new-year-wishes.jpg

Hum BhojpuriaJanuary 17, 20221min500

अमर होके केहू नइखे आइल। जे आइल बा सेकरा जाहीं के बा। बाकिर कुछ लोग जाइयो के रह जाला …जेहन में, चित्त में, स्मृति में, इतिहास में, लोक में। मरियो के ना मरे आ बोलत-बतियावत रहेला अपना काम में, कृति में। हमार एगो शेर बा –

बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा

बहुत बा लोग जे जियते में यार मर जाला

जियते में मरे वाला पर बात फेर कबो। अभी त मरलो के बाद जे जीयत बा ओकर बात होता।

भोजपुरी जंक्शन ( हम भोजपुरिआ ) के जब शुरुआत भइल तबे से हमार मन रहे कि समसामयिक साहित्य लेखन के साथे-साथ ‘ भोजपुरी साहित्य के गौरव ’ स्तम्भ के अंतर्गत भोजपुरी के दिवंगत साहित्य सेवी लोग के व्यक्तित्व-कृतित्व पर आलेख छपत रहे ताकि सभे नींव के ईंट के जाने। नया पीढ़ी भोजपुरी के सामर्थ्य आ इतिहास से परिचित होखे। भूलल-बिसरल संस्मरण आ साहित्य सोझा आवे। सिलसिला शुरू भइल आ लेख लिखाये-छपाये लागल। लेकिन ई लमहर लेख रहे। दिवंगत साहित्यकार के व्यक्तित्व आ कृतित्व पर विहंगम दृष्टिपात।

तब लागल कि अइसे त बहुत समय लागी। कई बरिस लाग जाई सब साहित्यकार लोग के समेटे में।

तब, एह लमहर लेख के अलावा संक्षिप्त परिचय के सिलसिला भी शुरू भइल ताकि हरेक अंक में अधिक से अधिक साहित्य सेवी से परिचय करावल जा सके। ई काम आसान ना रहे। दू-चार गो साहित्यकार पर लिखल अलग बात बा आ एगो सीरीज के रूप में सब साहित्यकार लोग के समेटल बिल्कुल अलग बात। बाकिर एह कठिन काम के बीड़ा उठइनी पिछला चार दशक से मातृभाषा भोजपुरी खातिर समर्पित भाव से लागल डॉ. ब्रजभूषण मिश्र जी। मिश्र जी अपना आगे के दू पीढ़ी आ बाद के दू पीढ़ी के भोजपुरी साहित्य में अवदान के जानेवाला लोगन में एक बानी। भोजपुरी आंदोलन के इतिहास से परिचित बानी अउर अनवरत अपना के अपडेट करत रहीले।

भोजपुरी जंक्शन, लगभग दू साल के सफर में, अपना अलग-अलग अंक में भोजपुरी के एक सौ एक दिवंगत साहित्य सेवियन के परिचय छाप चुकल बा अउर ई सिलसिला आगे भी जारी रही काहे कि अभी लमहर लिस्ट बा।

एक सौ एक के संख्या बड़ा शुभ होला। नया साल (2022) आवता। भगवान करस इहो शुभ होखे। नया साल के सौगात के रूप में भोजपुरी के एक सौ एक दिवंगत साहित्य सेवियन के परिचय एह अंक में प्रस्तुत करत हमरा अपार खुशी होता आ एकरा खातिर एकरा लेखक डॉ.ब्रजभूषण मिश्र जी के प्रति आभार प्रकट करत बानी।

प्रणाम

मनोज भावुक


img1256-1280x1768.jpg

Hum BhojpuriaDecember 10, 20211min1100

संस्मरण का ह ? याददाश्त ह। मेमोरी ह। याददाश्त कवना रुप में दिमाग पर छपल बा, केतना गहराई के साथे मन में बइठल बा, ओही तासीर आ भावना के साथे दिलोदिमाग में गूँजेला। दरअसल संस्मरण अनुभव के अँटिया ह, जवन बोझा बन्हा जाला मन के ढोये खातिर।

जब लइका पैदा होला त अपना होश सम्हरला ले, अपना नजर में ना उ हिन्दू होला, ना मुसलमान, ना बाभन होला ना बनिया, ना इंडियन होला, ना अमेरिकन। एही से उ मस्त रहेला। छने में लड़े-झगड़ेला आ छने में सब भुला के साथे खेले लागेला। उ अपना ओरिजिनल रुप में रहेला। कुछुओ ओढ़ले-बिछौले ना रहेला। ओकर दिमाग खाली रहेला। विचार शून्य रहेला। याददाश्त के कचरा ना भरल रहेला।

कचरा शब्द के प्रयोग हम एह से कइनी ह कि एगो सांसारिक आदमी के दिमाग में याददाश्त के नाम पर कुछ जरूरी इन्फॉर्मेशन के छोड़ के ढ़ेर फालतुये बात होला। कवनो तरीका से अगर ई फालतू बात, ई सब बकवास दिमाग से निकल जाये त आदमी फेर लइका बन जाला, अपना मूल स्वरूप में आ जाला। आदमी के मूल स्वरूप आनंद के ह।

बाकिर आज अधिकांश आदमी दुखी बा, परेशान बा। कुछ दुख जेनुइन बा। ऊ आर्थिक बा, शारीरिक बा। कुछ दुख मानसिक बा। मानसिक दुख के अधिकांश हिस्सा अइसने कचरा वाला याददाश्त के चलते बा, जवन बढ़त उम्र के साथ हमनी के इकठ्ठा कइले बानी जा। एजुकेशन, धर्म, राजनीतिक पार्टी, अलग-अलग गोल, गुट, समाज, सरहद आदि से जुड़ला से जइसन इन्फॉर्मेशन एह दिमाग में फीड भइल, ओइसने याददाश्त बनल, ओइसने संस्मरण। …

अउर इहे संस्मरण आगे के जीवन खातिर रेगुलेटर के काम करेला, डिसीजन मेकर के काम करेला। एगो अर्थ में संस्मरण के रउरा अनुभव भी कह सकेनी। अनुभव आदमी के कई गो मुहावरा देले बा जइसे कि दूध के जरल मट्ठा फूंक-फूंक के पीयेला। अनुभव न जाने केतना गीत-गजल, कविता देले बा। हमरे एगो शेर बा –

अइसहीं ना नू गजल-गीत लिखेलें भावुक

वक्त इनको के बहुत नाच नचवले होई

बाकिर सब अनुभव छंद के बंध में बन्हइबो त ना करे। एह संदर्भ में हमार कुछ शेर हाजिर बा –

दफ़्न बा दिल में तजुर्बा त बहुत ए भावुक

छंद के बंध में सब काहे समाते नइखे

चाहे

अनुभव नया-नया मिले भावुक हो रोज-रोज

पर गीत आ गजल में ले कवनो-कवनो बात

त बात भा अनुभव लेले केतना लोग मर गइल। केतना लोग भीतरे-भीतर घुटल भा खुश भइल। केतना लोग खुशी के मारे नाचल भा दुख से छाती पीटल। केतना लोग अपना नाती-पोता, पर-परिवार के साथे ( अगर उ सुने वाला आ सुने लायक भइल त ) आपन अनुभव, आपन संस्मरण साझा कइल।

ई अंक ओह खुशकिस्मत लोग के चलते बा जेकरा के भगवान ई हुनर देले बाड़े कि ऊ अपना अनुभव के कागज प उतार सके। अपना याददाश्त के लिपिबद्ध कर सके। एही से लेखक के क्रियेटर कहल जाला। ऊ लोर के गजल बना लेला, आग के कविता। घात-प्रतिघात, ठेस-ठोकर के कहानी-संस्मरण।

त सुख-दुख, आग-पानी, काँट-कूस, फूल-खुशबू, हँसी-खुशी, जहर-माहुर से भरल मन आ ओह मन के याददाश्त से उपजल समय-समय के बात हाजिर बा एह संस्मरण अंक में।

त काहे खातिर संस्मरण अंक? आनंद खातिर, दोसरा के अनुभव आ जानकारी से सीखे खातिर, सचेत रहे खातिर आ जिनगी के गहराई आ रहस्य के समझे खातिर।

बात प बात चलsता त कई गो बात मन परsता। ओही बात भा अनुभव भा एहसास से उपजल आपन कई गो शेर मन परsता। ओही में से एगो शेर के साथे आपन बात खतम करत बानी।

ऊ जौन देखलें, ऊ जौन भोगलें, ना भोगे आगे के नस्ल ऊ सब

एही से आपन कथा-कहानी कहत रहलें मनोज भावुक

प्रणाम

मनोज भावुक


Loy-Krathong-and-Yee-Peng-Lantern-Festivals-Chiang-Mai-Thailand.jpg

Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min1280

अक्टूबर-नवंबर के फेस्टिवल मन्थ यानी कि पूजा-पाठ के महीना कहल जाला। नवरात्र-दशहरा से दिवाली-छठ ले पूजे-पूजा। अनुष्ठाने-अनुष्ठान। एगो आध्यात्मिक माहौल। सवाल ई बा कि ई सब खाली पूजा के रस्म-अदायगी भर बा आ कि लोग बाग पर एकर असरो बा ?

कवनो दिया में कतनो तेल होखे, कतनो घीव होखे, उ बुताइल बा त ओकर महत्व नइखे। जरते दिया के मान बा। बुताइल दिया या त फेर से जरावल जाला या विसर्जन में चल जाला।

हमरा बुझाला कि पूजा-पाठ, प्रार्थना मन के दिया के जरावे खातिर होला। मन के शोधन खातिर होला। मन के रिचार्ज करे खातिर होला। कठिन से कठिन समय में भी सकारात्मक रहे खातिर होला, संभावना खोजे खातिर होला।

प्राण यमराज के हाथ में जाये ओकरा पहिले तक अपना हाथ में ठीक से रहे के चाहीं। ठीक से माने ठीक से। अपना नियंत्रण में। एही खातिर साधना कइल जाला। परमात्मा भा प्रकृति से जुड़ल जाला। अपना इहाँ के सब पूजा-पाठ आ तीज-त्योहार के वैज्ञानिक महत्व बा। ई सब अंततः स्वास्थ्य, शांति, सकून, शक्ति, साहस, समाधान, समृद्धि आ सद्भावना प्रदान करे खातिर बनल बा। ओकरा ऐतिहासिक महत्व के एगो अलग आयाम बा।

दशहरा आ नवरात्रि में राम गूँजत रहेलें। रामलीला चलत रहेला। खुद राम के लीला अपना आप में हर समस्या के समाधान समेटले बा। राम जेतना दुख, राम जेतना परीक्षा से के गुजरल बा? मंच भा टेलीविजन के रामलीला में दुख के ग्लैमराइज कइल गइल बा। लोग के ग्लैमराइज्ड दुख, विषाद भा लड़ाई देखे में मजा आवेला बाकिर जे ओकरा के भोगले बा, जे ओह में तपल बा, ओकरा से पूछीं। शायर साहिर लुधियानवी के एगो गीत के पंक्ति बा-

जो तार से निकली है वो धुन सब ने सुनी है

जो साज़ पे गुज़री है वो किस दिल को पता है

हिन्दी-उर्दू-भोजपुरी के शायर भाई साकेत रंजन प्रवीर के एगो शेर बा –

गम सुनावे में दम निकल जाला  

हं मगर मन तनी बहल जाला

गम, दुख, पीड़ा, कष्ट, तनाव जिंदगी के हिस्सा ह। ई सब ऊर्जा के क्षीण करेला। मन के बैटरी के डाउन करेला। हमरा समझ से पूजा-पाठ, योग-अनुष्ठान, ध्यान आदि मन के चार्ज करे खातिर होला ताकि कष्ट, बीमारी, दुख आदि होखबो करे त ओकर एहसास ना होखे भा कम होखे। बाहर में कतनों हलचल होखे, अंदर (मन) शांत होखे। इहे साधना ह। साध लेला पर ई संगीत जइसन लागेला।

मनोज भावुक के एगो शेर बा –

दुखो में ढूंढ ल ना राह भावुक सुख से जीये के

दरद जब राग बन जाला त जिनगी गीत लागेला

आ साँच पूछीं त जिनगी गीते ह, बस एकरा के राग आ लय में रखे के पड़ी। समय, परिस्थिति आ कुछ राक्षसी प्रवृति के लोग रउरा के बेलय करे के कोशिश करी बाकिर साधना इहे ह कि बाहरी परिस्थिति के असर अंदर ना पड़े। मुश्किल समय भी संभावना बन जाय। दरअसल हर समस्या में एगो संभावना छुपल रहेला, बस सकारात्मक नजरिया के बात बा।

एक बार, जहां एक आदमी बेरोजगारी के रोना रोअत रहे, उहें दुसरका बेरोजगार आदमी कहलस- “ हमनी के सौभाग्यशाली बानी जा कि बेरोजगार बानी जा। बेरोजगार आदमी के पास असीम संभावना बा। उ कुछओ कर सकेला। कुछओ बन सकेला। काहे कि उ कवनो खूँटा से नइखे बंधल। बंधन मुक्त बा। जे  डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस बन गइल बा या कवनो खास प्रोफेशन से बंध गइल बा, उ बंध गइल बा। हमनी कहीं से, कुछुओ से बंधल नइखीं त हमनी खातिर आकाश खुला बा। पूरा आकाश आपन बा। कहीं उड़ सकत बानी जा। “

कहे के मतलब कि हर परिस्थिति में सकारात्मक नजरिया रखल जा सकेला। हर जगह संभावना बा। दुख, निराशा आ परेशानी जइसन कवनो चीज हइये नइखे। आत्मा के असली प्रकृति उल्लास ह। देह आ मन त बाहरी चीज ह। अध्यात्म सोच के इहाँ तक पहुंचा देला। एह साँच तक पहुँचा देला। इहाँ तक पहुंचे में पूजा-प्रार्थना, योग, ध्यान, स्वाध्याय, उपवास, व्रत आदि मदद करेला। एह सब से आत्मा के रिचार्ज करीं।

दशहरा, नवमी, दियरी-बाती आ छठ के शुभकामना के साथ

प्रणाम

मनोज भावुक


Pixabay_Goddess-Durga_Navratri_1200.jpg

Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min2340

मनुष्य के सबसे बड़ उपलब्धि बा कि ओकरा पास एगो विकसित दिमाग बा लेकिन साथ हीं सबसे बड़ परेशानियो के कारण इहे बा। दिमगवे नू तनाव के घर ह।

हाल हीं में भइल सर्वे के अनुसार दुनिया में 86 प्रतिशत लोग तनाव के शिकार बा। अपना देश भारत में त 89 प्रतिशत लोग ‘टेंशन’ में जीयsता। दुनिया में एतना नफरत फइलल कि तरह-तरह के बम आ मिसाइल बनल। प्यार आ मुहब्बत खातिर कुछ बनल कहाँ? प्यार के संदेश देवे वाला भा कोशिश करे वाला के त अक्सर जहर पियावल गइल।

कहे के मतलब कि दुनिया में ज्यादा डिस्ट्रक्टिवे लोग बा। दोसरा के परेशान, दुखी भा तनाव में देख के खुश होखे वाला लोग। एही से सिनेमो में अइसन दृश्य खूब देखावल जाला।

देश के भीतर जाति-धर्म-संप्रदाय-भाषा आदि के आधार पर जवन ग्रुप, गैंग आ खेमा बनल ओह में वैचारिक मतभेद मनभेद तक पहुंचल आ लोग एक-दुसरा के नीचा देखावे खातिर नीचता के स्तर पर उतरे लागल। राष्ट्र, मानवता आ समाज के हित के फिकिर छोड़ के सामने वाला के मान-मर्दन खातिर हुलेलेले में लाग गइल। एक-दुसरा के हौसला देवे के बजाय तनाव देवे में लाग गइल आ पूरा देश भा पूरा विश्व तनावग्रस्त हो गइल।

सवाल ई बा कि कवनों भी देश भा समाज जब एही सब में लागल रही त उ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आ सृजन पर कइसे फोकस करी?

विकास खातिर भा क्रियेशन खातिर एगो सकारात्मक माहौल जरूरी होला, तनावमुक्त मन जरूरी होला। इहाँ त तनाव हर आँगन भा शहरी फ्लैट के हर कमरा तक पहुँच गइल बा। ना यकीन होखे त कचहरी जाके डिवोर्स के केस देखीं। खेत के डंरार खातिर कपारफोरउअल आ मुकदमाबाजी देखीं। त ना पति-पत्नी में पटsता, ना सहोदर भाई में। समाज में त कुछ कुक्कुरन के गोल बनले बा जवन खाली निगेटिविटी फइलावे खातिर जनमल बाड़न स। आखिर हर 40 सेकेंड पर एगो आदमी आत्महत्या काहे करsता। ई हम नइखीं कहत, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के रिपोर्ट कहs ता। .. आ एह में ज्यादा नौजवाने लोग शामिल बा।

केहू के बेवक्त मूअल बहुत खतरनाक होला। ऊ अपना साथे परिवार में केतना लोग के मार देला, जिंदा लाश बना देला। एह से जहां तक संभव होखे, जइसे संभव होखे, अइसन मौत के रोके के कोशिश होखे के चाहीं। मित्र, परिवार अउर इंसानियत से भरल अन्य लोग भी अवसाद, विषाद, तनाव, निराशा आ पीड़ा में आकंठ डूबल लोग के साथे खड़ा होखे। ओकरा के अकेला मत छोड़े। ओकरा के समझा के, बुझा के, गला लगा के, बीच-बचाव क के, पंचायती क के, ओकरा साथे खड़ा होके, आर्थिक, मानसिक भा शारीरिक सहयोग क के ओकरा के बचावे, जिंदगी देवे। इहे मानवता ह।

राक्षसन के काम त दोसरा के तकलीफ में अट्टहास कइल ह। पीड़ित आदमी के भी एह सच्चाई के स्वीकार कर लेवे के चाहीं। एहू बात के पक्का यकीन होखे के चाहीं कि जे दोसरा खातिर गड्ढा खोदेला, ईश्वर ओकरा खातिर गड्ढा खोद देलें। ईश्वर के सत्ता पर भरोसा करे के चाहीं। एह से तनाव कम होई। हर युग में एह दुनिया में अच्छा आ बुरा आदमी रहल बा। एह से समस्या त रही। हमेशा रही, अलग-अलग रूप में। ओकर असर रउरा तन आ मन पर कम से कम पड़े, ओकरा खातिर अपना के अंदर से मजबूत करे के पड़ी। साधना करे के पड़ी। फॉर्गेट एंड फॉर्गिव के फार्मूला अपनावहीं के पड़ी। अपना दिमाग के प्यार के कटोरा बनावे के पड़ी। ओह में नफरत टिकी ना। नफरत ना रही त अवसाद, विषाद आ टेंशन ना रही। एकरा खातिर मेडिटेशन, मेडिकेशन, योगा, काउंसिलिंग, पूजा-प्रार्थना जवन जरूरी होखे कइल जाय।

जिंदगी तोहफा ह। वरदान ह। एकरा के असमय मौत से बचावल जाय। मौत से बेहतर बा चीखल-चिल्लाइल, गरियावल चाहे जी भर के रोअल। दुख भा तनाव के आउटलेट चाहीं। आँख में लोर के सूखल एगो सैलाब के दावत दिहल ह। हमरा कविता ‘’ यादें और चुप्पियां’’ के एगो अंश बा –

यादें और चुप्पियाँ एक दुसरे के directly proportional होतीं हैं

चुप्पियाँ ..यादों के समन्दर में डुबोती चली जाती हैं

कहते हैं .. खामोशी और बोलती है …..echo भी करती है .

पगला देती है आदमी को …..

इसलिए शब्दों का और आंसुओं का बाहर निकलना बहुत जरुरी है.

दिमाग से कचड़ा बाहर निकाले के यत्न होखे। विध्वंस कवनो रास्ता ना ह। सम्राट अशोक विध्वंस भी कइलें आ प्रेम भी। .. बाद में प्रेमे के रास्ता अपनवलें। बेटो-बेटी के प्रेमे के राह धरवले। प्रेमे ईलाज बा नफरत के। प्रेमे ईलाज बा तनाव के। दिमाग के प्रेम के कटोरा बना लीं। सब ठीक हो जाई। …बाकी खातिर दुर्गा मईया बाड़ी नू। जय माता दी!

नवरात्रि के हार्दिक शुभकामना!

प्रणाम !

मनोज भावुक


images-8.jpg

Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2780

मनोज भावुक     

एगो गुलाम आदमी बाहरे से ना, भीतरो से गुलाम होला काहे कि ओकरा मन के भा मन से कुछुओ त होला ना। बलुक साँच कहीं त ओकर मन ओकर रहबे ना करेला। ओकरा त दोसरा के हिसाब से चले के पड़ेला।

… ठीक ओइसहीं नफरत आ कुंठा भरल मन के हालत होला। नफरत अपना हिसाब से आदमी के चलावेला। प्रेम में मन क्रिएटिव होला…कंस्ट्रक्टिव होला। नफरत में डिस्ट्रक्टिव।

आजादी के मूल में प्रेम बा। देश से प्रेमे रहे कि देश आजाद भइल। फेर से प्रेम पैदा कइल जाय। प्रेम रही त देश सुरक्षित रही। देश प्रगति करी। ना त जाति-पाति, धर्म-सम्प्रदाय, पार्टी-पउआ के दीवार पर नफरत के आग में देश धधकते बा।

प्रेम मानवीय गुण ह। नफरत दानवीय। प्रेम से भरल आदमी दोसरा के ह्रदय परिवर्तन क सकेला। नफरत से भरल आदमी नफरते पैदा करी। जहाँ नफरत रही, उहाँ आजादी रहिये नइखे सकत।

असली आजादी ह अपना के नफरत से मुक्त कइल। असली आजादी ह अपना के निगेटिविटी से मुक्त कइल। काहे कि जवना मन में ई सब रही उ मन उन्मुक्त कइसे रही? आज़ाद कइसे रही? उ त रात-दिन इर्ष्या, द्वेष, साजिश, सियासत आ नकारात्मकता के गुलामी के जंजीर में जकड़ल रही। उ जहाँ रही दुर्गंध फइलाई, जहर बोयी त जाहिर बा कि उहाँ खाली तनाव आ अशांतिये रही।

असली आजादी ह अमन हासिल कइल। अमन मन में। अमन समाज में। अमन देश में। जवना घर में दिन रात लड़ाई-झगड़ा होला, कुकुराहट होला, उ घर बर्बाद हो जाला। उहाँ कवनो क्रिएटिव काम होइए ना पावे। सभकर दिमाग दोल्हा-पाती में लागल रहेला।

वैचारिक मतभेद संभव बा बाकिर मतभेद के मतलब इर्ष्या, द्वेष, साजिश, लड़ाई ना ह। मतभेद के उदेश्य अल्टरनेटिव के सुझाव ह। विपक्ष के भूमिका सरकार के विरोधे कइल ना ह, बलुक देश के बेहतरी खातिर सरकार के सही निर्णय में साथो दीहल ह।

दरअसल, जेकरा अंदर दया, करुणा आ प्रेम के भाव ना होई, ओकरा ई कुल्ही बुझइबे ना करी। माता-पिता भी कई गो बिंदु पर, कई गो बात पर अपना संतान के विरोध करेलें बाकिर उ विरोध बेहतरी खातिर होला। बात बस अतने बा। एही भाव के समझे के बा। जेल भी सुधार खातिर बनल। कोर्ट भी दूनू पक्ष के बात निष्पक्ष होके सुने आ न्याय करे खातिर बनल बाकिर जहाँ-जहाँ करप्शन घूस गइल, उहाँ से नैतिकता गायब हो गइल आ साथ हीं असल आजादी ख़तम हो गइल।

अब देश जाति-पाति, गोल-गुट आ कई गो खेमा में बंट के विरोध करे खातिर विरोध करता। एह में सच्चा आदमी अकेला पड़ जाता। झूठा भा लबरा झूठ के भी अइसे आ एतना गावत बाड़न स कि लोग के झुठवे साँच लागे लागत बा। इहे खतरनाक बा।

दरअसल, आदमी के अंदर आदमीयत ना रही, दया, करुणा आ प्रेम के भाव ना रही त एही तरह के विरोध होई। विरोध करे खातिर विरोध। अइसना में चलनियो हँसेला सूप के जेकरा में सहत्तर गो छेद।

स्वार्थ, नफरत आ अहंकार के चलते देश आ समाज में उथल-पुथल बा। आजाद देश में आम आदमी घुटन महसूस करता। प्रेम, सौहार्द आ मानवता के संचार क के देश के हर नागरिक के आजादी के एहसास करावल जा सकता। प्रेम अंगुलीमाल के बदल देलस। डाकू रत्नाकर के महर्षि बाल्मीकि बना देलस। प्रेम में ह्रदय परिवर्तन के ताकत होला। जेकरा के आपन समझल जाई, ओकरा से प्रेम होखबे करी। कम से कम अपना-अपना ईगो के खोल से बहरी निकल के देश के हर नागरिक के आपन समझल जाय। असल आजादी इहे बा।

प्रणाम।


Bhojpuri-junction-1-15-September-2021_page-0005.jpg

Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2790

मनोज भावुक

अपना समय के बात, करेंट अफेयर्स आ  देश-विदेश आ समाज के तत्कालिक स्थिति पर बोलल आ विमर्श कइल पत्रकारिता के प्रधान धर्म ह।

हालाँकि “भोजपुरी जंक्शन” भोजपुरी साहित्य, सिनेमा, संगीत, राजनीति आ तीज-त्यौहार के समेटत, परंपरा आ आधुनिकता के समन्वय के नाम ह, एकर अधिकांश अंक विशेषांक के रूप में प्रकाशित भइल बा, तेहू पर हरेक अंक में एगो अनिवार्य स्तंभ देश के दशा-दिशा पर मुखर होके बोलत-बतियावत रहल बा, समय के राग सुनावत रहल बा। एह स्तंभ के नाम बा- सुनीं सभे आ लेखक बानी वरिष्ठ पत्रकार, पूर्व राज्य सभा सांसद आ एह पत्रिका के प्रधान संपादक श्री रवींद्र किशोर सिन्हा।

एही महीना में 22 सितंबर के सिन्हा जी के जन्मदिन बा त भोजपुरी जंक्शन परिवार ई तय कइलस कि काहे ना भोजपुरी जंक्शन के हर अंक में बिखरल अपना समय के दस्तावेज ” सुनीं सभे” के संग्रह करके एगो विशेषांक के रूप दे दिहल जाय। त लीं, “सुनीं सभे विशेषांक” सुनीं सभे, गुनीं सभे आ अपना बहुमूल्य सुझाव से अवगत कराईं सभे।

भोजपुरी में कविता, कहानी, नाटक आदि के संग्रह ढेर बा। जहाँ तक हमरा जानकारी बा, करेंट अफेयर्स पर भी लिखात रहल बा बाकिर उ संग्रह के रूप में नइखे आइल या बहुत कम आइल बा। एह लिहाज से ई संग्रह भोजपुरी के रचना संसार के समृद्ध करी आ एगो नया आयाम दी।

एह अंक के साथे भोजपुरी जंक्शन दुसरका साल में प्रवेश करsता। भोजपुरी जंक्शन के ई पचीसवां अंक ह। एकरा पहिले “हम भोजपुरिआ” के चौदह गो अंक निकल चुकल बा। एह सब अंक में से अधिकांश विशेषांके बा, जइसे कि महात्मा गाँधी विशेषांक, वसंत अंक, फगुआ अंक, चइता अंक, वीर कुँवर सिंह अंक, लोक में राम अंक, कोरोना विशेषांक, कोरोना कवितावली, चीन अंक, दशहरा अंक, छठ विशेषांक, गिरमिटिया अंक, रजिंदर बाबू अंक, किसान अंक, नया साल अंक, माई-बाबूजी विशेषांक, माई-बाबूजी कवितावली आ देशभक्ति अंक आदि।

एह सब अंक में “सुनीं सभे” अनिवार्य रूप से शामिल बा। इहाँ तक कि विशेषांक के विषय चाहे जे होखे, “सुनीं सभे” ओकरा से इतर देश आ समाज के वर्तमान स्थिति पर बात करत रहल बा। इहे एह स्तंभ के खासियत बा, खुशबू बा, अनोखापन बा।

‘’ सुनीं सभे ‘’ के लेखक श्री रवींद्र किशोर सिन्हा के पत्रकारिता के मूलाधार राष्ट्रीयता के भाव बा; जवना के गूँज-अनुगूँज एह विशेषांक में संकलित सब लेख में सुनाई पड़sता। एह संग्रह में संकलित सब लेख अपना-अपना समय के कहानी कहत बा। ‘’ सुनीं सभे ‘’ वाकई ध्यान से सुने लायक बा काहे कि ओह में देश आ समाज खातिर खाली चिन्ते नइखे, चिंता से मुक्ति के उपायो बतावल गइल बा। समस्या के समाधान भी सुझावल गइल बा।

एह से, एह स्तंभ के सब आलेख के संग्रह के रूप में परोसत अपार खुशी हो रहल बा। उम्मीद बा, अपने सभे के स्नेह-दुलार मिली।

अंत में, ‘’ सुनीं सभे ‘’ के लेखक सिन्हा जी के जन्मदिन के मंगलकामना।

प्रणाम।


f_page-0001-1_1625638238_1180X580_c_c_0_0.jpg

Hum BhojpuriaJuly 8, 20211min5290

संपादक- मनोज भावुक

विचार से बढ़ के ताकतवर दुनिया में कुछु नइखे। मन में जब जइसन विचार चलेला, देह आ चेहरा के हाव-भाव ओइसने हो जाला। विचार में सुख के दुःख आ दुःख के सुख में बदले के ताकत बा। महत्वपूर्ण ई बा कि हम कवनो घटना के कइसे देखत बानी। देखे के ताकत आँख में ना, विचार में होला। आँख त बस एगो कैमरा ह। असल चीज त मनवे बा। मन विचार के कारखाना ह।

मन कइसन बनी, ई बहुत कुछ माई-बाप पर भी निर्भर करेला। माई-बाप के पहिला गुरु कहल जाला। कुम्हार कहल जाला। संतान त माटी ह, जवना के सान के माई-बाप रूपी कुम्हार मुकम्मल शेप देला, मतलब लइकन के आदमी बनावेला। एगो बात दिल से कहsतानी। एह के रउरो मानब। केतनो बाउर माई-बाप होखे, क्रिमिनले काहें ना होखे, उहो ना चाही जे ओकर औलाद बुरा होखे। उहो चाहेला कि ओकर बेटा-बेटी इंसान बने।

बाकी परवरिश आ परिवेश दूनो के असर होला। माई-बाप के डीएनए त रहबे करेला। ओह गुणसूत्र से गुण-दोष त अइबे करेला। एही से नू औलाद के माई-बाप के छाया भा प्रतिरूप कहल जाला।

माई-बाप प लिखल आसान ना होला। जे रउरा के लिखले बा, ओकरा प रउरा का लिखब जी ? ओकरा के शब्द में कइसे बान्हब ? हं ! अपना जिंदगी के ओह लेखक खातिर संवेदना के चार गो शब्द समर्पित कर सकीले। एह अंक में उहे चार गो शब्द उकेरे के कोशिश कइल गइल बा। बाकिर ई कोशिश भी पानी प पानी लिखे के कोशिश जइसन बा।

‘’ माई-बाबूजी विशेषांक ‘’ के संपादन के दौरान केतना बार हमार आँख लोराइल बा, कह नइखीं सकत। एह अंक में किसिम-किसिम के दुनिया समाइल बा। दुःख के दरियाव बा। सुख के समुन्दर बा। हम केतना पंवड़ी ? कई बार त लागल कि डूब गइनी।

कुछ विद्वान लोग माई-बाबूजी के भगवान के प्रतिनिधि कहले बा। कहले बा कि चूँकि ईश्वर हर जगह नइखन पहुँच सकत, एह से उ माई-बाप के गढ़ले। कुछ लोग त इहाँ तक कहले बा कि का जाने भगवान होलें कि ना होलें, दुःख सुनेलें कि ना सुनेलें बाकिर माई-बाबूजी त बेकहले दुःख बूझ जालें आ छटपटा के, बेचैन होके, अपना के खपा-मिटा के भी अपना बाल-बच्चा के मदद करेलें। त माइये-बाबूजी नू साक्षात भगवान बाड़ें।

हमार कहनाम बा कि माई-बाबूजी अच्छा-बुरा हो सकेलें। उहो इंसाने हउअन। सरधा से ओह लोग के भगवान भले कह दीं भा मान लीं बाकिर ई साँच बा कि उ लोग भगवान ना ह। त अगर ओह लोग से कवनो भूल हो जाय त दिल बड़ा क के भुला जाये के चाहीं। इंसान से भूल होला। होखे के त भगवानो से होला। बाकिर केहू के आदर्श भा भगवान मनला प भूल के पचावल तनी कठिन होला, एह से आदमी के आदमिये मानल ठीक होई। रउरा अपना माई-बाबूजी के सरधा से भगवान मानीं भा पूजीं, एह में कवनो दिक्कत नइखे। आसिरबादे मिली। बाकी अंधभक्त मत बनीं। अंधभक्त त केहू के बनल ठीक ना ह। चेतना के द्वार हरदम खुला रहे के चाहीं। हमनी के शास्त्र में लिखल बा –

सुशीलो मातृपुण्येन, पितृपुण्येन चातुरः ।

औदार्यं वंशपुण्येन, आत्मपुण्येन भाग्यवान ।।

अर्थात- कवनों भी इंसान अपना माता के पुण्य से सुशील होला। पिता के पुण्य से चतुर होला। वंश के पुण्य से उदार होला आ अपना स्वयं के पुण्य से उ भाग्यवान बनेला।

त सौभाग्य प्राप्ति खातिर सत्कर्म त करहीं के पड़ी !

संतान के कर्म अइसन होखे कि माई-बाबूजी लोग ओकरा प गर्व करे आ दिल से दुआ देव अउर  माइयो-बाबूजी लोग अइसन होखे कि संतान उनका के आपन आदर्श माने आ पूजे खातिर बाध्य हो जाय, एही कामना के साथ -प्रणाम !


Oct19_11_1096519222-2.jpg

Hum BhojpuriaJune 11, 20211min3800

संपादक- मनोज भावुक

टीवी पर रात-दिन एगो ऐड आवsता, जे, मैंने अपने बच्चे को कोचिंग से निकालकर सोचिंग में डाल दिया है। खैर, ओह ऐड के संदर्भ दोसर बा बाकिर व्यापक फलक पर देखला पर ई बहुत कुछ सोचे-समझे खातिर मजबूर कs रहल बा।

एह कोरोने काल के देख लीहीं। लोग अपना राजनीतिक पार्टी, सम्प्रदाय, क्षेत्र, देश, परिवेश भा संस्थान से प्रत्यक्ष भा परोक्ष रुप से जवन ट्रेनिंग (कोचिंग) लेता, ओकरे हिसाब से स्टेटमेंट देता। व्यवहार करता। कोचिंग के ज्ञान भा पूर्वाग्रह से ऊपर उठ के सोचिंग के एक्सट्रीम पर उ जाते नइखे। ओशो के एगो किताब ‘’ नये भारत की ओर ‘’ में हम पढ़ले रहनीं जे, ” जिंदगी रटे हुए उत्तर नहीं चाहती। जिंदगी चाहती है विचारपूर्ण चेतना..”

कोचिंग भा स्कूल भा कॉलेज त एही खातिर बनले होला, जे आदमी सोचे के सीखे। ज्ञान त रॉ मटेरियल हs सोच खातिर। सोच के संबंध सिचुएशन से बा। सिचुएशन के हिसाब से सोचे के पड़ी।

कोरोना काल में सबसे जरूरी का बा ? जान बचावल। अपने ना, दोसरो के। जान बचावे खातिर सबसे जरूरी का बा ? अपना पार्टी-पउआ, संप्रदाय आ क्षेत्र के कोचिंग से बहरी निकल के सोचिंग में घूसल। जहवाँ आदमियत पर फोकस ढेर होखे। बाकिर लोग लाशो प सियासत कs रहल बा। मरणासन्न लोगन के परिवारन के मजबूर क के आपन तिजोरी भर रहल बा। दवा आ जीवन रक्षक सामान के कालाबाजारी कs रहल बा। आ ई सब करे वाला मनई कवनो अनपढ़ नइखन। ई लोग कोचिंग कइले बा। बाकिर एह लोगन के कोचिंग के ज्ञान सोचिंग ले जाते नइखे। गइल रहित त इहो लउकित कि ई रस्ता ओह लोगन के कहवाँ ले ले जाई। कर्म के अंतिम परिणामओ लउकित। माल आ मलाई के चक्कर में ई लोग राछछ बनल बा।

कोरोना काल में कालाबाजारी, जमाखोरी, ऑनलाइन ठगी आ हॉस्पिटल के मनमाना बिल से मिलल लग्जरी लाइफ एह लोग के सकून ना छीनत होई ?  इ सब ज्ञानी लोग हs। कोचिंग कइल लोग हs।

एने तीन दशक में कोचिंगे त बढ़ल बा। हर चीजवे के कोचिंग बा। हँसे के कोचिंग। रोवे के कोचिंग। नाचे के कोचिंग।. फिटनेस के कोचिंग। करियर के कोचिंग। पर्सनालिटी-डेवलपमेंट के कोचिंग। चले तक के लूर-ढङ सिखावे के कोचिंग। अतने ना, कोचिंग करावे के कोचिंग ! … दू का, दू का, दू का !

पढाई-लिखाई, फिटनेस, पर्सनालिटी-डेवलपमेंट आ करियर सबके कोचिंग-काउन्सिलिंग खुल गइल, बाकिर आदमी के आदमी बनावे वाली ब्रम्हचर्य आश्रम में जवन पढ़ाई-लिखाई होत रहे, ऊ गायब हो गइल। प्रोफेशनल प प्रोफेशनल कोर्स बढ़त गइल, ओकर कोचिंग बढ़त रहल। बाकिर आदमी आदमी से मशीन बन गइल। पइसा कमाए वाली मशीन। ऊ कोचिंग क के कमाता। पइसा कमाए का फेरा में ऊ पूरा बाई के बेग में धउर रहल बा। पेड़ कटाता। कंकरीट के जंगल में फ्लैट बुक होता। गला काट प्रतियोगिता क के करोड़न के कार किनातिया। करोड़न के डेस्टिनेशन-मैरीज होता। जेकरा लगे करोड़ नइखे उ करोड़ के चिंता में मुअsता। बाकिर, केहू के ई होश नइखे जे ई सब जिनगी खातिर संजीवनी तत्त्व ऑक्सीजन आ शुद्ध भोजन के कीमत प हो रहल बा। ई सभ सुख अछइत सुख नइखे। त तड़पीं ऑक्सीजन खातिर। पीहीं केमिकल वाला दूध। खाईं सुई घोंपल घेंवड़ा आ लउकी।

कोचिंग से जिनगी ना सुधरी ए चनेसर! … सोचिंग से सुधरी। अच्छा आहार तन खातिर आ अच्छा विचार मन खातिर सबसे जरुरी बा. .. आ तन-मन ठीक रही त कोचिंग के रस्ता सोचिंग ले जाई। तब आदमी आदमियत के साथे जिन्दा रही। बिना सोचिंग के कोचिंग त मानवता के दुश्मन, क्रिमिनल आ देशद्रोही पैदा करेला।

कोचिंग आ सोचिंग में कुछ मूलभूत फरक बा, ई समझे के जरुरत बा।

कोचिंग में दोसरा प निर्भर रहल जाला। जबकि सोचिंग आत्म निर्भर, आत्म मंथन आ  आत्मचिंतन के प्रकिया हs। सोचिंग ज्ञान के तत्त्व मन में बइठावल ह। जबकि कोचिंग बेबुझले-समझले सोझे रट्टा मारल हs।

कोचिंग के ज्ञान से धनओ कमाके मनई सुखले रहेला। जबकि सोचिंग के प्रकिया से आदमी कम रहलो में खुश रहेला। कोचिंग असंतोष बढावेला। सोचिंग संतोष देला।  ‘आत्म दीपो भवः’ के भाव जगावेला।

एही से कहsतानी, जे लइकन के कोचिंग में डाले से पहिले सोचिंग में डालीं। विचारपूर्ण चेतना आ मानवीय मूल्यन से भरल पूरल अदमिये एह धरती के बचइहें। मशीनी आदमी त विनाशे करी।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया… ईश्वर सबका के निरोग राखस…


1800x1200_coronavirus.jpg

Hum BhojpuriaJune 1, 20211min4950

संपादक- मनोज भावुक

कोरोना पॉजिटिव होके कोरोना प लिखल आसान ना होला। हँथवा काँपे लागेला। काँपतो बा। लैपटपवा प बइठत बानीं आ लिखे खातिर जोर मारत बानीं त आँखी के सोझा अइसन केतना चेहरा नाँच जाता जे आज से दस दिन पहिले ले सङे हँसत-बोलत-बतियावत रहे आ आज ओह में से केहू के अस्थि विसर्जित कइल जाता, केहू के लाश गंगा जी में दहsता त केहू के लाश श्मशान घाट प अपना बारी के इन्तजार में बा। जीव धक्क दे हो जा रहल बा। आँख लोरा जाता। शब्द धुँआये लागsता। दिमाग सुन्न हो जा रहल बा। घंटन लैपटॉप के सोझा बइठल रहला के बादो कुछ लिखात नइखे।

दोसरा हाथ में मोबाइल बा। फेसबुक से भागल रहनी हँ। फेर फेसबुक प आ गइनीं। शुभचिंतक लोग मना करsता। बाकिर मन मानत नइखे। दोहरियाइ के आवे के पड़sता। शुतुर्मुग लेखा मुँह फेर लिहला से त होई ना। अपना खातिर भा दोसरा खातिर मददओ एहिजे माँगे के बा। कुछ लोग योद्धा जइसन दिन-रात मदद में त कुछ लोग गिद्ध जइसन नोंचे में लागल बा।

कुछ लोग बेमारी से ठीक होखे खातिर फेसबुक पर एक-दोसरा के शुभकामना देता। प्रार्थना आ दुआ में असर होला, करहीं के चाहीं। बाकिर जे सामर्थ्यवान बा ओकरा अपना हीत-मीत से इहो पूछ लेवे के चाहीं, जे, काहो दवा-बीरो आ टेस्ट आदि खातिर रूपया-पइसा बा नू ? काम धंधा चलsता नू ? नोकरी बाँचल बा नू ? पइसा के कमवा त पइसे से नू होई, ए चनेसर।

साल 2019 में चीन में पैदा भइल ई कोरोना वायरस सउँसे दुनिया के हिला देले बा। काम धंधा, व्यापार, बाजार सभ रुक गइल बा। मध्यम वर्ग के बहुलता वाला भारत अब रोटियो खातिर तरसे लागल बा। इ कोरोना जवन सउँसे साल बीस लील लिहलस, एकइसओ प आपन दाँत गड़वले बा।

शहर त शहर गाँवहूँ में ई बेमारी अबकी फइलल जाता। अपने घर वाला अपना आदमी के अर्थी नइखे छूअत। एह डरे जे ओकरो कोरोना मत हो जाव। प्रशासन के गुहार लगावे के पड़sता जे लाशन के अंतिम संस्कार के व्यवस्था कइल जाय। मुर्दा देहि के जवन गंजन हो रहल बा, न्यूज आ सोशल मीडिया पर ई कूल्हि देखि के दिल दहल जाता। ई कोरोना कौ सदियन में मानवता प आइल सबले बड़ त्रासदी बन के सोझा ठाढ़ बा।

बाकिर, ईहो ओतने साँच बा, जे अब कोरोना के वैक्सीन आ गइल बा। एकर सकारात्मक असरओ  लउक रहल बा। कोरोना के इलाज खातिर नया-नया दवाई खोजा रहल बा। ऑक्सीजन के किल्लत से मर रहल लोगन खातिर ऑक्सीजन के नया-नया प्लांट खुल रहल बा। विदेशन से मदद मिल रहल बा। त एह हिसाब से हमनियो के सकारात्मक रहे के चाहीं। ढेर छरिअइला से बेचैनिये नू बढ़ी। हँ, ऑक्सीजन आ इलाज के कमी से लाखन लोगन के जान गइल बा, ई तोपे जोग नइखे। कुछ लोग दवाई, ऑक्सीजन, एम्बुलेंस के कालाबाजारी में लागल बा। कुछ लोग दवाई आ उपकरण के मुहैया करावे के नाँव प ऑनलाइन ठगी क रहल बा। जबकि ई सभ के मालूम बा जे ई महापाप हs। सियासी खेला जवन बा तवन अलगे बा। हमरा आपन लिखल कुछ शेर ईयाद पड़sता –


अर्थी के साथ बाज रहल धुन बिआह के
अब एह अनेति पर केहू कहँवाँ सिहात बा

संवेदना के लाश प कुर्सी के गोड़ बा
मालूम ना, ई लोग का कइसे सहात बा

उ अदिमिये कइसन जेकरा में दया, प्रेम, करुणा आ  ममत्व के भाव ना होखे। मनुष्यता के त इहे सब पहचान हs। जेकरा में से इ सब गायब होला, उ अपराधी बन जाला। त का ई कोरोना काल आदमी के आदमी बना सकी ?

लोग कहsता जे कोरोना के तिसरको लहर आवे वाला बिया। जब ले कोरोना के समूल नाश ना होई, तले ई रक्तबीज बन के उगत रही। एही से हमनियो के माँ चंडी जइसन एकर विनाश करे खातिर एक सङे मिल के, एक दोसरा के सहयोग से, अपना अंदर के मनुष्यता के जीवित राखत उ सब करे के पड़ी जवन एकर नाश खातिर जरुरी बा।

कोरोना काल खातिर लिखल अपना संकल्प गीत से बात खतम कइल चाहबि –

नेह-नाता के ऑक्सीजन से 

मन के इम्यून के बढ़ावे के

जंग जीते के बा कोरोना से 

एही संकल्प के गोहरावे के

दुख त चारो तरफ पसरले बा

सुख के कुछ गीत अब कढ़ावे के

यार जहिया ले सांस साथे बा 

जिंदगानी के गीत गावे के


6bdf65cfc0ad4ab83c3b23505ffc58d6.jpg

Hum BhojpuriaMay 19, 20211min5810

संपादक- मनोज भावुक

शादी के सालगिरह पर अपना पत्नी के मुस्कुरात तस्वीर के साथे केहू पोस्ट डलले बा कि – ‘’ तुम्हारी मुस्कुराहट मेरे लिए ऑक्सीजन है और तुम वैक्सीन। सदा खुश रहना और साथ रहना। ‘’

चारो तरफ कोरोना के तांडव चलsता। सोशल मिडिया श्मशान घाट बनल बा। सगरो चीख-चिल्लाहट, रोना-रोहट, दहशत आ घबड़ाहट बा। अइसना में परिवार के साथ-सहयोग सबसे बड़ संबल बा। अब रउरा परिवार के दायरा केतना बड़ बा, ई त रउरा प निर्भर बा। मनुष्य जाति भी त एगो परिवारे ह। जहाँ तकले सँपरे निभावे के चाहीं।

1944 के आसपास बिहार में मलेरिया अउर हैजा महामारी के रूप में फइलल रहे। ओहू समय अइसने लाश के ढेर लागल रहे। आजेकल के तरह मउवत के डर आ  भय से लोग काँपत रहे। तब फणीश्वर नाथ रेणु के कहानी पहलवान की ढोलक के हीरो लुट्टन पहलवान ढोलक बजा-बजा के लोग में जिनिगी के प्रति भरोसा जगवलें।

गीत-संगीत स्ट्रेस बूस्टर ह। चिंता निवारक औषधि ह। एही भावना से एह कोरोना काल में ई चइता अंक रउरा के सउंपत बानी। ई चइता अंक कोरोना काल के एकांतवास में राउर जायका बदली, डर आ दहशत से दूर रख के राउर मनोरंजन करी आ हो सकेला कि लुट्टन पहलवान जइसन जिनिगी के प्रति भरोसो जगावे।

एह अंक में 35 गो कवियन के चइता-चइती संकलित बा। साथ हीं चइता-चइती के शास्त्रीयता अउर सिनेमा में ओकरा सौन्दर्य पर आलेख बा। दुनिया के सबसे बड़ नायक भगवान राम भी हिम्मत आ हौसला बढ़ावे खातिर एह अंक में बाड़े काहे कि चइते में उनकर जनम भइल रहे। रामजी के जनमे प केतना चइता बा।

एह संकलन के अधिकांश चइता वियोग श्रृंगार बा, पिया के पास ना रहला के पीड़ा आ ताना से भरल-

रतिया भइल बा नगीनिया हो रामा,  पिया घर नाहीं / तनिको ना सोहेला गहनवा हो रामा, पिया परदेसी / चुड़िया गिनत बीते रतिया हो रामा, पियवा ना अइलें / अगिया लगावे कोयलिया, हो रामा, अइलें ना सांवरिया

कवि भालचंद त्रिपाठी जी के नायिका के त पति के आगमन के सपना आवsता आ अचके नीन खुलला पर देखsतारी कि नाक के नथुनिया त तकिया में फँसल बा। ओही तरे शैल पाण्डेय शैल जी के नायिका पति के ना अइला का खीसी कोयल के सहकल छोड़ावे के बात करत बाड़ी।

गया शंकर प्रेमी जी के चइता में हास्य-व्यंग्य के रंग बा। इहाँ कोयलिया ठीक भिनुसहरे जरला पर नून दरत बिया। आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ के रचना में ननद-भौजाई के नोंक-झोंक के साथे भौजाई के महुआ बीने के ट्रेडिशन आ ननद के व्हाट्सएप चलावे के मॉडर्न अप्रोच देखे के मिलता।

चइता के चुनावी रंग भी बा- पहिले त सुध मुंह, पियवा ना बोले / महिला कोटा होते आगा पाछा डोले

/ बेरी-बेरी कहें दिलजनिया ए रामा, छुटली चुहनिया / पियवा के चाहीं परधानिया ए रामा, छुटली चुहनिया

सब कुछ के बावजूद वर्तमान से कटल कहाँ संभव बा। मन के कतनो भुलवाईं, कोरोना आँख का सोझा आके खड़ा होइये जाता। कई गो चइता में कोरोना समाइल बा आ जीव डेराइल बा त ओह में प्रार्थना बा, सलाह बा, चेतावनी बा आ चिंता बा।

एही चिंता के बीचे बलिया के कवि शशि प्रेमदेव जी के चइता बा- हम काटब गेहूं, गोरी कटिहs तूं मुसुकी ! / कटनी के काम आगा हाली-हाली घुसुकी !

भाई हो, काम के साथे-साथ जीवन में एही मुस्की के जरुरत बा। इहे ऑक्सीजन ह।  

जे ना चेती ओकरा खातिर डॉ. अशोक द्विवेदी जी त जिनिगी के सच्चाई कहते बानी- गते-गते दिनवा ओराइल हो रामा, रस ना बुझाइल

कोरोना काल में ई चइती फुहार अगर रउरा सब के तनिको आराम देता, होठ प मुस्की आ हियरा में हौसला देता त हमनी के कइलका सुकलान हो जाई। ईश्वर से प्रार्थना बा कि सबकर साँस बनल रहे, आस बनल रहे, साहस बनल रहे, सकून कायम होखे आ मन के अँगना में चइता गूँजत रहे।

जे-जे साथ छोड़ के हमेशा खातिर चल गइल ओकरा प्रति लोरभरल श्रद्धांजलि।



About us

भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


Contact us



Newsletter

Your Name (required)

Your Email (required)

Subject

Your Message