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Hum BhojpuriaApril 19, 20211min8030

आर.के. सिन्हा

रतन टाटा के भारत-रत्न देवे के हाल में सोशल मीडिया में चलल कैंपेन अपने आप में अइसे त कतई गलत ना रहे। पर जे देश भर के रत्न होखे ओकरा भारत रत्न चाहे कोई दोसर पुरस्कार मिले या ना मिले, ओसे का फर्क पड़ता। उ त देश के नायक पहिलहीं से ही बाड़े। उनका के रउआ नायकन के नायक कह सकsतानी। जब रतन टाटा के भारत रत्न से सम्मानित करे के मांग जोर पकड़ल त रतन टाटा के खुद ही कहे के पड़ल कि ‘ऊ अपना प्रशंसक सबके भावना के कद्र करsतारे लेकिन अइसन कैंपेन के बंद करे के चाहीं। हम भारतीय भइला आ भारत के ग्रोथ अउर समृद्धि में योगदान करे में खुद के भाग्यशाली मानsतानी। जाहिर बा, ये तरह के बात कवनों शिखर शख्सियत ही कर सकsता। सामान्य कद के इंसान रतन टाटा के तरह के स्टैंड त नाहिंये ली। के ना जानेला कि बहुत से सफेदपोश हस्ती भी पद्म पुरस्कार पावे खातिर अनेक तरह के लाबिंग अउर कई समझौता करेला।

टाटा समूह के पुराण पुरुष जे.आर.डी. टाटा के 1993 में निधन के बाद रतन टाटा नमक से लेके स्टील अउर कार से लेके ट्रक आ इधर हाल के बरिस में आई टी सेक्टर में भी टाटा समूह के एक शानदार अउर अनुकरणीय नेतृत्व देले बाड़न। रतन टाटा के भारत हीं ना बल्कि सारा संसार के सबसे आदरणीय कॉरपोरेट लीड़रन में से एक मानल जाला। जे.आर.डी टाटा के संसार से विदा भइला के बाद शंका अउर आंशका जाहिर कइल जात रहे कि का उ जे.आर.डी के तरह के उच्चकोटि के नेतृत्व अपना समूह के देवे में सफल रहिहें?  इ सब शंका वाजिब भी रहे, काहे कि जे.आर.डी टाटा के व्यक्तित्व सच में बहुत बड़हन रहे। लेकिन ई त कहे के परी कि रतन टाटा अपने आपके सिद्ध करके दिखा दिहलन I अइसे त सब बिजनेस वैंचर के पहिलका लक्ष्य लाभ कमाइल हीं रहेला। एमे कुछ गलत भी नइखे। पर टाटा समूह के लाभ कमाए के साथ-साथ एक लक्ष्य सामाजिक सरोकार अउर देश के निर्माण में लागल रहल भी बा। ये मोर्चा पर कम से कम भारत के त कवनों भी बिजनेस घराना टाटा समूह के आगे पानी भरेsला। टाटा समूह के सारा देश एही खातिर आदर करेला कि उहाँ पर लाभ कमाइल ही लक्ष्य ना रहेला। रतन टाटा त अब टाटा समूह के चेयरमेन भी नइखन। उ चेयरमेन के पद टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस (टीसीएस) के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के सौंप देले बाड़े। उनका में प्रतिभा के पहचाने के कमाल के कला बा। उ सही पेशेवरन के सही जगह काम पर लगावेले। उनका एकर अभूतपूर्व नतीजा भी मिलेला। रतन टाटा एन. चंद्रशेखरन के बड़हन जिम्मेदारी देते समय ई ना देखलन कि उ कवनों नामवर अंग्रेजी माध्यम के स्कूल या कॉलेज में नइखन पढ़ले। रतन टाटा ई देखलन कि चंद्रशेखरन के सरपरस्ती में टीसीएस लगातार बुलन्दी के छू रहल बा। एही से उ टाटा समूह के इतिहास में पहिलका बार टाटा समूह के चेयरमैन एक गैर-टाटा परिवार से जुड़ल गैर-पारसी व्यक्ति के बनवलन। ये तरह के फैसला कवनों दूरदृष्टि रखे वाला शख्स ही कर सकsता। चंद्रशेखरन आपन स्कूली शिक्षा अपना मातृभाषा तमिल में ग्रहण कइले रहलन। उ स्कूल के बाद इंजीनियरिंग के डिग्री रीजनल इंजीनयरिंग कालेज (आरईसी), त्रिचि से हासिल कइलन। चंद्रशेखरन के टाटा समूह के चेयरमेन बनला से इहो साफ हो गइल कि तमिल या कवनों भारतीय भाषा से स्कूली शिक्षा लेवे वाला विद्यार्थी भी आगे चल के कॉरपोरेट संसार के शिखर पर जा सकsता। ऊ भी अपना हिस्सा के आसमान छू सकsता।

अगर आज भारत के सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया सबसे खास शक्तियन में से एक मानsता आ भारत के आईटी सेक्टर 190 अरब डॉलर तक पहुंच गइल बा त एकर श्रेय़ कुछ हद तक त रउआ रतन टाटा के भी देवे के होई। रतन टाटा में ई गुण त अदभुत बा कि उ अपना कवनों भी कम्पनी के सीईओ के काम में दखल ना देले। ओ लोग के पूरा आजादी देले कि उ कंपनी के अपना बुद्धि आ विवेक से आगे ले जाय। उ अपने सीईओज के छूट देले काम करे के। हालांकि उनका पर पैनी नजर भी रखस। ओ सबके समय-समय पर सलाह-मशविरा भी देत रहले। ये पॉजिटिव स्थिति में ही उनके समूह के कम्पनी सब दोसरा से आगे निकलेला।

रउआ कह सकsतानी कि जेआरडी टाटा के तरह रतन टाटा पर भी ईश्वरीय कृपा रहे कि उ चुन-चुन के एक से बढ़ के एक मैनेजर के अपना साथे जोड़ सकले। एही खातिर टाटा समूह से एन. चंद्रशेखरन (टीसीएस), अजित केरकर (ताज होटल),  ननी पालकीवाला (एसीसी सीमेंट), रूसी मोदी (टाटा स्टील) वगैरह जुड़ले। ई सब अपने आप में बड़े ब्रांड रहलन। रतन टाटा के पास अगर प्रमोटर के दूरदृष्टि ना रहल रहित आ उ अपना सीईओ पर भरोसा ना करते त फेर बड़हन सफलता के उम्मीद कइल ही व्यर्थ रहे। टाटा अपना सीईओज के आपन विजन बता देले। फिर काम होला सीईओ के कि उ ओ विजन के अमली जामा पहनावस आ ओकरो से भी आगे जाये के सोचे।

अगर रतन टाटा के सम्मान सारा देश करsता त एकरा पीछे उनकर बेदाग शख्सियत बा। इयाद करीं पिछला साल जनवरी में मुंबई में आयोजित एगो कार्यक्रम में रतन टाटा के इंफोसिस समूह के फाउंडर एम. नारायणमूर्ति चरण स्पर्श करके आशीवार्द लेत रहले। रतन टाटा आ नारायणमूर्ति के बीच 9 साल के अंतर बा। मूर्ति टाटा से 9 साल छोट बाड़न, लेकिन नारायणमूर्ति भी माने लन कि उपलब्धियन के स्तर पर रतन टाटा उनका से ढेर आगे बाड़े।

दरअसल रतन टाटा के संबंध भारत के ओ परिवार से बा, जवन आधुनिक भारत में औद्योगीकरण के नींव रखलस। ई मान लीं कि बिल गेट्स आ रतन टाटा जइसन कॉरपोरेट लीडर रोज-रोज ना होखे। ई कवनों भी सम्मान या पुरस्कार के मोहताज नइखन। ये लोग से पीढ़ी प्रेरित होला। इनका सामने कवनों भी पुरस्कार या सम्मान बौना बा। ई सच में भारत के सौभाग्य बा कि रतन टाटा हमार हउअन आ हमरा बीच में अभी भी सक्रिय बाड़े। उनकर हमनीं के बीच रहल ही बहुत सुकून देला।

( लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं. )


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Hum BhojpuriaApril 19, 20211min9130

संपादक- मनोज भावुक

परसाल होली पनछुछुर रहे काहे कि भारत में कोरोना वायरस के मामला रफ़्तार पकड़ल शुरू क देले रहे। लोग डेराइल शुरू क देले रहे।  ओकरा बाद स्कूल-कॉलेज बंद भइल, अंतरराष्ट्रीय उड़ान पर रोक लागल आ ओकरा बाद त मिललो-जुलला प रोक लाग गइल। लाग गइल लॉकडाउन आ सोशल एनीमल सोशल डिस्टेंसिंग के पालन करे लागल।

केतना राउंड के लॉकडाउन से गुजरत साल गुजरल। नया साल लागते कोरोना के टीका आइल। ख़ुशी के लहर दउड़ल कि मिल गइल संजीवनी बूटी। मिल गइल कवच-कुण्डल। बाकिर, आहि दादा.. कादो, कोरोना के दूसरा लहर चल देले बा। आ गइल बा। होली आवते फेरु आ गइल। कोरोनवा के का जाने होली से कवन बैर बा। होली रंग के त्यौहार ह आ ई रंगे में भंग करsता।

खैर, कई जगह लॉकडाउन लगा दिहल गइल बा। टीकाकरण अभियानो तेजी पकड़ले बा। नाक से नीचे मास्क पहिने आ सट-सट के बतियावे वाला लोग अलर्ट हो गइल बा। सरकारो से अलर्ट पर अलर्ट जारी होता। डॉक्टर लोग कहsता कि हमनी के पुरनका अनुभव से सीखे के चाहीं आ सभा-समारोह में जाके  सुपरस्प्रेडर बने से बचे के चाहीं।

अब लइका-बच्चा, स्कूलिहा-कवलेजिया होली के हुडदंग खातिर जवन योजना बनवले रहलें हं, उ त फेल होइये गइल। जीजो-साली आ देवर-भौजाई के प्लानिंग पर पानी फिरल। चनेसर च्चा बेसिये टेंसनिआइल बाड़े। होली मिले-जुले के त्यौहार ह आ मिललके-जुललका पर रोक बा। पतझड़ के बाद बसंत आवेला आ बसंत के साथे फगुआ बाकिर इहाँ त बसंत के साथे फेर से पतझड़ आ गइल। कोरोना के ई दुसरका लहर सब उत्साह आ उमंग के हरियरी चर गइल बा। बुझाते नइखे कि फगुनाहट ह कि कोरोनाहट। टिभियो पर त फाग से बेसी कोरोना राग सुनाता।

हालाँकि बंगाल में कोरोना राग से बेसी चुनावी राग बा। उहाँ त बुझाता कोरोनवा आत्महत्या कर लेले बा। उहवें ना जहाँ-जहाँ इलेक्शन होला, कोरोना उहाँ ना फटके। त हम कंफ्यूज हो जानी कि कोरोना के भगावे खातिर वैक्सीनेशन जरुरी बा कि इलेक्शन!

खैर, भोजपुरी जंक्शन में पूरा के पूरा फाग राग बा। एह अंक पर कोरोना-सोरोना के कवनो असर नइखे। ई कम्पलीट फगुआ विशेषांक बा। 5 दर्जन कवि लोग के होली गीत, भोजपुरी के साथे ब्रज के भी तड़का, बसंत के अइला से लेके फगुआ के बदलत रूप पर बात, बॉलीवुड आ भोजीवुड के फगुआ के गीत-संगीत पर चर्चा, होली-रस आ होलियाना संस्मरण के साथे अंत में इहो कि ‘’ भउजी देह अंइठली अउरी फागुन आय गइल ‘’ तक सब रस, सब रंग मतलब होली के फुल पैकेज। अब कोरोना काल में पढ़े पर त रोक बा ना, पढ़ीं आ आनंद लीं। इहो होली खातिर दस्तावेजे बा।



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