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Hum BhojpuriaJune 7, 20212min5490

भोजपुरी जंक्शन पत्रिका साहित्य नभ के ऊंचाई के छू रहल बा

सम्पादक महोदय,

भोजपुरी जंक्शन के देखलीं आ पढ़लीं बहुते प्रसन्नता भ‌इल। स्तरीय रचनन के एगो अनुपम जंक्शन के रूप में ई अंक बाटे। रचनन आ सम्पादन के दृष्टि से ई पत्रिका साहित्य नभ के ऊंचाई के छू रहल बा। कवर फोटो अपने आप में अद्वितीय बा जवन पत्रिका के पूरा मैटर प्रदर्शित क रहल बा।

“मत बांटs थोक के भाव पीएचडी के डिग्री “निबंध आज के शिक्षा विभाग के आईना देखा रहल बा। निबंध ” गांव में गूंजत न‌इखे ए हो रामा ” आपन संस्कृति सभ्यता छोड़ के गांव से लोगन के पलायन बता रहल बा, गांव में अब गवन‌ई गोल कहीं ल‌उकत न‌इखे। चूंकि च‌इत शुक्ल नवमीं के भगवान श्री राम के जन्म भ‌इल ह एसे निबंध ” श्री राम अवतार के रहस्य ” एह च‌इता अंक के सार्थकता सिद्ध क रहल बा। निबंध ” भारतीय सिनेमा में भगवान राम ” में भिन्न-भिन्न भाषा में श्री राम कथा प बनल फिल्मन के चर्चा करत कहल ग‌इल बा कि श्री राम कथा प भोजपुरी में एकहू फिल्म न‌इखे बनल,एह बात से हम सहमत न‌इखीं। सन् 1960 में भोजपुरी के पहिलका फिल्म रहल “गंगा म‌इया तोहे पियरी चढ़‌इबो “ओकरे बाद ” लागी नाहीं छूटे राम ”   “बिदेसिया ” आ “सीता म‌इया ” एक के बाद एक बनल। सीता म‌इया के पटकथा भगवान श्री राम के कथानक प आधारित रहे, सीता के भूमिका में जय श्री गडकर आ श्री राम के भूमिका में आसिम कुमार के सफल अभिनय में देखल ग‌इल। ओकर एगो गीत के एक लाइन हमके इयाद आवता — सरजू के तीरे तीरे अवध नगरिया, जहां खेलें राम लखन दूनो भ‌इया।

एह च‌इती विशेषांक में लगभग 36 गो साहित्यकारन के च‌इती प्रकाशित बा। कुल्ही च‌इती एक से बढ़ के एक बाड़िन से। कुल्हनी प कुछ न कुछ कहला से प्रतिक्रिया बहुत लमहर हो जाई, आ केहू प कहीं आ केहू के छोड़ी त ई अन्याय हो जाई।

भोजपुरी जंक्शन के ई च‌इता विशेषांक अपना उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफल बा। एमे सम्मिलित कुल्ही साहित्यकारन के संगे संगे हम कुशल सम्पादक महोदय के कोटि-कोटि बधाई, शुभकामनाएं आ धन्यवाद दे रहल बानी।

 

डॉ. भोला प्रसाद आग्नेय, रघुनाथपुरी, टैगोर नगर, सिविल लाइंस, बलिया, उ०प्र०

भोजपुरी जंक्शन पत्रिका गुणवत्ता का दृष्टि से उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहल बा

भोजपुरी जंक्शन के चइता/चइती विशषांक स्तरीयता का दृष्टि से एह बात के प्रमाण बा कि पत्रिका गुणवत्ता का दृष्टि से उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहल बा। एकरा पहिले होली विशेषांक निकलल रहे, जवन संपादकीय कला के अद्भुत नमूना रहे।

चइता/चइती विशेषांक भी बढ़ चढ़ के विशेषता समेटले बा। एह लोक विधा पर ललित लेख त बड़ले बा, गीत-रचना सब भी जे छपल बा, बहुत ही स्तरीय बा, भोजपुरी साहित्य के समृद्ध करे वाला बा।

सुन्दर संपादकीय परिकल्पना खातिर बहुते बधाई आ शुभकामना।

दिनेश कुमार शर्मा, रिटायर्ड जज, छपरा

भोजपुरी जंक्शन टीम के हृदय से अभिनंदन !

एने हर्ष-विषाद के अझुरहट में एतना बुरी तरह से फंसि गइल रहनीं हं ( अबहिंयों मन दोचिते बा …) कि आउर कवनो चीज़ का ओर धियान ना जात रहल हs ! आवरण पृष्ठ पर अपना चैता के पंच लाइन देखि के अच्छा लागत बा।

शशि प्रेमदेव, बलिया

भोजपुरी जंक्शन खातिर राउर ई प्रतिबद्धता इयाद राखल जाई

एह संकटकालो में भोजपुरी खातिर मनोज जी राउर ई प्रतिबद्धता इयाद राखल जाई। पारिवारिक समस्यन से जूझत अपने आपन संकल्प पूरा कर रहल बानीं।  बहुत बढ़िया अंक बा। राउर सब आलेख आ सगरी कविता पढ़े जोग बाड़ी सं। संपादकीय खूब रोचक आ सामयिक बा। बधाई।

डॉ. सुनील कुमार पाठक, पटना

भोजपुरी जंक्शन के चइता विशेषांक बेजोड़ बा

भोजपुरी जंक्शन के चइता विशेषांक बेजोड़ बा। साज-सज्जा, संपादन बहुत उच्च कोटि के बा। भोजपुरी में एह तरह से लेखन के लिए सब आदरणीय विद्वान लेखक भाई सब के हम सादर अभिवादन करत बानी। भोजपुरी के विकास में संपादक मण्डल के हृदय से आभार बा

मोहन पाण्डेय, हाटा कुशीनगर

भोजपुरी जंक्शन बडहन इस्टेशन भइल बा

रउआ भोजपुरी के उद्धारक भइल बानी एह खातिर अनघा बधाई। भोजपुरी जंक्शन बडहन इस्टेशन भइल बा। भोजपुरी साहित्य खातिर बड़ काम होता। कतना लोग जागि गइलें भोजपुरी मेल क हारन सुन के। ओहिमे फगुआ चइता क खूब झाम झाम मनोरंजक के साथ ही ज्ञानवर्धक रहे। केहू असानी से सोच ना सके बाकिर चइता में कोरोना महमारी के दुःख दर्द कुलहि आइल। ई शोधपरक कार भईल राउर सौजन्य से। ई विशेषांक दस्तावेज होई आगे। चइता में हमरो रचना के शामिल कइला खातिर बहुत-बहुत आभार।

                                                                                   डाक्टर मञ्जरी पाण्डेय, शिक्षिका, लेखिका, कवयित्री, रंगकर्मी, समाजसेवी 

आदरणीय भावुक जी, हम

सादर नमन।

‘भोजपुरी जंक्शन’  चइता विशेषांक में मेरे पत्र को आपने पाती स्तंभ में स्थान दिया, हृदय से बहुत-बहुत आभारी हूँ। यह अंक भी बहुत आकर्षक, मन भावन, पूर्ण रंग बिरंगी साज सज्जा से ओत-प्रोत है, सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक अनमोल कोहिनूर हैं। सभी कलमकारों को हार्दिक बधाई। संपादक विभाग के सभी सुकर्मियों को बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं।

दरियाब सिंह राजपूत, ब्रजकण, मोदी नगर

भोजपुरी के समृद्धि में एगो अउरी नग जड़े खातिर राउर आभार   

ई पहिला अंक ह जवन हमरा के पढ़े के मिलल ह आ हम भाग्यशाली मानS तानी अपना के, कि एह चैता विशेषांक में हमरो चैती के जगहा मिलल बा।

आवरण चित्र के सङ्गे ‘हम काटब गेहूं, गोरी कटिहs तू मुस्की’ पढ़ के एगो उत्सुकता पहिलहीं पत्रिका के ले के मन में होखे लागल ह, कि कइसे हाली से पढ़ लिहल जाओ!

सम्पादकीय खूब बन्हिया लागल ह। एक से बढ़ के एक चैता! आ चइता पर आग्नेय जी के आलेखो निमन लागल ह। कोयीली तोर सहकल छोड़इबो शैलेन्द्र शैल जी के ई चइती पढ़ के एगो अलग अनुभव मिलल।

सब मिला के ई चइता विशेषांक एगो महत्वपूर्ण जगह बनाई भोजपुरी पत्रिकन के बीच में। भोजपुरी के समृद्धि में एगो अउरी नग जड़े खातिर राउर आभार!

डॉ. कादम्बिनी सिंह, बलिया  

भोजपुरी खातिर इ पत्रिका संजीवनी बा

मन गदगद भइल। भाउक जी के कलम त भाव के जीवंतता उरेहता। हमरा त भोजपुरी जंक्शन की बारे में जानकारिये ना रहल हS कि एतना सुन्दर इ बा। लेकिन ज्ञानेश्वर गूँजन जी से जानकारी भइल अउरी गूँजनजी ही हमसे आग्रह कS के एगो चैता लेहनी। अपनी भोजपुरी खातिर इ पत्रिका संजीवनी बा ए बाति के अपार खुशी बा। कब-कब इ पत्रिका निकलेला बताईं। हमहू एइमे आपन रचना भेजत रहबि। अन्त में फेरु एइसन सुंदर पत्रिका खातिर हृदय की गहराई से शुभकामना।

सत्य प्रकाश शुक्ल बाबा, भठहीं बुजुर्ग कुशीनगर उत्तर प्रदेश

 

सचमुच बहुत बढिया विशेषांक बा

बहुत-बहुत आभार जंक्शन पर स्थान मिलल एह खातिर। सचमुच बहुत बढिया विशेषांक बा। चइत माह के सब विशेषता के जोगा के विविध विधा में रचल बा। साधुवाद! भोजपुरी जंक्शन टीम के।

रजनी रंजन, जमशेदपुर

आपन लोक संस्कृति के बचावे के भगीरथ प्रयास बा ई चइता विशेषांक

भोजपुरी जंक्शन’ के ‘चइता विशेषांक’ देख के करेजा जुड़ा गइल। एगो भुला रहल विधा के विशेषांक बनाके फिर से स्थापित करने के भगीरथ प्रयास खाती श्री मनोज सिंह भावुक जी के जतना प्रशंसा कइल जाए ऊ थोरे होखी। एक से बढ़के एक चइता पढ़के मन अघा गइल। आपन लोक संस्कृति के बचावे खाती इहाँ के आपना हृदय से धन्यवाद देत बानी आ दिनोंदिन इहाँ के एह काम में खूब आगे बढ़े खाती ढेरे शुभकामना देतानी ।

गीता चौबे गूँज, राँची झारखंड

हर दिशा, हर क्षेत्र, हर विधा के जुड़ाव आ जुटान बा

भोजपुरी ई-पत्रिका भोजपुरी जंक्शन के होली विशेषांक के साथे पहली बार एह पत्रिका के दर्शन भइल। एह जंक्शन पर हर दिशा, हर क्षेत्र, हर विधा के जुड़ाव आ जुटान बा।

संपादकीय में आदरणीय मनोज भावुक जी के कलम से एकदम सामयिक चित्रण फगुनाहट आ कोरोनाहट के भइल बा। अबगे भोजपुरी जंक्शन के चइता विशेषांक मिलल ह। एह अंक के मिलला के बाद कोरोनाहट के बीच में एगो तनाव के खतम त ना कहल जा सकेला, लेकिन कम करेके साधन जरूर मिल गइल। सब रचनाकार लोग के एतना सुंदर रचना रचे खातिर बहुत-बहुत बधाई। उम्मीद रही कि आगे भी नवोदित लोग के दिशा देखावे खातिर और भी बढ़िया और प्रेरणा देबे लायक रचना मिली। साथ ही साथ एह पत्रिका के संपादक मण्डल और सब जुड़ल सदस्य, रचनाकार लोग के बहुत बहुत धन्यवाद, प्रणाम।

अजय कुमार, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश      


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Hum BhojpuriaJune 7, 20211min6750

जन्मदिवस विशेष: 23 अप्रैल 1969

लेखक- मनोज भावुक 

कुछ लोग के ज़िन्दगी के कहानी स्वेट मार्डेन, शिव खेड़ा, नेपोलियन हिल आदि के प्रेरक पुस्तक से कम रोचक आ मोटिवेशनल ना होला। कोरोना काल में अइसने कहानियन के जरूरत बा जे गहन निराशा में आशा के किरण जगावे।

कहल जाला कि मन में हिम्मत होखे आ अपना लक्ष्य खातिर जुनून होखे त कवनो रास्ता पहाड़ नइखे। पश्चिमी चंपारण के एगो छोट गाँव बेलवा के रहे वाला लइका बॉलीवुड के एगो श्रेष्ठ अभिनेता बन गइल, एकरा  पीछे अथक मेहनत आ अटूट लगन के हाथ बा। एह बिहारी अभिनेता के नाम ह मनोज बाजपेयी जे सामान्य किसान परिवार से होखला के बादो फिल्म अभिनेता बनला के फ़ैन्सी सपना ना खाली देखलें बल्कि ओकरा के पूरो कइलें। 23 अप्रैल 1969 के मनोज बाजपेयी के जन्म भइल। मनोज अपना पाँच भाई बहिन में दुसरा नंबर के संतान हवें। उनके शुरुआती पढ़ाई गाँवे के प्राथमिक विद्यालय से आ हाईस्कूल के पढ़ाई के. आर. हाईस्कूल बेतिया से भइल।

मनोज 1986 में 17 साल के उमिर में दिल्ली पढ़े आ गइलें। बचपन से अभिनेता बने के शौख उनका मन में रहे, एही से इहाँ आके थियेटर से जुड़ गइलें। उनकर नाम मनोज भी ओ बेरा के हिट फिल्म कलाकार मनोज कुमार के नाम पर रखाइल रहे आ मन में कलाकार बने के अरमानों मचलत रहे त थियेटर के प्रति झुकाव स्वाभाविक रहे। दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई करत समय मनोज के जान पहचान थियेटर के दुनिया के बड़ बड़ लोग से हो गइल। तबे उनका पता चलल कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अभिनय के बेहतरीन प्रशिक्षण होला। उ ओह में दाखिला खातिर लगातार कोशिश कइलें, बाकिर तीन बेर असफल भइलें। मनोज एकदम निराश हो गइल रहलें। बने के अभिनेता रहे आ रास्ता मिलते ना रहे। लाइफ लाइन के तलाश जारी रहल। एह अन्हरिया सफर में भेंटइले रघुबीर यादव (प्रसिद्ध अभिनेता)। उनका सलाह पर मनोज मशहूर अभिनय कोच बैरी जॉन के थियेटर कंपनी जॉइन कs लेहलें। शाहरुख खान भी बैरी जॉन किहाँ से अभिनय के कोचिंग लेले बाड़ें। थियेटर के दिन में मनोज आ शाहरुख के मुलाकात भी भइल रहे। मनोज बाजपेयी ए थियेटर कंपनी के साथे कई गो प्ले कइलें अउरी साथ ही अपना अंग्रेजी भाषा के कॉम्प्लेक्स के दूर कइलें। एगो इंटरव्यू में उ बतवलें कि बिहार से आवे वाला अक्सरहा युवक अंग्रेजी से घबड़ाला। हमरा भी बहुत चिंता होखे कि हम कइसे बढ़िया अंग्रेजी बोलीं। कुछ दोस्त लोग के मदद से अंग्रेजी भाषा पर कमांड कइनी आ आज उ काम देता ।

ओही थियेटर के दिन में मनोज बाजपेयी चौथा बार एनएसडी में दाखिला खातिर फेर कोशिश कइलें। एह बेरी उहाँ बोर्ड में बइठल लोग इनका के चिन्हत रहे आ इनका प्रतिभा के मुरीद रहे। उ लोग कहल कि मरदे, अब तू सीखे ना सिखावे आवs.  मनोज गइल रहलें ओहिजा चेला बने आ उनके गुरु बने के नेवता मिल गइल। बाकिर उ मना क दिहलें। उनके अभिनय चलत रहल। साल 1994 में गोविंद निहलानी ओमपुरी आ नसीरुद्दीन के लेके फिल्म बनावत रहलें। उ मनोज के एक मिनट के एगो छोट रोल में कास्ट कइलें आ ई रहे भविष्य के एगो चमकत फिल्म सितारा के पहिला पर्दा-पदार्पण। ओही साल मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर कुख्यात डाकू फूलन देवी के जीवन पर फिल्म ‘बैन्डिट क्वीन’ बनावत रहलें आ उनके फिल्म में टाइटल रोल के समानांतर भूमिका खातिर एगो अइसन नवयुवक के तलाश रहे जे कुशल अभिनेता होखे। मनोज के मित्र आ ओह फिल्म के कास्टिंग कर रहल तिग्मांशु धूलिया शेखर कपूर से मनोज के नाम सुझवलें। मनोज बाजपेयी के मामला लगभग सेट हो गइल, तले कुछ दिन बाद उनके रोल में निर्मल पाण्डेय के कास्ट कर लिहल गइल। मनोज के हिस्से एगो छोट रोल आइल बाकिर ई रोल उनके अभिनय क्षमता प्रमाणित करे खातिर काफी रहे।

कुछ समय बाद मनोज बाजपेयी मुंबई के रुख कर देहलें आ उहाँ उनकर संघर्ष के असली दौर शुरू भइल। बाकिर उनके दिल्ली के कुछ मित्र मुंबई में पहिले से रहलें आ स्थापित होत रहलें। एहीसे उनके मुंबई फिल्म उद्योग में घुसे में मदद भी मिलल। मनोज अपना मित्र सौरभ शुक्ला के साथे मुंबई में आपन शुरुआती दिन गुजरलें। एगो साक्षात्कार में एगो रोचक किस्सा बतवलें कि उ लोग संघर्ष के दिन में अभिनय के लगातार माँजत रहल लोग। केहू भी मित्र आवे त मुर्गा आ मटन पार्टी होखे अउरी मनोज एकरा बदले में आपन कुछ रिहर्सल कइल सीन देखावस।

मनोज के 1995 में महेश भट्ट के टीवी शो स्वाभिमान मिलल। ओह में हालांकि मनोज के छोट रोल रहे लेकिन उ एतना लोकप्रिय भइल कि उनके रोल दू साल से ऊपर तक शो में चलल। एकरा बाद उनके रामगोपाल वर्मा से मुलाकात भइल, जब उ एगो कॉमेडी फिल्म दौड़ के कास्टिंग करत रहलें। रामू उनके प्रतिभा देख के एतना प्रभावित भइलें कि उनके कहलें कि हेतना छोट रोल तहरा लायक नइखे। हम तोहरा के अगिला फिल्म में बड़हन रोल देम। मनोज के पैसा के गरज रहे एहीसे उ रोल कइलें। बाकिर रामू अपना वादा मुताबिक अगिला फिल्म सत्या में हीरो के समानांतर भीकू म्हात्रे नाम के गैंगस्टर के रोल दिहलें। ई रोल अउरी फिल्म एतना हिट भइल कि मनोज बाजपेयी पूरा देश में मशहूर हो गइलें। ई फिल्म बहुत सफल भइल आ मनोज के अभिनय के भूरी भूरी प्रशंसा भइल। मनोज के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलल। एही जा से मनोज बाजपेयी के बढ़िया फिल्म मिले लागल। कुछ साल में उनके शूल, कौन, अक्स, जुबैदा, दिल पे मत ले यार आइल। ई फिल्मन में मनोज बाजपेयी के मुख्य भूमिका रहल आ उनके अभिनय के बड़ा तारीफ भइल। बाकिर मनोज बाजपेयी के फिल्मन के बिजनेस कवनो खास ना रहल।

मनोज 2010 तक के पीरियड में कई गो फिल्मन में नजर अइलें बाकिर उनकर मुख्य भूमिका रहल फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाल ना देखा पवली सन। एही से पता चलता कि हिन्दी फिल्म दर्शकन के केतना दुर्भाग्य बा कि उ बढ़िया कलाकारन के कबो कैश ना करेला आ लिपल पुतल तथाकथित स्टार चेहरा पर छिछिआइल रहेला। साल 2010 में प्रकाश झा के मल्टीस्टारर राजनीतिक फिल्म राजनीति रिलीज भइल आ फिल्म सुपरहिट भइल। एह में मनोज के नेगटिव रोल के बहुत प्रशंसा भइल। फेर साल 2012 में फिल्म आइल गैंग्स ऑफ वासेपुर आ उनके किरदार सरदार खान अमर हो गइल ओइसहीं जइसे भीकू म्हात्रे। मनोज बाजपेयी ओइसे भी घर घर में पहुँच चुकल रहलें, एह फिल्म के बाद वाली पीढ़ी के भी स्मृति में बस गइलें। साल 2016 में उनके फिल्म ‘अलीगढ़’ रिलीज भइल जेके चारु ओर खूब तारीफ भइल, एक बार फेर मनोज अपना अभिनय से सभके चकित कर देहलें। उनके एकरा खातिर प्रतिष्ठित एशिया पेसिफिक स्क्रीन अवॉर्ड से नवाजल गइल। साल 2018 के फिल्म गली गुलेयां भी मनोज बाजपेयी के फिल्मोग्राफी के बेहतरीन फिल्म ह। एह फिल्म के देश विदेश में खूब तारीफ मिलल।

साल 2019 मनोज बाजपेयी खातिर बढ़िया साल रहल। एही साल उनके पद्म श्री के उपाधि मिलल आ एही साल उनके फिल्म भोंसले रिलीज भइल जे में उ टाइटल रोल कइलें। पिछला साल फिल्म भारत में भी ओटीटी पर प्रदर्शित भइल। ई फिल्म देश विदेश में खूब नाम कमइलस। साल 2021 में उनके भोसले फिल्म खातिर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार मिलल ह।

मनोज बाजपेयी के अमेजॉन प्राइम पर रिलीज भइल शो द फैमिली मैन के बड़ा प्रसिद्धि मिलल आ उ शो सुपर डुपर हिट रहल। उनके फिलहाल जीफाइव पर साइलेंस नाम के थ्रिलर ड्रामा रिलीज भइल बा आ जलदिए द फैमिली मैन के अगिला सीरीज रिलीज होखे वाला बा।


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Hum BhojpuriaJune 7, 20211min5250

जन्मतिथि- 09 अप्रैल 1893 |  पुण्यतिथि- 14 अप्रैल 1963

लेखक- मनोज भावुक

पहिला बार जब हम जननी कि राहुल बाबा भोजपुरियो में किताब लिखले बाड़न, उहो नाटक… उहो एगो-दुगो ना, आठ गो त विश्वासे ना भइल। राहुल बाबा माने महापंडित राहुल सांकृत्यायन।

बात 1996 के ह। तब हम बिहार आर्ट थियेटर, कालिदास रंगालय, पटना में नाट्यकला डिप्लोमा के छात्र रहीं। चुकि लेखन में भी रुचि रहे त नाटक में शोध करे लगनी। स्पेशली भोजपुरी नाटक में, जवन दू साल बाद भोजपुरी अकादमी पटना के पत्रिका में एगो लमहर लेख ‘ भोजपुरी नाटक के संसार ‘ के रूप में छपल। ओही शोध के दौरान ई बात पता चलल आ पता का चलल… बिहाने भइला भोजपुरी साहित्य के पर्याय गुरुवर आचार्य पाण्डेय कपिल जी से राहुल बाबा के लिखल तीन गो नाटक मिलियो गइल पढ़े खातिर- नइकी दुनिया, जोंक आ मेहरारुन के दुर्दशा। ई तीनों नाटक भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका में छप चुकल रहे।

राहुल बाबा के भोजपुरी नाटक पर त बात करबे करब। पहिले उहाँ के भोजपुरी आ भोजपुरियापन पर बात करेम। उहाँ के घुमक्कड़ी स्वभाव आ हर भाषा के जाने-सीखे के ललक आ चाव पर बात करेम। साथ हीं इहो कि आखिर 09 अप्रैल 1893 ई। में आजमगढ़ के पन्दहा गांव में जनमल केदार पाण्डेय, केदार पाण्डेय से बाबा रामोदार दास आ रामोदार दास से राहुल सांकृत्यायन कइसे बन गइलें।

बिहार के छपरा जिला में एकमा के पास एगो जगह बा परसागढ़। ‘परसागढ़’ पुरान संत प्रसादी बाबा के नाम पर बा। परसागढ़ के मठो बहुते प्राचीन हऽ। एही मठ में महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम केदार पाण्डेय से ‘बाबा रामोदार दास’ धराइल। ई कइसे भाई ?

केदार पाण्डेय से बन गइलें बाबा रामोदार दास

एकमा के प्रोफ़ेसर राजगृह सिंह बतावेनी कि परसागढ़ मठ के महंथ बाबा लक्ष्मण दास महंथ चिंतित रहत रहनी, काहे कि युवा साधु रामोदार दास के मृत्यु हो चुकल रहे आ उनके नाम से मठ के जमीन-जायदाद रहे। युवा साधु के महंथी देत समय बाबू लोग (जमींदार, परसागढ़) नाखुश हो गइल रहे। मठ के जमीन-जायदाद पर बाबू लोग मुकदमा ठोक देले रहे। मठ के जमीन-जायदाद के सुरक्षा खातिर एगो अइसन युवक के तलाश रहे, जे तेज-तर्रार अउर महंथी के काबिल होखे।

नयका मंदिर खातिर पत्थर खरीदे बाबा लक्ष्मण दास महंथ वाराणसी गइल रहनी। ओहिजा के महंथ के एगो छावनी रहे, जवना में संस्कृत के अध्यापन भी होत रहे। अचानके बाबा लक्ष्मण दास के धेयान एगो अइसन 19 वर्षीय युवक पऽ गइल जवन ओहिजा संस्कृत पढ़े आइल रहे अउर ओकरा साधु बने के मनो रहे। ऊ पंडित राजकुमार जी के माध्यम से आइल रहे। ओह युवक के नाव केदार पाण्डेय रहे अउर उ आजमगढ़ के पंदाहा के रहे वाला रहे। बाबा लक्ष्मण दास के संपर्क में आ के अउर पंडित राजकुमार के कहला पऽ केदार पाण्डेय छपरा परसागढ़ चले खातिर तइयार हो गइले। महंत जी केदार पाण्डेय के छपरा लेके अइनी आ 2 दिन रुक के तीसरा दिने एकमा होत परसागढ़ पहुंचनी। केदार पाण्डेय के मठ में ओही चबूतरा प बइठावल गइल, जवना चबूतरा पऽ रामोदार दास बइठत रहनी। एकादशी, 1912 के केदार पाण्डेय के नाम बदलके रामोदर दास कऽ दिहल गइल। शुभ मुहूर्त में वैदिक रीति से उनकर नामकरण संस्कार कइल गइल आ उनका से कहल गइल कि आज से रउरा रामोदार दास साधु हो गइनी। जमीन-जायदाद रउरे नाम से बा। ओकर देखभाल करे के होई अउर मुकदमा के सगरी कागजात रउरे देखे के होई।

परसागढ़ मठ के महंथी स्वीकार ना कइलें बाबा     

बाबा के महंथी करे के ना रहे। जमीन-जायदाद के लालच रहे ना। सब सुख-सुविधा के बावजूद  ऊ उहां से भाग के दक्षिण चल गइलन आ मठ से संबंधित स्थानन के भ्रमण करे लगलन। महंथ लक्ष्मण दास के निहोरा पर ऊ 1913, 1914, 1917 अउर 1918 में परसागढ़ आवत रहलन अउर मुकदमा के देखभाल करत रहलन। देश के पूरा तीर्थ, मठ से जुड़ल स्थानन के घूमत रहलन। आगरा में जाके 1915 में आर्य समाजी हो गइलन। एक दिन महंथ जी के तार पढ़के ऊ सर्वे के काम से मठ के जमीन के देखभाल करे खातिर परसा आ गइलन। बाकिर महंथी स्वीकार ना कइलन आ महंथ लक्ष्मण दास के मर गइला के बाद मठ में आइल भी ना के बराबर हो गइल। प्रोफ़ेसर राजगृह सिंह बतावेनी कि ओकरा बाद परसागढ़ मठ से कमे नाता रहल उहाँ के बाकिर 1993 में जब कमला जी (बाबा के पत्नी) एकमा आइल रहली त कहत रहली कि बाबा इहाँ के लोगन के खूब ईयाद करीं।

11 साल के उमिर में 8 साल के कन्या से बिआह भइल

गोबर्द्धन पाण्डेय आ कुलवन्ती देवी के संतान राहुल बाबा के लालन-पालन आ पढ़ाई कन्नौल गांव के नाना राम शरण पाठक के देखरेख में 16 साल के उमिर तक चलल। नाना अवकाशभोगी पल्टनिहा रहलन, जेकरा देश-विदेश के घुमला के अनुभव से बाबा काफी प्रभावित रहस। 11 साल के उमिर में 8 साल के कन्या से बाबा के बिआह कऽ दीहल गइल। पुरान विचार के परिवार में घर-गृहस्थी संभाले खातिर एही तरे लोग शादी-बिआह कर देत रहे। बाबा का मन में समाज का प्रति विद्रोह जागल आ उ 16 साल के उमिर में घर बार छोड़ के बनारस भाग अइलन। इहां दयानंद हाई स्कूल में संस्कृत के शिक्षा लेत रहलन। एही बीच उनकर मुलाकात लक्ष्मण बाबा से हो गइल आ उ अपना साथे ले के परसागढ़ मठ चल अइलन।

जेलो गइलें बाबा 

1921 में बिहार अइला के बाद गांधीजी के असहयोग आंदोलन के आकर्षण बढ़ल। कादो, गांधीजी के एकमा बोलावे के श्रेय बाबा के रहे। आन्दोलन में सक्रिय भइला के चलते उनका 6 महिना खातिर बक्सर जेल आ 1923 के आस-पास हजारीबाग सेंट्रल जेल में भी जाए के पड़ल। हजारीबाग सेंट्रल जेल में उ मार्क्सवाद से प्रभावित पुस्तक ‘बाइसवीं सदी’ लिखलन।

कइसे पड़ल नाम महापंडित राहुल सांकृत्यायन

बाबा 1927 में संस्कृत के अध्यापक होके लंका गइलन आ उहां 1928 में उनका ‘त्रिपिटिकाचार्य’ के उपाधि मिलल। भारत लौटला पर 1928 में काशी के पंडित लोग उनका के ‘महापंडित’ के उपाधि से सम्मानित कइल। 30 जुलाई 1930 में बाबा आर्य समाज आ कांग्रेस राजनीति के विचार त्याग के बौद्ध भिक्षु बन गइलन। एह उपलक्ष में उ आपन नाम बदल के ‘राहुल सांकृत्यायन’ रख लेहलन। बुद्धपुत्र ‘राहुल’ आ गोत्र ‘सांकृत्यायन’ मिल के राहुल सांकृत्यायन हो गइल। तब से दुनिया में इहे नाम प्रचलित भइल।

लंका से लंदन आ लंदन से रूस के यात्रा       

1932 में बौद्धधर्म के प्रचार खातिर लंका से लंदन गइलन। यूरोप के यात्रा कके 1933 में लद्दाख लौट के हिमालय, तिब्बत आ मध्य एशिया के यात्रा कइलन। तिब्बत से कई सौ के संख्या में संस्कृत, पाली, प्राकृत आ अपभ्रंश के पाण्डुलिपि लेके अइलन जवन पटना संग्रहालय में सुरक्षित बा। 1937 में लेनिनग्राड (रूस) में प्राचीन भाषा-संस्थान के अध्यापक बन के गइलन आ संस्थान के सचिव एलेना (लोला) से गंधर्व विवाह कर लेलन। 1939 में लौट के भारत अइलन आ सहजानंद सरस्वती का किसान आंदोलन का साथे जुट गइलन। 1939 में छपरा जिला (आज सिवान जिला) के अमबारी में जमींदार के खिलाफ भारत के पहिलका किसान आंदोलन के नेतृत्व कइलन जवना खातिर उनका लाठी, भाला आ जेल सभ मिलल। एशिया, यूरोप के अनेक देश के बार-बार यात्रा कके अपना अनुभव के लाभ लोग के देत रहलन। 24 माह फेर रूस रह के 1949 में राहुल जी भारत लौटलन। 1942 का आस-पास अपना निजी सचिव ‘कमला जी’ के धर्मपत्नी  का रूप में स्वीकार कइलन।

राहुल बाबा के भोजपुरी साहित्य  

राहुल बाबा 1948 में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के सभापतित्व कइलन आ लमहर लिखित भाषण दिहलन जे भोजपुरी के धरोहर बा। साथ हीं उ आठ गो नाटक भोजपुरी में लिखलन जवन 1942 ई। में छपल।

नइकी दुनिया– आजादी के बाद कइसन होई हमनी के दुनिया एह पर फोकस बा।

जोंक– मिल के मालिक, जमींदारन, साहूकारन आ अन्य समर्थ लोग कइसे कमजोर आ गरीब लोग के जोंक बन के चूसता, एही पर फोकस बा।

मेहरारुन के दुरदसा- नामे से साफ़ बा कि औरतन के शोषण के खिलाफ आवाज उठावत बा ई नाटक।

ई हमार लड़ाई जर्मनी के खिलाफ जनता के लड़े खातिर प्रेरित करे वाला नाटक।

जपनिया राछछ- जापान द्वारा कोरिया आ चीन पर अत्याचार केंद्र में बा। जापान में बढ़त वेश्यावृत्ति पर भी फोकस बा।

जरमनवा के हार निहिचय हिटलर के प्रति आक्रोश बा। ओकरा हार के कामना बा।

देस रच्छक– जापान द्वारा बमबाजी से त्रस्त वर्मावासियन के आजाद हिंद फौजियन द्वारा सेवा टहल के प्रशंसा कइल गइल बाटे एह नाटक में।

ढुनमुन नेता- कॉग्रेसी नेता के दोहरा चरित्र के उजागर करत बा इ नाटक। जमींदारी प्रथा स्क्रिप्ट के आधार बा।

दुर्भाग्यवश उनकर लिखल खाली तीन गो नाटक (मेहरारूअन के दुरदसा, नइकी दुनिया आ जोंक) उपलब्ध बा। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन पत्रिका में ई तीनों नाटक के प्रकाशन भइल बा। संस्कृत, पाली, प्राकृत से लेके हिन्दी भोजपुरी तक के दुनिया में राहुल जी समान विचार रखेवाला विद्वान रहस। लोकभाषा के विकास पर उनकर काफी जोर रहे। जहां जास उहें भाषा सीख लेस आ ओही में आपन विचार प्रचार शुरू कर देस। राहुल जी अद्भूत मस्तिष्क वाला व्यक्ति रहस। उनकर लेखन कार्य विचित्र ढंग से चलत रहे। उनका साथे बराबर टाइपिस्ट रहत रहे आ उनकर बोली आ भाषण टाइप होत रहे। अइसन विचार आ चिन्तन के धनी आदमी संसार में दुर्लभ बा।

प्रोफ़ेसर राजगृह सिंह बतावेनी कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन जमींदार लोग का व्यवहार से क्षुब्ध हो के भीष्म प्रतिज्ञा कइले रहस कि जब तक जमींदारी प्रथा के अंत ना होई हम एकमा-परसागढ़ में गोड़ ना राखब। एकर उ निर्वाहो कइलन। छपरा-सीवान आवस बाकिर एकमा ना उतरस। जब जमींदारी के अंत हो गइल त 1956 में राहुल जी के प्रतिज्ञा टूटल आ उ परसागढ़-एकमा अइलन।

राहुल जी स्वतंत्र आ स्वाभिमानी रहस। साम्यवाद में उनका आस्था रहे बाकिर हिन्दी राष्ट्रभाषा बने, एह मुद्दा पर उ 1948 से 1958 तक पार्टी (साम्यवादी) से अलग रहलन। हिन्दी के उनकर सेवा अपूर्व बा। सैकड़ो ग्रंथ कहानी, उपन्यास, इतिहास, शोधग्रंथ आदि हिन्दी में लिख के एह भाषा आ साहित्य के सम्पन्न कइलन। 1959 से 1961 तक लंका के विद्यालंकार विश्व विद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष-अध्यापक रहलन आ उहे विश्वविद्यालय उनका के डी। लिट् के उपाधि देहलस।

14 अप्रैल 1963 में उनके पार्थिव शरीर सदा खातिर एह दुनिया से चल गइल बाकिर राहुल जी के यशस्वी शरीर अमर बा। मरणोपरांत भारत सरकार से उनका ‘पद्मभूषण’ के उपाधि मिलल।



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