अविनाश चंद्र विद्यार्थी जी के भोजपुरी साहित्य साधना

अविनाश चंद्र विद्यार्थी जी के भोजपुरी साहित्य साधना

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Posted: March 21, 2022
Category: आलेख
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प्रो. (डॉ.) जयकान्त सिंह  'जय'

आज जब एक-एक करके भोजपुरी सेवी साहित्य सर्जक पूरखन के इयाद कर रहल बानी तब ओह लरी के सबसे अनमोल कड़ी के रूप में ' विद्यार्थी जी ' के इयाद बरबस आ जाता। विद्यार्थी जी मतलब अविनाश चंद्र विद्यार्थी। सन् उनइस सौ सत्तासी-अठासी के आसपास भोजपुरी के सिद्ध गजलकार जगन्नाथ जी आ जय दुर्गा प्रेस, पटना के संस्थापक साहित्यकार नागेन्द्र जी के संयुक्त सम्पादन में 'लोग प्रकाशन' से सितंबर, १९७८ में छपल भोजपुरी का प्रतिनिधि गजलन के एगो उम्दा संग्रह पढ़े के मिलल रहे। ओह गजल संग्रह में विद्यार्थी जी के दूगो गजल छपल रहे। पहिल गजल के एक-एक शेर हम आजुओ आ अबहिंयों गुनगुना रहल बानी –

'काँटो का संगे नेह निभवलीं हां आजु ले

नाता ना जोरे फूल से पवलीं हां आजु ले

ताकीं कहाँ ले आगे मिरिगा के भइल हाल

पानी का भके रेत पर धवलीं हां आजु ले '

आज भोजपुरी में ढ़ेर गजलगो हो गइल बारन। बाकिर उनका गजलन में भोजपुरी भासा आ भाव का जगे उर्दू के सब्द आ मध्यकालीन समाज के जमीन ज्यादे नजर आवेला। उहँवे विद्यार्थी जी के एक सौ बीस गजलन के संग्रह ' पतिआत ना केहू ' का गजलन के पढ़ला पर भोजपुरी भासा, समाज आ संस्कृति के साक्षात् दरसन हो जाला। उनका गजल लिखे के लकम लागल जगन्नाथ जी का संसर्ग से।  ऊ आपन ई गजल संग्रह उनके के समर्पित कइले बारन।

अइसहीं सन् उनइस सौ छियासी में भोजपुरी स्नातक के विद्यार्थी के रूप में 'बिहार विश्वविद्यालय भोजपुरी पद्य संग्रह' में विद्यार्थी जी के दूगो काव्य रचना ' अबहीं त बहुत कहे के बा ' आ 'बिनु गीत के'  पढ़े के मिलल। ओही दरम्यान ओह पद्य संग्रह आ कुछ जेठ साहित्यकार लोग से उनका व्यक्तित्व आ कृतित्व के बारे में जाने के अवसर मिलल। जवना के अनुसार उनकर जनम ०४ जनवरी, १९२६ ई. के शाहाबाद के शाहपुर पट्टी में बाबूजी बबन लाल आ माई धीरजा देवी के परिवार में भइल रहे। जनम देला के कुछे देर के बाद माई सरग सिधार गइली आ उनकर फुआ बिरिज कुमारी देवी उनका के पाल-पोसके माई के कमी महसूस ना होखे देली। ऊ अपना फुए के ईआ कहत रहलें। विद्यार्थी जी अपना आराध्य राम भक्त हनुमान जी के नायक बनाके रचल महाकाव्य ' सेवकायन ' के ओही फुआ भा ईआ स्व. बिरिज कुमारी देवी के समर्पित कइले बारन। जवन फरवरी, १९८४ में भोजपुरी अकादमी, पटना से छपके काफी जस बिटोरलस।

ई 'सेवकायन' महाकाव्य हमरा भोजपुरी एम. ए. का सत्र १९९१-९३ का पाठ्यक्रम में लागल रहे। जवना के हम अपना गुरुदेव आ विद्यार्थी जी के परम शिष्य स्व. डॉ. जितराम पाठक जी से उनका हरि जी के हाता अवस्थित आवास पर जा जाके पढ़ले रहनीं।

पाठक जी विद्यार्थी जी मास्टर साहेब कहत बतवले रहीं जे मास्टर साहेब अपना साहित्य में भोजपुरी के निसोख-निरइठ सब्दन के मोती जरिले। विद्यार्थी जी का भाव-विचार आ विषय-विनोद के अनुकुल-अनुरूप सब्द-संजोजन-कला पर लट्टू रही पाठक जी।

पाठक जी के अनुसार 'विद्यार्थी जी सन् १९४३ में शाहपुर हाई स्कूल से मैट्रिक के परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास कके इंटरमीडिएट खातिर जैन कालेज, आरा में नाम लिखवले रहस आ सन् १९४५ में प्रथम श्रेणी से इंटर के परीक्षा कइले रहस। उनका इंटर पास करते हरिनारायण हाई इंग्लिश स्कूल, शाहपुर पट्टी का सचिव के बुलावा आइल आ ऊ सचिव के इच्छा के सम्मान करत उनका स्कूल में १४ मार्च, १९४५ के भूगोल आ अंगरेजी शिक्षक के रूप में जोगदान कर लिहलें। ओह घरी उहाँ के हेड मास्टर रहलें जानल-मानल शिक्षा शास्त्री आ साहित्यकार सत्यनारायण लाल।'

जब शाहपुर पट्टी हाई स्कूल में विद्यार्थी जी शिक्षक के रूप में बहाल भइलें ओह घरी पाठक जी उहाँ एगारहवां के छात्र रहस। मतलब विद्यार्थी जी पाठक जी से दू-तीने साल जेठ रहल होइहन। जब १९४७ में पाठक जी प्रथम श्रेणी से मैट्रिक पास कइलन त विद्यार्थी जी समय-परिस्थिति के खेयाल करत उपयोगितावादी नजरिया के मोताबिक उनका के राय देलें कि अइसे त तोहार हिन्दी आ सामाजिक विग्यान बहुते मजबूत बा अउर हिन्दी में कवितो-कहानी नीमन लिख लेवे ल, बाकिर जल्दी नोकरी पावे खातिर तोहरा साइंस चाहे कामर्स पढ़े के पड़ी। आ पाठक जी जैन कालेज आरा से इंटर करे खातिर कामर्स विषय ले लिहलें। काहेकि ओह घरी जैन कालेज में विग्यान के पढ़ाई ना होत रहे।

आगे सन् १९५२-५३ तक शाहपुर पट्टी हाई स्कूल में पढ़वला के बाद सरकारी पेंशन के लाभ देखके विद्यार्थी जी पटना सचिवालय के निम्न वर्गीय सहायक के परीक्षा पास करके उहँवें बहाल हो गइनी। एही बीच सन् १९५४ में पटना के एगो मोटर दुर्घटना में उहाँ के पांव के ठेंघुना क्षतिग्रस्त हो गइल आ उहां का पांच-छव साल ले इलाज करावत पटना से बाहर ना निकलनीं। कइसहूं सचिवालय में आ-जा के आपन ड्यूटी करीं। ओह घरी मैथिल लोग के ' मैथिली परिषद ' पटना में बहुत सक्रिय रहे। जवना से प्रेरित-प्रभावित होके आचार्य शिवपूजन सहाय के सलाह पर पाण्डेय नर्मदेश्वर साहेब आदि सन् १९५९ में ' भोजपुरी परिवार ' नाम के एगो भोजपुरी सेवी संस्था बनवलें। विद्यार्थी जी ओकर संजोजक बनावल गइलें आ सन् १९६० से एह 'भोजपुरी परिवार ' से ' अँजोर ' पत्रिका निकाले के भइल त उनका के ओकर सहायक संपादक बनावल गइल। फेर 'अँजोर' आ 'योगी' पत्रिका में उनकर भोजपुरी रचना छपे लागल।

एकरा बाद त विद्यार्थी जी सन् १९९४-१९९५ तक भोजपुरी के खूब सेवा कइलें। जवना के साक्षात् प्रमाण बा उनकर डेढ़ दर्जन से ऊपर छपल स्तरीय साहित्यिक पुस्तक; जइसे- जय बंगला ( लघु काव्य ), सुदिन ( प्रगतिशील गीत संग्रह ), पँखुरी भइल हजार ( बरवै संग्रह ), लीला ई श्री राम-स्याम के ( गीत रूपक ), भोजपुरी भूँई (कविता संग्रह), अनसाइल राग ( कविता संग्रह ), पतिआत ना केहू ( गजल संग्रह ), गाँव बारहो मास में ( गीत संग्रह ), कौशिकायन ( प्रबंध काव्य ), सेवकायन ( प्रबंध काव्य ), बेटा के नइहर ( ललित निबंध ), घर के गूर ( निबंध संग्रह ), डागा बाज गइल ( कहानी संग्रह ), गइल घर ( उपन्यास ) आदि।

विद्यार्थी जी से आमने-सामने होके सुने आ सुनावे के पूरहर मोका अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के मुबारकपुर अधिवेशन में मिलल। उहाँ का खूब खुल के मिलनीं-बतिअवनीं आ अपना भोजपुरी सेवा पर खुल के बात रखनीं। उहां के अनुसार उनका ऊपर भिखारी ठाकुर, रघुवंश नारायण सिंह, शिवपूजन सहाय, नर्मदेश्वर सहाय, त्रिलोचन शास्त्री, जगन्नाथ, डॉ. अनिल कुमार आंजनेय, प्रोफेसर ब्रजकिशोर आदि साहित्यकार लोग के बहुत प्रभाव पड़ल रहे। उहां के साहित्य के जवन विधा जेकरा से सिखनीं भा प्रभावित हो के लिखनीं ओह विधा के संग्रह ओही व्यक्तित्व के समर्पित कइनीं; जइसे- भोजपुरी गजल संग्रह ' पतिआत ना केहू ' जगन्नाथ जी के, बरवै संग्रह ' पँखुरी भइल हजार ' त्रिलोचन शास्त्री के, कविता संग्रह  'भोजपुरी भूँइ ' रघुवंश नारायण सिंह के,  निबंध संग्रह ' घर के गूर ' डॉ. अनिल कुमार आंजनेय के, कहानी संग्रह ' डागा बाज गइल ' प्रो. ब्रजकिशोर के आदि आदि।

‌    विद्यार्थी जी के अनुसार उहां का बचपने से भारी नचदेखवा रहीं। जवार में कहीं भी भिखारी ठाकुर के नाच आवे त उहां का चोरा-छुपाके जरूर देखे जाईं। ओह घरी बड़ घर का लरिका-फरिका के नाच-नवटंकी देखे के मनाही रहे। काहे कि भिखारी ठाकुर आ आउर-आउर नाच मंडली वालन का नाच-पाठ में जगह-जगह पर बेपर्दा के अश्लील संवाद आ बात होखत रहे जवन छोट छोट लरिकन पर खराब प्रभाव डाल सकत रहे। बाकिर विद्यार्थी जी मानस ना। चोरा-छुपा देखबे करस। धीरे-धीरे उनका भिखारी ठाकुर से हेल-मेल हो गइल। हेले-मेल ना भइल ऊ भिखारी ठाकुर आ उनका पाठ-नाटक के विशेषज्ञ जानकार हो गइलन। अइसन मानल जाला कि भिखारी ठाकुर के सही जानकार दूइए लोग रहे- एगो महेश्वर प्रसाद मतलब महेश्वराचार्य आ दोसर अविनाश चंद्र विद्यार्थी। एकर सबूत बा उनका संपादन में प्रकाशित भिखारी ठाकुर ग्रंथावली।

‌विद्यार्थी जी अपना गीत-गजलन आ कवितन तत्कालीन सामाजिक आ राजनीतिक विद्रूपतन आ विसंगतियों पर चोट करे से भी परहेज नइखीं कइले। उनका गीत के एगो कड़ी एकर नमूना बा –

' हमरा आम के बगइचवा में उगि रहल बबूर।

  किन के कलम मँगवलीं,

पाँति नापी के लगवलीं,

        राते दिन अगोरीं केतने

        सांढ़ भइंसवा भगवलीं,

    देवता डारी देले डेरा, डाढ़ पर चढ़ल लंगूर।।'

बाकिर नरियर जइसन ऊपर से कठोर आ भीतर कोमल हृदय के विद्यार्थी जी घोर आशावादी साहित्यकार रहीं। उहें के दू पाँति कहके बानी के बिराम देब-

 ' हमरा बा भरोस रतिया ई पराई मितवा।

  तनिका देर भा सबेर दिनवा आई मितवा।। '

 

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