राउर पाती

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Posted: May 25, 2021
Category: राउर पाती
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धर्मयुग, साप्तिहिक-हिंदुस्तान, कादंबिनी पत्रिका के समतुल्य  है 'भोजपुरी जंक्शन'    

आपके कुशल एवम सफल संपादन में 'भोजपुरी जंक्शन' ई पत्रिका के संपूर्ण पृष्ठों को उलटने पलटने का सुअवसर प्राप्त हुआ। धर्मयुग, साप्तिहिक-हिंदुस्तान, कादंबिनी पत्रिका के

समतुल्य आपकी विशिष्ट पत्रिका एक लंबे अंतराल के पश्चात मेरी नज़रों से गुज़र गयी, जिसकी प्रशंसा में दो शब्द लिखना अति आवश्यक है।

महोदय आज के युग में पत्रिका प्रकाशन लोहे के चने चबाने के समान है, इसकी साज सज्जा, अति आकर्षक हृदय स्पर्शी रचना चयन संपादक की विद्वता का परिचायक है। जिसके

लिए आप और आपका सुकर्मी  संपादन विभाग बधाई का पात्र है।

रंग बिरंगी होली की विभिन्न रचनाओं के मन भावन रंग बिखेरता, मिठासभरी गुंजिया सी

स्वादिष्ट व दही भल्ले सी नमकींन रचनाएं पढ़कर होली की मस्ती का आनन्द चौगुना हो गया।

आपने भोजपुरी रचनाओं के मध्य ब्रजभाषा की होली रचनाओं को जो महत्ता प्रदान की

है, उसके लिए मैं आपका, और सभी सहयोगियों का हृदय से आभारी हूँ। मेरा गीत "उड़ रह्यो

रंग गुलाल ब्रज की गलियन में" "भोजपुरी जंक्शन" के सभी पाठकों को पसंद आयेगा, ऐसा

मेरा विश्वास है।

अनुदिन पत्रिका प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे, इसी मंगलकामना के साथ "भोजपुरी जंक्शन" परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं।

दरियाब सिंह राजपूत 'ब्रजकन',  मोदीनगर


"भोजपुरी जंक्शन" में ब्रजभाषा को सम्मान देने के लिए साधुवाद

"भोजपुरी जंक्शन" का "होली विशेषांक" अपनी नवीनतम मनोहारी साज सज्जा के साथ प्रकाशित हुआ, इसके लिए "भोजपुरी जंक्शन" परिवार को हृदय से बधाई।

इस अंक में मेरा ब्रजभाषा गीत "फागुनी बयारि" प्रकाशित करने एवं ब्रजभाषा को सम्मान देने के लिए आपका सादर सहृदय साधुवाद, आदरणीय भावुक जी !

इस अंक में प्रकाशित अधिकांश रचनाएं भोजपुरी के लालित्य से परिपूर्ण है जो एक से बढ़ कर एक सुंदर, सरस एवं भावपूर्ण हैं। आपके भोजपुरी दोहे बहुत पसंद आये, इसके लिए आपको विशेष बधाई। यह होली विशेषांक बहुत सुंदर बन गया है। मां वाणी की कृपा से आगामी अंक भी इसी प्रकार सफलता पूर्वक प्रकाशित होते रहेंगे, ऐसी मंगल कामना करता हूं।

 नरेंद्र शर्मा "नरेंद्र", गीतकार, अलीगढ़ (उ.प्र.)


ठवर-ठवर फाग क गगरी ढरकि रहलि बा

ई होली विशेषांक देख के अस लागि रहल बा कि भोजपुरी माई अपना सतरंगी अंचरा से घन मोती लुटा रहलि बाड़ी। अस लागि रहल बा के धरती अपना पूते क जनेव ठानत ए होली के मन भर जीयत बाड़ी, ठवर-ठवर फाग क गगरी ढरकि रहलि बा। सब लिखनहार लो मन भर मन से लिखले बा एकर बहुत बधाई।

एह फाग विशेषांक के विशेषता एकरे विशेषज्ञता आ विविधता में बा। मनोज भावुक जी आ उहां क टीम क जोड़ले क कला अवर विनम्रता मेहनत फैन बना देवे वाली बा।

आकृति विज्ञा ‘अर्पण’, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश 


 

फगुआ अंक देख के बुझाता कि धरती आपन अँचरा में गुलाल लेइके छितरा देहले बाड़ी

एक तरफ़ जहाँ कोरोना के भयावहता बढ़ता, उहवें फ़ाग के रंग से सजल-धजल ई पत्रिका मन के मोह लेलख. बुझाता कि धरती आपन अँचरा में गुलाल लेइके छितरा देहले बाड़ी। एक से बढ़के एक होली के खुशबू में भींगल, नीमन से शब्दन के सजावल रचना। एह अंक के देख के मन हरखित बा। मनोज भावुक जी आ उहाँ के पूरा टीम बधाई के पात्र बा।

मधुबाला सिन्हा, मोतिहारी,चम्पारण, बिहार 


मील के पाथर साबित होई भोजपुरी जंक्शन

ऐतिहासिक काम भइल बा। आवे वाला समय में मील के पाथर साबित होई। अनघा बधाई मनोज भावुक जी।

सविता सौरभ, बनारस, उत्तर प्रदेश


बेजोड़ अंक आइल बा

बेजोड़ अंक आइल ई फगुआ से जुड़ल। रुचिर आ रमणीय रचनन से भरल इहो अंक संगिरहा जोग बा। बधाई मनोज जी। राउर मिहनत रंग ले आ रहल बा।

सुनील कुमार पाठक, पटना, बिहार


होली विशेषांक के सुघराई देखे जोग बा

होली विशेषांक के सुघराई के जतना बयान कइल जा कमे बा। संपादक मंडल आ डिज़ाइनर के ढेरकी खान बधाई। परिकल्पना के धरातल पर उतारल गइल। मन गदगद बा।

चंदेश्वर शर्मा परवाना, देवरिया, उत्तर प्रदेश


होली विशेषांक में सचमुच होली कs जान-परान बा

भोजपुरी के चर्चित पत्रिका ' भोजपुरी जंक्शन ' के होली अंक देखते मन भाव विभोर हो गइल। पत्रिका के साज-सज्जा आ कलेवर काबिले तारीफ बा। अंक में संकलित एक से बढ़ के एक रचना आ लेख होली पर बा जवना में सुघर तथ्य आ पठनीयता लउकत बा, जे पत्रिका में जान डाले में कवनो कोर-कसर बाकी नइखे छोड़ले। राउर संपादकीय जानदार बा, हम रउरा से पूरे-पूरे सहमत बानी कि " भोजपुरी जंक्शन में पूरा के पूरा फाग राग बा आ एह अंक पर कोरोना-सोरोना के कवनो असर नइखे, ई कम्प्लीट फागुन विशेषांक बा।"

एह अंक में सभई के लेख आ रचना प्रासंगिक आ प्रेरणादायक बा। "फागुन के बदलत रुप" लेख में एक ओर तारकेश्वर राय 'तारक' के चिन्ता कइल उचित लग रहल बा तs दूसरे ओर बादशाह प्रेमी, मनमोहन मिश्र, मिथिलेश गहमरी, प्राचार्य सुभाष यादव, संगीत सुभाष, सौदागर सिंह, जे पी द्विवेदी, निशा राय, नथूनी प्रसाद कुशवाहा, प्रतिभा गुप्ता, प्रेम नाथ मिश्र, संजय मिश्र " संजय", निर्भय नीर आ शम्भू कुशवाहा जइसन मानिन्द साहित्यकार लोगन के फगुआ के गीत भरोसा दे रहल बा कि फगुआ के रुप कतनो बदले जब ले गंगा-जमुना में पानी रही तब तलक फगुआ मनत रही। काहे कि फगुआ के साहित्य में एतना जान बा कि फिल्मी जगत भी एकरा बिना अधूरा बा जेकर जीवन्त गवाही भावुक जी के दमदार लेख " हिन्दी सिनेमा में फगुआ" कर रहल बा। इहो डंका के चोट पर कहल जा सकेला कि जब तलक "भोजपुरी जंक्शन" जइसन पत्रिका मिलत रही तब तलक फगुआ मनत रही। "भोजपुरी जंक्शन" पत्रिका अपने स्वरुप आ पहिचान में काफी उच्च स्तरीय पत्रिका दिख रहल बा। भाई मनोज भावुक राउर भगीरथ प्रयास एक ना एक दिन इतिहास रची आ भोजपुरी खातिर मील के पत्थर साबित होई।

राम पुकार सिंह "पुकार" गाजीपुरी, पूर्व प्रधानाध्यापक, कोलकाता


 

मन फागुन फागुन हो गइल बा

फगुआ अंक तनी देर से आइल त का चइतो में रंग बरसा देलस। मन फागुन फागुन हो गइल बा।

फगुआ अंक बेजोड़ भावुक जी

फगुआ अंक बेजोड़।

चइत में फागुन ले आइल

रंगलस मन के कोर

अंक संग्रहणीय बनल बा

सामग्री    पुरजोर।

लेख  आलेख  कविता बा

रंग   से   भरपूर

तीत कोरोना ना छू पवलस

फगुआ के तासीर।

फलो फूलो भोजपुरी जंक्शन

बिखरत रहे सुवास

करत  रहीं  भोजपुरी  सेवा

हमरा  बा   विश्वास।

देश - विदेश  में झंडा गाड़ के

दिहनी भाषा के पहचान

भोजपुरी  के  मान  बढ़वनी

हमनी ला वरदान।

कनक किशोर जी, आरा, बिहार


भोजपुरी जंक्शन चंदन के माटी हऽ

साँच कहिले भोजपुरी के थाती हऽ

भोजपुरी जंक्शन चंदन के माटी हऽ

ताज़ा कणिका होली पर आधारित बा

पढ़ि के रचना ई मनवा आह्लादित बा

इक से बढ़ि के एक लेख कविता बाटे

जेतने पढ़ऽ ओतने मन तरसताटे

 

रंग विरंगा चित्र भाव मनभावन बा

नइखे तनिक फुहड़ता सबकुछ पावन बा

 

असहीं रउवा कवि, कविता से प्यार करीं

नेक कार्य के बदे नमन स्वीकार करीं

आकाश महेशपुरी, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश


धूम मचल बा जंक्शन पर

धूम मचल बा जंक्शन पर, भाउक जी के खेला हे

देखs देखs देखs देखs, लगल कबिन के मेला हे

पत्रिका पढ़ीके नींक लगल केतना कइसे तुह॔के बतलाईं

हिया के पोर ही पोर से भावुक जी तोह॔के बा बधाई बधाई

ओमप्रकाश पांडे आचार्य जी, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश


आवरण पृष्ठे रंग बरसा रहल बा

भोजपुरी जंक्शन के होली विशेषांक "फगुनहट हऽ कि कोरोनाहट" सुवहनिय प्रपत्र का रूप में मिलते मन फगुना गइल बा। काहे कि एकर आवरण पृष्ठे रंग बरसा रहल बा।

रउरा सम्पादकीय के कोरोना काल के खतियान कहाव त हमरा समझ से गलत ना कहाई। आवरण पृष्ठ से फगुआत सम्पादकीय में डूबत  अदमी जब आगा बढ़ता त; वास्तव में भारत के रत्न हईं टाटा, फगुआ के बदलत रूप, बसंत कऽ मनुहार अउर होली कऽ त्योहार, बसंत आ गइल, माने एकहु ना बतिया होली में रसिया, होली रस, आ हमार भउजी जस लेख,आलेख,संस्मरण, कहानी भरपूर साहित्यिक खोराक देता।

भोजपुरी के पचपन कवि लोगन के गीत, कविता पढ़ मन आनंदित त होइए रहल बा ब्रज भाषा के कवितो फगुआवे में कवनो कसर नइखे छोड़त।

हिन्दी सिनेमा में फगुआ नामक  राउर लेख बहुते उपयोगी बा। कुल मिलाके के कहल जाव त ई अंक हमनी ला एगो थाती का रूप में बा।

दिलीप पैनाली, सैखोवा, तिनसुकिया, असम 


भोजपुरी जंक्शनदेख के मन अगरा गइल, हरियरा गइल

स्वस्तिश्री सर्व उपमायोग्य सम्पादकजी के जय-जय।

एह बार के ‘भोजपुरी जंक्शन’ मिलल। मन अगरा गइल, हरियरा गइल। ई पत्रिका हर बार नियन एहू बार सामयिक अड़ान पs अड़ल रहलि। एह बार फागुन के खूब रंग चढ़ल रहल, शायद एहीसे ‘होली-विशेषांक’ बा। रसिक सम्पादक के होली में गोताइल आ भावुकता भरल कलम से आइल ‘फगुनहट कि कोरोनोहट’ शीर्षस्थ सम्पादकीय कोरोना के साथे लेले कोरोनाकालीन चुनावी चाल पs गभियो चला देलस। फगुआ के बदलल रूप, बसन्त के मनुहार अउर होली के त्यौहार हs, बसन्त आ गइल, माने एकहू ना बतिया होली में रसिया, होली-रस, हमार भउजी-जइसन आलेखन के साथे एक से एक कविता आ फिलिमो के होली रंग सहेजले एह अंक के पोरे पोर रसगर रहल। हँs, ‘वास्तव में भारत के रत्न हईं टाटा’ ई आलेखो एगो महनीय व्यक्तित्व के उजागर करेवाला विशिष्ट बोध के प्रतीक बा।

आवरण से लेके अन्तस् तक में मनोहर चित्रन के साथे विषय-प्रस्तुति कतहूँ से ओनइस ना लागल। भोजपुरी के विकास में सभ सवांग के साथे एह पत्रिको के योगदान गवाई। शुभमस्तु।

मार्कन्डेय शारदेय, पटना, बिहार 


अद्भुत संकलन बाटे

भोजपुरी जंक्शन के होली विशेषांक वास्तव में अद्भुत संकलन बा।

संपादक भावुक जी अपना सम्पादकीय में चुनाव के साथे कोरोना के साठगाँठ पर बहुत उत्तम व्यंग्य कइले बानीं जवना पर आम लोग के भी ध्यान आ बहुत व्यंग्य सुने आ पढ़े के मिल रहल बा। आर.के.सिन्हा साहब के आलेख में टाटा के भारतीय अर्थव्यवस्था में योगदान के बहुत सुंदर चर्चा भइल बा आ वास्तव में एकरा के केहू नजरअंदाज नइखे कर सकत।

तारक जी 'फगुआ के बदलल रूप' आलेख के माध्यम से फगुआ के पहिले के स्वरूप आ फगुआ  के सार्थकता के बहुत सुंदर चित्रन कइले बानी। एही तरे रामपुकार सिंह जी, मार्कण्डेय शारदेय जी,सम्पादक भावुक जी, डॉक्टर एस. के. पाठक जी आ डॉ. शंकर मुनि राय सरीखे रचनाकार सबके आलेख ये विशेषांक में चार चाँद लगा दिहले बा। सही में सब आलेख एक से बढ़कर एक बा।

काव्य खंड में भी होली के रंगीन मिजाजी साफ-साफ छलकत-छलकत बा। एक से बढ़के एक गीतकार अउर कवि सबके गीत आ कविता पढ़के मन होलीनुमा हो गइल बा। ये अंक में हिंदी सिनेमा में फगुआ के महक देखे के मिल रहल बा। फिल्मी दुनिया में होली के रंग केतना चटकदार आ असरदार बा ये विशेषांक में साफ-साफ लउकता।

अखिलेश्वर मिश्र, बेतिया, प. चम्पारण, बिहार

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भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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