डॉ. राजेंद्र प्रसाद दिहनी भोजपुरी फिल्म बनावे के आइडिया

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Posted: December 17, 2020
Category: सिनेमा
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लेखक – मनोज भावुक

16 फरवरी 1961, भोजपुरी सिनेमा खातिर एगो ऐतिहासिक तिथि बा। आजे पटना के ऐतिहासिक शहीद स्मारक पर भोजपुरी के पहिला फिलिम ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के मुहूर्त समारोह संपन्न भइल आ अगिला दिने शूटिंग शुरू हो गइल। वरिष्ठ पत्रकार अउर भोजपुरी चलचित्र संघ के अध्यक्ष आलोक रंजन के अनुसार ई ऊ शुभ घड़ी ह, जब भोजपुरी फिलिम के अनिश्चित काल खातिर बंद पड़ल निर्माण के द्वार हमेशा खातिर खुल गइल, बाकिर एह स्थिति तक पहुंचे में केतना पापड़ बेले के पड़ल, ई कहानी बहुते रोचक आ संघर्षपूर्ण बा। हिन्दी फिलिम के क्षितिज पर एगो नया शक्ति के उदय केतना क्रांतिकारी कदम होई .... उहो ओह समय में जबकि केहू से भोजपुरी फिलिम बनावे के बारे में बतियावल बुरूबके बनल रहे। ओह घरी ई केहू के यकीने ना रहे कि उत्तर पूर्व भारत के एह लोकप्रिय भाषा भोजपुरियो में कवनो फिलिम बन सकत बा। काहे कि फिल्मकार लोगन के मन में इहे धारणा रहे कि भोजपुरी लोकगीत आ लोकधुन के लिहाज से त बेशक समृद्ध बा बाकिर सामाजिक संदर्भ में भोजपुरी में बतियावल आदमी के जाहिले-गंवार साबित करी। एही से हिन्दी फिलिम में भोजपुरी गीतन के उपयोग (डकइती) त फिल्मकार लोग व्यावसायिक लाभ खातिर करत रहे, बाकिर भोजपुरी के फिलिम बनावे के नाम पर नाक भौं सिकोड़े लागत रहे।...... बाकी होनी के के टाल सकत बा?

आज के ‘सांच’ ओह दिन के ‘सपना’ बन के जद्दनबाई नाम के एगो मशहूर अदाकारा के आंखि में नाचे लागल। ई उहे जद्दनबाई हई जे निर्देशक महबूब खान से जिद्द क के हिंदी फिलिम में भोजपुरी गीत डलववले रहली। ओह गीत के सफलता के बाद जद्दनबाई के मन में कम्पलीट भोजपुरी फिलिम के भूख अउरो बढ़ गइल रहे। उ अपना संपर्क में आइल हर भोजपुरी बोले आ समझे वाला फिल्मकारके ई समुझावस कि ‘हिन्दी फिलिम में खाली भोजपुरी गीत के प्रयोग हतना फायदा देता त भोजपुरिये में बनल फिलिम केतना फायदा दी।’

बनारसे के रहे वाला चरित्र अभिनेता कन्हैया लाल, जे खुदे तन-मन से विशुद्ध ‘बनारसी बाबू’ रहले, के ई बात खूब जंचल आ उहो भोजपुरी फिलिम निर्माण खातिर लोगन के उकसावे लगले। एही बीचे उनकर भेंट गाजीपुर के रहेवाला मशहूर चरित्र अभिनेता आ संवेदनशील लेखक नाजिर हुसैन से हो गइल, जे खुदे भोजपुरी में फिलिम बनावे खातिर बेचैन रहलें।

के रहलें नाज़िर नाज़िर हुसैन 

नाज़िर हुसैन के भोजपुरी सिनेमा के पितामह कहल जाला. उहे के प्रयास रहे कि भोजपुरी सिनेमा कल्पना से हकीकत बन पावल आ भोजपुरी के पहिला फिल्म बनल. नाज़िर साहेब हिंदी में बहुत सफल अभिनेता रहनी आ बिमल रॉय अउरी देव आनंद के फिल्मन के अनिवार्य अभिनेता रहनी. गाजीपुर के दिलदारनगर में 15 मई 1922 के जनमल नाज़िर साहेब के बारे में बहुत कम लोग जानेला कि उहाँ के पहिले रेलवे में फायरमैन फेर ब्रिटिश इंडियन आर्मी के तरफ से विश्वयुद्ध द्वितीय लड़े वाला सिपाही भी रहनी. जब ब्रिटेन जापान से युद्ध हार गइल त नाज़िर साहेब अउर 60 हज़ार सिपाहियन के साथे बंदी हो गइनी आ जापानी सेना के खूब अत्याचार सहनी. उहें ऊ दुःख दर्द भुलाये खातिर लिखल आ अभिनय कइल शुरू कइनी. एक बार जब खुदीराम बोस जापान में बंदी सिपाहियन से मिले गइनी त उहाँ के लिखल नाटक ही मंचित भइल आ बोस बहुत प्रभावित भइनी. जब सुभाषचन्द्र बोस आजाद हिन्द फ़ौज के गठन करत रहनी त ऊ भी नाज़िर साहेब से मुलाकात कइनी. बोस सिंगापुर रेडियो पर नाज़िर हुसैन कार्यक्रम कई बेर सुनले रहनी. जब आजाद हिन्द फ़ौज के विघटन के बाद नाज़िर साहेब भारत अइनी त कलकत्ता में न्यू थिएटर में नाटक करे लगनी. एहिजा ही उहाँ के मुलाकात बिमल रॉय से भइल आ बिमल रॉय के ऊ असिस्टेंट बन गइनी. बिमल रॉय ‘पहला आदमी’ फिल्म बनावत रहनी, नाज़िर साब एह फिल्म में खाली अभिनय ही ना कइनी बल्कि एकर कहानी लेखक सह संवाद लेखक भी रहनी. ई फिल्म उहाँ के स्थापित कर देलस. नाज़िर हुसैन फिल्म ‘मुनीम जी’ में पहिला बार देवानंद के साथे दिखनी . एह फिल्म के ऊ पटकथा-संवाद भी लिखले रहनी. देवानंद आ नाज़िर साब के दोस्ती एही जा से शुरू भइल आ आजीवन चलल.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद दिहनी भोजपुरी फिल्म बनावे के आइडिया

भोजपुरी फिलिम बनावे के प्रेरणा उ नाज़िर हुसैन के देशरत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद के सानिध्य से मिलल रहे। जब उ अपना मन के बात राजेन्द्र बाबू के सामने रखले रहले त राजेन्द्र बाबू कहले रहले कि ‘बात त बहुत नीक बा बाकिर एकरा खातिर बहुते हिम्मत चाहीं, ओतना हिम्मत होखे त जरूर बनाईं।’

दरअसल भइल ई कि एक बार राजेन्द्र बाबू फिल्म समारोह में मुंबई गइनी ओहिजा उनका बगल में बइठल नाज़िर साहेब से परिचय भइल. जब राजेन्द्र बाबू जननीं कि नाज़िर हुसैन भोजपुरी     भाषी हईं त भोजपुरिये में कहनी कि रउआ जइसन कलाकार भोजपुरिया  बा तबो भोजपुरी में अभी ले कौनो फिल्म ना बनल ?

राजेन्द्र बाबू के ई बतिया नाज़िर साब के बेचैन क देलस जल्दी से भोजपुरी फिलिम बनावे खातिर। उ बड़ी लगन से एगो भोजपुरी फिलिम के कहानियो (स्क्रिप्ट) तइयार क लिहले, जवन उनका जुबान से सुनला पर कहानी ना बलुक भोजपुरी इलाका के साफ-सुथरा आ जीयत-जागत तस्वीर मालूम पड़े। कहानी सुनला पर (हिंदी फिलिम बनावे खातिर) कई गो निर्माता लोग स्क्रिप्ट झींटे खातिर लपकल। इहां तक कि ओह समय के महान फिल्मकार विमल राय भी नाजिरसाहेब से ओह स्क्रिप्ट पर फिलिम बनावे के प्रस्ताव पेश कइलें बाकिर नाजिर हुसैन एह स्क्रिप्ट पर भोजपुरी में फिलिम बनावे खातिर संकल्पित रहले आ उ अपना जिद्द पर अड़ल रहले कि ‘ई फिलिमिया चाहे जहिया बनो, बनी त भोजपुरिये में।’ पता ना कवना आत्मिक शक्ति का वजह से उनका ई भरोसा रहे कि कबो ना कबो, केहू ना केहू त अइसन मिलबे करी जे पक्का भोजपुरिया होई आ उनही के तरे बुलन्द हौसला वाला होई।

वक्त के रफ्तार के साथे निर्माता जोहे के कोशिश अनवरत आगे बढ़त रहल। ई एगो अइसन अन्हरिया सफर रहे जवना के भोर कब, कहां आ कइसे होई, केहू ना जानत रहे। चारो तरफ बस एगो दरदीला सन्नाटा पसरल रहे। अइसन अन्हरिया सफर में नाजिर साहेब के हमसफर बनलें बनारस के असीम कुमार, जे तब हिन्दी फिलिम के नामी-गिरामी अदाकार रहलें। नाजिर साहेब अपना भावी फिलिम में उनहीं के हीरो बनावे के फैसला क लेलें। ओह घरी उ अपना हर मुलाकात में असीम कुमार से कहस कि ‘अरे असीमवा कोई मिल जाय त कइसहूं ई फिलिमिया बना लिहती।’ खैर निर्माता त उनका बरिसन ले ना मिलले बाकी एगो अइसन आदमी से भेंट जरूर हो गइल जे जद्दनबाई से प्रेरित होके खुदे भोजपुरी फिलिम के सूत्रधार बने के कल्पना लोक में डूबल रहे। ई रहलें, मुंगेर, बिहार के रहनिहार बच्चा पटेल। पटेल मूलतः फिलिम के निर्माण-प्रबंधन, नियंत्रण आ वितरण के काम से संबंधित रहलें। हालांकि उनका लगे पूरा फिलिम बनावे लायक पूंजी ना रहे बाकिर उ रहलें एगो जोगाड़ी आदमी आ जोगाड़ जुटाइये के दम लेले। उनका विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी नाम के एगो फरिस्ता भेंटा गइल, जेकरा के ऊ बम्बई से लगभग दू हजार किलोमीटर दूर गिरिडीह, बिहार में कोइला के खान से खींच ले अइले। बंधु छपरा, शाहाबाद (बिहार) निवासी विश्वनाथ शाहाबादी के फिलिम निर्माण के कवनो अनुभव ना रहे, बाकिर उ दिलीप कुमार आ वैजयन्ती माला के तत्कालिन प्रदर्शित फिलिम ‘गंगा-जमुना’ में अवधिया संवाद के प्रयोग का कारण ओकरा सफल आ लोकप्रिय भइला से काफी प्रभावित रहलें आ खुदे भोजपुरी फिलिमोद्योग खातिर एगो नया राह गढ़े के सोचत रहले, तले उनका सोच के दिशा देवे खातिर उनकर संघतिया बच्चा पटेल उनका के बम्बई खींच ले गइलें। ई भगवानो के लीला अजीब ह..... केंगऽ-केंगऽ कवना चीज के सेटिंग करेलें, उहे बुझस। देखीं केने-केने छिटाइल, भोजपुरी फिलिम बनावे खातिर छपिटाइल सब भोजपुरी प्रेमियन के जुटान होइए नू गइल। शाहाबादी जी फिलिम में धन लगावे खातिर तइयार हो गइले आ आगे के कार्यवाही खातिर नाजिर हुसैन के हरी झंडी देखा दिहले। फेर का? स्क्रिप्ट तइयारे रहे। जनवरी 1961 के समय रहे। फिलिम के नांव रखाइल -‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’। निर्देशन खातिर बनारस के कुंदन कुमार चुनइले। गीत आ संगीत लेखन के दायित्व क्रमशः शैलेन्द्र आ चित्रगुप्त के संउपल गइल। मुख्य कलाकार के रूप में असीम कुमार, कुमकुम, नाजिर हुसैन, बच्चालाल पटेल, भगवान सिन्हा, पद्मा खन्ना, रामायण तिवारी आदि के टीम बनल। 16 फरवरी 1961 के पटना में मुहूर्त समारोह के बाद शूटिंग शुरू हो गइल।

लगभग एक साल बाद 1962 में ई फिलिम सबसे पहिले बनारस के प्रकाश टाकीज में लागल। लोग कहेला कि गांव के गांव ओनह के बनारस आवे लागल। शहरो के लोग खाइल-पियल भुला गइल। जहां पहिले वितरक लोग एह फिलिम के कीने में नाकुर-नुकुर करत रहलें, अब दांते अंगुरी काटे लगलन। जहां-तहां लोग बतियावे- गंगा नहा, विश्वनाथ जी के दर्शन करऽ आ ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ देख के तब घरे जा।

एह फिलिम के मोल रहे दर्शक से एकर आत्मीयता। दहेज, बेमेल बियाह, नशाबाजी, सामंती संस्कार, अंधविश्वास से निकलल समस्या भोजपुरिया लोग के अपना जिनिगी के समस्या लागल। गीतकार शैलेन्द्र आ संगीतकार चित्रगुप्त गीतन के अतना मोहक बनवलन कि गीत गली-गली बाजे लगलन स ....‘काहे बांसुरिया बजवले’ ........ ‘सोनवा के पिंजरा में बन्द भइल हाय राम’ ..... ‘मोरी कुसुमी रे चुनरिया इतर गमके’....‘अब हम कइसे चली डगरिया’....... ‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो, सइयां से कर द मिलनवा’...... पूर्वोत्तर भारत के गांव- गंाव में गूंजे लागल। पांच लाख के पूंजी से बनल ‘गंगा मइया .....’ लगभग पचहत्तर लाख रुपिया के व्यवसाय कइलस। ई देख के त कुछ व्यवसायी लोग भोजपुरी फिलिम के सोना के अंडा देबे वाली मुरगी कहे लगलन। नतीजा ई भइल कि दनादन सइ गो भोजपुरी फिलिम के निर्माण के घोषणा हो गइल। बाकिर ओह में अधिकांश निर्माता के नजर खाली सोनवा के अंडा पर रहे, मुर्गी पर ना। उ अंडा का लोभ में मुर्गियो के हलाल करे लगलन। ......भोजपुरिया संस्कृति आ संस्कारे के हत्या होखे लागल जवना के बहुते बुरा परिणाम सामने आइल। ..... खैर, पहिला फिलिम बनल आ एतना सफल भइल कि सिनेमा के आकाश में भोजपुरी के सूरज चमके लगलें। अब एह सूरज के कब-कब, कहां-कहां आ कइसे-कइसे गरहन लागल, ई त टीसे आ टभके वाली कहानी होई. अच्छा बात बा कि एह इंडस्ट्री से लाखो लोग के चूल्हा जलsता. दुनिया में भोजपुरी भाषा के प्रचार-प्रसार भी होता. स्वाभिमान के भाषा भोजपुरी अपमानित मत होखे बस अतने खेयाल राखे के बा. जे एकर रोटी खाता उ एकरा के डंसो मत ना त राजेन्द्र बाबू समेत ओह सब लोग के आत्मा कलपी जे भोजपुरी के सँवारे में अपना के होम कइले बा.

 

 

 

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