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Hum BhojpuriaJune 11, 20211min5220

संपादक- मनोज भावुक

टीवी पर रात-दिन एगो ऐड आवsता, जे, मैंने अपने बच्चे को कोचिंग से निकालकर सोचिंग में डाल दिया है। खैर, ओह ऐड के संदर्भ दोसर बा बाकिर व्यापक फलक पर देखला पर ई बहुत कुछ सोचे-समझे खातिर मजबूर कs रहल बा।

एह कोरोने काल के देख लीहीं। लोग अपना राजनीतिक पार्टी, सम्प्रदाय, क्षेत्र, देश, परिवेश भा संस्थान से प्रत्यक्ष भा परोक्ष रुप से जवन ट्रेनिंग (कोचिंग) लेता, ओकरे हिसाब से स्टेटमेंट देता। व्यवहार करता। कोचिंग के ज्ञान भा पूर्वाग्रह से ऊपर उठ के सोचिंग के एक्सट्रीम पर उ जाते नइखे। ओशो के एगो किताब ‘’ नये भारत की ओर ‘’ में हम पढ़ले रहनीं जे, ” जिंदगी रटे हुए उत्तर नहीं चाहती। जिंदगी चाहती है विचारपूर्ण चेतना..”

कोचिंग भा स्कूल भा कॉलेज त एही खातिर बनले होला, जे आदमी सोचे के सीखे। ज्ञान त रॉ मटेरियल हs सोच खातिर। सोच के संबंध सिचुएशन से बा। सिचुएशन के हिसाब से सोचे के पड़ी।

कोरोना काल में सबसे जरूरी का बा ? जान बचावल। अपने ना, दोसरो के। जान बचावे खातिर सबसे जरूरी का बा ? अपना पार्टी-पउआ, संप्रदाय आ क्षेत्र के कोचिंग से बहरी निकल के सोचिंग में घूसल। जहवाँ आदमियत पर फोकस ढेर होखे। बाकिर लोग लाशो प सियासत कs रहल बा। मरणासन्न लोगन के परिवारन के मजबूर क के आपन तिजोरी भर रहल बा। दवा आ जीवन रक्षक सामान के कालाबाजारी कs रहल बा। आ ई सब करे वाला मनई कवनो अनपढ़ नइखन। ई लोग कोचिंग कइले बा। बाकिर एह लोगन के कोचिंग के ज्ञान सोचिंग ले जाते नइखे। गइल रहित त इहो लउकित कि ई रस्ता ओह लोगन के कहवाँ ले ले जाई। कर्म के अंतिम परिणामओ लउकित। माल आ मलाई के चक्कर में ई लोग राछछ बनल बा।

कोरोना काल में कालाबाजारी, जमाखोरी, ऑनलाइन ठगी आ हॉस्पिटल के मनमाना बिल से मिलल लग्जरी लाइफ एह लोग के सकून ना छीनत होई ?  इ सब ज्ञानी लोग हs। कोचिंग कइल लोग हs।

एने तीन दशक में कोचिंगे त बढ़ल बा। हर चीजवे के कोचिंग बा। हँसे के कोचिंग। रोवे के कोचिंग। नाचे के कोचिंग।. फिटनेस के कोचिंग। करियर के कोचिंग। पर्सनालिटी-डेवलपमेंट के कोचिंग। चले तक के लूर-ढङ सिखावे के कोचिंग। अतने ना, कोचिंग करावे के कोचिंग ! … दू का, दू का, दू का !

पढाई-लिखाई, फिटनेस, पर्सनालिटी-डेवलपमेंट आ करियर सबके कोचिंग-काउन्सिलिंग खुल गइल, बाकिर आदमी के आदमी बनावे वाली ब्रम्हचर्य आश्रम में जवन पढ़ाई-लिखाई होत रहे, ऊ गायब हो गइल। प्रोफेशनल प प्रोफेशनल कोर्स बढ़त गइल, ओकर कोचिंग बढ़त रहल। बाकिर आदमी आदमी से मशीन बन गइल। पइसा कमाए वाली मशीन। ऊ कोचिंग क के कमाता। पइसा कमाए का फेरा में ऊ पूरा बाई के बेग में धउर रहल बा। पेड़ कटाता। कंकरीट के जंगल में फ्लैट बुक होता। गला काट प्रतियोगिता क के करोड़न के कार किनातिया। करोड़न के डेस्टिनेशन-मैरीज होता। जेकरा लगे करोड़ नइखे उ करोड़ के चिंता में मुअsता। बाकिर, केहू के ई होश नइखे जे ई सब जिनगी खातिर संजीवनी तत्त्व ऑक्सीजन आ शुद्ध भोजन के कीमत प हो रहल बा। ई सभ सुख अछइत सुख नइखे। त तड़पीं ऑक्सीजन खातिर। पीहीं केमिकल वाला दूध। खाईं सुई घोंपल घेंवड़ा आ लउकी।

कोचिंग से जिनगी ना सुधरी ए चनेसर! … सोचिंग से सुधरी। अच्छा आहार तन खातिर आ अच्छा विचार मन खातिर सबसे जरुरी बा. .. आ तन-मन ठीक रही त कोचिंग के रस्ता सोचिंग ले जाई। तब आदमी आदमियत के साथे जिन्दा रही। बिना सोचिंग के कोचिंग त मानवता के दुश्मन, क्रिमिनल आ देशद्रोही पैदा करेला।

कोचिंग आ सोचिंग में कुछ मूलभूत फरक बा, ई समझे के जरुरत बा।

कोचिंग में दोसरा प निर्भर रहल जाला। जबकि सोचिंग आत्म निर्भर, आत्म मंथन आ  आत्मचिंतन के प्रकिया हs। सोचिंग ज्ञान के तत्त्व मन में बइठावल ह। जबकि कोचिंग बेबुझले-समझले सोझे रट्टा मारल हs।

कोचिंग के ज्ञान से धनओ कमाके मनई सुखले रहेला। जबकि सोचिंग के प्रकिया से आदमी कम रहलो में खुश रहेला। कोचिंग असंतोष बढावेला। सोचिंग संतोष देला।  ‘आत्म दीपो भवः’ के भाव जगावेला।

एही से कहsतानी, जे लइकन के कोचिंग में डाले से पहिले सोचिंग में डालीं। विचारपूर्ण चेतना आ मानवीय मूल्यन से भरल पूरल अदमिये एह धरती के बचइहें। मशीनी आदमी त विनाशे करी।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया… ईश्वर सबका के निरोग राखस…


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Hum BhojpuriaJune 1, 20211min6070

संपादक- मनोज भावुक

कोरोना पॉजिटिव होके कोरोना प लिखल आसान ना होला। हँथवा काँपे लागेला। काँपतो बा। लैपटपवा प बइठत बानीं आ लिखे खातिर जोर मारत बानीं त आँखी के सोझा अइसन केतना चेहरा नाँच जाता जे आज से दस दिन पहिले ले सङे हँसत-बोलत-बतियावत रहे आ आज ओह में से केहू के अस्थि विसर्जित कइल जाता, केहू के लाश गंगा जी में दहsता त केहू के लाश श्मशान घाट प अपना बारी के इन्तजार में बा। जीव धक्क दे हो जा रहल बा। आँख लोरा जाता। शब्द धुँआये लागsता। दिमाग सुन्न हो जा रहल बा। घंटन लैपटॉप के सोझा बइठल रहला के बादो कुछ लिखात नइखे।

दोसरा हाथ में मोबाइल बा। फेसबुक से भागल रहनी हँ। फेर फेसबुक प आ गइनीं। शुभचिंतक लोग मना करsता। बाकिर मन मानत नइखे। दोहरियाइ के आवे के पड़sता। शुतुर्मुग लेखा मुँह फेर लिहला से त होई ना। अपना खातिर भा दोसरा खातिर मददओ एहिजे माँगे के बा। कुछ लोग योद्धा जइसन दिन-रात मदद में त कुछ लोग गिद्ध जइसन नोंचे में लागल बा।

कुछ लोग बेमारी से ठीक होखे खातिर फेसबुक पर एक-दोसरा के शुभकामना देता। प्रार्थना आ दुआ में असर होला, करहीं के चाहीं। बाकिर जे सामर्थ्यवान बा ओकरा अपना हीत-मीत से इहो पूछ लेवे के चाहीं, जे, काहो दवा-बीरो आ टेस्ट आदि खातिर रूपया-पइसा बा नू ? काम धंधा चलsता नू ? नोकरी बाँचल बा नू ? पइसा के कमवा त पइसे से नू होई, ए चनेसर।

साल 2019 में चीन में पैदा भइल ई कोरोना वायरस सउँसे दुनिया के हिला देले बा। काम धंधा, व्यापार, बाजार सभ रुक गइल बा। मध्यम वर्ग के बहुलता वाला भारत अब रोटियो खातिर तरसे लागल बा। इ कोरोना जवन सउँसे साल बीस लील लिहलस, एकइसओ प आपन दाँत गड़वले बा।

शहर त शहर गाँवहूँ में ई बेमारी अबकी फइलल जाता। अपने घर वाला अपना आदमी के अर्थी नइखे छूअत। एह डरे जे ओकरो कोरोना मत हो जाव। प्रशासन के गुहार लगावे के पड़sता जे लाशन के अंतिम संस्कार के व्यवस्था कइल जाय। मुर्दा देहि के जवन गंजन हो रहल बा, न्यूज आ सोशल मीडिया पर ई कूल्हि देखि के दिल दहल जाता। ई कोरोना कौ सदियन में मानवता प आइल सबले बड़ त्रासदी बन के सोझा ठाढ़ बा।

बाकिर, ईहो ओतने साँच बा, जे अब कोरोना के वैक्सीन आ गइल बा। एकर सकारात्मक असरओ  लउक रहल बा। कोरोना के इलाज खातिर नया-नया दवाई खोजा रहल बा। ऑक्सीजन के किल्लत से मर रहल लोगन खातिर ऑक्सीजन के नया-नया प्लांट खुल रहल बा। विदेशन से मदद मिल रहल बा। त एह हिसाब से हमनियो के सकारात्मक रहे के चाहीं। ढेर छरिअइला से बेचैनिये नू बढ़ी। हँ, ऑक्सीजन आ इलाज के कमी से लाखन लोगन के जान गइल बा, ई तोपे जोग नइखे। कुछ लोग दवाई, ऑक्सीजन, एम्बुलेंस के कालाबाजारी में लागल बा। कुछ लोग दवाई आ उपकरण के मुहैया करावे के नाँव प ऑनलाइन ठगी क रहल बा। जबकि ई सभ के मालूम बा जे ई महापाप हs। सियासी खेला जवन बा तवन अलगे बा। हमरा आपन लिखल कुछ शेर ईयाद पड़sता –


अर्थी के साथ बाज रहल धुन बिआह के
अब एह अनेति पर केहू कहँवाँ सिहात बा

संवेदना के लाश प कुर्सी के गोड़ बा
मालूम ना, ई लोग का कइसे सहात बा

उ अदिमिये कइसन जेकरा में दया, प्रेम, करुणा आ  ममत्व के भाव ना होखे। मनुष्यता के त इहे सब पहचान हs। जेकरा में से इ सब गायब होला, उ अपराधी बन जाला। त का ई कोरोना काल आदमी के आदमी बना सकी ?

लोग कहsता जे कोरोना के तिसरको लहर आवे वाला बिया। जब ले कोरोना के समूल नाश ना होई, तले ई रक्तबीज बन के उगत रही। एही से हमनियो के माँ चंडी जइसन एकर विनाश करे खातिर एक सङे मिल के, एक दोसरा के सहयोग से, अपना अंदर के मनुष्यता के जीवित राखत उ सब करे के पड़ी जवन एकर नाश खातिर जरुरी बा।

कोरोना काल खातिर लिखल अपना संकल्प गीत से बात खतम कइल चाहबि –

नेह-नाता के ऑक्सीजन से 

मन के इम्यून के बढ़ावे के

जंग जीते के बा कोरोना से 

एही संकल्प के गोहरावे के

दुख त चारो तरफ पसरले बा

सुख के कुछ गीत अब कढ़ावे के

यार जहिया ले सांस साथे बा 

जिंदगानी के गीत गावे के


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Hum BhojpuriaMay 19, 20211min7990

संपादक- मनोज भावुक

शादी के सालगिरह पर अपना पत्नी के मुस्कुरात तस्वीर के साथे केहू पोस्ट डलले बा कि – ‘’ तुम्हारी मुस्कुराहट मेरे लिए ऑक्सीजन है और तुम वैक्सीन। सदा खुश रहना और साथ रहना। ‘’

चारो तरफ कोरोना के तांडव चलsता। सोशल मिडिया श्मशान घाट बनल बा। सगरो चीख-चिल्लाहट, रोना-रोहट, दहशत आ घबड़ाहट बा। अइसना में परिवार के साथ-सहयोग सबसे बड़ संबल बा। अब रउरा परिवार के दायरा केतना बड़ बा, ई त रउरा प निर्भर बा। मनुष्य जाति भी त एगो परिवारे ह। जहाँ तकले सँपरे निभावे के चाहीं।

1944 के आसपास बिहार में मलेरिया अउर हैजा महामारी के रूप में फइलल रहे। ओहू समय अइसने लाश के ढेर लागल रहे। आजेकल के तरह मउवत के डर आ  भय से लोग काँपत रहे। तब फणीश्वर नाथ रेणु के कहानी पहलवान की ढोलक के हीरो लुट्टन पहलवान ढोलक बजा-बजा के लोग में जिनिगी के प्रति भरोसा जगवलें।

गीत-संगीत स्ट्रेस बूस्टर ह। चिंता निवारक औषधि ह। एही भावना से एह कोरोना काल में ई चइता अंक रउरा के सउंपत बानी। ई चइता अंक कोरोना काल के एकांतवास में राउर जायका बदली, डर आ दहशत से दूर रख के राउर मनोरंजन करी आ हो सकेला कि लुट्टन पहलवान जइसन जिनिगी के प्रति भरोसो जगावे।

एह अंक में 35 गो कवियन के चइता-चइती संकलित बा। साथ हीं चइता-चइती के शास्त्रीयता अउर सिनेमा में ओकरा सौन्दर्य पर आलेख बा। दुनिया के सबसे बड़ नायक भगवान राम भी हिम्मत आ हौसला बढ़ावे खातिर एह अंक में बाड़े काहे कि चइते में उनकर जनम भइल रहे। रामजी के जनमे प केतना चइता बा।

एह संकलन के अधिकांश चइता वियोग श्रृंगार बा, पिया के पास ना रहला के पीड़ा आ ताना से भरल-

रतिया भइल बा नगीनिया हो रामा,  पिया घर नाहीं / तनिको ना सोहेला गहनवा हो रामा, पिया परदेसी / चुड़िया गिनत बीते रतिया हो रामा, पियवा ना अइलें / अगिया लगावे कोयलिया, हो रामा, अइलें ना सांवरिया

कवि भालचंद त्रिपाठी जी के नायिका के त पति के आगमन के सपना आवsता आ अचके नीन खुलला पर देखsतारी कि नाक के नथुनिया त तकिया में फँसल बा। ओही तरे शैल पाण्डेय शैल जी के नायिका पति के ना अइला का खीसी कोयल के सहकल छोड़ावे के बात करत बाड़ी।

गया शंकर प्रेमी जी के चइता में हास्य-व्यंग्य के रंग बा। इहाँ कोयलिया ठीक भिनुसहरे जरला पर नून दरत बिया। आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ के रचना में ननद-भौजाई के नोंक-झोंक के साथे भौजाई के महुआ बीने के ट्रेडिशन आ ननद के व्हाट्सएप चलावे के मॉडर्न अप्रोच देखे के मिलता।

चइता के चुनावी रंग भी बा- पहिले त सुध मुंह, पियवा ना बोले / महिला कोटा होते आगा पाछा डोले

/ बेरी-बेरी कहें दिलजनिया ए रामा, छुटली चुहनिया / पियवा के चाहीं परधानिया ए रामा, छुटली चुहनिया

सब कुछ के बावजूद वर्तमान से कटल कहाँ संभव बा। मन के कतनो भुलवाईं, कोरोना आँख का सोझा आके खड़ा होइये जाता। कई गो चइता में कोरोना समाइल बा आ जीव डेराइल बा त ओह में प्रार्थना बा, सलाह बा, चेतावनी बा आ चिंता बा।

एही चिंता के बीचे बलिया के कवि शशि प्रेमदेव जी के चइता बा- हम काटब गेहूं, गोरी कटिहs तूं मुसुकी ! / कटनी के काम आगा हाली-हाली घुसुकी !

भाई हो, काम के साथे-साथ जीवन में एही मुस्की के जरुरत बा। इहे ऑक्सीजन ह।  

जे ना चेती ओकरा खातिर डॉ. अशोक द्विवेदी जी त जिनिगी के सच्चाई कहते बानी- गते-गते दिनवा ओराइल हो रामा, रस ना बुझाइल

कोरोना काल में ई चइती फुहार अगर रउरा सब के तनिको आराम देता, होठ प मुस्की आ हियरा में हौसला देता त हमनी के कइलका सुकलान हो जाई। ईश्वर से प्रार्थना बा कि सबकर साँस बनल रहे, आस बनल रहे, साहस बनल रहे, सकून कायम होखे आ मन के अँगना में चइता गूँजत रहे।

जे-जे साथ छोड़ के हमेशा खातिर चल गइल ओकरा प्रति लोरभरल श्रद्धांजलि।


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Hum BhojpuriaApril 19, 20211min9370

संपादक- मनोज भावुक

परसाल होली पनछुछुर रहे काहे कि भारत में कोरोना वायरस के मामला रफ़्तार पकड़ल शुरू क देले रहे। लोग डेराइल शुरू क देले रहे।  ओकरा बाद स्कूल-कॉलेज बंद भइल, अंतरराष्ट्रीय उड़ान पर रोक लागल आ ओकरा बाद त मिललो-जुलला प रोक लाग गइल। लाग गइल लॉकडाउन आ सोशल एनीमल सोशल डिस्टेंसिंग के पालन करे लागल।

केतना राउंड के लॉकडाउन से गुजरत साल गुजरल। नया साल लागते कोरोना के टीका आइल। ख़ुशी के लहर दउड़ल कि मिल गइल संजीवनी बूटी। मिल गइल कवच-कुण्डल। बाकिर, आहि दादा.. कादो, कोरोना के दूसरा लहर चल देले बा। आ गइल बा। होली आवते फेरु आ गइल। कोरोनवा के का जाने होली से कवन बैर बा। होली रंग के त्यौहार ह आ ई रंगे में भंग करsता।

खैर, कई जगह लॉकडाउन लगा दिहल गइल बा। टीकाकरण अभियानो तेजी पकड़ले बा। नाक से नीचे मास्क पहिने आ सट-सट के बतियावे वाला लोग अलर्ट हो गइल बा। सरकारो से अलर्ट पर अलर्ट जारी होता। डॉक्टर लोग कहsता कि हमनी के पुरनका अनुभव से सीखे के चाहीं आ सभा-समारोह में जाके  सुपरस्प्रेडर बने से बचे के चाहीं।

अब लइका-बच्चा, स्कूलिहा-कवलेजिया होली के हुडदंग खातिर जवन योजना बनवले रहलें हं, उ त फेल होइये गइल। जीजो-साली आ देवर-भौजाई के प्लानिंग पर पानी फिरल। चनेसर च्चा बेसिये टेंसनिआइल बाड़े। होली मिले-जुले के त्यौहार ह आ मिललके-जुललका पर रोक बा। पतझड़ के बाद बसंत आवेला आ बसंत के साथे फगुआ बाकिर इहाँ त बसंत के साथे फेर से पतझड़ आ गइल। कोरोना के ई दुसरका लहर सब उत्साह आ उमंग के हरियरी चर गइल बा। बुझाते नइखे कि फगुनाहट ह कि कोरोनाहट। टिभियो पर त फाग से बेसी कोरोना राग सुनाता।

हालाँकि बंगाल में कोरोना राग से बेसी चुनावी राग बा। उहाँ त बुझाता कोरोनवा आत्महत्या कर लेले बा। उहवें ना जहाँ-जहाँ इलेक्शन होला, कोरोना उहाँ ना फटके। त हम कंफ्यूज हो जानी कि कोरोना के भगावे खातिर वैक्सीनेशन जरुरी बा कि इलेक्शन!

खैर, भोजपुरी जंक्शन में पूरा के पूरा फाग राग बा। एह अंक पर कोरोना-सोरोना के कवनो असर नइखे। ई कम्पलीट फगुआ विशेषांक बा। 5 दर्जन कवि लोग के होली गीत, भोजपुरी के साथे ब्रज के भी तड़का, बसंत के अइला से लेके फगुआ के बदलत रूप पर बात, बॉलीवुड आ भोजीवुड के फगुआ के गीत-संगीत पर चर्चा, होली-रस आ होलियाना संस्मरण के साथे अंत में इहो कि ‘’ भउजी देह अंइठली अउरी फागुन आय गइल ‘’ तक सब रस, सब रंग मतलब होली के फुल पैकेज। अब कोरोना काल में पढ़े पर त रोक बा ना, पढ़ीं आ आनंद लीं। इहो होली खातिर दस्तावेजे बा।


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Hum BhojpuriaMarch 18, 20213min11450

संपादक- मनोज भावुक

मार्च 2020 में आइल कोरोना महामारी पूरा साल आदमी के अस्तित्व के झकझोरत रहल. अभियो टीस मारते बा. एह दरम्यान बहुत कुछ सोचे-समझे खातिर आदमी मजबूर भइल. हमरो मन में उथल-पुथल रहल. बहुत कुछ पाकल, बहुत कुछ फूटल आ उ संपादकीय के पन्ना पर ओह कालखंड के दस्तावेज के रूप में अंकित-टंकित हो गइल. लीं पेश बा उ दस्तावेज. पढ़ी आ सोची-विचारीं.

अंक 4 – ए हो रामा…

फगुआ के बाद चइता अंक परोस रहल बानी। फगुआ अगर अंत हऽ त चइता शुरूआत। अंत आ शुरुआत के अद्भूत तालमेल ह फगुआ-चइता। एही संगम पऽ हमनी के नया साल के उद्गम बा। रउरा सभे के नया साल के शुभकामना।

नया साल के अइसन जश्न त दुनिया में कहीं मनावले ना जाला। दिनभर फगुआ गवाला आ 12 बजे रात के बाद उहे गोल, उहे समाज, उहे दरी, उहे तिरपाल, उहे ढोलक, उहे झाल, उहे हुड़का, उहे मजीरा, उहे पखावज, उहे झांझ, उहे तासा, उहे नगाड़ा, रंग- अबीर से पोतल, भांग में डूबल उहे लोग…ए हो रामा…शुरू क देवेला। माने फागुन खतम। चइत शुरू।…नया साल के आगाज।

बाकिर, फगुआ-चइता के बीच एह साल एगो कोरोना आ गइल बा। रंग में भंग के रूप में ई  कोरोना खाली भारत खातिर ना, संउसे दुनिया खातिर, मनुष्यता खातिर एगो खतरा बा। एकरा से निपटे खातिर एहतियात बरतल बहुते जरूरी बा।

कोरोना के चलते असो दिल्ली के होली पनछुछ्छुर रहल हऽ आ गांव के चइता इहां कहां? गांव के ईयाद आवऽता।

कटिया शुरू हो गइल होई। तीसी, मसूरी, खेसारी, लेतरी, सरसो, मटर उखड़ा गइल होई। रहर के ढेढ़ी, जौ-गेहूं के बाल, महुआ बारी के महुआ गांवे बोलावऽता। काली जी के मंदिरवा पऽ चइता-चइती त होते होई। कई गो लोक धुन आ लोक राग मन में गूंजऽता। लहर पऽ लहर उठता।

अंक 5-  कोरोना काल में रामायण क्रांति

टेलीविजन प टीकर चलsता कि लॉकडाउन में संयम सिखावे अइले श्रीराम। लक्ष्मण रेखा में रहे के मर्यादा सिखइहें श्रीराम।

दरअसल कोरोना महामारी के खिलाफ पूरा देश में  25 मार्च से 21 दिन के जवन लॉकडाउन भइल बा, ओह में 28 मार्च से दूरदर्शन पर सुबह-शाम रामानंद सागर कृत रामायण के प्रसारण शुरू भइल बा। तबे से कोरोना अउर राम के लेके बतकूचन चालू बा।

अइसहूं ई चइत के महीना हऽ। भगवान श्रीराम के जनम के महीना। अब राम से बड़ा नायक के बा ? जेतना राम पर लिखाइल बा, कहाइल बा, गवाइल बा आ मंचन भइल बा, सीरियल-सिनेमा बनल बा, ओतना कवना नायक पर काम भइल बा ?…आ बात खाली भइला के नइखे भावना के बा। जवना भावना से लोक में राम के स्वीकार कइल गइल बा, उ भाव दोसरा कवनो नायक के नइखे भेंटाइल। सांच कहीं त जीवन के हर भाव में राम बाड़े। राम हर काल में प्रासंगिक बाड़े। कोरोना काल में भी।

सांच पूछीं त राम रसायन आजो सब समस्या के समाधान बतावे में सक्षम बा। रामलीला आ रामचरित मानस आजो सबसे आसानी से समझ में आवे वाला दर्शन शास्त्र बा। सिनेमा – सीरियल खातिर सबसे इंटरेस्टिंग एक्शन बा, ड्रामा बा, इमोशन बा। मानी भा मत मानी राम के बिना राउर काम नइखे चले वाला।

आईं एक बेर फेर कोरोना महामारी से सम्पूर्ण विश्व आ मानवता के मुक्त करावे खातिर राम के नाव लीहल जाव। जय श्रीराम!

अंक 6  – लोक बनवले बा बाबू कुँवर सिंह के इतिहास पुरुष

कवनो चीज के कथा-कहानी के रूप में देखल आ ओकरा के भोगल दूनों दू गो बात ह। दूनों के मरम अलग होला।

अबहीं सउँसे विश्व में कोरोना महामारी के प्रकोप बा। भारत में भी लॉक डाउन चलsता। लोग दहशत में बा। घर में कैद बा। केहू के बाल-बच्चा कहीं फँसल बा त केहू के माई-बाप। डॉक्टर, पुलिस, पत्रकार जान-जोखिम में डाल के दिन रात सेवा में लागल बाड़े। ई दुख वर्तमान में भोगल जाता। अभी एकर पीड़ा इंटेंस बा। दस-बीस साल बाद, पचास साल बाद ई इतिहास हो जाई। कहानी हो जाई। डायनासोर युग के जुरासिक पार्क जइसन फिलिम हो जाई।

जइसे आजकल रोज हमनी के टीवी पर रामायण आ महाभारत देखत बानी जा। हमनी खातिर ई बस एगो कहानी बा, सीरियल बा। मजा ले तानी जा। मन बहलावsतानी जा। बाकिर एकरा के अगर रउरा सत्यकथा मानी त महसूस करीं ओह कष्ट के, ओह पीड़ा के जे रामायण के पात्र राम भोगलें, सीता भोगली, राजा दशरथ भोगलें भा लक्ष्मण जी के पत्नी उर्मिला भोगली भा महाभारत के पात्र पांडव भोगलें, कुंती भोगली। कहे के मतलब कि असली चीज महसूस कइल बा। ओह कालखंड में जाके अपना के ओह स्थिति में रख के महसूस कइल बा। तबे अंदर के इंसान ज्यादा समृद्ध, ज्यादा मानवीय होई।

ई अंक 1857 के गदर में बिहार के प्रतिनिधित्व करे वाला 80 बरिस के हीरो बाबू कुँवर सिंह के समर्पित बा, जेकरा बारे में प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार होम्स के भी लिखे के पड़ल कि ” युद्ध के समय कुँवर सिंह के उम्र अस्सी साल रहे, अगर उ जवान रहितन त अंग्रेजन के 1857 में ही भारत छोड़े के पड़ित।”

अंक 7- कोरोना के ओह पार …

बबुआ रे, ई देश-विदेश काहे बनल ?…काहे बन्हाइल बाँध सरहद के ?…दुनिया के ऊपर एके गो छत -आसमान आ एके गो जमीन-धरती। के कइलस टुकड़ा-टुकड़ा?…झगड़ा के गाछ के लगावल?  के बनावल नफ़रत के किला ?… का दो, धरती माई हई। माईयो टुकी-टुकी ???  ……एह टुकी-टुकी में हीं सारा समस्या के जड़ बा। टुकी-टुकी में वर्चस्व के लड़ाई बा। अहंकार, शक्ति-प्रदर्शन, धोखा, गद्दारी, जमाखोरी, साजिश, सियासत सब एह टुकी-टुकी में बा।  ‘ वसुधैव कुटुंबकम ‘ खाली नारा में बा आ मानवता में बानर नर से आगे निकल गइल बाड़न।

चीन के चेहरा देखीं। देखीं का, कोरोना शब्द बोलते भा सोचते चीन के क्रूर चेहरा नज़र का सामने नाचे लागता। चीन के चाल आ चक्रव्यूह सउँसे दुनिया समझ गइल बा। तनिक विचार करीं, चीन कोरोना वायरस के संक्रमण से जुड़ल सूचना दबवलस काहे?  दबवलस त दूर, अब त इहो सुने में आवता कि कोरोना वायरस के उत्पत्ति चीन के प्रयोगशाला बुहान इंस्टीच्यूट आफ वायरोलाजी में ही भइल बा। मतलब ई एगो मानव निर्मित वायरस बा।  अइसन काहे कइलस चीन ?… बात उहे, टुकी-टुकी वाला बा। चीन धरती के बाकी टुकड़ा के गैर समझलस, दुश्मन समझलस, बाजार समझलस। ‘ वसुधैव कुटुंबकम’ के राज, रहस्य आ सुख ओकरा भेजा में घुसबे ना कइल।

दरअसल हमनी के प्रेम कइल छोड़ देले बानी जा। प्रेमे सब बेमारी के ईलाज बा। प्रेम रही तबे    ‘ वसुधैव कुटुंबकम ‘ के रहस्य समझ में आई। प्रेम खाली आदमी के आदमी से ना… पशु, पंक्षी आ प्रकृति से भी।  त अब चिचिअइला आ छाती पिटला से का होई कि प्रकृति के हमनी के दोहन कइनी जा। ओकरा साथे अन्याय कइनी जा, ओकरे सजा  मिल रहल बा। गगनचुंबी टॉवर के पॉवर देखावे में संवेदना के महल खंडहर बन गइल, ओकरे सजा मिल रहल बा। जीवन से प्रेम गायब हो गइल त एह सूखल ढाँचा में  ‘ स्ट्रांग इम्यून सिस्टम ‘ रहो त रहो कइसे। फेर त कोरोना डायन खातिर जिनिगी के डंसल बहुत आसान बा। ई अलग-अलग रूप में आवते रही। …

विद्वान लोग के मत बा आ इतिहासो साक्षी बा कि हर महामारी के बाद हमनी के जागेनी जा। …जागल बानी जा। जगला पर कुछ समीकरण बदलेला। कुछ मान्यता टूटेला।  कुछ नया सामने आवेला। ई महामारी या त्रासदी कवनो पहिला बेर त आइल नइखे। प्लेग, ब्लैक डेथ आ स्पैनिश फ्लू के समय भी दुनिया हिल गइल रहे।  ओही तरे महामारी के बाद आर्थिक संकट के खड़ा भइल भी कवनो नया नइखे। चिंता, आर्थिक संकट के साथे साथ ओह संकट से समाज में उपजे वाला विषमता आ करप्शन के बा। चिंता, अपना सपना के मेहनत के कढ़ाही में रोजे पकावे वाला मजदूरन के अनाथ होके एने ओने छिछिअइला के बा।

कोरोना कवनो जाति, धरम, अमीर, गरीब के ना ह। तब्लीगी जमात के वजह से भारत में कोरोना के मरीज बढ़ल बाड़े। निःसंदेह दोषी के सजा मिले के चाहीं। बाकिर एकरा चलते हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य ना फइले के चाहीं।  सउँसे दुनिया में रोयेला आदमी त रुलाई एके जइसन होला। लोर के स्वाद एके जइसन होला। हंसी आ ठहाका भी एके जइसन होला। मानवीय अनुभूति के मानवता के आधार पर समझे के जरुरत बा। जात-पात, धर्म, भाषा, देश, क्षेत्र, सरहद के आधार पर ना। एह से, संकीर्ण राष्ट्रवाद से ऊपर उठ के मानवतावाद पर जोर देवे के होई। दुनिया के तमाम देशन के बीच निहित स्वार्थ से ऊपर उठ के एगो नया समीकरण आ संतुलन पर जोर देवे के होई। तबे मानव जाति  के अस्तित्व पर से खतरा टली।  अरे, जब अदिमिये ना रही त कवँची सरहद,  कवँची सेना, कवँची बाज़ार, कवँची व्यापार। रही जीव तबे नू पीही घीव।

एह से अभी विश्व कल्याण के भावना से काम करे के जरुरत बा। अइसन पहल पहिलहूँ भइल बा। संयुक्त राष्ट्र, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अउर विश्व बैंक  … के जनम संकट काल ( द्वितीय विश्व युद्ध ) के बादे भइल बा।…एहू महामारी के बाद कुछ तब्दीली आई। वैश्विक स्तर पर कुछ नया उपाय होई।

फिलहाल त घर में रहीं। लॉकडाउन आ सोशल डिस्टेंसिंग के पालन करीं। ओकरा बाद रोजी-रोजगार के सोचीं। प्रधानमंत्री जी जान आ जहान दूनू के बात करत बानी।  आत्मनिर्भरता के बात करत बानी।  गाँव प थोड़ा सा फोकस कइल जाय। अपना जड़ आ जमीन प।  जड़ से कट के फूल ना खिली।  खिलबो करी त उ प्लास्टिक आ कागजे के होई। बाकी सब त समय खुद ब खुद समझा दी।  समझावते बा।

ई अंक समय के दस्तावेज बा। भविष्य में जब कबो पीछे पलट के कोरोना काल के समझे के कोशिश कइल जाई त ओह समय ई अंक आज के समय के कहानी सुनाई। एह अंक में कवि, गायक, कथाकार, पत्रकार, चिकित्सक, समाजसेवी सबकर कोरोना के लेके उदगार बा, चिंता बा, चिंतन बा, सुर बा, स्वर बा, समस्या बा, समीक्षा बा। पढ़ीं। पढ़ाईं।

कोरोना के जगह अब करुणा बरिसे,  एही प्रार्थना के साथ।

 

अंक 8 – रेड, ऑरेंज आ ग्रीन जोन वाला आदमी

” लॉकडाउन समस्या नइखे। समस्या त भूख बा। ”  मदर्स डे पर बाते बात में ई बतिया समझा देलस माई। विश्व के तमाम माई के मने मन प्रणाम करत हम लॉकडाउन अउर भूख के बारे में सोचे लगनी। सोचे लगनी, पूर्वांचल के माई-दादी आ चाची-भउजी का बारे में जे पूरा जिनगी लॉकडाउन में काट देलस। ससुरा अइला के बाद घर के चौखट से बाहर ना निकलल। बाकिर उ लॉकडाउन खलल ना। काहे कि उ लॉकडाउन जीवन शैली या संस्कार रहे। घर के मान-मरजादा रहे आ ओही में आनंद रहे। एह से उ लॉकडाउन कबो लॉकडाउन लगबे ना कइल। लॉकडाउन में रहियो के माई-दादी आ चाची-भउजी अपना के रानी-महारानी महसूस कइल लोग। उहाँ बेबसी ना रहे। भूख भी ना रहे। ( पेटवे के ना,  मनवो के भूख होला। जेकरा एह व्यवस्था में घुटन महसूस भइल उ समय के साथे उन्मुक्त भी भइल।)

जहाँ भूख रहे, ई लॉकडाउन टूटल। ओही यूपी-बिहार में एगो अइसन तबका रहे आ अभियो बा, जेकरा घर के औरत के खेत-खरिहान में काम करे निकले के पड़ल, गाँव के दोसरा घर में काम करे निकले के पड़ल। उ लॉकडाउन में रहती त मर जइती। उहां भूख के समस्या रहे।

हमरा आपन एगो शेर मन पड़Sता-

पानी के बाहर मौत बा, पानी के भीतर जाल बा

लाचार मछरी का करो, जब हर कदम पर काल बा

आज प्रवासी मजदूरन के पीड़ा कुछ अइसने बा। उ भूख, बेमारी आ भविष्य के लेके भकुआइल बा। ओकर माथा काम नइखे करत अउर उ उजबुजा के मुंबई आ दिल्ली जइसन जगह से पैदले निकल पड़ल बा गाँव खातिर।

गाँव ओकरा के खींचत त बा बाकिर अँकवारी में ना भरी। गाँवों डेराइल बा। कोरोना के डर गाँव-शहर सबका धमनी-शिरा में पसर गइल बा। प्रधानमंत्री जी के बेसी जोर गाँव के बचावे पर बा। गाँव में कोरोना मत घुसे। एह से गाँव हर आवे वाला के शक के निगाह से देखsता। त गाँव के ओर बेतहाशा भागे वाला एह अभागन के लोर के पोंछी?   लोर के साथ हमरा जेहन में हमार अशआर इको कs रहल बा-

लोर पोंछत बा केहू कहां / गाँव अपनो शहर हो गइल …

सबसे बड़का शाप गरीबी / सबसे बड़का पाप गरीबी

डँसे उम्र भर,  डेग-डेग पर / बनके करइत साँप गरीबी

एह गरीब आ विवश लोग खातिर महीनन से बंद पड़ल रेल त आज (12 मई ) चालू हो गइल बाकिर एह लोग के जिनिगी के रेल पटरी पर कब आई, कब दौड़ी, पता ना ?

पीएम के सभ सीएम लोग से मीटिंग प मीटिंग चलsता। पांचवा बार बइठक भइल ह। केंद्र आ राज्य सरकार दुनों लागल बा। अभी ले दुनिया में 42 लाख आ भारत में 67152 से बेसी ममिला हो गइल बा कोरोना संक्रमण के। लॉकडाउन के तीसरा चरण (लगभग 55 दिन) ख़तम होखे वाला बा। अब जान के साथे जहानो के फिकिर बा। रोजी-रोजगार खातिर लॉकडाउन में कुछ ढील के बात होता। कबले बंद दरवाजा के भीतर से बाहर झाँकल जाई। कबो ना कबो त बाहर निकलहीं के पड़ी। बाकिर हँ,  .. अब त मास्क आ सोशल डिस्टेंसिंग के आदत डाल लेवे के चाहीं काहे कि कोरोना अचानक से छू मंतर ना हो जाई। ई अभी दुनिया के साथे आँखमिचौली खेलsता। संकट बड़हन बा त ओकर उपचारो बड़ा करे के पड़ी। सरकार के पास कवनो जादू के छड़ी नइखे कि एक बार में सब कुछ ठीक हो जाई। दोबारा व्यवस्था बनावे में समय लागी। समस्या के हल निकाले खातिर केंद्र,  राज्य अउर नागरिक सबके अपना-अपना हिस्सा के जिम्मेदारी उठावे के पड़ी।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी 12 मई 2020  के राष्ट्र के नाम सम्बोधन में ‘ आत्मनिर्भर भारत ‘ खातिर देश के आह्वान करत 20 लाख करोड़ रूपया के (भारत के जीडीपी के 10 % ) आर्थिक पैकेज के घोषणा कइले बानी।  साथ हीं ‘ लोकल’ उत्पाद खातिर ‘ वोकल’ होखे के मंतर देले बानी।

एह से जात-पात, धर्म-सम्प्रदाय, सरहद-सीमा से ऊपर उठ के मानवता के आधार पर सचेत रहत कोरोना से जंग लड़े के बा। अइसहूँ अभी त आदमी के तीने गो जात बा- रेड जोन वाला आदमी,  ऑरेंज जोन वाला आदमी आ ग्रीन जोन वाला आदमी….एही आधार पर ई. टिकट भा ‘’ सब ‘’ सहूलियत मिले के बा।

भारत के हर आदमी ग्रीन जोन वाला आदमी बन जाय,  भगवान से इहे गोहरावत बानी। रउरा सभ के जागे-जगावे, हिम्मत बढ़ावे, सचेत करे अउर समय के दस्तावेजीकरण खातिर प्रस्तुत बा कोरोना विशेषांक (भाग-2)। पढ़ीं। पढ़ाईं।

 

अंक 10- जिंदगी जंग ह, बोझ ना…

भोरे-भोरे गौरैया आँगन में चहकल / चाह के दोकानी के आँच बाटे लहकल  ….

आ ओही चाह के दोकानी प, चट्टी प कुल्हड़ में चाय सुड़ुक-सुड़ुक के पीयत दुनिया भर के बतकही, दुनिया भर के पंचायत, देश-विदेश के समस्या, निजी घात-भीतरघात सब शेयर होखे अपना यार के सङे, दिलदार के सङे, राजदार के सङे, साथी-संघाती के सङे। उ आउटलेटे अब गायब भइल जाता।

त मन के भीतर खउलsता तरह-तरह के बात। तरह-तरह के खीस-पीत। अवसाद-विषाद, कुंठा-क्रोध के अम्ल मन के बर्तन के पेंनिये गाएब कs देता। मन रीते लागsता। तबो मन के बुझात नइखे कि कवनो मनोचिकित्सक से मिल लिहल जाव। लागsता कि ई जवन होता, बहुत सामान्य बात बा। असहीं होला। बाकिर ई सामान्य घटना नइखे। जहर पीयत-पीयत मन आत्मघाती हो जाला। मन नॉर्मल ना रहे। नार्मल अवस्था में केहू पंखा से लटक के जान कइसे दे सकेला? केहू ख़ुदकुशी कइसे क सकेला?

कोरोना त आदमी के जान लेते बा। ई अवसाद, विषाद, फ्रस्ट्रेशन, अकेलापन भी मौत के मुँह में ढकेल रहल बा। हमरा दिलोदिमाग में बेर-बेर उ गीत गूँज रहल बा कि ”जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए”… बाहर से जे सुखी लउकsता, जेकरा पास धन-दौलत, शोहरत आ मान-सम्मान सब बा, उहो पंखा से लटक जाता। गरीबी से जे मू रहल बा, उ त मुअते बा। एकर मतलब कि आत्महत्या के सम्बन्ध अमीरी, गरीबी से नइखे, धन-दौलत आ शोहरत-सम्मान से नइखे। उ कवनो भितरिया चीज ह। शायद ओकर नाँव विलपॉवर ह। जिजीविषा ह। मन के ढिठई ह। मन के थेथर होखे के चाहीं। मन के चमड़ा मोट होखे के चाहीं जहँवाँ से अपमान, उपेक्षा आ दुःख के तीर परावर्तित हो जाव। कमजोर मन आत्मघाती हो जाला आ फेर उ अपने के खोर-खोर खाए लागेला।… मन बहरियो बहुत उत्पात मत मचावे, एकरे खातिर संत लोग योग, ध्यान, चिंतन आ सत्संग के राह बतवले बा ना त आदमी के मन आसाराम बापू हो जाला, रामरहीम हो जाला, शहाबुद्दीन हो जाला, निर्भया गैंग रेप के दोषी राम सिंह हो जाला।

मन ह का?  देह में ई कहँवाँ रहेला? ई कहल कठिन बा। दिल आ दिमाग के अस्तित्व त जीव विज्ञान में बा बाकिर मन … ?

बाकिर एतना त तय बा कि मन देह से अलगा के कवनो चीज नइखे तबे नू मन के पीड़ा देह के अस्तित्व के खतम क देता। एह से मन के मजबूत कइल जरुरी बा। तन के इम्म्यून सिस्टम के सङे-सङे मनो के इम्म्यून सिस्टम के स्ट्रांग कइल जरुरी बा। व्यायाम के साथ ध्यान आ योग भी जरुरी बा। स्ट्रेस के हैंडिल करे के कला सीखल जरुरी बा। मन आ तन दुनो स्तर पर अपना के फौलाद बनावे के पड़ी तबे सकून के चिरई एह जिन्दगी के अँगना में चहकी।

दुश्मन त मानी ना, साजिश करी। मन के तूरे के भरसक कोशिश करी। बाकिर हमनी के दादा-परदादा भा रामायण-महाभारत के पात्र अपना हक खातिर लड़े के सिखा गइल बाड़े ना कि सुसाइड करे के।

अपना क्षमता के हिसाब से ‘कुछ’ बने के कोशिश बेशक होखे के चाहीं बाकिर कोशिश अइसनो ना होखे के चाहीं कि उ पूरा ना भइला पर रउआ भितरी से टूटि जाईं। षङयंत्रकारी त हर जगहा, हर क्षेत्र में बाड़न। जरनियहपन त हर जगहा बा। एह से धीरज त धरहीं के पड़ी। संघर्ष त करहीं के पड़ी भाई ! कीड़ा फतिंगा भी अपना आखिरी दम तक अपना संघर्ष के लड़ाई लड़ेला। हर घड़ी हर कदम संघर्ष.. . अनथक साधना आ धीरज के काट केहू के लगे नइखे।

जिनिगी बा त सुख-दुःख त अइबे-जइबे करी। सुख के महफ़िल से इतर दुख के साथी चीन्हे के पड़ी। अइसन साथी जेकरा सामने बेफिक्र होके दिल खोलल जा सके। जेकरा कान्हा प मूड़ी ध के फूट-फूट के रोअल जा सके। जे बेकहले राउर दुख बूझे आ अपना जोर भर मदद करे। अइसन साथी मिलल मुश्किल बा। बाकिर दोसरा खातिर अइसन साथी त बनले जा सकत बा। ई अपना अख्तियार में बा। एहू से दुख कम होई। कुँवर बेचैन जी के एगो शेर बा-

तुम्हारे दिल की चुभन भी जरूर कम होगी / किसी के पाँव से काँटा निकालकर देखो

भाई हो, उदार बने के पड़ी। सहनशील बने के पड़ी। ‘’ नेकी कर दरिया में डाल ’’ के राहे चले के पड़ी। अनेरहूँ हँसे के पड़ी। अपनो प हँसे के पड़ी। गीत गावे के पड़ी। गुनगुनाये के पड़ी। हमार शेर बा कि ‘दुखो में ढूँढ ल ना राह भावुक सुख से जीये के / दरद जब राग बन जाला त जिनगी गीत लागेला।‘  मतलब, रउरा दुःख के आउटलेट रखे के पड़ी। अइसन नेह के बंधन भी चाहीं जॅऺहवाँ बेबातो के बात होखे, बेवकूफी भरल बात होखे, पागल नियर आदमी ठठा के हँसे। जहाँ दिल, दिमाग आ किडनी पर जोर ना पड़े। बिंदास होके संवाद होखे। जहँवाँ ई संदेह मत होखे कि एह में से केहू अपना मतलब के बात उचिला के कबो सेंटीमेंटल ब्लैकमेल करी। जहाँ दोस्ती में माई आ बेटा वाला ममता के, देवर-भउजाई वाला मजाक के आ पति-पत्नी वाला निजता आ खुलापन के रिश्ता होखे। अइसन दोस्त चाहीं। अइसन दुखहरन दोस्त। ना बाहर मिले त अपना भितरी खोजीं। बाकिर संवाद चालू रहे। हमार एगो दोहा बा,  ” भावुक अब बाटे कहाँ पहिले जस हालात / हमरा उनका होत बा, बस बाते भर बात।”  ई बाते भर बात वाला दीवार तुरियो के कुछ रिश्ता चाहीं, जहाँ नेह के बरसात में मन भींज के तरोताजा होत रहे। तब ना होई कवनो सुसाइड। ना होखिहें लोग आत्महंता। ना मरिहें कवनो सुशांत सिंह राजपूत। तब जिंदगी जंग भलहीं लागी, बोझ ना लागी।

तीन गो बात अउरी इशारा में। संयुक्त परिवार का ओर लौटल एकदम से संभव नइखे। बाकिर जहँवें बन पड़े, दुख त बाँटल जा सकेला। सूनल-सुनावल जा सकेला। एकल परिवार में त पति-पत्नी के बीच अनबन भा झगड़ा भइल होखो त हफ्तन सन्नाटा रहेला। दूनो के मन होखबो करो तबहूँ केहू फरियावे भा समझौता करावे वाला ना होला। दोसर बात, अपना जड़ का ओर सोचल जाव, जहँवाँ अपनन खातिर दरवाजा हर-हमेसा खुलल रहत रहे। अपॉइंटमेंट लेबे के औपचारिकता ना भइल करे। तीसर बात, दिन रात सोशल मीडिया के अनसोशल कोना में ढूकि के टेंशन बटोरला से नीमन बा जे छोट-छोट लइकन के सङे बइठ के लूडो खेलल जाव, भा प्रकृति के सङे रोमांस कइल जाव। प्रेम आ रोमांस.. ईहे कवनो तनाव के काट बा। अपना से, अपना माई-बाप से, भाई-बहिन से, परिवार से, देश आ समाज से अउर अपना सपनन से प्रेम करीं। प्रेम जीये के भूख देला, त जिंदगी खातिर लड़े के ताकत।

ना चली चीन के चाल

व्यक्तिगत दुःख-सुख आ शांति से इतर वतन के अमन बा। देश खुशहाल रही तबे ओह देश के नागरिक सुखी रहीहें। ई मुश्किल वक्त बा, व्यक्तिगत दुःख-सुख, पार्टी-नेता-जाति-धर्म से उठके सिर्फ अउर सिर्फ भारतीय बन के रहे के जरुरत बा। भारतीय सेना के पराक्रम आ शौर्य पर भरोसा रखीं ! आपन सैनिक 20 पर 43 मारत बाड़न। चीनी सेना के हालत ख़राब बा। सैनिक आ कूटनीतिक दुनों मोर्चा पर भारत चीन पर भारी बा। धूर्त आ चालबाज चीन खातिर भारत के पूरा तैयारी बा। हर देशभक्त तैयार बा। उ कोरोना से पहिले भारतीय चीन समर्थक के मारे खातिर उतावला बा अउर सीमा पर शेर के तरह दहाड़े आ ललकारे खातिर भी।

अंक 14- खुद के लवना के तरह रोज जरावत बानी… 

पेट में आग त सुनुगल बा रहत ए भावुक

खुद के लवना के तरह रोज जरावत बानी

कोरोना महामारी जब फइलल त एकर पड़े वाला असर प खूब बतकूचन होत रहे… बाकिर जइसे-जइसे दिन बीते लागल बतकूचन खतम हो गइल आ ओकर असर साक्षात सामने लउके लागल।  अब हालात ई बा कि कंपनी-कॉर्पोरेट में छंटनी के सीजन शुरू हो गइल बा, त कहीं नौकरी पेशा वाला लोग के वेतन दू-दू महीना के बकाया चले लागल बा। एक त कोरोना के डर ऊपर से पॉकिट में पइसा के अभाव। ई अइसन स्थिति बा जवना में मध्यवर्ग सबसे अधिका पिसाता। ऊ राशन खातिर भा अउरी कवनो खैरात में मिले वाला सुविधा खातिर लाइन में नइखे लाग सकत। स्कूल ऑनलाइऩ चल रहल बा त स्कूल फीस देबहीं के बा। फ्लैट के किराया के अलावा अउरी दोसर देनदारी कपार प चढ़ले बा। मकान के ईएमआई से लेके दवा-दारु तक सब बड़ले बा। एही में रात-बीरात जब कबो अँघी टूटsता त बुझाता कि मेल प टर्मिनेशन लेटर आइल बा। जे बेरोजगार हो गइल बा, ओकरा नया रोजगार के कवनो संभवना लउकते नइखे। अइसे में आदमी मानसिक, सामाजिक आ आर्थिक अवसाद में घिर रहल बा।

दरअसल दिल आ दिमाग के रास्ता पेट से होके जाला। पेट में आग लागी त ओकर लपट दिल आ दिमाग तक जइबे करी। जब लपट दिल आ दिमाग तक जाई त ओकर असर परिसंचरण तंत्र आ तंत्रिका तंत्र यानी कि दिल के धड़कन आ दिमाग के फड़कन पर पड़बे करी। बीपी बढ़ी आ दिमाग खराब होई। ख़राब दिमाग से सही निर्णय होला ना। आदमी अंड-बंड करे लागेला। त सउँसे देश में अंड-बंड के स्थिति उपजे के ढेर संभावना बा। ई बहुत बड़ त्रासदी बा जवन कोरोना लेके आइल बा। कोरोना खाली बेमारी ना जिनगी के राहु-काल बा।

कहल जाता कि जइसे दूसरा विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के परिदृश्य बदलल रहे ओइसही कोरोना के बाद दुनिया के परिदृश्य बदली। अब ई लउके लागल बा। कुछ सकारात्मक बदलाव लउकता त कुछ नकारात्मको बा। सकारात्मक पहलू ई बा कि कोरोना के डरे हीं सही, लोग अनियमित जीवनशैली से बाहर निकलल बा त नकारात्मक पहलू ई बा कि परिवारिक कलह, सामाजिक निराशा, अपराध में बढ़ोत्तरी जइसन चीज अब ढेर सामने आवता। भलही सरकार के ओर से अस्पतालन में कोरोना के इलाज के कथित तौर प बेहतर सुविधा मुहैया करावल गइल बा बाकिर एह कोरोना से उपजल मानसिक, सामाजिक व आर्थिक अवसाद में घिरल लोग के काउंसिलिंग खातिर अबहीं ले कवनो व्यवस्था नइखे लउकत। ई हाल खाली अपने देश के ना बलुक दुनिया के विकसित कहाये वाला देशन में भी अबहीं एकर भयावहता के ले के सत्ता प्रतिष्ठान में कवनो गंभीरता नइखे लउकत, जवन एगो बड़ खतरा के सिग्नल दे रहल बा।

आदमी के जिनगी चूल्हा हो गइल बा आ देह लवना। ओही में जरsता-धनsकता आदमी। एह लपट से मानवता के बचावे खातिर जल्दिये कुछ उपाय कइल जरुरी बा।

 

अंक 18- देश में अमन आ पेट में अन्न

एगो त घर में तनाव बा। बाहर कुक्कुर बोलsतारs सन। इन्हनीं के टेंशन त देलहीं बाड़न स, तवना में कउवन के काँव-काँव अलगे चल रहल बा। एही में बिहार में चुनाव बा। नारा से बेसी भोजपुरी गाना गूँजsता। कोरोना के चलते जे बेरोजगार भइल बा ओकरा असहीं अंघी नइखे लागत। भोर के अखबार सुरुज भगवान से बेसी लाल बा। हत्या से बेसी आत्महत्या के खबर लउकsता। ब्रम्हांड के सर्वश्रेष्ठ जीव आत्मघाती हो गइल बा। आखिर ई कइसन समय आ गइल बा हे दुर्गा मइया।

कइसे गोहराईं तोहरा के? लइका लेखा फूट-फूट के रोईं? रोईं भोंकार पार के? सीना चीर के देखाईं? का करीं? कइसे बुझबू कि हम दुखी बानी। हमार दुख तोहरा काहे नइखे लउकत? आकि चनेसरा लेखां तुहूँ मजा ले तारू?

चनेसरा त विपक्षी हs। हमरा अच्छाइयो में बुराइये देखेला। केतनो बड़का काम काँहें ना करीं, तारीफ़ के दू बोल ना बोली। हमरा जवना काम के उ निन्दा करता, ओकर आका भा गुरुजी लोग, ओही में डूबल बा। बाकिर उ ओह लोग के तलवा चाटsता। खैर, छोड़s, ई कुल्हि सियासी बात हs।

तू त माई हऊ। तू दिल के सब दरद बुझेलू। बस बहरिये बहरी भोकाल बा ए माई। भीतर खाली बा। कुछ बा ना। कइसे रही?  इहाँ भुँजवो खाये के बा, फँड़वो टोवे के बा। पेट खाली बा। खाली पेट में दिमगवो खाली हो जाला। दिमाग कामे नइखे करत। कुछ सूझते नइखे।

पंडी जी से पूछनी हँ। उहाँ के कहनी हँ जे राहू-केतु ठीक नइखे चलत। खैर, उहाँ के त कुंडली के आधार पर ग्रह के बात कहनी हँ।

हमरा त हई कुल्ही राहू-केतु लउकत बाड़न स। एगो जवन अपना देसवा के बाउंडरिया पर फँउकत बाड़न स ड्रैगनवा, ऊ। दोसर देस के भीतरे दोस्त के रूप में दुश्मन बनल घूमsतारs सन, भितरघतिया, ऊ। तीसर ऊ, जेकरा हर काम में नुक्से लउकsता, निगेटिव आदमी, ऊ। ए सगरी के बुद्धि ठीक करs ए माई।

अभी सबसे जरुरी बा – देश में अमन आ पेट में अन्न।

अमन द। अन्न द। निरोग करs। देशे के ना, सउँसे दुनिया के कोरोना मुक्त करs।

आम आदमी भूखे मूअता। सबका थाली में रोटी होखे आ आँखि में नींन, एह नवरात्रि में बस अतने प्रार्थना बा ए दुर्गा माई।

 

अंक 22- शुभ हो, मंगलमय हो नयका साल

साल 2020 … मनुष्य के औकात बतवलस। चिरई-चूरूंग, कुक्कुर-बिलार अँगना-दुअरा फुदुकत-कुदुकत रहल आ मानुष मुँह प जाबी (मास्क) लगवले घर में दुबुकल। आदमी सामाजिक प्राणी ह बाकिर ओकरे सामाजिक दूरी बना के रहे के पड़ल, पड़sता आ आगे देखीं, कब ले ?…

अभियो अमिताभ बच्चन फोनवा प बोलते बाड़े – ‘’ नमस्कार, हमारा देश और पूरा विश्व आज कोविड-19 की चुनौती का सामना कर रहा है। कोविड-19 अभी खत्म नहीं हुआ है, ऐसे में हमारा फर्ज है कि हम सतर्क रहें। इसलिए जब तक दवाई नहीं, तब तक कोई ढिलाई नहीं। ‘’

बच्चन साहेब के पहिले एगो जनाना बोलत रहे। ओकर बोलिया तनी मीठ लागत रहे। ई मर्दवा त पगला देले बाड़े। आदमी अपना काम में अझुरा के भुलाइयो जाता तले कवनो फोन अइला पर इनकर जबरिया कॉलर ट्यून कोरोना के ईयाद ताज़ा करा देता।

बाप रे बाप। ई कोरोना केतना लोग के नौकरी खइलस। केतना लोग के जिनगी। तबो नइखे अघात। तबो नइखे जात। कादो वैक्सीन खाई तबे जाई।

वैक्सीन के लेके तरह-तरह के कोशिश आ दावा त होते बा बाकिर अभी बहुत कुछ साफ़ नइखे… भारत में कोरोना वायरस वैक्सीन के परीक्षण अंतिम चरण में पहुंच चुकल बा आ वैक्सीन के उत्पादनो तेज़ी से हो रहल बा बाकिर ई आम आदमी तक आ ओकरा पॉकेट के पहुँच तक कब पहुंची, ई कहल अभी जल्दीबाजी होई। सरकार के कहनाम बा कि टीकाकरण एक महीना में शुरू हो सकsता। सीरम इंस्टीट्यूट कंपनी एस्ट्राजेनेका के साथ मिलके ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित वैक्सीन के उत्पादन कर रहल बा। ई टीका 70 से 90 प्रतिशत तक प्रभावी बतावल जाता।

खैर, हर बुरा समय के एगो सीमा होला। इहो जाई। जइबे करी।.. आ जब ई इतिहास हो जाई त पीछे पलट के हमनी के एह महामारी के देखब जा त बहुत कुछ लउकी।

लउकी उ काफिला जवना में मरद-मेहरारू लइका-बच्चा के गोदी टंगले पैदले बम्बई से बिहार चल देले रहे। मास्क लगाके पूड़ी बाँटत लोग के फोटो त फेसबुक हर साल देखाई। लाश प भइल सियासत भी सिहरन पैदा करत रही। कादो, बुरा दौर के बाद आदमी जागेला आ ओकरा में मानवता लौटेला पर इहो ओतने साँच बा कि आदमी से हेहर-थेथर दोसर कवनो प्राणी नइखे। श्मशान घाट पर संवेदनशील भइल इन्सान घाट से बहरी निकलते संवेदनहीन होके तोर-मोर करत देखल गइल बाड़न।

खैर, साल 2020 जाता। 2021 आवsता। हमरा नइखे लागत कि कैलेण्डर बदलला से कुछ बदली भा बदलेला बाकिर हँ, दुख, परेशानी, दुर्घटना, ठेस, ठोकर, महामारी आदमी के या त मार देला या त माँज देला, तरास देला। तप के आदमी अउरो चमकेला, निखरेला आ ओकर जिनगी सोना बन जाला। अगर दुख बड़लो बा त दुखी भइला से कुछ होई ना। हम त इहे कहेब कि –

दुखो में ढूंढ लs ना राह भावुक सुख से जीये के

दरद जब राग बन जाला त जिनिगी गीत लागेला

नया साल में बेहतर के उम्मीद कइल जाय…


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Hum BhojpuriaMarch 9, 20211min9020
संपादक- मनोज भावुक
3 मार्च ह आज। दिन बुधवार ह। आजे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद दिल्ली के RR हॉस्पिटल में कोरोना वैक्सीन के पहिला डोज लेले हं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन, बिहार के मुख्यमंत्री नतीश कुमार, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक आ केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद समेत कई गो नेता लोग अब तक टीका लगवा चुकल बा।
भारत में कोविड वैक्सीनेशन के दूसरा चरण एक मार्च से शुरू भइल ह। पहिला चरण के शुरुआत 16 जनवरी 2021 से भइल रहे। पहिला चरण में स्वास्थ्यकर्मियन यानी डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिक्स आ स्वास्थ्य से जुड़ल लोग के साथही फ़्रंटलाइन वर्कर्स यानी पुलिसकर्मियन, पैरामिलिट्री फ़ोर्सेज आ सैन्यकर्मियन के भी टीका लगावल गइल। दूसरा चरण में 60 साल से ज़्यादा उम्र वाला लोग आ कवनो गंभीर बीमारी से जूझ रहल 45 साल से अधिक उम्र के लोग के वैक्सीन दीहल जाता।
भारत में कोविड-19 से बचाव खातिर दू गो वैक्सीन लगावल जा रहल बा, जेकरा के ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया (डीसीजीआई) अनुमति देले बा। ई दूनू वैक्सीन बा- कोविशील्ड और कोवैक्सीन। कोविशील्ड जहां असल में ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका के संस्करण बा उहवें कोवैक्सीन पूरा तरह से भारत के आपन वैक्सीन बा जेकरा के ‘स्वदेशी वैक्सीन’ भी कहल जा रहल बा। कोविशील्ड के भारत में सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया कंपनी बनवले बा। उहवें, कोवैक्सीन के हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक कंपनी आ इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) मिलके बनवले बा।
वैक्सीन के अइला से लोग में कोरोना के खौफ़ भलहीं कम भइल बा बाकिर कोरोना के आग अभी बुताइल नइखे। देश में कोरोना के मामला लगातार बढ़ते जा रहल बा। एहू में महाराष्ट्र के हालात सबसे ख़राब बा। बुझ जाईं जे इहाँ पिछला 24 घंटा में रिकॉर्ड 9855 कोरोना के मामला सामने आइल बा। ई आंकड़ा पिछला 136 दिन में सबसे ज्यादा बा। एकरा पहिले इहाँ 18 अक्टूबर के 9060 मामला रहे।
अब तक देश में 1 करोड़ 11 लाख 39 हजार से ज्यादा लोग संक्रमण के चपेट में आ चुकल बाड़न, जवना में 1 करोड़ 8 लाख लोग ठीको हो चुकल बाड़न, जबकि 1 लाख 57 हजार 385 मरीजन के मौत हो गइल। 1 लाख 67 हजार 183 मरीज के अभी इलाज चलता। ई डेटा हम डेरवावे खातिर ना, सचेत रहे खातिर आ सावधानी बरते खातिर दे तानी।
पिछला साल मार्चे में कोरोना के चलते लॉकडाउन के सिलसिला शुरू भइल। आदमी जे सोशल रहे, सोशल डिस्टेंसिंग बनावे लागल। लोग कंगारू लेखां लइका-बच्चा के करेजा से सटले मुंबई-दिल्ली से पैदले गाँवे भागे लागल। मुँह प जाबी (मास्क) लगा के जरूरतमंद के पूड़ी-तरकारी बँटाये लागल। जे जहाँ फँसल ओही जी भगवान के गोहरावे लागल। गाय अलगे हँकरsतिया, बछरू अलगे। रोज़ी-रोजगार गइल। चैन-सुख गइल। सगरो दहशत पसरे लागल।
तब बहुत लोग अपना इम्यून सिस्टम के साथे अपना मनो के मजबूत कइलस। समय देके अपना रिश्ता के मजबूत कइलस। गाँव-घर के महत्व समझलस। एह में वर्क फ्रॉम होम के सफल प्रयोग भइल। वर्चुअल सेट प कई गो इजाद भइल। नया-नया चैनल खुलल। लइकन के पढ़ाई-लिखाई सब वर्चुअल सेट प।
जब उथल-पुथल होला त कुछ ना कुछ नया होला। कोरोनो काल में भइल। कोरोना काल काल बन के आइल। एह महामारी के विश्वयुद्ध से भयंकर त्रासदी बतावल गइल। लोग-बाग़ तरह-तरह के अनुभव से गुजरल आ ओकरा के लिखल। भोजपुरी जंक्शन ओही लिखलका के एगो संग्रह के रूप में प्रस्तुत करत बा ताकि सनद रहे।
कोरोना काल में लगभग हरेक अंक में कोरोना पर कुछ ना कुछ छपत रहल- आलेख के रूप में, रिपोर्ट के रूप में, हास्य-व्यंग्य के रूप में, सुझाव-सलाह के रूप में, समीक्षा के रूप में, गीत-ग़ज़ल, कविता के रूप में, स्थायी स्तम्भ सुनीं सभे भा संपादकीय का रूप में। हर महिना में कोरोना के अलग-अलग मिजाज रहल आ ओही हिसाब से ओकर असर रहल।
ओह मिजाज आ असर के सहेज के हम एगो सौगात के रूप में ई अंक रउरा लोग के सउंपत बानी, आवे वाला पीढ़ी के ई बतावे खातिर कि हिम्मत, धीरज आ बुद्धिमानी से मुश्किल से मुश्किल समय के पार कइल जा सकेला।

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Hum BhojpuriaFebruary 15, 20211min11250

संपादक- मनोज भावुक

भोजपुरी जंक्शन (हम भोजपुरिआ) के प्रकाशन के एक साल पूरा हो गइल।

ई चौबीसवां अंक ह, जवना में चौदह अंक ‘’ हम भोजपुरिआ ‘’ के नाम से निकलल आ ओकरा बाद एह पाक्षिक पत्रिका के नाम हो गइल- ‘’ भोजपुरी जंक्शन ’’। भोजपुरी जंक्शन के ई दसवां अंक ह।

एह पत्रिका के शुरुआत ‘’ महात्मा गाँधी विशेषांक ’’ से भइल अउर ई चौबीसवां अंक भी  गांधियेजी के समर्पित बा। बीचो में एगो अंक गाँधी जी पर निकलल रहे। एह तरह से चौबीस अंक में से तीन गो अंक त गांधियेजी पर बा। बाकी 21 गो अंक में बसंत विशेषांक, फगुआ विशेषांक, चइता विशेषांक, भगवान राम पर दू गो विशेषांक, कोरोना पर तीन गो विशेषांक, चीन के विरुद्ध मुहीम पर विशेषांक, वीर कुँवर सिंह विशेषांक, देशभक्ति विशेषांक, सिनेमा विशेषांक, दशहरा विशेषांक, गिरमिटिया विशेषांक, दियरी-बाती अउर छठ विशेषांक, डॉ. राजेंद्र प्रसाद विशेषांक अउर सम-सामयिक घटनन से लबरेज कई गो सामान्यो अंक बा। एह सब अंक में किसान, जवान आ विज्ञान सबकर जिक्र बा। भोजपुरी के गौरव जइसन स्तम्भ में धारावाहिक रूप में भोजपुरी के दिवंगत साहित्य सेवी के बात होता, ताकि नया पीढ़ी ई जान सके कि भोजपुरी में केतना-केतना काम भइल बा। केतना लोग अपना जिनगी के होम कइले बा। नयका सिनेमा के साथे पुरनको सिनेमा के बात होता ताकि नया पीढ़ी ई जान सके कि भोजपुरी सिनेमा के इतिहास केतना गौरवशाली रहल बा।

हम शुरुवे में ई वादा कइले रहनी कि ई पत्रिका समय के राग के साथे अपना गौरवशाली परंपरा के लेके चली। करेंट अफेयर्स के साथे अपना जड़ से जुडल रही। एह से देश-विदेश में जवन होता, ओकरा साथे-साथ भोजपुरी साहित्य, सिनेमा आ लोक में जवन काम हो चुकल बा, ओहू सब के समेटे-सहेजे-जोगावे आ नया पीढ़ी से रुबरु करावे के काम ई पत्रिका कर रहल बिया।

राउर पाती स्तम्भ के बहाने जवन रउरा सब के स्नेह-सुझाव आ प्रोत्साहन मिलेला, ऊ ऊर्जा से भर देला अउर काम कइला के एगो अलगे संतोष-सुख मिलेला।

कोरोना संकट अउर तमाम प्रतिकूल परिस्थिति के बावजूद हमनी के हमेशा ई कोशिश रहल कि गुणवत्ता बनल रहो। कुछ नया, अनोखा आ संग्रहणीय सामग्री हीं रउरा सब के परोसल जाय आ एह में सफलतो मिलल।

पत्रिका में भारत के अलावा सात समुन्दर पार के भोजपुरी लेखक लोग के भी सहयोग मिलल।  स्थापित साहित्यकार लोग के साथे-साथ टेलीविजन अउर प्रिंट मिडिया के मुख्य धारा में कार्यरत साथी लोग के भी सक्रिय सहयोग मिलल। साँच कहीं त एही साथी-संघाती लोग के बल पर हमार नज़र सड़क से संसद ले, गाँव से मेट्रो आ सात समुन्दर पार ले, मकई के लावा से पॉपकॉर्न ले, माड़ से राइस सूप ले रहल।

दरअसल भोजपुरी के ओकरा भदेसपन आ इंटेलेक्ट दुनों खातिर समग्रता में देखल जाए के चाहीं।

हम त देखते बानी रउरो आँख से, अपनो आँख से। 8वीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल कइल जाए खातिर जवन लॉलीपॉप दीहल गइल भा दीहल जात रहल बा, ओकरा के लेके खीस बरल त ई शेर भइल कि –

बात प बात होता, बात ओराते नइखे / कवनो दिक्कत के समाधान भेंटाते नइखे

भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा / मर गइल बा का सुरुज, रात ई जाते नइखे

बाकिर हार माने के त सवाले नइखे। भोजपुरिआ लोग हमेशा से अपना जिजीविषा, कर्मठता, जुझारूपन आ लड़ाकू तेवर खातिर जानल गइल बा। हमरा दोसरा गजल में ई आशावादी शेर फूटल कि –

होखे अगर जो हिम्मत कुछुओ पहाड़ नइखे / मन में जो ठान लीं त कहँवा बहार नइखे

कहियो त भोर होई, कहियो छंटी कुहासा / भावुक ई मान ल तू, आगे अन्हार नइखे  

एही हौसला आ उम्मीद के साथे आगे बढ़े के बा।

रउरा सब के साथ-सहयोग के आकांक्षी

 


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Hum BhojpuriaJanuary 19, 20211min8980

संपादक- मनोज भावुक

भारत कृषि प्रधान देश ह बाकिर टू वन जा टू आ टू टू जा फ़ोर वाला जेनरेशन के ई पते नइखे कि गेहूँ आ धान के बाल में का अंतर बा। मुरई आ गाजर जमीन के ऊपर लटकेला कि नीचे।

भारत के आत्मा गाँव में बसेला आ भारत के भविष्य ‘यूथ’ शहर में।

कवनो बाप के मंजूरे नइखे कि ओकर बेटा गाँव में रहो आ खेती-किसानी सीखो। पढ़-लिख गइल बा त गाँव में रहल अउरो गुनाह बा।

त गाँव में के रही? जे बेकार बा, अनपढ़ बा, लाचार बा आ बेरोजगार बा।

त खेती के करी? जे बेकार बा, अनपढ़ बा, लाचार बा आ बेरोजगार बा।

जे समझदार बा, एजुकेटेड बा, टैलेंटेड बा उ नोकरी करी, बिजनेस करी बाकिर खेती ना करी। हमनी के देश के पहचान गाँव बा बाकिर गाँव में जीये-मरे वाला युवा के जल्दी हाड़े हरदी ना लागी. उ तिलकहरू लोग खातिर तरस के रह जाई।

सबका पता बा कि आदमी नोट ना खाई। खाई रोटिये। बाकी रोटी पैदा करे वाला सबसे बुरबक, सबसे गँवार, अंडरस्टीमेटेड …निकम्मा।

अद्भुत देश बा ई।

देश के राजधानी दिल्ली में किसान बिल के लेके लगभग डेढ़ महिना से आन्दोलन चलsता। टीवी प डिबेट चलsता। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचल बा। चारो तरफ खेती-खेती, किसानी-किसानी, किसान बिल के शोर सुनाई देता त हमार ध्यान शहर में भारी बस्ता के बोझ ढोवत लइकन प गइल ह। आपनो बचपन ईयाद आइल ह। जदि गाँव में ना रहल रहितीं त पते ना चलित कि घेंवड़ा छान्ही प फरेला आ कटहर गाछ पर।

मतलब एजुकेशन में खेती के लेके कवनो सीरियसनेस नइखे भले भारत कृषि प्रधान देश ह।

एजुकेशन, हेल्थ, राजनीति, सिनेमा, क्राइम सबके कवर करे वाला पत्रकार, अखबार आ टीवी पर कार्यक्रम देखले-सुनले बानी बाकिर ओह सीरियसनेस के साथ खेती के लेके कुछ नइखीं देखले भले भारत कृषि प्रधान देश ह।

शहर त शहर हम गाँव में भी युवा लोग के पोलिटिक्स, क्रिकेट, सिनेमा प गॉसिप भा बतकही भा डिबेट करत देखले-सुनले बानी बाकिर खेती प ना भले भारत कृषि प्रधान देश ह।

देश के आत्मा गांव में बसेला आ किसान के आत्मा दहार, सुखार, पाला भा कर्ज के सामना करत-करत फांसी के फंदा प भले भारत कृषि प्रधान देश ह।

साँचो, ई देश कृषि प्रधान ह। लोकतंत्र के मंदिर से हर साल बजट में कृषि खातिर करोड़ो-अरबो रुपया आवंटित कइल जाला बाकिर आजो गांव में लइका जवान भइल ना कि दिल्ली, सूरत, पंजाब, मुंबई जाये के तइयारी क लेला। काहे भाई ?

आज ले कृषि, एह कृषि प्रधान देश में प्रतिष्ठा के विषय काहे ना बन पावल ? कमाई के विषय काहे ना बन पावल ?

उत्तम खेती मध्यम बान। निषिद चाकरी, भीख निदान।। …. वाली कहावत कब आ काहे पलट गइल ?

काहे, हर दुआर से बैल गायब बाड़न स आ आदमी शहर में जाके कोल्हू के बैल बनल बा। कोरोना काल में ई लोग-बाग के सबसे बेसी एहसास भइल ह।

साथहीं शहर में जहर खात-खात ई एहसास भइल ह कि हमनी कि आपन खेतियो खराब कर लेले बानी जा। यूरिया आ पोटास छीट-छीट जहर उगावत बानी जा आ जहरे खात बानी जा।

बैल गायब त दुआर प गोबर वाला खाद गायब। भारतीय खेती गायब। जैविक खेती गायब,जवना में गोबर गौमूत्र के मिटटी में डलला से करोड़ो सूक्ष्म जीव के पेट भरे, मिट्टी के उर्वरा क्षमता बढ़े आ अमृत पैदा होखे। अब जाके धीरे-धीरे फेर लोग के आँख खुलता, जब छिहत्तर गो बेमारी धरे लागल बा।

उपज के मामला में ब्राजील दुनिया में सबसे अधिका अन्न उपजावे वाला देश बा त इजराइल अपना तकनीक के बल प कम जमीन में अधिका उपज वाला देश। हिंदुस्तान के भी प्रेरणा लेवे के होई। अधिक से अधिक टैलेंट के कृषि में झोंके के होई। एह कृषि प्रधान देश में तकनीक आ वैज्ञानिकता के सबसे बेसी अभाव कृषि के क्षेत्र में हीं बा।

कृषि आ पशुपालन एक दूसरा से जुड़ल बा। पहिले जब गाय बाछा बियात रहे त परिवार के बुझाव कि घर में एगो सवांग बढ़ गइल बा, बाकिर समय बदलल आ एह सवांग के उपयोगिता खतम होत गइल। ट्रैक्टर के चलन बढ़ल आ बैल के काम खतम हो गइल। नतीजा भइल कि खेत में खादर के बजाय, यूरिया-पोटाश झोंकाइल आ जिनिगी में जहर।

जिनगी में खुशहाली ले आवे के बा त खेती-किसानी के बारे में गंभीरता से सोचे के होई। जब ले किसानी सम्मान आ स्वाभिमान, आकर्षण आ जूनून के विषय ना बनी, ना खेत लहलहाई, ना जिनगी।


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Hum BhojpuriaJanuary 1, 20211min7910
संपादक- मनोज भावुक
साल 2020… मनुष्य के औकात बतवलस। चिरई-चूरूंग, कुक्कुर-बिलार अँगना-दुअरा फुदुकत-कुदुकत रहल आ मानुष मुँह प जाबी (मास्क) लगवले घर में दुबुकल। आदमी सामाजिक प्राणी ह बाकिर ओकरे सामाजिक दूरी बना के रहे के पड़ल, पड़sता आ आगे देखीं, कब ले ?…
अभियो अमिताभ बच्चन फोनवा प बोलते बाड़े – ” नमस्कार, हमारा देश और पूरा विश्व आज कोविड-19 की चुनौती का सामना कर रहा है। कोविड-19 अभी खत्म नहीं हुआ है, ऐसे में हमारा फर्ज है कि हम सतर्क रहें। इसलिए जब तक दवाई नहीं, तब तक कोई ढिलाई नहीं। ”
बच्चन साहेब के पहिले एगो जनाना बोलत रहे। ओकर बोलिया तनी मीठ लागत रहे। ई मर्दवा त पगला देले बाड़े। आदमी अपना काम में अझुरा के भुलाइयो जाता तले कवनो फोन अइला पर इनकर जबरिया कॉलर ट्यून कोरोना के ईयाद ताज़ा करा देता।
बाप रे बाप। ई कोरोना केतना लोग के नौकरी खइलस। केतना लोग के जिनगी। तबो नइखे अघात। तबो नइखे जात। कादो वैक्सीन खाई तबे जाई।
वैक्सीन के लेके तरह-तरह के कोशिश आ दावा त होते बा बाकिर अभी बहुत कुछ साफ़ नइखे… भारत में कोरोना वायरस वैक्सीन के परीक्षण अंतिम चरण में पहुंच चुकल बा आ वैक्सीन के उत्पादनो तेज़ी से हो रहल बा बाकिर ई आम आदमी तक आ ओकरा पॉकेट के पहुँच तक कब पहुंची, ई कहल अभी जल्दीबाजी होई। सरकार के कहनाम बा कि टीकाकरण एक महीना में शुरू हो सकsता। सीरम इंस्टीट्यूट कंपनी एस्ट्राजेनेका के साथ मिलके ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित वैक्सीन के उत्पादन कर रहल बा। ई टीका 70 से 90 प्रतिशत तक प्रभावी बतावल जाता।
खैर, हर बुरा समय के एगो सीमा होला। इहो जाई। जइबे करी।.. आ जब ई इतिहास हो जाई त पीछे पलट के हमनी के एह महामारी के देखब जा त बहुत कुछ लउकी।
लउकी उ काफिला जवना में मरद-मेहरारू लइका-बच्चा के गोदी टंगले पैदले बम्बई से बिहार चल देले रहे। मास्क लगाके पूड़ी बाँटत लोग के फोटो त फेसबुक हर साल देखाई। लाश प भइल सियासत भी सिहरन पैदा करत रही। कादो, बुरा दौर के बाद आदमी जागेला आ ओकरा में मानवता लौटेला पर इहो ओतने साँच बा कि आदमी से हेहर-थेथर दोसर कवनो प्राणी नइखे। श्मशान घाट पर संवेदनशील भइल इन्सान घाट से बहरी निकलते संवेदनहीन होके तोर-मोर करत देखल गइल बाड़न।
खैर, साल 2020 जाता। 2021 आवsता। हमरा नइखे लागत कि कैलेण्डर बदलला से कुछ बदली भा बदलेला बाकिर हँ, दुख, परेशानी, दुर्घटना, ठेस, ठोकर, महामारी आदमी के या त मार देला या त माँज देला, तरास देला। तप के आदमी अउरो चमकेला, निखरेला आ ओकर जिनगी सोना बन जाला। अगर दुख बड़लो बा त दुखी भइला से कुछ होई ना। हम त इहे कहेब कि –
दुखो में ढूंढ लs ना राह भावुक सुख से जीये के
दरद जब राग बन जाला त जिनिगी गीत लागेला
नया साल में बेहतर के उम्मीद कइल जाय. अपना गीत के एगो टुकड़ा से बात ख़तम करत बानी –
अखिल विश्व में सभे रहे खुशहाल
शुभ हो, मंगलमय हो नयका साल
भईया के मुँह से फूटे संगीत
भउजी के कंगना से खनके ताल
आवे रे आवे अइसन मधुमास
मरे कोरोना, टूटे ओकर साँस
जाये रे जाये कोरोना काल
शुभ हो, मंगलमय हो नयका साल

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Hum BhojpuriaDecember 15, 20201min9840

संपादक- मनोज भावुक

26 नवम्बर 1949 के भारत के संविधान बनके तइयार भइल, लागू भइल 26 जनवरी 1950 के। कादो, विश्व के सभ संविधान के अध्ययन कके व्यापक विचार-विमर्श के बाद भारतीय संविधान तइयार भइल। संविधान निर्माण खातिर संविधान के प्रारूप समिति के 141 गो बइठक भइल आ एह तरह से 2 बरिस 11 महिना 18 दिन लागल रहला के बाद एगो प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद आ 8 गो अनुसूची के संगे स्वतंत्र भारत के संविधान के मूल प्रारूप तइयार करे के काम पूरा भइल। हालाँकि एह 71 साल में एह में ढेर बदलावो कइल गइल। आज हमनी के संविधान में 12 अनुसूची सहित 400 से अधिक अनुच्छेद बा।

त अभिये 26 नवम्बर के पूरा देश में संविधान दिवस मनावल गइल ह। 2015 से हीं संविधान दिवस मनावल जाता। केंद्र सरकार वर्ष 2015 में गजट नोटिफिकेशन द्वारा 26 नवंबर के ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनावे के घोषणा कइलस, तब से। एकरा पहिले, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा वर्ष 1979 में एगो प्रस्ताव के बाद से ई दिन ‘राष्ट्रीय कानून दिवस’ (National Law Day) के रूप में मनावल जात रहे।

खैर, संविधान दिवस भा राष्ट्रीय कानून दिवस के शुभकामना देत अपना संविधान के ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर के ओह बतिया पर विशेष ध्यान चाहsतानी जवन अक्सर नजरंदाज होला।

“संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह अंततः बुरा साबित होगा, अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग बुरे होंगे” – डॉ भीमराव अंबेडकर

बात बहुत बड़ बा। बूझे के जरुरत बा।

अब एगो दोसर बात। 26 नवम्बर से सटले एगो अउर तिथि बा- 3 दिसम्बर। 3 दिसंबर 1884 के ओह महान छात्र के जन्म भइल जेकरा खातिर एग्जामिनर कहलस कि ‘The Examinee is better than Examiner.’ ..सादगी, सेवा, त्याग आ स्वतंत्रता आंदोलन में अपना आपके होम कर देवे वाला ओह महान देशभक्त के जनम भइल जेकरा के भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाज़ल गइल। जेकरा के पूरा देश प्यार से ‘देशरत्न’ कहल।

आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 के भारत के गणतंत्र राष्ट्र के दर्जा मिलला के साथ जे देश के राष्ट्रपति बनल, फेर साल 1957 में दुबारा राष्ट्रपति बनल, देश के एकमात्र नेता जे दू बार राष्ट्रपति बनल, 12 साल तक राष्ट्रपति रहल, ओह पुण्यात्मा के जन्मदिन ह 3 दिसम्बर।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद माने हमनी के इलाका के रजिंदर बाबू। जीरेदेई सिवान के नू हईं। खाँटी भोजपुरिया। कादो, अपना लोग से भोजपुरिये में बतिआईं अउर उहें के प्रेरणा से भोजपुरी में सिनेमा बनल शुरू भइल।

खैर, ई सब कथा-कहानी त जवन बा तवन बड़ले बा। असल बात ई बा कि बात भारतीय संविधान आ संविधान दिवस से शुरू भइल बा त ई जानल जरुरी बा कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद हीं  संविधान सभा के अध्यक्ष रहनी आ उहाँ के जवन 24 गो उप-समितियन के गठन कइले रहीं, ओही में से एगो ‘‘मसौदा कमेटी’’ के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर रहनी। अम्बेडकर साहेब के काम रहे 300 सदस्यीय संविधान सभा के सब चर्चा आ उप-समितियन के सब अनुशंसा के संकलित कके एगो मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार कइल, जवना के संविधान सभा के अध्यक्ष भइला के नाते रजिन्दरे बाबू स्वीकृत करत रहनी। तब उ ड्राफ्ट संविधान में शामिल होत रहे।

त भाई हो, तनी रजिन्दरो बाबू के योगदान के ओतने मन से ईयाद कइल जाय। हमरा विश्वास बा कि उहाँ के ईयाद कइला से, सच्चा मन से उहाँ के श्रद्धांजलि देला से, उहाँ के जीवन में आत्मसात कइला से राजनीति के आत्मा परिष्कृत होई आ देश, समाज के बेहतर दिशा मिली।



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भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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