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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min1930

ज्योत्स्ना प्रसाद

जन्मतिथि- 19 अक्टूबर 1927        पुण्यतिथि- 31 दिसम्बर 1989

‘अपि स्वर्णमयी लङ्का न में लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । । ’

ई कथन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के ह। एह कथन से ही ई बात प्रमाणित हो जाता कि सनातन धर्म आ भारतीय परम्परा में माता के केतना ऊँचा स्थान बा? बाकिर एकर अर्थ ई ना भइल कि माता के महत्त्व के कवनों धर्म-विशेष के चौहद्दी में बाँध के देखल जाव।  काहेकि प्राय: हर धर्म में माता के स्थान बहुत ऊँचा बा। मुस्लिम परम्परा में भी मानल जाला- ‘माँ के क़दमों के नीचे है जन्नत। ’ वइसे ही मरियम के बिना यीशु मसीह के कल्पना ही ना कइल जा सकेला। एह से हर धर्म में ही ना बल्कि जीव-जन्तु में भी अपना माता के प्रति विशेष लगाव देखल जाला। आखिर केहू के अपना माता के प्रति लगाव रहे काहे ना ? माता ही ऊ माध्यम हई जे ईश्वर-अंश के अपना गर्भ में धारण करेली, ओह अंश के कष्ट सहके भी शरीर प्रदान करेली। ओकरा दु:ख-सुख में शामिल होली। एह से कवनों बच्चा अपना सुख में महतारी के इयाद करे चाहे ना लेकिन दु:ख के छाया पड़ते ऊ सबसे पहिले अपना माई के ही इयाद करेला। एही से त महतारी के भगवान के दूसरा रूप भी कहल जाला।

हम अपना माई के अम्मा कहत रहनी। हमरा अम्मा शैलजा कुमारी श्रीवास्तव (जन्म- 19 अक्टूबर 1927- मृत्यु- 31 दिसम्बर 1989) के जन्म पिलुई, दाउदपुर, सारण (बिहार) के एगो सम्पन्न, शिक्षित आ प्रतिष्ठित परिवार में भइल रहे। उहाँ के प्रारम्भिक शिक्षा अपना गाँव में यानी पिलुई में ही भइल रहे जबकि माध्यमिक शिक्षा सीवान से भइल। चूँकि शैलजा जी के परिवार पढ़ल-लिखल रहे, उहाँ के बाबूजी उर्दू-फारसी-अरबी के शायर आ विद्वाने भर ना रहनी स्वयं एम. ए., एल. एल. बी. भी कइले रहनीं। एह से अपना बेटी के उच्च शिक्षा देबे खातिर उहाँ के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस भेजनीं। जहाँ से शैलजा जी स्नातक कइनीं आ साहित्याचार्य के परीक्षा-बिहार संस्कृत समिति से स्वर्ण पदक के साथे उत्तीर्ण कइनीं। जवना के बाद ही शैलजा जी दिघवलिया (सीवान) निवासी रसिक बिहारी शरण (एम. ए., एल. एल. बी.) के चौथा लड़िका (पाँचवीं संतान) श्री महेन्द्र कुमार (एम. ए., एम. काम., डीप. एड.) से परिणय-सूत्र में बँध गइनीं। बाकिर अपना शादी के बाद भी उहाँ के आपन पढ़ाई जारी रखते हुए पटना विश्वविद्यालय से डिप-एड कइनीं आ बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से संस्कृत में एम. ए. कइनीं।

शैलजा जी बिहार में शिक्षा विभाग के विभिन्न पदन के शोभा बढ़ावत अंत मे प्राचार्या, महिला प्रा० शिक्षक शिक्षा-महाविद्यालय, सीवान के साथे-साथे जिला विद्यालय निरीक्षिका, सारण-सह-सीवान एवं गोपालगंज के पद से 31-10-85 के सेवनिवृत्त हो गइनीं। शैलजा जी अपना घर-गृहस्ती आ नौकरी के साथे-साथे साहित्य-सेवा में भी सदा सक्रिय रहत रहनीं।  एकर प्रमाण ई बा कि सन् 1970 में उहाँ के पुरनका सारण जिला भोजपुरी साहित्य-सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष रहनीं त सन् 1972 में कानपुर भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में सचिव के पद पर चयनित भइनीं। सन् 1977 में उहाँ के अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के तिसरका अधिवेशन सीवान में स्वागत-समिति के संयुक्त सचिव के पद पर चयनित भइनीं। ऊहई उहाँ के अ. भा. भो. महिला साहित्य सम्मेलन 1977 के स्वागत मंत्री के पद के शोभा भी बढ़वनीं। सन् 1981 में तिसरका जिला महिला भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षता कइनीं।

शैलजा जी के साहित्य-सेवा के मद्दे नज़र उहाँ के सन् 1984 में साहित्य संचेतना द्वारा सम्मानित कइल गइल रहे। सन् 1990 में भोजपुरी निबन्ध संग्रह ‘चिन्तन कुसुम’ पर अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन द्वारा चित्रलेखा पुरस्कार से मरणोपरांत उहाँ के पुरस्कृत कइल गइल।

चिन्तन कुसुम (भोजपुरी निबन्ध संग्रह, 1981) के अलावा उहाँ के दू गो अउर प्रकाशित किताब लोकप्रिय भइल – कादम्बरी (वाणभट्ट के ‘कादम्बरी’ पर आधारित भोजपुरी में लिखल कथा, 2003) आ श्रद्धा-सुमन (भोजपुरी-हिन्दी-उर्दू कविता संकलन, 2016)।

गोरा रंग, मध्यम कद-काठी, सिन्दूर से भरल मांग, माथा पर बिंदी, कमर के नीचे तक लटकत एगो लम्बा चोटी या कभी जुड़ा बनवले, सिल्क या सूती साड़ी में सीधा पल्ला कइले शैलजा जी के देखते कोई सहज ही समझ सकत रहे कि उहाँ के सादगी के प्रतीक हईं।

शैलजा जी बचपन से ही प्रखर बुद्धि के रहनीं। उहाँ के मिडिल स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा में भी विशेषता के साथे उत्तीर्ण भइल रहनीं। पारिवारिक माहौल भी साहित्यिक रहे। बाकिर सीवान में ओह समय चूँकि लड़कियन के स्कूल ना रहे। एह से बुझाइल कि उहाँ के पढ़ाई में व्यवधान आ जाई। बाकिर अइसन भइल ना। काहेकि उहाँ के 1934 में डी.ए. वी. स्कूल सीवान में नाम लिखा गइल। शैलजा जी के कविता लिखे के क्षमता के एहसास पहिला बेर एही स्कूल में भइल। जब स्कूल में नशाखोरी के रोके खातिर कविता बनावे के छात्र-छात्रा से कहल गइल। शैलजा जी अपना ओही उमिर में जे कविता लिखनी ओकर बानगी देखीं-

ताड़ी दारू गाँजा भाँग पिअला के फल इहे, घरवा में खरची ना देहिया पर लुगवा

नाहीं जो तूँ मनब पिअल नाहीं छोड़ब त, उड़ि जइहें देह रूपी पिंजड़ा से सुगवा

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डॉ. ब्रजभूषण मिश्र

” भोजपुरी साहित्य के गौरव ” स्तम्भ में दिवंगत साहित्य सेवियन के संक्षिप्त परिचय के सिलसिला पीछला कई अंकन से जारी बा। अब तक निम्नलिखित 93 गो दिवंगत साहित्यकारन के संक्षिप्त परिचय रउरा पढ़ चुकल बानी। ओह 93 गो साहित्यकार लोगन के लिस्ट पढ़ीं आ फेर आगे बढ़ीं। – संपादक

अंक 11 में –    

1- महापंडित राहुल सांकृत्यायन

2- दूधनाथ उपाध्याय

3- महिन्दर मिसिर

4- रघुवीर नारायण

5- भिखारी ठाकुर

6- मनोरंजन प्रसाद सिंहभाग

7- महेन्द्र शास्त्री

8- दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह ‘ नाथ ‘

9- राम विचार पांडेय

10- डॉ. उदय नारायण तिवारी

11- धरीक्षण मिश्र

अंक 12 में

12-  प्रसिद्ध नारायण सिंह

13- रघुवंश नारायण सिंह

14- राम बचन द्विवेदी ‘ अरविंद ‘

15- डॉ. कमला प्रसाद मिश्र ‘ विप्र ‘

16 -शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी

17- हवलदार त्रिपाठी ‘ सहृदय’

18- डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय

19- विश्वनाथ प्रसाद ‘ शैदा’

20- पांडेय नर्मदेश्वर सहाय

21- कुलदीप नारायण राय ‘ झड़प’

22- पं. गणेश चौबे

अंक 13 में

23 – डॉ.स्वामी नाथ सिंह

24- राघव शरण मिश्र ‘ मुँहदूबर ‘

25- जगदीश ओझा ‘ सुन्दर ‘

26- रामनाथ पाठक ‘ प्रणयी ‘

27- मोती बी ए

28- महेश्वराचार्य

29- ईश्वर चंद्र सिन्हा

30- रामनाथ पांडेय

31- राधा मोहन राधेश

32- हरेन्द्रदेव नारायण

33- मास्टर अजीज

अंक 14 में

34- पांडेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह

35- बिसराम

36- भुवनेश्वर प्र. श्रीवास्तव ‘ भानु’

37- बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव ‘ ढीबरी लाल’

38- रुद्र काशिकेय / गुरु बनारसी

39- श्याम बिहारी तिवारी ‘ देहाती ‘

40- रामदेव द्विवेदी ‘अलमस्त ‘

41- राहगीर

42- दूधनाथ शर्मा  ‘ श्याम ‘

43-  दंडी स्वामी विमलानंद ‘ सरस्वती ‘

44- राम बचन लाल श्रीवास्तव

अंक 15 में – ( भोजपुरी जंक्शन – अंक 1 )

45- कुंज बिहारी  ‘ कुंजन ‘

46- प्रभुनाथ मिश्र

47- रामजियावन दास ‘ बावला ‘

48- सिपाही सिंह ‘ श्रीमंत ‘

49- डॉ. विवेकी  राय

50- भोला नाथ गहमरी

51- अविनाश चंद्र ‘ विद्यार्थी ’

52- प्रो. सतीश्वर सहाय वर्मा  ‘ सतीश ‘

53- डॉ. बसंत कुमार

54- अर्जुन सिंह ‘अशांत ‘

55- अनिरुद्ध

अंक 21 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 7 )

56- सन्त कुमार वर्मा

57- रमाकांत द्विवेदी ‘रमता

58- डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘ बेसुध ‘ उर्फ चतुरी चाचा

59-  पद्मश्री रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ उर्फ लोहा सिंह

60- प्राचार्य विश्वनाथ सिंह

61- पद्मभूषण विद्यानिवास मिश्र

62- डॉ. जितराम पाठक

अंक 22 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 8 )

63- रमेश चंद्र झा

64- गौरीशंकर मिश्र ‘ मुक्त ‘

65- प्राध्यापक अचल

66- पं. नर्मदेश्वर चतुर्वेदी

67- शारदानंद प्रसाद :

68- उमाकांत वर्मा

69- अक्षयवर दीक्षित

70- पांडेय कपिल

अंक 31 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 17 )

71- रामजी सिंह ‘ मुखिया ‘

72- विन्ध्याचल प्रसाद श्रीवास्तव

73- डॉ. अनिल कुमार राय ‘ आंजनेय ‘

74- डॉ. धीरेन्द्र बहादुर ‘ चाँद ‘

75- डॉ. विश्वरंजन

76- नरेन्द्र रस्तोगी ‘ मशरक ‘

77- नरेन्द्र शास्त्री

अंक 32 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 18 )

78- डॉ. रसिक बिहारी ओझा ‘ निर्भीक ‘

79- परमेश्वर दूबे शाहाबादी

80- राधा मोहन चौबे ‘ अंजन ‘

81- गणेश दत्त ‘ किरण ‘

82- डॉ. प्रभुनाथ सिंह

83- गिरिजा शंकर राय  ‘ गिरिजेश ‘

84- चंद्रशेखर मिश्र

85- पशुपति नाथ सिंह

अंक 40 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक  )

86- रामजी पांडेय अकेला
87- कैलाश गौतम

88- कुबेरनाथ मिश्र ‘ विचित्र ‘

89- प्रो. ब्रजकिशोर

90- जगन्नाथ

91- हरि शंकर वर्मा

92- डॉ० बच्चन पाठक सलिल
93- जमादार भाई

 

अब आगे पढ़ीं —

 94- बालेश्वर राम यादव

बालेश्वर राम यादव के जनम उ. प्र. के बलिया जिला के जगदेवाँ गाँव में 05 दिसम्बर, 1937 ई. के भइल रहे आ निधन 17 सितम्बर,1917 ई. के रायरंगपुर, उड़िसा में हो गइल। इहाँ के पिताजी के नाम शिव बालक यादव आ माता के नाम तेतरी देवी रहे। परिवार गोपालक रहे आ उहे विरासत में बालेश्वर जी का मिलल रहे। मगर रुचि पढ़ाई में रहे। बालेश्वर राम जी के पिता जमशेदपुर में खटाल चलावत रहीं आ दूध के कारोबार करत रहीं। मैट्रिक पास कइला के बाद आगे के पढ़ाई खातिर बालेश्वर राम जी जमशेदपुर चल अइनी। जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज से बी. ए. कइनी आ रॉची विश्वविद्यालय, रॉची से हिंदी में एम. ए. कइलीं। उहाँ का बी. एड. भी कइलीं। काव्यलोक, जमशेदपुर नाम के संस्था उहाँ के मानद ‘ विद्यालंकार’ के उपाधि देले रहे। पढ़ाई-लिखाई के बाद जमशेदपुर के अंगरेजी इसकूलन में हिन्दी शिक्षक रूप में कार्य कइनी। राउर विवाह उड़िसा के रायरंगपुर के आस पास रामदुलारी जी से भइल। ओकरा बाद सरकार का रायरंगपुर के ब्वायज हाई इसकूल में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गइल, जहाँ से 1995 ई. में सेवा निवृत्त भइनी। जहाँ तक साहित्यिक रुचि के सवाल बा, ऊ हाई इसकूल में पढ़त खानी रामचरित मानस पढ़ला आ गाँव में दस बेर ओकर पाठ करके सुनवला से जागल। अपने के आवाज़ अतना सुरीला रहे कि लोग मोहा जात रहे। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना आ गठन के पाछे राउर एही सुकंठ गायकी के कमाल रहे। को-ऑपरेटिव कॉलेज के कैम्पस में 1955 ई. में डॉ. बच्चन पाठक सलिल सहित अउर संहतिया लोग के बीचे बालेश्वरराम जी के आवाज़ गूँजत रहे – ‘मोरे पिछुअरवा सिरिसिया के गछिया, झहर-झहर करे पात कि निंदियो ना आवे हो राम ‘। ई आवाज़ कॉलेज के भोजपुरिया अध्यापक डॉ. सत्यदेव ओझा आ मेजर चंद्रभूषण सिन्हा के कान में पड़ल आ भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना भइल, जवना के महासचिव डॉ सलिल बनावल गइलीं आ बालेश्वर राम जी सचिव। भोजपुरी हिंदी में लिखल पढ़ल जारी रहल। भोजपुरी में तीन गो किताब छपल  —  ‘ भोजपुर के रतन ‘ ( गीत संग्रह, 1957 ई.),       ‘गाँव के माटी ‘ ( उपन्यास , 1973 ई. ) आ ‘ कृष्ण चरित पीयूष ‘ ( महाकाव्य , 2011ई. )।  पत्नी रामदुलारी यादव के अनुरोध पर ‘महाभागवत पुराण ‘ के कथा के भोजपुरी भाषा मे दोहा – चौपाई – सोरठा में छंदबद्ध करत ‘ कृष्णचरित पीयूष ‘ महाकाव्य रचाइल। हिंदी में  ‘ मेरी लाली ‘ (1997 ई. ) आध्यात्मिक गीत संग्रह बा। दू गो हिंदी पत्रिका- ‘ पुष्पांजलि ‘ आ ‘ तरंग ‘ रायरंगपुर से संपादित करत रहलीं। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद आ ललित कला मंच ( रायरंगपुर ) से सम्बद्ध रहलीं। भोजपुरी समाज, बिष्टुपुर, जमशेदपुर; जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद ; गुरुमंच, विद्यालय परिवार, रायरंगपुर आ ललित कला मंच, रायरंगपुर अपने के सम्मानित कइलस।

 

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आर.के. सिन्हा

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जा के बाद भयंकर हाहाकार मचल बा। उहाँ सरेआम कत्लेआम चालू बा। नतीजा, ज्यादातर स्थानीय अफगानी नागरिक भी कहीं अउर जाके बसे के चाह रहल बा। उनका अफगानिस्तान में अब अपना बीबी बच्चन के साथे एक मिनट भी रहल सही नइखे लागत। अफगानिस्तान से बहुत सारा हिन्दू-सिख समुदाय के लोग भारत आ रहल बा। उनका इहाँ पर सम्मान के साथ शरण भी मिल रहल बा। पर अफगानिस्तान के मुसलमानन के इस्लामिक देश अपना इहाँ शरण देवे खातिर आगे नइखे आवत। सब केहू ये लोग के अपना इहाँ शरण देवे या शरणार्थी के रूप में जगह देवे से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से मना कर देले बा। दुनिया के इस्लामिक देशन के अपना के नेता माने वाला पाकिस्तान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरत, तुर्की आ बहरीन जइसन देश या त चुप हो गइल ह या फिर ऊ लोग अपना अफगानिस्तान से लागे वाली सरहदन के ज्यादा मजबूती से घेर लेले बा। चौकसी बढ़ा दिहले बा ताकि कोई घुसपैठ ना कर सके। ले-दे के सिर्फ शिया बहुल ईरान ही ये अफगानियन खातिर आगे आइल बा। इहाँ पहिले से ही लगभग साढ़े तीस लाख सुन्नी अफगानी शरणार्थी रहेला। ईरान के तीन तरफ से सीमा अफगानिस्तान से मिलेला। शिया शासित ईरान के भारी संख्या में सुन्नी शरणार्थियन के शरण देहल वाकई काबिले तारीफ बाI

अफगानिस्तान संकट में धूर्त पड़ोसी पाकिस्तान के काला चेहरा खुल के सामने आ रहल बा। ऊ अपना अफगानिस्तान से लागल सरहदन पर सेना के तैनात कर देले बा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कह रहल बाड़े कि हमरा इहाँ त पहिलहीं से लाखन अफगानिस्तानी शरणार्थी बाड़ें। हम अब अउर ना लेम। त फेर पाकिस्तान अपना के सारी दुनिया के मुसलमानन के रहनुमा काहे मानता। अफगानिस्तान संकट के बहाने पाकिस्तान के दोहरा चरित्र के समझल आसान होई। पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के मुसलमानन के हक खातिर सारी दुनिया के मुसलमानन के आये दिन खुल के आह्वान करत रहेला। ऊ संयुक्त राष्ट्र से ले के तमाम अन्य मंचन पर भारत के घेरे के भी नाकाम कोशिश करेला। लेकिन पाकिस्तान ई त बताओ कि उ अफगानिस्तान के मुसलमानन के अपना इहाँ शरण काहे नइखे देत? का कुछ हजार मुसलमानन के अउर आ जाए से पाकिस्तान में भुखमरी के हालात पैदा हो जाई?

पाकिस्तान त बांग्लादेश में रहे वाला अपना बेसहारा उर्दू भाषी बिहारी मुसलमान नागरिकन के भी अपना इहाँ लेवे के तैयार नइखे जे 1971 के बांग्ला देश आजादी के लड़ाई में पाकिस्तानी सेना के खुल के साथ दिहले रहे आ अभी शरणार्थी कैंपन में आपन जिंदगी काट रहल बा। पाकिस्तान के मालूम बा कि सिर्फ ढाका में एक लाख से अधिक बिहारी मुसलमान शरणार्थी कैम्पन में नारकीय जिंदगी गुजार रहल बाड़ें। बिहारी मुसलमान 1947 में देश के बंटवारे के वक्त पाकिस्तान चल गइल रहलें। जब तक बांग्लादेश ना बनल रहे तब तक त इनका कवनों दिक्कत ना रहे। पर बांग्लादेश बनते बंगाली मुसलमान बिहारी मुसलमानन के आपन जानी दुश्मन माने लागल। वजह ई रहे कि बिहारी मुसलमान तब पाकिस्तान सेना के खुल के साथ देत रहे जब पाकिस्तानी फौज पूर्वी पाकिस्तान में बंगालियन के ऊपर कत्लेआम मचावत रहे। इयाद करीं कि बिहारी मुसलमान ना चाहत रहे कि पाकिस्तान कभी भी बंटे।

ई लोग 1971 में मुक्ति वाहिनी के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सेना के खुल के साथ देले रहे। तब से ही इनका के बांग्लादेश के आम लोगन द्वारा नफरत के निगाह से देखल जाला। ओइसे ई बांग्लादेश में अभी भी लाखन के संख्या में बाड़ें अउर नारकीय यातना सहे के मजबूर बाड़ें। ई लोग पाकिस्तान जाए के भी चाहेला। पर पाकिस्तान सरकार ये लोग के अपना देश में लेवे के कत्तई तैयार नइखे। जरा सोंची कि कवनों जब देश अपनही देशभक्त नागरिकन के लेवे से मना कर दे। ई घटियापन पाकिस्तान ही कर सकेला। चीन में प्रताड़ित कइल जा रहल मुसलमानन के दर्द भी ओकरा सुनाई नइखे देत।

जब भारत धारा 370 के खतम कइलस त तुर्की अउर मलेशिया भी पाकिस्तान के साथ सुर में सुर मिलाके बात करत रहे। ऊ लोग भारत के निंदा भी करत रहे। मलेशिया के तब के राष्ट्रपति महातिर मोहम्मद कहत रहले, हम ई देख के दुखी बानी कि जवन भारत अपना के सेक्युलर देश होखे के दावा करेला, ऊ कुछ मुसलमानन के नागरिकता छीने खातिर क़दम उठा रहल बा। अगर हम अपना देश में अइसन करीं, त हमरा पता नइखे कि का होई? हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री आ अस्थिरता होई आ हर कोई प्रभावित होई। महातिर एक तरह से अपना देश के लगभग 30 लाख भारतवंशियन के खुल के चेतावनी भी देत रहले। ई दुनू देश पाकिस्तान के कहला पर संयुक्त रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलत रहे। पर ई दुनू मुल्क भी अफगानियन के अपना इहाँ रखे खातिर तइयार नइखे। अब इनका इस्लामिक प्रेम के हवा निकल गइल।

दुनिया भर में फइलल 57 इस्लामिक देशन के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के ईरान के छोड़ शेष सदस्य अपना तरफ से अफगानिस्तान के शरणार्थियन के हक में मानवीय आधार पर सामने नइखे आवत। कुल मिला के अफगानिस्तान संकट ओआईसी के खोखलापन के भी उजागर कर देलेबा। ई लोग सिर्फ इजराईल आ भारत के खिलाफ ही बोले आ बयान देवे के जानेला। अगर रउआ करीब से इस्लामिक देशन के आपसी संबंध के देखेम त समझ में आ जाई कि ये सबके एकता दिखावा भर खातिर बा। इयाद करीं कि रोहिंग्या मुसलमानन के म्यांमार के सबसे करीबी पड़ोसी बांग्लादेश शरण देवे से साफ इंकार कर दिहलस। बांग्लादेश के एक मंत्री मोहम्मद शहरयार कहलन कि ई रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश के सुरक्षा खातिर गम्भीर खतरा बाड़ें। हमरा इहाँ पहिले भी कई घटना घट चुकल बा। इहे कारण बा कि हम उनका लेके सावधान बानीं।

रोहिंग्या मुसलमानन के जाने वाला बतावेलें कि ई रोहिंग्या जल्लाद से कम ना ह। ई म्यामांर में बौद्ध कन्या सबसे बलात्कार के बाद उनकर हत्या कर के उनका अतडिंयन के निकाल फेंके से भी गुरेज ना करे लोग। इनके कृत्य के इनका देश में पता चलल त म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमान के खदेड़ल जाये लागल रहे। एकरा बाद से इनके हाथ-पैर फूले लागल बा आ ई लोग बांग्लादेश आ भारत में शरण के भीख माँगे लागल। हालांकि इनका के कवनों इस्लामिक देश त सिर छिपावे के जगह ना देवे। पर भारत में इनका हक में तमाम सेक्युलरवादी सामने आवत रहल बा। एही से ही ई लोग भारत में कई राज्यन में घुस भी गइल बा। बहरहाल, बात होत रहलs ह इस्लामिक देशन के अफगान संकट के लेके बनल नीति के। अब कोई कम से कम ई मत कहे कि इस्लामिक देशन में आपस में बहुत प्रेम आ सौहार्द बा।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min1280

अक्टूबर-नवंबर के फेस्टिवल मन्थ यानी कि पूजा-पाठ के महीना कहल जाला। नवरात्र-दशहरा से दिवाली-छठ ले पूजे-पूजा। अनुष्ठाने-अनुष्ठान। एगो आध्यात्मिक माहौल। सवाल ई बा कि ई सब खाली पूजा के रस्म-अदायगी भर बा आ कि लोग बाग पर एकर असरो बा ?

कवनो दिया में कतनो तेल होखे, कतनो घीव होखे, उ बुताइल बा त ओकर महत्व नइखे। जरते दिया के मान बा। बुताइल दिया या त फेर से जरावल जाला या विसर्जन में चल जाला।

हमरा बुझाला कि पूजा-पाठ, प्रार्थना मन के दिया के जरावे खातिर होला। मन के शोधन खातिर होला। मन के रिचार्ज करे खातिर होला। कठिन से कठिन समय में भी सकारात्मक रहे खातिर होला, संभावना खोजे खातिर होला।

प्राण यमराज के हाथ में जाये ओकरा पहिले तक अपना हाथ में ठीक से रहे के चाहीं। ठीक से माने ठीक से। अपना नियंत्रण में। एही खातिर साधना कइल जाला। परमात्मा भा प्रकृति से जुड़ल जाला। अपना इहाँ के सब पूजा-पाठ आ तीज-त्योहार के वैज्ञानिक महत्व बा। ई सब अंततः स्वास्थ्य, शांति, सकून, शक्ति, साहस, समाधान, समृद्धि आ सद्भावना प्रदान करे खातिर बनल बा। ओकरा ऐतिहासिक महत्व के एगो अलग आयाम बा।

दशहरा आ नवरात्रि में राम गूँजत रहेलें। रामलीला चलत रहेला। खुद राम के लीला अपना आप में हर समस्या के समाधान समेटले बा। राम जेतना दुख, राम जेतना परीक्षा से के गुजरल बा? मंच भा टेलीविजन के रामलीला में दुख के ग्लैमराइज कइल गइल बा। लोग के ग्लैमराइज्ड दुख, विषाद भा लड़ाई देखे में मजा आवेला बाकिर जे ओकरा के भोगले बा, जे ओह में तपल बा, ओकरा से पूछीं। शायर साहिर लुधियानवी के एगो गीत के पंक्ति बा-

जो तार से निकली है वो धुन सब ने सुनी है

जो साज़ पे गुज़री है वो किस दिल को पता है

हिन्दी-उर्दू-भोजपुरी के शायर भाई साकेत रंजन प्रवीर के एगो शेर बा –

गम सुनावे में दम निकल जाला  

हं मगर मन तनी बहल जाला

गम, दुख, पीड़ा, कष्ट, तनाव जिंदगी के हिस्सा ह। ई सब ऊर्जा के क्षीण करेला। मन के बैटरी के डाउन करेला। हमरा समझ से पूजा-पाठ, योग-अनुष्ठान, ध्यान आदि मन के चार्ज करे खातिर होला ताकि कष्ट, बीमारी, दुख आदि होखबो करे त ओकर एहसास ना होखे भा कम होखे। बाहर में कतनों हलचल होखे, अंदर (मन) शांत होखे। इहे साधना ह। साध लेला पर ई संगीत जइसन लागेला।

मनोज भावुक के एगो शेर बा –

दुखो में ढूंढ ल ना राह भावुक सुख से जीये के

दरद जब राग बन जाला त जिनगी गीत लागेला

आ साँच पूछीं त जिनगी गीते ह, बस एकरा के राग आ लय में रखे के पड़ी। समय, परिस्थिति आ कुछ राक्षसी प्रवृति के लोग रउरा के बेलय करे के कोशिश करी बाकिर साधना इहे ह कि बाहरी परिस्थिति के असर अंदर ना पड़े। मुश्किल समय भी संभावना बन जाय। दरअसल हर समस्या में एगो संभावना छुपल रहेला, बस सकारात्मक नजरिया के बात बा।

एक बार, जहां एक आदमी बेरोजगारी के रोना रोअत रहे, उहें दुसरका बेरोजगार आदमी कहलस- “ हमनी के सौभाग्यशाली बानी जा कि बेरोजगार बानी जा। बेरोजगार आदमी के पास असीम संभावना बा। उ कुछओ कर सकेला। कुछओ बन सकेला। काहे कि उ कवनो खूँटा से नइखे बंधल। बंधन मुक्त बा। जे  डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस बन गइल बा या कवनो खास प्रोफेशन से बंध गइल बा, उ बंध गइल बा। हमनी कहीं से, कुछुओ से बंधल नइखीं त हमनी खातिर आकाश खुला बा। पूरा आकाश आपन बा। कहीं उड़ सकत बानी जा। “

कहे के मतलब कि हर परिस्थिति में सकारात्मक नजरिया रखल जा सकेला। हर जगह संभावना बा। दुख, निराशा आ परेशानी जइसन कवनो चीज हइये नइखे। आत्मा के असली प्रकृति उल्लास ह। देह आ मन त बाहरी चीज ह। अध्यात्म सोच के इहाँ तक पहुंचा देला। एह साँच तक पहुँचा देला। इहाँ तक पहुंचे में पूजा-प्रार्थना, योग, ध्यान, स्वाध्याय, उपवास, व्रत आदि मदद करेला। एह सब से आत्मा के रिचार्ज करीं।

दशहरा, नवमी, दियरी-बाती आ छठ के शुभकामना के साथ

प्रणाम

मनोज भावुक



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