Screenshot-16.png

Hum BhojpuriaOctober 22, 20213min240

डॉ. ब्रजभूषण मिश्र

” भोजपुरी साहित्य के गौरव ” स्तम्भ में दिवंगत साहित्य सेवियन के संक्षिप्त परिचय के सिलसिला पीछला कई अंकन से जारी बा। अब तक निम्नलिखित 93 गो दिवंगत साहित्यकारन के संक्षिप्त परिचय रउरा पढ़ चुकल बानी। ओह 93 गो साहित्यकार लोगन के लिस्ट पढ़ीं आ फेर आगे बढ़ीं। – संपादक

अंक 11 में –    

1- महापंडित राहुल सांकृत्यायन

2- दूधनाथ उपाध्याय

3- महिन्दर मिसिर

4- रघुवीर नारायण

5- भिखारी ठाकुर

6- मनोरंजन प्रसाद सिंहभाग

7- महेन्द्र शास्त्री

8- दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह ‘ नाथ ‘

9- राम विचार पांडेय

10- डॉ. उदय नारायण तिवारी

11- धरीक्षण मिश्र

 

 

 

अंक 12 में

 

12-  प्रसिद्ध नारायण सिंह

13- रघुवंश नारायण सिंह

14- राम बचन द्विवेदी ‘ अरविंद ‘

15- डॉ. कमला प्रसाद मिश्र ‘ विप्र ‘

16 -शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी

17- हवलदार त्रिपाठी ‘ सहृदय’

18- डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय

19- विश्वनाथ प्रसाद ‘ शैदा’

20- पांडेय नर्मदेश्वर सहाय

21- कुलदीप नारायण राय ‘ झड़प’

22- पं. गणेश चौबे

 

अंक 13 में

23 – डॉ.स्वामी नाथ सिंह

24- राघव शरण मिश्र ‘ मुँहदूबर ‘

25- जगदीश ओझा ‘ सुन्दर ‘

26- रामनाथ पाठक ‘ प्रणयी ‘

27- मोती बी ए

28- महेश्वराचार्य

29- ईश्वर चंद्र सिन्हा

30- रामनाथ पांडेय

31- राधा मोहन राधेश

32- हरेन्द्रदेव नारायण

33- मास्टर अजीज

 

अंक 14 में

34- पांडेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह

35- बिसराम

36- भुवनेश्वर प्र. श्रीवास्तव ‘ भानु’

37- बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव ‘ ढीबरी लाल’

38- रुद्र काशिकेय / गुरु बनारसी

39- श्याम बिहारी तिवारी ‘ देहाती ‘

40- रामदेव द्विवेदी ‘अलमस्त ‘

41- राहगीर

42- दूधनाथ शर्मा  ‘ श्याम ‘

43-  दंडी स्वामी विमलानंद ‘ सरस्वती ‘

44- राम बचन लाल श्रीवास्तव

 

 

 

 

 

अंक 15 में – ( भोजपुरी जंक्शन – अंक 1 )

45- कुंज बिहारी  ‘ कुंजन ‘

46- प्रभुनाथ मिश्र

47- रामजियावन दास ‘ बावला ‘

48- सिपाही सिंह ‘ श्रीमंत ‘

49- डॉ. विवेकी  राय

50- भोला नाथ गहमरी

51- अविनाश चंद्र ‘ विद्यार्थी ’

52- प्रो. सतीश्वर सहाय वर्मा  ‘ सतीश ‘

53- डॉ. बसंत कुमार

54- अर्जुन सिंह ‘अशांत ‘

55- अनिरुद्ध

अंक 21 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 7 )

56- सन्त कुमार वर्मा

57- रमाकांत द्विवेदी ‘रमता

58- डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘ बेसुध ‘ उर्फ चतुरी चाचा

59-  पद्मश्री रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ उर्फ लोहा सिंह

60- प्राचार्य विश्वनाथ सिंह

61- पद्मभूषण विद्यानिवास मिश्र

62- डॉ. जितराम पाठक

 

 

अंक 22 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 8 )

63- रमेश चंद्र झा

64- गौरीशंकर मिश्र ‘ मुक्त ‘

65- प्राध्यापक अचल

66- पं. नर्मदेश्वर चतुर्वेदी

67- शारदानंद प्रसाद :

68- उमाकांत वर्मा

69- अक्षयवर दीक्षित

70- पांडेय कपिल

अंक 31 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 17 )

71- रामजी सिंह ‘ मुखिया ‘

72- विन्ध्याचल प्रसाद श्रीवास्तव

73- डॉ. अनिल कुमार राय ‘ आंजनेय ‘

74- डॉ. धीरेन्द्र बहादुर ‘ चाँद ‘

75- डॉ. विश्वरंजन

76- नरेन्द्र रस्तोगी ‘ मशरक ‘

77- नरेन्द्र शास्त्री

 

 

अंक 32 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 18 )

78- डॉ. रसिक बिहारी ओझा ‘ निर्भीक ‘

79- परमेश्वर दूबे शाहाबादी

80- राधा मोहन चौबे ‘ अंजन ‘

81- गणेश दत्त ‘ किरण ‘

82- डॉ. प्रभुनाथ सिंह

83- गिरिजा शंकर राय  ‘ गिरिजेश ‘

84- चंद्रशेखर मिश्र

85- पशुपति नाथ सिंह

 

अंक 40 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक  )

86- रामजी पांडेय अकेला
87- कैलाश गौतम

88- कुबेरनाथ मिश्र ‘ विचित्र ‘

89- प्रो. ब्रजकिशोर

90- जगन्नाथ

91- हरि शंकर वर्मा

92- डॉ० बच्चन पाठक सलिल

93- जमादार भाई

 

अब आगे पढ़ीं —

 

 94- बालेश्वर राम यादव

बालेश्वर राम यादव के जनम उ. प्र. के बलिया जिला के जगदेवाँ गाँव में 05 दिसम्बर, 1937 ई. के भइल रहे आ निधन 17 सितम्बर,1917 ई. के रायरंगपुर, उड़िसा में हो गइल। इहाँ के पिताजी के नाम शिव बालक यादव आ माता के नाम तेतरी देवी रहे। परिवार गोपालक रहे आ उहे विरासत में बालेश्वर जी का मिलल रहे। मगर रुचि पढ़ाई में रहे। बालेश्वर राम जी के पिता जमशेदपुर में खटाल चलावत रहीं आ दूध के कारोबार करत रहीं। मैट्रिक पास कइला के बाद आगे के पढ़ाई खातिर बालेश्वर राम जी जमशेदपुर चल अइनी। जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज से बी. ए. कइनी आ रॉची विश्वविद्यालय, रॉची से हिंदी में एम. ए. कइलीं। उहाँ का बी. एड. भी कइलीं। काव्यलोक, जमशेदपुर नाम के संस्था उहाँ के मानद ‘ विद्यालंकार’ के उपाधि देले रहे। पढ़ाई-लिखाई के बाद जमशेदपुर के अंगरेजी इसकूलन में हिन्दी शिक्षक रूप में कार्य कइनी। राउर विवाह उड़िसा के रायरंगपुर के आस पास रामदुलारी जी से भइल। ओकरा बाद सरकार का रायरंगपुर के ब्वायज हाई इसकूल में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गइल, जहाँ से 1995 ई. में सेवा निवृत्त भइनी। जहाँ तक साहित्यिक रुचि के सवाल बा, ऊ हाई इसकूल में पढ़त खानी रामचरित मानस पढ़ला आ गाँव में दस बेर ओकर पाठ करके सुनवला से जागल। अपने के आवाज़ अतना सुरीला रहे कि लोग मोहा जात रहे। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना आ गठन के पाछे राउर एही सुकंठ गायकी के कमाल रहे। को-ऑपरेटिव कॉलेज के कैम्पस में 1955 ई. में डॉ. बच्चन पाठक सलिल सहित अउर संहतिया लोग के बीचे बालेश्वरराम जी के आवाज़ गूँजत रहे – ‘मोरे पिछुअरवा सिरिसिया के गछिया, झहर-झहर करे पात कि निंदियो ना आवे हो राम ‘। ई आवाज़ कॉलेज के भोजपुरिया अध्यापक डॉ. सत्यदेव ओझा आ मेजर चंद्रभूषण सिन्हा के कान में पड़ल आ भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना भइल, जवना के महासचिव डॉ सलिल बनावल गइलीं आ बालेश्वर राम जी सचिव। भोजपुरी हिंदी में लिखल पढ़ल जारी रहल। भोजपुरी में तीन गो किताब छपल  —  ‘ भोजपुर के रतन ‘ ( गीत संग्रह, 1957 ई.),       ‘गाँव के माटी ‘ ( उपन्यास , 1973 ई. ) आ ‘ कृष्ण चरित पीयूष ‘ ( महाकाव्य , 2011ई. )।  पत्नी रामदुलारी यादव के अनुरोध पर ‘महाभागवत पुराण ‘ के कथा के भोजपुरी भाषा मे दोहा – चौपाई – सोरठा में छंदबद्ध करत ‘ कृष्णचरित पीयूष ‘ महाकाव्य रचाइल। हिंदी में  ‘ मेरी लाली ‘ (1997 ई. ) आध्यात्मिक गीत संग्रह बा। दू गो हिंदी पत्रिका- ‘ पुष्पांजलि ‘ आ ‘ तरंग ‘ रायरंगपुर से संपादित करत रहलीं। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद आ ललित कला मंच ( रायरंगपुर ) से सम्बद्ध रहलीं। भोजपुरी समाज, बिष्टुपुर, जमशेदपुर; जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद ; गुरुमंच, विद्यालय परिवार, रायरंगपुर आ ललित कला मंच, रायरंगपुर अपने के सम्मानित कइलस।

 

READ MORE: http://humbhojpuria.com/e-patrika/1-15-october-2/


img105.jpg

Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min460

 

अतुल कुमार राय

बात पिछला साल के ह। पश्चिम टोला के शशांकवा के बियाह मार्च में तय भइल। तब तक ना जाने कहाँ से ई माटीलगना कोरोना आ गइल। पंडित जी लइका-लइकी के बाप से कहनी कि जजमान,ढेर मत सोचीं। लइका-लइकी के देह से जून में एगो साइत बनत बा,कहीं त रख दी ?

लइका के बाबूजी कहनी कि ए समधी जी जवन डेट बा,तवन बटले बा।रउरा ढेर मत सोची… बियाह तय करीं..ले आवs हो कागज पर हल्दी छूआवs”

लेकिन ई का ?….लइका कइलस बवाल!

जून के गर्मी सोच के ओकर मिज़ाज उखड़ गइल। कहलस कि ना बाबूजी,जून में त एकदम बियाह ना होई। हम तनी और बरदाश के दवाई खा लेब लेकिन बियाह हमार जाड़ा में होई।

उ का बात बा कि जाड़ा में काफी आराम रहेला…!

बाऊजी कहलन, ” रे बउचट तू जवन मेहरी के मुँह देख के आराम सोचत बाड़े,तवन सोच-सोच के हमार चानी के सगरो बार पाक गइल। बियाह के एक-डेढ़ साल बाद जाड़ा-गर्मी और बरसात सब एक्के लेखा लागेला रे बबुआ। बात मान जो, अपना मन के बेसी होशियार ना बनल जाला…”

लइका कहलस कि ना बाबूजी मेहरारु के बड़ा मन बा गोवा में हनीमून मनावे के। जाड़ा में ही सही रही।

खैर,लइका-लइकी के बाबूजी मान गइल लो।

नवम्बर 2020 में शादी के दिन रखा गइल।

तबसे लइका अँकवारी में तकिया लेके उंगली पर महीना गिनत सुते लागल…!रात-रात भर सगरी दू जीबी डाटा वीडियो कॉल में जियान होखे लागल।

एने नवंबर कहे कि हम अइबे ना करब। लइका कहे कि ए करेजा अब सगरी फीलिंग फफाता ! मंदिर पर जवन भजन सुनतानी, उहो डीजे लेखा लागत बा। चार किलोमीटर दूर कहीं बैंड बाजा बाजता त अइसन बुझाता कि हमरा बियाहे में बाजता।

लइकी बैंगलोर में नौकरी करत रहे..धीरे से कहलस कि प्लीज स्टॉप..लेट्स टॉक सम स्प्रिचुअल थिंग्स..अदरवाइज आई नॉट विल एबल टू स्लीप!

लइका मेहरारु के बात मान लिहलस और एगो आध्यात्मिक प्रश्न पूछलस, “ए करेजा हमरा ख़ातिर तू करवा चौथ के बरत रहबू, हम तहरा ख़ातिर का भूखब हो ?”

मेहरारु कहलस कि कुछ नहीं टाइम से बर्तन धो देना वही मेरे लिये सबसे बड़ा व्रत है।”

खैर, इहे कुल बतियावत सितंबर आ गइल। अब लइका के दू जीबी डाटा रात के बदले दुपहरिया में ख़तम होखे लागल…!

अक्टूबर बीतल और नवम्बर आइल त भइल दुर्घटना।

पता चलल कि होखे वाली मेहरारु के बड़का बाबा के देहान्त हो गइल.. अब का होइ हो शशांक, तब बियाह ना होई…?

साइत बढ़िया नइखे.. अब मई 2021 में होई।

आही दादा!  मई सुनते लइका के ऑक्सीजन लेवल 70 से नीचें जाए लागल। मेहरारु से कहलस कि बतावs ना हो सगरी गोवा के ख़्वाब माटी में मिल गइल..अब का होई ? तहरो बाबा के हमार बियहवे के समय डेट मिलल ह..?

मेहरारु फेर समझदारी देखवलस, “जैसे छह महीने बर्दास्त किया…छह महीने और सही.. खूबसूरत चीजें थोड़ी मेहनत के बाद मिलें तो और प्रसन्नता होती है, लेट्स एंज्वाय दिस टाइम! ”

आही हो दादा ! अब का एंज्वाय करीं हो…

मेहरारू के ई बात लइका के करेजा में पत्थर लेखा लागे लागल..

लेकिन अभी-अभी ताजा जानकारी तक!

पिछला 12 मई के लइका के बियाह रहल ह.. !

बियाह बड़ा बढ़िया से भइल बा.. लेकिन दुःख के बात बा कि बियाह बाद लइका पाजीटिव होके क्वारंटाइन हो गइल बा।

आगे के सगरी कार्यक्रम पर ब्रेक लागल बा। ककन भी नइखे छूटल!

अब लइका जल्दी से निगेटिव होखे ख़ातिर दिन भर में तेरह हाली काढ़ा पियत बा। आतना जोगासन कर देले बा कि रामदेव बाबा ओकरा आगे हाथ जोड़ देले बाड़े कि कहीं पतंजलि मुनि प्रगट ना हो जास !

ओने मेहरारु आजुओ वीडियो कॉल पर बतियाके दिलासा देतिया.. ” आएंगे अच्छे दिन, जरूर आएंगे…!

लेकिन लइका का करो ? घर में जस-जस पायल और चूड़ी के छन-छन आवाज सूनाता, तस-तस ओकरा करेजा के नस में छन-छन करत बा…!

चौदह दिन, चौदह बरिश के बनवास लेखा बीत रहल बा।

मेहरारु कहत बिया कि इससे तो अच्छा था कि मैं भी पाजीटिव हो जाती…

लइका के ना कुछ कहले कहाता, न रहले रहाता।

लेकिन लइका के बाउजी रोज खिड़की पर से पूछत बाड़े..!

“काहो इंजीनियर साहेब, कहत रहनी न कि बड़-जेठ के बात मानल जाला..अब ना जइबा गोवा..ना मनइबा हनीमून.. ?

लइका का करो… उदास बा.. और मने मन कहता.

जो रे कोरोना तोर माटी लागो.. !


img194.jpg

Hum BhojpuriaOctober 22, 20216min520

डा. स्वर्ण लता

भोजपुरी बालगीत विविधता  से भरल बा बाकिर भोजपुरी साहित्य के इतिहास में एह विषय पर चरचा खोजलो पर ना मिलेला। लोक साहित्य में बालगीत एकल गीत आ समूह गीत दुनो रूप में मिलेला। मुख्य रूप से बालगीत मनोरंजन के साधन हऽ। भोजपुरी बालगीत में खेल खेलवना, खेलवनिया पर गीत प्रचुर मात्रा में पावल जाला। चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह भोजपुरी बाल गीतन के आठ भाग में बॅटले बानी ओकरा में खेलावे के गीत-खेलवना एगो प्रमुख भाग बा। खेल गीत खेलत खा बालक/बालिका/ किशोर/ किशोरी के द्वारा गावल जाला बाकिर खेलवना फुसलवना, अझुरवना गीत परिवार के बड़-बुजूर्ग सदस्य आ नजदीकी रिश्तेदार द्वारा गावल जाला। खेल गीत बालक बालिका, किशोरी/किशोर, के होला तब खेलवना, फुसलवाना, बझवना, अझुरवना गीत बालक, बालिका, किशोर, किशोरी खातिर होला। मतलब कि बालक के पारिवारिक बड़-बुजूर्ग आ रिश्तेदार द्वारा जवना गीतियन के सस्वर लय-ताल मे, कोमल से कोमल आ सुमघुर आवाज में गावल जाला ओही पारंपरिक गीतियन के खोज के, अध्ययन करि के एहिजा राखल गइल बा। पारंपरिक बाल गीत प्राकृतिक नदी के धारा अस होले जवन कवनो घेरा के ना माने आ एक कियारी से दोसर तीसर कियारी में, एक ताल तलइया से दोसर-तीसर ताल तिलइया में मांकत रहेले स। एह गीतियन के गावत, खेलावत, फुसुलावत, अझुरावत, बझावत बडो़-बुजूर्ग के व्यायाम हो जाला। एह भाग के गीतियन के सुने खातिर लइका-लइकी बड़ बुजूर्ग के घेरले रहेलन सं। एह से बूढ़ो-बूढी के मनसायन रहेला, घर में शांति रहेला। पढ़े आ सीखे खातिर बइठे के आदत लइकन/लइकिन में  स्वाभाविक रूप से पनपेला। बड़-बुजूर्ग के छोट-मोट टहल-टिकोरो हो जाला। बड़-बुजूर्ग के आ रिश्तेदार के अनुभव/ज्ञान के लाभ अगिला पीढी में स्थानातंरित होत रहेला। एह गीतियन से जवन अनुभव/सीख मिलेला उ भावी जिनगी में  काम के साबित होला। बालक/बालिका के ज्ञान क्षितिज के विस्तार बिना अतिरिक्त मेहनत, समय के स्वाभविक रूप  से हो जाला। जवन भावी जिंदगी के सफर में आइल समस्यन के हल करे  में मददगार साबित होला। ओह में से कुछ बाल गीतन के नीचे देल जा रहल बा।

  1. अंतर मंतर घोघा साड़ी।

कोठी तर पितिआइन बाड़ी।।

से दुख देले बाड़ी।

से दुख लेले जास।। 

एह गीत के चोट लगला पर रोवत लइका चुप करावे खातिर गावल जाला। भोजपुरी क्षेत्र में लोग भूत-प्रेत डायन ओझा पर विश्वास करेलन। हालाकि ई आदमी युगीन लोक आस्था ह बाकिर एह वैज्ञानिक उपलब्धियनो के युग में नेस्त-नाबुत नइखे भइल। कहल जाला कि गोतिया आ दाल गलावे कि चीज ह। पितिआइन सामने से ना छिप के वार कइले बाड़ी। उन्हुंकरे मंतर मरला से चोट लागल बा। जे दोसरा के राह में कांटा बोवेला ओकरो राह कंटकित हो जाला। ए बाबू तू चूप हो जा। रोवला से कुछ ना होई। तू देख लिहs तहार पितिआइन खुद एक दिन चोटिल हो जइहें। छू  कहत मतारी चोटिल जगह पर मुंह से फूंक मार देली। यानि विश्वास धरावेला कि ऊ डायन हई तऽ हमहूं ओझाई के मंतर जानिला। झार देनी, उन्हूंकर मंतर खा गइनी।

बहुत महीनी से बालमन में सीख भरल गइल बा कि दोसरा के बेमतलब ना तंग करे के चाहीं ना तऽ दुख देबहूँ वाला के एक ना एक दिन दुखित होखे के पड़ेला। दुख में विचलित ना होखे के चाहीं। महात्मा बुद्व कहले बाड़न कि संसार में दुख बा तऽ दुख दूरो करे के साधन बा। दुख देवेवाला बा तऽ दुख दूरो करे वाला बा।

  1. अरर बरर के पतवा,

बिलइया चाटे पतवा,

चाटत चाटत बिलइया,

गइल पिछुअरिया

कुकुरा धरलेलस,

भर अंकवरिया,

छोड़ छोड़ कुकुरा

अब ना आइब

तोरा पिछुअरिया।।

एह गीत में एगो बिलाई बिया जवन दोसरा के हकमारी कर के ओकर खाद्य पदार्थ लेके राजा के पिछुआरी में भाग के जाके खाए लागल। ऊ समझत रहे कि राजा के पिछुआरी में केहू ना आई। बाकिर पिछुआरी में खटका भइला पर राजा अपना कुकुर के लिलकार देलन आ ऊ धरि के बिलार राम के भभोरे लागल। बिलाई कान धरि के उठ बइठ करे लगली कि माफ कर दऽ अब से हम इहंवा कबो ना आइब।

एह गीत में सीख भरल बा कि केहू गलत काम कतनो सुरक्षित जगह पर छिप के करी ऊ सजाय से बांच ना सके। आदमी सामाजिक प्राणी हऽ ओकरा दोसरा के हक ना हथवसे के चाहीं। समरस समाज के निर्माण बदे आगे चलके बालक/ बालिका काम करे, इहे कामना गीतकार के मन में होई-गीत के रचना करत खा।

  1. आगे मइया कलावती।

सिर पर देबो पउती।

गंगा पार बियाह देबो।

आवे के ना जाए के।

टुसुर टुसुर रोव के।।

कवनो रोवत लइकी के समझावल गइल बा एह गीत में कि चोट लागल बा तऽ ठीक हो जाई। साथ साथ धमकावल जात बा कि चुप हो जा ना तऽ रोवले चाहत बाडू तब दूर देश में माथा पर थोड़ा सा सामान देके बियाह करिके भेज देब जहंवा से आ ना सकबू आ जिंदगी भर बइठ के रोवत रहबू। बालमन में सीख भरल गइल बा एह गीत में कि रोवत रहे से समस्या के हल ना होई आ समय बर्बाद होई यानि समय बेसकीमती होला ओकरा के बर्बाद ना करे के चाहीं।

  1. आव रे खेदन चिरइया

    गुलगुल अंडा पार

तोहरा अंडा मे आग लागो

  बाबू के खेलाव।।

  1. आव रे गइया अगरी,

दूधवा दे भर गगरी,

बबुआ पीही भर गगरी।।

दूध पिआवत खा लइका / लइकी छेरिआ जालिस। दूध पीअल ना चाहेलीस तब उपरांकित गीत गा गा के गीत में फुसला-फुसला के लइका / लइकी के दूध पियावल जाला। दूध पिआवे वाला जानत बा कि पीआवत खा जोर जबरदस्ती ना करे के चाहीं नाही तऽ पाचन क्रिया गड़बड़ा जाई। एही से अपना गीत में अझुरा के दूध पिआवे ला। बालक / बालिका के सुंदर शरीर के कामना मतारी-बाप के, भाई-बहिन के मन में रहेला।

  1. आहा जी आहा, दू गोड़ दू बांहा,

पीठ पर पोंछ नाचे, ई तमासा कहां ?

छोट लइका / लइकी के खेलवनिया दूनो हाथ से उछाल उछाल लोकि-लोकि के गावेला। ऊ चाहेला कि अइसन बेला में बालक / बालिका के मन बाझ के बहल जाय। बालक/बालिका के हंसला पर खेलवनिया के आनंद के शब्दन मे व्यक्त ना कइल जा सके। ऊ हनुमान अस बलिष्ट शरीर के ध्यान दिला के ओकरा के शक्तिमान बनावे के कामना करेला।

  1. ए बबुआ। तू कथी के?

खने सोना, खने रूपा के ।

बाबू चउवा चनन के,

पितिया पीताम्बर के,

मातारी हऽ लवंग के,

लोग बिराना माटी के ?

………………………?

  1.  ए बाबू तोहार बाबा कइसन?

कुर्सी ऊपर राजा अइसन।

ए बाबू तोर इया कइसन

मचिया बइठन रानी अइसन।

ए बाबू तोहार बाबू कइसन ?

कुर्सी बइठल कलक्टर जइसन।

ए बाबू तोर फुआ कइसन।

बेग लटकवले मेम जइसन। 

ए बाबू तोर माई कइसन?

घर घर घूमत बिलाई जइसन।

इहे गीत जब माई आ चाची गावेली तब फुआ के जगह पर  चाची  आ माई के जगहो पर फुआ गावेली। छने छने छेरिआत लइका के कांहा पर पार के फुआ खेलावेली आ गा गा के बझावे के प्रयास करेली। एह गीत मे कुल खानदान के मान मर्यादा  के ओर ध्यान लगावल जाला। एकरा प्रति हमेशा चौकस चेतना बालमन, अचेतन, में भरल जाला। बाबा घर के सर्वोच्च स्थान पर होले। जीवनानुभव से पाकल। सर्वशक्तिमान घर-परिवार के मालिक एही से उन्हूंका के राजा कहल गइल बा। अइसने राजा के पत्नी रानी बन के पूजन जाली। संपूर्ण व्यवस्था के कर्ता पिता परिवार में जिलाधीश के हैसियत वाला होला। जेकर भाई कलक्टर होई ओकर बहिन सान से अकड़ के मेम अस चलबे करी। बबुआ के फुआ माई के ननद भइली, ननद भउजाई में हंसी-मजाक बराबर से चलत आइल बा। इहां पर गीत में हास्य में पुट देल गइल बा। एही के तहत बबुआ के माई के घर घर घुमत बिलाई कहल गइल बा। एक तरह से गीत में बेमतलब ना घूमे के हिदायत दिहल गइल बा। जवन जीवन में सीख के अनमोल भीख दे रहल बा।

गीत सं 7 के देखल जाय। बबुआ के तनी भर ओठ बिजकावते मातारी के करेज करकरा के फाटे लागेला। ऊ कांही पर पार के गीत गावे लागेली। स्नेह के उतुंग चोटी पर पहुंच के देह गेह के सुधि हेरा जाला। मातारी बदे सबसे सुंदर बबुआ होले आ बबुआ खातिर मतारी। उत्तम रूपक पल पल पर बिटोरत-छिटांत रहेला। गीत में बाबू चउआ चनन के कही के निर्माता के प्रति अगाध स्नेह आ आदर के भाव उकेरल गइल बा। पितिया यानि चाचा के पीतांबर  कहल गइल बा। पीताम्बर भगवान विष्णु/ कषण के पहिरन हऽ। पावन चंदन चर्चित बेदी पर पीताम्बर धारण करिके बइठले पर दूनों के मान मर्यादा बढेला। बाप-चाचा में अभेद भाव राखे के, भाईचारा राखे के परोक्ष रूप से बतावल गइल बा। साथे साथे चेतावल गइल बा कि अपना बाप-पितिया अस मिल-जूल के रहब तबे जीवन में सफल होईब। एह से हमेश ख्याल रही कि तू का हवऽ।

  1. कांची कुची कउआ खाय।

घी के लोंदा बबुआ खाय।।

बबुआ/बबुनी के तेल लगा के आंख मुंह पोछत गीत के गा-गा के बझावल जाला। एह गीत में कहल गइल बा कि काम निकाले खातिर ठकुरसुहाती बोलल अनुचित ना हऽ। तेल लगावे वाला/वाली के बबुआ/बबुनी के गीत में अझुरा के स्थिर राखलो मकसद रहेला ताकि आंख-कान खोदाय मत।

  1. चमन अइसन चुमन अइसन।

महना जुआठ अइसन। 

तेलिया के झंवड़ा दुबरा। 

                       हमार बाबू कुमना।।

तेल लगावत खा ई गीत गा-गा के बाबू के स्थिर राखे के कामना राखल जाला।

  1. काहे तू रोवलिस बुची रे ?

पाएंट ला कि टोपी ला ?

  1. गलर गलर पुआ पाकेला।

चिलरा खोईछा नाचेला।।

जो रे चिलरा खेत खरिहान।

लेके अइहे कनकजीर धान ।।

ओही धान के चुरा कुटइबो। 

बाभन-बिसुन भोजन करइबो।।

बभना के पूत दिही असीस। 

जीय बबुआ लाख बरीस।।

13 घुघुआ घुघेली, आतम चउरा ढेरी।

पत्ता उडिआइल जाय, बिलइया खदेड़ले जाय। 

चल लइके दानापुर, दानापुर में का बा ?

लाल लाल सिपहिया बा, दूनो कान कटावल बा,

  परती में बेलावल बा। परती में सुगवा,

बिनेला खटोलवा, ओह पर सूते मामा-मामी,

बीच में बालकवा।

ए……….बहू हंडिया-पतुकी सहरले रहिहऽ

  बबुआ जात बा भड़ाक

मामा के छंवड़ा रोवत बा। 

केरा दूगो जोहत बा।

रोवे दे खकचोदा के 

नाचे दे पंवरिया के,

देखे दे महाजन के। 

  1. घुघुआ माना, उपजे धाना।।

बाबू के छेदा दे नाक दूनो काना।।

भा

घुघुआ माना, उपजे धाना,

अइहें बचिया के मामा

छेदा दिहें काना

पेन्हा दिहें बाला

नया भीत गिरेले, पुराना भीत उठेले,

सम्हरिहे बुढिया, छिपा लोटा।

भा

घुघुआ माना उपजे धाना,

धनि धनि अइले बबुआ के मामा,

 बबुआ के नाक कान-कान दूनो छेदवले,

सोनरा के देले भर सूप धाना

सोनरा के पूतवा देला असीस

बबुआ जीए लाख बरीस। 

   अथवा

घुघुआ माना मनेर से, अरवा चावल डेढ सेर

बबुआ खाई दूध भतवा, बिलइया चाटी पतवा

पत्ता उडिया गइल, बिलाइया लजा गइल।।

बालक/बालिका के हाथ-पांव तनिक दीढ़ हो जाला। ऊ बइठे लागेला।

ओकर गर्दन-मुंडी दीढ़ हो जाले तब खेलवनिया चीताने सूत के अपना दूनो गोड़वन के पेट-छाती पर मोड़ के ओकरे पर बालक के बइठा के ओकर दूनो हाथ अपना हथवन से धरि के उपरांकित घुघुआ-गीतियन के गा के खेलावेला।

राम आ कृष्णा के माई अपना शाही सामर्थ के बल पर अपना पूत के सोना के पलना पर झुलावत होइहें बाकिर भोजपुरिया खेलवनिया के पांवे पलना बनि गइल बा। एही पांव पलना पर जीवन के शास्वत संगीत गा के अपना पूत के मन-प्राण में जीवन के सार तत्व बइठावत बाड़ी। एह गीत में ई बतावल गइल बा कि आदमी के विवेक हर दम जागल रहे के चाहीं। उड़िआत पतई के पाछा-पाछा धावल आ दोसरा के जूठ पतल चाटल नीच कर्म हऽ। जातो जाला आ  भातो ना भेंटाय। नया भीत गिरेले, पुराना भीत उठेले में महात्मा कबीर के उल्टवांसी के शिल्प शैली में जीवन के अनिवार्य परिवर्तन के बात बतलावल गइल बा यानि परिवर्तन प्रकृति के शास्वत नियम हऽ जवना के देख के घबड़ाए के ना चाहीं। नया-पुरान आ पुरान-नया होत रहेला। एकरा के रोकल संभव नइखे। आदमी के अमर करे के प्रयास युग-युग से होत आ रहल बा आजो हो रहल बा। अविष्कार सतत चलत रहेवाली प्रक्रिया हऽ, चलत रही एहू में दू राय नइखे। आदमी अमरत्व प्राप्त करे लागी तब जल-जमीन-हवा के समस्या कइसे हल होई? एकर कल्पनो अबहीं ना कइल जा सके। सुख दुख में समभाव से रहल ज्ञानी आदमी के काम हऽ।

एह गीत में अंग्रजी राज के गंध बा। कहल जात बा कि दानापुर चलल जाय तब सवाल उठत बा कि उहंवा जाके का मिली? जवाब जन्मत बा कि उहां चल के सैनिक बनल जाई। देस में कवनो राजा महराजा रह नइखन गइल। भर्ती हो रहल बा। उहंवा भर्ती हो गइला पर सभ दुख दलिदर भाग जाई। बाकिर सुनेवाला, प्रतिरोध करत कहत बा कि ना ना। ई अनुचित होई। जे लोक भर्ती होके अंग्रजी सेवा में बा। ऊ धर्म के विरोध काम कइला के चलते समाज से बहिस्कृत कर दीहल गइल बा। स्वधर्में मरन…….के याद करावल गइल बा-एह गीत में। बहाल लोग के ना धर्म रह गइल बा ना जात। ऊ लोग जात धर्म के बंधन से अलग बा।

धान के पइआ फेंके लाएक होला बाकिर आदमी के पइया फेंकल ना जाय। रचल खटोला पर मामा मामी के बीच बालक बिहंस सकेला।   खकचोदा  में एगो व्यंग भरल बा। द्वेश के भाव के दखल अंदाज नइखे। घर में जब बालक के रोवाई सुनाई, ऊ बिहंसी तब पांव नचबे करी। महाजन दीदा भर के निहार लेस कि पूत पवला के खुशी धनी गरीब के घर में एक समान होला। आपन पूत सभका प्यारा होला। पूत के जवान होखते दुख भाग जाई। सुख-दुख में समभाव राखे के, जीवन समर में हरवे हथियार के हरदम चौकस रहे के, निर्माण के जुझारू उत्साह राखे के चटक रंग भरल बा-एह गीत में। हार के हार मान के जीवन जंग से पराइल कायर के काम हऽ।

  1. चंदा मामा। आरे आव, बारे आव,

नदिया किनारे आव

सोना के कटोरवा में

दूध-भात ले ले आव

बबुआ के मुहंवा में घूट।।

खाना, खाए में कवनो बालक नाकुर-नुकुर करे लागेला, मुँह के पास कवर ले गइला पर रोए लागेला, मुंह हटा-हटा लेला तब खिआवे वाला आदमी लइका के घर के बाहर भा छत पर ले जाके चंदा के देखा-देखा के उपरांकित गीत गा गा के कवरे कवर खाना खिआ देला। ए गीत में नजदीकी रिश्तेदार के संपन्न के बखान आ बालक के सुख-चैन के कामना भरल बा। खात खा मन चंचल ना रहे के चाहीं। शांति के साथ खाना खइले पर नीक से देहे लागेला, ई खिआवे वाला के मन में बा। एही से ऊ बहला, फुसला, खेला-खेला के खाना खिला रहल बा कवनो तरह के जोर जबरदस्ती नइखे करत। एह में सुख समृद्वि के कामना भरल बा।

  1. चुप्प रहs चुप्प रहs बालबचना

बाप-माई गलहू चिचोर कोड़ना

सांझी खानी देख लीहs भर अंगना

उहंवा से ले अइहें भर ढ़कना

मोटरी पटक दिहें भर अंगना

दूधवा पिआ दिहें तीन ढ़कना।।

  1. ते तइया, ते तइया, बाबू तइया,

तेल के घटाई चढ़ो, बाबू के मोटाई,

बाबू कोतल सन, बाबू कोतल सन,

धोबिया के पाठ सन, तेली के जुआठ सन,

गंगा जी के सेवार सन,

काचर-कुचर कउआ खाई, घी के लडु बबुआ खाई,

दिनो दिन होखस बीस, बबुआ जीअस लाख बरीस।

मतारी-बहिन, चाची, मामी भा फुआ दादी के मुंह से बहला के तेल लगावत खा ई वात्सल्य के गीत गावल जाला। एह गीत में लइका के सोगहग विकास के कामना कइल गइल बा। बालमन के प्रौढ़ प्रौढ़ चीज से परिचित करावे के प्रयास कइल गइल बा। अइसने बने के सीख देल गइल बा।

  1. तोर मइया ना डोलावे

तेर बाप ना डालावे

तेाके हमहीं डोलाई

एह गीत में मइया बाप के जगह पर मउसी, मउसा, आजी-बाबा, चाचा चाची फुआ-फुफा लगा के गावल जाला। आकास में उड़त चिरई आ झुला झुलत किशोरियन के देख के झूले खातिर लइका जिद करेला। बाप मतारी कवनो कारण बस लइका के मांग पूरा ना कर पावे तब दोसर केहू नजदीकी रिश्तेदार एक हाथ लइका के दूनो गोड़ आ एक हाथ से ओकर दूनो बांह धरि के झुलावत आ गावत रहेला। एह गीत के द्वारा हमरा समुझ से लइका के अवचेतन में ई भाव भरल गइल बा कि अपना नजदीकी से नजदीकी आदमी के मददगार ना बनलो पर समाज के केहू ना केहू आगे आके मदद कर सकेला एह से खाली अपना नजदीकी रिश्तेदार के अलावे दोसरो केहू के गैर ना समझे के चाहीं।

  1. बबुआ के मइया अउरी, भर हाड़ी रिंहेली जउरी,

अपने खाली कठवतिया में बबुआ के देली उलदिया मे।।

तेही खातिर बाबू हमार रूसेलन 

उलदी कठउती के दूसेलन,

रूसल रूसल बाबू ममहर जाय,

उहंवा से अनले कनकजीर धान,

ओही धान के चुड़ा कुटाईब,

कमकजीर के चुड़ा सोरहिया-दूध,

खालऽ बबुआ जइब बड़ी दूर।।

  1. बबुआ के मामा अइले, घोड़ा पर कि हाथी पर?

कुकर  भुकत आवेला, बानर नाचत आवेला। 

चीलर काटत आवेला, सुअर देखत आवेला। 

बइठ मामा चैकी पर, अडरे मडेर के झोपड़ी

कउआ रे कहंरिया, मइनी के बजनिया 

छोटकी के तेल देनी, बड़की के आग

उठ रे जटिनिया, बेटी भइली तमासा

मामा कउआ नीचे दाढी

अब ना मामा जीही, गुड़ गुड़ हुक्का पीही। 

बबुआ के मामा आवेले 

घोड़ा पर कि हाथी पर ?

कुकुर भूंकत आवेला

बानर नोचत आवेला

चीलर काटत आवेला

सुअर देखत आवेला। 

लइकन के अपना मामा से बहुत प्रेम होला। बबुआ के मामा से बबुआ के बाप पितिया के मजाक के रिश्ता होला। एही से मामा के नांव पर उपरांकित गीतियन में हास्य व्यंग भरल गइल बा।

20 सुगवा धनवा खात बा

मार बेटी भक्षनी, गोड़ में देवो पैजनी,

खाए के देबो भोजनी

गंगा पर बिआह देब

आवे के ना जाए के 

टुसुर टुसुर रोवे के ।।

21 हाल हाल बबुआ, कुरूई में ढेबुआ

बाप दरबरूआ, मातारी अकसरूआ,

माई तोहार गइली चिचोर खनना,

सांझी खानी अइहे तऽ भर अंगना।

आदमी देखो भा आपन आंख मुंदी लेवो बाकिर वातावरण के प्रभाव से ऊ बाच ना सके। हवा-पानी हमेशा आपन प्रभाव सीधे भा घुमा के डालत रहेला। घर में द्वेष पैदा करिके सोना के कटोरा केहू ले भागल। भोजन करे-करावे बदे बाच गइल काठ के उलदी। आदमी के खून में बइठल सोना के कटोरा के संस्कार अबहीं भुलाइल नइखे। लइका के रूसले एक मात्र अस्त्र होला, जवना के प्रयोग बालगीतन में जगहे-जगह पावल जाला। चहबचा के जगह पइसा जोगा के राखे बदे माटी के कुरूई बांच गइल बा। गरदन में गुलामी के फंदा डालके दरबार कइला के बादो पेट नइखे भरत। घर-आंगन में बालक के अकसरूआ छोड़ि के भंवरा-भंवरा धाके मतारी के सामने चिचोर खने के मजबूरी सर पर सवार बा। घर के तंगेहाली से लइका ममहर जाके नीमन खाए लाएक धान ले आवत बा। एह बात में सहयोग के स्नेहिल भावना के पावल जाता। साथे-साथ भोजपुरिया संस्कृति के सुगंध भरल बा कि विवाहोपरांतो भाई अपना बहिन के भुला-त्यागि ना देवेला आ मौका पर मदद करे में आना-कानी ना करे। धरती पर उपलब्ध जानवरन में सनातनी आदमी खातिर गाय सबसे पावन-पवित्र जानवर होले। ओकरो में सोरही। जवना के पोंछ के बाल के चंवर बनेला। गाइ के स्थान उंच पीढा पावेला। बाकिर ई प्रजाती दूर हिमालय क्षेत्र में पावल जाले, भोजपुरी क्षेत्र में ना। इहां सोरही के अर्थ सोरह नीमन गुण लक्षण वाणी  समझल जाए के चाहीं। चुड़ा-दूध खा के यानि सहयोग पा के, मंजिल के दूरी बता के जीवन या़त्रा के प्रति प्रोत्साहन देल गइल बा। मिथिला क्षेत्र के गीत रहित तब चूड़ा-दूध के बदला मे चूड़ा-दही रहित। ई गीत मोतिहारी (बेतिया) तरफ के हऽ ना तऽ चुड़ा-दूध के बदला दूध-भात गावल जाइत। ऊ इलाका मीथिला से सटल क्षेत्र हऽ ऐ्ही से भात ना चूड़ा रखल गइल बा। बालपन में लइकन में कल्पना के बहुलता रहेला। धीरे धीरे वास्तविकता से परिचित करावेले सुझाव मनौवैज्ञानिक सच्चाई द्वारा उपरांकित दूनो गीतियन में मनो वैज्ञानिक भाव के उतारल गइल बा। मनौवैज्ञानिक कसउटी पर कसाला पर दूनो गीत खरा बाड़ीस।

पारंपरिक बाल गीत बालक बालिका में संस्कार के जड़ रोपे में त मददगार होखबे करेला साथ ही बचपन में अभाव का होला ई ना जाने देवे। ऊपर वर्णित गीतन से स्पष्ट बा कि गीतन के रचना बाल मनोविज्ञान के आधार पर कइल गइल रहे जे आजो प्रासंगिक बा।


img168.jpg

Hum BhojpuriaAugust 19, 20218min3270

डॉ. ब्रज भूषण मिश्र

 भारतीय संस्कृति में माई, बाबू आ गुरु के देव तुल्य मानल गइल बा- मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, गुरु देवो भव। जनम के पहिले से महतारी गरभ में नौ महीना ढोवेली आ जनम के साथ पाले पोसे के जिम्मेवारी उनके पर होला आ कुछुओ सीखे जाने के पहिला अवसर  उनकरे से मिलेला। बाबूजी बाल बच्चा के कइसे उनति बढ़ंती होई, एकर चिंता आ उतजोग करेलन। इहो बात बा कि सब माई बाप एके अइसन ना होखस। केहू-केहू  बाल बच्चन के ओइसन चिंता फिकिर ना करे, जइसन-तइसन हालत में छोड़ देवेला। बाकिर अइसन कम देखाई पड़ेला। अपने दुख-सुख काट के गँवई समाज में, अपना भोजपुरी समाज में माई-बाप बाल बच्चन के खेयाल  राखेला। ओह बाप-महतारी के मन में ई बात, ई उमेद रहेला कि बुढ़ापा अइला पर ओकर बचवा सब सहारा बनी, बुढ़ापा के लाठी बनी। बाकिर सब के सोच उमेद पर ओकर बाल-बच्चा खरा ना उतरे। बहुत संतति सयान भइला पर अपना माई आ बाबूजी के कइलका के इआद राखेला, उनकर कृतज्ञ रहेला। बाकिर, जइसे-जइसे समय बदलत जात बा, परिवार में, समाज में विसंगति पैदा होत जा रहल बा। केतने बाप महतारी पथराइल आँख से बहरवाँसू  संतान के बाट जोहत बा। जे अपना संतान के संगे रहत बा, ओह में से बेसी लोग के हालत नौकर-चाकर अस हो गइल बा। परिवार में ओकरा बात के कवनो मोल नइखे, ओकर कवनो सुनवाई नइखे। एह सब स्थिति पर भोजपुरी कवि लोग के नजर बा। ओह लोग के दृष्टि से कुछुओ नइखे बाँचल। एह में सबसे बेसी माई के चर्चा मिली। बाबूजी के चर्चा मिलेला, बाकिर  माई के तुलना में कम। कई कवि लोग के चरचा में दुनों लोग संगे मिल जइहें। आपसी संबंधन पर माई आ बाबूजी के तरफ के बात त मिलबे करी, संतानो लोग के बात के कवि लोग अहमीयत देले बा।

पारिवारिक संबंधन पर कवि राधा मोहन चौबे ‘अंजन ‘ जी के कलम खूब चलल बा। संतान से उमेद, असरा  लगवला के संगे, ओह लोग खातिर कइल गइल जतन के इआद करावे के उदेसे उहाँ का गीत रचना कइले बानी। सीमा पर युद्धरत बेटन खातिर ओकरा संघतिया के हाथे  घर से  खाये-पीए के  सामान  भेजे के  चिंता  वाला  गीतो मिली। देखीं करेज के  खँखोर लेवे वाला गीत के कुछ पाँति –

         जहिया माई के गोदिया के याद आई रे
तहरी अँखिया  में  गंगा के पाट आई रे
भूखे रहि के कौर खिअवली, अपने मरि के तोहे जियवली,
सबके ओरहन सुनली मइया, बछरु पोसे जइसे गइया,
मइया चलि जइहें ना अइहें, कतनो केहू जतन करइहें,
तहिया मनवा के तहरा विषाद आई रे

‘माई के जीव गाई अस पूत के जीव कसाई अस ‘ भोजपुरी कहावत ह। ई कहावत बहुते अनुभव के बाद बनल होई। चलल होई। देखीं अंजन जी ओह माई के ममता के कइसे शब्द में बन्हले बानी जे अपना सैनिक बेटा खातिर ओकरा संघतिया के मारफत खाये पिये के सामान आ संवाद भेजत बाड़ी –

लेले जइहs हमरो सामान हो, पूछिहें जवान सुगना !
सतुआ चिउरा के गठरी जल्दी दीहs पहुँचाई
भरुआ मरिचा  कोने ओह में दिहनी हम गठिआई
पइहें नाचे लागी खुसी से परान हो, पूछिहें जवान सुगना !
मत कहिहs कि मइया तोहर पाकल फल हो गइली
चिट्ठी दिहली काँपत रहली जात-जात रो गइली
ना त बेकल होइहें बाबू के परान हो, पूछिहें जवान सुगना !

अंजन जी के बाद के कवियन में ई विषय फरत फुलात रहल। संवेदना से भरल काव्य पंक्ति लोग के संवेदित करत रहल। देखीं,  ‘ ज्ञान गगरी ‘ के कवि माई के इआद करत का लिखले बाड़न –
    जब-जब इयाद आवे माई के दुलार हमरा।
तब-तब अँखिया से बहे महाधार हमरा।।
मइया हमके जनमवली, हमके गोदीए में सुतवली।
कतना कटली दुख दिन, कपड़ा रातो-दिन मलीन।।
कइली दूधवा दे के, जिनगी के तैयार हमरा।

लगभग एही जमीन पर, हरिद्वार प्रसाद किसलय के गीत बा। ऊपरके गीतवन के अनुगूंज बा, नया कुछुओ नइखे –

कबो सुन के  रोआईमईया  गोदिया  उठाई
लाल सुगना कही बोलत, लागे मिसरी रस घोरत
आँचर ढँक के पिअवलू दूध धार हमरा
जब जब इयाद आई माई के दुलार हमरा

1980-90 के बीच ब्रज किशोर दूबे के गीत ‘ बाबूजी के चिट्ठी’ बड़ा चरचा में रहल। 1989 ई. में दैनिक हिन्दुस्तान, पटना ओकरा के छपलहूँ रहे। कवनो बाप अपना परदेसी  एकलौता बेटा के जे बहरवाँसू हो के घर-परिवार के भुला  गइल बा, एगो चिट्ठी लिखत बा आ बेटा से अपना चाहना के बतावत बा, बहुते मार्मिक गीत बा। दू गो अंश देखीं –

अपना गाँव-घर के नेहिया जनि भुलइहs बबुआ
कबहूँ सपनो में सुधिया तू ले अइहs बबुआ

ठेंगुरी पर ढोवs तानी जिनगी के बोझा
करे मन रहितs नजरिया के सोझा
धन पाछे पून पहिले तू कमइहबबुआ

        बाड़ तूँ ही माई बाबू जी के आखिरी अलम
बा ओरात जात आँख अउरु ठेहुना के दम
धई के अँगुरी सिवाला में ले जइहs बबुआ

एही कालखंड में दू गो कवि लोग के रचना अइसन भेंटात बा जवना में बाबूजी व्यंग्य आ आक्रोश के शिकार बाड़न। प्रसिध्द कवि कुंज बिहारी कुंजन बाबूजी से परेशान हाल बेटा के, जे अभाव में बा आ लाजे लेहाजे बाबूजी के सेवा करत बा, के अभिव्यक्ति देले बाड़न –

का हो पूज्य पिताजी, बोलs अबहीं कहिया ले जियबs तूं ?
कहिया ले चवनपरास  खा-ऊपर से गोरस पियबs  तूं ?

का करबs अब देह बना के, भोरे मधु के पान करे ल।
सबसे पहिले मारी पलहथी, रोटी दाल जियान करे ल।
तलब छोड़ि एको पइसा ऊपर से कहीं परापत नइखे।
अपने मेहर लइकन के खरचा से कुछुओ बाँचत नइखे।

अरुण भोजपुरी के ओती घरी युवा दलित कवि के रूप में बड़ा चरचा रहे। उनकर एगो किताब आइल ‘ आजादी के अँजोर ‘ ( 1992 ई. )। एह छोट पुस्तिका में तीन गो समरपन बा आ जेकरा के समरपन कइल गइल बा, ओकरा पर आक्रोश व्यक्त कइल गइल बा। अपना पिता बसावन राम, जे डाक तार विभाग के अधिकारी रहलें के समर्पित करत कवि अपना असफलता खातिर दोषी ठहरवले बाड़न –


हमरो परसनाल्टी के जे डिसऑर्डर में डालल
हमरे ना गुरुओ पुरुखा के बात कबो ना मानल
ले लिहले गोतिया के जमीन, बड़का कइले खरखाही
घरवो के रोकले विकास बा इनकर अफसर-शाही

हीरा प्रसाद ठाकुर 1995 ई. में परदेस गइल बेटा के नेह बिसरला के कारण दुखी एगो माई के मानसिक दुख आ क्लेश के अपना कविता के विषय बनवले बाड़न –

      खुद भिंजलका पर सुतनी, तोहके सुखले सुतवनी,
आसवा रखनी, बबुआ काहे नेहिया बिसरल
कभी आध पेट खइनी, कभी माँग माँग खइनी,
दूध पिअवनी, बबुआ काहे नेहिया बिसरल

जयकांत सिंह ‘ जय ‘ नौकरीपेशा बेटा के ओह हलकानी के चित्रण कइले बाड़न जे समय से बेतन ना मिलला के कारन माई बाबूजी के जरूरत के समय से पूरा करे में अक्षम हो जात बा । अभाव के कारन माई बाबू जी के सेवा में खलल पड़त बा –


बाबूजी कहलें एह चस्मा के पावर कम बा।
दादी के दम्मा देखs कइले बेदम बा।।
माई के सब दाँत लगावल बहुत जरूरी।
हित नात कोहनाइल, के सुनो मजबूरी।।
दूर से देखेवाला सबका का का दिखत बा।
ई मनई अभाव में जीए के सीखत बा।।

शिवजी पांडेय ‘ रसराज ‘ माई के कृतज्ञता ज्ञापन में पारम्परिके बात कहले बानी, बाकिर कविता ढंग के उतरल बा –

ममता के अँचरा में, हमके छिपा के,
सीत घाम बरखा से, हरदम बचा के,
आफति के अदहन में खुद के उसिनली ऊ
बाकिर ना धीरज गँववली,
हमार माई धई के अँगुरी चलवली।

अर्जुन पाठक ‘ विकल ‘ आ माधव पांडेय ‘निर्मल’ पारम्परिके बात से माई के नेह आ छोह के चरचा कइले बाड़न, बाकिर विकल कवित्त में त निर्मल गीत में।
पहिले विकल के कवित्त देखीं –


माई के नेह कबो ना ओराई, हो जइहें पूत कपूत कसाई
सीपी में मोती समान सहेजेले, नव महीना में कोख जुड़ाई
बाबू के काजर तेल करे अउरी छाती के दूध से पोसत आई
ललना के बाउर नजर न लागे, सरसों अइंछ के धूईं जराई

अब निर्मल जी के गीत के अंश देखीं –

माई रे माई तोर छोहवा गंगाजल के समान।

नेहिया-दुलार के गगरिन लोर से
जिनगी के बेलिया फुलइलू ,
जिनिगी भर बबुआ के हँसी खुशी देवे खातिर
आपन देहिया सुखइलू,
करजा तोहार हिमगिरि से भी बड़ बाटे
निर्मल करीं हम बखान।

मनोज भावुक पिछला सदी के आखिरी दसक में भोजपुरी साहित्य के क्षेत्र में कदम रखलन। भोजपुरी में गीत गजल कविता में आपन खास पहचान बनवलें।  ना खाली कथ्य के दिसाईं बलुक शिल्प के दिसाईं ई नया तेवर आ त्वरा के संगे माई बाबूजी के साथे संतान के संबंध निर्वाह  आ उनका प्रति चिंता आ दायित्व बोध के अभिव्यक्ति दिहलन। भोजपुरी में माई बाबूजी विषयक जतना सामग्री ऊ परोसले बाड़न, ओतना आउर लोग के नइखे। हिंदी में डॉ. संजय पंकज के माँ पर सैकड़न दोहा के संग्रह – ‘ माँ है शब्दातीत ‘ छपल बा।  कवनो कवि के माँ पर ई सबसे बड़हन संग्रह हम मानत रहनी ह, बाकिर भोजपुरी में विविध रूप में मनोज भावुक उनका से बेसी लिखले बाड़न। माई खातिर, बाबूजी खातिर आ माई बाबूजी खातिर एकसाथ। सबसे पहिले माई पर केंद्रित उनकरा गजलन से दू तीन गो शेर-

बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल

                  x

     हजारो गम में रहेले माई
तबो ना कुछुओ कहेले माई


बनल रहे घर बँटे ना आँगन
एही से सभकर सहेले माई

माई-बेटा के संबंध में आइल बदलाव के व्यंजना में लिखल मनोज भावुक के एगो गीत बहुत गवाइल बा, जवना के कुछ पाँति देखीं –

   बबुआ भइल अब सेयान कि गोदिए नू छोट हो गइल
माई के अँचरा पुरान, अँचरवे में खोट हो गइल

        ‘ चुलबुल चिरइया में बबुआ हेराइल
बोले कि बुढ़िया के मतिये मराइल
बाबा के नन्हकी पलनिया उजारे –
उठल रूपइया के जोर जिनिगिये नू नोट हो गइल

मनई केतनो बड़ा हो जाए, बाकिर जब-जब अफदरा में फँसेला, ठोकर आ दुत्कार खाला, तब माई के गोदी आ अँचरा के इआद दुलारेला। मनोज भावुक के दोहा देखीं-

दुनिया से जब जब मिलल ठोकर आ दुत्कार
तब तब बहुते मन परल माई तोर दुलार

बाबूजी के व्यक्तित्व आ स्थिति के बारे में मनोज भावुक जी के कविता कुछ अइसे फूटल बा  –

       बर पीपर के छाँव के जइसन बाबूजी
हमरा भीतर गाँव के जइसन बाबूजी

         x

  टुकी टुकी बाबूजी के बाग हो गइल
पतझड़ आइल अइसन दुलम साग हो गइल

                   x

बाबूजी के हालत बाटे  दिनवो काटे रतियो काटे
सभे अपना मन के बाटे
मनवा जब सभकर अरुआइल
काँव काँव के बोल सुनाइल
बाबूजी के घरवा कागे काग हो गइल

अफसर बेटा आ इंजिनियर पतोह के दुआरी बाबूजी आ माई के स्थिति नौकर आ दाई अस हो गइल बा। समय के एह साँच के भावुक जी बयान करत बाड़न –

बाबूजी के आँख पर / चढ़ गइल बा मोतियाबिंद
वाला चश्मा / तबो ऊ ढो ढो के पहुँचावत बाड़न /
चाउर-दाल, तर-तरकारी, घीव-गुड़ / — अपना
बबुआ किहाँ / बबुआ अफसर नू बा शहर में / आ
बबुआ बो? / बबुआ बो कम्प्यूटर इंजिनियर हई /
दूनू बेकत बड़ी मानेला माई के / माई ले बढ़िया
दाई कहाँ मिली ?

आसिफ रोहतासवी जी भोजपुरी के नामचीन गजलगो हईं। गजल जइसन सोभाव कोमल बा, बाकिर समय के तीख मीठ अनुभवन से लबरेज बानी। इहाँ के पहिलके गजल संग्रह – ‘ महक माटी के ‘ में पारिवारिक संबंध के ले के कई गो गजल संकलित बा। एह में बाबूजी के सरलपन,  नरिअर अस कठोरपन, मेहनती सुभाव, पारिवारिक चिंता से बेचैनी के आसिफ साहेब गुनले बानी आ कलमबद्ध कइले बानी। कुछ बानगी से पता चल जाई –

देखे में सीधा-साधा बउराह बुझालें बाबूजी
बाकिर भर गाँवें में अगहर नेक कहालें बाबूजी

     जीव अबहियों लरकाईं अस ना जे काहे काँपेला
जब-जब कवनो गलती पर तनिको खिसियालें बाबूजी

नोकरिहारा बेटा के बाबूजी के चिंता सतावत रहेला। बाल-बच्चा  पर  के बाबू जी के खीस माई पर उतरेला।  जाँगर थकलो पर गिरहथी के काम में लागल रहे वाला बाबूजी के एक-एक तसवीर सोझा खड़ा होता-

फिर सुरूहुरी धइले होई, खाँसत होइहें बाबूजी ,
सँउसे राती खटिया बइठल हाँफत होइहें बाबूजी।
थाक गइल बा जांगर, बाकिर जीव कहाँ मानत होई
धर चिंगुरल करिहाँय गहूँ जौ काटत होइहें बाबूजी
रघुआ के फकरुलई उनकर कइले होई नाकी दम
नित माई पर ओकर खीस उतारत होइहें बाबूजी

बेटा जब अफदरा में पड़ेला त बाबूजी के सीख काम आवेला-

डगमग डेग करेला जब जिनगी के ऊबड़ खाबड़ में
आपन अनुभव के बइसाखी आसिफ हाथ धरा जालें

माई अइसन जीव हई जे घर परिवार से गोतिया दयाद तक के कुशल मनावेली, रात दिन बाल बचवन आ माल मवेशियन के खेयाल राखेली  आ मरत खपत रहेली। माई के दिनचर्या के ले के आसिफ साहेब लिखत बानी –

नाती-पोता, पूत-पतोहू, गोतिया-नइया, टोल-पड़ोस
खातिर कतना देवता पीतर रोजे भाखेली माई
माल-मवेसी, गोबर-गोइठा के चक्कर में ठेंगुरी पर
बखरी ले ओ बखरी तक भर दिन नापेली माई

माई बाबू के अपना पर पड़ल प्रभाव के बड़ा सहजे शायर सँकारत लिखले बाड़न –

माई-बाबूजी पर परल बानी
तब नू सीधा सहज सरल बानी

राम रक्षा मिश्र विमल जी के कविता पुस्तक ‘ फगुआ के पहरा ‘ में ‘माई हो माई ‘ एगो गीत बा, जवना में बेटी बिअह के जब घर से जात बिया त माई के कइलका सब के इआद करत बिया आ आगे के कुछुओ सिखाई सोच में बिया –

केकरा से कइसे मिलीं कइसे बतिआईं
केकरा ले हँसी केकरा से मुसकाईं
आज ले सिखवलु दुनियादारी पाई-पाई
काल्हु के अब  सिखाई

माई के लेके केशव मोहन पांडेय अपना काव्य संग्रह  ‘ जिनगी रोटी ना ह ‘ में  चार-पाँच गो कविता लिखले बानी। परबे-तेवहारे माई के पास ना आवेवाला बेटा के लेके अपना दूधे के दोषी ठहरावे वाली माई के व्यथा व्यक्त करत लिखले बाड़न –

अब सचहूँ गाँव छूट गइल  / आ माई / अँचरा में मुँह लुकवा के/ धीरे से लोर पोंछेली / बेर – बेर / अपना दूधवे के कोसेली / कि ईहे खार हो गइल / कि हमरा कवल-करेजा के / हमरा बाबू के अइसन बेवहार हो गइल।

श्रीभगवान पाण्डेय ‘ निरास ‘ अपना कविता संग्रह – किसिम-किसिम के फूल में अपना परिजन लोग के इआद आ प्रार्थना कइले बानी। माई बाबूजी के गुन गावत दोहन में से कुछ नमूना देखीं –

आँगन के तुलसी रही, घर के रही सिंगार
माता जी संजीवनी, संझा-बाती  द्वार
कुशल  क्षेम घर में  रहे, बढ़त  रहे  परिवार
माई भूखत रहि गइल, छठ जितिया अतवार

       जीवन आपन गारि के, सिंचली दे के प्यार
कुल कुटुम्ब हरियर भइल, लहलहात परिवार
भूख गरीबी बेबसीकठिन समय के मार
ढाल बनल रोकत रहीं, जानल ना परिवार

जय शंकर प्रसाद द्विवेदी के कवितन में माई के चित्रण मिल जात बा। ‘ जबरी पहुना भइल ‘ संग्रह के दू कवितन से एक-एक  अंश देखीं  जवना में  बाल बच्चन खातिर संघर्ष  करे वाली माई कइसे अपने घर से बिलगावल जाली, मार्मिक चित्रण बा –

हरदम बेकल परान रहे ओकर
रहिया में कतनो लागे चाहे ठोकर
बिछली से हरदम बचावेले माई
नेहिया के नाता निभावेले माई
x

ओहि घर अँगना में तुलसी के पुरवा
संझा दियरी जरि जाय
सेही हो अँगनवा में अइली बहुरिया
माई के देली बिलगाय

कई कवि लोग अपना संग्रह के शुरुआत मंगलकामना के रूप में ईश वंदना के संगही माई बाबूजी के वंदना करेला, जवना से शास्त्रीय विधान के अनुसरन होला।  अवध किशोर अवधू ओह नियम के अनुसरन करत माई बाबू जी के वंदना कइले बाड़ें। कवित्त के अंश देखीं –

पवली मिठाई कहीं, अँचरा में बन्हली ऊ
कहीं होखीं हमरे के, खोज के खियवली
फटही लुगरिया पहिनले रहेली बाकी
हमरा के नया-नया कीनी के पेन्हवली
सहि-सहि घाम-सीत काम करें खेतवा में
सहली गजन बाकी हमके पढ़वली
हमरा निरोग रहे खतिरा ऊ घूमि-घूमि
देव देवी सबका के भरवा चढ़वली

       अँगुरी धराई के, चलावे के सिखवलs तूँ
गलती जो देखलs s हमके बरजलs
हमरा भविष्य के सँवारे हेतु रात-दिन
घाम से कबो तs कबो बरखा से बजलs
नेक राह पर हम चलीं खुशहाल रहीं
एही खतिरा तूँ भगवानो जी के भजलs
बाबूजी हो एतने ना परल जरूरत तs
कबो कबो लबदो से मारियो के सजलs

भोजपुरी में बाल साहित्य कम बा। कुछ एक कवि लोग यदा कदा बाल साहित्य रचत रहल बा। अगर बालपन में कवनो बात दिमाग में बइठ जाला त जल्दी ना निकले। एह से बाल साहित्य के रूप में परोसाइल रचना रुचि परिष्कार में काम करी। जलज कुमार अनुपम के ‘अटकन चटकन ‘ में  ‘ माई ‘  कविता काम के बा –

जग में सबसे सुन्नर माई
जग में सबसे निमन माई

फूटेला जब-जब रोआई
माई के आँचर में मुँहवा छिपाईं

अब हम अपना एह आलेख के सुभाष चंद्र यादव के  ‘ माई ‘ गीत के कुछ पाँति से करे जा रहल बानी। ई गीत खूब पढ़ल, गावल, सुनल गइल बा –

जग में माई बिना केहुए सहाई ना होई
केहू कतनो दुलारी बाकिर माई ना होई
सुख दुख रतिया दिनवा सहली
मुख से कबहूँ कुछ ना कहली
उनका अँचरा से बढ़के रजाई ना होई
अपने सूखल पाकल खा के
रखली सबके भरम बचा के
उनकर रोंआ जे दुखाई त भलाई ना होई

जब तक भोजपुरी अपना लोक आ संस्कृति के ना भुलाई, तब तक माई आ बाबूजी के महत्त्व बरकरार रही। माई बाबूजी के गुन गवात रही, कविता-गीत लिखात गवात रही।

( परिचय- डॉ. ब्रज भूषण मिश्र भोजपुरी साहित्य आ संगठन में चालिसहन बरिस से लागल बानी। कविता, आलोचना, इतिहास, काव्यशास्त्र, अकादमिक लेखन, जनशिक्षा संबंधी लेखन, संपादन कार्य।)


img138.jpg

Hum BhojpuriaAugust 19, 20213min1430

डा. सुनील कुमार पाठक

भारतीय वाङ्मय में भारतीय संस्कृति के मान्यता के अनुरूप माता-पिता के बहुत श्रद्धा आ सम्मान के नजर से देखल गइल बा। भारतवर्ष में अइसन मान्यता रहल बा कि जवन माई अपना गर्भ में अनेक पीड़ा आ कष्ट सहके आपन संतान जनमावेली आ फेरू ओकरा के बचपन से पाल-पोस के सियान करेली उनकर दरजा मानव समाज में काफी ऊंचा मानल जाई। ओइसहीं बचपन से लेके पूरा जिनिगी अपना संतति के पाले पोसे वाला, ओकरा के बराबर अपना आशीर्वचन आ शुभकामना से परिपोसन करेवाला बाबूओजी के मानव जीवन में बहुते ऊंचा स्थान प्राप्त बा। जगद्गुरु शंकराचार्य जी देवी वंदना में लिखले बानीं- “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।” पुत्र कुपुत्र भले हो जाए मगर माता कुमाता नैइखी हो सकत। संस्कृत के एगो श्लोक में एगो मादा पशु जवन शिकारी के पकड़ में अइला पर ओकरा से इहे बिनवत बिया कि-
आदाय मांसमखिलं स्तनवर्जमंगे/मा मुञ्च वागुरिक याहि कुरु प्रसादम्।/
अद्यापि शष्पकवलग्रहणानभिज्ञः/मद्वर्त्मचञ्चलदृशःशिशवो मदीयाः।”
मतलब कि “हे शिकारी! हमरा देह के हर भाग के काट के अलग कर द बाकिर हमरा दूनू स्तनन के छोड़ द। काहे कि हमार छोटका बचवा जवन कि अबहीं घासो खाये के शुरू नइखे कइले ऊ बड़ी आकुलता से हमार बाट जोहेला आ हम ओकरा के दूध ना पिआइब त ऊ मर जाई। एहसे हमरा दूनू स्तनन के मत काटs। एह श्लोक में एतना मार्मिकता छिपल बा कि पशुलोक के एह बात से मानव समुदायो के असीम प्रेरणा मिल रहल बा। कवनो प्राणी जगत् में माई-बाप के प्रति ओकर संततियन में अथाह प्रेम आ श्रद्धा पावल  जाला। काहे कि माई बापो एह देश में आजीवन अपना संतानन खातिर एगो विराट छायादार वृक्ष लेखां होला, एगो प्रकाश-स्तंभ खानीं होला जवन संकटन के कइसनो अंधकार में सदा मार्गदर्शन करत रहेला। भारतीय संस्कृत शास्त्रन में “मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः, गुरु देवो भवः” के जवन सूक्ति मिलेला ओह में भारतीय संस्कृति के आत्मा छिपल बिया। ई मातृभावना भारत में एतना व्यापक आ महत्तम रूप में पिरोवल गइल बा कि देश के माटी, नदी,पर्वत, पवन,वनस्पति-सगरी देवता के निवास मानल गइल बा। अथर्ववेद में त पूरा धरती के कन-कन के मातृभावना से देखत सरधा से शीश झुकावल गइल बा- “माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्याः।” यानी कि ई पूरा धरती हमनीं के माता हई आ हमनीं इनकर संतान। धरती के मातृभाव से देखला पर मन के हर तरे के विकार सहजे दूर हो जाई। एगो दोसर श्लोक में त जनम देबेवाला माता-पिता के धरती आ आसमानो ले ज्यादा पूज्य बतावल गइल बा– “भूमेः गरीयसी माता स्वर्गात् उच्चतर पिता।” एगो संस्कृत श्लोक संध्याकाल के
दीपक चनरमा के प्रातःकाल के दीपक सूरज के,तीनू लोक के दीपक धरम के आ कुल के
दीपक सुपुत्र के बतावत मानव समाज के मंगलकामना कइले बा।
सुपुत्र माता पिता के आसिरबाद हासिल करे खातिर बराबरे प्रयत्नशील रहेला, जिम्मेदार माता-पितो के ई धरम बतावल गइल बा कि -“माता शत्रुः पिता बैरी ये न बालो न पठितः। न शोभते सभा मध्ये हंस मध्ये बको यथाः।” ऊ अपना संतान के सुशिक्षा देके देश आ समाज खातिर एगो जिम्मेदार नागरिक के रूप में तैयार करो।
संस्कृत में अनेक महाकाव्य, नाटक, नीतिश्लोक, धर्म आ नीति विषयक सूक्तियन आदि में माता पिता के सरधा से परिपूर्ण रहे के शिक्षा दिहल गइल बा।

हिन्दी काव्य में माई-बाबूजी

जहाँ तक हिन्दी काव्य के सवाल बा एहूजा माता-पिता के प्रति सम्मान भाव राखे खातिर ओकरा औलादन के प्रेरित कइल गइल बा आ दोसरका तरफ एगो जिम्मेदार पालक-पोसक के रूप में माई बाबूजी के बेवहार करे के सीख दिहल गइल बा।

गोस्वामी तुलसीदास जी के लेखनी भगवान श्री रामचंद्र जी के सदाचारी बतावत ई कह रहल बिया कि- “प्रातकाल उठि के रघुनाथा मातु पिता गुरु नावहिं माथा।” प्रभु श्रीराम के ई आचरण बेहद प्रेरणादायक बा जवन कम-से-कम एतना त बतावते बा कि भारतीय संस्कृति में माता-पिता खातिर ओकर संतान के का आचरण होखे के चाहीं।

सूरदासजी के त हिन्दी में वात्सल्य रस के उद्भावक आ सम्राटे मानल गइल बा। अइसन कहल गइल बा कि सूरदास अपना पदन में मातृहृदय के कोना-कोना छानि मरले बाड़ें। सूरदास के एगो पद में मातृहृदय के मनोविज्ञान देखल जा सकत बा-“जसोदा हरि पालना झुलावै/हलरावै दुलराइ मल्हावै जोई सोई कछु गावै/ मोरे लाल को आइ निंदरिया काहे न आनि सुहावै।”– एह पद में जसोदा मैया के हृदय के बेबसी, वात्सल्य आ विह्वलता देखे लायेक बा। जइसे तइसे जोड़-जाड़ के, कुछऊ गा-गुनगुना के अपना बचवन के सुतावे वाला तौर-तरीका अधिकतर भारतीय परिवार में आजो ओइसहीं जारी बा।

खड़ी बोली हिन्दी के राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त भारतीय नारी जीवन के जवन चित्र उरेहले बाड़ें ओह से नारी के मातृरूपे के छवि ज्यादा उभर रहल बा-“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी / आंचल में है दूध और आंखों में पानी।” -आंचल में दूध (वात्सल्य) आ आंख में पानी (लज्जा, वेदना) से भरल भारतीय नारी के जवन चित्र एजवा रचाइल बा ओह से ओकरा मातृछवि के दीप्ति भरपूर प्रकट हो रहल बा। एगो दोसर कविता में जहाँ बेटा अपना माई से कहानी कहे के निहोरा कर रहल बा, कवि मैथिली शरण जी के हृदय के भावातुरता आ तर्कशीलता के मनोहारी रूप देखे लायक बा- ” मां कह एक कहानी / बेटा! समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी/ कहती है मुझसे यह चेटी / तू मेरी नानी की बेटी / कह मां कह लेटी ही लेटी /राजा था या रानी? / मां कह एक कहानी।” -एह कविता में माई के नानी के बेटी चेटी द्वारा बतावल गइला से बालक के हृदय में कौटुम्बिकता के जवन एगो भावना रच-बस जात बिया, ओह से माई के प्रति ओकर सरधा त उमड़ते बा, एगो स्वस्थ भारतीय परिवार के मजबूती के प्रयासो झलकत बा।

जयशंकर प्रसाद अपना महाकाव्य ‘कामायनी’ भारतीय नारी के सरधा से भरल जवन चरित्र-चित्रण कइले बाड़ें, ओहू में नारी के मातृरूपे के प्रधानता बा- “नारी! तुम केवल श्रद्धा हो/ विश्वास-रजत-नग पगतल में / पीयूष स्रोत-सी बहा करो / जीवन के सुन्दर समतल में।”

रामधारी सिंह दिनकर अपना एगो कविता में लिखले बाड़ें “विवश देखती मां, आंचल से नन्ही जान तड़प उड़ जाती / अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज बज्र की छाती।” अपना शिशु के दूध पिलावे बदे मतारी के ई प्राणांतक बेचैनी कवि के मातृहृदय के सच्चा पारखी भइला के निसानी बा।

आधुनिक हिन्दी साहित्य में गीतन आ गजलन के साथे-साथे समकालीन कवितो में माता-पिता पर कवि सब खूब लेखनी चलवले बा। यश मालवीय आ योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ के  गीत-पंक्तियन के देखल जा सकत बा जवना में वर्तमान जिनिगी के भाग-दौड़, संयुक्त परिवार के विखंडन, भौतिकता के प्रकोप के तौर पर कौटुम्बिक जीवन में उभर रहल स्वार्थपरता, लालच, छल-प्रपंच, गैरजबाबदेही, आत्मकेन्द्रित चिन्तन आदि के प्रवृति बढ़ल जा रहल बा, फलस्वरूप समाज, परिवार आ माई-बाप के प्रति सम्मान के भावना कमजोर पड़त जा रहल बा- “फूली सरसों नहीं रही / अब खेतों में मन के / पिता नहीं  हैं अब नस-नस / क्या कंगन सी खनके / रास्ता थकी हुई यादों का / छेंक रही है मां। × × × जाती हुई धूप संध्या की / सेंक रही है मां / अपना अप्रासंगिक होना देख रही है मां। “(यश मालवीय) “फर्ज निभाती रही उम्र भर / बस पीड़ा भोगी / हाथ पैर जब शिथिल हुए तो / हुई अनुपयोगी / धूल चढ़ी सरकारी फाइल / जैसी है अब मां / किसको चिन्ता किस हालत में / कैसी है अब मां। “(योगन्द्र वर्मा व्योम) बाकिर डा. कुंअर बेचैन के एगो गीत में माई के प्रति सम्मान के भावना कमजोर पड़त बिल्कुल नइखे दिखत-“मां! / तुम्हारे सजल आंचल ने / धूप से हमको बचाया है / चांदनी का घर बनाया है। × × × मां! / तुम्हारे प्रीति के पल ने / आंसुओं को भी हंसाया है / बोलना मन को सिखाया है।”

शायर मुनव्वर राणा दुनिया भर में मां पर लिखल अपना शायरी के बल पर खूब नाम -यश कमइले बाड़न। उनकर कुछ शेर त लोग के जुबान पर अइसन रच-बस गइल बा कि ऊ अगर आउरो कुछ नाहियो लिखले रहितें त खाली एकनिये के बल पर बरिसन तक अदबी रूचि के जमात में जिन्दा रहिहें। बतौर बानगी कुछ शेरन के देखल जा सकत बा- “किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई / मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई। × × × इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है / मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है। × × × अभी जिन्दा है मां मेरी मुझे कुछ नहीं होगा / मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है। × × × खाने की चीजें मां ने भेजी है गांव से / बासी भी हो गई हैं तो लज्जत वही रही। × × × मेरा बचपन था मेरा घर था खिलौने थे मेरे / सर पे मां-बाप का साया भी गजल जैसा था।”

-मुनव्वर साहब के एह शेरनो में अइसन रवानगी आ ताजगी भरल बा कि ओकर तासीर कबो फींका नइखे पड़ सकत।

समकालीन हिन्दी कवितो में कवि माता-पिता खातिर सम्मान के भाव दिखवले बा। जहाँ कहीं माई-बाप के प्रति अनादर भा उपेक्षा कवि के दिखल बा ओकरा के ऊ समय आ परिस्थिति के प्रभाव मनला के बावजूदो हिकारत के नजर से देखले बा। समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि राजेश जोशी के ‘मां कहती है’ शीर्षक कविता के एह पंक्तियन में माई के अपना संतान के प्रति आत्मीय अनुराग के जवन चित्रण भइल बा ऊ हृदय के शीतलता प्रदान करे वाला बा- “सोने से पहले / मां / टूइयां के तकिये के नीचे / सरौता रख देती है / बिन नागा / मां कहती है / डरावने सपने इससे / डर जाते हैं।”  आधुनिक वैज्ञानिक युगो में माई सब के एह बेवहार में शायिदे कहीं अंतर आइल होखे। चंद्रकांत देवताले जी मां के हाथ के परोसाइल खाना के इयाद करत कहत बाड़ें- “वे दिन बहुत दिन दूर हो गए हैं / जब मां के बिना परसे पेट भरता ही नहीं था।” समकालीन कविता के एगो प्रतिष्ठित कवि एकांत श्रीवास्तव मतारी के भूत आ भविष्य के जोड़त ई बता रहल बाड़े कि ऊ भावी चेतनो के निरन्तर झकझोरत रही आ मनुष्यता के पहचान मिटे ना दी-“शताब्दियों से उसके हाथ में सूई और धागा है / और हमारी फटी कमीज / मां फटी कमीज पर पैबंद लगाती है / और पैबंद पर काढ़ती है / भविष्य का फूल।”
(मां  -एकांत श्रीवास्तव)

समकालीन कविता के कईगो कवयित्री माई-बाबूजी पर बहुत शानदार आ मार्मिक रचना कइले बा लोग। रंजना जायसवाल आ निवेदिता के पंक्तियन के बानगी देखे लायक बा-

(क)- “तुम्हारा आंचल / कितना बड़ा था मां / समा जाते थे जिसमें / मेरे सारे खेल / सारे सपने / सारी गुस्ताखियाँ / मेरा दामन कितना छोटा है मां / नहीं समा पाता जिसमें / तुम्हारा बुढ़ापा।”(मां-2, रंजना जायसवाल)

(ख)- “बच्चे एक दिन कहेंगे / यह वही उजाला है जिससे हमारी मां ने / सूरज से चुराया था / बादलों से छिपाया था / हवा के थपेड़ों से बचाया था / वह रोशनी है यह जिससे रोशन है इंसान। “(मां के लिए‘-निवेदिता)

भोजपुरी काव्य में माई-बाबूजी

भोजपुरी काव्य के इतिहास में माई-बाबूजी पर खूब लिखाइल बा। भोजपुरी लोकगीतन में खास करके बिआह-शादी, सोहर आदि से जुड़ल संस्कार गीतन में बाबा, माई-बाबूजी के मरजाद, ओह लोग के महत्व अपना संतान के साथे जुड़ाव आदि के बहुत मार्मिकता से उरेहल गइल बा। एह लोकगीतन में भारत के लोक संस्कृति के सुछवि आ सुरभि देखे लायक बा। एगो सोहर गीत में संतान जनमला पर बाबा-इया, माई-बाबूजी आ सकल परिवार में छाइल खुशी आ उमंग के देखल-परखल जा सकत बा- “जुग जुग जीयस ललनवा भवनवा के भाग जागल हो / ए ललना लाल होइहें कुलवा के दीपक / महलिया उठे सोहर हो।”  एगो भोजपुरी सोहर में राजा दशरथ के फरमान पर एगो हिरन जंगल से मंगावल गइल बा। हिरनी राजमहल आके रानी कोसिला से मांस रीन्हला के बाद  हिरन के छाल मांगत बिया ताकि ओकर खाल गाछि में टांग के ओकरा इयाद के कइसहूं जोगा सके। बाकिर कोसिला रानी रामचंद्र जी खातिर डुग्गी छवावे के आपन इरादा बतावत ओकरा के लवटा देत बाड़ी। भोजपुरी के एह सोहर गीत में हिरनी के मर्मान्तक पीड़ा के जइसे उरेहाई भइल बा, ऊ संवेदना के तार-तार झंकृत कर देबे वाला बा- “आंगन सून चोउकिया बिना मंदिल दियरा बिना हो, ललना ओइसन सून बिरदाबन एक रे हरिना बिना हो।” एजवा एगो पशु के पीड़ा के जरिये कोशिला रानी के नारीत्व आ मातृत्व भावना, मानवीय संवेदना आ चेतना के झकझोरे के अद्वितीय प्रतीकात्मक प्रयास भइल बा। एगो विवाह गीत में बेटी के प्रति बाबा आ माई-बाबूजी के अनुराग आ बिछुड़न के वेदना देखे लायक बा-“हमरो सीता हो बेटी / आंखि के पुतरिया / दिनवा हरेलू हो बेटी / भूखिया रे पियसिया / रतिया हरेलू हो बेटी / पापा आंखि हो निंदिया।”(भोजपुरी के विवाह गीत-भगवान सिंह भास्कर)

भोजपुरी के केतना महाकाव्य, गीत, गजल, मुक्तक आदि में माई-बाबूजी के वात्सल्य आ प्रेम आउर संतान सब के ओह लोग के प्रति सरधा के व्यापक आ मार्मिक वर्णन भइल बा। ओकर चलताऊ उल्लेख से ई आलेख काफी विस्तार के मांग करी। बाकिर एजवा उचित बुझात बा कि आधुनिक भोजपुरी कवियन के कुछ हाल फिलहाल के रचनन के आधार पर ई मूल्यांकन कइल जाव कि माई बाप खातिर आज के संतानन में केतना ले आदर आ अनुशासन के भाव भरल बा आ युगीन परिस्थितियन के विसंगति आ तेजी से भाग रहल दुनिया में आत्मकेन्द्रित हो रहल मनुष्य खातिर ई रिश्ता अब केतना ले उपयोगी, आवश्यक, प्रासंगिक आ सांस्कृतिक क्षरण के रोके वास्ते जरूरी हो गइल बा। अपना अध्ययन के समकालीन महत्व बरकरार राखे खातिर हम भोजपुरी जंक्शन के एह अंके में प्रकाशित कुछ रचनन पर अपना के केन्द्रित करे के चाहब। ई आलेख एह अंक में प्रकाशित रचनन के समीक्षा नइखे, बलुक एह अंक के जवन रचना हमरा बतकही के साझेदारी में माकूल पड़ल बाड़ी सं ओकनिये के हम एह आलेख में उद्धृत कर पवले बानीं। वैसे एह अंक के सगरी रचना अपना-अपना रंग-रूप में बेजोड़ आ ‘को बड़ छोट कहत अपराधू’ के मनःस्थिति में डाल देबे लायक बाड़ी सं जवनन के ऐतिहासिक महत्व दिन-पर -दिन बढ़त जाई।

अशोक द्विवेदी भोजपुरी साहित्य के गद्य आ पद्य दूनू  के विविध विधा में आपन लेखनी से अनुपम योगदान देले बानीं। उहां के एगो छंदमुक्त कविता बिया- “आज बहुत इयाद आवत बिया माई अद्भुत वितान में फइलल कविता बिया ई रचना। कवनों भारतीय भाषा के रचना साथे पांत में पूजाये लायक कविता बिया ई।

अशोक जी के कविता- “आज बहुत इयाद आवऽतिया माईकवि में गार्हस्थिक बिम्बन के जरिये माई के जवन रूप खड़ा कइल गइल बाज बहुत इयाद आवऽतिया माई! /माई दलान में बइठल अनाज फटकत/ गोहूँ से सरसों आखत/ अँगना में बइठि के चाउर बीनत/पहँसुल से हाली हाली/साग चीरत/बाल्टी का पानी से बरतन धोवत/कोठरी, दलान आ अँगना से/ लेले दुआरी ले झारत-बहारत/गाई का गोबर से घर लीपत/गोइंठा से चूल्हि सुनुगावत/ × × × माई कबो खलिहा ना लउके/ छछात स्रम के देवी, हऽ माई/ नीन खुलला से सुत्ता परला ले/ जब कबो गोहरवनी/ओकर बोली सुनाइल/हमके आजु ले ई ना बुझाइल/कि कब जागल माई/आ कब उँघाइल ?/नीन भर सुतबो कइलस कि ना/ कबो माई।” × × × एह अनचीन्ह शहर में/दिन भर लथरइला का बाद/जब अगल बगल नइखे लउकत/ केहू आपन नइखे सुनात कहीं/केनियो शुभकामना के असीसहमके फेरु/बहुत इयाद आवतिया माई!”

-एह पूरा कविता में स्मृति बिम्बन के खूब इस्तेमाल भइल बा आ एगो जवन ‘यूटोपिया’ रचाइल बा ओहू में जथारथ के अनदेखी से भरसक बचे के कोसिस भइल बा। माई के हाथ के खाना के एगो अलगे सवाद होला चूंकि ओमें ओकर नेह सउनाइल रहेला। माई के कोरा आ माई के हाथ के कौर-दूनू कबो भुलाइल नइखे जा सकत- “हमके लागल बा बहुत जोर से भूखि/बेचैन हो गइल बिया माई /अँचरा का खूँट से पकड़ि के /जरत बटुली चूल्हि से उतारत/परई से थरिया में मांड़ पसावत/जरत भात में से बीनि बीनि/आलू मीसि के हाली-हाली/चोखा बनावत/ बाँहि से पोंछत लिलार क पसेना/कटोरी में कलछुत से/दाल निकालत/ माई परोसि रहत बिया/गरम गरम खाना/हमरा खातिर!/साँच कहीं त/ माई के परोसल खाना के/मुकाबला संसार के/कवनो खाना ना कर सके।” -अशोक द्विवेदी के एह कविता से समकालीन भोजपुरी कविता के एगो अइसन ऊंचाई मिलल बा जवन आधुनिक भाव-बोध के साथे-साथ पारम्परिक जीवनदायी मूल्यन के जोगवले चलत रहे के प्रेरणा दे रहल बा।

भगवती प्रसाद द्विवेदी के कवितो- ‘बाबूजी’ में समकालीनता के पकड़े के भरपूर कोसिस भइल बा। बाबूजी के अनुपस्थिति के मतलब समुझावे खातिर कविता जवना बिम्बन के सहारा लेत बिया ऊ भोजपुरी मन-माटी के अनुकूल रचाइल बा। एह कविता में एगो पंक्ति बिया-“शेषनाग अस छतर तनले छाता के।”  “छतर तनले छाता”  ई प्रयोग अर्थग्रहण में पाठक के परेशान कर सकत बा।

भोजपुरी में गीत-गजल लिखेवाला युवा कवि मनोज भावुक अपना समझदारी आ काव्य-प्रतिभा से बराबरे चकित करत रहल बाड़न। माई-बाबूजी पर ऊ खूब लिखले बाड़ें, आ खूबी के साथ लिखले बाड़ें। अपना कहन, ट्रीटमेंट, लोकप्रचलित मुहावरन के प्रयोग, प्रचलित शब्दने में नया-नया अर्थन के पिरोवत अनुपम भाव-सौन्दर्य रच देबे के क्षमता आदि में उनकर सानी नइखे। मनोज भावुक के “बर-पीपर के छाँव के जइसन बाबूजी”  शीर्षक एगो नवगीत में बाबूजी के मौजूदगी के महत्व बतावत कवि कहत बा-

“बर-पीपर के छाँव के जइसन बाबूजी / हमरा भीतर गाँव के जइसन बाबूजी / छूटल गाँव, छिटाइल लावा भुंजा के / नेह लुटाइल साथी रे एक दूजा के / शहर-शहर में जिनिगी छिछिआइल, माँकल / बंजारा जिनिगी, धरती धीकल, तातल / पाँव पिराइल मन थाकल रस्ता में जब / मन के भीतर पाँव के जइसन बाबूजी / दुःख में प्रभु के नांव के
जइसन बाबूजी।”

-एगो गजल में मनोज माई के मौन के जरिये ओकरा ममत्व के जइसन मुखरता सिरिजले बाड़ें, ऊ गौर करे लायक बा- हजारो गम में रहेले माई/तबो ना कुछुओ कहेले माई / हमार कपड़ा, कलम आ कापी / सईंत-सईंत के धरेले माई / बनल रहे घर बंटे न आंगन / एही से सभकर सहेले माई।”

-माई के अरमान आजो होला कि ओकरा औलादन में मन-मुटाव होके घर-आंगन के बांट-बखरा के नउबत मत आ जाव, बाकिर आज ई एगो सुखावह कल्पना भर रहि गइल बा। माई त सब सह के रहे खातिर तइयार बिया बाकिर ओकर बचवो होखस सं तब नूं!

आनंद संधिदूत जी अपना  नवबोधी काव्य विवेक के बल पर बहुत सुन्दर रचना लेके बराबर हाजिर होत रहीले। प्रसाद गुण से भरल एगो सीधा-सहज गीत में उहां के संदेश साफ बा-“पालि पोसि जे बड़ा कइल / ओकरा के जिन बिसरइह / ओकर चरन-धूलि अपना माथे से रोज लगइह / माई-बाबू के न भूलि के भूलइह बबुआ।”

मनोज भावुके लेखां सुभाषचंद्र यादव के कवितो में माई के चुप्पीये में ओकर असीम वेदना भरल बा- “केहू केतनो दुलारी बाकिर माई ना होई/ × × × सुख दुःख रतिया दिनवां सहली/कबहीं मुँह से कुछ ना कहली/उनका अंचरा से बढ़ि के रजाई ना होई।” एह अंक के सगरी कवितन पर अलग से एगो आलेख जरूरी बा जवना से वर्तमान समय में माई-बाबूजी के साथे भारतीय कौटुम्बिक जीवन के महत्व रेखांकित हो सके आ भारत के सांस्कृतिक बोध रूपायित हो सके।

एह संक्षिप्त अनुशीलन के क्रम में हमरा ई जरूर बुझाइल बा कि भोजपुरी कविता कवनों विषय, भावधारा, वैचारिकता भा शिल्पगत निपुणता के दिसाईं अपना कवनो फारमेट में कवनों भारतीय भाषा के कविता से पिछुआत नइखे दिखत, कहीं-कहीं त अपना लोक संवेदना के बल-बूते,  ई आपन एगो ताजगी भरल, मजिगर, मर्मस्पर्शी आ नया सुघर छवि लेके उभरे में कामयाब रहल बिया।

(परिचय- डॉ. सुनील कुमार पाठक  हिन्दी आ भोजपुरी के चर्चित कवि आ समीक्षक बानी। ‘नेवान’, ‘कविता का सर्वनाम’, ‘उमड़े निबंध मेघ’ आ ‘छवि और छाप:राष्ट्रीयता के आलोक में भोजपुरी कविता का पाठ’ आदि इहाँ के प्रमुख कृति बाड़ी सं। ) 


img115.jpg

Hum BhojpuriaAugust 19, 20211min2080

डॉ. अनिल कुमार प्रसाद

माईबाबूजी के बारे में लिखे के इच्छा हर आदमी के मन में रहेला। कुछ लोग संस्मरण के रूप में तs कुछ लोग कविता या कहानी में कुछ अइसन चरित्र के उकेर देला। उ चरित्र जीवन से ही उठावल रहेला लेकिन एतना जीवंत हो जाला कि ओह चरित्र में सभे आपन माई बाबूजी के आत्मीय छबि देखे लागेला। हम एह लेख में विश्व साहित्य में प्रसिद्ध कुछ माई बाबूजी के बारे में लिखब। एह बात के लिखे के दूगो कारण बा: पहिला तs मनोज भावुक जी के आग्रह आ दूसरे कि भोजपुरी के समृद्ध करे खातिर हमनी के बाहर निकले के पड़ी। कहे के मतलब देखे के पड़ी कि दुनिया में का भइल बा आ का हो रहल बा। एक दूसरा के भाषा आ  साहित्य के जानकारी भइला से एक भाषा आ साहित्य के पाठक गण के दूसरा भाषा आउर साहित्य के intercu।tura। competence में वृद्धि होला। एसे आज के कोरोना संतप्त दुनिया में भी g।oba। citizen बनेके अवसर आउर क्षमता मिल सकेला।

विश्व साहित्य एक अथाह सागर बा ओकरा में छुपल सब मोती-माणिक के एतना कम समय आ छोट लेख में डुबकी मार के बाहर ले आवल संभव नइखे फिर भी कुछ चमकत मोतीयन के हम रउआ सब के सामने प्रस्तुत कर रहल बानी। तs आईं हमनी के कुछ विश्व साहित्य में वर्णित बाबूजी आ माई लोग के बारे में जानल जाव।

सबसे ज्यादा प्रभावित करे वाला बाबूजी के चरित्र 19 वीं शताब्दी के फ़्रांस के विक्टर हुगो के  उपन्यास “ले मिसेराबल” के जाँ वालजाँ के बा। जाँ वालजाँ कोजेट के आपन बाबूजी ना  हउअन लेकिन अपना बच्चा से कही ज्यादा प्यार करsतारे, जान पर खेल के कोजेट के रक्षा करsतारे। अपना बहिन के सात बच्चन खातिर ब्रेड चोरावे के अपराध में जेल के सजा काट रहल जाँ वालजाँ प्यार, करुणा, मानवता, आशा आ विश्वास के प्रतिमूर्ति बाड़े।

19 वीं सदी के शुरुआत में बहुचर्चित उपन्यासकार जेन औसटेन के उपन्यासन में बाबूजी लोग के बहुत यथार्थवादी चित्रण भइल बा। एहि मे उनकर मशहूर उपन्यास “प्राइड एण्ड प्रेजुडिस” में चित्रित मिस्टर बेनेट के चरित्र एक अइसन आदमी के रूप में उभर के आइल बा जे अपना पत्नी के फूहड़पन से त्रस्त बा लेकिन आपन सीधापन, बुद्धिमत्ता, व्यंग्यात्मक हास्यप्रेम आउर मिलनसार व्यवहार के मरे नइखन देत। साथ ही अपना सबसे प्रिय बेटी एलिजाबेथ के मिस्टर कॉलिन्स अइसन फूहड़ आ बेवकूफ आदमी से शादी होखे से बचावत बाड़े आउर अपना बड़की बेटी जेन के भी शादी बिंगले से हो जाए में सहायता करत बाड़े।

1960 में प्रकाशित हारपर ली के लिखल “टु किल ए माकिंग बर्ड” में अटिकस फ्लिञ्च एक अइसन पिता बाड़े जे अकेले अपना बच्चन के पालन पोषण करsतारें एक व्यस्त अटर्नी  रहला के बावजूद। बहादुर, दयावान, लोग का कही के फेर में ना रह के, अपना बच्चन के अच्छा संस्कार देबे में विश्वास राखsतारे। अपना बच्चन के अनुशासित रखले बाड़े लेकिन ओह लोग के स्वाभाविक स्वतंत्रता में कोई बाधा नइखन बनत। अटिकस फ्लिञ्च एक आदर्श पिता के उदाहरण बाड़े।

मैथ्यू कथबर्ट के किरदार अमेरिकन साहित्य में पिता के एक क्लासिक उदाहरण बा। मृदुभाषी, सहृदय आ अत्यधिक शर्मिला मैथ्यू कथबर्ट एन शरले के गोद ले के आपन बेटी अइसन प्यार करsतारे। हालांकि दूनो के व्यक्तित्व में बहुत अंतर बा फिर भी जाँ वालजाँ से मैथ्यू कथबर्ट से तुलना हो सकेला।

इ. एम. फॉस्टर के 1908 में प्रकाशित उपन्यास “अ रूम विद अ व्यू” में इमरसन बहुत ही तेज, विचारवान आ अनूठा पिता बाड़न। उ अपना बेटा जार्ज आ उनकर प्रेमिका लूसी के हमेशा इहे सीख दे रहल बाड़न कि “be honest to yourse।f ।”

जब पिता पुत्र के संबंध के बात होखे आ तुर्गनेव के उपन्यास “फ़ादर्स एण्ड संज” के चर्चा ना होखे तs बहुत आश्चर्य के बात होई। एहिमे निकोलाई पेट्रोवईच एक रोमांटिक पिता बाड़े। उ अपना आ अपना बेटा के बीच में पीढ़ी के फर्क के हमेशा पाटे के कोशिश करsतारे। अंत में अपना बेटा अरकाडी के संगे उनकर जीवन अच्छा गुजरल। उनकर चित्रण एक अइसन इंसान के रूप में भइल बा जे जीवन के बहुत धैर्य आ जिंदादिली से जीयता।

अफ़गान अमेरीकन लेखक खालिद हुसैनी के उपन्यास “द काइटरनर” में एक पिता के बहुत भव्य वर्णन बा; ‘बाबा’ के उनकर बेटा अमीर के नजर से देखावल गइल बा। बाबा जेतना देखे में अच्छा इंसान बाड़े ओतने उनकर चरित्र ऊँचा स्तर के बा।

आ उहे बात हम गैबरियल गार्सिया मारकेज़ के उपन्यास “वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सोलीचुड” के बारे में भी कह सकेनी। होसे अरकडीओ बउएनडिया एक अइसन पिता बाड़न जे अपना कल्पना आ मेहनत से माकांडों नांव के एक गाँव बसा दे तारन। उ अपना तीन गो लरिकन के पालत बाड़न साथ ही रेबेका नाम के एगो यतीम लड़की के भी सहारा देतारें। बुढ़ापा में पागल हो गइला के बाद भी उनका तेजी में कमी नइखे आवत!

गैबरियल गार्सिया मारकेज़ के उपन्यास में अरसुला एक अइसन माई बाड़ी जेकरा दीर्घ जीवन आ परिवार के बाँध के रखे के जीवट के दौरान के अकेलापन के तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए संभवतः एह उपन्यास के नाम “वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सोलीचुड” दिहल बा।

डी. एच. लॉरेंस के उपन्यास “सन्ज एण्ड लवर्स” में मुख्य नायक पॉल मोरेल के माई ज्रट्रूड के पॉल खातिर बहुत मोह बा जवना के चलते पॉल के जिनगी अपना दू को प्रेम मिरियम आ क्लारा के बीच में डोलत रह जाता। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी एह उपन्यास के पढल गइल बा आ ईडीपस कॉम्प्लेक्स के चर्चा आलोचक लोग पॉल मोरेल आउर उनकर माई के भावनात्मक संबंध के लेके कइले बा लोग। जवना में महतारी के हमेशा ई डर बनल बा कि मिरियम या क्लारा से नजदीकी पॉल के उनकरा से अलग कर दी। लॉरेंस के जीवन में अइसन भइल बा, उ अपना “पियानो” कविता में अपना माई के अपना बचपन में जाके याद करsतारे।

लुइसा मे अलकोट, 19 वीं शताब्दी के अमेरिका के मशहूर लेखिका के उपन्यास “लिटल वीमेन” में मार्मि अपना चार बेटियन के अपना पति के घर में ना रहला पर जवन शिक्षा आउर संस्कार देतारी उ उनकर स्नेह, धैर्य आ बुद्धिमता दिखावता। पति लड़ाई के मैदान में बाड़न आ मार्मि सीमित साधन में आपन घर संभाल रहल बाड़ी। अपना बेटियन के, जेकरा के स्नेह से उ  ‘लीटल पिलग्रीमज़’ कहsतारी, काम में व्यस्त रहे के आग्रह करsतारी जब तक बाबूजी लड़ाई से घरे नइखन आ जात!

माई के जिक्र होखे आ मैक्सिम गोर्की के उपन्यास “मदर” के चर्चा ना होखे इ उचित कहाई ! पेलएगुएआ एक अइसन माई बाड़ी जे सब माई लोग लेखां अपना बेटा पावेल के भविष्य के लेके बहुत चिंतित बाड़ी लेकिन जब उनका पता लागत बा कि उनकर बेटा क्रांतिकारी लोग के साथे मिल के काम करsतारे त उ बहुत आश्वस्त हो जातारी।

नाइजेरियन लेखिका बूचि एमिचटा के उपन्यास “जॉयज़ ऑफ मदरहुड” में बाबूजी आ माई के बड़ा ही मार्मिक चित्रण बा। अगर एकर भोजपुरी अनुवाद होखे त एकर कुछ हिस्सा के वर्णन भोजपुरी क्षेत्र के भावना से मिलत जुलत बा जइसे बिआह के बाद जब बेटी  नु-ईगो अपना बाप वोकोचा अगवाडी से मिलतारी आ ओहि बेटी के बेटा लोग जियला पर पुछत नइखे, आ मुअला के बाद खूब खर्चा करके, लोग के दिखावे खातिर अंतिम संस्कार करता लोग। नु-ईगो के त्याग के चलते उनकर लरिका सब उच्च शिक्षा पावsता लोग लेकिन अपना महतारी के सुख नइखे दे पावत लोग।

अफ्रीकी उपन्यासकार चिनुआ अचेबे के उपन्यास “थिंग्स फ़ौल अपार्ट” के नायक ऑकोनकवो के जब मच्छर काटता तब उनका उनकर बचपन याद आवsता जब उनकर माई उनका के मच्छर आ कान के कहानी सुनवले रहली। नाइजेरिआ के इबो कबीला में छोट बच्चन के लोक–कथा के माध्यम से शिक्षा देवे के परंपरा बा। मच्छर आ कान के कहानी में एगो मच्छर बार बार कान के लगे आ के कुछ कहsता। उ कान से कहsता कि हम तहरा से बियाह करब ! एहिपर कान हँस के कहsतारी कि तु त नरकंकाल बाड़ तु त तुरते मर जइबs ! एही से आजो मच्छर कान के पास आके याद करावेला कि देखs अभी तक हम जियsतानी !

प्रेम चंद के उपन्यास “गोदान” में रउआ सभे होरी आ गोबर के बीच के पीढ़ी के अंतर के ओ लोग के भाग्यवाद आ आदर्शवाद के क्रमश: अंतर देखलहिं बानी लोग। सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के “सरोज-स्मृति” में एक बाप के करुणा आ असमर्थता आ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना के “दिवंगत पिता के प्रति” उद्गार आ जीवन-मूल्य बोध: ‘धक्का देकर किसी को आगे जाना पाप है’/ अत: तुम भीड़ से अलग हो गए’ से रउआ सब वाकिफ बानी ! शिवपूजन सहाय के बचपन के वर्णन जे समय में उहाँ के माई बाबूजी के स्नेह के देखवात बा इ सब रउआ लोगन से छुपल नइखे। महाश्वेता देवी के “हजार चौरासी की माँ” में ब्रती के माई सुजाता के रउआ भुलाइल ना होखेब। सुभाष यादव के ‘माई’ के तs रउआ सभे रोजे गुनगुनाइले: ‘केहू केतनों दुलारी लेकिन माई ना होई।’

विश्व साहित्य में कविता में भी माई बाबूजी के बहुत वर्णन भइल बा। आई सभे साथे-साथे साहित्य के सागर में गोता लगा के कुछ आउर मोतियन के चुन के जमा कइल  जाव !

18 वीं सदी के अंग्रेजी कवि रॉबर्ट बर्न्स अपना किसान पिता के अपना गीत (बैलड ) “माय  फादर” के बहुत ही सुन्दर वर्णन कइले बाड़न। उनकर पुश्तैनी जीविका के साधन खेती बारी ही रहे जे उ छोड़ दिहले, उनकर मृत्यु बहुत कम उम्र में हो गइल लेकिन उ आज भी स्कॉटलैंड के सबसे मशहूर कवि बाड़े।

इनकर कविता पढ़त घरी हमरा स्पैनिश आइरिश मूल के कवि शेमस हीनि के कविता “फॉलोवर” इयाद पड़ गइल हs! अपना गाँव में बाप खेत जोत रहल बाड़े आ उनकर बेटा गिरत पड़त ढिमलात उनका पीछे जा रहल बाड़े। आ जब उ लडिका बड़ होता तs खेत में आगे आगे उ हर जोतsता आ ओकरा छाया में बूढ़ा बाप पीछे पीछे चल रहल बाड़े ! एह कविता में बाप बेटा के परस्पर सही समय पर खयाल रखे के बारे में दिखावता। एक पीढ़ी से दूसरा पीढ़ी में खेती किसानी के गुण हस्तान्तरित हो जाता। साथ ही एह कविता में इ भी दिखावल जाता कि कइसे ई परंपरा विलुप्त होखे के कगार पर बा।

डी. एच. लॉरेंस के कविता “ब्यूटीफुल ओल्ड ऐज” हमेशा खातिर बहुत प्रासंगिक बा। लॉरेंस के   बुढ़ापा एक तरह के सेब (pippin) के तरह होखे के चाँही जेहिमे आदमी के झुर्रीदार शरीर में से ओह तरह के सुगंध निकले के चाँही जेकरा के महसूस करके ओकर बेटा बेटी आश्चर्य आ गौरव से कह सको कि हमार माई आ बाबूजी पूर्ण जीवन जियले बा लोग। एह कविता में बुढ़ापा के वर्णन पढ़ के हमरा हिन्दी के वरिष्ट कवि अरुण कमल जी के पंक्ति अनायास इयाद आ गइल हs,“ न विवशता न थकान न स्यापा / हो, तो जिंदगी की नोक हो बुढ़ापा ।”

टैगोर अपना माई के स्नेह से कम उम्र में ही वंचित हो गइल रहले। उनकर कविता में माई के प्रति स्नेह के बहुत ही मार्मिक चित्रण रहेला। उनकर कविता “ I Cannot Remember My Mother”  में अपना माई के प्रति अइसन भावनात्मक लगाव के वर्णन बा जे पढ़ के पाठक महसूस करता कि माई मरला पर अमर हो जातारी। उ जब आपन पार्थिव शरीर त्याग देतारी तब आउर उनकर दायरा बढ़ जाता आ उ हवा में, फूल में, मौसम में, आकाश में सब जगह मौजूद बाड़ी।

सिल्विया प्लाथ के “डैडी” कविता बहुत प्रसिद्ध आउर विवादित बा जेहिमे उ अपना बाबूजी के एक नाजी अफसर के अइसन खाका खिचले बाड़ी आ होलोकॉस्ट के बारे में वर्णन बा। लेकिन उनकर एगो कविता “द  मॉर्निंग सॉन्ग” बा जेकरा में उ आपन गर्भावस्था के चित्रित कइले बाड़ी। गर्भावस्था पर उनकर एगो आउर कविता बा “ए रीडल इन नाइन सिलैबल्स” जे खाली metaphors में लिखल बा, जेकरा में उ महतारी बनेके पहिले के अनुभव के बहुत ही रोचक आउर प्रभावशाली ढंग से कहsतारी ।

अमेरिका के मशहूर कवि आउर कहानीकार एडगर एलन पो के कविता अपना माई पर ना लिखके अपना पत्नी के ममी पर लिखल बा, “टु माय मदर” ! एह कविता में उ देखावsतारे कि आदमी के आपन माई के अलावा कोई दूसरा के माई से भी भावनात्मक नजदीकी हो सकेला। 20 वीं सदी के अंग्रेजी के कवि फिलिप लारकिन के कविता “मदर, समर एण्ड आय “ इ देखावsता कि अपना बाबूजी के मरला के बाद लारकिन के अपना माई के प्रति बहुत निष्ठा हो गइल।

हम आपन लेख के फिलिप लारकिन के बात से ही खतम करे के चाहब जे 20 वीं सदी के एक महत्वपूर्ण  कवि रहले। हम अपना लेख के भूमिका में कारण बतवले बानी कि विश्व साहित्य (अपना भाषा के साहित्य भी ओहि में समाहित बा ) काहे पढे के चाँही। खाली उहे कारण ना हो सकेला, रउआ सभे आउर भी कारण बता सकीले ! अब सवाल उठsता कि साहित्य में कल्पना के रंग दे के माई बाबूजी के बारे में काहे लिखाइल बा ? का जरूरत बा लिखे के ? हमरा समझ से साहित्य में केवल “न मातुः परदैवतम्” आ “सर्वदेवमय: पिता” ही माई बाबूजी के बारे में लिखे के कारण ना हो सके! फिलिप लारकिन जे बात कहsतारें उ खाली कविता पर ही नइखे लागू होत, साहित्य के सब विधा पर लागू होता, “I am a।ways trying to ‘preserve’ things by getting other people to read what I have written, and feel what I fe।t.” अगर अइसन बात ना रहित तs शेक्सपियर के नाटक “किंग लीयर” में एक बूढ़ा बाप के आपन बेटियन द्वारा घर से बाहर ना कइल जाइत जे आज भी एक मिथक बन के प्रासंगिक हो जाइत। अगर अइसन बात ना रहित तs भिखारी ठाकुर के “गबरघिचोर” नाटक में गबरघिचोर के माई अपना विवेक, ममता आ करुणा के परिचय ना देती ! हर देश के समाज आ संस्कृति एही संवेदना के थाती के सँजो के रखे के प्रयास करेला जवना के महत्वपूर्ण हिस्सा में माई आ बाबूजी लोग बसेला।

( परिचय- डॉ. अनिल कुमार प्रसाद यमन, लीबिया आ सऊदी अरबिया  में अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक आ अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष रहल बानी।  हिंदुस्तान, मध्य-पूर्व, चीन, अमेरिका आ यू. के. में आयोजित अन्तराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेले बानी। अंग्रेजी में कविता, कहानी आ आलोचना के किताब प्रकाशित बा। अंग्रेजी, हिन्दी आ भोजपुरी में लगातार लिखत रहेनी । )


20210518_104418.jpg

Hum BhojpuriaAugust 13, 20211min3010

डॉ. कादम्बिनी सिंह

पापा के आ मम्मी के देख के इहे बुझाला की नाना के चुनाव केतना सही रहे, दुनू  लोग एकदम एकही अइसन विचार धारा के, दुनू लोग घर-परिवार के प्रति एकदम समर्पित!

ई बात लखनऊ में ओह घरी के ह जब हमनी के छोट रहीं सन। हम पढ़े गइल रहीं आ छोट भाई घरहीं खेलत रहे। ओह दिन भगवान जी दिनो तनी निमन कइले रहलें, आकाश साफ आ हवा ओतने सिहरावन कि बाउर ना लागे, मोटा मोटी बुझ लीं कि जाड़ केवाड़ी खटकावत रहे आवे खातिर! भाई अंगीठी से तनीये सा दूरिया बइठल रहे, आ मम्मी कुकर ओहि अंगीठी पर भात बने खातिर चढइले रही। अब का जाने का बात भइल रहे कि कुकरवा सिटिये ना देवे,आ भाई त छोट रहे ऊ निर्द्वन्द् होके ओहिजा खेलत रहे, तले अचानक इतना जोर से आवाज भइल कि बुझाइल कि दस गो बंदूक एक सङ्गे छुटली ह सन! हमरा स्कूल ले सुनाइल रहे।

कुकर त फाट गइल जेतना गरम भात ओमे रहे ऊ छत पर सटल जा के आ भाई के देह में जेतना भाग खुलल रहे, भात से जर गइल! ऊ आवाज से अइसन डेरा गइल कि सहम गइल रहे आ रोवत रहे खूब! मम्मी अकेले रहली। हमरा के स्कूल से बोलवा लेली। पापा के ऑफिस में कइसहूँ सूचना भेजवइली। पापा भागल गइलन। ओतना देर में मम्मी सब भात देह में से छोड़ा देली।

पापा पहुंच के तुरंत भाई के डॉक्टर किहाँ ले गइलन आ दवाई मिलते राहत मिले लागल भाई के अचरज के बात रहे कि जेतना जरल रहे ओतना फोकचा ना घिंचलस ! दवाई आ माई दुनू के मिलल जुलल असर के ओजह से!

हम त डेराइल रहीं कि कहीं पापा लापरवाही के इल्जाम मम्मी पर मत लगा देस आ खिसिआस। बाकिर पापा तनिको ना खिसिअइलन मम्मी पर। बल्कि अपना ओरी से इतना भाई के दुलार देलन की हफ्ता भर में ऊ ठीक होखे लागल। मम्मी रोये घबरा के, बाकि पापा के कबो उदास ना देखनी। हो सके कि लइकन के आगे ऊ ना देखावस आपन उदासी!

मां पापा के आपस के तालमेल आ नेह-स्नेह से घर में फेरू पहिले अइसन माहौल हो गइल। मम्मी से फेर कबो ओइसन चूक ना भइल।

ओकरा बाद अगिला दसहरा के मेला में रावण के जरल देखे खातिर सब लोग गइल। ऊ मेला हमनी के एसे पसंद आवे काहे कि ओजा माटी के खूब खेलवना मिले। ओह दिन मुड़ी हिलावे आली बूढ़ा बूढ़ी किन के ली अइनी सन आ खूब खेलीं सन, बूढ़ा-बूढ़ी के मुड़िया छू छू के। कइयों हाली मम्मी-पापा के ओह लोग से तुलना कइल जाओ कि जब तूं लोग बूढ़ हो जइबs  लोग त अइसही हर बतिया पर मूडी हिलावे के परी।

एही तरे खुसीहाली से हमनी के बड़ कइलस लो। हमनी के पढ़ा-लिखा के काबिल बनवलस लो। हमनी के तीनों भाई बहिन में संस्कार के बीज बोए वाला माँ पापा के अथाह खुसी मिलो।
ई ओही लोग के त्याग, समर्पण आ दीहल संस्कार ह कि हर मोड़ पर सब लोग एकजुट रहेला।

 


img1435.jpg

Hum BhojpuriaAugust 13, 20211min3020

ज्योत्स्ना प्रसाद

जन्मतिथि- 19 अक्टूबर 1927        पुण्यतिथि- 31 दिसम्बर 1989

‘अपि स्वर्णमयी लङ्का न में लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । । ’

ई कथन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के ह। एह कथन से ही ई बात प्रमाणित हो जाता कि सनातन धर्म आ भारतीय परम्परा में माता के केतना ऊँचा स्थान बा? बाकिर एकर अर्थ ई ना भइल कि माता के महत्त्व के कवनों धर्म-विशेष के चौहद्दी में बाँध के देखल जाव।  काहेकि प्राय: हर धर्म में माता के स्थान बहुत ऊँचा बा। मुस्लिम परम्परा में भी मानल जाला- ‘माँ के क़दमों के नीचे है जन्नत। ’ वइसे ही मरियम के बिना यीशु मसीह के कल्पना ही ना कइल जा सकेला। एह से हर धर्म में ही ना बल्कि जीव-जन्तु में भी अपना माता के प्रति विशेष लगाव देखल जाला। आखिर केहू के अपना माता के प्रति लगाव रहे काहे ना ? माता ही ऊ माध्यम हई जे ईश्वर-अंश के अपना गर्भ में धारण करेली, ओह अंश के कष्ट सहके भी शरीर प्रदान करेली। ओकरा दु:ख-सुख में शामिल होली। एह से कवनों बच्चा अपना सुख में महतारी के इयाद करे चाहे ना लेकिन दु:ख के छाया पड़ते ऊ सबसे पहिले अपना माई के ही इयाद करेला। एही से त महतारी के भगवान के दूसरा रूप भी कहल जाला।

हम अपना माई के अम्मा कहत रहनी। हमरा अम्मा शैलजा कुमारी श्रीवास्तव (जन्म- 19 अक्टूबर 1927- मृत्यु- 31 दिसम्बर 1989) के जन्म पिलुई, दाउदपुर, सारण (बिहार) के एगो सम्पन्न, शिक्षित आ प्रतिष्ठित परिवार में भइल रहे। उहाँ के प्रारम्भिक शिक्षा अपना गाँव में यानी पिलुई में ही भइल रहे जबकि माध्यमिक शिक्षा सीवान से भइल। चूँकि शैलजा जी के परिवार पढ़ल-लिखल रहे, उहाँ के बाबूजी उर्दू-फारसी-अरबी के शायर आ विद्वाने भर ना रहनी स्वयं एम. ए., एल. एल. बी. भी कइले रहनीं। एह से अपना बेटी के उच्च शिक्षा देबे खातिर उहाँ के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस भेजनीं। जहाँ से शैलजा जी स्नातक कइनीं आ साहित्याचार्य के परीक्षा-बिहार संस्कृत समिति से स्वर्ण पदक के साथे उत्तीर्ण कइनीं। जवना के बाद ही शैलजा जी दिघवलिया (सीवान) निवासी रसिक बिहारी शरण (एम. ए., एल. एल. बी.) के चौथा लड़िका (पाँचवीं संतान) श्री महेन्द्र कुमार (एम. ए., एम. काम., डीप. एड.) से परिणय-सूत्र में बँध गइनीं। बाकिर अपना शादी के बाद भी उहाँ के आपन पढ़ाई जारी रखते हुए पटना विश्वविद्यालय से डिप-एड कइनीं आ बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से संस्कृत में एम. ए. कइनीं।

शैलजा जी बिहार में शिक्षा विभाग के विभिन्न पदन के शोभा बढ़ावत अंत मे प्राचार्या, महिला प्रा० शिक्षक शिक्षा-महाविद्यालय, सीवान के साथे-साथे जिला विद्यालय निरीक्षिका, सारण-सह-सीवान एवं गोपालगंज के पद से 31-10-85 के सेवनिवृत्त हो गइनीं। शैलजा जी अपना घर-गृहस्ती आ नौकरी के साथे-साथे साहित्य-सेवा में भी सदा सक्रिय रहत रहनीं।  एकर प्रमाण ई बा कि सन् 1970 में उहाँ के पुरनका सारण जिला भोजपुरी साहित्य-सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष रहनीं त सन् 1972 में कानपुर भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में सचिव के पद पर चयनित भइनीं। सन् 1977 में उहाँ के अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के तिसरका अधिवेशन सीवान में स्वागत-समिति के संयुक्त सचिव के पद पर चयनित भइनीं। ऊहई उहाँ के अ. भा. भो. महिला साहित्य सम्मेलन 1977 के स्वागत मंत्री के पद के शोभा भी बढ़वनीं। सन् 1981 में तिसरका जिला महिला भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षता कइनीं।

शैलजा जी के साहित्य-सेवा के मद्दे नज़र उहाँ के सन् 1984 में साहित्य संचेतना द्वारा सम्मानित कइल गइल रहे। सन् 1990 में भोजपुरी निबन्ध संग्रह ‘चिन्तन कुसुम’ पर अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन द्वारा चित्रलेखा पुरस्कार से मरणोपरांत उहाँ के पुरस्कृत कइल गइल।

चिन्तन कुसुम (भोजपुरी निबन्ध संग्रह, 1981) के अलावा उहाँ के दू गो अउर प्रकाशित किताब लोकप्रिय भइल – कादम्बरी (वाणभट्ट के ‘कादम्बरी’ पर आधारित भोजपुरी में लिखल कथा, 2003) आ श्रद्धा-सुमन (भोजपुरी-हिन्दी-उर्दू कविता संकलन, 2016)।

गोरा रंग, मध्यम कद-काठी, सिन्दूर से भरल मांग, माथा पर बिंदी, कमर के नीचे तक लटकत एगो लम्बा चोटी या कभी जुड़ा बनवले, सिल्क या सूती साड़ी में सीधा पल्ला कइले शैलजा जी के देखते कोई सहज ही समझ सकत रहे कि उहाँ के सादगी के प्रतीक हईं।

शैलजा जी बचपन से ही प्रखर बुद्धि के रहनीं। उहाँ के मिडिल स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा में भी विशेषता के साथे उत्तीर्ण भइल रहनीं। पारिवारिक माहौल भी साहित्यिक रहे। बाकिर सीवान में ओह समय चूँकि लड़कियन के स्कूल ना रहे। एह से बुझाइल कि उहाँ के पढ़ाई में व्यवधान आ जाई। बाकिर अइसन भइल ना। काहेकि उहाँ के 1934 में डी.ए. वी. स्कूल सीवान में नाम लिखा गइल। शैलजा जी के कविता लिखे के क्षमता के एहसास पहिला बेर एही स्कूल में भइल। जब स्कूल में नशाखोरी के रोके खातिर कविता बनावे के छात्र-छात्रा से कहल गइल। शैलजा जी अपना ओही उमिर में जे कविता लिखनी ओकर बानगी देखीं-

ताड़ी दारू गाँजा भाँग पिअला के फल इहे, घरवा में खरची ना देहिया पर लुगवा

नाहीं जो तूँ मनब पिअल नाहीं छोड़ब त, उड़ि जइहें देह रूपी पिंजड़ा से सुगवा

बाकिर शैलजा जी के एह प्रतिभा में पर लागल उहाँ के बनारस अइला के बाद। इहाँ शैलजा जी के आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, पं. बदरीनाथ शुक्ल जइसन चोटी के लोगन से शिक्षा ग्रहण करे के अवसर मिलल। आज त ई बात सोचिए के हमनी रोमांचित हो जाइले कि शैलजा जी के निराला के कविता स्वयं निराला जी से पढ़े के अवसर मिलल रहे। एही के साथे सीवान के पं. नागेंद्रचार्योपाध्याय आ पं. कृष्णचंद्र झा के देख-रेख में शैलजा जी के पढ़ाई-लिखाई चले लागल। शैलजा जी के मेहनत रंग ले आइल आ उहाँ के साहित्याचार्य के परीक्षा में स्वर्णपदक प्राप्त भइल। पढ़ाई के क्रम में शैलजाजी पर संस्कृत के साहित्यकार लोगन के प्रभाव पड़ल। एही बात के पाण्डेय कपिल जी कहतानी- ‘शैलजा जी के अध्ययन के क्षेत्र व्यापक आ बहुवर्णी रहे, बाकिर संस्कृत साहित्य से उनका विशेष लगाव रहे। ऊ वाल्मीकि, कालिदास, हाल, माघ, शूद्रक, श्रीहर्ष, भवभूति, बाणभट्ट, जयदेव, भोज, मुरारि, बिल्हण आ पंडितराज जगन्नाथ के गहन अध्ययन कइले रहली।’ संस्कृत-साहित्य के एह शीर्ष के रचनाकार लोगन के अध्ययन-मनन करे के अवसर मिलला के नतीजा ई भइल कि शैलजा जी के गद्य में ही ना पद्य में भी संस्कृत के प्रभाव देखल जा सकेला। शैलजा जी के बारे में अक्षयवर दीक्षित जी लिखतानीं- ‘ई काव्य रचना बचपने से करत रहली। कविता के अलावे गद्य लेखन में ई खूब निपुण रहली। गद्यों में निबन्ध लिखे में इनका आनन्द आवे। इनका निबन्ध के संग्रह ‘चिन्तन कुसुम’ महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ बाटे। इनकर सबसे महत्त्वपूर्ण काम ई भइल जे बाणभट्ट के कादम्बरी-जवन संस्कृत साहित्य में कठिन भाषा के ग्रन्थ मानल जाला- के शैलजा जी भोजपुरी में सरिया-सरिया के, फरिया-फरिया के टुकड़न में कथा लिख दिहली। ई पुस्तक पढ़ि के केहू कादम्बरी के कथा समझ सकेला।’ उहाँ के आगे लिखतानी- भोजपुरी खातिर ऊ दिन सुदिन होई जब इनकर कविता संग्रह प्रकाशित होई।’

‘कादम्बरी’ के भूमिका में गोविन्द झा जी शैलजा जी के भाषा के ‘फुदकती-थिरकती-सी’ भाषा कहतानी। इहाँ के ‘कादम्बरी’ के बारे में लिखतानीं- ‘प्रस्तुत कादम्बरी भले ही बाणभट्ट की कादम्बरी की प्रतिच्छवि हो, पर इसकी छवि नि: सन्देह इसकी अपनी है- ऐसी छवि जो बाणभट्ट की महनीय देव-वाणी में नहीं, भोजपुरी- जैसी लोकवाणी में ही उतर और निखर सकती है। बाणभट्ट की कादम्बरी राज-दरबार के लिए है तो प्रस्तुत कादम्बरी जनता-दरबार के लिए। .. यह तो भोजपुरी की कादम्बरी न तो आज के कथा-साहित्य में रखी जा सकती है, न लोक-साहित्य में। विनम्र शब्दों में और निश्छल रूप में यह कादम्बरी की काया नहीं आत्मा है और इसी रूप में इसकी उपयोगिता है, इसकी पठनीयता है।’

‘चिंतन कुसुम के भूमिका में आ. विश्वनाथ सिंह लिखतानी- ‘शैलजा जी कवि आ कहानीकारो हई। इनका भोजपुरी-हिन्दी-कविता के कुछ नमूना उदाहरण का रूप में एह पुस्तक में जगह-जगह मिली। बाकी ई समझे में कवनो कठिनाई नइखे कि इनका व्यक्तित्व के प्रधान रूप अध्ययन, भावन आ चिन्तन का तंतुअन से बनल बा। शैलजा जी के अध्ययन के क्षेत्र काफी व्यापक बा। संस्कृत, अँगरेजी, उर्दू, हिन्दी आ भोजपुरी-काव्य के अनुशीलन के साथे-साथे एक ओर लोकगीतन का लालित्य से आ दोसरा ओर योग आउर भक्ति का आध्यात्मिक तत्वन से लेखिका के जवन समृद्ध मानस निर्मित भइल बा ओकर परिणत स्वरूप एह चिन्तन कुसुम मे मिलsता। इनका दार्शनिक अध्ययन का विस्तार में गीता, उपनिषद् अउर हठयोग, नादयोग से लेके बाइबिल तक के समावेश बा।’

पाण्डेय कपिल जी चिन्तन कुसुम के आमुख में लिखतानी- ‘चिंतन के अइसन फूल त पाण्डित्ये का गाछ पर फुला सकेला। शैलजा जी के विदुषी व्यक्तित्व के आयाम बहुत व्यापक बा। —एह विशिष्ट कृति खातिर श्रीमती शैलजा कुमारी श्रीवास्तव जी भोजपुरी-जगत के साधुवाद के पात्र बानीं।’

डॉ. रमाशंकर श्रीवास्तव काव्य-संकलन ‘अमराई’ में शैलजा जी के गीतन के मधुरता, प्रवाहमयी भाषा आ मनोहारी भाव-बिम्बन के सराहना करत लिखले बानी- ‘शैलजा जी मधुर गीतों की कवयित्री थीं । ’

प्रो. अनिल कुमार प्रसाद लिखतानीं- ‘..शैलजा जी का शब्द-चयन तो अद्भुत है ही लेकिन शब्दों की सरसता एवं लयबद्धता से जो उस कविता में संवाद के स्तर पर वातावरण तैयार हो रहा है वो उत्कृष्ट और काबिलेतारीफ है । ’

उर्दू और अंग्रेजी के प्रसिद्ध आलोचक डॉ. अफरोज अशरफी जी के मानना बा- ‘शैलजा जी अपनी कविताओं में न केवल बहुभाषी होने का प्रमाण देती हैं बल्कि जीवन के उस रंग को भी बधाई का पात्र समझती हैं जो बहार के हाथों से फिसल कर अपने दु:ख में समाया हुआ है। उनकी कविता निरंतर जीवन से की गई संवाद की कविता है। उन्हें ज़िंदगी से शिकवा भी है और चाहत के पायदान पर पाँव रखने का गिला भी। ’

शैलजा जी एगो प्रतिभाशाली रचनाकार रहनीं जेकरा भोजपुरी, हिन्दी आ उर्दू पर समान रूप से अधिकार रहे। उहाँ के गद्य-पद्य में सम्भाव से रचना करत रहनी। बाकिर कविता में इहाँ के बहुत मन रमत रहे। इहाँ के कविता के क्षेत्र बहुत व्यापक रहे। जवना के विषय प्राय: समसामयिक, पारिवारिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आ अपना कार्यक्षेत्र से संबंधित रहत रहे।  घर-परिवार में केहू के शादी-बिआह होखे त शैलजा जी एगो सेहरा जरूर लिखत रहनी।  अपना कार्यक्षेत्र में केहू के आगमन या विदाई समारोह होखे त शैलजा जी के स्वागत या विदाई गीत के बिना ऊ पूरा ही ना हो पावत रहे। इहाँ तक कि अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के ‘स्वागत गान’ ही ना ‘अधिवेशन तिसरका के शोर भइल बा’ भी ऊहें के लिखले रहनी जवना पर भइल एक्शन सौंग अधिवेशन के समय धूम मचा देहले रहे ।

शैलजा जी चूँकि स्वयं एगो नारी रहनी आ महिला कॉलेज के प्रचार्या भी रहनी एह से नारी के अनेक समस्या के नजदीक से देखे आ समझे के उहाँ के मौक़ा मिलल रहे। एही कारण से शैलजा जी के अनेक कविता में नारी के दर्द के यथार्थ चित्रण भइल बा। बाकिर एकर अर्थ ई ना भइल कि उहाँ के सिर्फ नारीवादी दृष्टिकोण रहे। समाज के जहाँ कहीं भी विद्रुप आ असामान्य घटना उहाँ के आँख के सामने से गुजरे, चाहे कोई अइसन बात जे उहाँ के चुभत होखे तब शैलजा जी के कलम चले लागे। एह से रायबरेली से राजनारायण से इन्दिरा गाँधी के हार पर उहाँ के कलम मौन ना रह पावल आ ना ही ओह समय ही रह पावल जब मोरारजी भाई के मंत्रि परिषद में कवनों महिला के मंत्री ना बनावल गइल। उहाँ के लिखतानी-

है जयप्रकाश का यह प्रकाश, पर प्रभा ‘प्रभा’ की क्षीण हुई

केन्द्रीय-मंत्री-परिषद-गरिमा, महिला विहीन श्रीहीन हुई

शैलजा जी समाज में नारी के प्रतिष्ठा पावे खातिर ओकरा के अपना मातृत्व के रक्षा के साथ ही शक्ति सम्पन्न भी देखे के चाहत रहनीं। एह से उहाँ के मान्यता रहे कि नारी के एह पुरुष-प्रधान समाज में छुई-मुई आ पुरुष के हाथ के कठपुतली बनला से काम ना चली काहे कि ‘क्लीवत्व उपासक’ दुनिया के ‘नामर्द’ बनावे में लागल बा। बाकिर नारी यदि अपना सहज गुण आ मातृत्व के साथ ही शक्तिशाली रही त समाज में पुरुष-वर्ग में ओकर अपमान करे के साहस ना हो पाई-

अधरों पर हो मुस्कान मगर आँखों में फिर चिनगारी हो,

हो एक हाथ में सृष्टि और दूजे में प्रलय कटारी हो

यह रूप तुम्हारा देख पुरुष अपमान नहीं कर पायेगा,

तुम माता बन जाओ तो जग संतान स्वयं बन जायेगा

अपना समाज में तिलक-दहेज एगो अइसन समस्या हो गइल बा जवना चलते कइगो घर बरबाद हो गइल। बेटिहा के घर-दुआर भी बेचा जाता, भाई-बाप सड़क पर आ जाता तबों ना बेटहा के लिस्टे पूरा हो पावता आ ना ही ओकर बेटी ओह घर में सुख से रह पायी एकरे कवनों गारंटी मिल पावता। एही विषय पर शैलजा जी के ‘दहेजवा’ शीर्षक एगो प्रसिद्ध कविता बा। ओकर बानगी रउओ देखीं-

 

पपिहा के बोली सुनि कसके करेजवा से,

फेरी-फेरी कर भिनसार रे दहेजवा

नैनन लाज अँसुवन धुली गइले से,

अरथी सजल मनुहार रे दहेजवा

चिटुकी सेनुर लागीं खुँटवे बन्हइली से,

सहलो ना जाला अब घात रे दहेजवा

नवल कुसुम रस भँवरा लोभइले से,

सेज सुन साले आधी रात रे दहेजवा

 

‘मृदुला-स्मृति’ शीर्षक कविता शैलजा जी अपना बड़ बेटी के असामयिक मृत्यु पर लिखले रहनीं। ई कविता भोजपुरी के संभवत: अकेला शोक-गीत ह। जइसे निराला के ‘सरोज-स्मृति’ के हिन्दी के एकमात्र शोक-गीत के गौरव प्राप्त बा वइसे ही ‘मृदुला-स्मृति के भी प्राप्त बा।  शैलजा जी के काव्य-संग्रह ‘श्रद्धा-सुमन’ के समर्पित भी उनकरे के कइल गइल बा ।

बिसरी ना सुरतिया तोहार मुरतिया झलकते रही

टूटी गइले मन के कगार नयनवा छलकते रही

खंडहर मनवा हमार जियरा दहकते रही

पुरल ना मनवा के आस करेजवा कसकते रही

शैलजा जी के काव्य-संसार बड़ा व्यापक रहे। जवना में प्रकृति-वर्णन, नायक-नायिका भेद, हृदय के भाव, ईश्वर से प्रार्थना, मुक्तक, ग़ज़ल, शोकगीत आदि ही सिर्फ़ ना रहे बल्कि ‘कविता चुराई हम कविजी कहाई ले’, चीट के भरोसा पर फारम भराइल बा, ‘कोर्ट-मैरेज’ जइसन विषय पर भी बड़ा रोचक आ मनोरंजक कविता भी बा।

शैलजा जी के ‘चिन्तन-कुसुम’ ग्यारहगो निबन्ध के एगो संग्रह ह। जवना में साहित्यिक आ आध्यात्मिक विषयन पर निबन्ध बा। एह संग्रह के अध्ययन-मनन से ही एह बात के एहसास हो जाई कि उहाँ के अध्ययन के क्षेत्र केतना व्यापक रहे। एह निबंधन में एक ओर उहाँ के जीवन के अनुभव बा त दोसरा ओर लोकगीतन के लालित्य बा। एह सब के बीच में योग-भक्ति आ दर्शन के ज्वार-भाटा भी रह-रह देखे के मिल जाई।

शैलजा जी के साहित्यिक निबन्ध में ई कहल गइल बा कि मनुष्य स्वभाव से ही सौंदर्यप्रेमी होला। एही सौंदर्यवृति के तृप्त करे खातिर अद्भुत प्राकृतिक-सौन्दर्य के रचना भइल बा। उहाँ के अपना निबन्ध में लीक से हट के अपना मैलिक चिन्तक होखे के गवाही भी देतानी।  भारतीय साहित्य में काव्यानन्द के ब्रह्मानन्द के सहोदर कहल गइल बा। जबकि शैलजा जी के मानना ई बा कि काव्यानन्द ब्रह्मानन्द से श्रेष्ठ बा। काहेकि काव्यानन्द ब्रह्मानन्द के तरह आत्मगत एवं संसार निरपेक्ष ना होके निर्वैक्तिक आउर जीवन सापेक्ष होला।

शैलजा जी के जीवन-दर्शन आध्यात्मिक बा। उहाँ के मानना ई बा कि जीवन के लक्ष्य ह बिंदु के सिंधु में मिलन, ब्रह्मानन्द के प्राप्ति आ सत्य के संसाधन। उहाँ के विचार से स्वाद आदमी के बहुत बड़ा शत्रु ह। आदमी के अपना इन्द्रिय के गुलाम ना होखे के चाही। काहेकि हमार ई भौतिकवादी अभिवृद्धि ही मानव के जबरदस्ती विनाश के ओर घसीट रहल बा।  जबले समाज के एह सोच में बदलाव ना आई हमनी के संतोष आ सच्चा सुख नसीब ना होई।

एह संतोष आ सुख खातिर आदमी के अपना धूरी के ओर लौटे के ही पड़ी। तबही हमार आ हमरा समाज के कल्याण होई। अन्यथा हम आपना लालसा के मकड़जाल में एह तरह से उलझत चलल जायेब कि ओह में से हमार निकलल असंभव हो जाई।

अंत में हम सिर्फ़ इहे बात कहे के चाहेब कि शैलजा जी ओह चंद रचनाकारन में से एक हईं जेकर रचना उहाँ के साहित्य के क्षेत्र में उभरला के साथ ही आचार्य शिवपूजन सहाय जइसन स्वनाम धन्य साहित्य-सर्जक के एतना प्रभावित कइलस कि उहाँ के आपना आशीर्वाद स्वरूप शैलजा जी के प्रोत्साहित करत उहाँ पर एक लेख लिख देहनीं।


img1411.jpg

Hum BhojpuriaAugust 13, 20211min3350

डॉ. राजेश कुमार ‘माँझी’

दुनिया के प्रत्येक इंसान के दिल में ओकरा माई-बाबूजी के छवि उम्र भर रहेला। सुख-दुःख के सब अवसर पर माई-बाबूजी के याद आवेला। माई-बाबूजी से जुड़ल बहुत सारा बात बा जवन हमरा भी दिल में बा। हमरा स्वर्गीय बाबूजी के नाम श्री रामदेव माँझी रहे आउर माई के नाम श्रीमती शिवकुमारी देवी हवे। हमार बाबूजी दिल्ली में महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड में लाइन इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत रहनी आ इंस्ट्रक्टर पद पर प्रन्नोत होके वर्ष 2005 में वीआरएस ले लेहनी आ अप्रैल 2012 में ब्रेन हैमरेज के चलते दिल्ली के एम्स में दम तुड़ देहनी। बाबूजी के स्वर्गवास के बाद अब हमरा सिर पर माई के ही हाथ रह गइल बा।

जब से हम होश संभलनी अपना बाबूजी के कुछ एक खूबी हमरा मन में  बइठ गइल। पहिला खूबी ई कि कवनो भी काम मन लगाके करे के चाहीं। दोसर खूबी जरूरतमंद के यथा संभव सहायता तन मन धन से करे के हम अपना बाबूजी से ही सीखनी। कुछ एक खूबी जवन हम ना सीख सकनी ऊ ह छोट मोट हाथ के काम– जइसे कि खटिया बुनाई, बढ़ईगिरी, घर के चूना-रंगाई के काम आउर खेत में मेहनत वाला काम इत्यादि जवना खातिर अफ़सोस बा। एगो आउर खूबी जवन हम ना सीख सकनी ऊ ह भोजपुरी देवी गीत, पचरा गायन, साँझा-पराती, राहू गीत, होली गीत, चइता, सोहर इत्यादि ।

भोजपुरी के समृद्ध वाचिक परंपरा के जानकारी हमरा अपना माई बाबूजी से ही मिलल। शादी बिआह के अवसर पर जवन मांगलिक गीत औरत लोग गावेला ओकर जानकारी भी हमरा केहू दोसर व्यक्ति ना बल्कि हमरा अपना माई से मिलल। भोजपुरी के वाचिक परंपरा अब आगे कहवां ले जाई एकरा बारे में हमरा बहुते संदेह बा। कारण ई बा कि जब हम खुदे भोजपुरी के समृद्ध वाचिक परंपरा के ना सीख सकनी त आगे के संतति का सीखी। डर ई बा कि भोजपुरी के समृद्ध वाचिक परंपरा के हमनी जा कहीं गवां ना दीहीं जा।

आज के दौर में ज्यादातर घर में पारंपरिक मांगलिक गीत के कवनो महत्व नइखे। महानगर में ही ना बल्कि गाँव देहात में भी कवनो शुभ अवसर पर फ़िल्मी गीत के शोर सुनाई देत बा । आज के मेहरारू लोग अपना सास, ददिया सास आदि से गीत गवनई सीखे से परहेज करत बा लोग। एगो आउर बात जवन मन में खलबली मचवले बा ऊ ई ह कि माई बाबूजी के बाद अधिकतर घर-आँगन में परिवार के आपस में जोड़के के रखी? आज देखेके ई मिलत बा कि एगो घर आँगन में भाई के भाई से नइखे बनत जवना के कारण अनेकानेक बा। एकही घर में आज दस दस को चूल्हा जलत बा। केहू के माई बाबूजी ई ना चाहेला कि ओकरा जिनगी में ही उनकर बच्चा लोग में जमीन जायजाद के चलते बंटवारा हो जाए, जवन आज अधिकतर परिवार में हो रहल बा। आज माई बाबूजी के प्यार तराजू पर तौलात बा। का एकरे के आधुनिकता आउर विकास कहल जाई ?

आज एकल परिवार में मानसिक अवसाद, एकाकीपन आदि देखल जा सकेला जवन कि संयुक्त परिवार में कबो सुने के ना मिलत रहे। कोरोना जइसन वैश्विक महामारी आज फेर से संयुक्त परिवार के अहमियत देश दुनिया के बता देले बा। दुनिया में पइसा के बल पर सब कुछ संभव नइखे। पइसा से परिवार के प्यार ना ख़रीदा सकी। पइसा से केहू अपना माई बाबूजी आउर घर-परिवार के सदस्य लोग से शुभकामना आ सुख समृधि के आशीष ना खरीद पाई।

आज जरूरत ई बा कि परिवार के सदस्य एक दोसरा पर विश्वास करे, एक दोसरा के धोखा ना देबे, एक दोसरा के सुख दुःख में मन से शामिल होखे आ सहयोग करे ना कि देखावा खातिर।  माई बाबूजी ऊ छायादार गाछ होखेला लोग जेकर छाया सब बच्चा लोग पर एक जइसन मिलेला जइसे कि सूर्य-किरण। का हमनी के नवही पीढ़ी अपना अपना माई बाबूजी जइसन ऊ छायादार गाछ ना बन सकेनी जा जवना से प्रेरित होके हमनी के भावी पीढ़ी में भी ई गुण प्रसारित हो सके।

एकरा आलावा आज समय के इहो मांग बा कि हमनी जा अपना अपना माई बाबूजी से भोजपुरी के समृद्ध वाचिक परंपरा के सीखीं जा आउर आज जरुरत इहो बा कि माई बाबूजी के मधुर कंठ से जवन किस्सा कहानी, गीत, भजन, सोहर, झूमर सुनेके मिलत बा ओकरा के रिकार्ड कइल जाए आ ओकरा के लिपिबद्ध कइल जाव।

ए दिशा में हम अपना माई के मुख से उच्चारित कुछ मांगलिक गीत के रिकार्ड, लिपिबद्ध आ अनुवाद करे के शुरू कर देले बानी ताकि दुनिया के बता सकीं कि हम अपना माई बाबूजी से का सीख पइनी। बाबूजी के लिखल एगो कॉपी हमरा लगे थाती स्वरूप बा जवना में राहू पूजा से संबंधित गीत बा। बाबूजी के लिखल राहू पूजा के गीत त हमरा लगे बा जवना के हम पढ़  सकेनी पर कवना तरह से गावल जाई ई हम अपना बाबूजी से ना सीख सकनी जवना के अफ़सोस जिंदगी भर रही। एही कारण हम चाहत बानी कि रउवा लोग भी अपना अपना माई बाबूजी से भोजपुरी के समृद्ध वाचिक परंपरा के सीखीं। कोरोना महामारी के दौर में माई बाबूजी से परिवार के एक साथ बांध के रखे के गुण भी आज सिखल जरूरी महसूस हो रहल बा। देर भइला पर कहीं माई बाबूजी के साथे समृद्ध परंपरा के अंत ना हो जाए।


20210518_062209-COLLAGE-1.jpg

Hum BhojpuriaAugust 13, 20211min2200

गीता चौबे गूँज 

लड़कपन के भी का दिन रहे! ना कवनो चिंता, ना फिकिर आ ना कवनो जवाबदेही। बस मस्ती के दिन आ चैन के नींद। खा-पिअ, खेल आ सुतऽ। तनी-मनी टहल-टिकोरा केकरो कऽ दऽ आ फेन छुट्टी…। ओही लइकाईं के एगो अइसन  घटना भइल जवन हमरा के आत्मनिर्भर बनावे में मील के पत्थर साबित भइल।

ई बात ओह समय के ह जब हम करीब आठ-नौ बरिस के होखब। हमरा इयाद बा हम तीसरा क्लास में पढ़त रहीं। पढ़े-लिखे के अलावा आउर कवनो काम ना रहे। हमार माई के अपना लइकिन के पढ़ावे के खूब सवख रहे, काहे कि उनका पढ़े के ना मिलल रहे। एह से ऊ आपन सपना आपन बेटी लोग के पढ़ा के पूरा कइल चाहत रही। स्कूल जाए से पहिले रोज एक घंटा सबेरे आ स्कूल से अइला प रात के भोजन से पहिले दू घंटा पढ़े के नियम बनवले रही। ऊ अकेले सब खाएक-पानी बनइहन। कतनो अकाज होत रही बाकी हमनी के पढ़ाई प से उठे ना दिहन।  भिनसहरा से ले के रात गइला तक अकेले खटत रहिहन आ एहि में हमार चोटी करे के भी  टाइम निकाल लेत रही।

तब हमार केश खूब लंबा आउर घना रहे। जे देखत रहे से हाह मारे लागत रहे कि ‘अरे बाप रे! हती गो लइकी के हते-हते बार…!’

सभके मुँह से अइसन बात सुन के हमरा बड़ी खीस बरे आ डरो लागे कि कतहूँ नजर ना लाग जाए। एह से हम आपन बार कबो खोल के ना रखत रहीं। हरदम रिबन से दू गो चोटी जवना के ऊपरे मोड़ के फुदेना लगा दियात रहे… ओइसहि माई से बँन्हवा लेत रहीं। जाह दिन स्कूल ना जाए के रहत रहे ओह दिन चोटी ना खुले। शनिचर के बान्हल चोटी सोमारे के खुलत रहे। काहे कि अपने बान्हे ना आवत रहे आ माई के एतवार के फुर्सत ना रहत रहे। माई कहस कि स्कूल जाहिं के नइखे त बार का खोले के बा।

भोरे-भोरे रोज के भागाभागी घर-घर के कहानी रहबे करेला। कोइला के एकछिया चूल्हा प खाना बनत रहे। भोरे-भोरे माई उठ के घर बहार के चूल्हा लीपिहन आ दाल-भात तरकारी, भुजिया आउर बाबूजी के रोटी ( बाबूजी रोटी-भात दूनो खात रहीं ) बना दिहें। कबो-कबो हमरा पढ़े में मन ना लागी त पूछब कि ए माई कुछ करवावे के होखे त कहऽ, हम मदद क देब। बाकी ऊ जान जइहन कि ई पढ़े से बचे खाती बहाना बनावतिया। तुरंत कहिहन कि तू जा, हम कऽ लेब।

बाबूजी के साढ़े नौ बजे कवलेज जाए के रहत रहे आ हमनी के चारों भाई-बहिन के स्कूल जाए के। पहिले ए गो बाथरूम रहत रहे। पारा-पारी लाइन लागले रहत रहे। आपन चोटी गुँथवावे खातिर हम माई के पीछे-पीछे चलत रहब। बाबूजी के खाएक दे के माई हमार चोटी गूँथ देत रही। बाबूजी के ओड़ावन माँगे से पहिले हमार चोटी गुँथा जात रहे। माई के अफरातफरी कतनो रही बाकि ऊ आतना सलीका आ धीरज से सभ काम करिहन कि सभ काम शांति से बेरा प हो जात रहे।

ओह दिना हम स्कूल के गृहकार्य करे में तनिका देर कऽ देनी। बाबूजी के खाएक दे के माई कहली कि जल्दी आव तोर चोटी गुँथ दीहीं। बाकि हमार काम खत्म ना भइल रहे। हम कहनी कि तू ओडावन दे लऽ हम ककही ले के आवतानी। माई ओड़ावन दे के बाबूजी के पंखा हाँके लगली। हम ओहिजे ककही ले के चल गइनी कि ओड़ावन दे लेलू त हमार चोटी गुँथ द। चोटी जब गुँथा गइल त हम झहरा के जइसहीं खड़ा भइनी लाम बार के गुच्छा उड़ के बाबूजी के थरिया में। अब त हमरा कटले खून ना। बाबूजी के थरिया में एके कौर बचल रहे बाकी बार गिरला प केकरो मन घिना जाई। बाबूजी के थरिया छन्नाक से भूइंया पऽ फेंकाइल आ  बाबूजी के दहाड़ अइसन लागल कि कान के पर्दा फाड़ दीही…

“कईंची कहाँ बा रे? ले आव तऽ… अबहिं एकर बार काट के फेंक दे तानी। ना रही बार, ना गुँथाई चोटी…।”

हमार बड़का भइया तुरंत कईंची ले के हाजिर हो गइलन। भइया के हाथ में कईंची देख के हम चलनी पराय। पलंग के नीचे घुस गइनी। देरी तक हमरा कान में बाबूजी के डाँट सुनाई देत रह गइल। एही चक्कर में कवलेज के देरी हो गइल त माइयो के खूब डाँट पड़ल कि लइकिन के माथा प चढ़ा के रखले बाड़ी। बबुआ बना के रखले बाड़ी।

ओह दिन हम स्कूल ना गइनी आ ओकरा बाद बाबूजी के खाए के बेरी कबो उनका सोझा ना गइनी आउर आपन बार अपने से बान्हे के सीख लेनी। शुरू-शुरू में टेंढ़ बांगुच बन्हात रहे बाकी कुछे दिन में खूब नीमन बँन्हाए लागल। ओकरा बाद हम बारे बान्हल का, आपन दोसरो काम अपने से करे लगनी।  हमरा बड़ी ग्लानि भइल कि हमरा चलते माई के डाँट पड़ल।

एह घटना के सकारात्मक प्रभाव पड़ल कि हम पढ़ाई के साथे साथे माई के काम में हाथ बँटावे  लगनी। बाद में सभे खूब चिढ़ावे कि एके डाँट में आत्मनिर्भर बने के मिसाल आउर कतहूँ ना मिली।



About us

भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


Contact us



Newsletter

Your Name (required)

Your Email (required)

Subject

Your Message