भोजपुरिया समाज के जीवट कथा

भोजपुरिया समाज के जीवट कथा

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Posted: December 14, 2021
Category: आलेख
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लेखक- विनय बिहारी सिंह

तीन गो एकदम सांच आ रोचक घटना हमनी के भोजपुरिया समाज के लौह पुरुषता के उदाहरण बाड़ी सन। अइसे त अनगिनत घटना बाड़ी सन, बाकिर आजु तिनिए गो प्रेरक घटना पढ़ीं।

 पहिला घटना-

उत्तर प्रदेश के बलिया जिला के कौनो गांव के घटना ह। लइकाईं में ई घटना सुनाके हमार ईया (दादी) सीख देसु कि कौनो प्रण कइला के बाद पीछा ना हटे के चाहीं आ अपना दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर प्रण कइल काम पूरा क देबे के चाहीं। ईया घटना बतावत का घरी ईहे कहसु कि दक्खिन का ओर एगो गांव रहे। ओइजा एगो मंदिर बनावे के प्लान बने आ कौनो ना कौनो कारन से रुकि जाउ। जमीन तक तय हो चुकल रहे। एह गांव में एगो परम भक्त आदमी रहले जिनकर नांव लोग साधु जी रखले रहे। उनुकर असली नांव से ज्यादा पुरुब टोला के साधु जी बड़ा प्रसिद्ध रहे। त मंदिर के प्लान बने आ रुकि जाउ। साधु जी अचानके एक दिन प्रण कइले कि जब तक मंदिर ना बनी, हम अन्न ना खाइब। एह प्रण का बाद ऊ सबकरा से मंदिर खातिर चंदा बटोरे लगले। भोजन में ऊ कबो आलू उबाल के खा लेसु त कबो कंद- मूल। कबो दही त कबो दूध। नाम मात्र के मजदूरी लेके मंदिर बनावे खातिर दू गो मजूरन के साधु जी तय क दिहले। मंदिर के नींव खोदा/कोड़ा गइल। कौनो ईंटा के भट्ठा वाला मालिक उनुका के एक हजार ईंटा दे दिहलस। नींव डला गइल। मंदिर बने शुरू हो गइल। एही बीच में साधु जी के मलेरिया हो गइल। मंदिर के काम रुकि गइल। काहें से कि दोसर केहू मंदिर बनावे में साधु जी जतना सक्रिय ना रहे। मलेरिया उग्र रूप ले लिहलस आ साधु जी के टायफाइड हो गइल। बोखार में ऊ का जाने का बड़बड़ासु आ देह तावा नियर जरे। लागल कि साधु जी मरि जइहें। जब तनी बोखार कम भइल त डॉक्टर कहलस कि मांस- मछरी खाईं। अनाज खाईं, तब देह में ताकत आई। बाकिर साधु जी कहले कि मरि जाइब बाकिर आपन प्रण ना छोड़बि। बेमारी में गांव के सक्षम लोग उनुकरा पर रुपया- पइसा खरच करेके तेयार रहे लोग। तीन महीना ले मृत्यु से लड़ाई कके साधु जी जीत गइले। आखिर ले ऊ अन्न टच ना कइले। दूध- दही आ फल के बल पर स्वस्थ हो गइले। मांस- मछरी उनुका खातिर आजीवन निषिद्ध चीज हो चुकल रहे। मंदिर त छोटहने बनल बाकिर ओकरा बने में दस साल लागि गइल। ओमें भगवान शिव के स्थापना भइल। गांव के लोग कहल कि साधु जी ओह मंदिर के पुजारी बनसु। साधु जी विवाहित रहले। उनुकर पत्नी भी सरल, सहज आ साधु स्वभाव के रहली। जब गांव के लोग आपन जिद्द ना छोड़ल त साधु जी बात मान लिहले। मंदिर के पुजारी बनि गइले बाकिर मंदिर बनला का बादो ऊ अनाज ना खइले। कहसु कि अब त अनाज का ओर ताकहूं के मन नइखे करत। बिना अनाज के जीए के आदत परि गइल बा। सचहूं मलेरिया से ठीक भइला का बाद साधु जी फेर बेमार ना परले। अनाज छोड़ला का बाद उनुकर चेहरा में का जाने कइसे निखार आ गइल। नब्बे साल के उमिर ले जियला का बाद अंतिम सांस लिहले।

  दोसरकी घटना-

हम बलिया रेलवे स्टेशन पर भोर में उतरनी आ अपना बड़ भाई का घरे जाए खातिर एगो रिक्शा कइनीं। रिक्शा वाला बड़ा धीरे- धीरे चलावत रहे। हम रिक्शा वाला के कहनीं- अरे भाई तूं रेक्सा चलावतार कि बैलगाड़ी? एतना धीरे- धीरे चलबs त घरे हम दुपहरिया खान पहुंचब। रिक्सा वाला जवान लइका रहे, कहलस- जी बाबू। आ पैडल पर पैर मरलस त ठक दे बाजल। हम हैरान। पैर मरला पर ठक दे त बाजे ना। ओकरा गोड़ का ओर तकनी त हमार छाती धक्क दे हो गइल। ई का? रिक्सा वाला के एगो गोड़ के जगह पर डंटा/लाठी बांन्हल रहे। हमरा बड़ा अफसोस भइल। अपना पर ग्लानि भइल। ओह रिक्सा वाला के एकही गोड़ रहे। दोसरका गोड़ जांघ तक रहे। ओही जांघ में डंटा बान्हि के ऊ रिक्सा चलावत रहे। हम ओकरा से पुछनी कि तोहार गोड़ कइसे कटाइल? रिक्सा वाला कहलस कि ओकरा गोड़ में गैंगरीन हो गइल रहे, एही कारन से गोड़ काटे के परल। कहलस- “हमरा घर में हम बानी आ हमार माई बिया। आय के कौनो साधन नइखे। खाए- पीए आ माई के दवाई खातिर धन चाहीं। ओही खातिर हम रिक्सा चलावतानी।” हम त अपराध बोध से चुप रहनीं। घरे पहुंचि के ओकरा के बीस रुपया का बदला चाली गो रुपया देबे लगनी बाकिर रिक्सावाला बीस रुपया लौटा दिहलस। कहलस कि रउरा से त बीसे रुपया किराया तय भइल रहल ह। त हम चालीस रुपया काहें लेब। हमरा पर दया मत देखाईं। बस राउर प्रेम बनल रहो, ईहे चाहीं। रिक्सावाला पढ़ल- लिखल रहे। अगिला दिने ओकरा के खोजे निकललीं बाकिर फेर ओकरा से हमार भेंट ना भइल।

   तिसरकी घटना-

ओह घरी ट्रेक्टर के नांव बहुते कम लोग सुनले रहे। आजकाल नियर ट्रेक्टर से खेत जोतल आम घटना ना रहे। रबी के फसल बोआई के समय रहल। तले एगो किसान के बैल मरि गइल। किसान के नांव रहे अयोध्या। अयोध्या के चिंता भइल कि खेत कइसे जोताई? रबी के फसल कइसे बोआई? अयोध्या सबका से बैल मंगले। बाकिर सबका आपन खेत बोए के रहे। त बैल के उधार दी। पहिले आपन खेत बोई कि बैल उधार दी। एक दिन रात खान अयोध्या प्रण कइले कि पूरा तीन बीघा/बिगहा खेत फरुहा/फावड़ा से कोड़ देब। अगिला दिने फरुहा लेके खेत कोड़े शुरू कइले अयोध्या। लोग हंसे आ कहे कि पागल भइल बाड़े अजोध्या। आरे आधा कट्ठा, एक कट्ठा के बात रहित त कौनो बात रहल ह। ई तीन बिगहा खेत कइसे कोड़िहें। बाकिर अयोध्या सबकर बात अनसुना कके खेत कोड़े लगले। आ उनुका धुन के प्रणाम बा कि 15 दिन में तीन बिगहा कोड़ि दिहले। अब जे फरुहा भा कुदारी/कुदाल चलवले नइखे ऊ का जानी कि खेत कोड़े में कतना कठिन परिश्रम के जरूरत बा आ कतना एनर्जी लागेला। कहाला कि खेत कोड़ला पर हाड़ के पसीना निकलि आवेला। हाड़ से पसीना एगो मुहावरा ह। त एतना कठिन काम कके अयोध्या हंसते हंसत खेत के बो दिहले। ओकर विधिवत सिंचाई क दिहले आ उनुकर रबी के फसल लहलहाए लागल। आसपास के गांव में शोर हो गइल कि अयोध्या त लोहा के आदमी बाड़े। उनुकर मुकाबला के करी।

ई तीन गो कहानी सुनि के आजुओ हमार मन जुड़ा जाला। हम आजकाल अइसन कौनो लौह पुरुष के नइखीं देखत जौन एहतरे के उदाहरण मनुष्य के सामने राखत होखे। पहिले के लोग उदाहरण राखि देत रहल ह। मीडिया में आवे के ओकर कौनो इच्छा ना रही। बस हम आपन प्रण पूरा क दिहनी, एही के खुशी ओकरा खातिर पर्याप्त रहल ह। आजकाल त सुनाता कि बिना कौनो पराक्रम के ही लोग चाहता कि हमार नांव होजा, यश होजा। अइसना लोगन के अपना पुरनियन से सीख लेबे के चाहीं। लोहा बने खातिर एह लोगन के उदाहरण काफी बा।

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