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Hum BhojpuriaApril 27, 20221min850

हमनी के भीतर केतना युद्ध चलत बा,  कुछ पता बा रउआ ? श्वेत रक्त कणिका (WBC) होखे चाहे प्लेटलेट्स भा हमनी के पूरा के पूरा इम्यून सिस्टम, सब लड़हीं खातिर बनल बा। बाहर के बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आ बेमारी से देह लड़ते बा। देह के भीतर युद्ध चलते बा।

आ दिमाग! ….दिमाग के का कहल जाव!  एकरा में त देहियो ले बड़हन कुरुक्षेत्र बा। जगला त जगला, सुतलहूँ बेर सपनवो में दुनिया भर के युद्ध आ बुदबुदाहट। भले ई लड़ाई मैदान में नइखे होत, तबो मानसिक लड़ाई त चलिये रहल बा। वैज्ञानिक मान्यता के हिसाब से एकरो असर किडनी, लिवर आ सँउसे देह पर पड़ेला।

त देह में, दिमाग में लगातार युद्ध चलत बा। एह दूनू के प्रेम से पटवे के जरूरत बा, सींचे के जरूरत बा। कम से कम दिमाग के आग त प्रेमे के पानी से बुताला। बाकिर सगरो प्रेम के पोखरा सूखल जाता। एह लिक्विड के कम भइला से आदमी सनकल जाता। अधकपारी भइल जाता। फिजूल के बात पर लड़ जाता, युद्ध थोपा जाता। रूस आ यूक्रेन युद्ध एकर गवाह बा। अहंकार, इरिखा आ हम-हमिता के लड़ाई में हजारो लोग मर गइल। लाखो लोग उजड़ गइल।

केहू खुदे लड़ जाता। केहू केहू के ललकरला से लड़ जाता। पगलेटन के कमी थोड़े बा, अपनो देश में बाड़न स। हर गली-मोहल्ला में। भोजपुरियो समाज में, अफरात। केहू के नीचा देखावे खातिर केतनो नीचे गिर जाय खातिर गिरोह बान्ह के तइयार।

आ रउरा साथे समस्या ई बा कि रउरा रचब कि इन्हनी से अझुराइब! आपने एगो दोहा मन परत बा –

भावुक छोटे उम्र में एतना फइलल नाँव

कुकुरो पीछे पड़ गइल, कउओ कइलस काँव…

 

अच्छा त भाई, ईहो सोहागभाग! के कही कि कुकुरन के पाछा धाईं, कउअन के पाछा उधियाईं, बढ़िया बा कि आपने राह धइले जाईं!

कोरोना वायरस से लड़ाई त समझ में आवत बा। ई मानव प्रजाति पर हमला बा त लड़ला के सिवा दोसर कवनो चारा नइखे। हमनी के लड़बो कइनी जा आ जीतबो कइनी जा। ई एगो सार्थक लड़ाई रहल ह। बाकिर हई यूक्रेन आ रूस के युद्ध ?!

फिजूल बा फिजूल। दुनू देश कराहत बा आ बरिसन ले कराहत रही।

अभी त हमनी के सार्थक युद्ध के जरूरत बा। मनुष्य के अस्तित्व खातिर ….आ वृहत्तर अर्थ में प्राणी जगत के अस्तित्व खातिर।

धरती के छाती में पोरे-पोर जहर पसरल बा। एह से हमनी के जहरे उगावत बानी जा आ जहरे खात बानी जा। जैविक खेती क के धरती के छाती में अमृत भरे के बा आ अमृत उगावे के बा। ई एगो जरुरी लड़ाई बा।

ओजोन लेयर में छेद भइल जाता। वायु प्रदूषण एतना बा कि साँस लेत में जहरो भीतर जाता। त धरती प हरियरी बढ़ावे के बा। खूब पेड़-पौधा, झाड़ लगावे के बा। ई एगो जरूरी लड़ाई बा।

नदियन के पानी में कचड़ा बढ़ल जाता। ओकनी के सफाई एगो जरूरी लड़ाई बा।

अइसन कई गो अउर जरूरी लड़ाई अविलंब लड़ल जरूरी बा बाकिर हमनी के गैर जरूरी लड़ाई भा कुकुरहट में फँसल बानी जा।

पहिले आपन माटी, हवा, पानी, आग आ आकाश ठीक करे के जरूरत बा। एही से नू हमनी के बनल बानी जा!

बाकिर हमनी के आपन देखावा के मकान-दोकान सजावे में ढेर बीजी बानी जा। अगिला पल के पता नइखे बाकिर सात पुश्त खातिर जमा करे के फेर में लागल बानी जा।

पल-पल के जीये खातिर दिमाग में लागल आग बुतावे के पड़ी। दिमाग के आग प्रेम के पानी से बुताला। एह से हिंसा के जगह प्रेम के चुनाव जरूरी बा। प्रेम हमनी के प्रकृति ह। हिंसा के साथे, इरिखा आ डाह के साथे त हमनी के अप्राकृतिक हो जानी जा।

अगर विश्व के हर आदमी प्रेम से भर जाय त हई जवन युद्ध प खर्चा होता, बम-बारूद, सेना आ सुरक्षा प खर्चा होता उ बंद हो जाई। कोर्ट-कचहरी प खर्चा होता, उ बंद हो जाई। जवन बर-बेमारी प खर्चा होता बहुत हद तक उहो बंद हो जाई। साँच मानी, प्रेम बहुत सारा बेमारी के ईलाज ह। दुनिया में बहुत सारा लोग प्यार से गले ना लगवला के मारे, माने उपेक्षा से मर जाला। मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म देखले बानी नू। प्यार के झप्पी से ईलाज।

प्यार के झप्पी दिहीं महाराज, प्यार के झप्पी!

फागुन चलत बा। होली नियरा गइल बा। होली प्रेम के प्रतीक ह बाकिर रूस आ यूक्रेन में खून के होली होता। ई बंद होखे के चाहीं। दुश्मन के गाल प गुलाल रगड़े के रवायत शुरू होखे के चाहीं। नफरत के मवाद निकाल के प्रेम के मरहम लगावे के चाहीं।

तब जाके ई बात समझ में आई कि जिंदगी युद्ध ना उत्सव ह।

मनोज भावुक


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Hum BhojpuriaMarch 21, 20221min1750

अगर अन्हरिया से अँजोरिया के तरफ बढ़े के बा त आपन धरती आ आकाश बढ़ावे के पड़ी। आपन सुरुज खुद उगावे के पड़ी। तबे भीतर अँजोर होई। राउर आपन औरा (आभा) बनी। मन खुश रही। जीवन मजबूती से जीयब आ बोध के क्षमता बढ़ी।

हम बुद्धि के बात नइखीं करत, बोध के बात करत बानी। बुद्धि त युद्ध करा रहल बा। यूक्रेन आ रसिया में उठल बवाल से त पूरा दुनिया में भूचाल आइल बा। मानवता तबाह बा। मानव जवना अदभुत गिफ्ट या वरदान ‘’ बुद्धि’’ के चलते प्राणियन में सर्वश्रेष्ठ बा, उहे बुद्धि ओकरा के उलझवले बा। बुद्धि आदमी के बालनोचवा बना देले बा। सभे आपन बाल नोचत बा। सुख आ आनंद देवे में समर्थ बुद्धि दुख, डर, पीड़ा आ दहशत दे रहल बा।

दरअसल बुद्धि ई त बता देले कि दिल का ह, कहाँ बा, कइसे काम करेला बाकिर दिल में का बा, ई बुद्धि ना बता पावेले। ई बोध से पता चलेला। एहसास से पता चलेला। ओकरा खातिर अपना मन के धरती आ विश्वास के आकाश के बढ़ावे के पड़ी। कई गो सरहद के तूरे के पड़ी। देश, जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा, लिंग आदि के सरहद। इहाँ तक कि अपना देह के सरहद भी तूरे के पड़ी आ अध्यात्म के एह गूढ़ रहस्य के समझे के पड़ी कि हम ना त देह हईं ना मन…. हमरा विस्तार के कवनो सीमा नइखे। एह से हमरा के सीमा आ सरहद में नइखे बान्हल जा सकत।

दरअसल समझ के तीन गो स्तर बा- बुद्धि, बुद्धू आ बुद्ध। बुद्धि के हालत त रउरा देखते बानी। दिया जरा के अँजोर करे के जगह लुकार भाँज के घर जरा रहल बा। दोसरो के आ अपनो। आपन बुद्धि अपने खिलाफ बा।

त परेशान लोग थोड़े देर खातिर बुद्धू बने के कोशिश करता। दारू, अफीम, गाँजा पीके  भा सेक्सुआलिटी में जाके भा ड्रग्स के इस्तेमाल करके थोड़े देर खातिर अपना नर्वस सिस्टम के, अपना तंत्रिका तंत्र के डाइवर्ट करता भा ओकरा एक्टिविटी के कम करता। हउ गनवा नइखीं सुनले, ‘’ मुझे पीने का शौक नहीं, पीता हूँ गम भुलाने को ‘’। त इहे हाल बा।

जानवर के पास बुद्धि नइखे। एह से ओकरा टेन्शनो नइखे। ओकर संघर्ष खाली प्रजनन आ भोजन भर बा। ओकरा ना त घर आ गाड़ी के ई. एम. आई. देवे के बा, ना यूक्रेन, पाकिस्तान से लड़े के बा। लड़ाई अंतिम समाधान नइखे। रहित त सम्राट अशोक बौद्ध धर्म के प्रचारक अशोक ना बनितन। हर युग में युद्ध भइल बा बाकिर अंततः प्रेम के प्रकट होखहीं के पड़ल बा।

अभी महामारी (कोरोना) खतमों ना भइल कि युद्ध शुरू हो गइल। अभी त प्रकृति के करीब जाये, आपन जीवन शैली सुधारे, अपना के सजावे-सँवारे आ वृहत्तर अर्थ में मानवता के बचावे के कोशिश होखे के चाहीं। .. बाकिर हमनी के बारूद के ढेर पर बइठ गइनी जा। त ई बुद्धि हमनी के असंवेदनशील बनवले बा कि जागरूक?

कोरोना में लाश प लाश गिरल ह। अब युद्ध में गिरता। चीख-पुकार जारी बा। साँच पूछीं त टेंशन बुद्धि वाला के बा। बुद्धू आ बुद्ध के ना। काहे कि बुद्ध बनला पर राउर बुद्धि राउर दोस्त बन जाले। उ रउरा खिलाफ काम ना करे। उ परम आनंद आ परम शांति में ले जाले आ मन में करुणा भर देले, अहंकार के गला देले। .. ना त एह घरी आदमी के बुद्धि आ ओकरा भीतर बइठल अहंकार लाख रूपिया के प्रॉपर्टी खातिर करोड़ रूपिया के किडनी डैमेज करवा देता। देह-रूप-रस से बहकल शैतान मन अच्छा-अच्छा लोग के साम्राज्य मटियामेट क के जेल भेजवा देता। हम ई नइखीं कहत कि पइसा भा सेक्स जरूरी नइखे। अरे भाई पैसा ना रही त जियले मुश्किल हो जाई। सेक्स ना रही त सृजन भा यौवन सुख कइसे प्राप्त होई। ई त जरूरिए बा। एह में कहाँ कवनों दिक्कत बा। बाकिर ई जहां रहे के चाहीं, ओही जी रहे त ठीक बा। पइसा पॉकेट में रहे, सेक्स देह में रहे त समय आ जरूरत पर सुख दी, कामे आई बाकिर ई कपार पर चढ़ जाई त दुख दी, जेल भेजवाई।

त कपार में जवन रहे के चाहीं, उहे रहो .. कचड़ा ना। एकरे खातिर योग जरूरी बा। योगी बनल जरूरी बा। योग पूरा दुनिया में हर आदमी खातिर अनिवार्य शर्त होखे के चाहीं। तबे आदमी के भूमि तत्व आ आकाश तत्व सुधरी भा विकसित होई। तबे आदमी पंच तत्व के मरम बूझीं आ एकर श्रेष्ठतम उपयोग करी आ परिणाम दी। योगी ही विश्व के आ मानवता के बचा सकेलें। काश! विश्व के हर बच्चा योगी बने।

विश्व बंधुत्व के भावना के विकास के कामना के साथ ..

प्रणाम!

मनोज भावुक


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Hum BhojpuriaFebruary 15, 20221min2120

तर्क से परे बा बहुत कुछ। बहुत कुछ बा बुद्धि से ऊपर। बहुत कुछ बा beyond the obvious

बहुत कुछ बा जवन कहइला से कहाई ना। बहुत कुछ बा जवन लिखइला से लिखाई ना।

बहुत कुछ बा जवन अनुभव के अँटिया में दबा के देह के साथे बिला जाला। बहुत कुछ बा जवन होठ प आके हवा हो जाला। बहुत कुछ बा जवन कागज प उतर के अर्काइव होला बाकिर अनछपल रह जाला आ ओकर अगिला पीढ़ी ओह अनुभव के खजाना के रद्दी कागज लेखां बेंच देला। …आ फेर ओकर ठोंगा बनेला भा लोग ओह में चिनिया बादाम फोड़ के खाला। केतना बात कहीं। केतना दर्द बटोरीं। का-का कहीं, कइसे कहीं? का जाने हमरा कहहूँ के लूर बा कि ना?… आ का जाने जवन हम कहेब तवने रउरा बुझेब आ कि अपना चश्मा से दोसरे तस्वीर देखेब।

कहलका के मोल तबे बा जब सुनेवाला ओकरा के ओही रूप में बूझे। लिखे वाला लिक्खाड़ खातिर बूझे वाला बुझक्कड़ चाहीं। बूझे वाला के रिसीवर के पॉवर के उपयोगिता तबे बा, जब ऊ कहेवाला के बात के चित्र अपना मन के कैनवास पर ओही रूप में बना लेव।

हमनी के ऋषि-मुनि लोग बड़-बड़ बात सूत्र आ संकेत में कहले बा। ई त हमनी के समझ पर निर्भर करता कि हमनी ओकरा के केतना बूझत बानी। दरअसल बूझल त स्ट्रॉंग आब्ज़र्वैशन पर निर्भर करेला। सेब त पेड़ से पहिलहूँ गिरत रहे, ऊ न्यूटने चाचा के काहे लउकल?

ब्रम्हांड में बहुत कुछ बा जवन लउकल अभी बाकी बा, बस देखे वाला नजर चाहीं। बहुत कुछ जवन लउकता उ झूठ ह, ई आवे वाला समय बताई। आवे वाला समय बतवलस कि पृथ्वी चापुट ना गोल बिया। समय केतना चीज के झुठलवले बा। एह से तर्क आधार बा बाकिर बहुत कुछ तर्क से परे बा। जवन बा ओकरा पर संदेह कइल जा सकत बा आ जवना प भरोसा नइखे होत, उहो काल्ह साँच हो सकत बा। आज से पचास साल पहिले ई बात के मानित कि अमेरिका, यूरोप आ एशिया भा दुनिया के कवनो कोना में रहत आदमी अपना-अपना घरे में बइठल, एक दूसरा के देख के बतियाई, संगोष्ठी करी, परिचर्चा करी, मीटिंग करी, वेबिनार-सेमिनार करी। बाकिर इंटरनेट के अइला से अइसन तमाम संभावना के जनम भइल। काल्ह ई हो सकेला कि रउरा दिमाग के सब इन्फॉर्मेशन कवनो चीप में लेके दोसरा के दिमाग में ट्रांसफर कर दिहल जाय। एह से इन्फॉर्मेशन इकट्ठा कइल कवनों बड़का बात नइखे। ई त रटंतु विद्या वाली बात भइल। एह घरी के पढ़ाई में इहे चलता। रट के बढ़िया से उलटी क देला के हीं मार्क्स बा। जबकि जरूरी बा न्यूटन लेखां सोचल। आँख खोल के देखल, दिमाग खोल के जीयल। दुनिया में जीयल, अपने आप में ना। जादा इन्फॉर्मेशन इकठ्ठा कइला से भा अलूल-जलूल दिमाग में भरला से आदमी खुदे समस्या बन जाला जबकि आदमी समाधान ह। ब्रम्हांड में बहुत कुछ बा। ओकरा खातिर अपना दिमाग में बनावल दुनिया से बहरी निकल के पेड़-पौधा, चिरई-चुरुङ, झींगुर-मांगुर, तितली-भौंरा, बदरी-बूनी सब के सुने-देखे के पड़ी। तसलवा तोर कि मोर से बहरी निकले के पड़ी। जवन रउरा फेंकब उहे रउरा प गिरी आ गिरी त पहाड़ बन के गिरी सूद समेत। एह से अपना आ दोसरो के उल्लास खातिर जीहीं, खुशी खातिर जीहीं, सचेतन होके जीहीं, समभाव होके जीहीं, खोज खातिर जीहीं, पल-पल जीहीं, जी भर के जीहीं, जियला लेखां जीहीं, जीहीं अइसे कि मुअला के बादो जीहीं।

प्यार में रहला प सब चीजवे नीक लागेला आ नफरत में नीको चीज खराब लागेला। मन में माहुर रही त जिनिगिये माहुर हो जाई। जिनगी समस्या ना ह, जिनगी संभावना ह। एह से जीविका के साथे-साथ जीवन के समृद्ध करे वाला उदयोग के बारे में भी सोचल जाय। टेक्नोलॉजी के पास खुद के दिमाग थोड़े होला। दिमगवा त रउरे काम करी। एह से मानवीय चेतना के विकास, ओकर अपग्रेडेशन सबसे जरूरी काम बा।

हम का कहsतानी आ काहे कहsतानी, हमरो ठीक से बुझात नइखे। हं, संपादकीय के बहाने कुछ कहे के होला त बहुत कुछ दिमाग में चलेला। आज इहे चलल ह त इहे कहा गइल ह। रउरा बुझा जाई त बता देब। बाबा पांडेय कपिल कहले बानी कि ‘’ जीभ बेचारी का कही, ओकर का औकात ‘’ …. माने कलम बेचारी का कही। पुरनिया लोग जब चिठ्ठी भेजे त लिखे कि कम लिखना ज्यादा समझना।

त भाई हो लिखला, कहला से जादा जरूरी बूझल बा। बूझे खातिर बहुत कुछ तर्क से परे बा। रोआँ-रोआँ में बहुत कुछ महसूस होला। सिहरन होला। ओह सिहरन के, ओह कंपन के, ओह ध्वनि के सुने के कोशिश होखे।

प्रणाम।

मनोज भावुक


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Hum BhojpuriaJanuary 17, 20221min1800

अमर होके केहू नइखे आइल। जे आइल बा सेकरा जाहीं के बा। बाकिर कुछ लोग जाइयो के रह जाला …जेहन में, चित्त में, स्मृति में, इतिहास में, लोक में। मरियो के ना मरे आ बोलत-बतियावत रहेला अपना काम में, कृति में। हमार एगो शेर बा –

बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा

बहुत बा लोग जे जियते में यार मर जाला

जियते में मरे वाला पर बात फेर कबो। अभी त मरलो के बाद जे जीयत बा ओकर बात होता।

भोजपुरी जंक्शन ( हम भोजपुरिआ ) के जब शुरुआत भइल तबे से हमार मन रहे कि समसामयिक साहित्य लेखन के साथे-साथ ‘ भोजपुरी साहित्य के गौरव ’ स्तम्भ के अंतर्गत भोजपुरी के दिवंगत साहित्य सेवी लोग के व्यक्तित्व-कृतित्व पर आलेख छपत रहे ताकि सभे नींव के ईंट के जाने। नया पीढ़ी भोजपुरी के सामर्थ्य आ इतिहास से परिचित होखे। भूलल-बिसरल संस्मरण आ साहित्य सोझा आवे। सिलसिला शुरू भइल आ लेख लिखाये-छपाये लागल। लेकिन ई लमहर लेख रहे। दिवंगत साहित्यकार के व्यक्तित्व आ कृतित्व पर विहंगम दृष्टिपात।

तब लागल कि अइसे त बहुत समय लागी। कई बरिस लाग जाई सब साहित्यकार लोग के समेटे में।

तब, एह लमहर लेख के अलावा संक्षिप्त परिचय के सिलसिला भी शुरू भइल ताकि हरेक अंक में अधिक से अधिक साहित्य सेवी से परिचय करावल जा सके। ई काम आसान ना रहे। दू-चार गो साहित्यकार पर लिखल अलग बात बा आ एगो सीरीज के रूप में सब साहित्यकार लोग के समेटल बिल्कुल अलग बात। बाकिर एह कठिन काम के बीड़ा उठइनी पिछला चार दशक से मातृभाषा भोजपुरी खातिर समर्पित भाव से लागल डॉ. ब्रजभूषण मिश्र जी। मिश्र जी अपना आगे के दू पीढ़ी आ बाद के दू पीढ़ी के भोजपुरी साहित्य में अवदान के जानेवाला लोगन में एक बानी। भोजपुरी आंदोलन के इतिहास से परिचित बानी अउर अनवरत अपना के अपडेट करत रहीले।

भोजपुरी जंक्शन, लगभग दू साल के सफर में, अपना अलग-अलग अंक में भोजपुरी के एक सौ एक दिवंगत साहित्य सेवियन के परिचय छाप चुकल बा अउर ई सिलसिला आगे भी जारी रही काहे कि अभी लमहर लिस्ट बा।

एक सौ एक के संख्या बड़ा शुभ होला। नया साल (2022) आवता। भगवान करस इहो शुभ होखे। नया साल के सौगात के रूप में भोजपुरी के एक सौ एक दिवंगत साहित्य सेवियन के परिचय एह अंक में प्रस्तुत करत हमरा अपार खुशी होता आ एकरा खातिर एकरा लेखक डॉ.ब्रजभूषण मिश्र जी के प्रति आभार प्रकट करत बानी।

प्रणाम

मनोज भावुक


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Hum BhojpuriaDecember 10, 20211min2430

संस्मरण का ह ? याददाश्त ह। मेमोरी ह। याददाश्त कवना रुप में दिमाग पर छपल बा, केतना गहराई के साथे मन में बइठल बा, ओही तासीर आ भावना के साथे दिलोदिमाग में गूँजेला। दरअसल संस्मरण अनुभव के अँटिया ह, जवन बोझा बन्हा जाला मन के ढोये खातिर।

जब लइका पैदा होला त अपना होश सम्हरला ले, अपना नजर में ना उ हिन्दू होला, ना मुसलमान, ना बाभन होला ना बनिया, ना इंडियन होला, ना अमेरिकन। एही से उ मस्त रहेला। छने में लड़े-झगड़ेला आ छने में सब भुला के साथे खेले लागेला। उ अपना ओरिजिनल रुप में रहेला। कुछुओ ओढ़ले-बिछौले ना रहेला। ओकर दिमाग खाली रहेला। विचार शून्य रहेला। याददाश्त के कचरा ना भरल रहेला।

कचरा शब्द के प्रयोग हम एह से कइनी ह कि एगो सांसारिक आदमी के दिमाग में याददाश्त के नाम पर कुछ जरूरी इन्फॉर्मेशन के छोड़ के ढ़ेर फालतुये बात होला। कवनो तरीका से अगर ई फालतू बात, ई सब बकवास दिमाग से निकल जाये त आदमी फेर लइका बन जाला, अपना मूल स्वरूप में आ जाला। आदमी के मूल स्वरूप आनंद के ह।

बाकिर आज अधिकांश आदमी दुखी बा, परेशान बा। कुछ दुख जेनुइन बा। ऊ आर्थिक बा, शारीरिक बा। कुछ दुख मानसिक बा। मानसिक दुख के अधिकांश हिस्सा अइसने कचरा वाला याददाश्त के चलते बा, जवन बढ़त उम्र के साथ हमनी के इकठ्ठा कइले बानी जा। एजुकेशन, धर्म, राजनीतिक पार्टी, अलग-अलग गोल, गुट, समाज, सरहद आदि से जुड़ला से जइसन इन्फॉर्मेशन एह दिमाग में फीड भइल, ओइसने याददाश्त बनल, ओइसने संस्मरण। …

अउर इहे संस्मरण आगे के जीवन खातिर रेगुलेटर के काम करेला, डिसीजन मेकर के काम करेला। एगो अर्थ में संस्मरण के रउरा अनुभव भी कह सकेनी। अनुभव आदमी के कई गो मुहावरा देले बा जइसे कि दूध के जरल मट्ठा फूंक-फूंक के पीयेला। अनुभव न जाने केतना गीत-गजल, कविता देले बा। हमरे एगो शेर बा –

अइसहीं ना नू गजल-गीत लिखेलें भावुक

वक्त इनको के बहुत नाच नचवले होई

बाकिर सब अनुभव छंद के बंध में बन्हइबो त ना करे। एह संदर्भ में हमार कुछ शेर हाजिर बा –

दफ़्न बा दिल में तजुर्बा त बहुत ए भावुक

छंद के बंध में सब काहे समाते नइखे

चाहे

अनुभव नया-नया मिले भावुक हो रोज-रोज

पर गीत आ गजल में ले कवनो-कवनो बात

त बात भा अनुभव लेले केतना लोग मर गइल। केतना लोग भीतरे-भीतर घुटल भा खुश भइल। केतना लोग खुशी के मारे नाचल भा दुख से छाती पीटल। केतना लोग अपना नाती-पोता, पर-परिवार के साथे ( अगर उ सुने वाला आ सुने लायक भइल त ) आपन अनुभव, आपन संस्मरण साझा कइल।

ई अंक ओह खुशकिस्मत लोग के चलते बा जेकरा के भगवान ई हुनर देले बाड़े कि ऊ अपना अनुभव के कागज प उतार सके। अपना याददाश्त के लिपिबद्ध कर सके। एही से लेखक के क्रियेटर कहल जाला। ऊ लोर के गजल बना लेला, आग के कविता। घात-प्रतिघात, ठेस-ठोकर के कहानी-संस्मरण।

त सुख-दुख, आग-पानी, काँट-कूस, फूल-खुशबू, हँसी-खुशी, जहर-माहुर से भरल मन आ ओह मन के याददाश्त से उपजल समय-समय के बात हाजिर बा एह संस्मरण अंक में।

त काहे खातिर संस्मरण अंक? आनंद खातिर, दोसरा के अनुभव आ जानकारी से सीखे खातिर, सचेत रहे खातिर आ जिनगी के गहराई आ रहस्य के समझे खातिर।

बात प बात चलsता त कई गो बात मन परsता। ओही बात भा अनुभव भा एहसास से उपजल आपन कई गो शेर मन परsता। ओही में से एगो शेर के साथे आपन बात खतम करत बानी।

ऊ जौन देखलें, ऊ जौन भोगलें, ना भोगे आगे के नस्ल ऊ सब

एही से आपन कथा-कहानी कहत रहलें मनोज भावुक

प्रणाम

मनोज भावुक


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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min2470

अक्टूबर-नवंबर के फेस्टिवल मन्थ यानी कि पूजा-पाठ के महीना कहल जाला। नवरात्र-दशहरा से दिवाली-छठ ले पूजे-पूजा। अनुष्ठाने-अनुष्ठान। एगो आध्यात्मिक माहौल। सवाल ई बा कि ई सब खाली पूजा के रस्म-अदायगी भर बा आ कि लोग बाग पर एकर असरो बा ?

कवनो दिया में कतनो तेल होखे, कतनो घीव होखे, उ बुताइल बा त ओकर महत्व नइखे। जरते दिया के मान बा। बुताइल दिया या त फेर से जरावल जाला या विसर्जन में चल जाला।

हमरा बुझाला कि पूजा-पाठ, प्रार्थना मन के दिया के जरावे खातिर होला। मन के शोधन खातिर होला। मन के रिचार्ज करे खातिर होला। कठिन से कठिन समय में भी सकारात्मक रहे खातिर होला, संभावना खोजे खातिर होला।

प्राण यमराज के हाथ में जाये ओकरा पहिले तक अपना हाथ में ठीक से रहे के चाहीं। ठीक से माने ठीक से। अपना नियंत्रण में। एही खातिर साधना कइल जाला। परमात्मा भा प्रकृति से जुड़ल जाला। अपना इहाँ के सब पूजा-पाठ आ तीज-त्योहार के वैज्ञानिक महत्व बा। ई सब अंततः स्वास्थ्य, शांति, सकून, शक्ति, साहस, समाधान, समृद्धि आ सद्भावना प्रदान करे खातिर बनल बा। ओकरा ऐतिहासिक महत्व के एगो अलग आयाम बा।

दशहरा आ नवरात्रि में राम गूँजत रहेलें। रामलीला चलत रहेला। खुद राम के लीला अपना आप में हर समस्या के समाधान समेटले बा। राम जेतना दुख, राम जेतना परीक्षा से के गुजरल बा? मंच भा टेलीविजन के रामलीला में दुख के ग्लैमराइज कइल गइल बा। लोग के ग्लैमराइज्ड दुख, विषाद भा लड़ाई देखे में मजा आवेला बाकिर जे ओकरा के भोगले बा, जे ओह में तपल बा, ओकरा से पूछीं। शायर साहिर लुधियानवी के एगो गीत के पंक्ति बा-

जो तार से निकली है वो धुन सब ने सुनी है

जो साज़ पे गुज़री है वो किस दिल को पता है

हिन्दी-उर्दू-भोजपुरी के शायर भाई साकेत रंजन प्रवीर के एगो शेर बा –

गम सुनावे में दम निकल जाला  

हं मगर मन तनी बहल जाला

गम, दुख, पीड़ा, कष्ट, तनाव जिंदगी के हिस्सा ह। ई सब ऊर्जा के क्षीण करेला। मन के बैटरी के डाउन करेला। हमरा समझ से पूजा-पाठ, योग-अनुष्ठान, ध्यान आदि मन के चार्ज करे खातिर होला ताकि कष्ट, बीमारी, दुख आदि होखबो करे त ओकर एहसास ना होखे भा कम होखे। बाहर में कतनों हलचल होखे, अंदर (मन) शांत होखे। इहे साधना ह। साध लेला पर ई संगीत जइसन लागेला।

मनोज भावुक के एगो शेर बा –

दुखो में ढूंढ ल ना राह भावुक सुख से जीये के

दरद जब राग बन जाला त जिनगी गीत लागेला

आ साँच पूछीं त जिनगी गीते ह, बस एकरा के राग आ लय में रखे के पड़ी। समय, परिस्थिति आ कुछ राक्षसी प्रवृति के लोग रउरा के बेलय करे के कोशिश करी बाकिर साधना इहे ह कि बाहरी परिस्थिति के असर अंदर ना पड़े। मुश्किल समय भी संभावना बन जाय। दरअसल हर समस्या में एगो संभावना छुपल रहेला, बस सकारात्मक नजरिया के बात बा।

एक बार, जहां एक आदमी बेरोजगारी के रोना रोअत रहे, उहें दुसरका बेरोजगार आदमी कहलस- “ हमनी के सौभाग्यशाली बानी जा कि बेरोजगार बानी जा। बेरोजगार आदमी के पास असीम संभावना बा। उ कुछओ कर सकेला। कुछओ बन सकेला। काहे कि उ कवनो खूँटा से नइखे बंधल। बंधन मुक्त बा। जे  डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस बन गइल बा या कवनो खास प्रोफेशन से बंध गइल बा, उ बंध गइल बा। हमनी कहीं से, कुछुओ से बंधल नइखीं त हमनी खातिर आकाश खुला बा। पूरा आकाश आपन बा। कहीं उड़ सकत बानी जा। “

कहे के मतलब कि हर परिस्थिति में सकारात्मक नजरिया रखल जा सकेला। हर जगह संभावना बा। दुख, निराशा आ परेशानी जइसन कवनो चीज हइये नइखे। आत्मा के असली प्रकृति उल्लास ह। देह आ मन त बाहरी चीज ह। अध्यात्म सोच के इहाँ तक पहुंचा देला। एह साँच तक पहुँचा देला। इहाँ तक पहुंचे में पूजा-प्रार्थना, योग, ध्यान, स्वाध्याय, उपवास, व्रत आदि मदद करेला। एह सब से आत्मा के रिचार्ज करीं।

दशहरा, नवमी, दियरी-बाती आ छठ के शुभकामना के साथ

प्रणाम

मनोज भावुक


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min3860

मनुष्य के सबसे बड़ उपलब्धि बा कि ओकरा पास एगो विकसित दिमाग बा लेकिन साथ हीं सबसे बड़ परेशानियो के कारण इहे बा। दिमगवे नू तनाव के घर ह।

हाल हीं में भइल सर्वे के अनुसार दुनिया में 86 प्रतिशत लोग तनाव के शिकार बा। अपना देश भारत में त 89 प्रतिशत लोग ‘टेंशन’ में जीयsता। दुनिया में एतना नफरत फइलल कि तरह-तरह के बम आ मिसाइल बनल। प्यार आ मुहब्बत खातिर कुछ बनल कहाँ? प्यार के संदेश देवे वाला भा कोशिश करे वाला के त अक्सर जहर पियावल गइल।

कहे के मतलब कि दुनिया में ज्यादा डिस्ट्रक्टिवे लोग बा। दोसरा के परेशान, दुखी भा तनाव में देख के खुश होखे वाला लोग। एही से सिनेमो में अइसन दृश्य खूब देखावल जाला।

देश के भीतर जाति-धर्म-संप्रदाय-भाषा आदि के आधार पर जवन ग्रुप, गैंग आ खेमा बनल ओह में वैचारिक मतभेद मनभेद तक पहुंचल आ लोग एक-दुसरा के नीचा देखावे खातिर नीचता के स्तर पर उतरे लागल। राष्ट्र, मानवता आ समाज के हित के फिकिर छोड़ के सामने वाला के मान-मर्दन खातिर हुलेलेले में लाग गइल। एक-दुसरा के हौसला देवे के बजाय तनाव देवे में लाग गइल आ पूरा देश भा पूरा विश्व तनावग्रस्त हो गइल।

सवाल ई बा कि कवनों भी देश भा समाज जब एही सब में लागल रही त उ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आ सृजन पर कइसे फोकस करी?

विकास खातिर भा क्रियेशन खातिर एगो सकारात्मक माहौल जरूरी होला, तनावमुक्त मन जरूरी होला। इहाँ त तनाव हर आँगन भा शहरी फ्लैट के हर कमरा तक पहुँच गइल बा। ना यकीन होखे त कचहरी जाके डिवोर्स के केस देखीं। खेत के डंरार खातिर कपारफोरउअल आ मुकदमाबाजी देखीं। त ना पति-पत्नी में पटsता, ना सहोदर भाई में। समाज में त कुछ कुक्कुरन के गोल बनले बा जवन खाली निगेटिविटी फइलावे खातिर जनमल बाड़न स। आखिर हर 40 सेकेंड पर एगो आदमी आत्महत्या काहे करsता। ई हम नइखीं कहत, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के रिपोर्ट कहs ता। .. आ एह में ज्यादा नौजवाने लोग शामिल बा।

केहू के बेवक्त मूअल बहुत खतरनाक होला। ऊ अपना साथे परिवार में केतना लोग के मार देला, जिंदा लाश बना देला। एह से जहां तक संभव होखे, जइसे संभव होखे, अइसन मौत के रोके के कोशिश होखे के चाहीं। मित्र, परिवार अउर इंसानियत से भरल अन्य लोग भी अवसाद, विषाद, तनाव, निराशा आ पीड़ा में आकंठ डूबल लोग के साथे खड़ा होखे। ओकरा के अकेला मत छोड़े। ओकरा के समझा के, बुझा के, गला लगा के, बीच-बचाव क के, पंचायती क के, ओकरा साथे खड़ा होके, आर्थिक, मानसिक भा शारीरिक सहयोग क के ओकरा के बचावे, जिंदगी देवे। इहे मानवता ह।

राक्षसन के काम त दोसरा के तकलीफ में अट्टहास कइल ह। पीड़ित आदमी के भी एह सच्चाई के स्वीकार कर लेवे के चाहीं। एहू बात के पक्का यकीन होखे के चाहीं कि जे दोसरा खातिर गड्ढा खोदेला, ईश्वर ओकरा खातिर गड्ढा खोद देलें। ईश्वर के सत्ता पर भरोसा करे के चाहीं। एह से तनाव कम होई। हर युग में एह दुनिया में अच्छा आ बुरा आदमी रहल बा। एह से समस्या त रही। हमेशा रही, अलग-अलग रूप में। ओकर असर रउरा तन आ मन पर कम से कम पड़े, ओकरा खातिर अपना के अंदर से मजबूत करे के पड़ी। साधना करे के पड़ी। फॉर्गेट एंड फॉर्गिव के फार्मूला अपनावहीं के पड़ी। अपना दिमाग के प्यार के कटोरा बनावे के पड़ी। ओह में नफरत टिकी ना। नफरत ना रही त अवसाद, विषाद आ टेंशन ना रही। एकरा खातिर मेडिटेशन, मेडिकेशन, योगा, काउंसिलिंग, पूजा-प्रार्थना जवन जरूरी होखे कइल जाय।

जिंदगी तोहफा ह। वरदान ह। एकरा के असमय मौत से बचावल जाय। मौत से बेहतर बा चीखल-चिल्लाइल, गरियावल चाहे जी भर के रोअल। दुख भा तनाव के आउटलेट चाहीं। आँख में लोर के सूखल एगो सैलाब के दावत दिहल ह। हमरा कविता ‘’ यादें और चुप्पियां’’ के एगो अंश बा –

यादें और चुप्पियाँ एक दुसरे के directly proportional होतीं हैं

चुप्पियाँ ..यादों के समन्दर में डुबोती चली जाती हैं

कहते हैं .. खामोशी और बोलती है …..echo भी करती है .

पगला देती है आदमी को …..

इसलिए शब्दों का और आंसुओं का बाहर निकलना बहुत जरुरी है.

दिमाग से कचड़ा बाहर निकाले के यत्न होखे। विध्वंस कवनो रास्ता ना ह। सम्राट अशोक विध्वंस भी कइलें आ प्रेम भी। .. बाद में प्रेमे के रास्ता अपनवलें। बेटो-बेटी के प्रेमे के राह धरवले। प्रेमे ईलाज बा नफरत के। प्रेमे ईलाज बा तनाव के। दिमाग के प्रेम के कटोरा बना लीं। सब ठीक हो जाई। …बाकी खातिर दुर्गा मईया बाड़ी नू। जय माता दी!

नवरात्रि के हार्दिक शुभकामना!

प्रणाम !

मनोज भावुक


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min4300

मनोज भावुक     

एगो गुलाम आदमी बाहरे से ना, भीतरो से गुलाम होला काहे कि ओकरा मन के भा मन से कुछुओ त होला ना। बलुक साँच कहीं त ओकर मन ओकर रहबे ना करेला। ओकरा त दोसरा के हिसाब से चले के पड़ेला।

… ठीक ओइसहीं नफरत आ कुंठा भरल मन के हालत होला। नफरत अपना हिसाब से आदमी के चलावेला। प्रेम में मन क्रिएटिव होला…कंस्ट्रक्टिव होला। नफरत में डिस्ट्रक्टिव।

आजादी के मूल में प्रेम बा। देश से प्रेमे रहे कि देश आजाद भइल। फेर से प्रेम पैदा कइल जाय। प्रेम रही त देश सुरक्षित रही। देश प्रगति करी। ना त जाति-पाति, धर्म-सम्प्रदाय, पार्टी-पउआ के दीवार पर नफरत के आग में देश धधकते बा।

प्रेम मानवीय गुण ह। नफरत दानवीय। प्रेम से भरल आदमी दोसरा के ह्रदय परिवर्तन क सकेला। नफरत से भरल आदमी नफरते पैदा करी। जहाँ नफरत रही, उहाँ आजादी रहिये नइखे सकत।

असली आजादी ह अपना के नफरत से मुक्त कइल। असली आजादी ह अपना के निगेटिविटी से मुक्त कइल। काहे कि जवना मन में ई सब रही उ मन उन्मुक्त कइसे रही? आज़ाद कइसे रही? उ त रात-दिन इर्ष्या, द्वेष, साजिश, सियासत आ नकारात्मकता के गुलामी के जंजीर में जकड़ल रही। उ जहाँ रही दुर्गंध फइलाई, जहर बोयी त जाहिर बा कि उहाँ खाली तनाव आ अशांतिये रही।

असली आजादी ह अमन हासिल कइल। अमन मन में। अमन समाज में। अमन देश में। जवना घर में दिन रात लड़ाई-झगड़ा होला, कुकुराहट होला, उ घर बर्बाद हो जाला। उहाँ कवनो क्रिएटिव काम होइए ना पावे। सभकर दिमाग दोल्हा-पाती में लागल रहेला।

वैचारिक मतभेद संभव बा बाकिर मतभेद के मतलब इर्ष्या, द्वेष, साजिश, लड़ाई ना ह। मतभेद के उदेश्य अल्टरनेटिव के सुझाव ह। विपक्ष के भूमिका सरकार के विरोधे कइल ना ह, बलुक देश के बेहतरी खातिर सरकार के सही निर्णय में साथो दीहल ह।

दरअसल, जेकरा अंदर दया, करुणा आ प्रेम के भाव ना होई, ओकरा ई कुल्ही बुझइबे ना करी। माता-पिता भी कई गो बिंदु पर, कई गो बात पर अपना संतान के विरोध करेलें बाकिर उ विरोध बेहतरी खातिर होला। बात बस अतने बा। एही भाव के समझे के बा। जेल भी सुधार खातिर बनल। कोर्ट भी दूनू पक्ष के बात निष्पक्ष होके सुने आ न्याय करे खातिर बनल बाकिर जहाँ-जहाँ करप्शन घूस गइल, उहाँ से नैतिकता गायब हो गइल आ साथ हीं असल आजादी ख़तम हो गइल।

अब देश जाति-पाति, गोल-गुट आ कई गो खेमा में बंट के विरोध करे खातिर विरोध करता। एह में सच्चा आदमी अकेला पड़ जाता। झूठा भा लबरा झूठ के भी अइसे आ एतना गावत बाड़न स कि लोग के झुठवे साँच लागे लागत बा। इहे खतरनाक बा।

दरअसल, आदमी के अंदर आदमीयत ना रही, दया, करुणा आ प्रेम के भाव ना रही त एही तरह के विरोध होई। विरोध करे खातिर विरोध। अइसना में चलनियो हँसेला सूप के जेकरा में सहत्तर गो छेद।

स्वार्थ, नफरत आ अहंकार के चलते देश आ समाज में उथल-पुथल बा। आजाद देश में आम आदमी घुटन महसूस करता। प्रेम, सौहार्द आ मानवता के संचार क के देश के हर नागरिक के आजादी के एहसास करावल जा सकता। प्रेम अंगुलीमाल के बदल देलस। डाकू रत्नाकर के महर्षि बाल्मीकि बना देलस। प्रेम में ह्रदय परिवर्तन के ताकत होला। जेकरा के आपन समझल जाई, ओकरा से प्रेम होखबे करी। कम से कम अपना-अपना ईगो के खोल से बहरी निकल के देश के हर नागरिक के आपन समझल जाय। असल आजादी इहे बा।

प्रणाम।


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min4540

मनोज भावुक

अपना समय के बात, करेंट अफेयर्स आ  देश-विदेश आ समाज के तत्कालिक स्थिति पर बोलल आ विमर्श कइल पत्रकारिता के प्रधान धर्म ह।

हालाँकि “भोजपुरी जंक्शन” भोजपुरी साहित्य, सिनेमा, संगीत, राजनीति आ तीज-त्यौहार के समेटत, परंपरा आ आधुनिकता के समन्वय के नाम ह, एकर अधिकांश अंक विशेषांक के रूप में प्रकाशित भइल बा, तेहू पर हरेक अंक में एगो अनिवार्य स्तंभ देश के दशा-दिशा पर मुखर होके बोलत-बतियावत रहल बा, समय के राग सुनावत रहल बा। एह स्तंभ के नाम बा- सुनीं सभे आ लेखक बानी वरिष्ठ पत्रकार, पूर्व राज्य सभा सांसद आ एह पत्रिका के प्रधान संपादक श्री रवींद्र किशोर सिन्हा।

एही महीना में 22 सितंबर के सिन्हा जी के जन्मदिन बा त भोजपुरी जंक्शन परिवार ई तय कइलस कि काहे ना भोजपुरी जंक्शन के हर अंक में बिखरल अपना समय के दस्तावेज ” सुनीं सभे” के संग्रह करके एगो विशेषांक के रूप दे दिहल जाय। त लीं, “सुनीं सभे विशेषांक” सुनीं सभे, गुनीं सभे आ अपना बहुमूल्य सुझाव से अवगत कराईं सभे।

भोजपुरी में कविता, कहानी, नाटक आदि के संग्रह ढेर बा। जहाँ तक हमरा जानकारी बा, करेंट अफेयर्स पर भी लिखात रहल बा बाकिर उ संग्रह के रूप में नइखे आइल या बहुत कम आइल बा। एह लिहाज से ई संग्रह भोजपुरी के रचना संसार के समृद्ध करी आ एगो नया आयाम दी।

एह अंक के साथे भोजपुरी जंक्शन दुसरका साल में प्रवेश करsता। भोजपुरी जंक्शन के ई पचीसवां अंक ह। एकरा पहिले “हम भोजपुरिआ” के चौदह गो अंक निकल चुकल बा। एह सब अंक में से अधिकांश विशेषांके बा, जइसे कि महात्मा गाँधी विशेषांक, वसंत अंक, फगुआ अंक, चइता अंक, वीर कुँवर सिंह अंक, लोक में राम अंक, कोरोना विशेषांक, कोरोना कवितावली, चीन अंक, दशहरा अंक, छठ विशेषांक, गिरमिटिया अंक, रजिंदर बाबू अंक, किसान अंक, नया साल अंक, माई-बाबूजी विशेषांक, माई-बाबूजी कवितावली आ देशभक्ति अंक आदि।

एह सब अंक में “सुनीं सभे” अनिवार्य रूप से शामिल बा। इहाँ तक कि विशेषांक के विषय चाहे जे होखे, “सुनीं सभे” ओकरा से इतर देश आ समाज के वर्तमान स्थिति पर बात करत रहल बा। इहे एह स्तंभ के खासियत बा, खुशबू बा, अनोखापन बा।

‘’ सुनीं सभे ‘’ के लेखक श्री रवींद्र किशोर सिन्हा के पत्रकारिता के मूलाधार राष्ट्रीयता के भाव बा; जवना के गूँज-अनुगूँज एह विशेषांक में संकलित सब लेख में सुनाई पड़sता। एह संग्रह में संकलित सब लेख अपना-अपना समय के कहानी कहत बा। ‘’ सुनीं सभे ‘’ वाकई ध्यान से सुने लायक बा काहे कि ओह में देश आ समाज खातिर खाली चिन्ते नइखे, चिंता से मुक्ति के उपायो बतावल गइल बा। समस्या के समाधान भी सुझावल गइल बा।

एह से, एह स्तंभ के सब आलेख के संग्रह के रूप में परोसत अपार खुशी हो रहल बा। उम्मीद बा, अपने सभे के स्नेह-दुलार मिली।

अंत में, ‘’ सुनीं सभे ‘’ के लेखक सिन्हा जी के जन्मदिन के मंगलकामना।

प्रणाम।


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Hum BhojpuriaJuly 8, 20211min6740

संपादक- मनोज भावुक

विचार से बढ़ के ताकतवर दुनिया में कुछु नइखे। मन में जब जइसन विचार चलेला, देह आ चेहरा के हाव-भाव ओइसने हो जाला। विचार में सुख के दुःख आ दुःख के सुख में बदले के ताकत बा। महत्वपूर्ण ई बा कि हम कवनो घटना के कइसे देखत बानी। देखे के ताकत आँख में ना, विचार में होला। आँख त बस एगो कैमरा ह। असल चीज त मनवे बा। मन विचार के कारखाना ह।

मन कइसन बनी, ई बहुत कुछ माई-बाप पर भी निर्भर करेला। माई-बाप के पहिला गुरु कहल जाला। कुम्हार कहल जाला। संतान त माटी ह, जवना के सान के माई-बाप रूपी कुम्हार मुकम्मल शेप देला, मतलब लइकन के आदमी बनावेला। एगो बात दिल से कहsतानी। एह के रउरो मानब। केतनो बाउर माई-बाप होखे, क्रिमिनले काहें ना होखे, उहो ना चाही जे ओकर औलाद बुरा होखे। उहो चाहेला कि ओकर बेटा-बेटी इंसान बने।

बाकी परवरिश आ परिवेश दूनो के असर होला। माई-बाप के डीएनए त रहबे करेला। ओह गुणसूत्र से गुण-दोष त अइबे करेला। एही से नू औलाद के माई-बाप के छाया भा प्रतिरूप कहल जाला।

माई-बाप प लिखल आसान ना होला। जे रउरा के लिखले बा, ओकरा प रउरा का लिखब जी ? ओकरा के शब्द में कइसे बान्हब ? हं ! अपना जिंदगी के ओह लेखक खातिर संवेदना के चार गो शब्द समर्पित कर सकीले। एह अंक में उहे चार गो शब्द उकेरे के कोशिश कइल गइल बा। बाकिर ई कोशिश भी पानी प पानी लिखे के कोशिश जइसन बा।

‘’ माई-बाबूजी विशेषांक ‘’ के संपादन के दौरान केतना बार हमार आँख लोराइल बा, कह नइखीं सकत। एह अंक में किसिम-किसिम के दुनिया समाइल बा। दुःख के दरियाव बा। सुख के समुन्दर बा। हम केतना पंवड़ी ? कई बार त लागल कि डूब गइनी।

कुछ विद्वान लोग माई-बाबूजी के भगवान के प्रतिनिधि कहले बा। कहले बा कि चूँकि ईश्वर हर जगह नइखन पहुँच सकत, एह से उ माई-बाप के गढ़ले। कुछ लोग त इहाँ तक कहले बा कि का जाने भगवान होलें कि ना होलें, दुःख सुनेलें कि ना सुनेलें बाकिर माई-बाबूजी त बेकहले दुःख बूझ जालें आ छटपटा के, बेचैन होके, अपना के खपा-मिटा के भी अपना बाल-बच्चा के मदद करेलें। त माइये-बाबूजी नू साक्षात भगवान बाड़ें।

हमार कहनाम बा कि माई-बाबूजी अच्छा-बुरा हो सकेलें। उहो इंसाने हउअन। सरधा से ओह लोग के भगवान भले कह दीं भा मान लीं बाकिर ई साँच बा कि उ लोग भगवान ना ह। त अगर ओह लोग से कवनो भूल हो जाय त दिल बड़ा क के भुला जाये के चाहीं। इंसान से भूल होला। होखे के त भगवानो से होला। बाकिर केहू के आदर्श भा भगवान मनला प भूल के पचावल तनी कठिन होला, एह से आदमी के आदमिये मानल ठीक होई। रउरा अपना माई-बाबूजी के सरधा से भगवान मानीं भा पूजीं, एह में कवनो दिक्कत नइखे। आसिरबादे मिली। बाकी अंधभक्त मत बनीं। अंधभक्त त केहू के बनल ठीक ना ह। चेतना के द्वार हरदम खुला रहे के चाहीं। हमनी के शास्त्र में लिखल बा –

सुशीलो मातृपुण्येन, पितृपुण्येन चातुरः ।

औदार्यं वंशपुण्येन, आत्मपुण्येन भाग्यवान ।।

अर्थात- कवनों भी इंसान अपना माता के पुण्य से सुशील होला। पिता के पुण्य से चतुर होला। वंश के पुण्य से उदार होला आ अपना स्वयं के पुण्य से उ भाग्यवान बनेला।

त सौभाग्य प्राप्ति खातिर सत्कर्म त करहीं के पड़ी !

संतान के कर्म अइसन होखे कि माई-बाबूजी लोग ओकरा प गर्व करे आ दिल से दुआ देव अउर  माइयो-बाबूजी लोग अइसन होखे कि संतान उनका के आपन आदर्श माने आ पूजे खातिर बाध्य हो जाय, एही कामना के साथ -प्रणाम !



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भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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