राउर पाती

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Posted: May 3, 2021
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समै के शब्द-चित्र खींच रहल बा कोरोना विशेषांक

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।

लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥

कर्म के महत्ता बतावत एह श्लोक के अंतर्निहित महीनी जदी बूझल जाव त मालूम होखी जे जनक जइसन निर्लिप्त, निर्विकार कर्मयोगी अगर परम सिद्ध भइले आ कहइले, त अपना कर्म में निरत भइला में बिचार के लगातार होत उच्चता के कारन। लोक भा जन-मानस के उदारता से जोरला के भाव लोक-संग्रह कहाला। लोक-संग्रह खलसा लोकवे के ना, बलुक लोक के कइल्को के जोगावल आ ओकरा सइँत के राखल सुगढ़ संग्रह के मान होला।

अपना कइल्का के दोहरियावल बाउरो हो सकेला, त ऊ कर्म-संकलन के एगो अन्यतम उदाहरन के तौर प होखो त आवे वाला समय में आजु के कइल्का के थाती ले हो सकेला। लोक-संग्रह हऽ, लोगन के जोरल, लोगन के कइल्का के सँजोवल, लोगन के कइल्का के मानल आ ओकरा अपेक्षा के अनुरूप भाव दीहल। ई प्रक्रम खलसा आत्मप्रशंसा के उतजोग ना, बाकिर सगरे फइलल-पटाइल कूल्हि कइल्का के निकहा क्रम बनावत ओकरा इतिहास के कोरा में रखला के काम हऽ।

पर साल के महा भारी छुआछूत फइलल। तन से दूरी बनाइ के रखला के भरपूर प्रोत्साहन दियाइल। अपना समाजे ले ना बलुक परिवार-कुटुम्ब के लोगन से मिलल-जुलल, आइल-गइल, मेल-मुलाकात कइल, भेंट कइल सभ प पाबंदी लागि गइल। लोगन के आपसी बर्ताव-बेवहार में भारी बदलाव हो गइल। कारन रहे, चीन से उठल, भा उठावल, नोबल-कोरोना-19 नाँव के वाइरस जवन गाँवहीं सूबा भर में ना पटाइल, देस-बिदेस में पटात अबादी के अबादी चाटत गइल। अपना देस में लॉकडाउन के लमहर काल चलल। सउँसे संसार में लोग छोड़ीं, परिवार के परिवार, मोहल्ला के मोहल्ला लोगन के प्रान निकलल, जान गइल। देसन के आर्थिक दसा बिगड़ गइल। देसन के नतीजा निकल गइल।

लोक आ समाज से साहित्य के बड़ा गहीर रिश्ता होला। साहित्य लोक के सत्ता के माने बुझवावेले। साहित्य समाज में घटल आ घटल रहल दसा के लेके चर्चा करवावेले। भोजपुरिया समाज के लोग देसे ना बिदेसन में आपन मौजूदगी से उन्नती के गाथा लिखे में माहिर रहल बाड़े। कोरोनाकाल के दसा-दुर्दसा के सोझ प्रभाव एह लोगन प परल बा। पर साल के भोजपुरी जंक्शन के अंकन में कोरोना के लेके लगातार कुछ ना कुछ छपत रहल। कोरोना के रौद्र रूप घटत-बढ़त रहल, आ सङहीं अंक में संपादकीय, आलेख, कहानी, कविता, छंद, गजल के विधा में लोक-भावना शब्द-रूप में जगहि पावत रहल। ओही सभ रचनन के गद्य आ पद्य प्रारूप के संकलन भा संग्रह सोझा आइल बा भोजपुरी जंक्शन का ओर से। 1 से 15 फरौरी’21 के अंक गद्य रचनन के संग्रह बा, त 1 से 15 मार्च’21 के अंक में पद्य रचनन के संग्रह हऽ। कहे के ना, ई दूनो अंक संग्रहनीय बन गइल बाड़न स।

गद्य रचनन के संग्रह के अंक के संपादकीय में भाई मनोज भावुक ओह काल के इयादे नइखन पारत, बलुक ओह समै के शब्द-चित्र खींच रहल बाड़न - पिछला साल मार्चे में कोरोना के चलते लॉकडाउन के सिलसिला शुरू भइल। आदमी जे सोशल रहे, सोशल डिस्टेंसिंग बनावे लागल। लोग कंगारू लेखा लइका-बच्चा के करेजा से सटले

मुम्बई-दिल्ली से पैदल गाँवे भागे लागल। मुँह प जाबी (मास्क) लगा के जरूरतमंद के पूड़ी-तरकारी बँटाये लागल। जे जहाँ फँसल ओहिजे भगवान के गोहरावे लागल। गाय अलगे हँकरऽतिया, बछरू अलगे। रोजी-रोजगार गइल। चैन-सुख गइल। सगरो दहशत पसरे लागल। एही अंक में जहँवाँ ’सुनी सभे’ के कालम के पहिला भाग में श्री रवींद्र

किशोर सिन्हा के कलम सार्क देसन के समूह का ओर से भारत के मुँह जोहला के कारन बता रहल बाड़न, त ’सेहत’ कॉलम के तहत डाँ० राजीव कुमार सिंह ’कइसे जान बाँची कोरोना से’ सभ का सोझा ले आइल बाड़न। एही अंक के ’सुनी सभे’ कॉलम के दोसरा भाग में रवींद्र किशोर सिन्हा में कोरोना के लेइ के चीन के धुर्तई उजागर कऽ

रहल बाड़न। त एही कॉलम के तीसर भाग में उहाँ का तब्लीगी जमात के घोर लापरवाही प आपन चर्चा रखले बानीं। तब्लीगी जमात के भर संसार से बिटुराइल सदस्यन के खतरनाक लापरवाही कतना कस के कोरोना-रोगी के आँकड़ा बढ़ा दिहलस, एह बिन्दुअन प खुल के चर्चा कइल जरूरी बा। रवींद्र किशोर जी के ’सुनी सभे’ कॉलम से आगा

दूगो अउरी आलेख संकलित भइल बाड़न स। ई पाँचो आलेख कोरोना आ एकरा भइला आ फइलला के कारन प बिना ढेर लाज-लिहाज कइले चर्चा क रहल बा। आगा संपादकीय के कड़ियन में कोरोना के कारन आ निवारन गहिराह चर्चा भइल बा। एह कड़ियन का बाद से आलेख सभ के प्रकाशन भइल बा।

 

’अपना आलेख में डॉ० ब्रजभूषण मिश्र जी कोरोना के वैश्विक महामारी बतावत भारतीय सनातन परंपरा सभ के अर्थ बतौले बाड़न - जहाँ तक भारतीय आचार-बेवहार के बात बा, रोजनामचा में शारीरिक शुचिता बनवले रखला के प्रावधान रहल बा। कहीं से अइला-गइला प हाथ-गोड़-मुँह धोवल, जूता-चप्पल बहरी छोड़ल, हाथ ना मिलाके कर जोर परनामा-पाती, जूठ ना खाइल आ ना केहू के खिआवल, अनजान जगह पर सूते बइठे में आपन आसनी, गमछा के उपयोग कइल, माँसाहार से परहेज आदि छुत-छात से बचावत रहल हऽ। एह आलेख में ब्रजभूषण मिश्रजी कोरोना के रोशनी में सनातन परंपरा के वैज्ञानिकता का ओर इशारा कइले बाड़े

कहे के माने ई, जे अंक के आलेखन के माध्यम से कोरोना-काल में आदमी के एगो जाती के तौर प ओकर जिजीविषा के रूप समुझल जा सकेला। आदमी आपदा में जवना ढंग से अपना जीये के अवसर निकाल लेला, ओकर दस्तावेज बा ई गद्य रचनन के अद्भुत संग्रह। एही कड़ी में ’वर्क फ्रॉम होम’ प एगो हमरो आलेख सम्मिलित भइल बा। ई आपदा में अवसर खोजला के भाव त कहिये रहल बा। तवना प ’माई’ के माध्यम से मनोज भावुक परंपरा के निबाहत औरतन के निकहा दर्द समुझे के गेट-वे प्रस्तुत कइले बाड़न - गँउवाँ में त लइकी ससुरा जाते लॉकडाउन में आअ जाली स ! भारतीय समाज में ठोपे-ठोपे चुआवल आ बसावल मूल्यहीनता के बूझे के नमूना बा ’माई’।

एही लगले कोरोना-काल में भोजपुरी जंक्शन के अंक सभ में कविता हर तरह के विधा में छपल। हालाँकि, गीतन प रचनाकार लोगन के अधिके जोर बनल बा। भोजपुरिये ना भारत के हर समाज के श्रमजीवी समाज के स्वर गीत रहल बाड़न स। एह अंक के संपादकीय में मनोज भावुक जी खुल के सँकारत सोझा आ रहल बाड़न - कोरोना कवितावली खातिर हम कविता के शिल्प के लेके बहुत लचीला रुख अख्तियार कइनीं। हालाँकि, भोजपुरी भासा के रचनाकारन में गीत-कविता के लेके उत्साह तनिका अधिके रहेला। बाकिर आउर भारतीय भासा के पद्य-रचना प जवना अस्तर से काम होला, शिल्प के मूलभूत विधान के आलोक में जवना ढंग से रचनाकर्म होला, ओह हिसाब से भोजपुरी के रचनाकारन लोग के ढेर सीखे के होई। तबहूँ एह अंक के सम्मिलित भइल रचनन में कोरोना के जियल-भोगल, जानल-जुटाअवल हर पहलू के जगहि मिलल बा। एह अंक में कविता के आत्मा के आजु के समै से जोरे के प्रयास भइल बा। कुल मिला के कविकर्म में रत अड़लालिस लोगन के रचना के अस्थान मिलल बा।

ई दूनो बिसेस अंक आवे वाला समै, जब कोरोना सचकी ना रहि जाई, में बेर-बेर पढ़ल जाई। लोग अपना घर-आङन के लइकन से काथा कहिहें - ’एगो कोरोना रहे... ’

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सौरभ पाण्डेय


' भोजपुरी जंक्शन ' के हर अंक विशेष अंक बा

देखल जाय त भोजपुरी जंक्शन ( पहिले के ' हम भोजपुरिआ ' )  के हर एक अंक , अपने आप में विशेष अंक बा आ संग्रहणीय बा । काहे से कि ई कवनो ना कवनो विषय पर केन्द्रित बा ।

' हम भोजपुरिआ '  से ले के  ' भोजपुरी जंक्शन '  के 11वाँ अंक तक में छपल एह  अड़तालिस कवियन के कवितन के एक साथ 13वाँ अंक में एक साथ संकलित करके रउरा बड़हन काम कइले बानी । एह में कुछ सिद्धहस्त कवियन के सङे - सङे

कुछ नयो लोग के रचना छपले बानी ।

ई अच्छा कदम बा । एह से ई त जरूर पता चलत बा कि पुरनकी पीढ़ी के सोच में आ नयकी पीढ़ी के सोच समझ में का साम्य आ वैषम्य बा ।

कविता खाली मनोरंजन के चीज ना ह , ई औजार ह , जे आदमी के विचार बदल देवेला , ओकरा के संबल देवेला , दुख आ सुख बाँटेला । राउर संपादकीय जे कवितात्मके बा , एह बात के नीके रेखांकित करत बा - " कविता से कोरोना भागी ना , ई सभका पता बा बाकिर कविता से आदमी जागी , जागेला एकर इतिहास साक्षी बा । देश आ दुनिया पर जब - जब संकट आइल बा , कविता आदमी के जगवले बा । दर असल कविता आदमी के आदमी बनावेला । आदमी के अंदर के सूतल आदमी के जगावेला । सचेत करेला । " साँचहू कोरोना केन्द्रित सब कविता ओकरा कारण , निवारण आ भविष्य में ओकर पड़ेवाला प्रभाव के रेखांकित करत बा । कोरोना के इतिहास ,भूगोल के सङे - सङे , व्याप्त भय , भय के निवारण आ भयातुर के भय भगावत हास्य - व्यंग्य परोसत कविता सोझा आइल बाड़ी स । एह खातिर राउर संपादकीय सोच साधुवाद के पात्र बा । राउर संपादकीय के शीर्षक - ' एगो कोरोना रहे ' । बड़ा लाजवाब बा । लोककथा अइसहीं नू कहाले । कोरोना कथा कहाई आ कहे खातिर भोजपुरी जंक्शन पत्रिका के सहारा लिआई ।

हम एह चिट्ठी के सहारे ओह सब लोग के जे भोजपुरी पढ़े पढ़ावे आ शोध करे करावै से जुड़ल लागल बा , ई सलाह देवे के चाहत बानी कि पत्रिका

के अंकन के अपना पास जोगावे , भविष्य में ओकरा कामे आई ।

एगो धरोहर अंक खातिर रउरा

के साधुवाद ।

- ब्रजभूषण


 

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भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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