कुंज बिहारी कुंजन: भोजपुरी के जे निहाल कर देलस देह गलाके!

कुंज बिहारी कुंजन: भोजपुरी के जे निहाल कर देलस देह गलाके!

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Posted: December 20, 2021
Category: आलेख
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भगवती प्रसाद द्विवेदी 

करीब-करीब पनरह-सोरह बरिस भइल होई, तीन-चार बेर साहित्यिक जलसन में रोहतास (बिहार) के नायाब शहर नोखा के जातरा करेके मोका मिलल रहे। उहे नोखा, जवन कबो गढ़ नोखा का नांव से जानल-पहिचानल जात रहे। आजु भलहीं पहाड़ियन के बेरहम मशीनन से भुरकुस कऽके पथल के रोजगार आ चाउर मिलन के भरमार ओह इलाका के बैपारिक सम्पन्नता के पहिचान बनि गइल होखे, बाकिर नोखा के सही माने में सांस्कृतिक पहिचान रहलन-उहवां के जीवंत कवि कुंजबिहारी कुंजन, जे तमाम संघर्षन से अकेलहीं जूझत भोजपुरी के झंडा ताजिनिगी थम्हले रहे आ यादगार रचनाशीलता का जरिए आपन अमिट छाप छोड़ि गइल।

नोखा में पहिल बेर हम तब गइल रहलीं, जब पुन्नश्लोक कुंजन के पावन इयाद में एगो कवि सम्मेलन आयोजित भइल रहे, जवना के उद्घाटन के बहाना हम कुंजन जी के बेमिसाल व्यक्तित्व-कृतित्व पर दू शब्द बोलिके आपन सरधा के फूल चढ़वले रहलीं आ ओह ऐतिहासिक अवसर के इयाद करत आजुओ हम आपन अहोभागि मानींले। बाकिर एह से बढ़िके विडम्बना अउर का हो सकेला कि जवन शख्स नोखा के पहिचान रहे, साहित्य के नामी-गिरामी हस्तियन के पग-धूर से ओह धरती के धन्य करे में जेकर अविस्मरणीय योगदान रहे, ओही अनमोल रतन के, अपना पहिचान के नोखावासी भुलवा दिहलन। तबे नू कुंजन के इयाद में नोखा में आजु अइसन किछऊ नइखे बांचल, जवना चिन्ह से ओह कवि के चिन्हिके सरधा-सुमन अर्पित कइल जा सके। एगो महत्वपूर्ण साहित्यकार का प्रति कतना एहसान फरामोस बा ई मतलबी समाज!

एह बात के अंदाज बुझिला महाकवि कुंजन अपना जिनिगिए में लगा लेले रहलन। उन्हुकर रेघरिआवे जोग अवदान आ आंतर के उदबेग एह पांती में बखूबी देखल जा सकेला-

जे नोखा के चमका देलस अपना के तलफा के

भोजपुरी के जे निहाल कर देलस देह गला के

ओह कुंजन खातिर नोखा में कहवां कुछ चरचा बा

ओह कुंजन बिन जइसे केहू के ना कुछ हरजा बा!

कुंजन जी के दिली लालसा रहे कि नोखा में 'भोजपुरी भवन' के निरमान होखो आ एह खातिर ऊ जीव-जान से लागलो रहलन,बाकिर उन्हुकर साध पूरा ना हो पावल। एह खातिर ऊ भोजपुरी साहित्य-कला परिषद् के गठन कइले रहलन आ कविसम्मेलन आउर महामूरख सम्मेलन के आयोजनो करवावत रहलन,बाकिर देह के अवसान होते ई जालिम दुनिया उन्हुकर मए कइल-करावल पर पानी फेरत भोजपुरी भवन बनवावे के बात के कहो,खुद उन्हुके के भुला-बिसरा दिहलस।

जिनिगी में जीए-जूझे खातिर कुंजन आखिर कवन अधातम ना कइलन! रोजी-रोटी खातिर ऊ बीड़ी बनावे के काम कइलन। दरजीगिरी सीखिके दरजी के काम कइलन। कहे के मतलब ई कि कवनो काम के ऊ छोट भा निकृष्ट ना बुझलन। बाकिर उन्हुका जिनिगी के असली मकसद त कवि-कर्म रहे,जवना में ऊ आपन सोरहो आना कामयाब रहलन। बड़प्पन आ विनम्रता अइसन कि जब उन्हुका कृति के तारीफ आ आकलन होखे लागे,त ऊ हाथ जोड़िके कहसु-'तीसरा दरजा पास कुंजन से अइसन अपेक्षा मत राखीं सभे!'

अपना के 'थर्ड किलसिया' मानत ऊ कहलहूं रहलन-

अधिका नीमन के झूठे नू लवले बानीं आस

जानते बानीं, कुंजन बाड़े तीने दरजा पास!

एह तरी, 'दरजा तीन' पास कुंजन खाली स्कूली शिक्षा आ आखरे ज्ञान में ना,बलुक तेवरो में कबीर आ भिखारी ठाकुर के परंपरा के बहुआयामी रचनाकार रहलन। हाजिरजवाबी आ आशुकवित्व के गुन उन्हुका में कूटि-कूटि के भरल रहे। ओइसे त ऊ मूलतः कवि रहलन,बाकिर उन्हुका सिरिजन के विविध आयाम रहे- एगो व्यंगकार के, प्रबंधकाव्यकार के,गीतकार के,ग़ज़लगो के आउर एकांकीकार के।

कुंजन जी रामकथा के कुशल पारखी रहलन आ एह विषय पर उन्हुकर दूगो यादगार प्रबंधकाव्य अइलन स-'सीता के लाल' आउर 'कुंजन रामायण'। 'सीता के लाल' के स्तरीयता आ लोकप्रियता के अंदाजा एही से लगावल जा सकेला कि ओकरा पर महेश्वराचार्य के समीक्षा के किताबो प्रकाशित भइल रहे। 'कुंजन रामायण' के प्रकाशन कवि के जीवनकाल में त ना हो सकल रहे,बाकिर सासाराम के डॉ नंदकिशोर तिवारी जी के सौजन्य से एकरा प्रकाशन के सूचना मिलल रहे। चोट आ कचोट से लैस व्यंग के दूगो संग्रह 'कुरकुरहट' आ 'कुनैन के गोली' के कविता , कवि के व्यंग कविता के बेजोड़ नमूना बाड़ी स। गीत-संग्रह 'रसबुनिया' आ 'कुंजन के पाती' के भावप्रवणता, ताजगी पढ़निहारन के मरम के छूवे बेगर नइखे रहत। हिन्दी ग़ज़ल-संग्रह 'महफिले ग़ज़ल' के बांकपन आ एकांकी 'शिवटहल काका' के सम्प्रेषणीयता देखते बनत बा। अचरज होला कि कतना पोढ़ आ असरदार रहे उन्हुकर सिरिजना!

बाकिर एह अप्रतिम कवि के सार्थक मूल्यांकन आजुओ बाकी बा। एकरा खातिर समालोचक आ शोध-निदेशक के आगा आवे के चाहीं। बाकिर आजु भोजपुरी का,हिन्दिओ में आलोचना के जवन हाल बा,ऊ केहू से छिपल नइखे। खुद कुंजनो जी एह तथ से वाकिफ रहलन।

तबे नू सेसरो रचना के निजी राग-द्वेष का चलते धज्जी उड़ावल देखिके ऊ कहले रहलन-

बेकटले ना छोड़ी,रचना कतनो होखे रोचक

बानि परल काटे-भोंके के,बनि गइलीं आलोचक!

कुंजन जी के रचनाशीलता के स्थायी भाव रहे-व्यंगपरकता आ आशुकवित्व। समाज के विसंगति-विद्रूपता के खुलासा कऽके ऊ अइसन गहिर चोट करत रहलन कि पढ़े-सुनेवाला के आंतर घाही भइला बेगर ना रहत रहे। आजु के अर्थ केन्द्रित समाज में बूढ़ बाप-महतारी का प्रति बेटा-नाती के का सोच बा,एकर खुलासा करत कवि कहले रहलन-

का हो पूज्य पिताजी, बोलऽ,आखिर कहिया ले जियबऽ तूं,

कहिया ले खा च्यवनप्राश आ ऊपर से गोरस पियबऽ तूं?

बाकिर बेरोजगारी झेलत नवकियो पीढ़ी आखिर का करो! चरम पर पहुंचल महंगी

बाप-महतारी के बहंगी के कान्ह प से उतारे खातिर अलचार कऽ देत बिया। कवि के कहनाम बा-

कान्ह पर के कांवर के उतार दिहले भार,

महंगी के बहंगी ढोवे लगले सरवन कुमार!

'सीता के लाल' प्रबंधोकाव्य में हालांकि उत्तरार्ध करुन रस,वीर रस आ वीभत्स रस से सराबोर रहे,बाकिर पूर्वार्ध में हासे-व्यंग के प्रधानता रहे।

आजु जबकि भोजपुरी गायकी चंद फूहर धंधेबाजन का चलते दागदार हो रहल बिया, कुंजन जी के जियतार गीत सहजे इयाद आवत बाड़न स, जवनन के भावभूंइ

सुननिहारन के झूमे खातिर अलचार कऽ देत रहे। अइसने भरत शर्मा व्यास के गावल एगो गीत में प्रकृति के मानवीकरन देखते बनेला। सबेरे के ललकी किरिन धरती पर एह तरी उतरत बिया,जइसे ससुरा में उतरल लजात-सकुचात कनिया गते-गते दउरा में डेग डालत होखे-

ससुरा में आवे जइसे नई दुलहिनिया,

लजात आवे हो तइसे ललकी किरिनिया।

हालांकि सिरिजना का संगें-संगें कुंजन जी 'सुर-सरिता' आ 'कल्लोलिनी' के संपादनो कइले रहलन आउर अक्तूबर, 1985 में 'कुंजन स्मारिका' छापल गइल रहे, बाकिर जब ले 'कुंजन रचनावली' के प्रकाशन ना होई आ जब ले नोखा में 'भोजपुरी भवन' ना बनी,तब ले का महाकवि कुंजन के दिवंगत आत्मा के अमन चैन आ चिरशांति मिलि पाई?

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