img903.jpg

Hum BhojpuriaOctober 12, 20211min810

सूर्येन्दु मिश्र

तिरबेनी नाम रहे उनकर लेकिन गांव के लोग उनके तिबेनिया के नाम से ही जाने। तिरबेनी लरिकाईये से गाँव के बाकी लड़िकन से अलगे बुझात रहलें। कवनो काम होखे चाहे खेलकूद उनकर मुकाबिला उनकरी उमिर के लड़िका लो ना क पावे।

उनकर बाबू जी छबीला पांडे सरकारी महकमा में एगो अच्छा पद पर काम करत रहलें। वो घरी अंग्रेजन के राज रहे आ उहे देश के मालिक रहलें कुल। पांडे जी के इच्छा रहे कि उनकर कुल के चिराग खूब पढ़-लिख के कौनो ऊंच ओहदा पर नौकरी करें…लेकिन पूत के पांव पलनवे में नूं लउक जाला।

तिरबेनी जब कुछ बड़ भइले त कबो कबो  गोरून के चरवाही में भी जाये लगलें। एक दिन जब सब चरवाहा लोग बांधी पर बइठ के बतियावत रहले त तिरबेनी भी उनकर बात सुनें लगलें। एक जाना बुजुर्ग कहल शुरू कइलें…

” देख लोग ई अंगरेजन के हुशियारी सरवा अइलें सन बयपारी बन के घिघिआत आ आजु उहे ए देश के राजा बनिके पूरा देश के अपनी अंगूरी पर नचावत बाड़े सन।”

दूसरा जाने बोललन- “ठीक कहs तारs भाई, अब त ई हाल बा कि जे ई गोरन के खिलाफ बोलता ओकरा के उ तुरंते फांसी पर लटकवा दे तारेसन। पंजाब में त उ क्रांतिकारी लोग के तोपे के मुंह में बान्हि के उड़ा दिहलन ह सन।”

इन्हन के एतना अत्याचार बढ़ गइल बा कि ढाका में अपने देश के कारीगरन के हाथे कटवा देलेसन। ओ लोगन के हाथ से बनल मलमल के पूरा थान एगो अंगुठी से निकल जात रहे ।

तिरबेनी चरवाहा लोगन के बात बड़ी ध्यान से सुनत रहलें। उनका से ना रोकाइल तब पूछ लिहलें ….

“काका, ई कारीगर लोग के हाथ काहे कटवा दिहले? उनके त बहुत खून निकलल होई ?

दुखी काका -“आरे तोरा ना बुझाई रे बबुआ…. उ कारिगरन के रहते अंगरेजी कंपनी के माल बिकईबे ना करित।”

तिबेननी कहलन-” एम्मे कौन बात रहे, सब लोग मिलके कंपनी के माल ख़रीदबे ना करी त कंपनी खुदे बन्द हो जायी।”

दुखी काका – उ त ठीक बा लेकिन अपनिये देश के लोग जब गद्दार बा त का करबा ?”

“काका एकर मतलब हमरा ना बुझाईल”

दुखी काका- ” तहरा ना नू बुझाई, तू त बड़ा बाप के बेटा हउवs, तहार बाप अंग्रेजन के नौकरी करेलन। उ अंग्रेजन के खिलाफ कबो जा सकेलेन ? एहितरे सबके आपन आपन सवारथ बा। कुछ लोग विरोध में जाला त बहुत लोग गोरन के तलुआ चाटे खातिर लाइनी में खाड़ रहेला।”

तिरबेनी के ई बात भीतर जा के समा गइल। दूसरे दिन जब उनकर बाप नौकरी पर जाये खातिर तैयार होत रहलन त उ उनसे पूछलें – “बाबूजी रउवा अंग्रेजन के गुलामी करेनी का ?

उनकर बाबूजी अपनी बेटा के मुंह से ई बात सुनके भौचक्का हो गइले ।

पूछे लगलें- “तोहरा से ई के कहल ह, हम नौकरी करेनी त तनख्वाह पावेनी, नौकरी गुलामी थोड़े ना होला।”

…. लेकिन तिरबेनी उनके ए बात से संतुष्ट ना भइले।

कहे लगनें….” लेकिन बाबू जी जवन अंगरेज अपने देश के लोग के हाथ कटवा दे तारें सन, तोपे से उड़ा दे तारे सन आ भारतमाता के नाम लिहला पर फांसी पर चढ़ा दे तारे सन उनहन के नौकरी त देश के साथे गद्दारी कहल जाई।”

तिरबेनी के मुंह से अइसन बात सुन के  बाबूजी कुछ बोलले बिना घर से बाहर निकल गइलें  बाकी एतना त उनके नीमन से बुझा गइल रहे कि त्रिवेणी के मन में गोरन के खिलाफ विद्रोह के चिंगारी सुलुग रहल बा।

समय के साथ तिरबेनी जब कुछ और बड़ा हो गइलें तब उनकर दाखिला स्कूल में हो गइल। तिरबेनी तेज दिमाग के रहले, उनकर पढाई अपनें क्लास में आगे आगे चले।  धीरे-धीरे जब उ हाईस्कूल में पहुंच गइले….ओहि समय उनके हाथ कुछ अइसन किताब हाथे लागल जेकरा के पढला के बाद उनके मन में अंग्रेजन के खिलाफ विद्रोह के चिंगारी धधके लागल। अब त उनकर मन पढ़ाइयो से उचाट हो गइल रहे। त्रिवेणी के बात-बेवहार में परिवर्तन देख के उनकर बाबूजी चिंतित रहे लगलें। कवनो बाप अपनी बेटा के खुशहाल जीवन देखल चाहेला ..एकरा खातिर उ समाज के नियम-नेत के भी ताक पर रख देला। तिरबेनी के बाबूजी उनके कई बार ई समझावे के कोशिश कइले कि अंग्रेजन के खिलाफ बगावत सोचल शेर के मुंह में हाथ डलला अस बा लेकिन तिरबेनी के ऊपर उनकी बात के कवनो असर ना भइल।

एहि बीचे, एक दिन अपने स्कूल में एगो समारोह में तिरबेनी के कुछ बोले के मौका मिल गइल।  जब उ बोले खातिर खड़ा भइलन त आपन संबोधन वंदे मातरम से शुरू कइलन। जब उ ब्रिटिश हुकूमत के बघिया उघारल शुरू कइलन त वो समारोह में आइल अंग्रेज अधिकारी बौखला गइल आ मंच से उतरे के संदेशा भेजववलस लेकिन उ आपन बात कहिए  के उतरलन। उनके आवाज में इतना जोश रहे कि उनकर कुछ सहपाठी लोग भी बीच-बीच मे उनके वंदे मातरम आ भारत माता की जय के नारा खूब लगावल लो।

बाद में अफसर के आदेश पर तिरबेनी  के साथे उनके पांच गो और साथिन के नारा लगावे खातिर स्कूल से निकाल दिहल गइल।

तिरबेनी के स्कूल निकलला के खबर जब उनके बाबूजी के मिलल त उ आपन माथा पीटे लगलें। उनके समझावे के एगो कोशिश फेरु कइलें लेकिन तिरबेनी अपनी इरादा से टस से मस ना भइलन।

पढ़ाई छुटला के बाद तिरबेनी पर देशभक्ति के नशा अउर गहिरा गइल। अब उ धीरे-धीरे क्रांतिकारिन के मीटिंग में भी जाए लगले। उनकर जोशीला भाषण आ लगन देखि के उनका के एगो गुट के मुखिया बना दिहल गइल।

एही बीचे तिरबेनी के बाप ओ समय फइलल प्लेग के महामारी में स्वर्गवासी हो गइले। ए प्लेग के महामारी आ साथे पड़ल अकाल दुनों में अंग्रेजन आ जमीनदारन के करिया चेहरा उजागर हो गइल रहे।

धीरे-धीरे समय के साथे तिरबेनी के साथ कुछ नामी विद्रोही लोगन से हो गइल रहे। उनके गुट के लोग हथियार खरीदे खातिर आ पार्टी के काम की खातिर छोट-मोट डकैती भी डाले लागल रहे।

उनकी गुट के ई नियम रहे कि धनी आ जमींदार लोग देशद्रोही बनके जवन धन दौलत बटोर के रखता, ओईमे गरीब के भी हिस्सा होखे के चाहीं।

अब, एक के बाद एक डकैती लूट में उनकर नाम आवे लागल। पुलिस कई बेर गांव में छापा मरलस लेकिन तिरबेनी के परछाइयों ना पवलस। तिरबेनी के ना पकड़इला के कारण इहो रहे कि उ कबो अपनी इलाका में लूटमार ना करस। दूसरे, गरीबन के बेटी के कन्यादान उ खुद आ के करें। उनकरी पैसा से उनकर महतारी कबो अपनी खातिर कुछ ना लिहली बहुत गरीबी में आपन गुजर बसर करस।

एहि बीच में उनके बारे मे पुलिस के पक्का सूचना मिलल कि उनकी गुट के लोग के मीटिंग एगो उखि के खेत मे चलता। एगो तेज तर्रार अफसर मय फोर्स लेके उ खेत के घेर लिहलस आ तिरबेनी के गिरफ्तार क लिहलस। तिरबेनी के गिरफ्तारी से जवार के लोग बहुत दुखी रहे लेकिन अंग्रेजन की शक्ति के आगे सब लोग डेरइबो करे।

जब एगो अफसर उनसे पूछलस कि डकैती के समान कहाँ छुपवले बाड़s? त उ अपने पिछुआरे के खेत बता दिहलन। पुलिस मय फोर्स वो खेत के कई बेर खोदववलस बाकी उहवाँ से एगो फुटल कौड़ी भी ना मिलल।

जब उ अंगरेज अफसर खिसिया के  फेर पूछलसि–  “जब कुछ खेते में ना रहे त बेकार में खेते के खोदाई काहे करववल ह।”

“सरकार, हमार दू गो महतारी बाड़ी, एगो जवने ख़ातिर हमरा के फांसी होखे जाता। दूसर, जवन हमके जनम देले बिया। हमरी ना रहले के बाद उ ओहि खेत में कुछ बो-उपराजके खा सकी। एहि से हम अइसन कहनीं ह। हम जवन धन लुटले बानी ओके देश आ मजलूम लोग के सेवा में खर्च क देले बानी।”

उ अफसर के लगे अब कौनो सवाल ना रहे आ जबाब लोर बनके उनकी आंख से  टपके लागल।

आज भी जवार के लोग तिरबेनिया के बुध्दिमानी आ देशप्रेम के याद करेला।


img115.jpg

Hum BhojpuriaSeptember 6, 20211min2430

मनोज भावुक

( एक )

कविता

अबो जे कबो छूटे लोर आंखिन से

बबुआ के ढॉंढ़स बंधावेले माई

आवे ना ऑंखिन में जब नींद हमरा त

सपनो में लोरी सुनावेले माई

बाबूजी दउड़ेनी जब मारे-पीटे त

अँचरा में अपना लुकावेले माई

छोड़ी ना, बबुआ के मन ठीक नइखे

झूठहूं बहाना बनावेले माई

 

भेजे में जब कबो देर होला चिट्ठी त

पंडीजी से पतरा देखावेले माई

रोवेले रात भर, सूते ना चैन से

भोरे भोरे कउवा उचरावेले माई

 

जिनिगी के अपना ऊ जिनिगी ना बूझेले

´बबुए नू जिनिगी ह´ बोलेले माई

दुख खाली हमरे ऊ सह नाहीं पावेले

दुनिया के सब दुख ढो लेले माई

 

´जिनिगी के दीया´ आ ´ऑंखिन के पुतरी´

´बुढ़ापा के लाठी´ बतावेले माई

´हमरो उमिरिया मिले हमरा बबुआ के´

देवता-पितर गोहरावेले माई

 

( दू )

गीत

बबुआ भइल अब सेयान कि गोदिए नू छोट हो गइल

माई के अँचरा पुरान, अँचरवे में खोट हो गइल।

 

गुटु- गुटु गोदिया में दूध-भात खाइल

मउनी बनल अउरी भुइयाँ लोटाइल।

नेहिया– दुलरवा के बतिया बेकारे –

टूटल पिरितिया के डोर कि मन में कचोट हो गइल।

 

‘चुलबुल चिरइया’ में बबुआ हेराइल

बोले कि बुढ़िया के मतिये मराइल।

बाबा के नन्हकी पलनिया उजारे –

उठल रुपइया के जोर जिनिगिये नू नोट हो गइल।

 

भरल-पूरल घरवा में मन खाली-खाली

दियरी जरे पर मने ना दीवाली ।

रतिया त रतिया ई दिनवो अन्हारे –

डूबल सुरूज भोरे- भोर करेजवे में चोट हो गइल।

 

( तीन )

गजल

हजारो गम में रहेले माई

तबो ना कुछुओ कहेले माई

 

हमार बबुआ फरे-फुलाये

इहे त मंतर पढेले माई

 

हमार कपडा, कलम आ कॉपी

सँइत-सँइत के धरेले माई

 

बनल रहे घर, बँटे ना आँगन

एही से सभकर सहेले माई

 

रहे सलामत चिराग घर के

इहे दुआ बस करेले माई

 

बढे उदासी हिया में जब-जब

बहुत-बहुत मन परेले माई

 

नजर के काँटा कहेलीं रउरा

जिगर के टुकडा कहेले माई

 

‘मनोज’ हमरा हिया में हरदम

खुदा के जइसन रहेले माई

 

( चार )

फ़िल्मी गीत

( फिल्म- मेहंदी लगा के रखना-3 )

अँचरा छोड़ा के चल काहे दिहले

एतना दूर ए माई

अब के बबुआ, बबुआ कहिके हमके पास बोलाई

तोरा बिना जीही, जीही कइसे

तोरा बिना जीही, जीही कइसे

तोर बउरहवा रे माई

रे माई

तोरा बिना जीही, जीही कइसे

तोर बउरहवा रे माई

 

माई….माई…माई…

 

मन के दरदिया, अब के बूझी, अब के पोछी अँखिया से लोर

केकरा आगे फूट के रोअब, के समझी सिसकी के शोर

बिन कहले दुखवा जे बूझे, बिन कहले दुखवा जे बूझे

अइसन के हो पाई… रे माई..

तोरा बिना जीही, जीही कइसे

तोर बउरहवा रे माई

 

दुनिया के मेला में काहें तू हमसे छोड़वले हाथ रे

हमरा के भी लेले चलते, ले चलते अपने साथ रे…

खूँटा उखड़ गइल बा गईया के

खूँटा उखड़ गइल बा गईया के

अब इ बछड़ुआ कहवाँ जाई

रे माई…

तोरा बिना जीही, जीही कइसे

तोर बउरहवा रे माई

 

( पाँच )

दोहा 

माई रे ! जाई कहां, देवता पूजल तोर।

कहियो त होइबे करी, हमरो खातिर भोर।।

दुनिया से जब-जब मिलल ठोकर आ दुत्कार ।

तब-तब बहुते मन परल माई तोर दुलार।।

 

( छः 

कुछ फुटकर शेर

बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल

माई रे, अपना घर के उ आंगन कहाँ गइल

 

ना परे मन घर कबो बबुआ के भलहीं

रोज बुढिया भोर में कउवा उचारे

 

पडे जब डांट बाबू के, छिपीं माई का कोरा में

अजी इ बात बचपन के मधुर संगीत लागेला

 

धन दौलत सब तू ले ल

माई हमरा बखरा में

 

ए बबुआ नइखे हमरा डॉलर-फालर के काम

रहs आंख के सोझा हरदम माई कहे हमार

 

मझधार से हम बाँच के अइनी किनार पर

देवास पर भगवान से भखले होई माई


download-1.jpg

Hum BhojpuriaJune 12, 20211min3110

  डॉ. सुमन सिंह

बंगड़ परेसान हो-हो खटपटिया गुरु के मकान क चक्कर काटत रहलन। कब्बो गेट के लग्गे जाके भित्तर झाँके क कोसिस करें कब्बो खिड़की के बंद पल्ला पर कान रोपें बाकिर कवनों आवाज़-आहट ना। दू तल्ला क बड़-बरियार मकान अइसन सून-सपाट रहे कि लगे बरिसन क उजाड़ ओम्मे वास ले लिहले ह। मानुस त मानुस चिरई-चुरुंग भी ना देखायँ। दू दिन पहिले त अइसन सन्नाटा ना रहल। अब एकाएक कइसे अइसन हो गइल! हरान-परेसान बंगड़ मकान के बंद गेट पर मूड़ी टिकवले अबहीं सोचते रहलन कि आखिर का बात भइल, काहें दू दिन पहिले क हँसत-बोलत मकान एतरे सून हो गइल। कहाँ गइलन गुरु, कहवाँ गइलिन भउजी ..कि पिंकू पीछे से आके बंगड़  के पीठ पर जोरदार मुक्का मरलन-

-“का बंगड़ भैया! अब इहे रह गइल ह। का ताक-झाँक लगवले हउवा यार। कहीं डाका-वाका डाले क त ना मन बनावत हउवा ? ” पिंकू अबहीं सुर धइले आगे बोलहीं के रहलन कि बंगड़ खिसियाय गइलन- ” देख पिंटुआ एक त सबेरे ही सबेरे हमार दिमाग खराब हो गइल ह अब तू अउरी मत ख़राब कर, नाहीं त जान जईहे।” बंगड़ के अगियाबैताल बनत देख पिंटू के मन में अनार फूटे लगल। बहुत दिन बाद बंगड़ गुरु भेंटाइल रहलन। पिंटू क मन लहकत-चहकत रहे चिकारी करे खातिर। कुछ दिन पहिले बंगड़ पिंकू क बीच बजार, साह जी के चाह के दुकान पर कुल ढाँकल-तोपल भेद उजागर क दिहले रहलन। भाँग-गांजा पियले-छनले क आ इँहा तक कि जवन-जवन नसा आ काण्ड दुनु जानी आपस में गाँठजोड़ के कइले रहलन कुल्ह उजागर हो गइल। संगी-साथी, भइया-चच्चा लोग के सामने पिंटू क जमके जगहँसाई भइल। एह जगहँसाई करे के पीछे का कारण रहे ना त पिंटू जान पइलन ना बंगड़ बतावे गइलन बाकिर ओह दिन के बाद केहू बंगड़ आ पिंटू के एक संगे न देखलस।

अब जब बंगड़ केहू के दुआर ओरी झाँकत-ताकत पकड़इलन त पिंटू के उनकर लानत-मलामत करे क मौका मिल गइल। बंगड़ के एह करतूत के भरल समाज में ले आवे खातिर पिंटू भर जोर चिचिआए बदे मुँह फड़हीं वाला रहलन कि बंगड़ उनकर मुँह दबवले, घिसिरावत अपने दुआरे ले अइलन- “का बे, पिटाये बिना मानोगे नहीं का। अबहीं मारे दुई चप्पल ससुर क नाती ! ” बंगड़ अबहीं गोड़े में से चप्पल निकलहीं जात रहलन कि पिंटू अकड़ के खड़ा हो गइलन-” भैया जवन कहना है हमको कहिए बिच्चे में ससुर को मत लाइये, समझे कि नाहीं।” पिंटु बात त क्रोध से किटकिटा के कढ़वले रहलन बाकिर बंगड़ ठठा के हँसे लगलन- ” का बे, अबहीं उ ससुर तोहार ससुर बनबे नहीं किये आ अबहिएँ से तुम उनसे एतना थर्रा रहे हो ? बाद में का होगा बे। उ ससुर एक ले बिसधर। का जान रहे हो तोहरे नियन लहकट के दमाद बनायेंगे। आ जदि लइकी के मोह में पड़ के बनाइये लिए तो का समझ रहे हो तुम्हारे जइसे आवारा की आरती उतारेंगे आयं। ” बंगड़ क हँसी-ठिठोली बोली-कुबोली में बदल गइल रहल। पिंटू के फिर से आपन पिछला अपमान याद आ गइल। क्रोध में लहकत कहलन–” भइया इकुल बात ठीक नहीं है। आपका सादी-बियाह नहीं होगा तो का केहुवे का नहीं होगा। बचपन से पचपन के उमिर तक आप जिनगी में करबे का किये जी। पढ़ाई -लिखाई छोड़ के गल्ली-गल्ली घूम के बस इनके उनके रासन-पानी, दर-दवाई आ अनाज -तरकारी ढोवे। तीज-त्योहार में, सादी -ब्याह में बिना मजूरी लिए खटनी खटे। मिला क्या ? सुनने को फटकार आ खाने को गारी। आप आज ले तो चेतबे नहीं किये अपना नफा-नुकसान। मय गाँव-जवार, हीत-नात, आपन-आन आपको सुधारने में लगा रहा आ आप न सुधरे। कम से कम हम्मे तो अपना हानि-लाभ समझने दीजिये। ” पिंटू बिना साँस लिहले कुल उघटा-पैंच कय भइलन। इकुल सुन के केहुवे के कपार धीक जाए के चाही बाकिर बंगड़ सनाका खा गइल रहलन। कुछ घरी बंगड़ के चुप देख के पिंटू के अपने बोली-कुबोली पर पछतावा होवे लगल। बंगड़ के मूड़ी गोतले आ आँस छिपावत देख पिंटू क कुल मोहमाया उमड़-घुमड़ आइल। बंगड़ एह घरी अइसन दीन-हीन दुखियार देखात रहलन कि पिंटू अपने के कोसे लगलन। बहुत साहस बटोर के कहलन- ” भइया माफ़ कर दा यार। अब अइसन कुछु ना कहब कि तोहके बुरा लगी। हम त…।” अबहीं पिंटू हकलात आगे अउरी कहहीं के रहलन कि बंगड़ आँस पोछत ठाढ़ हो गइलन- “आज ले सबही हमके कुछ न कुछ टेढ़-सोझ कह देत रहल ह बाकिर हम केहू क बात करेजा पर ना लिहलीं, तोहरो ना लेब। बाकिर अब घरहूँ में मार-मार दुर-दुर होवे लगल ह। दू जून क रोटी खातिर एतना जहर-माहुर नियन बोली-टिबोली सुनले से ठीक कि आदिमी गंगा जी में समाय जायं। बेरोजगारी जिनगी खातिर गरहन बनल जात हे भाय पिंटू…. अच्छा !  ई कुल जंजाल त लगले रही…छोड़, चल चलीं जा बड़का भइया के घरे।

पता ना काहें हमार मन घबरात ह। कल्हिएँ से उनकर गेट बंद ह। अइसन आज ले ना भइल। सबेरे से लेके सुतली रात ले भउजी बोलत-बतियावत मनसायन कइले रहत रहलीं ह आ…” ऐसे पहिले कि बंगड़ आगे कुछ बोलें पिंटू बिच्चे में कूद गइलन- “ओके मनसायन ना कहल जाला। कपार खाइल कहल जाला भइया। अइसन करकसा मेहरारू हम अबहीं आज ले ना देखलीं। केसे ना करकर कइले होई ऊ मेहरारू.. सब्जीवाला, ठेलावाला, दूधवाला, राशनवाला तक ओकरे दुआरी जाए में आनाकानी करेला। आ तोहीं बतावा, तोहरे कवनों करम छोड़लस ऊ ? का-का अछरंग लगा के तोहके घर-निकाला दिहलस आ अबहीं तू उनही के फिकिर में बूड़त-उतरात हउवा ? बड़ा बरियार करेजा बा भइया तोहार यार ! मान-सम्मान कुल्हिये घोर के भोग लगा लेले हउवा का भाय ? हम त ना जाइब ओह करकसनी के दुआरी तोहके जाए के ह त जा।” कह के पिंटू भागे के भइलन कि बंगड़ कस के उनकर बाँह पकड़ लिहलन- ” मान-अपमान क चिंता आज तोके ढेर लेस देहलस…चल नाहीं त अबहिएँ तोहरे ससुर के हिकभर गरियाइब….। “बंगड़ हँसत पिंटू के बाँह पकड़ के घिसिरावत खटपटिया गुरु के दुआरे ले गइलन। कई बेर गेट पिटलन, कॉलबेल बजवलन बाकिर केहू क अता-पता ना। बहुत देर तक दुनू जनी घर क परिक्रमा क के गेट पीट के, घंटी बजा के जब थक गइलन त बंगड़ कहलन–” कूदे के पड़ी। “बंगड़ क विचार सुनते पिंटू के कँपकँपी छूट गइल-

-“ना भाई ना। तोहके कूदे के होय त कूदा बाकिर हमके माफ़ करा भइया। बत्तीस के उमिर में त केहुतरे पियाय, खियाय-पटाय के बियाह तय भइल ह। का चाहत हउवा ई तोहरे समाज सेवा में हम चोर-चाईं बनाय के जेल भेज दीहल जाईं। हमसे इकुल ना होई। तू ही कुद्दा..हम बहरे रह के निगरानी करब।”

“कवने बात क निगरानी बे ? चोरी करे जात हईं का हम ?।” मारे खीस के बंगड़ क मन करत रहे पिंटू के हिकभर कूटे क बाकिर केहू तरे धीर धइलन आ चारदीवारी धय के धप्प से घरे में कूद गइलन।

बइठका क खिड़की उढ़कल रहे, खोल के भित्तर झंकलन। भित्तर दिनहूँ में अन्हार रहे। बंगड़ क जी धुकपुक करे लगल। का बात ह, का भइल बूढ़ा-बूढ़ी के…कहीं … । मन के कड़ा क के गोहरवलन–” भइया हो !सब ठीक ह न हो ? कहवाँ हउवा भाय तू लोग ? बेमार-ओमार हउवा का ? …आँख फाड़-फाड़ के बंगड़ भित्तर के अन्हार में भइया-भउजी के टोहत रहलन आ लगातर गोहरावत रहलन। दस-पंद्रह मिनट के मेहनत-मसक्कत के बाद भउजी गिरत-भहरात अइलीं। भर्राइल कंठ से कुछ बोलल चहलीं पर बोल ना फूटल। भउजी के एह दसा में देख के बंगड़ क परान सूखा गइल- ” भउजी पहिले केवाड़ी खोला। भित्तर आवे दा।” बंगड़ हाल-समाचार जाने खातिर बेचैन रहलन बाकिर भउजी केवाड़ी ना खोललीं। भितरे से बोललीं–” तोहरे भइया के तीन-चार दिन से जर-बोखार रहल ह। जाँच करवावल गइल त कोरोना बतावत ह बचवा। तब्बे ले केवाड़ी बन के आदिमी पड़ल हउवन। बहरे केहू के पता न चले के चाही बचवा …। “कह के भउजी रोवे लगलीं। बंगड़ समझावत-बुझावत कहलन—

” देखा भउजी बहुते आदिमी के आजकल कोरोना होत ह आ बहुते लोग ठीक हो जात हउवन। घबराए क कवनों जरूरत ना ह। एतरे केवाड़ी बन कइले आ ढंकले-तोपले बेमारी ठीक होई कि बढ़ी?

तोहन लोग के बढ़िया देखभाल आ इलाज क जरूरत ह। घबरा जिन अबहीं घरे से बहिनिया के भेजत हईं। तोहन लोगन क भोजन-पानी क बेवस्था आ देखभाल खातिर। तनी दूरी बना के आ सावधानी रख के चलिहा लोग। सब ठीक हो जाई। घरे में लाइट जरावा, खिड़की-दरवाजा खोला। ई का मनहूसियत फइलवले हऊ। बंगड़ के एक-एक सबद भउजी खातिर संजीवनी रहल। ऊ रोवे लगलीं–” ए बचवा, तोहार एहसान कब्बो ना भुलाइल जाई हमहन दुनु जनी। आज दिन जब आपन औलाद हमहन के अकेल मरे  खातिर छोड़ देले हउवन त तूँ ….ए बचवा…। “भउजी बहुत चहलीं बाक़ी ऐसे आगे ना बोल पवलीं।

“अच्छा-अच्छा अब ढेर रोवले क आ कमज़ोर पड़ले क जरूरत ना ह। मजबूती से जइसे आज ले भइया के ठोंकत-बजावत आयल हऊ वइसहीं कोरोना के भी तू बढ़िया से ठोक-बजा लेबू। परेसान भइले क का जरूरत आंय..बतावा भला कोरोना माई क मजाल जवन तोहरे नियन मातारानी के समने टिक पइहन…अब आके गेटवा खोलबू कि फेर से चारदीवारी फाने के पड़ी..आयं।” बंगड़ क बोली एसे पहिले भउजी के कान में अंगार जस लगत रहे बाकिर आज संकट में संजीवनी बन गइल रहे। गदगद कंठ से टूटल-फूटल एतने कह पवलीं-

” कहल -सुनल माफ़ करिहा ए बचवा…।”

“तोहरे ना भउजी हम त सबही क कहल-सुनल माफ करत चल जात हईं…बज्र बेहया आदिमी क का मान, का अपमान ?

आपन आ भइया क खेयाल रखिहा। तनिको जिन घबरइहा। ठीक न …!” भउजी पहिली बार केहू के रोवां-रोवां से असीसत रहलीं।



About us

भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


Contact us



Newsletter

Your Name (required)

Your Email (required)

Subject

Your Message