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Hum BhojpuriaMarch 9, 20211min6820
संपादक- मनोज भावुक
3 मार्च ह आज। दिन बुधवार ह। आजे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद दिल्ली के RR हॉस्पिटल में कोरोना वैक्सीन के पहिला डोज लेले हं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन, बिहार के मुख्यमंत्री नतीश कुमार, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक आ केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद समेत कई गो नेता लोग अब तक टीका लगवा चुकल बा।
भारत में कोविड वैक्सीनेशन के दूसरा चरण एक मार्च से शुरू भइल ह। पहिला चरण के शुरुआत 16 जनवरी 2021 से भइल रहे। पहिला चरण में स्वास्थ्यकर्मियन यानी डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिक्स आ स्वास्थ्य से जुड़ल लोग के साथही फ़्रंटलाइन वर्कर्स यानी पुलिसकर्मियन, पैरामिलिट्री फ़ोर्सेज आ सैन्यकर्मियन के भी टीका लगावल गइल। दूसरा चरण में 60 साल से ज़्यादा उम्र वाला लोग आ कवनो गंभीर बीमारी से जूझ रहल 45 साल से अधिक उम्र के लोग के वैक्सीन दीहल जाता।
भारत में कोविड-19 से बचाव खातिर दू गो वैक्सीन लगावल जा रहल बा, जेकरा के ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया (डीसीजीआई) अनुमति देले बा। ई दूनू वैक्सीन बा- कोविशील्ड और कोवैक्सीन। कोविशील्ड जहां असल में ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका के संस्करण बा उहवें कोवैक्सीन पूरा तरह से भारत के आपन वैक्सीन बा जेकरा के ‘स्वदेशी वैक्सीन’ भी कहल जा रहल बा। कोविशील्ड के भारत में सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया कंपनी बनवले बा। उहवें, कोवैक्सीन के हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक कंपनी आ इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) मिलके बनवले बा।
वैक्सीन के अइला से लोग में कोरोना के खौफ़ भलहीं कम भइल बा बाकिर कोरोना के आग अभी बुताइल नइखे। देश में कोरोना के मामला लगातार बढ़ते जा रहल बा। एहू में महाराष्ट्र के हालात सबसे ख़राब बा। बुझ जाईं जे इहाँ पिछला 24 घंटा में रिकॉर्ड 9855 कोरोना के मामला सामने आइल बा। ई आंकड़ा पिछला 136 दिन में सबसे ज्यादा बा। एकरा पहिले इहाँ 18 अक्टूबर के 9060 मामला रहे।
अब तक देश में 1 करोड़ 11 लाख 39 हजार से ज्यादा लोग संक्रमण के चपेट में आ चुकल बाड़न, जवना में 1 करोड़ 8 लाख लोग ठीको हो चुकल बाड़न, जबकि 1 लाख 57 हजार 385 मरीजन के मौत हो गइल। 1 लाख 67 हजार 183 मरीज के अभी इलाज चलता। ई डेटा हम डेरवावे खातिर ना, सचेत रहे खातिर आ सावधानी बरते खातिर दे तानी।
पिछला साल मार्चे में कोरोना के चलते लॉकडाउन के सिलसिला शुरू भइल। आदमी जे सोशल रहे, सोशल डिस्टेंसिंग बनावे लागल। लोग कंगारू लेखां लइका-बच्चा के करेजा से सटले मुंबई-दिल्ली से पैदले गाँवे भागे लागल। मुँह प जाबी (मास्क) लगा के जरूरतमंद के पूड़ी-तरकारी बँटाये लागल। जे जहाँ फँसल ओही जी भगवान के गोहरावे लागल। गाय अलगे हँकरsतिया, बछरू अलगे। रोज़ी-रोजगार गइल। चैन-सुख गइल। सगरो दहशत पसरे लागल।
तब बहुत लोग अपना इम्यून सिस्टम के साथे अपना मनो के मजबूत कइलस। समय देके अपना रिश्ता के मजबूत कइलस। गाँव-घर के महत्व समझलस। एह में वर्क फ्रॉम होम के सफल प्रयोग भइल। वर्चुअल सेट प कई गो इजाद भइल। नया-नया चैनल खुलल। लइकन के पढ़ाई-लिखाई सब वर्चुअल सेट प।
जब उथल-पुथल होला त कुछ ना कुछ नया होला। कोरोनो काल में भइल। कोरोना काल काल बन के आइल। एह महामारी के विश्वयुद्ध से भयंकर त्रासदी बतावल गइल। लोग-बाग़ तरह-तरह के अनुभव से गुजरल आ ओकरा के लिखल। भोजपुरी जंक्शन ओही लिखलका के एगो संग्रह के रूप में प्रस्तुत करत बा ताकि सनद रहे।
कोरोना काल में लगभग हरेक अंक में कोरोना पर कुछ ना कुछ छपत रहल- आलेख के रूप में, रिपोर्ट के रूप में, हास्य-व्यंग्य के रूप में, सुझाव-सलाह के रूप में, समीक्षा के रूप में, गीत-ग़ज़ल, कविता के रूप में, स्थायी स्तम्भ सुनीं सभे भा संपादकीय का रूप में। हर महिना में कोरोना के अलग-अलग मिजाज रहल आ ओही हिसाब से ओकर असर रहल।
ओह मिजाज आ असर के सहेज के हम एगो सौगात के रूप में ई अंक रउरा लोग के सउंपत बानी, आवे वाला पीढ़ी के ई बतावे खातिर कि हिम्मत, धीरज आ बुद्धिमानी से मुश्किल से मुश्किल समय के पार कइल जा सकेला।

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Hum BhojpuriaFebruary 15, 20211min8520

संपादक- मनोज भावुक

भोजपुरी जंक्शन (हम भोजपुरिआ) के प्रकाशन के एक साल पूरा हो गइल।

ई चौबीसवां अंक ह, जवना में चौदह अंक ‘’ हम भोजपुरिआ ‘’ के नाम से निकलल आ ओकरा बाद एह पाक्षिक पत्रिका के नाम हो गइल- ‘’ भोजपुरी जंक्शन ’’। भोजपुरी जंक्शन के ई दसवां अंक ह।

एह पत्रिका के शुरुआत ‘’ महात्मा गाँधी विशेषांक ’’ से भइल अउर ई चौबीसवां अंक भी  गांधियेजी के समर्पित बा। बीचो में एगो अंक गाँधी जी पर निकलल रहे। एह तरह से चौबीस अंक में से तीन गो अंक त गांधियेजी पर बा। बाकी 21 गो अंक में बसंत विशेषांक, फगुआ विशेषांक, चइता विशेषांक, भगवान राम पर दू गो विशेषांक, कोरोना पर तीन गो विशेषांक, चीन के विरुद्ध मुहीम पर विशेषांक, वीर कुँवर सिंह विशेषांक, देशभक्ति विशेषांक, सिनेमा विशेषांक, दशहरा विशेषांक, गिरमिटिया विशेषांक, दियरी-बाती अउर छठ विशेषांक, डॉ. राजेंद्र प्रसाद विशेषांक अउर सम-सामयिक घटनन से लबरेज कई गो सामान्यो अंक बा। एह सब अंक में किसान, जवान आ विज्ञान सबकर जिक्र बा। भोजपुरी के गौरव जइसन स्तम्भ में धारावाहिक रूप में भोजपुरी के दिवंगत साहित्य सेवी के बात होता, ताकि नया पीढ़ी ई जान सके कि भोजपुरी में केतना-केतना काम भइल बा। केतना लोग अपना जिनगी के होम कइले बा। नयका सिनेमा के साथे पुरनको सिनेमा के बात होता ताकि नया पीढ़ी ई जान सके कि भोजपुरी सिनेमा के इतिहास केतना गौरवशाली रहल बा।

हम शुरुवे में ई वादा कइले रहनी कि ई पत्रिका समय के राग के साथे अपना गौरवशाली परंपरा के लेके चली। करेंट अफेयर्स के साथे अपना जड़ से जुडल रही। एह से देश-विदेश में जवन होता, ओकरा साथे-साथ भोजपुरी साहित्य, सिनेमा आ लोक में जवन काम हो चुकल बा, ओहू सब के समेटे-सहेजे-जोगावे आ नया पीढ़ी से रुबरु करावे के काम ई पत्रिका कर रहल बिया।

राउर पाती स्तम्भ के बहाने जवन रउरा सब के स्नेह-सुझाव आ प्रोत्साहन मिलेला, ऊ ऊर्जा से भर देला अउर काम कइला के एगो अलगे संतोष-सुख मिलेला।

कोरोना संकट अउर तमाम प्रतिकूल परिस्थिति के बावजूद हमनी के हमेशा ई कोशिश रहल कि गुणवत्ता बनल रहो। कुछ नया, अनोखा आ संग्रहणीय सामग्री हीं रउरा सब के परोसल जाय आ एह में सफलतो मिलल।

पत्रिका में भारत के अलावा सात समुन्दर पार के भोजपुरी लेखक लोग के भी सहयोग मिलल।  स्थापित साहित्यकार लोग के साथे-साथ टेलीविजन अउर प्रिंट मिडिया के मुख्य धारा में कार्यरत साथी लोग के भी सक्रिय सहयोग मिलल। साँच कहीं त एही साथी-संघाती लोग के बल पर हमार नज़र सड़क से संसद ले, गाँव से मेट्रो आ सात समुन्दर पार ले, मकई के लावा से पॉपकॉर्न ले, माड़ से राइस सूप ले रहल।

दरअसल भोजपुरी के ओकरा भदेसपन आ इंटेलेक्ट दुनों खातिर समग्रता में देखल जाए के चाहीं।

हम त देखते बानी रउरो आँख से, अपनो आँख से। 8वीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल कइल जाए खातिर जवन लॉलीपॉप दीहल गइल भा दीहल जात रहल बा, ओकरा के लेके खीस बरल त ई शेर भइल कि –

बात प बात होता, बात ओराते नइखे / कवनो दिक्कत के समाधान भेंटाते नइखे

भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा / मर गइल बा का सुरुज, रात ई जाते नइखे

बाकिर हार माने के त सवाले नइखे। भोजपुरिआ लोग हमेशा से अपना जिजीविषा, कर्मठता, जुझारूपन आ लड़ाकू तेवर खातिर जानल गइल बा। हमरा दोसरा गजल में ई आशावादी शेर फूटल कि –

होखे अगर जो हिम्मत कुछुओ पहाड़ नइखे / मन में जो ठान लीं त कहँवा बहार नइखे

कहियो त भोर होई, कहियो छंटी कुहासा / भावुक ई मान ल तू, आगे अन्हार नइखे  

एही हौसला आ उम्मीद के साथे आगे बढ़े के बा।

रउरा सब के साथ-सहयोग के आकांक्षी

 


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Hum BhojpuriaJanuary 19, 20211min7700

संपादक- मनोज भावुक

भारत कृषि प्रधान देश ह बाकिर टू वन जा टू आ टू टू जा फ़ोर वाला जेनरेशन के ई पते नइखे कि गेहूँ आ धान के बाल में का अंतर बा। मुरई आ गाजर जमीन के ऊपर लटकेला कि नीचे।

भारत के आत्मा गाँव में बसेला आ भारत के भविष्य ‘यूथ’ शहर में।

कवनो बाप के मंजूरे नइखे कि ओकर बेटा गाँव में रहो आ खेती-किसानी सीखो। पढ़-लिख गइल बा त गाँव में रहल अउरो गुनाह बा।

त गाँव में के रही? जे बेकार बा, अनपढ़ बा, लाचार बा आ बेरोजगार बा।

त खेती के करी? जे बेकार बा, अनपढ़ बा, लाचार बा आ बेरोजगार बा।

जे समझदार बा, एजुकेटेड बा, टैलेंटेड बा उ नोकरी करी, बिजनेस करी बाकिर खेती ना करी। हमनी के देश के पहचान गाँव बा बाकिर गाँव में जीये-मरे वाला युवा के जल्दी हाड़े हरदी ना लागी. उ तिलकहरू लोग खातिर तरस के रह जाई।

सबका पता बा कि आदमी नोट ना खाई। खाई रोटिये। बाकी रोटी पैदा करे वाला सबसे बुरबक, सबसे गँवार, अंडरस्टीमेटेड …निकम्मा।

अद्भुत देश बा ई।

देश के राजधानी दिल्ली में किसान बिल के लेके लगभग डेढ़ महिना से आन्दोलन चलsता। टीवी प डिबेट चलsता। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचल बा। चारो तरफ खेती-खेती, किसानी-किसानी, किसान बिल के शोर सुनाई देता त हमार ध्यान शहर में भारी बस्ता के बोझ ढोवत लइकन प गइल ह। आपनो बचपन ईयाद आइल ह। जदि गाँव में ना रहल रहितीं त पते ना चलित कि घेंवड़ा छान्ही प फरेला आ कटहर गाछ पर।

मतलब एजुकेशन में खेती के लेके कवनो सीरियसनेस नइखे भले भारत कृषि प्रधान देश ह।

एजुकेशन, हेल्थ, राजनीति, सिनेमा, क्राइम सबके कवर करे वाला पत्रकार, अखबार आ टीवी पर कार्यक्रम देखले-सुनले बानी बाकिर ओह सीरियसनेस के साथ खेती के लेके कुछ नइखीं देखले भले भारत कृषि प्रधान देश ह।

शहर त शहर हम गाँव में भी युवा लोग के पोलिटिक्स, क्रिकेट, सिनेमा प गॉसिप भा बतकही भा डिबेट करत देखले-सुनले बानी बाकिर खेती प ना भले भारत कृषि प्रधान देश ह।

देश के आत्मा गांव में बसेला आ किसान के आत्मा दहार, सुखार, पाला भा कर्ज के सामना करत-करत फांसी के फंदा प भले भारत कृषि प्रधान देश ह।

साँचो, ई देश कृषि प्रधान ह। लोकतंत्र के मंदिर से हर साल बजट में कृषि खातिर करोड़ो-अरबो रुपया आवंटित कइल जाला बाकिर आजो गांव में लइका जवान भइल ना कि दिल्ली, सूरत, पंजाब, मुंबई जाये के तइयारी क लेला। काहे भाई ?

आज ले कृषि, एह कृषि प्रधान देश में प्रतिष्ठा के विषय काहे ना बन पावल ? कमाई के विषय काहे ना बन पावल ?

उत्तम खेती मध्यम बान। निषिद चाकरी, भीख निदान।। …. वाली कहावत कब आ काहे पलट गइल ?

काहे, हर दुआर से बैल गायब बाड़न स आ आदमी शहर में जाके कोल्हू के बैल बनल बा। कोरोना काल में ई लोग-बाग के सबसे बेसी एहसास भइल ह।

साथहीं शहर में जहर खात-खात ई एहसास भइल ह कि हमनी कि आपन खेतियो खराब कर लेले बानी जा। यूरिया आ पोटास छीट-छीट जहर उगावत बानी जा आ जहरे खात बानी जा।

बैल गायब त दुआर प गोबर वाला खाद गायब। भारतीय खेती गायब। जैविक खेती गायब,जवना में गोबर गौमूत्र के मिटटी में डलला से करोड़ो सूक्ष्म जीव के पेट भरे, मिट्टी के उर्वरा क्षमता बढ़े आ अमृत पैदा होखे। अब जाके धीरे-धीरे फेर लोग के आँख खुलता, जब छिहत्तर गो बेमारी धरे लागल बा।

उपज के मामला में ब्राजील दुनिया में सबसे अधिका अन्न उपजावे वाला देश बा त इजराइल अपना तकनीक के बल प कम जमीन में अधिका उपज वाला देश। हिंदुस्तान के भी प्रेरणा लेवे के होई। अधिक से अधिक टैलेंट के कृषि में झोंके के होई। एह कृषि प्रधान देश में तकनीक आ वैज्ञानिकता के सबसे बेसी अभाव कृषि के क्षेत्र में हीं बा।

कृषि आ पशुपालन एक दूसरा से जुड़ल बा। पहिले जब गाय बाछा बियात रहे त परिवार के बुझाव कि घर में एगो सवांग बढ़ गइल बा, बाकिर समय बदलल आ एह सवांग के उपयोगिता खतम होत गइल। ट्रैक्टर के चलन बढ़ल आ बैल के काम खतम हो गइल। नतीजा भइल कि खेत में खादर के बजाय, यूरिया-पोटाश झोंकाइल आ जिनिगी में जहर।

जिनगी में खुशहाली ले आवे के बा त खेती-किसानी के बारे में गंभीरता से सोचे के होई। जब ले किसानी सम्मान आ स्वाभिमान, आकर्षण आ जूनून के विषय ना बनी, ना खेत लहलहाई, ना जिनगी।


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Hum BhojpuriaJanuary 1, 20211min6180
संपादक- मनोज भावुक
साल 2020… मनुष्य के औकात बतवलस। चिरई-चूरूंग, कुक्कुर-बिलार अँगना-दुअरा फुदुकत-कुदुकत रहल आ मानुष मुँह प जाबी (मास्क) लगवले घर में दुबुकल। आदमी सामाजिक प्राणी ह बाकिर ओकरे सामाजिक दूरी बना के रहे के पड़ल, पड़sता आ आगे देखीं, कब ले ?…
अभियो अमिताभ बच्चन फोनवा प बोलते बाड़े – ” नमस्कार, हमारा देश और पूरा विश्व आज कोविड-19 की चुनौती का सामना कर रहा है। कोविड-19 अभी खत्म नहीं हुआ है, ऐसे में हमारा फर्ज है कि हम सतर्क रहें। इसलिए जब तक दवाई नहीं, तब तक कोई ढिलाई नहीं। ”
बच्चन साहेब के पहिले एगो जनाना बोलत रहे। ओकर बोलिया तनी मीठ लागत रहे। ई मर्दवा त पगला देले बाड़े। आदमी अपना काम में अझुरा के भुलाइयो जाता तले कवनो फोन अइला पर इनकर जबरिया कॉलर ट्यून कोरोना के ईयाद ताज़ा करा देता।
बाप रे बाप। ई कोरोना केतना लोग के नौकरी खइलस। केतना लोग के जिनगी। तबो नइखे अघात। तबो नइखे जात। कादो वैक्सीन खाई तबे जाई।
वैक्सीन के लेके तरह-तरह के कोशिश आ दावा त होते बा बाकिर अभी बहुत कुछ साफ़ नइखे… भारत में कोरोना वायरस वैक्सीन के परीक्षण अंतिम चरण में पहुंच चुकल बा आ वैक्सीन के उत्पादनो तेज़ी से हो रहल बा बाकिर ई आम आदमी तक आ ओकरा पॉकेट के पहुँच तक कब पहुंची, ई कहल अभी जल्दीबाजी होई। सरकार के कहनाम बा कि टीकाकरण एक महीना में शुरू हो सकsता। सीरम इंस्टीट्यूट कंपनी एस्ट्राजेनेका के साथ मिलके ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित वैक्सीन के उत्पादन कर रहल बा। ई टीका 70 से 90 प्रतिशत तक प्रभावी बतावल जाता।
खैर, हर बुरा समय के एगो सीमा होला। इहो जाई। जइबे करी।.. आ जब ई इतिहास हो जाई त पीछे पलट के हमनी के एह महामारी के देखब जा त बहुत कुछ लउकी।
लउकी उ काफिला जवना में मरद-मेहरारू लइका-बच्चा के गोदी टंगले पैदले बम्बई से बिहार चल देले रहे। मास्क लगाके पूड़ी बाँटत लोग के फोटो त फेसबुक हर साल देखाई। लाश प भइल सियासत भी सिहरन पैदा करत रही। कादो, बुरा दौर के बाद आदमी जागेला आ ओकरा में मानवता लौटेला पर इहो ओतने साँच बा कि आदमी से हेहर-थेथर दोसर कवनो प्राणी नइखे। श्मशान घाट पर संवेदनशील भइल इन्सान घाट से बहरी निकलते संवेदनहीन होके तोर-मोर करत देखल गइल बाड़न।
खैर, साल 2020 जाता। 2021 आवsता। हमरा नइखे लागत कि कैलेण्डर बदलला से कुछ बदली भा बदलेला बाकिर हँ, दुख, परेशानी, दुर्घटना, ठेस, ठोकर, महामारी आदमी के या त मार देला या त माँज देला, तरास देला। तप के आदमी अउरो चमकेला, निखरेला आ ओकर जिनगी सोना बन जाला। अगर दुख बड़लो बा त दुखी भइला से कुछ होई ना। हम त इहे कहेब कि –
दुखो में ढूंढ लs ना राह भावुक सुख से जीये के
दरद जब राग बन जाला त जिनिगी गीत लागेला
नया साल में बेहतर के उम्मीद कइल जाय. अपना गीत के एगो टुकड़ा से बात ख़तम करत बानी –
अखिल विश्व में सभे रहे खुशहाल
शुभ हो, मंगलमय हो नयका साल
भईया के मुँह से फूटे संगीत
भउजी के कंगना से खनके ताल
आवे रे आवे अइसन मधुमास
मरे कोरोना, टूटे ओकर साँस
जाये रे जाये कोरोना काल
शुभ हो, मंगलमय हो नयका साल

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Hum BhojpuriaDecember 15, 20201min7920

संपादक- मनोज भावुक

26 नवम्बर 1949 के भारत के संविधान बनके तइयार भइल, लागू भइल 26 जनवरी 1950 के। कादो, विश्व के सभ संविधान के अध्ययन कके व्यापक विचार-विमर्श के बाद भारतीय संविधान तइयार भइल। संविधान निर्माण खातिर संविधान के प्रारूप समिति के 141 गो बइठक भइल आ एह तरह से 2 बरिस 11 महिना 18 दिन लागल रहला के बाद एगो प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद आ 8 गो अनुसूची के संगे स्वतंत्र भारत के संविधान के मूल प्रारूप तइयार करे के काम पूरा भइल। हालाँकि एह 71 साल में एह में ढेर बदलावो कइल गइल। आज हमनी के संविधान में 12 अनुसूची सहित 400 से अधिक अनुच्छेद बा।

त अभिये 26 नवम्बर के पूरा देश में संविधान दिवस मनावल गइल ह। 2015 से हीं संविधान दिवस मनावल जाता। केंद्र सरकार वर्ष 2015 में गजट नोटिफिकेशन द्वारा 26 नवंबर के ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनावे के घोषणा कइलस, तब से। एकरा पहिले, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा वर्ष 1979 में एगो प्रस्ताव के बाद से ई दिन ‘राष्ट्रीय कानून दिवस’ (National Law Day) के रूप में मनावल जात रहे।

खैर, संविधान दिवस भा राष्ट्रीय कानून दिवस के शुभकामना देत अपना संविधान के ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर के ओह बतिया पर विशेष ध्यान चाहsतानी जवन अक्सर नजरंदाज होला।

“संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह अंततः बुरा साबित होगा, अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग बुरे होंगे” – डॉ भीमराव अंबेडकर

बात बहुत बड़ बा। बूझे के जरुरत बा।

अब एगो दोसर बात। 26 नवम्बर से सटले एगो अउर तिथि बा- 3 दिसम्बर। 3 दिसंबर 1884 के ओह महान छात्र के जन्म भइल जेकरा खातिर एग्जामिनर कहलस कि ‘The Examinee is better than Examiner.’ ..सादगी, सेवा, त्याग आ स्वतंत्रता आंदोलन में अपना आपके होम कर देवे वाला ओह महान देशभक्त के जनम भइल जेकरा के भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाज़ल गइल। जेकरा के पूरा देश प्यार से ‘देशरत्न’ कहल।

आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 के भारत के गणतंत्र राष्ट्र के दर्जा मिलला के साथ जे देश के राष्ट्रपति बनल, फेर साल 1957 में दुबारा राष्ट्रपति बनल, देश के एकमात्र नेता जे दू बार राष्ट्रपति बनल, 12 साल तक राष्ट्रपति रहल, ओह पुण्यात्मा के जन्मदिन ह 3 दिसम्बर।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद माने हमनी के इलाका के रजिंदर बाबू। जीरेदेई सिवान के नू हईं। खाँटी भोजपुरिया। कादो, अपना लोग से भोजपुरिये में बतिआईं अउर उहें के प्रेरणा से भोजपुरी में सिनेमा बनल शुरू भइल।

खैर, ई सब कथा-कहानी त जवन बा तवन बड़ले बा। असल बात ई बा कि बात भारतीय संविधान आ संविधान दिवस से शुरू भइल बा त ई जानल जरुरी बा कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद हीं  संविधान सभा के अध्यक्ष रहनी आ उहाँ के जवन 24 गो उप-समितियन के गठन कइले रहीं, ओही में से एगो ‘‘मसौदा कमेटी’’ के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर रहनी। अम्बेडकर साहेब के काम रहे 300 सदस्यीय संविधान सभा के सब चर्चा आ उप-समितियन के सब अनुशंसा के संकलित कके एगो मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार कइल, जवना के संविधान सभा के अध्यक्ष भइला के नाते रजिन्दरे बाबू स्वीकृत करत रहनी। तब उ ड्राफ्ट संविधान में शामिल होत रहे।

त भाई हो, तनी रजिन्दरो बाबू के योगदान के ओतने मन से ईयाद कइल जाय। हमरा विश्वास बा कि उहाँ के ईयाद कइला से, सच्चा मन से उहाँ के श्रद्धांजलि देला से, उहाँ के जीवन में आत्मसात कइला से राजनीति के आत्मा परिष्कृत होई आ देश, समाज के बेहतर दिशा मिली।


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Hum BhojpuriaNovember 18, 20201min8380

संपादक- मनोज भावुक

हमरा बुझाला जे छठी मईया के भोजपुरी गाना बहुत पसंद बा। उ हर अरज गीतवे में सुनबे करेली। घर से घाटे निकले से लेके, घाट पर भर पूजा चाहे घाट से लौट के कोशी भरे या फेर भोरे अरघ देवे तक उहे– तिले-तिले गीत। गायको लोग ई बात बुझ गइल बा। दे दनादन गीत। गीत के एतना प्रोडक्शन त अउर कबो ना होला। त छठी मईया के भाषा गद्य ना पद्य बा। पद्य में भी लोकगीत…लोकभाषा में…बिहार के भाषा में, भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका आ बज्जिका में। बा नू ? त ई कन्फर्म हो गइल कि छठी मईया बिहारी हई…बिहार के हई…लोक के हई…एह से छठ पूजा लोकपर्व ह…लोक के आस्था के महापर्व ह। एही से ऊ लोकभाषा में बतियावेली गा-गा के काहे कि लोक के बोले में भी एगो लय होला, लहरा होला, राग होला आ भाषा सरल-सहज होला, सोझ होला। लापिटाह ना होला, क्लिष्ट ना होला, संस्कृतनिष्ट ना होला।

जब संस्कृतनिष्ट ना होला त एह पूजा मे पंडीजी के कवनो जरुरत ना होला। अरघ कवनो छोट लइको दे देला। बाकी मंतर त मेहरारु खुदे गीत गा-गाके पढ़ देली सन। जइसन कि पहिलहीं   बतवनी ह कि छठी मईया संस्कृत वाला क्लिष्ट मंतरवा से बेसी भोजपुरी वाला भक्ति गीतवा पसंद करेली काहे कि उ आम आदमी के देवी हई। लोक के देवी हई। लोक के पूजा ह। लोक के भाषा बुझेली। एही से उनका इहाँ अमीरी-गरीबी के भेद नइखे। जात-पात के भेद नइखे। सभे एक्के घाट प एक्के साथे बइठ जाला। सस्ता पूजा बा। पंडीजी के फीस त देवे के नइखे। कवनो महंगा फल-फूल के दरकार नइखे। अनाज आ सीजनल फल से काम चल जाला।

बाकी देवता लो के लड्डू-पेड़ा चढ़ेला आ छठी मईया के?….दूघ, फल, घी, ऊंख, गागल नींबू, कच्चा हरदी, अमरख, आँवला, सुथनी, सिंघाड़ा …इहे नू चढ़ेला जी ?

बाकी देवी-देवता लो घर में पूजाला भा मंदिर में आ छठी मईया? नदी, पोखरा, झील, बीच, आइसलैंड, पैडलिंग पूल, स्वीमिंग पुल आ कहीं-कहीं त बाथटब में भी।

केतना एडजस्टेबल आ एक्सेप्टेबल बाड़ी छठी मईया। एक्सेप्टेबल त एतना कि ग्लोबल हो गइल बाड़ी। आरा से अमेरिका पहुँच गइल बाड़ी। बरवा तर के पोखरवा से सिलिकॉन वैली के क्वेरी झील पहुँच गइल बाड़ी। बाकी अंगरेज नइखी भइल। अपना मूल स्वरुप में बाड़ी। अमेरिको में घाट प रउरा ठेकुआ, नरियर, केरा, सूप, कलसूप, डलिया, दउरी-दउरा, दिया-दियरी, सेनुर-पियरी अइसे लउकी जइसे अमेरिका में बिहार समाइल बा।…आ सुरुज भगवान त सबकर एक्के बाड़े कहीं अरघ दीं। धरती नू बंटाइल बाड़ी, आदमी बंटाइल बा, ब्रम्हांड त एक्के बा, परमात्मा एक्के बाड़न। ..छठियो मईया इहे बतावेली।..बड़का-छोटका, अमीरी-गरीबी, ऊँच-नीच के भेद मिटा के सबका के एक्के घाट बरोबरी प बइठावेली आ कहेली कि रे कथी बंटाइल बा, काहे खातिर लड़त बाड़न स। लेकिन लोग त गावे में बा, गाना के मरम बूझे में थोड़े ? छठी मईया किहाँ त डूबत आ उगत सूरूज के भी भेद ना होला। दूनू पुजालें। एह बात के मरम बूझल आ ओकरा के जिनगी में उतारल हीं छठ पूजा बा। देवता लोग दुःख के थोड़े मार दी लो। हाँ, दुःख सहे आ झेले भा सुख-दुःख में समभाव रहे के ताकत दे दी लो। दुःख ख़तम होखे वाला रहित त देवता लो प दुःख कइसे आइत ?

चूकि छठ सूर्य उपासना के महापर्व ह त सुरुजे भगवान प एगो शेर से आपन बात ख़तम करत बानी –

सूरज से ताकतवाला के बाटे दुनिया में बाकिर                                     

धुंध, कुहासा, बदरी, गरहन उनको ऊपर आवेला

दुःख में भी इन्सान बनल रहीं। सुख में भी इन्सान बनल रहीं। इहे कहेली छठी मईया।

जै छठी मईया !


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Hum BhojpuriaNovember 11, 20201min10100

संपादक- मनोज भावुक

पहिलहूँ लिखले बानी। फेर कहsतानी। बिहार में का बा, यूपी में का बा, बम्बई में का बा, इण्डिया में का बा, उनका में का बा, इनका में का बा…. त ए जिनिगिये में का बा ??? .. आ जब कतहूँ कुछ हइलहीं नइखे तब हाय-हाय में का बा ?

हमनिये के पूर्वज जहवाँ कुछुओ ना रहे, उहाँ ई ना गवलें कि का बा ? का बा ? …. अपना श्रम आ जिजीविषा से ओकरा के स्वर्ग बना देलें- धरती के स्वर्ग- मॉरिशस।

सवाल उठावे में कवनो हर्जा नइखे। का बा आ का नइखे, अपना के अपडेट करे आ बेहतर बनावे खातिर ई जानल त जरुरिये बा बाकिर ई सुर खाली शिकाइत भा अवसाद, विषाद, फ्रस्ट्रेशन-डिप्रेशन, एंगर मतलब खीस-पीत के ना होखे के चाहीं। ई सब एसिड ह जवना बर्तन में रहेला ओकरे पेंदी गायब क देला फेर त जवन रहेला उहो ना रह पावेला, उहो रीत जाला, उहो बह जाला।

दुनिया में कुछ नइखे, सब माया ह भा संतोष करीं, ई सब कूल रहे खातिर कहल गइल बा, माथा के ठंढ़ा रखे खातिर ताकि दोसरा के बढंती देख के जरनियहपन ना होखे। दोसरा के मरद के चौड़ा छाती देख के आपन छाती पीटे वाली जनाना जइसन हालत ना होखे।

मर्द के दर्द ना होला के तर्ज पर मूल बात इहे बा लोर में डूब के मरीं मत ओकरा से बिजुरी पैदा करीं आ अँजोर करीं। आँसू बने अंगारे के माने इहे बा। दर्द से रास्ता खोजीं, दवा खोजीं, ईलाज खोजीं। ऊ ईलाज दुनिया के भी बताईं ताकि रउरा साथे सबका मन के कोरोना मरे। दर्द से कराह के मरीं मत। दर्द सृजन खातिर बनल बा। दर्दे से हमनी के जनम भइल बा। हमनी के माई करहले बिया, तड़पल बिया तब ओकरा मातृत्व के सुख मिलल बा आ हमनी के जिंदगी। दर्द से जिंदगी मिलेला। मुर्दा के दर्द होला ?  दर्द जिंदा रहला के एहसास ह।

गिरमिटिया लोग का कम दर्द में रहे। हमनी के काला पानी, काल कोठरी, यातना, जुल्म, गुलामी ई सब खाली सुनले बानी जा, उ लोग भोगले बा। सुनला आ भोगला में फरक होला कि ना ए चनेसर बाबू। ओतने होला जेतना सपना आ साँच में।

एह गिरमिटिया अंक में टुकड़ा-टुकड़ा में ओह लोग के दर्द के दास्तान बा। ई अंक (1-15 नवम्बर 2020) गिरमिटिया अंक एह से बा कि एही महीना में आज से 186 साल पहिले 2 नवम्बर 1834 के आपन पूर्वज लोग ( गिरमिटिया मजदूर) के पहिला खेप पोर्ट लुईस, मॉरिशस के अप्रवासी घाट पर पहुँचल। ओह लोग के ईयाद में, सम्मान में हर साल 2 नवम्बर मॉरिशस में राष्ट्रीय उत्सव के रूप में, आप्रवासी दिवस के रूप में मनावल जाला। जे गइल ओकर वंशज आज सत्ता पर काबिज बा, मॉरिशस, फिज़ी, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद-टोबैगो सब जगह। कहे के मतलब जहवाँ कुछुओ ना रहे आपन सरकार, आपन सत्ता बनल। जहाँ आदमी गुलाम बन के गइल सत्त्ताधारी बन गइल, मजदूर बन के गइल मालिक बन गइल, गिरमिटिया बन के गइल गवर्नमेंट बन गइल।

त का बा ? …  कुछ नइखे आ बहुत कुछ बा। आधा गिलास भरल बा आ आधा खाली बा वाला चश्मा ठीक रखे के बा। जिंदगी जंग बा त लड़े के पड़ी, जहर बा त पीये के पड़ी मूये खातिर ना, जिए खातिर, सुते खातिर ना जागे खातिर।

अपना एगो शेर से बात ओरवावत बानी।

हर कदम जीये-मरे के बा इहाँ / साँस जब ले बा लड़े के बा इहाँ

बाकिर सतर्क होके लड़े के बा –

फूल में तक्षक के संशय हर घरी / अब त खुशबू से डरे के बा इहाँ

अँगरेजवा गिरमिटिया लोग खातिर तक्षके नू रहलन स। सोना के लालच देके सोना जइसन जिनिगी बर्बाद कइलन स बाकिर ओह बर्बादी के राख पर दुनिया के बगइचा में मॉरिशस जइसन खूबसूरत फूल खिलल बा जवना के खुशबू से सउँसे दुनिया गमगमा रहल बा.

जमीन त्यागल बड़ बात ना ह, जमीन के साथ जवन रिश्ता बा ओकरा के त्यागल पीड़ादायक होला. ऊँख रोपे गइल लो. ओह लोग के अपना जिनगी के रस आ मिठास ख़तम हो गइल. ऊँख में रस भरे लागल, मिठास बढ़े लागल, मॉरिशस लहलहा गइल.

ई गिरमिटिया अंक सउँपत बानी ई ईयाद दियावे खातिर कि सियाह रात के सोनहुला भोर होला आ गिरमिटिया से बेहतर एकर दोसर उदहारण ना मिली


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Hum BhojpuriaOctober 23, 20201min9240

संपादक- मनोज भावुक

एगो त घर में तनाव बा। बाहर कुक्कुर बोलsतारs सन। इन्हनीं के टेंशन त देलहीं बाड़न स, तवना में कउवन के काँव-काँव अलगे चल रहल बा। एही में बिहार में चुनाव बा। नारा से बेसी भोजपुरी गाना गूँजsता। कोरोना के चलते जे बेरोजगार भइल बा ओकरा असहीं अंघी नइखे लागत। भोर के अखबार सुरुज भगवान से बेसी लाल बा। हत्या से बेसी आत्महत्या के खबर लउकsता। ब्रम्हांड के सर्वश्रेष्ठ जीव आत्मघाती हो गइल बा। आखिर ई कइसन समय आ गइल बा हे दुर्गा मइया।

कइसे गोहराईं तोहरा के? लइका लेखा फूट-फूट के रोईं? रोईं भोंकार पार के? सीना चीर के देखाईं? का करीं? कइसे बुझबू कि हम दुखी बानी। हमार दुख तोहरा काहे नइखे लउकत? आकि चनेसरा लेखां तुहूँ मजा ले तारू?

चनेसरा त विपक्षी हs। हमरा अच्छाइयो में बुराइये देखेला। केतनो बड़का काम काँहें ना करीं, तारीफ़ के दू बोल ना बोली। हमरा जवना काम के उ निन्दा करता, ओकर आका भा गुरुजी लोग, ओही में डूबल बा। बाकिर उ ओह लोग के तलवा चाटsता। खैर, छोड़s, ई कुल्हि सियासी बात हs।

तू त माई हऊ। तू दिल के सब दरद बुझेलू। बस बहरिये बहरी भोकाल बा ए माई। भीतर खाली बा। कुछ बा ना। कइसे रही?  इहाँ भुँजवो खाये के बा, फँड़वो टोवे के बा। पेट खाली बा। खाली पेट में दिमगवो खाली हो जाला। दिमाग कामे नइखे करत। कुछ सूझते नइखे।

पंडी जी से पूछनी हँ। उहाँ के कहनी हँ जे राहू-केतु ठीक नइखे चलत। खैर, उहाँ के त कुंडली के आधार पर ग्रह के बात कहनी हँ।

हमरा त हई कुल्ही राहू-केतु लउकत बाड़न स। एगो जवन अपना देसवा के बाउंडरिया पर फँउकत बाड़न स ड्रैगनवा, ऊ। दोसर देस के भीतरे दोस्त के रूप में दुश्मन बनल घूमsतारs सन, भितरघतिया, ऊ। तीसर ऊ, जेकरा हर काम में नुक्से लउकsता, निगेटिव आदमी, ऊ। ए सगरी के बुद्धि ठीक करs ए माई।

हम देश में अमन चाहsतानी। अमन दs। निरोग करs। देशे के ना, सउँसे दुनिया के। कोरोना मुक्त करs।

आम आदमी भूखे मूअता।

सबका थाली में रोटी होखे आ आँखि में नींन, एह नवरात्रि में बस अतने प्रार्थना बा ए दुर्गा माई।

एह अबोध के पीठ ठोकs । अपना शेर से बात खतम करत बानी –

काँट चारो तरफ उगावे के

फूल के अस्मिता बचावे के

एह दशहरा में कवनो पुतला ना

मन के रावण के तन जरावे के


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Hum BhojpuriaOctober 9, 20201min9270

संपादक- मनोज भावुक

ई गाँधी जी के भोजपुरिये कनेक्शन बा कि 40 पेज के ई-पत्रिका के पहिलके अंक 152 पेज के महात्मा गाँधी विशेषांक बन गइल तबो मन ना भरल। फेर एगो विशेषांक रउरा हाथ में बा। विशेषांक का ? एकरा के विशेषांक पर विशेषांक कहीं।

साँचों, इहो गजबे संजोग बा गाँधी जी के पुण्यतिथि पर हम भोजपुरिआ के महात्मा गाँधी विशेषांक निकलल अउर जयंती पर ओह विशेषांक पर विशेषांक निकsलता। जी हाँ, एतना प्यार आ अइसे प्यार बहुत कम अंक के नसीब होला। 30 जनवरी के हम भोजपुरिआ के पहिलका अंक महात्मा गाँधी विशेषांक निकलल। एह अंक में माने पत्रिका के सतरहवां अंक कहीं भा भोजपुरी जंक्शन के तिसरका अंक, ओह अंक माने पहिलका अंक माने महात्मा गाँधी विशेषांक पर खूब बात होता। ई बात खाली बात माने बतकूचन नइखे। ई चिंतन-मनन बा, सुझाव-सलाह बा, नेह-आसिरबाद बा, सवाल-जबाब बा, नजर-नजरिया बा अउर ओह अंक के बहाने एहू अंक में गाँधी जी के अउर-अउर तरह से देखे-समझे, जाने-बूझे के कोशिशो बा।

डॉ. ब्रजभूषण मिश्रा, श्री भगवती प्रसाद द्विवेदी, डॉ. प्रेमशीला शुक्ल, डॉ. सुनील कुमार पाठक, श्री सौरभ पाण्डेय, श्री प्रकाश उदय, श्रीमती मनोरमा सिंह, डॉ. राजेश कुमार मांझी अउर श्री सुमन कुमार सिंह के महात्मा गाँधी विशेषांक पर समीक्षात्मक आलेख ऊर्जा आ उछाह से भर देता त कई जगे आँखों खोलSता। लगभग सभ विद्वान लोग ओह अंक के ऐतिहासिक अउर संग्रहणीय अंक कहले बा त ओह कहे में कहात-कहात गाँधी जी पर एतना–एतना बात हो गइल बा कि इहो अंकवा ऐतिहासिक अउर संग्रहणीय बन गइल बा। इहो अंकवा महात्मा गाँधी विशेषांक बन गइल बा– महात्मा गाँधी विशेषांक – दू

अच्छा, अइसनो नइखे कि ई अंक ओह अंक के समीक्षा मात्र बा। समीक्षा से इतर भी कई गो आलेख बा गाँधी बाबा पर। श्री परिचय दास के आलेख मातृभाषा आ गाँधी जी त बहुत जरुरी लेख बा।

चूँकि ई अंक गाँधीमय हो गइल बा, एह से स्थायी स्तम्भ जइसे कि भोजपुरी के गौरव:दिवंगत साहित्य सेवी, मलिकाइन के पाती, सिनेमा आदि एह अंक से गायब बा। अगिला अंक से ई सब फेर पहिलहीं लेखां चमके-दमके लागी।

फिलहाल आईं, ओह महात्मा के ईयाद कइल जाय जेकरा के महात्मा बिहार बनवलस। भोजपुरी क्षेत्र बनवलस। तीन कठिया प्रथा के विरोध उनका के 1917 में हीं हीरो बना देलस। चंपारण के भितिहरवा आश्रम मोहनदास के महात्मा बनावे के प्रक्रिया में लाग गइल। अतने ना गाँधी जी भोजपुरिआ लोग के मन-प्राण में अइसे बसलें कि उनका प कविता बने लागल, गीत रचाए लागल, उ शादी-बिआह में गवाये लगलें –

गाँधी बाबा दुलहा बनलें, नेहरू बनलें सहबलिया

भारतवासी बनलें बाराती, लंदन के नगरिया ना

बान्हि के खद्दर के पगड़िया, गाँधी ससुररिया चलले ना

जब गाँधी जी के हत्या भइल त भोजपुरी क्षेत्र के लोग बउरा गइल। सबका मुंह प गोडसे खातिर सराप रहे, गारी रहे, गुस्सा रहे। रसूल मियां के एगो गीत में गाँधी जी खातिर अपनापन आ दर्द दुनों साफ झलकsता-

 के हमरा गाँधी जी के गोली मारल हो, धमाधम तीन गो

तनी, गीत के भाषा देखीं। के हमरा गाँधी जी के। ..एह ‘हमरा’ प ध्यान दीं. इहे गाँधी जी के भोजपुरी कनेक्शन ह।  

ओह गाँधी जी के जे अंगरेजन से दहेज में सुराज मांगsता-

गांधी बाबा दूल्हा बने हैं

दुल्हन बनी सरकार

            चरखवा चालू रहे।

वीर जवाहर बने सहबाला

इर्विन बने नेवतार

            चरखवा चालू रहे।

वालंटियर सब बने बराती

जेलर बने बाजदार

            चरखवा चालू रहे।

दुलहा गांधी जेवन बैठे

दहेज में मांगे सुराज

            चरखवा चालू रहे।

भगवान राम के बाद भोजपुरी लोकगीतन में सबसे अधिक गूँजे वाला एह महानायक के नमन करत ई अंक रउरा सब के सउंपत बानी।


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Hum BhojpuriaSeptember 17, 20201min9930

संपादक- मनोज भावुक

सउँसे देश में शोर बा- मुंबई में का बा ?  फ़िल्मकार अनुभव सिन्हा अउर अभिनेता मनोज वाजपेयी के जवन भोजपुरी रैप सगरो गूँजता, ओकर बोल बा – मुंबई में का बा ? डॉ. सागर के लिखल ह।

हमार सवाल बा कि बिहारे में का बा ? पूर्वांचल में का बा ? अगर रहित त ओह इलाका के मेहरारू छाती पीट-पीट ना गइतीं स – रेलिया बैरन पिया को लिये जाये रे। ई कवनो हर्षोल्लास के गीत ना ह। पीड़ा के गीत ह। प्रवास के गीत ह। जाने कब से गवाता ? 200 साल पहिलहूँ खूब गूंजल रहे जब अंग्रेज गिरमिटिया लोग के रेलगाड़ी में भर-भर के कलकत्ता ले गइलें आ उहाँ से भवानीपुर डिपो से पानी के जहाज में भर के मॉरिशस, फिजी, गुयाना आ सूरीनाम आदि देशन में।

आज कोरोना काल में लॉकडाउन टूटला के बाद, गांव में रोज़ी-रोज़गार ना रहला का चलते, विवश होके, लाचारी में जब केहू दिल्ली, बम्बई के ओर डेग बढ़ावsता त उनका पत्नी के चेहरा प उहे भाव बा – रेलिया बैरन पिया को लिए जाये रे।

राज़ी-ख़ुशी से ना तब केहू तैयार रहे, ना आज।

हमार एगो शेर बा – ” पटना से दिल्ली, दिल्ली से बंबे, बंबे से लंदन / भावुक हो आउर कुछुओ ना पइसे नाच नचावेला ‘

त ई पइसा गाँव में नइखे। पइसा माने रोज़गार। एही से रेलिया बैरन बिया। ई गीत सदियन से एह क्षेत्र के त्रासदी आ दरद के प्रतिनिधित्व क रहल बा। ई हर्ष के ना विषाद आ टीस के गीत बा।

पुरबिया ना खाली अपना श्रम, शक्ति, जीवटता आ बुद्धिमत्ता से देश-विदेश सगरो अपना के स्थापित कइले। मजदूर बन के गइलें बाकिर अपना पौरुष से मालिक बन गइलें, गिरमिटिया बन के गइलें बाकी अपना जुझारूपन से गवर्नमेंट बन गइलें। चमका देलें ओह देश के। स्वर्ग बना देलें। बाकिर अपना गाँव-घर, नेटिव प्लेस के स्वर्ग काहे ना बना पवलें? दोसरा जमीन के माटी के छू के सोना बनावे वाला लोग अपना माटी के सोना काहे नइखे बनावत ? अपना गाँवे के मॉरिशस, फिज़ी, सूरीनाम भा दिल्ली-मुंबई काहे नइखे बनावत ?

ई सवाल देश के आजादी के बाद के हर सरकार से बा। केंद्र से भी, राज्य से भी अउर वोटर माने जनता-जनार्दन से भी। हर केहू अपना अंतरात्मा से पूछे। ई सामूहिक सोच आ प्रयास के काम बा भाई। एकर बीड़ा उठावे के पड़ी। जब ले अइसन ना होई पूरब के जनाना लोग ई गीत गावे खातिर अभिशप्त रहीहें कि रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे।

बाकी ‘मुंबई में का बा’ खातिर अनुभव सिन्हा के विशेष रूप से बधाई अइसन कंटेट के चुनाव कइला खातिर जहाँ दूर-दूर तक लोग के दृष्टि ना जाला। भोजपुरी साहित्य में त अइसन बहुत कुछ लिखाइल बा बाकिर भोजपुरी सिनेमा चोली, चुनरी आ टिकुली से बहरी निकलिये नइखे पावत। ओह लोग खातिर एगो नज़ीर बा ई गीत, आँख खुले त।

भोजपुरी हमेशा से प्रतिकार, विरोध, ललकार आ मर्दानगी के भाषा रहल बा। अश्लीलता के बात त दूर रोमांस भी खुल के नइखे भइल एह इलाका में। एह से अधिकांश नायक के कहानी दबले दबल रह गइल बा।

खैर, समय के साथ बदलाव आइल बा, अइबे करी मगर संतुलन जरुरी बा। माटी से कटला पर भी दोसरा जगह के हवा-पानी के असर होला आ ओह में आदमी कुछ बेसिए बहक जाला।

उम्मीद बा आपन माटी मजबूत होई। रोजी-रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा खातिर हमनी के आत्मनिर्भर होखब जा। रेलिया बैरन वाला गाना बंद होई।

… अउर फ़ाइनली हर ख़ुशी खातिर आत्मनिर्भर होखब जा, एही शुभकामना के साथे- राउर मनोज भावुक प्रणाम।



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भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

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