नॉस्टेल्ज़िक होखे से बाँचल बाड़न रंजन विकास

February 13, 2023
पुस्तक समीक्षा
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पुस्तक- फेर ना भेंटाई ऊ पचरुखिया

लेखक- डॉ. रंजन विकास

विधा- आत्म-संस्मरण

प्रकाशक- सर्वभाषा ट्रस्ट, नयी दिल्ली

प्रकाशन वर्ष- 2022

पृष्ठ संख्या- 224

पेपर बैक, मूल्य- 250 रुपये

सज़िल्द – 400 रुपये  

03 फरवरी 1958 के बिहार के सीवान ज़िला में दरौली ब्लॉक के गौरी गाँव में पैदा भइल डॉ. रंजन विकास एगो ख़ुशहाल आ शिक्षित-साहित्यिक पारिवारिक पृष्ठभूमि से आवेलन। इहाँ के नानी के सगी बुआ श्रीमती राजवंशी देवी के बियाह देश के प्रथम राष्ट्रपति भारतरत्न डॉ.राजेन्द्र प्रसाद से भइल रहे। इन्हिकर नाना पाण्डेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह ख़ुद हिन्दी-भोजपुरी के लेखक रहलन अवरू मामा पाण्डेय कपिल भी भोजपुरी के जानल-मानल शख़्सियत रहल बाड़न। हम सन् 1980 के आसपास उन्हुकर नाना के एगो आत्मकथात्मक भोजपुरी उपन्यास ‘घर टोला गाँव’ पढ़ले रहीं। उहाँ के मामा पाण्डेय कपिल के भोजपुरी उपन्यास ‘फुलसुंघी’ भोजपुरी उपन्यास साहित्य में ‘मील के पत्थर’ मानल जाला जवन भोजपुरी में पूर्वी गाना के शीर्ष आ अत्यंत लोकप्रिय गीतकार अवरू स्वाधीनता सेनानी महेन्दर मिसिर के जीवन पर आधारित बा। एने हाले में हिन्दी में मशहूर कथाकार संजीवो के एगो उपन्यास महेन्दर मिसिर के जीवन पर आइल बा। पाण्डेय कपिल भोजपुरी के स्तरीय आ नामी पत्रिका ‘उरेह’ के संपादको रहल बाड़न। हमहूँ एह पत्रिका के पाठक रह चुकल बानी। डॉ.रंजन विकास के पिता शारदानंदन प्रसादो एगो आदर्श शिक्षक आ हिन्दी-भोजपुरी के साधक-साहित्यकार रहलन। उन्हुकर भोजपुरी में कविता-गीत, कहानी आ शोध के कुछ पुस्तक प्रकाशित बाड़ी स। डॉ.रंजन विकास हाल-फिलहाल में भारत सरकार के स्वास्थ्य आ परिवार कल्याण मंत्रालय में मूल्यांकन अधिकारी के पद से सेवानिवृत्ति के बाद पटना में रहि के फेरू साहित्य सेवा में जुट गइल बाड़न। ऊ एहघरी भोजपुरी के ई-लायब्रेरी ‘भोजपुरी साहित्यांगन’ के सह संचालको बाड़न। एकर संचालक उन्हुकर बड़ भाई श्री रंजन प्रकाश बाड़न। एकरा माध्यम से भोजपुरी के लगभग सभ विधन के कुल 900 से ज़्यादा पुस्तकन के अबतक डिजिटल मंच पर प्रस्तुत कइल जा चुकल बा। एह में कई गो दुर्लभ पुस्तक त नष्ट होखे के इस्थिति में रही स। विशेषकर भोजपुरी साहित्य के प्रति डॉ.रंजन विकास आ उन्हुकर पूरा परिवार के ई सेवा अन्यतम आ विरल कहल जा सकेला।

डॉ. रंजन विकास के हिन्दी में एगुड़ा काव्य संग्रह ‘थिगलियाँ कटी धूप की’ सन् 1995 में ही प्रकाशित हो चुकल बा। ऊ छात्र-जीवन में ही सन् 1983 में बिहार के कुछ युवा कवियन के एगो साझा संकलन ‘धरती से जुड़कर’ के संपादन कर चुकल बाड़न। एगो लमहर चुप्पी के बाद जब ऊ साहित्य सृजन के तरफ़ मुख़ातिब होखल बाड़न त ऊ आपन भावाभिव्यक्ति खातिर आपन मातृभाषा भोजपुरिए के चयन कइले बाड़न। साहित्य में ऊ गद्य शैली में आत्म संस्मरण विधा के अपनवले बाड़न। समीक्ष्य पुस्तक उन्हुकर आत्म संस्मरण ह। एकरा के स्मृति कथा, स्मृति आख्यान भा आत्मकथो कहल जा सकत बा। अपना भूमिका में रंजन विकास जी लिखत बाड़न कि ‘ एह पुस्तक के लिखे के प्रेरणा उनका भोजपुरी जंक्शन के यशस्वी संपादक मनोज भावुक से मिलल बा। एह पुस्तक में परिशिष्ट के शामिल कर लिहल जाई त कुल 17 गो अध्याय हो जाई। एह मए पुस्तक में लेखक डॉ. रंजन विकास जवना एगो जगह के केन्द्रीयता प्रदान कइले बाड़न, ऊ जगह पचरुखी अर्थात् पचरुखिया ह। ई सीवान ज़िला के एगो छोटहन क़स्बा ह जेहवाँ लेखक के बचपन बीतल बा आ उन्हुकर हाई स्कूल तक के पढ़ायी-लिखायी भइल बा। ईहे जगहिया उन्हुकर शिक्षक आ साहित्य-साधक पिता शारदानंदन प्रसाद के कर्मस्थलियो रहल बिया। ऊ पचरुखी के सामाजिक जीवन के बारे में बहुते तफ़सील में आ रोचक तरीका से बतवले बाड़न। ऊ पचरुखी अवरू ओकरा आसपास के गाँवन में फइलल आपन हितई-नतई के विवरणो देले बाड़न। ऊ आपन पैतृक गाँव गौरी, ननिहाल शीतलपुर, शीतलपुर बाज़ार आ सादिकपुर के बहुते आत्मीयता के साथ चर्चा कइले बाड़न। एह पुस्तक के पढ़त घरी ओह मए जवार-पथार (ग्रामीण क्षेत्र) के तत्कालीन पारिवारिक-सामाजिक स्थितियन आ भौगोलिक बनावट के बारे में जानल जा सकत बा। डॉ.रंजन विकास आपन स्मृतियन में पचास-साठ साल पीछे लौटत बाड़न अवरू ओहघरी के समय के शब्दन के ज़रिए जीवंत कइ देत बाड़न। ऊ बीच-बीच में आपन लेखकीय टिप्पणियन से वर्तमान की बदलत जात स्थितियनो के बोध करा देत बाड़न। एह तरह से ऊ ‘नॉस्टेल्जिक’ होखे से भी बाँचल रहत बाड़न। एह पुस्तक के पढ़त बेर हमनी सब के पता चलेला कि समय केतना तेज़ गति से बदलत रहल बा। लेखक आपन प्रिय जगहन पर एगो लमहर अंतराल के बाद वापस लौटत बा। ई केतना पीड़ादायी बा कि हमनी के रोज़ी-रोज़गार आ विकास के चक्कर में विस्थापित होनी जा अवरू देखते- देखत आपन प्रिय जगहन आ आपन आत्मीय लोगन से बहुत दूर हो जानी जा। हमार ई सोच बा भा मानना बा कि हर पढल-लिखल आदमी के आपन अनुभव आ मूल्यवान पारिवारिक-सामाजिक स्मृतियन के एही तरह से लिख के सहेजे के चाहीं। एकर एगो आपन अलहदा महत्वो बा। लेखक रंजन विकास के जीवन के गढ़े में पचरुखिया आ ओकरा आसपास के जवार-पथार के महत्व त बड़ले बा पटनो शहर उनका खातिर एगो केन्द्रीय जगह रहल बा। उन्हुकर शख़्सियत के बनावे भा रचे-गढ़े में में पटनो शहर के अहम योगदान बा।

उन्हुकर आत्म संस्मरण के ई पुस्तक बहुते सरल-सहज अवरू पारदर्शी भोजपुरी गद्य में लिखल गइल बा। एकरा के पढ़त बेर पाठक कठिनाई के अनुभव ना कर सकेला। हमनी के आपन पुरान सम्बन्ध, पुरान जगह आ ओह दौर के जीवनानुभव के दुबारा स्मृतियन के ज़रिए भाषा में संभव कइ सकत बानी जा; बाक़ी त लेखक पुस्तक के शीर्षके व्यंजक देले बाड़न- “फेर ना भेंटाई ऊ पचरुखिया !” हमरा एह शीर्षक भा मथेला के पढ़त बेर बार-बार हिन्दी कवि शमशेर के एगो कविता-“लौट आ, ओ धार” के किछु पंक्ति स्मृति में कौंधत रही स –” लौट आ, ओ फूल की पंखड़ी/फिर/फूल में लग जा/चूमता है धूल का फूल/कोई,हाय!” (रचना काल–1959)

एह पुस्तक के एगो सुंदर भूमिका साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी जी लिखले बानी। भूमिका के शीर्षक बा-“लोकसंस्कृति के जियतार झाँकी”। बहरहाल, रंजन विकास जी के एह भोजपुरी आत्मकथात्मक गद्यकृति खातिर बहुत-बहुत बधाई आ शुभकामना।   

परिचय- बक्सर, बिहार में जनमल आ लगभग चार दशक से लेखन में सक्रिय चंद्रेश्वर जी के अब तक हिन्दी-भोजपुरी में सात गो पुस्तक प्रकशित बाड़ी स। यूपी, बलरामपुर के एम.एल.के.पी.जी. कॉलेज से हिन्दी के प्रोफेसर आ अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्ति के बाद आजकल लखनऊ में रहि के लेखन कार्य कर रहल बानी।

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