चुनौती बनल अवसर

चुनौती बनल अवसर

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Posted: December 14, 2021
Category: आलेख
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लेखक- महेन्द्र प्रसाद सिंह

सन 1990 के बात ह। हमार पहिलकी किताब, भोजपुरी नाटक, “बिरजू के बिआह” खातिर हमरे अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का ओर से जगन्नाथ सिंह पुरस्कार लेबे खातिर नेवतल गइल रहे।  हमरा 26 मई 1990 के रेणुकोट पहुंचे के रहे। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के 11वां अधिवेशन के आयोजन उंहवे भइल रहे। पुरस्कार, सम्मेलन के अध्यक्ष डा. विद्या निवास मिश्र का हाथे मिले वाला रहे। विज्ञान आ विधि के विद्यार्थी रहल हमरा अइसन इस्पात उद्योगकर्मी के साहित्य सृजन खातिर पुरस्कार मिलल बहुते बड़ बात रहे। खुशी आ उत्साह से भरल हम बोकारो स्टील सिटी से 25 मई  के चल के 26 के रेणुकोट पहुँच गइल रहीं। दिनभर साहित्यकार मित्र लोगिन से भेंट मुलाक़ात में समय बीतल। आपन जवारी आ सबसे  प्रिय कवि, कुमार विरल संगे कुछ बेसी समें बीतल। सांझ होते रेणुकोट के स्टेडियम खचा-खच भर गइल रहे। ओह दिन के आकर्षण रहे दिल्ली से आवे वाली आर्केस्ट्रा दल के प्रस्तुति।

पुरस्कार के आखिरी कड़ी पर हमार नाम रहे। रात के करीब आठ बज के बीस मिनट होखे वाला रहे। पुरस्कार मिलते पाण्डेय कपिल जी हमरा कान में गते से कहनी, “महेंद्र जी, दिल्ली से जवन आर्केस्ट्रा टीम पाँच बजे सांझ के पहुँचे वाला रहे ऊ अभी ले आइल नइखे। गाड़ी पाँच घंटा लेट बिया। रउआ "बिरजू के बिआह" के कुछ डायलग सुना देब? हम अनाउंस कर दिहीं ? कपिल जी “बिरजू के बिआह” नाटक, सम्मेलन के अमनौर (7वां) अधिवेशन, सन 1982 में,रांची (9वां) सन 1985 में, बोकारो (10वां) सन 1988 में आ ओकरा अलावे पटना, रवीन्द्र भवन में देख चुकल रहीं। उहाँ के लागल कि ओह नाटक के संवाद सुना के, हम लोग के शांत कर लेब। सांच बात त ई रहे कि आयोजक लोगिन खातिर दर्शक के ओतना देर तक सम्हारल एगो भारी चुनौती रहे। हमरो खातिर एकल अभिनय से करीब 7 हजार से बेसी लोग के मनोरंजन कइल, आ ऊहो लगातार डेढ़ घंटा तक, बड़हन चुनौती रहे बाकि एगो बहुत बड़ अवसरो रहे- आपन हुनर देखावे के। कपिल जी के आँख में हम देखनी आ समस्या के गंभीरता आ अपना खातिर अवसर भांपत कहनी, “एनाउंस कर दिहीं ।”

कपिल जी के आवाज़ गूंजल, “अब रउआ सभे के महेंद्र जी आपन “बिरजू के बिआह” नाटक के डायलाग सुनाइब जवन नाटक खातिर इहाँ के अबके पुरस्कार भेंटल हा।”

देखते-देखत, भरल-पूरल मंच खाली होखे लागल। मंच पर खड़ा रहे एगो माइक ओकरा पीछे हम। सोझा दर्शक के शोर शराबा आ हुटिंग के मिलल-जुलल तेज आवाज, “आर्केस्ट्रा-आर्केस्ट्रा” से स्टेडियम गूंजत रहे। मंच खाली हो गइल रहे आ हम शुरू हो गइल रहीं। माइक का सोझा खाड़ बोलत जात रहीं, बिना आवाज निकसले। बोले के माइम चलते रहे, तबले दर्शकदीर्घा से साफ साफ आवाज सुनाये लागल।

....चुप...चुप... सुन स ना, का बोलता। थोरहीं देर में सन्नाटा छा गइल। हम गुरु गंभीर आवाज़ में कहनी, “त अब बोलीं ?” जोरदार ठहाका गूंजल। लोग हँसत-हँसत लोट पोट हो गइल। हा हा हा हा......अरे तबे ले चुप रहे!

बिना कुछ बोलले ऑडिएंस के अइसन ठहाका हम पहिलहूँ देख चुकल रहीं। बोकारो ट्रेनिगं सेंटर के वार्षिकोत्सवन में जब हम आपन एकल प्रस्तुति खातिर  मंच पर खड़ा होत रहीं त अइसहीं लोग बिना कुछ बोलले हँसत रहे।अब हम ओही आत्मविश्वास से भरल मंच पर आपन  गोड़ जमा चुकल रहीं। लोग हँसत रहल हम मुस्कात रहनी। फेनु आपन अलग-अलग नाटकन के अंश सुनावत गइनी। लोग एक-एक शब्द पर ठहाका लगावत रहल। दस बज गइल रहे आने डेढ़ घंटा पर। कपिल जी गते से आ के कहनी। गाड़ी पहुँचहीं वाली बिया। आउर आधा घंटा घींची। हम उहाँ के चिंता मुक्त करत कहनी, “ठीक बा” आ कुछेक हास्य व्यंग्य आ अनुकृति सुनइनी। आधा घंटा बीतल आ दिल्ली से आइल गायन मंडली आपन साज-बाज मंच पर रखे लागल। हम विदा लेवे के अंदाज में लोग के तसल्ली देनी कि जेकर इंतज़ार में रउआ सभे रहीं ऊ दल पहुँच गइल बा। अब रउआ... तब तक गायक दाल के मुखिया (नाम इयाद नइखे) आके कान में कहलें, "दस मिनट आउरी सम्हारी हमनी के बस नेहा के आवत बानी जा। "हम समझ सकत रहीं कि गर्मी का मौसम में दिनभर के ट्रेन सफर के थकान क बाद नेहाइल केतना जरूरी बा। आ उहो जब रात भर गावे-बजावे के होखे तब। हम ओही साहस से आगे बढ़नीं । 30 मिनट बीत गइल। मण्डली के कलाकार मंच पर आके आपन-आपन साज बाज मिलावे के शुरू कर देले रहन।10 मिनट का बाद जब दल प्रस्तुति खातिर तैयार हो गइल, हम बिदा लेबे लगनी। आडिएंस के शोर उठल, “एगो आउर- एगो आउर”, 5 मिनट आउरी कुछ सुना के खानपुरी कइनी आ विदा लेनी। मने-मने कहनी, “रन जीतलअ ए महेंद्र सिंह”। ई हमार पहिलका आ आखिरी अवसर रहे जब हम अकेले सवा दू घंटा ले लोग के हंसावत रहनी। एकल नाटकन में कुछ रिकॉर्डेड म्यूजिक के भा टीम  के नेपथ्य से भा  मंच से सपोर्ट रहेला। एह में त ओइसन कुछ रहे ना। खैर सभे दिल खोल के सराहल। लखनऊ से आइल भोजपुरी लोक के संपादक श्रीमती डा राजेश्वरी शांडिल्य आ उनकर पति डा राम बिलास तिवारी जी हमरे लखनऊ में दू महीना बाद आयोजित होखे वाला आपन सांस्कृतिक कार्यक्रम के संचालन आ एकल प्रस्तुति खातिर नेवता दिहल लोग। आवे-जाये के ac 2 टियर के टिकट कटा के भेजलें आ कार्यक्रम के बाद सम्मानजनक उपहारो दिहलें। खैर ऊ त बाद के बात भइल। रेणुकूट में दोसरका दिने सांझ के कवि सम्मेलन रहे। कवि लोग से मंचो खचाखच ओइसही भरल रहे जइसे कि स्टेडियम। संचालन एगो वरिष्ठ कवि के हाथ में रहे। हमहूँ मंच के पिछला भाग में कविता सुनावे के अपना पारी के इंतज़ार में बइठल रहीं। कवि सम्मेलन नियम के उद्घोषणा भइल। पहिला राउंड में हर कवि के आपन बस एकेगो कविता सुनावे के बा। संचालक महोदय जेकर नाम पुकरलें ऊ कवि आके माइक संभार लिहलें। बाकि ऑडिएंस सुने के तैयारे ना रहे। ज़ोर-ज़ोर से लोग चिचियात रहन, “बोकारो-बोकारो”। पाण्डेय कपिल जी हस्तक्षेप कइनीं । संचालक महोदय से निहोरा कइनीं कि महेंद्र जी के लोग सुनल चाहत बा। उनहीं के पहिले बोला लिहीं। संचालक जी दर्शक के बुद्धिहीनता के आ कुरुचि के खूब कोसनी आ फेनु हार के हमरे आपन कविता सुनावे खातिर आमंत्रित कइनीं। जोरदार थपरी बजा के लोग स्वागत कईलस। हम आपन एगो हास्य व्यंग्य के कविता सुनइनीं आ अपना जगहा पर लवट अइनीं। लोग चिचियाइल, “एगो आउर- एगो आउर”। संचालक के पारा गरम भइल त कपिल जी खाड़ भइनी आ लोग के समझावे के कोसिस कइनी। बाकि सब बेकार। उहाँ के फेनु संचालक से कहनीं कि महेंद्र जी के बोला लिहीं। हमार फेनु बोलाहट भइल संगहीं उहाँ का दर्शक लोग से भी बहुते परेम से कवि सम्मेलन के नियमपूर्वक चलावे में सहयोग के मांग कइनी। दर्शक मान गइलें। हम आपन दोसरको हास्य व्यंग्य कविता सुनाके रेनूकूट के माटी आ उहाँ के दर्शक लोगिन के मनहीं मने प्रणाम कइनीं जे आजो हमरा जिनगी के एगो सबसे प्रेरक संस्मरण का रूप में ताज़ा रहेला। ओहि रेणुकोट में पढ़ल-बढ़ल मेधावी संपादक मनोज भावुक जी के पहल पर हम आपन संस्मरण के कागज पर उतारत बानी। उमेद बा कि उहाँ के एह संस्मरण के आपन पत्रिका में स्थान देब।

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