जिंदगी युद्ध ना उत्सव ह

जिंदगी युद्ध ना उत्सव ह

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Posted: April 27, 2022
Category: संपादकीय
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हमनी के भीतर केतना युद्ध चलत बा,  कुछ पता बा रउआ ? श्वेत रक्त कणिका (WBC) होखे चाहे प्लेटलेट्स भा हमनी के पूरा के पूरा इम्यून सिस्टम, सब लड़हीं खातिर बनल बा। बाहर के बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आ बेमारी से देह लड़ते बा। देह के भीतर युद्ध चलते बा।

आ दिमाग! ....दिमाग के का कहल जाव!  एकरा में त देहियो ले बड़हन कुरुक्षेत्र बा। जगला त जगला, सुतलहूँ बेर सपनवो में दुनिया भर के युद्ध आ बुदबुदाहट। भले ई लड़ाई मैदान में नइखे होत, तबो मानसिक लड़ाई त चलिये रहल बा। वैज्ञानिक मान्यता के हिसाब से एकरो असर किडनी, लिवर आ सँउसे देह पर पड़ेला।

त देह में, दिमाग में लगातार युद्ध चलत बा। एह दूनू के प्रेम से पटवे के जरूरत बा, सींचे के जरूरत बा। कम से कम दिमाग के आग त प्रेमे के पानी से बुताला। बाकिर सगरो प्रेम के पोखरा सूखल जाता। एह लिक्विड के कम भइला से आदमी सनकल जाता। अधकपारी भइल जाता। फिजूल के बात पर लड़ जाता, युद्ध थोपा जाता। रूस आ यूक्रेन युद्ध एकर गवाह बा। अहंकार, इरिखा आ हम-हमिता के लड़ाई में हजारो लोग मर गइल। लाखो लोग उजड़ गइल।

केहू खुदे लड़ जाता। केहू केहू के ललकरला से लड़ जाता। पगलेटन के कमी थोड़े बा, अपनो देश में बाड़न स। हर गली-मोहल्ला में। भोजपुरियो समाज में, अफरात। केहू के नीचा देखावे खातिर केतनो नीचे गिर जाय खातिर गिरोह बान्ह के तइयार।

आ रउरा साथे समस्या ई बा कि रउरा रचब कि इन्हनी से अझुराइब! आपने एगो दोहा मन परत बा -

भावुक छोटे उम्र में एतना फइलल नाँव

कुकुरो पीछे पड़ गइल, कउओ कइलस काँव...

 

अच्छा त भाई, ईहो सोहागभाग! के कही कि कुकुरन के पाछा धाईं, कउअन के पाछा उधियाईं, बढ़िया बा कि आपने राह धइले जाईं!

कोरोना वायरस से लड़ाई त समझ में आवत बा। ई मानव प्रजाति पर हमला बा त लड़ला के सिवा दोसर कवनो चारा नइखे। हमनी के लड़बो कइनी जा आ जीतबो कइनी जा। ई एगो सार्थक लड़ाई रहल ह। बाकिर हई यूक्रेन आ रूस के युद्ध ?!

फिजूल बा फिजूल। दुनू देश कराहत बा आ बरिसन ले कराहत रही।

अभी त हमनी के सार्थक युद्ध के जरूरत बा। मनुष्य के अस्तित्व खातिर ....आ वृहत्तर अर्थ में प्राणी जगत के अस्तित्व खातिर।

धरती के छाती में पोरे-पोर जहर पसरल बा। एह से हमनी के जहरे उगावत बानी जा आ जहरे खात बानी जा। जैविक खेती क के धरती के छाती में अमृत भरे के बा आ अमृत उगावे के बा। ई एगो जरुरी लड़ाई बा।

ओजोन लेयर में छेद भइल जाता। वायु प्रदूषण एतना बा कि साँस लेत में जहरो भीतर जाता। त धरती प हरियरी बढ़ावे के बा। खूब पेड़-पौधा, झाड़ लगावे के बा। ई एगो जरूरी लड़ाई बा।

नदियन के पानी में कचड़ा बढ़ल जाता। ओकनी के सफाई एगो जरूरी लड़ाई बा।

अइसन कई गो अउर जरूरी लड़ाई अविलंब लड़ल जरूरी बा बाकिर हमनी के गैर जरूरी लड़ाई भा कुकुरहट में फँसल बानी जा।

पहिले आपन माटी, हवा, पानी, आग आ आकाश ठीक करे के जरूरत बा। एही से नू हमनी के बनल बानी जा!

बाकिर हमनी के आपन देखावा के मकान-दोकान सजावे में ढेर बीजी बानी जा। अगिला पल के पता नइखे बाकिर सात पुश्त खातिर जमा करे के फेर में लागल बानी जा।

पल-पल के जीये खातिर दिमाग में लागल आग बुतावे के पड़ी। दिमाग के आग प्रेम के पानी से बुताला। एह से हिंसा के जगह प्रेम के चुनाव जरूरी बा। प्रेम हमनी के प्रकृति ह। हिंसा के साथे, इरिखा आ डाह के साथे त हमनी के अप्राकृतिक हो जानी जा।

अगर विश्व के हर आदमी प्रेम से भर जाय त हई जवन युद्ध प खर्चा होता, बम-बारूद, सेना आ सुरक्षा प खर्चा होता उ बंद हो जाई। कोर्ट-कचहरी प खर्चा होता, उ बंद हो जाई। जवन बर-बेमारी प खर्चा होता बहुत हद तक उहो बंद हो जाई। साँच मानी, प्रेम बहुत सारा बेमारी के ईलाज ह। दुनिया में बहुत सारा लोग प्यार से गले ना लगवला के मारे, माने उपेक्षा से मर जाला। मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म देखले बानी नू। प्यार के झप्पी से ईलाज।

प्यार के झप्पी दिहीं महाराज, प्यार के झप्पी!

फागुन चलत बा। होली नियरा गइल बा। होली प्रेम के प्रतीक ह बाकिर रूस आ यूक्रेन में खून के होली होता। ई बंद होखे के चाहीं। दुश्मन के गाल प गुलाल रगड़े के रवायत शुरू होखे के चाहीं। नफरत के मवाद निकाल के प्रेम के मरहम लगावे के चाहीं।

तब जाके ई बात समझ में आई कि जिंदगी युद्ध ना उत्सव ह।

मनोज भावुक

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