युद्ध के विरूद्ध खड़ा होखे भारत

युद्ध के विरूद्ध खड़ा होखे भारत

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Posted: April 27, 2022
Category: सुनीं सभे
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आर.के. सिन्हा

रूस के हमला से तार-तार हो रहल यूक्रेन से आ रहल खबर अउर तस्वीरन के देख के कवनों भी संवेदनशील व्यक्ति के दिल दहल सकsता। रूसी सेना लगातार हमला बोल रहल बा। एसे जान-माल के बड़ स्तर पर तबाही हो रहल बा। बम वर्षा से मानवता मर रहल बा। विश्व बिरादरी के तमाम अपील से बेरपवाह रूस, यूक्रेन पर हल्ला बोल रहल बा। काहे ना कवनों भी मसला के हल वार्ता से निकलता। अगर बातचीत के बाद हल नइखे निकलत त समझ लीं दूनू में से कवनों पक्ष शांति अउर अमन के लेके गंभीर नइखे। उ लोग दुनिया के हर अहम शहरन में बनल ओ कब्रिस्तानन के नइखे देखले जहां पर पहिला, दूसरा विश्वयुद्ध चाहे फेर कवनों अन्य जंग के शहीद चिर निद्रा में बा। पिछला 100-125 साल में विभिन्न जंग में करोड़न लोग के जान गइल बा। आखिर केहू के का मिल गइल एतना लोग के मार देहला के बाद भी। युद्ध के विरूद्ध साहिर लुधियानवी के कालजयी नज्म के कुछ हिस्सा के पढ़ लीं-

“ख़ून अपना हो या पराया हो, नस्ल-ए-आदम का ख़ून है/ आख़िर जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में, अम्न-ए-आलम का ख़ून है/ आख़िर बम घरों पर गिरें कि सरहद पर, रूह-ए-तामीर ज़ख़्म खाती है।”

बेशक, जंग के विचार पर एतना करारा हमला शायद ही कवनों दोसर लेखक कइले होखे।

अगर रउआ राजधानी में रह रहल बानीं त रउआ धौलाकुआं के करीब दिल्ली वार सिमिट्री में जरूर जाए के चाहीं। इहवाँ चौतरफा हरियाली के बीच पहिला आ दूसरा विश्वयुद्ध के योद्धा चिरनिद्रा में बा लोग। ई कब्रिस्तान एगो हरा-भरा मैदान के जइसन लागेला, जेमे कुछ भाग में क्रम से योद्धा लोग के कब्र बा। ये कब्रन पर संगमरमर के पत्थर पर युद्ध में प्राण के आहुति देवे वाला सैनिक सबके संक्षिप्त परिचय मिलेला।

ये सब शहीद लोग के आयु के पढ़ के मन उदास हो जाला। ई लोग 22 से 25 साल तक के बा। जरा सोंची कि युद्ध के विभीषिका के कारण भरल जवानी में ई सब जान गंवा बइठल। इनकर भी माता-पिता होइहें, इनकर भी भाई-बहन अउर आपन करीबी लोग होई। दिल्ली वार सिमिट्री में 1951 में इलाहाबाद, कानपुर, देहरादून आ लखनऊ से कब्रन के अवशेष इहाँ पर ले आइल गइल रहे। ई सभे प्रथम विश्व युद्ध के शहीद रहे। एने ग्यारह सौ से अधिक कब्र बा। ई कब्रिस्तान बीच-बीच में आबाद हो जाला, जब इहाँ पर पर्यटक लोग के कवनों जत्था आ जाला। ई जत्था प्राय: ब्रिटेन, कनाडा चाहे अमेरिका के नागरिक के ही होला।

दिल्ली वार सिमिट्री में गोरखा रेजिमेंट से जुड़ल अंग्रेज सैनिक सबके भी समाधी बा। रउआ ये तरह के कब्रिस्तान भारत के कई शहरन के अलावा सिंगापुर, थाईलैंड वगैरह में भी मिल जाई। सिंगापुर के कब्रिस्तान में पंजाब रेजिमेंट के सैकड़न सिपाही लोग के कब्र बा, जे पहिला या दूसरा विश्वयुद्ध में शहीद भइल।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री पीएम बोरिस जॉनसन कह रहल बाड़ें कि रूस दूसरा विश्वयुद्ध के बाद यूरोप में सबसे बड़हन जंग के तैयारी कर रहल बा। येसे पहिले दुनिया दू गो विश्वयुद्ध झेल चुकल बा अउर ओ दूनू जंग में जेतना तबाही मचल रहे, उ तीसरा विश्वयुद्ध में मचे वाला कहीं विनाशकारी तबाही के भयानक तस्वीर देखा रहल बा। दूनू विश्वयुद्ध में दुनिया में ना सिर्फ करोड़न लोग के मौत भइल, बल्कि ज्यादातर देशन में भुखमरी, बेरोजगारी आ भारी महंगाई जइसन हालत बन गइल रहे।

समूचा दुनिया देख रहल बा कि यूक्रेन पर रूस के ताबड़तोड़ हमला से तबाही मच रहल बा। ये युद्ध आ तबाही के बीच यूक्रेन के आम नागरिक डरल-सहमल बाड़ें। हमला के वजह से टूटल-बिखरल घर अउर जगह-जगह लागल आग से बचत-भागत लोग दिखाई दे रहल बा। बुजुर्ग से लेकर बच्चन के बेबसी उनके भींजल आंख में साफ देखल जा सकेला। यानी यूक्रेन में स्थिति बेहद भयावह हो चुकल बा।

हम 1971 के युद्ध एगो पत्रकार के रूप में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) जाके कवर कइले रहीं। उहाँ हम युद्ध से भइल तबाही के अपना आँखी से देखले रहनीं। हजारन-लाखन बेकसूर इंसान शहीद भइल रहे आ असंख्य विकलांग। लाखन बंगाली बच्चियन अउर महिला सबके पाकिस्तानी सैनिक बलात्कार कइले रहे! हमनीं ओ युद्ध में विजयी त भइनी पर कवना कीमत पर। ओ जंग के अलावा भारत के 1948 आ 1965 में पाकिस्तान से अउर 1962 में चीन से जंग हो चुकल बा। कारगिल अउर श्रीलंका में भी भारतीय सेना के हजारन शूरवीर लोग देश खातिर आपन जान के नजराना पेश कइले बा। लेकिन, जरा ओ परिवार के बारे में भी सोचल जाय जेकरा परिवार के कवनों सदस्य जंग में शहीद होला

ये सब जंग में शहीद भइल जवान लोग के नाम इंडिया गेट में बनल राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में अंकित बा। इंडिया गेट त पहिले विश्वयुद्ध में शहीद भइल भारतीय सैनिक सबके याद में ही बनल रहे। इंडिया गेट के युद्ध स्मारक में ओ वीर लोग के नाम भी अंकित बा जे श्रीलंका में 1987 में भारतीय शांति रक्षा सेना (आईपीकेएफ) के हिस्सा रहे। ओ शहीद लोग में राजधानी के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज (यूसीएमएस) में पढ़ल मेजर (डॉ.) अश्वनी कान्वा भी रहले। उ भारतीय शांति रक्षा सेना (आईपीकेएफ) के साथ 1987 में जाफना, श्रीलंका गइल रहलन। उ 3 नवंबर, 1987 के अपना कैंप में घायल भारतीय सैनिक सबके इलाज में जुटल रहले। ओ मनहूस दिन शाम के वक्त उनका पता चलल कि हमरा कुछ जवानन पर कैंप के बाहर हीं हमला हो गइल बा। उ फौरन उहाँ पहुंचले। उ जब ओ लोग के फर्स्ट एड देत रहलन तब आसपास छिपके बइठल लिट्टे के आतंकी सब उनका पर गोली बरसा देहलस। उनका तीन गोली लागल। दोसरा के इलाज करे वाला के फर्स्ट एड देवे वाला कोई ना रहे।

काश, लिट्टे जेनेवा संधि के उल्लंघन ना कइले रहित त उ शहीद ना होखते। बेहद हैंडसम मेजर अश्वनी के शादी खातिर लड़की ढूंढल हीं जात रहे, जब उ शहीद भइले। उ कॉलेज के टॉपर रहले। ये उदाहरण के देहला के मकसद ई बा कि युद्ध में अनगिनत मासूम लोग भी मारल जाले। ई स्थिति बेहद चिन्तनीय बा।

बुद्ध और गांधी के देश भारत के रूस-यूक्रेन युद्ध के समाप्त करवावे के दिशा में सक्रिय पहल करे के होई। ये संकट से दुनिया के सबसे बड़हन लोकतंत्र भारत अछूता नइखे रह सकत। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बड़हन पहल करत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से फोन पर बातचीत कइले आ शांति के दिशा में कदम बढ़ावे के कहलन। मोदी अउर पुतिन के बीच करीब 20 मिनट तक बातचीत भइल। भारत के युद्ध के विरुद्ध माहौल बनावे के दिशा में त्वरित आ प्रभावी पहल करहीं के चाहीं।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)

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