश करस चाहे इस्तीफा देस। अब साल 2015 में चलल जाय। तब राहुल गांधी ललित मोदी मामला में ओह समय के देश के विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के इस्तीफा के मांग कइल शुरू क देले रहले। राहुल गांधी, सुषमा स्वराज पर बयान देत मीडिया से कहले कि सुषमा स्वराज  “क्रिमिनल एक्ट कइले रहली” अउर क्रिमिनल एक्ट करे वाला के सीधे जेल भेजे के चाहीं। हालांकि तब भाजपा उनका पर पलटवार करत बोलल कि राहुल गांधी के साथे दिक्कत इहे बा कि ऊ अपना के हर विषय के जानकार समझे लागल बाड़े। एकरा बाद उ कुछ समय तक चुप हो गइल रहले। लेकिन एकाध सप्ताह के बाद ही फेर चालू हो गइले I

वास्तव में ई कवनों भी इंसान खातिर बहुत गंभीर स्थिति ह कि ऊ अपना के सर्वज्ञानी माने लागेला। राहुल गांधी कोरोना महामारी से लेके राफेल डील आ दोसर तमाम मुद्दन पर बोलते रहल बाड़े। कोरोना के चेन के तूरे खातिर जब प्रधानमंत्री मोदी देश में लॉकडाउन लगावे के आह्वान कइले त राहुल गांधी कहत रहले कि एह कदम से देश के भारी क्षति होई। ऊ एह बात पर भी संदेह जतावत रहले कि उनका शक बा कि कोवैक्सीन कोरोना से लड़े में मददगार साबित होई कि ना। उनका लागल रहे कि वैक्सीन के खरीद अउर वितरण में उनका से बेहतर रणनीतिकार केहू देश में नइखे। ऊ 8 अप्रैल 2021 के प्रधानमंत्री मोदी के एगो पत्र लिख के कहsतारे -राज्यन खातिर वैक्सीन के खरीद में हमरा से राय ना लिहल गइल। उ ओही पत्र में सरकार से वैक्सीन के खरीद अउर वितरण में राज्यन के अधिक सक्रिय भूमिका के मांग कर रहल बाड़े। लेकिन राहुल गांधी के माई अउर कांग्रेस के अध्यक्ष सोनिया गांधी विपक्ष के 11 अन्य नेता लोग के साथ मिल के सरकार से मांग करsतारी कि केन्द्र सरकार राज्य सरकारन खातिर भी वैक्सीन के खरीद करे।

राहुल गांधी के बयान से इहे लागsता कि उनका शेयर बाजार के दूर-दूर तक कवनों समझ नइखे। ऊ तब खुश नइखन होत जब आपन शेयर बाजार 3 खरब रुपया (3 ट्रिलियन डॉलर) के आंकड़ा पार कर लेता। कवनों दोसर नेता होइत त एपर ट्वीट क के कहित कि भारत में इक्विटी संस्कृति पैर जमा रहल बा। ई सामान्य सा बात बा जब कोरपोरेट जगत इक्विटी के माध्यम से धन इकठ्ठा करे लागेला त ओकर बैंकन पर निभर्रता घट जाला। पूरी दुनिया में शेयर बाजार के निवेशक कवनों कंपनी के शेयर खरीदे से पहिले ओ कंपनी के पूर्व के प्रदर्शन आ भविष्य़ के संभावना के आकलन करेला। अब ऊ दिन ना रहल जब कवनों कंपनी के बेहतर बिक्री के आधार पर ओके श्रेष्ठ मान लिहल जात रहे। अब ओही कंपनी के बेहतर मानल जाला जेकर शेयरन के स्टॉक मार्केट में भरपूर मांग होला। पर कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के शेयर बाजार में उछाल में सिर्फ बुराई ही नजर आवेला। राहुल गांधी के निशाना पर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) लगातार रहेला। ऊ एकरा शेयर के उछाल से बहुत दुखी हो जाले। उनका बुझाला कि कवनों कंपनी के शेयरन में उछाल तब होला जब ओके सरकार के तरफ से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मदद मिलत रहेला। अब उनका के के बताओ कि जब कवनों सूचीबद्ध कंपनी के शेयरन में उछाल आवेला त ओकर लाभ त सब अंशधारक लोग के मिलेला। ओकरा से खाली प्रमोटर के ही चांदी ना होला। ओमे एलआईसी अउर सरकारी बैंकन के म्युच्युअल फंड भी शामिल रहेला।

राहुल गांधी के ई पता नइखे कि पिछला एक साल में इंडियन आयल कोरपोरेशन लिमिटेड (आईओसी) के शेयर 86 रुपया से 110 रुपया तक पहुंच गइल रहे। एही तरे स्टेट बैंक के शेयर भी 185 रुपया से 420 रुपया हो गइल बा। राहुल गांधी, कांग्रेस आ देश हित में होई कि उ थोड़ा ही सही पर पढ़स-लिखस भी। ऊ लोग सरकार के जन विरोधी नीतियन के कस के विरोध करो, सड़क पर उतरो आ जेल यात्रा भी करो। एगो विपक्षी नेता से ई त अपेक्षित होइबे करेला। पर ऊ त लगातार सरकार के कवनों मंत्री के इस्तीफा मांगत रहेले। उनका कवनों सलाहकार के चाहीं कि उ उनका के समझावे कि उनका चाहला से केहू भी इस्तीफा ना दी। हँ, अगर उ लोग पढ़ के लिख के सरकार के घेरी आ कवनों तर्कसंगत बात करिहें त उनकर सुनल जाई। उनकर देश के जनता के बीच साख भी बनी। फिलहाल त उनके बयान अउर भाषण के पढ़-सुन के निराशा ही होला। डर भी लागेला कि का उ कबो धीर-गंभीर होइहें, हो सकिहें आकि अपना बाल्यावस्था में ही रह के बाल सुलभ विनोद करत रहिहें?

( लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं। )


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Hum BhojpuriaAugust 17, 20211min2520

आर.के. सिन्हा

अगर रउआ कवनो ठोस आधार के बिना तैयार कइल कवनो प्रोजेक्ट में मीन-मेख निकालsतानी, त बात कुछ समझ में आवता। लोकतंत्र एतना हक सबके देला। पर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के आगे अवरोध एक साजिश के तहत खड़ा कइल जा रहल बा। एकर निंदा अकारण कइल जा रहल बा। समझल जा सकेला कि कुछ तत्वन के लागेला कि एतना विशाल प्रोजेक्ट केन्द्र में मोदी सरकार के सरपरस्ती में बनला से उनके भविष्य के संभावाना पर प्रतिकूल असर होई। ये प्रोजेक्ट के आगे खड़ा करे वाला तमाम अवरोध के कड़ी में ताजा मामला तब सामने आइल जब एपर रोक लगावे खातिर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका तक दायर कइल गइल। पर याचिकाकर्ता के लेने के देने पड़ गइल। दिल्ली हाईकोर्ट याचिकाकर्ता के कड़ी फटकार लगा के कहलस कि निर्माण कार्य के नइखे रोकल जा सकत। मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल आ न्यायमूर्ति ज्योति सिंह के पीठ कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के दौरान परियोजना रोके जाये के अनुरोध करे वाली याचिका खारिज करके कहलस कि याचिका कवनो मकसद से ‘‘प्रेरित’’ रहे अउर ‘‘वास्तविक जनहित याचिका’’ ना रहे। न्यायालय याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपया के जुर्माना भी लगवले बा।

दरअसल राष्ट्रीय महत्ता से जुड़ल प्रोजेक्ट के कवनो भी तरह से रुकवावे के कोशिश शर्मनाक बा। ये प्रोजेक्ट के लेके कांग्रेस सांसद राहुल गांधी भी केंद्र पर कई बार हमला बोल चुकल बाड़न। का उनका पता बा कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पूरा भइला के बाद सरकार के हर साल लगभग एक हजार करोड़ रुपया बाँची जवन ओकरा किरये के रूप में देवे के पड़ेला। फिलहाल आजादी के 74 वर्ष बीतला के बादो केन्द्र सरकार के बहुत सा दफ्तर प्राइवेट इमारतन से काम कर रहल बाटे जेकरा के सरकार के हर साल एक हजार करोड़ रुपया से अधिक किराया के रूप में देवे के पड़ेला। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत नया इमारत बनला के बाद कवनो भी सरकारी दफ्तर किराया के जगह से ना चली। एक बात अउर समझ लेवे के चाहीं कि अब जवन भी नया सरकारी इमारत बनी उ सब गगनचुंबी होई। अब चार-पांच फ्लोर के इमारतन के बने के दौर गुजर गइल बा। जब एडविन लुटियन देश के नया राजधानी के सरकारी इमारतन के डिजाइन बनावत रहले, तब दिल्ली के आबादी 14-15 लाख के आसपास रहे। अब ई ढाई करोड़ पार कर रहल बा। अब इहाँ कार अउर दोसर वाहनन के तादाद भी एक करोड़ से कहीं अधिक होई। सब नया इमारत में पर्याप्त भूतल कार पार्किंग होई। अभी कवनों भी सरकारी दफ्तर में कार पार्किंग के पर्याप्त व्यवस्था नइखे।

अभी ई कहल जल्दीबाजी होई कि नया संसद भवन आ बाकी बने वाला इमारतन के डिजाइन कवना स्तर के होई। हां, एतना त जान ही लीं कि नया बने वाला इमारत डिजाइन के लिहाज से ओतना या ओहू से कहीं ज्यादा भव्य आ बेहतरीन होई जवन लुटियंस आ उनकर साथी लोग डिजाइन कइले रहे। सरकार सेंट्रल विस्टा के विकास खातिर अहमदाबाद के मैसर्स एच सी पी डिज़ाईन, प्लानिंग एण्ड मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड के जिम्मेदारी देले बा। एकर अभी तक के ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहल बा। ई फ़र्म मुंबई पोर्ट काम्प्लेक्स, गुजरात राज्य सचिवालय, आई आई एम अहमदाबाद आदि के लाजवाब डिज़ाइन तैयार कइले बा। एसे एकरा क्षमता पर सवाल खड़ा कइल गलत होई। सेट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के हासिल करे खातिर कुल 6 नामी गिरामी आर्किटेक्चर फर्म  दावा पेश कइले रहे। वो सब के दावा अउर पहिले के काम के गहराई से अध्ययन कइला के बाद  बाजी एच सी पी डिज़ाईन, प्लानिंग एन्ड  मैनेजमेंट प्राईवेट लिमिटेड मार लिहलस। कुछ सिरफिरा लोग कहत फिर रहल बा कि अहमदाबाद के फर्म के एतना खास प्रोजेक्ट के दायित्व सौंपे में निष्पक्षता आ पारदर्शिता ना देखावल गइल। पर दिल्ली अर्बन आर्ट कमीशन के प्रमुख आ राजधानी दिल्ली स्थित स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के डायरेक्टर प्रो.पी.एस.एन राव के अध्यक्षता वाली कमेटी पर बिना पुख्ता प्रमाणन के सवाल खड़ा कइल गलत बा। ओइसे भी लोकतंत्र में केहू के जुबान त बंद नइखे कइल जा सकत। ई सबका पता बा कि जे सवाल खड़ा कर रहल बा उ एक खास एजेंडा के तहत ही काम कर रहल बा। ऊ लोग निश्चित ही बुरी तरह बेनकाब होई।

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत प्रधानमंत्री आ उप राष्ट्रपति के आवास के साथ केतने नया कार्यालय भवन अउर मंत्रालय के कार्यालय लिहले केंद्रीय सचिवालय के निर्माण भी होखे वाला बा। सेंट्रल विस्टा परियोजना के सितंबर 2019 में घोषणा कइल गइल रहे। 10 दिसंबर 2020 के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परियोजना के आधारशिला रखनीं। एकरा अलावे एक केंद्रीय सचिवालय के भी निर्माण कइल जाई। एकरे साथे इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक तीन किलोमीटर लंबा ‘राजपथ’ में भी परिवर्तन प्रस्तावित बा। जब देश के राजधानी नई दिल्ली बनल त इहँवा के सब प्रमुख इमारतन के बने में करीब 20 बरिस लागल रहे। लेकिन सेंट्रल बिष्टा के कार्य त करोना काल में ही मार्च 2024 तक समाप्त हो जाई। यानी 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहिले देश के सेंट्रल विस्टा नया रूप में मिली। अब विनिर्माण क्षेत्र में नया-नया तकनीक आ गइल बा। एमे काम बहुत तेज गति से होला। एसे सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो ही जाई अइसन लागsता। सरकार के चाहत बा कि संसद के नया इमारत भी 2022 तक बन जाय जब देश अपना आज़ादी के 75वीं वर्षगांठ मना रहल होखे। अगर रउआ संसद भवन के आसपास से गुजरीं त देखेम कि संसद भवन परिसर पर काम तेजी से चल रहल बा। सारा परिसर के लमहर-लमहर बोर्ड से कवर कइल जा चुका बा।

हमरा एक घटना इयाद आवsता। पोलैंड जब आजाद भइल तब पोलैंड के नया सरकार देश के सबसे बड़ा चर्च के तोड़ के ओही स्थान पर एक नया सुन्दर चर्च के निर्माण के आदेश देहलस। एकर आलोचना होखे लागल। लोग कहल कि पोलैंड त ईसाई देश ह। इहाँ पुरान सुंदर विशाल चर्च के तोड़ के उहाँ फिर से नया चर्च बनवला के का तुक बा। पोलैंड के नव निर्वाचित प्रधानमंत्री के तर्क रहे कि ऊ चर्च अंग्रेज शासक लोग द्वारा निर्मित रहे जवन बार-बार हमनीं के गुलामी के इयाद दिलावत रहे। हम ई नइखीं चाहत कि हमार नया पीढ़ी गुलामी के चिन्हन के देख के शर्मिंदा होखे, एही खातिर हम देश में गुलामी के चिन्हन के नष्ट करके आजाद पोलैंड के नया चिन्हन के निर्माण करे के चाहsतानी। हम ई उदाहरण मात्र एक संकेत के रूप में देले बानी। केहू भी स्वाभिमानी प्रधानमंत्री गुलामी के प्रतीकन के साथ दिन-रात जी कइसे सकता?

खैर ई सब बात छोड़ीं। यकीन मानी कि नया सेंट्रल विस्टा के इमारतन के डिजाइन आ ये सारा क्षेत्र के लैंड स्केपिंग विश्व स्तरीय होई। नई दिल्ली के अनेक इमारतन के दशा ओइसे भी बेहद खराब हो चुकल बा। ओकरा मेंटनेंस पर बार-बार करोड़ों खर्च कइला से बेहतर बा कि ओकरा स्थान पर आधुनिक आ बेहतरीन इमारत बने। अंत में एक बात नोट कर लीं कि समूचा “सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट” पर मात्र 20 हजार करोड़ रुपया व्यय होखे वाला बा। एतना धन के रिकवरी त होइए जाई काहे से कि सरकार के सेंट्रल विस्टा के बनला के बाद हर साल एक हजार करोड़ रुपया किराया पर खर्च ना करे के होई।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं)


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Hum BhojpuriaJuly 8, 20211min4280

आर.के. सिन्हा

ई साफ बा कि ब्रिक्स जइसन मंच एही खातिर बनले बा ताकि एह में शामिल देश एक-दोसरा के साथे सहयोग करे। ई लोग आपस में जुड़ेला भी एही खातिर काहेकि ये लोग में विभिन्न मसलन पर आपसी सहमति होला, चाहे एकरा खातिर सदिच्छा बनल रहेला। पर कोरोना काल के दौरान देखे में आ रहल बा कि ब्रिक्स देशन के एकमात्र सदस्य चीन अन्य सहयोगी देशन से, खासतौर पर भारत आ ब्राजील के कोरोना से लड़े में कतई साथ नइखे देत। ये दूनू देशन में कोरोना के कारण भारी नुकसान भी हो रहल बा। पिछले साल नवंबर में ब्रिक्स सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग कहले रहलन कि कोरोना संक्रमण पूरा विश्व में काफी तेजी से फइल रहल बा। कोरोना संक्रमण के इलाज खातिर चीनी कम्पनी अपना रूसी भागीदारन के साथ काम कर रहल बा। ओही जा उ दक्षिण अफ्रीका अउर भारत के साथ सहयोग करे खातिर भी तैयार बा। का चीन के एतना भर कह देहला से काम हो जाई?

जिनपिंग त ये समय में भी भारत के साथ सीमा पर लड़े के मूड में देखाई देत रहले। एही से उनकर ई कहल कि उनकर देश भारत से सहयोग खातिर तैयार बा समझ से परे बा। उनका अपना देश में उनका दावा के अनुसार कोरोना के संकट खत्म सा हो चुकल बा। उहाँ जिंदगी अब सामान्य हो रहल बा। तब उ पूरा विश्व के या कम से कम ब्रिक्स के सदस्य देशन के ई काहे नइखन बतावत कि कोरोना पर कवना तरे से काबू पावल जा सकेला? का चीन के ई देखाई नइखे देत कि भारत ये समय कवना घोर संकट से गुजर रहल बा? एकरा बावजूद उनका तरफ से भारत के कवनों मदद नइखे मिलत, ई साबित कर रहल बा कि उ ब्रिक्स आंदोलन के मजबूत करे के प्रति गंभीर नइखन। उ ब्रिक्स के एक अन्य सदस्य देश रूस से ही कुछ सीख ले लितन। रूस में बनल वैक्सीन के पहिलका खेप (डेढ़ लाख डोज) भारत पहुंच चुकल रहे। दोसर खेप भी जल्दी ही पहुंच जाई। रशियन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट फंड भारत में ये वैक्सीन के उपलब्ध करावे खातिर डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज से हाथ मिलवले बा। स्पूतनिक वी टीका के दुनियाभर के 50 से ज्यादा देश अप्रूवल दे चुकल बा।

ब्रिक्स के संबंध में कहल जाला कि ई उभरत अर्थव्यवस्था के संघ ह। एह में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका बा। ब्रिक्स के स्थापना 2009 में भइल रहे। एके 2010 में दक्षिण अफ्रीका में शामिल कइला गइला के वजह से पहिले “ब्रिक” ही कहल जात रहे। रूस के छोड़ के ब्रिक्स के सभी सदस्य विकासशील या नव औद्योगीकृत देश ही बाड़े जेकर अर्थव्यवस्था विश्व भर में आज के दिन सबसे तेजी से बढ़ रहल बा। दुनिया के 40 फीसद से अधिक आबादी ब्रिक्स देशन में ही रहेला। कहे खातिर त ब्रिक्स के सदस्य देश वित्त, व्यापार,  स्वास्थ्य, विज्ञान अउर प्रौद्योगिकी, शिक्षा, कृषि, संचार, श्रम आदि मसलन पर परस्पर सहयोग के वादा करत रहल बा। पर चीन भारत के साथ हमेशा दुश्मन जइसन व्यवहार करत रहल बा। ई बात कोरोना काल के समय त अउर शीशा के तरह साफ हो गइल बा।

कोरोना के दूसरा लहर में अचानक संक्रमण के मामला में बढ़ोतरी से भारत स्वास्थ्य व्यवस्था के मोर्चा पर जूझ रहल बा। ये जानलेवा बीमारी से निपटे खातिर भारत के चीन कतई साथ नइखे देले। हालांकि भारत आजकल भी ओकरा से काफी सामान आयात कर रहल बा। उदाहरण के रूप में भारतीय कम्पनियन के द्वारा चीनी विनिर्माता सब से खरीदे जाये वाली ऑक्सीजन कंसंट्रेटर जइसन कुछ कोविड-19 मेडिकल सप्लाई महंगा हो गइल बा। हांगकांग में भारत के महावाणिज्य दूत प्रियंका चौहान हाल में चीन से मेडिकल सप्लाई के कीमत में बढ़ोतरी रोके खातिर कहले रहली। भारत से ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के मांग कुछ ही समय में कई गुना बढ़ गइल बा।

केहू माने भा ना माने, पर चीन एक नंबर के घटिया देश बा। चीन के आतंकवाद के मसला पर भी रवैया कभी साफ ना रहल। उ हर मामला पर पाकिस्तान के साथ देत रहल बा। चीन कहले रहे, आतंकवाद सब देशन खातिर एक आम चुनौती बा। पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अपना आजादी के लड़ाई में जबरदस्त प्रयास आ बलिदान कइले बा। एकरा खातिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के ओकर सम्मान करे के चाहीं अउर पहचान भी करे के चाहीं। जब समूचा विश्व बिरादरी पाकिस्तान पर आतंकवाद के ले के सख्त कदम उठावे खातिर दबाव बनावेला, तब दुष्ट चीन पाकिस्तान के बेशर्मी से बचावे में लाग जाला।

बेशक, ब्रिक्स दुनिया से कोरोना से बचाव आ आतंकवाद के खत्म करे के स्तर पर एक लमहर मुहिम चला सकत रहे। पर अभी तक ओकर कदम ये लिहाज से तेज रफ्तार से नइखे बढ़ल। ई दुखद बा कि संसार के एतना महत्वपूर्ण संगठन एह सवालन पर कमजोर हीं रहल। लेकिन, ई कहे के होई कि चीन से लोहा लेवे में आस्ट्रेलिया मर्दानगी देखाके आगे रहल। एही खातिर चीन आस्ट्रेलिया से व्यापारिक समझौतन पर चल रहल सब गतिविधियन पर अनिश्चितकाल खातिर रोक लगा देले बा। बीजिंग आस्ट्रेलिया से कोयला, आयरन, गेहूं, वाइन सहित केतने सामान के आयात के भी फिलहाल बंद कर देले बा। सवाल ई बा कि ब्रिक्स के बाकी देश चीन से काहे ना पूछेला कि उ कोरोना काल में अपना सहयोगी देशन के साथ काहे नइखे खड़ा?  उ ब्रिक्स के साथी देशन के हित चाहsता कि ना?

खैर, ई कष्टकारी समय भारत खातिर अब एगो अवसर बन सकsता। भारत खातिर दुनिया के मैन्यूफैक्चरिंग हब बने के अवसर बा। भारत चाहे त चीन के खिलाफ दुनिया भर में फइलल नफरत के इस्तेमाल अपना खातिर एक बड़हन आर्थिक अवसर के रूप में कर सकsता। भारत के ये अवसर के कदापि छोड़े के ना चाहीं। ई संभव होई जब हम दुनिया भर के कंपनियन के अपना इहाँ निवेश खातिर सम्मानपूर्वक बुलायेम। हमनीं के सरकारी विभागन में फैलल भ्रष्टाचार अउर लालफीताशाही खत्म होई। केन्द्र आ राज्य सरकारन के ये दिशा में कठोर फैसला लेवे के होई। कोरोना काल के बाद से चीन में काम करे वाला सैकड़न बहुराष्ट्रीय कम्पनी उहाँ से आपन दुकान बंद कर रहल बा। भारत के ओ कंपनियन के अपना इहाँ बुलावे के चाहीं लेकिन आकर्षक शर्तन पर।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं)


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Hum BhojpuriaJune 11, 20211min4380

  आर.के. सिन्हा

प्रमुख अमेरिकी बैंक सिटी बैंक के भारत में आपन कारोबार समेटे के फैसला कुछ गंभीर सवाल खड़ा कर रहल बा। आखिरकार काहे विदेशी बैंकन के भारत में पैर उखड़ रहल बाटे? इनका खातिर भारत  काहे कठिन स्थान साबित हो रहल बा कारोबार करे के लिहाज से? सिटी बैंक के कहनाम बा कि ग्लोबल स्ट्रैटजी के हिस्सा के रूप में उ भारत में आपन कंज्यूमर बैंकिंग बिजनेस बंद करे जा रहल बा। सिटी बैंक भारत में प्रवेश क के 1985 में कंज्यूमर बैंकिंग बिजनेस शुरू कइलस। अगर पीछे मुड़ के देखीं त पता चलsता कि बैंक ऑफ अमेरिका 1998 में, एएनजे ग्रिंडलेज बैंक 2000 में, एबीएन ऑमरो बैंक 2007 में, ड्यूश बैंक 2011 में, आईएनजी 2014 तथा ओबीएस ने 2015 में आपन भारत के कारोबार के या त कम कइलस या बंद कर दिहलस। एचएसबीसी 2016 में आपन कामकाज बंद त ना कइलस लेकिन अपना शाखा सबके तादाद बहुत ही कम कर दिहलस ।

विदेशी बैंकन के साथ सबसे बड़ समस्या ई रहेला कि इ सिर्फ मुंबई, दिल्ली, बैंगलुरू, कोलकता, चैन्नई जइसन महानगरन अउर अहमदाबाद, गुरुग्राम, चंडीगढ़, इंदौर जइसन बड़ नगरन अउर शहरन में ही कार्यरत रह के ही अपना खातिर मोट मुनाफा के उम्मीद करे ले। ई गिनती भर के शाखा ही खोले ले। ई सोचे ले कि एटीएम खोले भर से बात बन जाई। ये एटीएम के शाखा के विकल्प के रूप में देखे ले। ई सोच बिल्कुल सही नइखे। इनका समझ ही ना आवे कि आम हिन्दुस्तानी के बैंक में जाके  बैंक कर्मी से आपन पास बुक या एफडी पॉलिसी के अपडेट करवावे में ही आनंद मिलेला। उहाँ पर उनका बैंक के नया स्कीमन के बारे में भी पता चलेsला।

बैंकिग सेक्टर के जानकार लोग जान रहल बा कि जवन बैंक जेतना नया शाखा खोलेले उ ओतने हीं जनता के बीच में या कहीं कि अपना ग्राहकन के पास पहुंच जाले। स्टेट बैंक आ एचडीएफसी बैंक के राजधानी के व्यावसायिक हब कनॉट प्लेस इलाके में ही लगभग 10-10 शाखा कार्यरत बा। एही तरे से कई प्रमुख भारतीय बैंक भारत के छोट-छोट शहरन, कस्बा अउर गांवन तक में फइलल बा। एचडीएफसी, कोटक महेंद्रा बैंक, आईसीआईसाई बैंक त प्राइवेट बैंक ह। फिर भी इनका पता बा कि ई सब ओही स्थिति में आगे जाई जब भारत के सभी हिस्सन में आपन शाखा या एटीएम खोली। ई सब एही दिशा में आगे बढ़ रहल बाड़े।

रउआ बता दीं कि का कवनों विदेशी बैंक बिहार के किसान के ट्रेक्टर खरीदे या आंध्र प्रदेश के युवा उद्यमी के अपना कारोबार चालू करे खातिर लोन दिहलस ? का केहू के इयाद बा कि एएनजे ग्रिंडलेज बैंक, एबीएन ऑमरो बैंक, ड्यूश बैंक, आईएनजी चाहे आरबीएस कभी झारखंड के ग्रामीण इलाकन, छतीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकन या फिर उड़ीसा के सुदूर इलाकन में आपन कवनों शाखा खोलले होखे ? अगर ना खोललस त काहे ना खोललस ? का इनका खातिर भारत के मतलब सिर्फ कुछ एक गिनती भर के शहर बा। ई त कवनों बात ना भइल। इनका भारत में आपन कारोबार करे के अधिकार बा। इनका इहो भी अधिकार बा कि इ भारत में कारोबार करके मुनाफा भी कमास। आखिर ई लोग निवेश भी करबे होला। लेकिन ए लोग के सिर्फ अउर सिर्फ मुनाफा के लेके ना सोचें के चाहीं। साँच बात इ बा कि ई विदेशी बैंक त मोट जेब वाले लोग खातिर आपन आकर्षक सेवा लेके आवेलन। इनकर टारगेट उ ग्राहक पढ़ल लिखल आधुनिक नौजवान भी होले जवन मोटी सैलरी पर नौकरी करेले। सिटी बैंक कंज्यूमर बैंकिंग बिजनेस में क्रेडिट कार्ड्स, रीटेल बैंकिंग, होम लोन जइसन सेवा देत रहलन। ये समय भारत में सिटी बैंक के 35 शाखा बा। गौर करीं कि सिर्फ 35 शाखा के साथ चल रहल “सिटी बैंक” के वित्त वर्ष 2019-20 में 4,912 करोड़ रुपया कर शुद्ध लाभ भइल रहे जवन एकरा पूर्व के वित्त वर्ष में 4,185 करोड़ रुपया रहे।

भारत में भारतीय रिजर्व बैंक सर्वोच्च बैंकिंग नियामक अथॉरिटी बा। आरबीआई देश में बैंकिंग व्यवस्था खातिर नियम बनावेला अउर देश के मौद्रिक नीति के बारे में फैसला लेला। भारत के बैंकिंग क्षेत्र में पांच तरह के बैंक काम करेला। ई निजी क्षेत्र के बैंक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, विदेशी बैंक, ग्रामीण बैंक आ कोऑपरेटिव बैंक के रूप में जानल जाला। अगर बात प्राइवेट क्षेत्र के बैंकन से शुरू करीं त हमार प्रमुख प्राइवेट बैंक बा; एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, इंडसइंड बैंक अउर एक्सिस बैंक आदि। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ओकरा के कहल जाला जेमे मेजोरिटी हिस्सेदारी (51%) सरकार के पास होला। एमे पंजाब नेशनल बैंक, भारतीय स्टेट बैंक आ सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया आदि आवेला। अब बात करतानी विदेशी बैंकन के। भारत खातिर विदेशी बैंक दो प्रकार के होला। पहिले, उ बैंक जवन भारत में आपन ब्रांच खोलेला आ दोसर उ बैंक जवन भारत में अपना प्रतिनिधि बैंकन के शाखा के माध्यम से बिज़नेस करेला। ये बैंकन में स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, अमेरिकन एक्सप्रेस अउर सिटी बैंक आदि आवेला। एकरा अलावा, भारत में विभिन्न ग्रामीण बैंक अउर कोपरेटिव बैंक भी सक्रिय बा। इनके ग्राहक संख्या भी लाखन में बा।

एक बिन्दु पर साफ राय रखे के जरूरत बा कि ओ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकन में कामकाज के स्तर के बहुत बेहतर करे के जरूरत बा जेकरा के हम सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कहीं ने। इनका स्थिति से त सारा देश वाकिफ बा। बैंकिंग अपने आप में आम जनता से जुड़ल सेवा के क्षेत्र ह। ई सेवा क्षेत्र में ही आवेला। इहाँ पर त उहे बैंक आगे जाई जवन अपना ग्राहकन के बेहतर सुविधा दी, जेकर अधिक से अधिक शाखा होई। ओकर अफसर आ बाकी स्टाफ अपना ग्राहकन के हित के ध्यान राखी। कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक त एही खातिर ही जनता के बीच जमल बा, काहे कि उनका भारत सरकार से भी मोटा बिजनेस मिल जाला। अगर सरकार उनका के अपने रहमो करम पर छोड़ दे त ई लोग पानी भी ना मागीं। भारत के बाजार अपने आप में अनंत सागर के तरह बा। एमे सबका खातिर काम करे के जगह बनावे अउर कमाये के पर्याप्त अवसर बा। पर भारत के बाजार में उहे बैंक टिकी जवन ग्राहकन के बेहतर सुविधा दी अउर जिनकर उपस्थिति महानगरन से ले के गांव-कस्बन तक में होई।

 (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


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Hum BhojpuriaJune 1, 20211min3800

आर. के. सिन्हा

छत्तीसगढ़ में माओवादियन के दानवी कृत्य के कारण सारा देश के गुस्सा वाजिब ही बा। माओवादियन के साथ मुठभेड़ में सुरक्षा बल के 22 जवान शहीद हो गइलन। मुठभेड़ स्थल पर पड़ल जवानन के शव के देखके हरेक हिन्दुस्तानी के कलेजा फाटल जात रहे। पिछला कुछ साल में छत्तीसगढ़ में ई माओवादियन के सबसे बड़ा हमला मानल जा रहा बा। माओवादी सब जे तरह के क्रूरता दिखलवले बा उ दिल दहला देवे वाली राक्षसी अउर पाशविक कृत्य बा। माओवादियन के ई दुस्साहसपूर्ण लोकतंत्र विरोधी कार्रवाई पूरा देश खातिर एक गंभीर चुनौती बा। ई देश पूर्व के दशकन में पंजाब, असम आ पूर्वोत्तर भारत में भी हिंसक पृथकतावादी आंदोलनन के देखले बा आ सफलतापूर्वक कुचलले भी बा। पर ये आतंकवादियन आ गैंगस्टर अपराधियन से भी खतरनाक माओवादियन के काहे नष्ट नइखे कर पा रहल? का देश शासन के संकल्प में कवनों स्तर पर कवनों कमी बा? ई बात पहिले सही भी हो पर आज के दिन त कतई सही ना मानल जाई।

एतना जरूर बा कि माओवादियन के ताजा कार्रवाई के बाद सुरक्षा एजेंसियन के एक बार अपना रणनीति पर फेर से विचार करहीं के होई। ये तरह के रणनीति बनावे के होई जेसे कि माओवादिन के पूरी तरह कुचलल जा सके। रणनीति अइसन बने कि ओ सब के जल्दी से जल्दी खत्म कइल जा सके। बहरहाल, लागत त इहे बा कि अब छतीसगढ़ चाहे कवनों अन्य राज्य में माओवादी लोग बाँची ना। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कह चुकल बाड़े कि शहीद जवानन के मौत के बदला लिहल जाई। गृह मंत्री अमित शाह भी इहे बात दुहरवले बाड़े। माओवादी लोग बताओ कि ई उनका कौना किताब में लिखल बा कि बेगुनाह जवानन के डायनामाइट से उड़ा दिहल जाए? अगर इहे उनका मार्क्सवाद के भाषा बा त हमार सेना अउर अर्धसैनिक बल उनका ये मार्क्सवाद के पूरी तरह नेस्तनाबूद करे में सक्षम बा। तैयार हो जा लोग अब अपना मौत खातिर।

मिल रहल जानकारी त चीख-चीख के इहे कह रहल बा कि बीजापुर के हमला सामान्य ना रहे। कहल जा रहल बा कि सुरक्षा बल के पास भी 20 दिन पहले से सूचना रहे, कुख्यात हिड़मा अउर ओकरा टीम के उपस्थिति के लेके। याद करीं 2010 में बस्तर में 76 सीआरपीएफ के जवान शहीद भइल रहलन। रिटायर्ड डीजी राम मोहन द्वारा कइल गइल जांच में पता चलल रहे कि सुरक्षा बल के एक वायरलेस सेट नक्सलियन के पास रहे अउर ओकरे से उनके पास फोर्स के तमाम मूवमेंट के जानकारी मिलत रहे। ओ समय फोर्स के नेतृत्व जवना डीआईजी, सीआरपीएफ के पास रहे, उहे आज ओ इलाका के आईजी भी बतावल जा रहल बाड़े। एतना बड़ा चूक के बावजूद सीआरपीएफ के ओ अफसर के प्रमोशन भइल आ फेर ओही इलाके में बहाली भी। वापस लौटत दल के अंतिम टुकड़ी पर घात लगावल, ई गत 10 साल के 7वीं घटना ह। आखिर ई छापेमारी योजना कइसे बनल? केम्प में बैकअप फोर्स काहे ना तैयार रहे? 24 घंटा तक हमनी के अपना शहीदन के शव आ फंसल जवानन के काहे ना निकाल पवनी सन ? नक्सलियन के पास पहिलहीं से अपने साथियन के शवन के निकाले खातिर ट्रैक्टर भी तैयार रहे। उनका साथे 1200 लोग जमा रहे। लेकिन, ऑपरेशन के हेड के पास एकर खबर तक कइसे ना पहुंचल ? ये सब सवालन के जवाब खोजे के होई।

अब जरा ओ शख्स के बारे में जान लीं जेकरा नाम से छत्तीसगढ़ के जंगलन में खौफ रहेला, जे अपना के आदिवासियन के मसीहा कहेला। ओकर नाम कमांडर माडवी हिडमा ह। ओकरे अगुवाई में 2010 में भइल रहे दंतेवाड़ा हमला। 2017 के सुकमा हमला के भी उहे देले रहे अंजाम। हाल में उहे इ भयानक खूनी खेल खेललस 3 अप्रैल के बीजापुर अउर सुकमा जिला के सीमा पर। ओकर 400 खूंखार कैडर जोनागुड़ा पहाड़ी के जंगलन में सीआरपीएफ के सुरक्षा बलन के जवानन पर तीन ओर से घेर के हमला कइलस, जवन ओ नक्सलियन के घेरे खातिर रवाना भइल रहे। हिडमा के उम्र के बारे में केहू के ठीक से पता नइखे। अइसे ओकर उम्र 40 साल के आसपास बतावल जाला। सुकमा अउर बीजापुर के बीच पार्वती गांव में जनमल हिडमा कुछ खास पढ़ल-लिखल भी नइखे। सुरक्षा बलन के अब ये खूनी दरिंदा के मारs हीं के होई। सवाल इ उठता कि हिडमा तक सुरक्षा बल आज तक काहे ना पहुंच पावल। छत्तीसगढ़ पुलिस के एगो सीनियर अफसर एकर वजह बतावेले, ‘बेहद शातिर ह हिडमा। उ अपने आसपास कई घेरा बना रखले बा। सबसे अंदरूनी घेरे में ही करीब 200 कैडर होला। एमे से ज्यादातर त ओकरा बचपन के साथिए बाड़े। ई बाहरी घेरा वालन के भी ओकरा पास फटके ना देला।

माओवादियन के यदि लागsता कि उनका साथे कवनों भी स्तर पर कहीं भी अन्याय भइल बा, त उ लोग लोकतांत्रिक तरीका से अहिंसक आंदोलन करके अपना मांगन के मनवा सकेले। सत्याग्रह के रास्ता भी अपना सकेले। एतना त समझ ही लेवे के चाहीं कि अब चूंकि उ लोग लोकतंत्र के रास्ता पर चले के राजी नइखे त उनका कठोर सजा त मिलबे करी जइसे कवनों भी देशद्रोही के मिलेला। का ई लोग भारत के राजसत्ता से लोहा ली? पहिले पैंट पर बेल्ट लगावे के त ठीक से सीख लेव लोग, फिर बात करस। भारत के राजसत्ता के मतलब इनका ठीक से समझहीं के होई। ई लोग नइखे जानत कि तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा के दशकन से भारत डंका के चोट पर अपना इहाँ शरण दे रखले बा अउर माओवाद के आका चीन लाल-पीला हो के भी कुछ नइखे कर पा रहल। बस बीच-बीच में कसमसा भर रहल बा। ये राजसत्ता से ई माओवादी का खाक टक्कर लीहें। ई सरेआम लूट, दादागीरी आ हफ्ता वसूली के धंधा करेले। इहे ह इनकर माओवाद। उनके आका के भी मालूम बा कि उ भारत के राजसत्ता से कभी भी लोहा नइखन ले सकत। पर भोला-भाला ग्रामीण सबके अपना जाल में फंसा के उनका के भीड़ के जबरदस्ती आगे क के खूनी खेल खेलत रहल बा लोग।

माओवादियन के लेके आज पूरा देश एक राय रख रहल बा। अब ये लोग के समूल नष्ट करहीं के होई। ई देश के दुश्मन आ आस्तीन के सांप हउवन। इनकर जल्दी से जल्दी खात्मा कइल ही देश हित में होई। इनके हिमायतियन के भी ठीक तरह से कसे के होई। हिमायतियन से आशय ओ तथाकथित मानवाधिकारवादियन से बा जे ये माओवादियन के हक में लगातार बोलेले। अंत में एगो सवाल करे के मन कर रहल बा कि का कम्युनिस्ट चीन, रूस या पूंजीवादी अमेरिका या जापान जइसन पूंजीवादी लोकतंत्र में भी गुंडागर्दी करे वाला माओवादी पनप सकेले आ आपन खूनी खेल खेल सकेले ? ना नू ?  त फेर भारत में इ कइसे पनप रहल बाड़े। राजनीतिक इच्छा शक्ति के कमी से अबतक ई होत रहल बा। लेकिन, मोदी जी के राज में त इ संभव नइखे दिखत।

( लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


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Hum BhojpuriaMay 19, 20211min5430

  आर.के. सिन्हा

दिल्ली विश्वविद्यालय के हालिया संपन्न 97बेवाँ दीक्षांत समारोह में 670 डॉक्टरेट के डिग्री देहल गइल। मतलब ई कि ई सब पी.एच.डी. धारी अब अपना नाम के आगे डॉ. लिख सकsता। का ये सब के शोध पहिले से स्थापित तथ्यन से कुछ हट के रहे ?  बेशक, उच्च शिक्षा में शोध के स्तर अहम होला। एही से इहो तय कइल जाला कि पीएचडी देवे वाला विश्वविद्यालय के स्तर कवना तरह के बा। अगर अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नालॉजी (एमआईटी), कोलोरोडा विश्वविद्लाय, ब्रिटेन के कैम्ब्रिज अउर आक्सफोर्ड विश्वविद्लायन के लोहा सारा दुनिया मानेला त कवनों त बात होइबे नु करी ? ई सिर्फ अखबारन में विज्ञापन देके दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्लाय नइखे बनल। ये सबके नाम उनके विद्यार्थियन द्वारा कइल मौलिक शोध के कारण ही बा।

बड़ा सवाल ई बा कि का हमरा इहाँ हर साल जे थोक के भाव से पीएचडी के डिग्री देहल जाला, ओकर आगे चल के समाज या देश के कवनों रूप में लाभ भी होला ?  सिर्फ दिल्ली विश्वविद्लाय एक वर्ष में 670 पीएचडी के डिग्री देले बा। अगर देश के सब विश्वविद्लायन से अलग-अलग विषयन में शोध करे वाला रिसर्चर के मिले वाला पीएचडी के डिग्री के बात करीं त ई आंकड़ा हर साल हजारन में पहुँच जाई। मतलब हरेक दस साल के दौरान देश में लाखों नया पीएचडी प्राप्त करे वाले पैदा हो ही जाला लोग। का ये शोध करे वाला लोग के शोध भी मौलिक होला ?  का ओ सब में कवनों ये तरह के स्थापना कइल गइल होला जवन नया होला ?  ई सवाल पूछल एसे भी जरूरी बा, काहे कि हर साल केन्द्र आ राज्य सरकार बहुत मोट राशि पीएचडी खातिर शोध करे वाला शोधार्थी सब पर व्यय करेला। ये लोग के शोध के दौरान ठीक-ठीक राशि दिहल जाला ताकि इनके शोध कार्य में कवनों तरह के व्यवधान या अड़चन ना आवे अउर इनकर जीवन यापन भी चलत रहे। निश्चय ही उच्च कोटि के शोध से ही शिक्षण संस्थानन के पहचान बनेला। जे संस्थान अपना शोध अउर ओकर क्वालिटी पर ध्यान ना देवे ओके कभी गंभीरता से ना लिहल जाला।

देश में सबसे अधिक पीएचडी के डिग्री तमिलनाडू, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में देहल जाला। मानव संसाधन मंत्रालय के 2018 में जारी एक रिपोर्ट पर यकीन कइल जाय त ओ साल तमिलनाडू में 5,844 शोधार्थियन के पीएचडी देहल गइल। कर्नाटक में पाँच हजार से कुछ अधिक शोधार्थी पीएचडी के डिग्री लेवे में सफल रहे। उत्तर प्रदेश में 3,396 शोधार्थियन के ई डिग्री मिलल। बाकी राज्य भी पीएचडी देवे में कवनों बहुत पीछे नइखे। भारत में साल 2018 में 40.813 नया पीएचडीधारी सामने अइलन। आखिर एतना शोध भइला के लाभ केकरा मिल रहल बा? शोध पूरा भइला अउर डिग्री लेहला के बाद ओ शोध के का होला? का एमे से एकाध प्रतिशत शोध के प्रकाशित करे खातिर कवनों प्रकाशक तैयार होले ? कवनों प्रतिष्ठित अखबार के नजर भी ओ शोधन पर जाला ? का हमरा इहाँ शोध के स्तर सच में स्तरीय या विश्व स्तरीय होला ?  ई बहुत जरूरी सवाल बा। ये पर गंभीरता से बात कइल भी जरूरी बा। जवन भी कहीं हमरा इहाँ शोध के लेके कोई भी सरकार या विश्वविद्यालय बहुत गंभीरता के भाव ना राखे।

भारत में जब उच्च शिक्षा संस्थानन के शुरुआत भइल तबो क्वालिटी रिसर्च के बहुत महत्व ना देहल गइल। निराश करे वाली बात ई बा कि हमनीं शोध पर कायदे से कभी फोकस हीं ना कइनीं। अगर हर साल हजारन शोधकर्ता लोग के पीएचडी के डिग्री मिल रहल बा त फेर ये लोग के विश्व स्तर पर सम्मान काहे नइखे मिलत। माफ करेम हमनीं के आईआईटी संस्थानन के चर्चा भी बहुत होला। इहाँ पर भी हर साल बहुत से विद्यार्थी के पीएचडी मिलेला। का अपना कवनों आईआईटी या इंजीनियरिंग कॉलेज के केहू छात्र के उनका मूल शोध खातिर नोबेल पुरस्कार के लायक मानल गइल? ना नू। अगर रउआ अकादमिक दुनिया से जुड़ल बानीं त रउआ जानते होखेम कि अपना इहाँ शोध के मतलब होला पहिले से प्रकाशित सामग्री के आधार पर ही आपन रिसर्च पेपर लिख लेहल। राउर काम खतम। इहे वजह बा कि शोध में नयापन के घोर अभाव देखाई देला। ई सच में एक घोर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बा कि अपना इहाँ पर शोध के प्रति हर स्तर पर उदासीनता के भाव बा। शोध ये खातिर कइल जाला ताकि पीएचडी मिल जाए आ फेर एक अदद नौकरी। रउआ अमेरिका के उदाहरण लीं। उहाँ के विश्वविद्लायन में मूल शोध पर जोर दिहल जाला। एही चलते उहाँ के शोधार्थी लगातार नोबेल पुरस्कार जीत पावे में सफल रहेलन।

ये बहस के तनि अउर व्यापक क दे तानी। अपना फार्मा कंपनियन के ही लीं। ई लोग नया दवा ईजाद करे पर होखे वाला रिसर्च पर केतना निवेश करेला?  ई मुनाफ़ा के अनुपात में बहुत ही कम राशि शोध पर लगावेला। इहे हालत अपना स्वास्थ्य क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम सबके रहल बा। इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल लिमिटेड (आईडीपीएल) के हीं बात कर लीं। एकर स्थापना 1961 में कइल गइल रहे, जेकर प्राथमिक उद्देश्य आवश्यक जीवनरक्षक दवाइयन में आत्मनिर्भरता हासिल कइल रहे। पर एकरा करप्शन के कारण घाटा पर घाटा भइल। इहाँ भी कबो कवनों महत्वपूर्ण शोध ना भइल। अब देखीं कि भारत में शोध खातिर सुविधा त बहुत बढ़ल, इंटरनेट के सुविधा सभी शोधार्थियन के आसानी से उपलब्ध बा, प्रयोगशाला सबके स्तर भी सुधरल बा, सरकार शोधकर्ता सबके आर्थिक मदद भी करेला। एकरा बावजूद अपना इहाँ शोध के स्तर घटिया ही हो रहल बा। त फेर हम काहे एतना सब पीएचडी के डिग्री बांटते ही जा रहल बानीं? आखिर हम साबित का करे के चाह रहल बानीं ? हम अइसन अनेक शोधार्थियन के जान रहल बानीं जे कुछ साल तक अपना विश्वविद्लायन से पीएचडी करे के नाम पर पैसा लिहलस अउर उहाँ के छात्रावास के भी भरपूर इस्तेमाल कइलस। ओकरा बाद उ बिना शोध पूरा कइले अपना विश्वविद्लाय के छोड़ देहलस या उहें बइठ के राजनीति करे लागल।

एक बात समझ लीं कि हमनीं के शोध के गुणवत्ता पर बहुत ध्यान देवे के होई। ओ शोधार्थियन से बचे के होई जे दायें-बायें से कापी-कट आ पेस्ट क के आपन शोध थमा देला। ये मानसिकता पर तत्काल से रोक लागे के चाहीं। शोध के विषय तय करे के एक मात्र मापदंड इहे होखे कि एसे भविष्य में देश अउर समाज के का लाभ होई ? शोधार्थियन के गाइड्स पर भी नजर रखल जाए कि उ कवना तरह से अपना शोधार्थी के सहयोग कर रहल बाड़ें। बीच-बीच में शिकायत मिलत रहल बा कि कुछ गाइड्स अपना शोधार्थियन के प्रताड़ित करत रहेला लोग। ये सब बिन्दुअन पर भी ध्यान दिहल जाए।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


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Hum BhojpuriaApril 19, 20211min6420

आर.के. सिन्हा

रतन टाटा के भारत-रत्न देवे के हाल में सोशल मीडिया में चलल कैंपेन अपने आप में अइसे त कतई गलत ना रहे। पर जे देश भर के रत्न होखे ओकरा भारत रत्न चाहे कोई दोसर पुरस्कार मिले या ना मिले, ओसे का फर्क पड़ता। उ त देश के नायक पहिलहीं से ही बाड़े। उनका के रउआ नायकन के नायक कह सकsतानी। जब रतन टाटा के भारत रत्न से सम्मानित करे के मांग जोर पकड़ल त रतन टाटा के खुद ही कहे के पड़ल कि ‘ऊ अपना प्रशंसक सबके भावना के कद्र करsतारे लेकिन अइसन कैंपेन के बंद करे के चाहीं। हम भारतीय भइला आ भारत के ग्रोथ अउर समृद्धि में योगदान करे में खुद के भाग्यशाली मानsतानी। जाहिर बा, ये तरह के बात कवनों शिखर शख्सियत ही कर सकsता। सामान्य कद के इंसान रतन टाटा के तरह के स्टैंड त नाहिंये ली। के ना जानेला कि बहुत से सफेदपोश हस्ती भी पद्म पुरस्कार पावे खातिर अनेक तरह के लाबिंग अउर कई समझौता करेला।

टाटा समूह के पुराण पुरुष जे.आर.डी. टाटा के 1993 में निधन के बाद रतन टाटा नमक से लेके स्टील अउर कार से लेके ट्रक आ इधर हाल के बरिस में आई टी सेक्टर में भी टाटा समूह के एक शानदार अउर अनुकरणीय नेतृत्व देले बाड़न। रतन टाटा के भारत हीं ना बल्कि सारा संसार के सबसे आदरणीय कॉरपोरेट लीड़रन में से एक मानल जाला। जे.आर.डी टाटा के संसार से विदा भइला के बाद शंका अउर आंशका जाहिर कइल जात रहे कि का उ जे.आर.डी के तरह के उच्चकोटि के नेतृत्व अपना समूह के देवे में सफल रहिहें?  इ सब शंका वाजिब भी रहे, काहे कि जे.आर.डी टाटा के व्यक्तित्व सच में बहुत बड़हन रहे। लेकिन ई त कहे के परी कि रतन टाटा अपने आपके सिद्ध करके दिखा दिहलन I अइसे त सब बिजनेस वैंचर के पहिलका लक्ष्य लाभ कमाइल हीं रहेला। एमे कुछ गलत भी नइखे। पर टाटा समूह के लाभ कमाए के साथ-साथ एक लक्ष्य सामाजिक सरोकार अउर देश के निर्माण में लागल रहल भी बा। ये मोर्चा पर कम से कम भारत के त कवनों भी बिजनेस घराना टाटा समूह के आगे पानी भरेsला। टाटा समूह के सारा देश एही खातिर आदर करेला कि उहाँ पर लाभ कमाइल ही लक्ष्य ना रहेला। रतन टाटा त अब टाटा समूह के चेयरमेन भी नइखन। उ चेयरमेन के पद टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस (टीसीएस) के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के सौंप देले बाड़े। उनका में प्रतिभा के पहचाने के कमाल के कला बा। उ सही पेशेवरन के सही जगह काम पर लगावेले। उनका एकर अभूतपूर्व नतीजा भी मिलेला। रतन टाटा एन. चंद्रशेखरन के बड़हन जिम्मेदारी देते समय ई ना देखलन कि उ कवनों नामवर अंग्रेजी माध्यम के स्कूल या कॉलेज में नइखन पढ़ले। रतन टाटा ई देखलन कि चंद्रशेखरन के सरपरस्ती में टीसीएस लगातार बुलन्दी के छू रहल बा। एही से उ टाटा समूह के इतिहास में पहिलका बार टाटा समूह के चेयरमैन एक गैर-टाटा परिवार से जुड़ल गैर-पारसी व्यक्ति के बनवलन। ये तरह के फैसला कवनों दूरदृष्टि रखे वाला शख्स ही कर सकsता। चंद्रशेखरन आपन स्कूली शिक्षा अपना मातृभाषा तमिल में ग्रहण कइले रहलन। उ स्कूल के बाद इंजीनियरिंग के डिग्री रीजनल इंजीनयरिंग कालेज (आरईसी), त्रिचि से हासिल कइलन। चंद्रशेखरन के टाटा समूह के चेयरमेन बनला से इहो साफ हो गइल कि तमिल या कवनों भारतीय भाषा से स्कूली शिक्षा लेवे वाला विद्यार्थी भी आगे चल के कॉरपोरेट संसार के शिखर पर जा सकsता। ऊ भी अपना हिस्सा के आसमान छू सकsता।

अगर आज भारत के सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया सबसे खास शक्तियन में से एक मानsता आ भारत के आईटी सेक्टर 190 अरब डॉलर तक पहुंच गइल बा त एकर श्रेय़ कुछ हद तक त रउआ रतन टाटा के भी देवे के होई। रतन टाटा में ई गुण त अदभुत बा कि उ अपना कवनों भी कम्पनी के सीईओ के काम में दखल ना देले। ओ लोग के पूरा आजादी देले कि उ कंपनी के अपना बुद्धि आ विवेक से आगे ले जाय। उ अपने सीईओज के छूट देले काम करे के। हालांकि उनका पर पैनी नजर भी रखस। ओ सबके समय-समय पर सलाह-मशविरा भी देत रहले। ये पॉजिटिव स्थिति में ही उनके समूह के कम्पनी सब दोसरा से आगे निकलेला।

रउआ कह सकsतानी कि जेआरडी टाटा के तरह रतन टाटा पर भी ईश्वरीय कृपा रहे कि उ चुन-चुन के एक से बढ़ के एक मैनेजर के अपना साथे जोड़ सकले। एही खातिर टाटा समूह से एन. चंद्रशेखरन (टीसीएस), अजित केरकर (ताज होटल),  ननी पालकीवाला (एसीसी सीमेंट), रूसी मोदी (टाटा स्टील) वगैरह जुड़ले। ई सब अपने आप में बड़े ब्रांड रहलन। रतन टाटा के पास अगर प्रमोटर के दूरदृष्टि ना रहल रहित आ उ अपना सीईओ पर भरोसा ना करते त फेर बड़हन सफलता के उम्मीद कइल ही व्यर्थ रहे। टाटा अपना सीईओज के आपन विजन बता देले। फिर काम होला सीईओ के कि उ ओ विजन के अमली जामा पहनावस आ ओकरो से भी आगे जाये के सोचे।

अगर रतन टाटा के सम्मान सारा देश करsता त एकरा पीछे उनकर बेदाग शख्सियत बा। इयाद करीं पिछला साल जनवरी में मुंबई में आयोजित एगो कार्यक्रम में रतन टाटा के इंफोसिस समूह के फाउंडर एम. नारायणमूर्ति चरण स्पर्श करके आशीवार्द लेत रहले। रतन टाटा आ नारायणमूर्ति के बीच 9 साल के अंतर बा। मूर्ति टाटा से 9 साल छोट बाड़न, लेकिन नारायणमूर्ति भी माने लन कि उपलब्धियन के स्तर पर रतन टाटा उनका से ढेर आगे बाड़े।

दरअसल रतन टाटा के संबंध भारत के ओ परिवार से बा, जवन आधुनिक भारत में औद्योगीकरण के नींव रखलस। ई मान लीं कि बिल गेट्स आ रतन टाटा जइसन कॉरपोरेट लीडर रोज-रोज ना होखे। ई कवनों भी सम्मान या पुरस्कार के मोहताज नइखन। ये लोग से पीढ़ी प्रेरित होला। इनका सामने कवनों भी पुरस्कार या सम्मान बौना बा। ई सच में भारत के सौभाग्य बा कि रतन टाटा हमार हउअन आ हमरा बीच में अभी भी सक्रिय बाड़े। उनकर हमनीं के बीच रहल ही बहुत सुकून देला।

( लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं. )


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Hum BhojpuriaFebruary 15, 20211min8250

  आर.के. सिन्हा

पाकिस्तानी फौज के तरफ से बलूचिस्तान में कइल जा रहल जुल्म-सितम के खिलाफ आवाज उठावे वाली प्रखर महिला एक्टिविस्ट करीमा बलोच के हाल ही में कनाडा में सुनियोजित निर्मम हत्या में पाकिस्तान के धूर्त अउर शातिर इंटेलिजेंस एजेंसी आईएसआई के नाम सामने आ रहा बा। बलोच पाकिस्तान सरकार, सेना अउर आईएसआई के आँख के किरकिरी बन चुकल रहली। ऊ पाकिस्तान सरकार के काली करतूतन के कहानी लगातार दुनिया के बतावत रहली। एही से उनका के आईएसआई ठिकाने लगा देहलस। बलोच के कत्ल साफ कर देले बा कि कनाडा एक अराजक मुल्क के रूप में आगे बढ़ रहल बा। उहाँ पर खालिस्तानी तत्व त पहिलहीं से जड़ जमा चुकल बा। अब उहाँ पर आईएसआई भी सक्रिय हो गइल बा। ओकरा तरफ से अब ओ लोगन पर वार होत रही जे पाकिस्तान में मानवाधिकार आ जनवादी अधिकार के हनन अउर बढ़ रहल कठमुल्लापन के खिलाफ बोले ला।

गौर करीं कि ई सब ओही कनाडा में हो रहल बा जेकर प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भारत सरकार के प्रवचन दे रहल बाड़े किसानन के आंदोलन के ले के। जस्टिन ट्रूडो कह रहल बाड़े कि भारत सरकार अपना आंदोलनकारी किसानन के मांग के माने। कहल जाला, जे शीशा के घर में रहेला ओकरा दोसरा के घर पर पत्थर ना फेंके के चाहीं। जस्टिन ट्रूडो के अपने देश में जंगल राज वाली स्थिति बन रहल बा, पर ऊ भारत के आंतरिक मामला में बेशर्मी से हस्तक्षेप करे से बाज नइखन आवत। ऊ अभी तक बलोच के कत्ल पर एक भी शब्द नइखन बोलले। काहे?  उनका ये सवाल के जवाब त विश्व के देवहीं के परी।

करीमा बलोच के भारत से बहुत उम्मीद रहे। ऊ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आपन भाई मानत रहली। दरअसल, साल 2016 के रक्षाबंधन पर करीमा बलोच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राखी भेजले रहली अउर आपन भाई बनवले रहली। ये राखी के साथ ही करीमा बलोच मोदीजी से बलूचिस्तान के आजादी के गुहार लगवले रहली। साल 2016 में करीमा बलोच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम एक संदेश भेजले रहली, जेमे ऊ कहले रहली कि रक्षाबंधन के दिन एगो बहिन रउआ के भाई मान के कुछ मांगे के चाहsतारी। बलूचिस्तान में केतने भाई शहीद हो गइले आ वापस ना अइले। बलूचिस्तान के लोग रउआ के मानेला। अइसे में रउआ दुनिया के सामने हमनीं के आंदोलन के आवाज बनीं। दरअसल करीमा बलोच 2016 से हीं कनाडा में शरण ले के रहत रहली। कनाडा के प्रधानमंत्री बतावस कि ऊ बलोच के पर्याप्त सुरक्षा काहे ना देहलन I  हालांकि, कुछ वक्त पहिलही ऊ एक वीडियो संदेश में अपना जान के खतरा होखे के बात कहले रहली? करीमा बलोच के गिनती दुनिया के 100 सबसे प्रेरणादायी महिला लोग में कइल जात रहे। करीमा बलोच के कत्ल से समझ आ जाता कि पाकिस्तान सरकार बलूचिस्तान में चल रहल अलगाववादी आंदोलन के ले के केतना परेशान बा।

बलूचिस्तान पाकिस्तान के सबसे पिछड़ल सूबा ह। विकास से कोसों दूर बा बलूचिस्तान। बलूचिस्तान पाकिस्तान से शुरू से ही अलग होखे के चाहsता। कायदे से ऊ बंटवारा के समय भारत के साथ ही रहे के चाहत रहेI स्वतंत्र राज्य रहे ही, पर पंडित नेहरु ओके उदारतापूर्वक पाकिस्तान के दान में दे देहलेI बलूचिस्तान पाकिस्तान के पश्चिम के राज्य ह जेकर राजधानी क्वेटा ह। बलूचिस्तान के पड़ोस में ईरान आ अफगानिस्तान बा। 1944 में ही बलूचिस्तान के आजादी देवे खातिर माहौल बनत रहे। लेकिन, 1947 में एके जबरन पाकिस्तान में शामिल कर लेहल गइल। तबे से बलूच लोग के संघर्ष चल रहल बा अउर ओतने ही ताकत से पाकिस्तानी सेना आ सरकार बलूच लोगन के कुचलत रहल बा। पाकिस्तानी सेना के ताकत ही ओके पाकिस्तान के हिस्सा बना के रखले बा। पर मजाल बा कि जस्टिन ट्रूडो कभी एक शब्द भी बलूचिस्तान के स्थिति पर भी बोलले होखस। पाकिस्तानी सेना स्वात घाटी अउर बलूचिस्तान में विद्रोह के दबावे खातिर आये दिन टैंक आ लड़ाकू विमानन तक के इस्तेमाल करे ला। जवन पाकिस्तान बात-बात पर कश्मीर के रोना रोवत रहेला, ऊ कभी भी बलूचिस्तान में कवनों विकास कार्य ना कइलस। बलूचिस्तान कमोबेश अंधकार के युग में जी रहल बा। का ई सब जस्टिन ट्रूडो के देखाई नइखे देत? बलूचिस्तान में चल रहल सघन पृथकतावादी आंदोलन पाकिस्तान सरकार के नाक में दम कर रखले बा, ई सब जानतारे पर ट्रूडो अपना अनभिज्ञता के स्वांग भर रहल बाड़े।

पाकिस्तान के चार सूबा बा: पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान अउर ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा। एकरा अलावा पाक अधिकृत कश्मीर अउर गिलगित-बल्टिस्तान भी पाकिस्तान द्वारा नाजायज ढंग से नियंत्रित बा, जेकरा के पाकिस्तान अवैध रूप से भारत से हड़प लेले बा। एक न एक दिन ई दूनू जिला भारत से मिलबे करी । पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान में महिला सबके साथ आये दिन खुलेआम बलात्कार करत आ रहल बा। मर्द सबके बड़ी बेरहमी आ बेदर्दी से मारेला। बलूचिस्तान के जनता तब से पाकिस्तान से अउर ही दूर हो गइल रहे जब कुछ साल पहिले बलूचिस्तान के एकछत्र नेता नवाब अकबर खान बुगती के हत्या कर देहल गइल रहे। उनके हत्या में पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ के हाथ बतावल जाला।

बहरहाल, बलूचिस्तान के अवाम के कहना बा कि जइसे 1971 में पाकिस्तान से कट के बांग्लादेश बन गइल रहे ओही तरह एक दिन बलूचिस्तान अलग देश त बनिये जाई। बलूचिस्तान के लोग कवनो भी कीमत पर पाकिस्तान से अलग हो जाए के चाहsता। करीमा बलोच के हत्या के लेके कनाडा के प्रधानमंत्री भलही ना बोलस पर भारत के बलूचिस्तान के जनता के हक में आपन आवाज बुलंद करहीं के होई। बलोच के शहादत कवनों भी सूरत में खाली ना जाये के चाहीं। ये बीचे, भारतीय नागरिकन के, खासतौर पर पंजाब प्रांत से संबंध रखे वालन के, कनाडा के ले के आपन सोच बदले के चाहीं। रउआ कभी मौका मिले त सोमवार से शुक्रवार तक के बीच राजधानी के चाणक्यपुरी इलाकन के चक्कर लगा लीं। एने सुबह से ही रउआ बड़ी तादाद में महिला, पुरुष आ बच्चा तइयार घूमत मिलिहें। इनका के देख के लागे ला, मानी ई सब लोग सुबह ही कवनों विवाह समारोह में भाग लेवे खातिर जा रहल बाड़े। ई लोग अधिकतर कनाडा हाई कमीशन के आसपास घूमत रहेला। ई लोग अलग-अलग समूहन में खड़ा होके आपस में बतियावत भी रहेले। अइसे त कुछ अउर दूतावासन आ उच्चायोगन के बाहर भी वीजा के चाहत रखे वाला लोग खड़ा होखेलें, पर कनाड़ा हाई कमीशन के त का काहे के। एने आवे वालन के चेहरा के भाव पढ़ला पर त लागेला मानी वीजा के जगह भीख मांग रहल बा लोग। का इनका ओ देश में जाये के पहिले सोंचे के ना चाहीं जहाँ पर भारत विरोधी गतिविधि लगातार बढ़ रहल बा आ जवन अराजकता के जाल में फँस रहल बा?

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं)


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Hum BhojpuriaJanuary 19, 20211min9570

  आर. के. सिन्हा

सरदार बूटा सिंह के निधन तब भइल जब अय़ोध्या में राम मंदिर के निर्माण कार्य के श्रीगणेश हो चुकल रहे। ये तरह से, पूर्व गृहमंत्री बूटा सिंह जी के आत्मा के शांति मिलल होईI ये तथ्य से कम लोग ही वाकिफ बा कि बूटा सिंह भगवान राम के अनन्य भक्त रहलन आ सुप्रीम कोर्ट में मंदिर-मस्जिद मसला पर जवन केस चलल रहे ओमे ऊ हिन्दू पक्ष के एगो महत्वपूर्ण सलाह भी देहले रहलन। कहे वाला त इहो कहेला कि अगर रामलला के ये केस में पक्षकार ना बनावल गइल रहित त फैसला अलग हो सकत रहे। ई जानल दिलचस्प बा कि रामलला के पक्षकार बनावे के पीछे तत्कालीन राजीव गांधी सरकार में गृह मंत्री बूटा सिंह के महत्वपूर्ण भूमिका रहे। जब राम मंदिर आंदोलन जोर पकड़े लागल अउर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ताला खुलवा देहले त बूटा सिंह शीला दीक्षित के जरिए विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल के संदेश भेजववले कि हिन्दू पक्ष के तरफ से दाखिल कवनों मुकदमा में जमीन के मालिकाना हक नइखे माँगल गइल अउर एसे उनकर मुकदमा हारल तय बा।

अजीब बिडबंना बा कि अयोध्या विवाद के हिन्दू-मुस्लिम मसला के रूप में ही देखल जात रहल बा। लेकिन ये सब प्रकरण से सिख नेता भी करीबी से जुड़ल रहलन। बूटा सिंह के भूमिका एही बात के पुष्टि कर रहल बा। ये पहलू के अभी तक अनदेखी ही भइल बा या ई कहीं कि ई पक्ष सही रूप से जनता के सामने नइखे आइल। देखल जाय त बूटा सिंह ओही परंपरा के आगे बढ़ावत रहले जेकर नींव गुरु नानकदेव भी सन 1510-11 के बीच में डलले रहलन। बाबा नानक अयोध्या जाके राम जन्म मंदिर के दर्शन कइले रहलन। प्रभाकर मिश्र अपना पुस्तक “एक रुका हुआ फैसला” में लिखले बाड़न कि बाबा नानक अय़ोध्या में बाबर के आक्रमण (सन 1526) से पहिले आइल रहले। बाद में नउआँ, गुरु तेग बहादुर जी अउर दसवाँ गुरु, गुरु गोबिन्द सिंह जी भी श्रीराम जन्मभूमि के दर्शन कइले रहलन।

161 साल पहिले विवादित ढाँचा के अंदर सबसे पहिले घुसे वाला व्यक्ति एक निहंग सिख रहे। सुप्रीम कोर्ट के फैसला में 28 नवंबर 1858 के दर्ज एक शिकायत के हवाला दिहल गइल बा जेमे कहल गइल बा कि ‘इस दिन एक निहंग सिख फकीर सिंह खालसा ने विवादित ढांचे के अंदर घुसकर पूजा का आयोजन किया। 20 नवंबर 1858 को स्थानीय निवासी मोहम्मद सलीम ने एक एफआईआर दर्ज करवाई जिसमें कहा गया कि निहंग सिख, बाबरी ढांचे में घुस गया है और राम नाम के साथ हवन करा रहा है।’ यानी राम मंदिर खातिर पहिलका एफआईआर हिन्दु लोग के खिलाफ ना, सिख लोग के खिलाफ ही दर्ज भइल रहे। अब जरा सोचीं कि ई निहंग सिख पंजाब से केतना लंबा सफर तय करके अयोध्या तक पहुँचल होइहें।

पर अफसोस ई देखीं कि आज कल बहुत से शातिर तत्व हिन्दू अउर सिख में वैमनस्य पैदा करे के हर मुमकिन कोशिश कर रहल बाड़े। भगवान राम के महिमा सिख परंपरा में भी बखूबी विवेचित बा। सिख के प्रधान ग्रंथ “गुरुग्रंथ साहब” में साढ़े पाँच हजार बार भगवान राम के नाम के जिक्र मिलल बा। सिख परंपरा में भगवान राम से जुड़ल विरासत रामनगरी में ही स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड में पूरा शिद्दत से प्रवाहमान बा। गुरुद्वारा में हरेक वर्ष राम जन्मोत्सव मनावल जाला। पूर्वाह्न अरदास-कीर्तन के साथ भगवान राम पर केंद्रित गोष्ठी आ मध्याह्न भंडारा आयोजित होला। एही तरह से सब सिख गुरु भी समस्त हिन्दू लोग खातिर भी आराध्य बाड़न। निश्चित रूप से भगवान राम, अयोध्या में बन रहल राम मंदिर अउर सिख के गहरा संबंध पर शोध अउर चर्चा होखे के चाहीं। जाहिर बा, जब ये बिन्दू पर अध्ययन होई त बूटा सिंह के उल्लेख भी बड़ा आदर पूर्वक होई। उनका के सिर्फ एक राजनीतिक हस्ती या केन्द्रीय मंत्री बता देहल भर से बात ना बनी। उनका मृत्यु पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शोक जतवले रहनीं। ई ये बात के प्रमाण बा कि बूटा सिंह के कवनों दल के नेता कहल सही ना होई।

बूटा सिंह अनुभवी प्रशासक त रहले हीं, ऊ गरीबन के साथ-साथ दलित के कल्यान खातिर भी एक प्रभावी आवाज रहले। बूटा सिंह के देहांत से देश एक सच्चा जनसेवक आ निष्ठावान नेता खो दिहलस। ऊ आपन पूरा जीवन देश के सेवा आ जनता के भलाई खातिर समर्पित कर दिहले, जवना खातिर उनका के हमेशा इयाद रखल जाई। ऊ अंतरंग बातचीत में बतावत रहले कि वाल्मिकी समाज में जन्म लेवे के कारण उनका बचपन में केतना घोर कष्ट सहे के पड़ल। उनहीं से स्कूल के टीचर सुबह क्लास साफ़ करे के कहस, काहे कि ऊ वाल्मिकी समाज से रहलन। उ ओ दौर के इयाद करत उदास हो जात रहलन। बूटा सिंह लगातार सफाई कर्मियन के हक़ में बोलत रहलन। ऊ साफ़ कहस कि दलितन में भी सबसे खराब स्थिति वाल्मिकी समाज के बा। उनका सीवर साफ करत सफाई कर्मी के मौत बहुत विचलित कर देत रहे। ऊ ये लिहाज से भी सही रहलन। कवनों सफाई कर्मी के मौत पर ले-देके उनकर घऱ वाला लोग ही आँसू बहा लेला। इनका मरला के खबर एक दिन अइला के बाद अगला दिन से ही कहीं दफन होखे लागेला। ये बदनसीबन के मरला पर ना केहू अफसोस जतावेला, न ही ट्वीट करेला। कवनों तथाकथित प्रगतिवादी मोमबत्ती परेड भी ना निकालेलाI चूंकि मामला कवनों बेसहारा गरीब के मौत से जुड़ल बा, त ओके रफा-दफा कइल भी आसान होला। ये गरीबन के ना त कवनों सही नाम पता ठेकेदार के पास रहेला ना ऊ घटना के बाद कुछ बतावे के कष्ट ही करेलाI  बूटा सिंह जब देश के केन्द्रीय गृह मंत्री या शहरी विकास मंत्री रहले, ऊ तबो अपना वाल्मिकी समाज से जुड़ल मसलन के प्रति बेहद सजग अउर संवेदशील रहलन। एसे समझल जा सकेला कि देश के असरदार अउर शक्तिशाली पद पवला के बाद भी ऊ अपना लोगन के अपना से दूर ना कइलन। बूटा सिंह के प्रति सही श्रद्धांजलि इहे होई कि देश के दलित अउर वाल्मीकि समाज के शैक्षणिक आ सामाजिक स्थिति में सुधार कइल जाय।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं )



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