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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min630

लेखक- विनय बिहारी सिंह

तीन गो एकदम सांच आ रोचक घटना हमनी के भोजपुरिया समाज के लौह पुरुषता के उदाहरण बाड़ी सन। अइसे त अनगिनत घटना बाड़ी सन, बाकिर आजु तिनिए गो प्रेरक घटना पढ़ीं।

 पहिला घटना

उत्तर प्रदेश के बलिया जिला के कौनो गांव के घटना ह। लइकाईं में ई घटना सुनाके हमार ईया (दादी) सीख देसु कि कौनो प्रण कइला के बाद पीछा ना हटे के चाहीं आ अपना दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर प्रण कइल काम पूरा क देबे के चाहीं। ईया घटना बतावत का घरी ईहे कहसु कि दक्खिन का ओर एगो गांव रहे। ओइजा एगो मंदिर बनावे के प्लान बने आ कौनो ना कौनो कारन से रुकि जाउ। जमीन तक तय हो चुकल रहे। एह गांव में एगो परम भक्त आदमी रहले जिनकर नांव लोग साधु जी रखले रहे। उनुकर असली नांव से ज्यादा पुरुब टोला के साधु जी बड़ा प्रसिद्ध रहे। त मंदिर के प्लान बने आ रुकि जाउ। साधु जी अचानके एक दिन प्रण कइले कि जब तक मंदिर ना बनी, हम अन्न ना खाइब। एह प्रण का बाद ऊ सबकरा से मंदिर खातिर चंदा बटोरे लगले। भोजन में ऊ कबो आलू उबाल के खा लेसु त कबो कंद- मूल। कबो दही त कबो दूध। नाम मात्र के मजदूरी लेके मंदिर बनावे खातिर दू गो मजूरन के साधु जी तय क दिहले। मंदिर के नींव खोदा/कोड़ा गइल। कौनो ईंटा के भट्ठा वाला मालिक उनुका के एक हजार ईंटा दे दिहलस। नींव डला गइल। मंदिर बने शुरू हो गइल। एही बीच में साधु जी के मलेरिया हो गइल। मंदिर के काम रुकि गइल। काहें से कि दोसर केहू मंदिर बनावे में साधु जी जतना सक्रिय ना रहे। मलेरिया उग्र रूप ले लिहलस आ साधु जी के टायफाइड हो गइल। बोखार में ऊ का जाने का बड़बड़ासु आ देह तावा नियर जरे। लागल कि साधु जी मरि जइहें। जब तनी बोखार कम भइल त डॉक्टर कहलस कि मांस- मछरी खाईं। अनाज खाईं, तब देह में ताकत आई। बाकिर साधु जी कहले कि मरि जाइब बाकिर आपन प्रण ना छोड़बि। बेमारी में गांव के सक्षम लोग उनुकरा पर रुपया- पइसा खरच करेके तेयार रहे लोग। तीन महीना ले मृत्यु से लड़ाई कके साधु जी जीत गइले। आखिर ले ऊ अन्न टच ना कइले। दूध- दही आ फल के बल पर स्वस्थ हो गइले। मांस- मछरी उनुका खातिर आजीवन निषिद्ध चीज हो चुकल रहे। मंदिर त छोटहने बनल बाकिर ओकरा बने में दस साल लागि गइल। ओमें भगवान शिव के स्थापना भइल। गांव के लोग कहल कि साधु जी ओह मंदिर के पुजारी बनसु। साधु जी विवाहित रहले। उनुकर पत्नी भी सरल, सहज आ साधु स्वभाव के रहली। जब गांव के लोग आपन जिद्द ना छोड़ल त साधु जी बात मान लिहले। मंदिर के पुजारी बनि गइले बाकिर मंदिर बनला का बादो ऊ अनाज ना खइले। कहसु कि अब त अनाज का ओर ताकहूं के मन नइखे करत। बिना अनाज के जीए के आदत परि गइल बा। सचहूं मलेरिया से ठीक भइला का बाद साधु जी फेर बेमार ना परले। अनाज छोड़ला का बाद उनुकर चेहरा में का जाने कइसे निखार आ गइल। नब्बे साल के उमिर ले जियला का बाद अंतिम सांस लिहले।

  दोसरकी घटना-

हम बलिया रेलवे स्टेशन पर भोर में उतरनी आ अपना बड़ भाई का घरे जाए खातिर एगो रिक्शा कइनीं। रिक्शा वाला बड़ा धीरे- धीरे चलावत रहे। हम रिक्शा वाला के कहनीं- अरे भाई तूं रेक्सा चलावतार कि बैलगाड़ी? एतना धीरे- धीरे चलबs त घरे हम दुपहरिया खान पहुंचब। रिक्सा वाला जवान लइका रहे, कहलस- जी बाबू। आ पैडल पर पैर मरलस त ठक दे बाजल। हम हैरान। पैर मरला पर ठक दे त बाजे ना। ओकरा गोड़ का ओर तकनी त हमार छाती धक्क दे हो गइल। ई का? रिक्सा वाला के एगो गोड़ के जगह पर डंटा/लाठी बांन्हल रहे। हमरा बड़ा अफसोस भइल। अपना पर ग्लानि भइल। ओह रिक्सा वाला के एकही गोड़ रहे। दोसरका गोड़ जांघ तक रहे। ओही जांघ में डंटा बान्हि के ऊ रिक्सा चलावत रहे। हम ओकरा से पुछनी कि तोहार गोड़ कइसे कटाइल? रिक्सा वाला कहलस कि ओकरा गोड़ में गैंगरीन हो गइल रहे, एही कारन से गोड़ काटे के परल। कहलस- “हमरा घर में हम बानी आ हमार माई बिया। आय के कौनो साधन नइखे। खाए- पीए आ माई के दवाई खातिर धन चाहीं। ओही खातिर हम रिक्सा चलावतानी।” हम त अपराध बोध से चुप रहनीं। घरे पहुंचि के ओकरा के बीस रुपया का बदला चाली गो रुपया देबे लगनी बाकिर रिक्सावाला बीस रुपया लौटा दिहलस। कहलस कि रउरा से त बीसे रुपया किराया तय भइल रहल ह। त हम चालीस रुपया काहें लेब। हमरा पर दया मत देखाईं। बस राउर प्रेम बनल रहो, ईहे चाहीं। रिक्सावाला पढ़ल- लिखल रहे। अगिला दिने ओकरा के खोजे निकललीं बाकिर फेर ओकरा से हमार भेंट ना भइल।

   तिसरकी घटना-

ओह घरी ट्रेक्टर के नांव बहुते कम लोग सुनले रहे। आजकाल नियर ट्रेक्टर से खेत जोतल आम घटना ना रहे। रबी के फसल बोआई के समय रहल। तले एगो किसान के बैल मरि गइल। किसान के नांव रहे अयोध्या। अयोध्या के चिंता भइल कि खेत कइसे जोताई? रबी के फसल कइसे बोआई? अयोध्या सबका से बैल मंगले। बाकिर सबका आपन खेत बोए के रहे। त बैल के उधार दी। पहिले आपन खेत बोई कि बैल उधार दी। एक दिन रात खान अयोध्या प्रण कइले कि पूरा तीन बीघा/बिगहा खेत फरुहा/फावड़ा से कोड़ देब। अगिला दिने फरुहा लेके खेत कोड़े शुरू कइले अयोध्या। लोग हंसे आ कहे कि पागल भइल बाड़े अजोध्या। आरे आधा कट्ठा, एक कट्ठा के बात रहित त कौनो बात रहल ह। ई तीन बिगहा खेत कइसे कोड़िहें। बाकिर अयोध्या सबकर बात अनसुना कके खेत कोड़े लगले। आ उनुका धुन के प्रणाम बा कि 15 दिन में तीन बिगहा कोड़ि दिहले। अब जे फरुहा भा कुदारी/कुदाल चलवले नइखे ऊ का जानी कि खेत कोड़े में कतना कठिन परिश्रम के जरूरत बा आ कतना एनर्जी लागेला। कहाला कि खेत कोड़ला पर हाड़ के पसीना निकलि आवेला। हाड़ से पसीना एगो मुहावरा ह। त एतना कठिन काम कके अयोध्या हंसते हंसत खेत के बो दिहले। ओकर विधिवत सिंचाई क दिहले आ उनुकर रबी के फसल लहलहाए लागल। आसपास के गांव में शोर हो गइल कि अयोध्या त लोहा के आदमी बाड़े। उनुकर मुकाबला के करी।

ई तीन गो कहानी सुनि के आजुओ हमार मन जुड़ा जाला। हम आजकाल अइसन कौनो लौह पुरुष के नइखीं देखत जौन एहतरे के उदाहरण मनुष्य के सामने राखत होखे। पहिले के लोग उदाहरण राखि देत रहल ह। मीडिया में आवे के ओकर कौनो इच्छा ना रही। बस हम आपन प्रण पूरा क दिहनी, एही के खुशी ओकरा खातिर पर्याप्त रहल ह। आजकाल त सुनाता कि बिना कौनो पराक्रम के ही लोग चाहता कि हमार नांव होजा, यश होजा। अइसना लोगन के अपना पुरनियन से सीख लेबे के चाहीं। लोहा बने खातिर एह लोगन के उदाहरण काफी बा।


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डॉ. अन्विति सिंह

गुजरल दिन के कुछ-कुछ घटना अइसन ह जवन अकसरहे चेहरा पर मुस्कान लिया देवेला आउर  याद अगर अम्मा, पापा आ मामा के तिकड़ी के होखे त सोने प सुहागा। ऊ लोग के सब याद हमार अनमोल थाती ह। जेतना बेर याद करीले ओतना बेर हम ओह समय के यात्रा क लेवेनी।

जाड़ा के दिन में अक्सर उहाँ के माने कलकत्ता के याद आवेला काहे कि मामा जाड़ा हमेशा उहवें बितावस। हावड़ा पंहुच के अम्मा के साथ मिलते मामा एकदम निश्चिन्त आ बेफिकिर हो जात रहले।

सुबह सवेरे मामा चौक के एगो चक्कर लगा अइहें आ मंदिर प धीरे से मिठाई के डिब्बा रख दीहें। अम्मा जब पूजा करे पंहुचिहें त डिब्बा देखते मामा के देखिहे। मामा हँसे लगिहें आ कहिहें,  “तहरा ठाकुर लोग के भूख लागल होई, भोग चढ़ा द।”

अम्मा हमार अपना ठाकुर लोग के बर्तन के लेके एकदम सजग रहेली। चमचमात रहें के चाहीं हमेशा। जब मामा देखिहें कि ऊ पूजा के बर्तन धोअतारी त कहिहें ,”अभी जूठ लागल बा, तनी ठीक से धोऊ !” आ अम्मा ‘बे भईया’ कह के हंसे लगिहें। भाई बहिन के ई चुहलबाज़ी एक सबेर से रात ले चलते रही। एह पूरा समय में मामा केतना बेर अम्मा के कहत होइहें, “तोरा कुछ बुझाला, बुरबक !” एकर केहू  अंदाज़ा नइखे लगा सकत।

सबसे जादा ई अम्मा तब सुनिहें जब ऊ मामा के खाना चाहे नाश्ता करावत रहिहें। जेकरा के भी अम्मा खाना परोस के खियवले बाड़ी ऊ जानेला कि अम्मा के संतोष ना होला। उनका पता ना काहे हमेशा ई लागेला की खाए वाला अधपेटे  खाता। एही मारे खाना परोसते जाली। माने अम्मा जेतने खियावे में तेज मामा ओतने कम खाए वाला। कहल जा सकेला कि उहाँ का चिरई लेखा चुगत रहनी खाना। अम्मा कम खियइहे ना, एकाध रोटी चाहे दो मुठ्ठा भात थरिया में बेसी डलबे करिहें,  त बस सुनिए एकही डायलॉग तोरा कुछ बुझाला!

एही तरे हम्मर छोट बहिन अधिकतर रूसले रहेली। घर के कवनो ना कवनो कोना में रूस के बइठले रहेली। मामा उनकर नाम देवता रखले रहले। देखते कहिहे, “अब आज देवता काहे रुसल बाड़ी?”

दिन दुपहरिया केहू आ जाए बेधड़क भोजन पर नेवत दिहे, ओकरा बाद आ के धीरे से पूछिहे, दू लोग क खाना हो जाइ नू? बाकी जवाब के कब्बो इंतज़ार ना कइले होइहेँ। काहे कि पूछला के बाद भी ऊ पुरा निश्चिंत रहिहें कि इहो कवनो पूछे वाला बात रहल ह। बिल्कुल हो जाई!

भलही मामा के कर्मभूमि दिल्ली रहे। कलकत्ता में भी उनकर दोस्त मित्र के कमी ना रहे। जबले उहाँ का कलकत्ता रहीं, रोज शाम के कहीं कवनो आयोजन रही,  ना त घरवे लोगन के जमावड़ा रही।

बाहर जब भी जाए के होई, उनकर कोशिश रही कि पापा भी उनकरा संगे जास। मामा एगो त चिरई चुरमुन लेखा खाए वाला रहले ऊपर से उ एकदम सादा भोजन खाएवाला रहले। बेसी मसालेदार सब्जी त पापा भी ना खात रहलें।

त होखे ई कि मामा के सब्जी अलग बने आ सभकर वाला सब्जी में भी मरिच मसाला तनी हाथ रोकिए के डालल जाओ। एक बार मामा आ पापा दुन्नों जने कहीं निमंत्रित रहे लोग रात के भोजन प। हमनी के तनी सुतारे मिलल त तय कइनी जा कि आलू गोभी मटर टमाटर के एकदम चटपटा मसालेदार तरकारी आ पूड़ी खाइल जाव। तरकारी बनला के बाद ओकर रंग एतना अच्छा लागल कि मुंह में पानी आ गइल। सोचनी जा कि जल्दी से पुड़ी छानल जाव आ पेट पूजा कइल जाव। तबले केहू घंटी बजइलस। गेट खोले के जिम्मेदारी हमरे रहे। भाग के जइसे गेट खोलनी, सामने पापा आ मामा! देखते हमरा एक्के बात बुझाइल कि ई लोग बिना भोजन पानी कइले आइल बा लोग। अभी बेचारा लोग गेटवो ना पार कइले होई लोग तबले हम खुद के तसल्ली देवे खातिर पूछ लेनी, “पापा खाना खइबs लोग का?

बुझला पापा कवनो बात पर चिढ़ल रहले। एकदम्मे से खिसिया के बोलले “ई कवन पूछे वाला बात ह, खाइम जा ना? पापा इतना पिनक के बोललें कि जवाब देवे के हिम्मते ना भइल कि कहीं, तंहs लोग खाना बनावे से मना कइले रहलs  लोग।

हमार त पसीना छूट गइल ई सोच के कि अब का होई। ई लोग लायक कुछ बनल नइखे आ अइसन कुछ हइयो नइखे जवन हाली से बन जाए। बजारे जा के सब्जी लियावे के समय रहे ना। अम्मा से कहती त उहो डटबे करती। काहे कि ऊ हमसे कहले रहली सब्जी लियावे के, हमहीं मना क दिहले रहनी।

ई सब लोग के डांट से बचे के इहे उपाय सूझल कि आंगन के पपीता बाबा के शरण में जाइल जाव। रात के समय रहे। पपीता बाबा से माफी मंगनी आ एगो पपीता तोड़ के ले अइनी। जल्दी-जल्दी काट-कूट के कूकर में छौंक दियाइल कि जल्दी बन जाव। लेकिन अभी एगो आउर दिक्कत रहे। हमनी के खीर भी न बनइले रहनी जा।

एके चम्मच सही,  मामा खीर जरूर खात रहनी, खजूर के गुड़ वाला। जो खाना परोसाइल आ मामा खीर मांग दिहें तब ? फेर अम्मा डांटी। अम्मा के डांट में कवनो त अइसन बात रहे कि बचे के उपाय खुद ब खुद सूझ जाए।

बस हम का कइनी जे दूध खउला के ओहमे गुड़ आ इलाइची पाउडर डाल दिहनी आ दिन के बचल भात अच्छा से मिला के ओही में डाल देनी। भाभी के ए उपाय प तनी शक रहे। हम कहनी कुछ ना रहला से बढ़िया बा कि कुछ रहे। अभी आपन इज़्जत बचइला में भलाई बा। एतना जल्दी हमनी के उ लोग लायक भोजन के इंतज़ाम कइले रहनी जा कि अपना पर गर्व महसूस होखे लागल रहें। लेकिन लाख उपाय क ल जब किस्मत में डांट सुनल लिखल रही त पड़बे करी। आ पड़ल जबरदस्त डांट। अम्मा से ना बाकी मामा आ पापा से।

भइल ई कि मामा अपना तरकारी के साथ सभकर वाला तरकारी भी मांग लेस। एही से जब तक उहां का कलकत्ता रहीं हमनी के मरीचा वरिचा तनी कम्मे डाली जा। बाकिर ओह दिन त सब कुछ तनी जम के डलले रहनी जा। आ रोज लेखा ओहू दिन मामा मांग लेले। हम ना नुकूर करते रह गइनी। के सुनता। कहबो कइनी कि तनी तीत बन गइल बा। तब्बो नाई सुननी उहां का। का करतीं, दे देनी। …आ ओकरा बाद जवन डांट सुननी। बाप रे बाप। भगवान बचावस। दुन्नो जने एक्के साथ बोलत रहे लोग। आ दुनो जने के संगे दिक्कत ई कि ऊ लोग आ कुच्छुओं  बोले लोग, जे सुनी ऊ हंसबे करी। त हम त चुपचाप मुस्कुरात रहनी आ अम्मा आपन अलग राग अलापत रहली कि  “जब कहले रहल  लोग कि खा के आवे के बा त बिना खइले काहें आ गइल ह लोग? “अम्मा जेतने बोलस ओतने हमके हंसी आवे आ  उ दुन्नो जने के ओतने खीस बरे। पापा के त नाक प गुस्सा रहेला बाकी हम मामा के खीस पहिला आ अंतिम बार देखले रहनी। बाद में पता चलल कि उ लोग के खीस केहू और के रहल जवन हमरा प निकलल रहे। अम्मा अगला दिन मामा के भात के खीर के भेद  भी बता दिहली। ओकरा बाद त मामा जब्बे खीर देखिहे कहिहे, “भात के खीर ना नू ह ?”


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केशव मोहन पाण्डेय

जब कवनो लेखक अपना निजी अनुभव के ईयाद क के कवनो मनई, घटना, वस्तु चाहें क्रियाकलाप के बहाने लिखेला त उ सब पाठक के मन से जुड़ जाला। पाठक अपना देखल-सुनल-भोगल समय-काल में ओह चीजन के, बातन के, जोहे-बीने लागेला। संस्मरण एगो अइसनके विधा ह, जवना के पढ़ के पाठक लेखक के लेखनी से एकात्म हो के जुड़ जाला।

उत्पत्ति के आधार पर देखल जाव त संस्मरण शब्द ‘स्मृ’ धातु में सम् उपसर्ग आ ल्युट् प्रत्यय के मिलला से बनल बा। एह तरे से एकर शाब्दिक अर्थ सम्यक् स्मरण होला। माने पूरा तरे से कवनो आदमी, घटना, दृश्य, वस्तु आदि के आत्मीयता आ गम्भीरता से कइल वर्णने संस्मरण ह।

कहल गइल बा कि संस्मरण सबसे लचीला साहित्य-विधा ह। संस्मरण के ढेर गुन साहित्य के ढेर विधा-शैली में रचल-बसल मिलेला। सुभावगत ई मिलेला कि रेखाचित्र, जीवनी, रिपोर्ताज आदि अउरियो साहित्यिक रूपन के छाँक संस्मरण में मिलेला। माने बात ई कि ईयाद के आधार पर कवनो विषय पर चाहें कवनो व्यक्ति पर लिखाइल आलेख संस्मरण कहाला। यात्रा-साहित्य एही के अन्तर्गत आ जाला। वइसे ढेर विद्वान लोग संस्मरण के साहित्यिक निबन्ध के एगो रूप मानेला लोग।

विकिपिडिया के मानी त हिंदी में संस्मरण के साहित्यिक रूप में लिखे के प्रचलन आधुनिक काल में पछिमी प्रभाव के कारण भइल बाकिर हिन्दी साहित्य में संस्मरणात्मक आलेखन के भरपूर विकास भइल। हिंदी में पहिला संस्मरणात्मक आलेख सन् 1905 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के ‘अनुमोदन का अन्त, अतीत स्मृति’ मिलेला। ओकरा बाद 1907 में काशी प्रसाद जायसवाल जी के ‘इंग्लैंड के देहात में महाराज बनारस का कुआँ’ 1907 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के ‘सभा की सभ्यता’ मिलेला बाकिर आजु एहिजा हम बात भोजपुरी में संस्मरण लेखन पर आपन बात राखे के प्रयास करत बानी। हमरा पता बा कि हमरा अल्पज्ञान के कारन ई प्रयास सूरूज के दीया देखावल बा, बाकिर बहाना अइसन समृद्ध मंच बा त बात राखहीं के पड़ी।

अब बात कइल जाव भोजपुरी में संस्मरण लेखन के। एह बारे में लिखे खातिर कुछ खोजबीन में लागल रहनी। ओही खोजबीन में ‘इग्नू’ के एगो प्रपत्र मिलल – ‘इकाई-दू, भोजपुरी भाषा आ लिपि’। 13 पेज के एह प्रपत्र के पाँचवा पेज पर जब हम गइनी त एगो उपशीर्षक रहे – ‘आधुनिक काल में भोजपुरी के विकास’।1 एह में लिखल बा कि ‘डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय आधुनिक भोजपुरी साहित्य के आरंभ 1875 ई. से मनले बानी आ लिखले बानी कि आधुनिक भोजपुरी साहित्य के प्रारंभिक काल (1885 ई. – 1920ई.) में एह भाषा में विशेष रचना उपलब्ध नइखीसन।’ ……. ओही में आगे लिखल बा कि ‘जइसन कि बतावल गइल बा कि ‘उक्तिव्यक्तिप्रकरण’ में भोजपुरी गद्य के पुरान नमूना मिलेला। एकरा बाद राजाज्ञा, सनद, पत्र आ दस्तावेजन में भोजपुरी गद्य के नमूना मिलेला। बाकिर आजादी के बाद भोजपुरी गद्य आपन विकास तेज गति से कइलस। आजादी के पहिले भोजपुरी के गद्य विधा में कुछ नाटक जरूर लिखाइल रहल बाकिर भोजपुरी उपन्यास, कहानी, निबंध, जीवनी, संस्मरण आदि के भरपूर लेखन आजादी के बाद भइल।’

कहल जाला कि भोजपुरी भाषा के इतिहास लगभग दस हजार बरीस से बा। अइसन पुरान भाषा में गद्य के विकास 1947 के बाद भइल। ओह में संस्मरण जइसन सरस आ मनलुभावनो विधा बा। एकरा बाद हम आपन ज्ञान बढ़ावे खातिर हमरा नजर में भोजपुरी के जीवंत इनसाइक्लोपिडिया आदरणीय डॉ. ब्रजभूषण मिश्र जी से बात कइनी। बात में डॉ. जयकांत सिंह ‘जय’ सर के किताब ‘भोजपुरी गद्य साहित्यः स्वरूप, सामग्री, समालोचना’ के चर्चा भइल। ओह किताब में जय सर कथेत्तर भोजपुरी गद्यन में चर्चा करत फिचर, शब्दचित्र आ संस्मरण आदि के चर्चा कइले बानी।

बात कइला पर भोजपुरी में संस्मरण लेखन के जतरा के बारे में पता चलल कि शुरुआती दौर के बात कइल जाव त पं. गणेश चैबे जी के किताब ‘भोजपुरी प्रकाशन के सै बरिस’ में उहाँ के ‘संस्मरण आ जीवनवृत्त’ नाम से एगो खंड बनवले बानी जवना में ओह घरी, माने 1983 में आठ गो किताब के चर्चा कइले बानी। जीरादेई के सदासत, आश्रम दत्त, राधामोहन राकेश के बा जवन कि राजेन्दर प्रसाद पर केन्द्रित बा। ‘गांधी यात्रा’ 1969 में निकलल, जवना में गांधी जी से संबंधित कविता चाहे उनकर चंपारण सत्याग्रह आदि के चर्चा बा। आचार्य महेंद्र शास्त्रीः व्यक्तित्व और कृतित्व 1971 में प्रकाशित भइल। ओहमें कइगो संस्मण शमिल बा। ‘आजादी के हलचल’ उमादत्त शर्मा के किताब ह। एहमें स्वतंत्रता संग्राम के संस्मरण के रूप में प्रस्तुत कइल गइल बा। गया से प्रकाशित होखे वाला ‘नवकल्प’ में आचार्य महेंद्र शास्त्री से जुड़ल कइगो संस्मरण छपल बा। देवरिया से छपल सदानंद स्मृति ग्रंथ, ओहू में स्वामी जी के व्यक्त्वि से संबंधित संस्मरण बा। सन 1977 में संत कुमार जी के एगो किताब बाबू राजेंद्र प्रसाद पर आइल, उहो संस्मरणात्मके बा। मोतिहारी के साँवलिया विकल जी के किताब ‘तरपन-अरपन’ में भोजपुरी के दिवंगत पुरोधा लोग पर संस्मरण बा। डी एन राय के ‘यादन के खोह में’ भोजपुरी लोककलाकार लोग पर केंद्रित संस्मरण के किताब बा। ‘स्मृतांजलि’ डॉ. शिव हर्ष पाण्डेय जी के संपादन में छपल संस्मरण के किताब ह।

आदरणीय डॉ. ब्रजभूषण मिश्र जी अपना बात में कहनी कि ‘भोजपुरी में संस्मरण विधा में ई सब कुछ के अलावा और किताब छपल बा बाकिर ढेर नइखे।’ ई बतिया सुन के हमार मन बइठ गइल। सोचे लगनी कि भाषा आ साहित्य के नाव पर सबसे ढेर हाल्ला भोजपुरिए में सुनाला-लउकेला आ ओहमें सबसे मनोरम विधा संस्मरण के हेतना अकाल। हम एगो बात साफ क दीं कि हमके व्यक्तिगत रूप से संस्मरण विधा बहुत प्रिय आ रोचक लागेला। वइसहीं कहल जाला कि बितल बात ईयाद अइला पर मन बेचैन हो जाला। संस्मरण बितले के त लिखल रूप ह। अपना जिनगी में सभे कबो ना कबो, कवनो ना कवनो अइसनका व्यक्ति से मिलल रहेला चाहें बेरा से गुजरल रहेला कि ओकर खट-मीठ ईयाद आवते रहेला। ओहि के त साहित्यिक रूप से लेखन संस्मरण विधा हऽ। संस्मरण लिखे खातिर कवनो अभ्यास आ अध्ययन के गरज ना पड़ेला। समय के साथे बहत कवनो काल-खंड में मिलल-गुजरल कवनो आदमी, अथान चाहें घटना के ईयाद कऽ-कऽ के लिखल संस्मरण ह। अइसन संस्मरण लेखन में सबसे ढेर मौलिकता रही। तनी सोंझो-टेढ़ रही त का हऽ, आपन रही, मौलिक रही। कहले जाला, घीव के लड्डू टेढ़ो भला।

भोजपुरी में संस्मरण अबहिनो लिखात बा, बाकिर किताब रूप में बहुत कम आवत बा। भोजपुरी के संस्मरण लेखन के गति, मति आ स्थिति के जाने खातिर हम प्रो. अर्जुन तिवारी जी के ‘भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ देखे लगनी। ओह किताब में पेज नंबर 387 से ‘संस्मरण’ के बारे में बतावल बा। पन्ना पलटे लगनी आ मन तनी चाकर होखे लागल। ओहमें सबसे पहिले संस्मरण के कुछ उदाहरण दिहल बा जइसे कि श्री रवींद्र श्रीवास्तव ‘जुगानी’ जी के लिखल संस्मरण ‘फिराक गोरखपुरी: हमार बाबा’ के कुछ अंश बा। 2 अगिला संस्मरण गीतपुरुष पं. हरिराम द्विवेदी जी के लिखल ‘जनकवि रामजियावन दास बावला’ 3  के प्रस्तुत कइल गइल बा। ओकरा बाद के संस्मरण सूझ-बुझ के संपादक श्री कृपाशंकर प्रसाद के लिखल ‘रेस के घोड़ा थथमलः मैना अब ना बोली’ बा। 4  जब हम अगिला संस्मरण पढ़नी त मन भरि गइल। अगिला पेजवा पर आदरणीय डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय जी के लिखल ‘हमार सिराज भाई’ संस्मरण के चर्चा आ कुछ अंश बा। जनाब सिराज अहमद अंसारी जी के नेह-छोह हमरो पर बरसल बा। सेवरही में श्री आर डी एन श्रीवास्तव सर आ डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय जी के आशीष से हम ‘संवाद’ संस्था के संयोजन करीं। हर महिना में दूसरका शनिचर के एह संस्था के गोष्ठी होखे। साहित्य से सदा स्नेह करे वाला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सिराज साहब लगभग सगरो गोष्ठी के अपना उपस्थिति से ऊँच बना दीं। एह संस्मरण के पढ़ि के थोड़ि देर ले हमहूँ थथम गइनी। वइसे ई संस्मरण ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ के 2007 के अंक 27 (संस्मरण अंक) में छपल रहल। एह बात के पता आदरणीय डॉ. अरुनेश नीरन सर आ आदरणीय डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय से बात कइनी त चलल। पाण्डेय सर के लगे ई अंक बाटे, से ओह अंक में छपल अउरियो संस्मरण के पता चलल। ऊहाँ के लगभग 16 पेज के फोटो खींच के हमके ह्वाटस्एप्प कइनी। कुछ के नाव देखीं- पाण्डेय कपिल जी के लिखल ‘भोजपुरी के भाषिक अस्मिता के उद्घोषक: डॉ. उदय नारायण तिवारी’, आचार्य रामदरस मिश्र जी के लिखल ‘बिकाऊ पंडित’, प्रो. रामदेव शुक्ल जी के लिखल ‘सुगना के आखिरी पयान’, गिरिजाशंकर राय ‘गिरिजेश’ जी के लिखल ‘समय के शिला पर’, अनिल कुमार पाण्डेय जी के ‘जुझारू जनकवि: आचार्य महेंद्र शास्त्री’, प्रसिद्ध कहानीकार मिथिलेश्वर जी के लिखल ‘जब लिखे शुरु कइनी’, विनय बिहारी सिंह के ‘कइसे भुलाईं कलकत्ता के ऊ दिन’, सतीशचंद्र भास्कर जी के ‘मस्ताना कवि श्याम जी’, रमाशंकर श्रीवास्तव जी के ‘भादो चउथ चाँदनी’, श्री रविकेश मिश्र जी के ‘गगन घन घेरि आई कारी बदरिया’, सतीश त्रिपाठी जी के ‘सरकारी तंत्र आ अजीज खाँ पठान’, अनिल ओझा ‘नीरद’ के ‘खरवा खोंटत, पनीया पीअत’, भगवती प्रसाद द्विवेदी के ‘भिखारी ठाकुर के जनमभूइँ’, पद्मभूषण विन्देश्वर पाठक जी के ‘सुलभ आंदोलन के कहानी’, पं. हरिराम द्विवेदी जी के ‘जिनगी के उछाह के कवि कैलाश गौतम’, प्रसिद्ध कथाकार कृष्ण कुमार जी के ‘लइकाईं के मइल आ माई के गइल’ के अलावा प्रेम प्रकाश पाण्डेय जी के ‘मम्मा के बुझउवल’, अनिरूद्ध त्रिपाठी अशेष जी के ‘साक्षात तुलसी से भेंट’, रवीन्द्र श्रीवास्तव ‘जुगानी’ जी के ‘फिराक गोरखपुरी: हमार बाबा’, जगन्नाथ त्रिपाठी जी के ‘जिनगी क पुरनका पन्ना’, सुनील सरीन के ‘युवानीति वाला ऊ दिन’ आ सुरेश त्रिपाठी के ‘हमके राजा से का काम’, ई सब संस्मरण ओह अंक के शोभा रहल आ अब भोजपुरी में संस्मरण लेखन के थाती बा। 5

‘भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ में विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सतीश त्रिपाठी जी के लिखल ‘पाताललोक से बहुरि के’ यात्रा-संस्मरण के अंश बा ओकरा बाद प्रगतिशील विचारधारा के पोषक जनकवि विजेन्द्र अनिल पर अविनाश नागदंश जी के संस्मरण के अंश प्रस्तुत कइल गइल बा। ई सगरो स्वतंत्र संस्मरण बा ना कि किताब के रूप में। एह सब के बाद तीन गो किताबन के नाव प्रस्तुत कइल गइल बा। सन् 1975 में छपल उमादत्त शर्मा जी के ‘आजादी के हलचल’, 1982 में छपल साँवलिया विकल जी के ‘तरपन-अरपन’, 2002 में छपल शारदानन्द प्रसाद जी के ‘सुरता के पथार’ बा।

संस्मरण पर तइयार करत एह लेख के सिलसिला में हम भोजपुरी साहित्य के एगो ई-ठेहा ‘भोजपुरी साहित्यांगन’ के वेबसाइट पर गइनीं। ऊँहा जा के मन में तनी स्थिरता आइल। ओहिजा हमके संस्मरण के पाँच गो किताब मिलल। ‘हमहूँ माई घरे गइनी’ डॉ. आशा रानी लाल के यात्रा-संस्मरण हऽ, जवन सन् 2001 में भोजपुरी विकास मंडल, सिवान के ओर से छपल रहल। सन् 2013 में पाण्डेय कपिल जी के किताब ‘घर आ बाहर’ भोजपुरी संस्थान पटना से छपल रहे। जवना में यात्रा-संस्मरण आ लेखो के संकलन बा। ‘पड़ाव’ डॉ. प्रभुनाथ सिंह जी के लिखल ‘भोजपुरी कहानी, संस्मरण आ ललित निबंधन’ के ई संकलन के प्रकाशन 2004 में विश्व भोजपुरी सम्मेलन, दिल्ली के ओर से भइल रहे। शारदानन्द प्रसाद जी के ‘सुरता के पथार’ भोजपुरी संस्थान पटना से 2002 में छपल रहल। राजीव रंजन सिंह ‘हिंमांशु’ जी के संस्मरण संग्रह ‘पंच दर्शन’ जवना में यात्रा-कथा बा, सन् 2002 में छपल रहल।

जइसन कि पहिलहूँ कहल बा, यात्रो साहित्य संस्मरणे में आवेला। एकर कारण हमरा ई लागेला कि इहो इयादे पर, स्मरणे के आधार पर लिखाला। डायरी लेखनो त ईयादे पर होला। ताजा प्रकाशित भइल डॉ. रामरक्षा मिश्र जी के डायरी नीक जबुन में पढ़ि के ई बाति पोढ़ हो जात बा। भोजपुरी में संस्मरण लेखन के जाने खातिर हमके ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ के 32 वाँ अंक मिलल जवन यात्रा विशेषांक रहे आ 2014 में छपल रहे। देखि-पढ़ि के अच्छा लागल। ओहमे भोजपुरी के समृद्ध-समृद्ध साहित्यकार लोग के रचना पढ़े के मिलल। ओह अंक आदरणीय डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय जी के ‘राजस्थान में दस दिन’ के अलावे पाण्डेय कपिल जी के ‘आगरा दर्शन’, अंतर्राष्ट्रीय दीदी सरिता बुधु जी के ‘हमार बिहार यात्रा: चंपारण के पुकार’, प्रो. रामदेव शुक्ल जी के ‘धरती आ किसान के मन एक्के बा इहाँ से उहाँ ले’, श्री बलराम पाण्डेय जी के ‘मारीशस: सिन्धु में बिन्दु’, आदरणीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी के ‘गया: आत्मा के मुकुती के धार्मिक पड़ाव’, डॉ. रविकेश मिश्र जी के ‘सातों बहिनियन के देश’, परिचय दास जी के ‘भाषा के जीभ से चखत’, सत्यदेव त्रिपाठी जी के ‘किन्नौर प्रांतर में छह दिन’, चंद्रदेव यादव जी के ‘जहाँ पाँव रूके वहीं पड़ाव’ आ डॉ. प्रेमशीला शुक्ल जी के ‘समुन्दर जी, समुन्दर’ यात्रा-संस्मरण के अलावे अनिल ओझा नीरद जी के ‘पुरुरवा के यात्रा कथा’, अनिरुद्ध त्रिपाठी ‘अशेष’ के ‘शहीदन के महातीर्थ में सात दिन’ आ सुरेश्वर त्रिपाठी जी के ‘देवरिया ताल के रोमांचक यात्रा’ छपल बा। 6

एतना छानबीन के बाद एतने पवला पर मन तनी दुखी भइल काहें कि एहू सब में ढेर स्वतंत्रे संस्मरण रहे, किताब के रूप में कम। एही में ईयाद पड़ल कि ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ के अठरहवाँ अंक में विवेकी राय जी के लिखल ‘का हो गइल गाँव के’ छपल रहे। कबो एही के प्रेरणा से हमहूँ लिखले रहनी ‘हमार गँउवा बदलि गइल बा’। तऽ ओह संस्मरण में विवेकी राय जी अपना गाँव सोनवारी के ईयाद करत लिखले बानी।

मन धीरे-धीरे हरिहराए लागल कि गँवे गँवे सहीं, भोजपुरी भाषा में पहिलहूँ संस्मरण लिखात रहल बा, आजहूँ लिखात बा। समय के साथे आजु भोजपुरी के फलक ढेर बढ़ल बा। ई साँच बा कि जेतना फलक बढ़ल बा, ओतना भोजपुरी में कथेत्तर गद्य के बढंती नइखे भइल। नइखे भइल त का, ई बड़ा प्रसन्नता के बात बा कि अब खूब होत बा। हमार संस्मरण ‘एगो त्रिवेनी ईहवों बा’ सन् 2012 में पहिला बेर ‘अँजोरिया’ में आ बाद में ‘भोजपुरी पंचायत’ में छपल रहे। ‘बरम बाबा’ आखर में आ ‘साँस-साँस में बाँस’ ‘भोजपुरी पंचायत’, ‘भोजपुरी संगम’ आ ‘भोजपुरी साहित्य सरिता’ में छपल रहल। अइसहीं भोजपुरी के कालजयी पत्रिका ‘पाती’ के लगभग हर अंक में संस्मरण छपत रहेला। कुछ उदाहरण देखीं – अंक 87 में डॉ. रामदेव शुक्ल जी के ‘ऑक्सफोर्ड युनीवर्सिटी में एक दिन’  7  यात्रा-संस्मरण बा त अजय कुमार जी के ‘एगो बैंकर के डायरी’ 8  ललित संस्मरण बा। पाती के अंक 90 में श्री आनन्द दुबे जी के लिखल ‘लूटल नीमन ना हऽ’  9   छपल बा आ अंक 91.92 में तीन तरह के संस्मरण छपल बा। श्री आनन्द दुबे जी के यात्रा-संस्मरण ‘यात्रा आ आस्था’, स्थान-संस्मरण के श्रेणी में श्री गुलरेज शहजाद जी के ‘संत कबीर आ चंपारन’ के सथवे स्मरण के रूप में आदरणीय डॉ. ब्रजभूषण मिश्र जी के ‘पं. गणेश चैबेः भोजपुरी लोक के सौन्दर्यशास्त्री’ छपल बा। स्मरण पर लिखइला के कारन हम एहके संस्मरणे के श्रेणी में राखे के धृष्टता करत बानी। आदरणीया डॉ. सुमन सिंह के ‘पगलो आजी’ पाती के 88 वाँ अंक में छपल रहल। सर्व भाषा ट्रस्ट से प्रकाशित भइल ऊहाँ के ‘हूक-हुँकारी’ किताब में छपल ‘मउगा चाचा’, ‘जादूगरी’, आ मनतोरना फुआ आदि ढेर समृद्ध संस्मरण पाठक लोग के सामने पढ़े खातिर उपलब्ध बा, जवन भोजपुरी संस्मरण विधा के समृद्धि के ओर आस बन्हावत बा। एकरा सथवे श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के दू गो संस्मरण ‘बुढ़िया माई’ आ ‘अवघड़ अउर एगो रात’ आ एगो यात्रा संस्मरण ‘एगो रोमांचक यात्रा’ भोजपुरी पंचायत में हमके पढे़ के मिलल रहल। एह सब से मन में ई विश्वास हो गइल कि अनगिनत लोग संस्मरण लिखत आ छपत होई।

भोजपुरी संस्मरण के बात करत में केदारनाथ सिंह जी के संस्मरण ‘हिंदी भुला जानी’ आ गोपेश्वर सिंह जी के लिखल ‘भोजपुरी के पहिलका सोप ओपेरा लोहा सिंह’ जवन हिंदी समय पर प्रकाशित बा, आपन उपसिथति दर्ज करइबे करी। सथवे आदरणीय मार्कण्डेय शारदेय जी के ‘डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव’ आ ‘पाण्डेय कपिल’ पर लिखल संस्मरण अपने आप में भावात्मक महत्व के बा।

भोजपुरी के बात, विचार, व्यवहार, संस्कार, गीत, संगीत से ले के ढेर भोजपुरिया लेखक लोग ढेर कुछ लिखले बा, संस्मरणों में ओकर उपयोग कइले बा, हो सकेला कि भोजपुरियो में संस्मरण लिखले होखे, हमरा पता नइखे, हम नाम नइखीं ले पावत, ओह खातिर क्षमा। बस पहिले मन जे तरे दुखी रहे, अब आह्लादित हो गइल बा कि भोजपुरियो में संस्मरण लेखन सदा से होत रहल बा, होत बा। आगहूँ होत रही। रउरा सब से हमार दसोनोह जोड़ के निहोरा बा कि मन में कवनो बितल व्यक्ति या वस्तु-अथान के ईयाद के भाव आवे, विधा ना समझ में आवे त चुपचाप माई सरस्वती के गोड़ लागीं आ लेखनी उठा के लिखल शुरू क दीं। राउर उ लेखनी असली मौलिक होई आ भोजपुरी साहित्य के संस्मरण के थाती समृद्ध करी।

संदर्भः

  1. ‘इग्नू’ प्रपत्र/ इकाई-दू, भोजपुरी भाषा आ लिपि/2.2.3 आधुनिक काल में भोजपुरी के विकास
  2. भोजपुरी साहित्य के इतिहास/डाॅ. अर्जुन तिवारी/ पृष्ठ 387.388
  3. उहे/ पृष्ठ 388.390
  4. उहे/ पृष्ठ 390.391
  5. पाती/अंक-87/ पृष्ठ 20.24
  6. पाती/अंक-87/ पृष्ठ 25.28
  7. पाती/अंक-90/ पृष्ठ 39.40
  8. समकालीन भोजपुरी साहित्य/अंक-27
  9. समकालीन भोजपुरी साहित्य/अंक-32

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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min1540

शशि प्रेमदेव

एही धरती का कवनो कोना में एगो देस रहे। ओह् देस में एगो नगर रहे — तमाम छोट-बड़  मकान-दोकान से भरल-पूरल। आ ओही मकानन-दोकानन का बीच से बहत रहे एगो उदास नदी। कुछ आबादी नदी के एह् पार। कुछ ओह पार।

नगर का ओह पार वाला हिस्सा में एगो परम पावन इमारत रहे। ओह इमारत में वइसे तs रोजे कुछ लोगन कs आवा-जाही रहे बाकिर हर हफ्ता जुमा (शुक्रवार) का दीने उहंवां एकही किसिम के भेसभूसा वालन क भीड़-भाड़ खास तौर पर दिखाई देव।

एह इमारत कs- जहवां जुटे वालन में एकहू औरत जात कब्बो ना लउके- सबसे बड़का अदिमी के उनकर समर्थक लोग ‘मौलाना’ कहि के पुकारत रहे।

संजोग से नदी के एह पार भी एगो परम पावन इमारत मौजूद रहे — तनी भिन्न किसिम कs ! बाकिर उहंवां जुमा के ना, अकसरहा मंगर आ सनीचर का दिने लोग जुटत रहलन- एके लेखा भेसभूसा में ना, मनचाहा भेसभूसा में! आ खलिसा नरे ना, नारी लोग भी !

एह इमारत क सबसे पूजनीय अदिमी के केहू ‘स्वामी जी’ तs केहू ‘महातमा जी’ कहि के पुकारत रहे।

ओही नगर में एगो ढींठ परिंदो क वजूद रहे। ओह परिंदा के जेतना मनोरंजक एह इमारत का भीतर होखे वाला प्रवचन लागत रहे, ओतने मजेदार ओह इमारत का भीतर होखे वाला प्रवचन ! जब-जब ओकरा के मन बहलावे कs कवनो दोसर जोगाड़ ना भेंटाव, ऊ कब्बो एह पार वाली इमारत पर जाके बइठि जाव, कब्बो ओह पार वाली इमारत पर …

एक दिन क बाति हs । परिंदा जसहीं ओह पार वाली इमारत के छरदेवाली पर जाके बइठल, मौलाना साहेब क गूंजत आवाज ओकरा कान में परल — ” हजरात ! हमारा मज़हब सबसे महान है … इंशाअल्लाह एक दिन सारी कायनात में सिर्फ़ हमीं होंगे … ग़ैर मज़हब वाले इन दिनों ख़ुद ब ख़ुद हमारे मज़हब की तरफ़ खींचे चले आ रहे हैं … कुछ दिनों पहले हमें पंजाब में एक बंदा मिला जिसने हाल ही में इस्लाम अपनाया था … जब मैंने उससे इसकी वज़ह जानना चाहा, तो उसने बताया कि उसकी जवान बहन मर गई थी … जब चिता पर उसे जलाया जा रहा था, तो यह देखकर उसे बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई कि कफ़न के जलते ही उसकी बहन का जवान जिस्म नंगा हो गया और आस-पास खड़े लोग उसे फटी आंखों से निहार रहे थे… इसलिए उसने वहीं तय कर लिया कि ऐसे बकवास धर्म से आइंदा कोई वास्ता नहीं रक्खेगा जिसमें पर्दानशीं बहन-बेटियों की लाशें इस शर्मनाक तरीके से जलायी जाती हों.”

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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min1580

प्रो. (डॉ.) जयकान्त सिंह जय

‘ भाषा ‘ के ‘ भासा ‘ लिखल देख के बिदकी जन। भोजपुरी के उचारन के दिसाईं इहे सही बा। भोजपुरी में भाषा के भासा बोलल आ लिखल जाला। काहे कि ई बैदिक परम्परा से आइल देसी प्राकृत भासा ह। प्राकृत मतलब बोले भा उचारे के प्रकृति आ प्रवृत्ति के हिसाब से लिखाए वाली ना, लिखाए वाला भासा। कवनो भासा में लिंगो ओह भासा-भासी जनसमूह के बेवहार से तय होला जइसे-संस्कृत के पुलिंग ‘आत्मा’ हिन्दी में स्त्रीलिंग हो जाला। हिन्दी के स्त्रीलिंग ‘चर्चा’ आ ‘धारा’ उर्दू में पुलिंग हो जाला। खैर, इहाँ बात होत रहल ह भाषा आ भासा के, त ऋग्बेद के 7/7/4 आ 8/23/5 में ‘अभिख्या भासा बृहदा ‘ क के प्रयोग भइल बा आ भाषा चाहे भासा ‘ भाष् ‘ चाहे ‘ भास् ‘ धातु से बनल बा। जवना के अर्थ होला- ब्यक्त वाक् मतलब समुझे-बूझे जोग बोलल। संस्कृतो में लिखल बा कि ‘ भास् व्यक्तायां वाचि।’ एह से भोजपुरी में भाषा के भासा चली। अइसहूं भोजपुरी के उचारन में अकसरहाँ जुड़वा ब्यंजन के बेवहार ना होला चाहे होइबो करेला त संस्कृत आ हिन्दी के प्रभाव से होला, ओही तरह से भोजपुरी में  ण, श आ ष के जगे न, स आ ख के उचारन होला। जवना के बारे में आगे बात राखल जाई। अबहीं असली मुद्दा मातृभासा के बा।

भोजपुरी हमार मातृभासा ह, मात्र भासा ना ह। मातृभासा मतलब हमरा आ हमरा मतारी द्वारा अपनावल हमरा पैतृक परिवार आ पड़ोस के कम से कम तीन-चार पीढ़ी के पारंपरिक संस्कार-पारिवारिक बेवहार के भासा। हमरा जिनगी के ऊ पहिल भासा,जवन हम अपना मतारी के गर्भ में पलात-पोसात छठे-सतवाँ महीना से सुभद्रा के अभिमन्यु जइसन महसूसे लगनीं आ जनम लिहला के बाद मतारी आ परिवार-पड़ोस के गोदी में तुतरात ‘तूती’ के रूप में पाके अबोध से सबोध भइनीं। सबोध भइला के बाद जिनगी के ओही पहिल भासा के जरिए आगे के जीवन सुखमय जीये खातिर आउर-आउर भासा के सिखनीं, पढ़नीं, लिखनीं आ अपनवनीं। एह तरह से बाद के अरजल हर उपयोगी भासा के मातृभासा भइल हमार भोजपुरी। एह तरह से हमरा खातिर भोजपुरी भासा हमरा अरजल हिन्दी, संस्कृत, अंगरेजी आदि हर भासा के मातृभासा बा।

साँच कहीं त पुरान भारतीय वाङ्मय में ‘ मातृभासा ‘ जइसन कवनो सब्द नइखे। ई अंगरेजी का ‘मदरटंग’ के हिन्दी अनुबाद ह। ऋग्वेद का एगो ऋचा में कहल गइल बा – ‘ इला सरस्वती मही तिस्त्रो देवीर्मयोभुव:। ‘ पच्छिम के बिद्वान एकर अंगरेजी में उल्था कइलें – ‘ वन शुड रेस्पेक्ट हिज मदरलैंड, हिज कल्चर एंड हिज मदरटंग, बिकौज दे आर गिभर्स ऑफ हैप्पिनेस।’ ( One should respect his motherland, his culture and his mothertongue, because they are givers of happiness.

एह अनुबाद में ‘ सरस्वती ‘ मतलब ‘ बानी ‘ खातिर ‘ मदरटंग ‘ माने मातृभासा सब्द के पहिला बेर प्रयोग भइल। बच्चा का मतारी के भासा के मातृभासा कहल गइल। जवना से कई गो सवाल खड़ा हो गइल; जइसे- जदि बच्चा के जनम देते ओकरा मतारी के मृत्यु हो जाए तब ओह बच्चा के मातृभासा का होई?, बच्चा का मतारी के मातृभासा ओकरा बिआह के पहिले ससुरार का परम्परागत पारिवारिक भासा से अलग होखी तब ओह बच्चा के मातृभासा का होई? आदि। तब पच्छिम के भासाविद् लोग कहल कि बच्चा के मतारी, बाप सहित ओकरा परिवार आ पड़ोस के परम्परागत बेवहारिक बोली भा भासा के ही ओह बच्चा के पहिल भासा, निज भासा, स्वभासा भा मातृभासा कहल जाई। जवना में ऊ बच्चा तुतरात अबोध से सबोध होखी आ ओही सीखल-अरजल पहिल पारिवारिक भासा के माध्यम से जीवन-जगत से जुड़ल जानकारी अउर दोसर भासा सबके बोले, पढ़े आ लिखे के काबिल बनेला। एह से ओह बच्चा के उहे परम्परागत पारिवारिक भासा ओकर मातृभासा कहाई। एकर पच्छिम के बिद्वान लोग अंगरेजी में कहल- ” द टर्म ‘ मदरटंग ‘ शुड बी इंटरप्रेटेड टू मीन दैट इज दि लैंग्वेज ऑफ वन्स मदर। इन सम पैटर्नल सोसाइटीज, दि वाइफ मूव्स इन विथ द हस्बैंड एंड दस मेय हैव ए डिफरेंट फर्स्ट लैंग्वेज, ऑर डायलेक्ट, दैन द लोकल लैंग्वेज ऑफ द हस्बैंड, येट देयर चिल्ड्रेन यूजुअली वनली एस्पीक देयर लोकल लैंग्वेज। ऑनली ए फ्यू विल लर्न टू एस्पीक मदर्स लैंग्वेज लाइक नैटिव्स। मदर इन दिस कन्टेक्स्ट प्रोबेब्ली ओरिजनेटेड  फ्रौम द डिफिनिशन ऑफ मदर एज सोर्स, ऑर ओरिजिन; एज इन मदर कन्ट्री ऑर लैंड।—— इन द वर्डिंग ऑफ द कोस्चन ऑन मदरटंग, द एक्सप्रेसन ‘ एट होम ‘ वाज एडेड टू एस्पेसिफाई द कान्टेक्स्ट इन विथ द इंडिविजुअल लर्न्ड द लैंग्वेज।”

 

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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min1930

ज्योत्स्ना प्रसाद

जन्मतिथि- 19 अक्टूबर 1927        पुण्यतिथि- 31 दिसम्बर 1989

‘अपि स्वर्णमयी लङ्का न में लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । । ’

ई कथन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के ह। एह कथन से ही ई बात प्रमाणित हो जाता कि सनातन धर्म आ भारतीय परम्परा में माता के केतना ऊँचा स्थान बा? बाकिर एकर अर्थ ई ना भइल कि माता के महत्त्व के कवनों धर्म-विशेष के चौहद्दी में बाँध के देखल जाव।  काहेकि प्राय: हर धर्म में माता के स्थान बहुत ऊँचा बा। मुस्लिम परम्परा में भी मानल जाला- ‘माँ के क़दमों के नीचे है जन्नत। ’ वइसे ही मरियम के बिना यीशु मसीह के कल्पना ही ना कइल जा सकेला। एह से हर धर्म में ही ना बल्कि जीव-जन्तु में भी अपना माता के प्रति विशेष लगाव देखल जाला। आखिर केहू के अपना माता के प्रति लगाव रहे काहे ना ? माता ही ऊ माध्यम हई जे ईश्वर-अंश के अपना गर्भ में धारण करेली, ओह अंश के कष्ट सहके भी शरीर प्रदान करेली। ओकरा दु:ख-सुख में शामिल होली। एह से कवनों बच्चा अपना सुख में महतारी के इयाद करे चाहे ना लेकिन दु:ख के छाया पड़ते ऊ सबसे पहिले अपना माई के ही इयाद करेला। एही से त महतारी के भगवान के दूसरा रूप भी कहल जाला।

हम अपना माई के अम्मा कहत रहनी। हमरा अम्मा शैलजा कुमारी श्रीवास्तव (जन्म- 19 अक्टूबर 1927- मृत्यु- 31 दिसम्बर 1989) के जन्म पिलुई, दाउदपुर, सारण (बिहार) के एगो सम्पन्न, शिक्षित आ प्रतिष्ठित परिवार में भइल रहे। उहाँ के प्रारम्भिक शिक्षा अपना गाँव में यानी पिलुई में ही भइल रहे जबकि माध्यमिक शिक्षा सीवान से भइल। चूँकि शैलजा जी के परिवार पढ़ल-लिखल रहे, उहाँ के बाबूजी उर्दू-फारसी-अरबी के शायर आ विद्वाने भर ना रहनी स्वयं एम. ए., एल. एल. बी. भी कइले रहनीं। एह से अपना बेटी के उच्च शिक्षा देबे खातिर उहाँ के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस भेजनीं। जहाँ से शैलजा जी स्नातक कइनीं आ साहित्याचार्य के परीक्षा-बिहार संस्कृत समिति से स्वर्ण पदक के साथे उत्तीर्ण कइनीं। जवना के बाद ही शैलजा जी दिघवलिया (सीवान) निवासी रसिक बिहारी शरण (एम. ए., एल. एल. बी.) के चौथा लड़िका (पाँचवीं संतान) श्री महेन्द्र कुमार (एम. ए., एम. काम., डीप. एड.) से परिणय-सूत्र में बँध गइनीं। बाकिर अपना शादी के बाद भी उहाँ के आपन पढ़ाई जारी रखते हुए पटना विश्वविद्यालय से डिप-एड कइनीं आ बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से संस्कृत में एम. ए. कइनीं।

शैलजा जी बिहार में शिक्षा विभाग के विभिन्न पदन के शोभा बढ़ावत अंत मे प्राचार्या, महिला प्रा० शिक्षक शिक्षा-महाविद्यालय, सीवान के साथे-साथे जिला विद्यालय निरीक्षिका, सारण-सह-सीवान एवं गोपालगंज के पद से 31-10-85 के सेवनिवृत्त हो गइनीं। शैलजा जी अपना घर-गृहस्ती आ नौकरी के साथे-साथे साहित्य-सेवा में भी सदा सक्रिय रहत रहनीं।  एकर प्रमाण ई बा कि सन् 1970 में उहाँ के पुरनका सारण जिला भोजपुरी साहित्य-सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष रहनीं त सन् 1972 में कानपुर भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में सचिव के पद पर चयनित भइनीं। सन् 1977 में उहाँ के अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के तिसरका अधिवेशन सीवान में स्वागत-समिति के संयुक्त सचिव के पद पर चयनित भइनीं। ऊहई उहाँ के अ. भा. भो. महिला साहित्य सम्मेलन 1977 के स्वागत मंत्री के पद के शोभा भी बढ़वनीं। सन् 1981 में तिसरका जिला महिला भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षता कइनीं।

शैलजा जी के साहित्य-सेवा के मद्दे नज़र उहाँ के सन् 1984 में साहित्य संचेतना द्वारा सम्मानित कइल गइल रहे। सन् 1990 में भोजपुरी निबन्ध संग्रह ‘चिन्तन कुसुम’ पर अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन द्वारा चित्रलेखा पुरस्कार से मरणोपरांत उहाँ के पुरस्कृत कइल गइल।

चिन्तन कुसुम (भोजपुरी निबन्ध संग्रह, 1981) के अलावा उहाँ के दू गो अउर प्रकाशित किताब लोकप्रिय भइल – कादम्बरी (वाणभट्ट के ‘कादम्बरी’ पर आधारित भोजपुरी में लिखल कथा, 2003) आ श्रद्धा-सुमन (भोजपुरी-हिन्दी-उर्दू कविता संकलन, 2016)।

गोरा रंग, मध्यम कद-काठी, सिन्दूर से भरल मांग, माथा पर बिंदी, कमर के नीचे तक लटकत एगो लम्बा चोटी या कभी जुड़ा बनवले, सिल्क या सूती साड़ी में सीधा पल्ला कइले शैलजा जी के देखते कोई सहज ही समझ सकत रहे कि उहाँ के सादगी के प्रतीक हईं।

शैलजा जी बचपन से ही प्रखर बुद्धि के रहनीं। उहाँ के मिडिल स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा में भी विशेषता के साथे उत्तीर्ण भइल रहनीं। पारिवारिक माहौल भी साहित्यिक रहे। बाकिर सीवान में ओह समय चूँकि लड़कियन के स्कूल ना रहे। एह से बुझाइल कि उहाँ के पढ़ाई में व्यवधान आ जाई। बाकिर अइसन भइल ना। काहेकि उहाँ के 1934 में डी.ए. वी. स्कूल सीवान में नाम लिखा गइल। शैलजा जी के कविता लिखे के क्षमता के एहसास पहिला बेर एही स्कूल में भइल। जब स्कूल में नशाखोरी के रोके खातिर कविता बनावे के छात्र-छात्रा से कहल गइल। शैलजा जी अपना ओही उमिर में जे कविता लिखनी ओकर बानगी देखीं-

ताड़ी दारू गाँजा भाँग पिअला के फल इहे, घरवा में खरची ना देहिया पर लुगवा

नाहीं जो तूँ मनब पिअल नाहीं छोड़ब त, उड़ि जइहें देह रूपी पिंजड़ा से सुगवा

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Hum BhojpuriaNovember 15, 20213min1350

डॉ. ब्रजभूषण मिश्र

” भोजपुरी साहित्य के गौरव ” स्तम्भ में दिवंगत साहित्य सेवियन के संक्षिप्त परिचय के सिलसिला पीछला कई अंकन से जारी बा। अब तक निम्नलिखित 93 गो दिवंगत साहित्यकारन के संक्षिप्त परिचय रउरा पढ़ चुकल बानी। ओह 93 गो साहित्यकार लोगन के लिस्ट पढ़ीं आ फेर आगे बढ़ीं। – संपादक

अंक 11 में –    

1- महापंडित राहुल सांकृत्यायन

2- दूधनाथ उपाध्याय

3- महिन्दर मिसिर

4- रघुवीर नारायण

5- भिखारी ठाकुर

6- मनोरंजन प्रसाद सिंहभाग

7- महेन्द्र शास्त्री

8- दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह ‘ नाथ ‘

9- राम विचार पांडेय

10- डॉ. उदय नारायण तिवारी

11- धरीक्षण मिश्र

अंक 12 में

12-  प्रसिद्ध नारायण सिंह

13- रघुवंश नारायण सिंह

14- राम बचन द्विवेदी ‘ अरविंद ‘

15- डॉ. कमला प्रसाद मिश्र ‘ विप्र ‘

16 -शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी

17- हवलदार त्रिपाठी ‘ सहृदय’

18- डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय

19- विश्वनाथ प्रसाद ‘ शैदा’

20- पांडेय नर्मदेश्वर सहाय

21- कुलदीप नारायण राय ‘ झड़प’

22- पं. गणेश चौबे

अंक 13 में

23 – डॉ.स्वामी नाथ सिंह

24- राघव शरण मिश्र ‘ मुँहदूबर ‘

25- जगदीश ओझा ‘ सुन्दर ‘

26- रामनाथ पाठक ‘ प्रणयी ‘

27- मोती बी ए

28- महेश्वराचार्य

29- ईश्वर चंद्र सिन्हा

30- रामनाथ पांडेय

31- राधा मोहन राधेश

32- हरेन्द्रदेव नारायण

33- मास्टर अजीज

अंक 14 में

34- पांडेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह

35- बिसराम

36- भुवनेश्वर प्र. श्रीवास्तव ‘ भानु’

37- बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव ‘ ढीबरी लाल’

38- रुद्र काशिकेय / गुरु बनारसी

39- श्याम बिहारी तिवारी ‘ देहाती ‘

40- रामदेव द्विवेदी ‘अलमस्त ‘

41- राहगीर

42- दूधनाथ शर्मा  ‘ श्याम ‘

43-  दंडी स्वामी विमलानंद ‘ सरस्वती ‘

44- राम बचन लाल श्रीवास्तव

अंक 15 में – ( भोजपुरी जंक्शन – अंक 1 )

45- कुंज बिहारी  ‘ कुंजन ‘

46- प्रभुनाथ मिश्र

47- रामजियावन दास ‘ बावला ‘

48- सिपाही सिंह ‘ श्रीमंत ‘

49- डॉ. विवेकी  राय

50- भोला नाथ गहमरी

51- अविनाश चंद्र ‘ विद्यार्थी ’

52- प्रो. सतीश्वर सहाय वर्मा  ‘ सतीश ‘

53- डॉ. बसंत कुमार

54- अर्जुन सिंह ‘अशांत ‘

55- अनिरुद्ध

अंक 21 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 7 )

56- सन्त कुमार वर्मा

57- रमाकांत द्विवेदी ‘रमता

58- डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘ बेसुध ‘ उर्फ चतुरी चाचा

59-  पद्मश्री रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ उर्फ लोहा सिंह

60- प्राचार्य विश्वनाथ सिंह

61- पद्मभूषण विद्यानिवास मिश्र

62- डॉ. जितराम पाठक

अंक 22 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 8 )

63- रमेश चंद्र झा

64- गौरीशंकर मिश्र ‘ मुक्त ‘

65- प्राध्यापक अचल

66- पं. नर्मदेश्वर चतुर्वेदी

67- शारदानंद प्रसाद :

68- उमाकांत वर्मा

69- अक्षयवर दीक्षित

70- पांडेय कपिल

अंक 31 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 17 )

71- रामजी सिंह ‘ मुखिया ‘

72- विन्ध्याचल प्रसाद श्रीवास्तव

73- डॉ. अनिल कुमार राय ‘ आंजनेय ‘

74- डॉ. धीरेन्द्र बहादुर ‘ चाँद ‘

75- डॉ. विश्वरंजन

76- नरेन्द्र रस्तोगी ‘ मशरक ‘

77- नरेन्द्र शास्त्री

अंक 32 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 18 )

78- डॉ. रसिक बिहारी ओझा ‘ निर्भीक ‘

79- परमेश्वर दूबे शाहाबादी

80- राधा मोहन चौबे ‘ अंजन ‘

81- गणेश दत्त ‘ किरण ‘

82- डॉ. प्रभुनाथ सिंह

83- गिरिजा शंकर राय  ‘ गिरिजेश ‘

84- चंद्रशेखर मिश्र

85- पशुपति नाथ सिंह

अंक 40 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक  )

86- रामजी पांडेय अकेला
87- कैलाश गौतम

88- कुबेरनाथ मिश्र ‘ विचित्र ‘

89- प्रो. ब्रजकिशोर

90- जगन्नाथ

91- हरि शंकर वर्मा

92- डॉ० बच्चन पाठक सलिल
93- जमादार भाई

 

अब आगे पढ़ीं —

 94- बालेश्वर राम यादव

बालेश्वर राम यादव के जनम उ. प्र. के बलिया जिला के जगदेवाँ गाँव में 05 दिसम्बर, 1937 ई. के भइल रहे आ निधन 17 सितम्बर,1917 ई. के रायरंगपुर, उड़िसा में हो गइल। इहाँ के पिताजी के नाम शिव बालक यादव आ माता के नाम तेतरी देवी रहे। परिवार गोपालक रहे आ उहे विरासत में बालेश्वर जी का मिलल रहे। मगर रुचि पढ़ाई में रहे। बालेश्वर राम जी के पिता जमशेदपुर में खटाल चलावत रहीं आ दूध के कारोबार करत रहीं। मैट्रिक पास कइला के बाद आगे के पढ़ाई खातिर बालेश्वर राम जी जमशेदपुर चल अइनी। जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज से बी. ए. कइनी आ रॉची विश्वविद्यालय, रॉची से हिंदी में एम. ए. कइलीं। उहाँ का बी. एड. भी कइलीं। काव्यलोक, जमशेदपुर नाम के संस्था उहाँ के मानद ‘ विद्यालंकार’ के उपाधि देले रहे। पढ़ाई-लिखाई के बाद जमशेदपुर के अंगरेजी इसकूलन में हिन्दी शिक्षक रूप में कार्य कइनी। राउर विवाह उड़िसा के रायरंगपुर के आस पास रामदुलारी जी से भइल। ओकरा बाद सरकार का रायरंगपुर के ब्वायज हाई इसकूल में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गइल, जहाँ से 1995 ई. में सेवा निवृत्त भइनी। जहाँ तक साहित्यिक रुचि के सवाल बा, ऊ हाई इसकूल में पढ़त खानी रामचरित मानस पढ़ला आ गाँव में दस बेर ओकर पाठ करके सुनवला से जागल। अपने के आवाज़ अतना सुरीला रहे कि लोग मोहा जात रहे। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना आ गठन के पाछे राउर एही सुकंठ गायकी के कमाल रहे। को-ऑपरेटिव कॉलेज के कैम्पस में 1955 ई. में डॉ. बच्चन पाठक सलिल सहित अउर संहतिया लोग के बीचे बालेश्वरराम जी के आवाज़ गूँजत रहे – ‘मोरे पिछुअरवा सिरिसिया के गछिया, झहर-झहर करे पात कि निंदियो ना आवे हो राम ‘। ई आवाज़ कॉलेज के भोजपुरिया अध्यापक डॉ. सत्यदेव ओझा आ मेजर चंद्रभूषण सिन्हा के कान में पड़ल आ भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना भइल, जवना के महासचिव डॉ सलिल बनावल गइलीं आ बालेश्वर राम जी सचिव। भोजपुरी हिंदी में लिखल पढ़ल जारी रहल। भोजपुरी में तीन गो किताब छपल  —  ‘ भोजपुर के रतन ‘ ( गीत संग्रह, 1957 ई.),       ‘गाँव के माटी ‘ ( उपन्यास , 1973 ई. ) आ ‘ कृष्ण चरित पीयूष ‘ ( महाकाव्य , 2011ई. )।  पत्नी रामदुलारी यादव के अनुरोध पर ‘महाभागवत पुराण ‘ के कथा के भोजपुरी भाषा मे दोहा – चौपाई – सोरठा में छंदबद्ध करत ‘ कृष्णचरित पीयूष ‘ महाकाव्य रचाइल। हिंदी में  ‘ मेरी लाली ‘ (1997 ई. ) आध्यात्मिक गीत संग्रह बा। दू गो हिंदी पत्रिका- ‘ पुष्पांजलि ‘ आ ‘ तरंग ‘ रायरंगपुर से संपादित करत रहलीं। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद आ ललित कला मंच ( रायरंगपुर ) से सम्बद्ध रहलीं। भोजपुरी समाज, बिष्टुपुर, जमशेदपुर; जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद ; गुरुमंच, विद्यालय परिवार, रायरंगपुर आ ललित कला मंच, रायरंगपुर अपने के सम्मानित कइलस।

 

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Hum BhojpuriaOctober 22, 20213min2360

डॉ. ब्रजभूषण मिश्र

” भोजपुरी साहित्य के गौरव ” स्तम्भ में दिवंगत साहित्य सेवियन के संक्षिप्त परिचय के सिलसिला पीछला कई अंकन से जारी बा। अब तक निम्नलिखित 93 गो दिवंगत साहित्यकारन के संक्षिप्त परिचय रउरा पढ़ चुकल बानी। ओह 93 गो साहित्यकार लोगन के लिस्ट पढ़ीं आ फेर आगे बढ़ीं। – संपादक

अंक 11 में –    

1- महापंडित राहुल सांकृत्यायन

2- दूधनाथ उपाध्याय

3- महिन्दर मिसिर

4- रघुवीर नारायण

5- भिखारी ठाकुर

6- मनोरंजन प्रसाद सिंहभाग

7- महेन्द्र शास्त्री

8- दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह ‘ नाथ ‘

9- राम विचार पांडेय

10- डॉ. उदय नारायण तिवारी

11- धरीक्षण मिश्र

 

 

 

अंक 12 में

 

12-  प्रसिद्ध नारायण सिंह

13- रघुवंश नारायण सिंह

14- राम बचन द्विवेदी ‘ अरविंद ‘

15- डॉ. कमला प्रसाद मिश्र ‘ विप्र ‘

16 -शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी

17- हवलदार त्रिपाठी ‘ सहृदय’

18- डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय

19- विश्वनाथ प्रसाद ‘ शैदा’

20- पांडेय नर्मदेश्वर सहाय

21- कुलदीप नारायण राय ‘ झड़प’

22- पं. गणेश चौबे

 

अंक 13 में

23 – डॉ.स्वामी नाथ सिंह

24- राघव शरण मिश्र ‘ मुँहदूबर ‘

25- जगदीश ओझा ‘ सुन्दर ‘

26- रामनाथ पाठक ‘ प्रणयी ‘

27- मोती बी ए

28- महेश्वराचार्य

29- ईश्वर चंद्र सिन्हा

30- रामनाथ पांडेय

31- राधा मोहन राधेश

32- हरेन्द्रदेव नारायण

33- मास्टर अजीज

 

अंक 14 में

34- पांडेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह

35- बिसराम

36- भुवनेश्वर प्र. श्रीवास्तव ‘ भानु’

37- बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव ‘ ढीबरी लाल’

38- रुद्र काशिकेय / गुरु बनारसी

39- श्याम बिहारी तिवारी ‘ देहाती ‘

40- रामदेव द्विवेदी ‘अलमस्त ‘

41- राहगीर

42- दूधनाथ शर्मा  ‘ श्याम ‘

43-  दंडी स्वामी विमलानंद ‘ सरस्वती ‘

44- राम बचन लाल श्रीवास्तव

 

 

 

 

 

अंक 15 में – ( भोजपुरी जंक्शन – अंक 1 )

45- कुंज बिहारी  ‘ कुंजन ‘

46- प्रभुनाथ मिश्र

47- रामजियावन दास ‘ बावला ‘

48- सिपाही सिंह ‘ श्रीमंत ‘

49- डॉ. विवेकी  राय

50- भोला नाथ गहमरी

51- अविनाश चंद्र ‘ विद्यार्थी ’

52- प्रो. सतीश्वर सहाय वर्मा  ‘ सतीश ‘

53- डॉ. बसंत कुमार

54- अर्जुन सिंह ‘अशांत ‘

55- अनिरुद्ध

अंक 21 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 7 )

56- सन्त कुमार वर्मा

57- रमाकांत द्विवेदी ‘रमता

58- डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘ बेसुध ‘ उर्फ चतुरी चाचा

59-  पद्मश्री रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ उर्फ लोहा सिंह

60- प्राचार्य विश्वनाथ सिंह

61- पद्मभूषण विद्यानिवास मिश्र

62- डॉ. जितराम पाठक

 

 

अंक 22 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 8 )

63- रमेश चंद्र झा

64- गौरीशंकर मिश्र ‘ मुक्त ‘

65- प्राध्यापक अचल

66- पं. नर्मदेश्वर चतुर्वेदी

67- शारदानंद प्रसाद :

68- उमाकांत वर्मा

69- अक्षयवर दीक्षित

70- पांडेय कपिल

अंक 31 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 17 )

71- रामजी सिंह ‘ मुखिया ‘

72- विन्ध्याचल प्रसाद श्रीवास्तव

73- डॉ. अनिल कुमार राय ‘ आंजनेय ‘

74- डॉ. धीरेन्द्र बहादुर ‘ चाँद ‘

75- डॉ. विश्वरंजन

76- नरेन्द्र रस्तोगी ‘ मशरक ‘

77- नरेन्द्र शास्त्री

 

 

अंक 32 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 18 )

78- डॉ. रसिक बिहारी ओझा ‘ निर्भीक ‘

79- परमेश्वर दूबे शाहाबादी

80- राधा मोहन चौबे ‘ अंजन ‘

81- गणेश दत्त ‘ किरण ‘

82- डॉ. प्रभुनाथ सिंह

83- गिरिजा शंकर राय  ‘ गिरिजेश ‘

84- चंद्रशेखर मिश्र

85- पशुपति नाथ सिंह

 

अंक 40 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक  )

86- रामजी पांडेय अकेला
87- कैलाश गौतम

88- कुबेरनाथ मिश्र ‘ विचित्र ‘

89- प्रो. ब्रजकिशोर

90- जगन्नाथ

91- हरि शंकर वर्मा

92- डॉ० बच्चन पाठक सलिल

93- जमादार भाई

 

अब आगे पढ़ीं —

 

 94- बालेश्वर राम यादव

बालेश्वर राम यादव के जनम उ. प्र. के बलिया जिला के जगदेवाँ गाँव में 05 दिसम्बर, 1937 ई. के भइल रहे आ निधन 17 सितम्बर,1917 ई. के रायरंगपुर, उड़िसा में हो गइल। इहाँ के पिताजी के नाम शिव बालक यादव आ माता के नाम तेतरी देवी रहे। परिवार गोपालक रहे आ उहे विरासत में बालेश्वर जी का मिलल रहे। मगर रुचि पढ़ाई में रहे। बालेश्वर राम जी के पिता जमशेदपुर में खटाल चलावत रहीं आ दूध के कारोबार करत रहीं। मैट्रिक पास कइला के बाद आगे के पढ़ाई खातिर बालेश्वर राम जी जमशेदपुर चल अइनी। जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज से बी. ए. कइनी आ रॉची विश्वविद्यालय, रॉची से हिंदी में एम. ए. कइलीं। उहाँ का बी. एड. भी कइलीं। काव्यलोक, जमशेदपुर नाम के संस्था उहाँ के मानद ‘ विद्यालंकार’ के उपाधि देले रहे। पढ़ाई-लिखाई के बाद जमशेदपुर के अंगरेजी इसकूलन में हिन्दी शिक्षक रूप में कार्य कइनी। राउर विवाह उड़िसा के रायरंगपुर के आस पास रामदुलारी जी से भइल। ओकरा बाद सरकार का रायरंगपुर के ब्वायज हाई इसकूल में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गइल, जहाँ से 1995 ई. में सेवा निवृत्त भइनी। जहाँ तक साहित्यिक रुचि के सवाल बा, ऊ हाई इसकूल में पढ़त खानी रामचरित मानस पढ़ला आ गाँव में दस बेर ओकर पाठ करके सुनवला से जागल। अपने के आवाज़ अतना सुरीला रहे कि लोग मोहा जात रहे। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना आ गठन के पाछे राउर एही सुकंठ गायकी के कमाल रहे। को-ऑपरेटिव कॉलेज के कैम्पस में 1955 ई. में डॉ. बच्चन पाठक सलिल सहित अउर संहतिया लोग के बीचे बालेश्वरराम जी के आवाज़ गूँजत रहे – ‘मोरे पिछुअरवा सिरिसिया के गछिया, झहर-झहर करे पात कि निंदियो ना आवे हो राम ‘। ई आवाज़ कॉलेज के भोजपुरिया अध्यापक डॉ. सत्यदेव ओझा आ मेजर चंद्रभूषण सिन्हा के कान में पड़ल आ भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना भइल, जवना के महासचिव डॉ सलिल बनावल गइलीं आ बालेश्वर राम जी सचिव। भोजपुरी हिंदी में लिखल पढ़ल जारी रहल। भोजपुरी में तीन गो किताब छपल  —  ‘ भोजपुर के रतन ‘ ( गीत संग्रह, 1957 ई.),       ‘गाँव के माटी ‘ ( उपन्यास , 1973 ई. ) आ ‘ कृष्ण चरित पीयूष ‘ ( महाकाव्य , 2011ई. )।  पत्नी रामदुलारी यादव के अनुरोध पर ‘महाभागवत पुराण ‘ के कथा के भोजपुरी भाषा मे दोहा – चौपाई – सोरठा में छंदबद्ध करत ‘ कृष्णचरित पीयूष ‘ महाकाव्य रचाइल। हिंदी में  ‘ मेरी लाली ‘ (1997 ई. ) आध्यात्मिक गीत संग्रह बा। दू गो हिंदी पत्रिका- ‘ पुष्पांजलि ‘ आ ‘ तरंग ‘ रायरंगपुर से संपादित करत रहलीं। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद आ ललित कला मंच ( रायरंगपुर ) से सम्बद्ध रहलीं। भोजपुरी समाज, बिष्टुपुर, जमशेदपुर; जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद ; गुरुमंच, विद्यालय परिवार, रायरंगपुर आ ललित कला मंच, रायरंगपुर अपने के सम्मानित कइलस।

 

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Hum BhojpuriaOctober 22, 20211min2310

 

अतुल कुमार राय

बात पिछला साल के ह। पश्चिम टोला के शशांकवा के बियाह मार्च में तय भइल। तब तक ना जाने कहाँ से ई माटीलगना कोरोना आ गइल। पंडित जी लइका-लइकी के बाप से कहनी कि जजमान,ढेर मत सोचीं। लइका-लइकी के देह से जून में एगो साइत बनत बा,कहीं त रख दी ?

लइका के बाबूजी कहनी कि ए समधी जी जवन डेट बा,तवन बटले बा।रउरा ढेर मत सोची… बियाह तय करीं..ले आवs हो कागज पर हल्दी छूआवs”

लेकिन ई का ?….लइका कइलस बवाल!

जून के गर्मी सोच के ओकर मिज़ाज उखड़ गइल। कहलस कि ना बाबूजी,जून में त एकदम बियाह ना होई। हम तनी और बरदाश के दवाई खा लेब लेकिन बियाह हमार जाड़ा में होई।

उ का बात बा कि जाड़ा में काफी आराम रहेला…!

बाऊजी कहलन, ” रे बउचट तू जवन मेहरी के मुँह देख के आराम सोचत बाड़े,तवन सोच-सोच के हमार चानी के सगरो बार पाक गइल। बियाह के एक-डेढ़ साल बाद जाड़ा-गर्मी और बरसात सब एक्के लेखा लागेला रे बबुआ। बात मान जो, अपना मन के बेसी होशियार ना बनल जाला…”

लइका कहलस कि ना बाबूजी मेहरारु के बड़ा मन बा गोवा में हनीमून मनावे के। जाड़ा में ही सही रही।

खैर,लइका-लइकी के बाबूजी मान गइल लो।

नवम्बर 2020 में शादी के दिन रखा गइल।

तबसे लइका अँकवारी में तकिया लेके उंगली पर महीना गिनत सुते लागल…!रात-रात भर सगरी दू जीबी डाटा वीडियो कॉल में जियान होखे लागल।

एने नवंबर कहे कि हम अइबे ना करब। लइका कहे कि ए करेजा अब सगरी फीलिंग फफाता ! मंदिर पर जवन भजन सुनतानी, उहो डीजे लेखा लागत बा। चार किलोमीटर दूर कहीं बैंड बाजा बाजता त अइसन बुझाता कि हमरा बियाहे में बाजता।

लइकी बैंगलोर में नौकरी करत रहे..धीरे से कहलस कि प्लीज स्टॉप..लेट्स टॉक सम स्प्रिचुअल थिंग्स..अदरवाइज आई नॉट विल एबल टू स्लीप!

लइका मेहरारु के बात मान लिहलस और एगो आध्यात्मिक प्रश्न पूछलस, “ए करेजा हमरा ख़ातिर तू करवा चौथ के बरत रहबू, हम तहरा ख़ातिर का भूखब हो ?”

मेहरारु कहलस कि कुछ नहीं टाइम से बर्तन धो देना वही मेरे लिये सबसे बड़ा व्रत है।”

खैर, इहे कुल बतियावत सितंबर आ गइल। अब लइका के दू जीबी डाटा रात के बदले दुपहरिया में ख़तम होखे लागल…!

अक्टूबर बीतल और नवम्बर आइल त भइल दुर्घटना।

पता चलल कि होखे वाली मेहरारु के बड़का बाबा के देहान्त हो गइल.. अब का होइ हो शशांक, तब बियाह ना होई…?

साइत बढ़िया नइखे.. अब मई 2021 में होई।

आही दादा!  मई सुनते लइका के ऑक्सीजन लेवल 70 से नीचें जाए लागल। मेहरारु से कहलस कि बतावs ना हो सगरी गोवा के ख़्वाब माटी में मिल गइल..अब का होई ? तहरो बाबा के हमार बियहवे के समय डेट मिलल ह..?

मेहरारु फेर समझदारी देखवलस, “जैसे छह महीने बर्दास्त किया…छह महीने और सही.. खूबसूरत चीजें थोड़ी मेहनत के बाद मिलें तो और प्रसन्नता होती है, लेट्स एंज्वाय दिस टाइम! ”

आही हो दादा ! अब का एंज्वाय करीं हो…

मेहरारू के ई बात लइका के करेजा में पत्थर लेखा लागे लागल..

लेकिन अभी-अभी ताजा जानकारी तक!

पिछला 12 मई के लइका के बियाह रहल ह.. !

बियाह बड़ा बढ़िया से भइल बा.. लेकिन दुःख के बात बा कि बियाह बाद लइका पाजीटिव होके क्वारंटाइन हो गइल बा।

आगे के सगरी कार्यक्रम पर ब्रेक लागल बा। ककन भी नइखे छूटल!

अब लइका जल्दी से निगेटिव होखे ख़ातिर दिन भर में तेरह हाली काढ़ा पियत बा। आतना जोगासन कर देले बा कि रामदेव बाबा ओकरा आगे हाथ जोड़ देले बाड़े कि कहीं पतंजलि मुनि प्रगट ना हो जास !

ओने मेहरारु आजुओ वीडियो कॉल पर बतियाके दिलासा देतिया.. ” आएंगे अच्छे दिन, जरूर आएंगे…!

लेकिन लइका का करो ? घर में जस-जस पायल और चूड़ी के छन-छन आवाज सूनाता, तस-तस ओकरा करेजा के नस में छन-छन करत बा…!

चौदह दिन, चौदह बरिश के बनवास लेखा बीत रहल बा।

मेहरारु कहत बिया कि इससे तो अच्छा था कि मैं भी पाजीटिव हो जाती…

लइका के ना कुछ कहले कहाता, न रहले रहाता।

लेकिन लइका के बाउजी रोज खिड़की पर से पूछत बाड़े..!

“काहो इंजीनियर साहेब, कहत रहनी न कि बड़-जेठ के बात मानल जाला..अब ना जइबा गोवा..ना मनइबा हनीमून.. ?

लइका का करो… उदास बा.. और मने मन कहता.

जो रे कोरोना तोर माटी लागो.. !


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20216min1990

डा. स्वर्ण लता

भोजपुरी बालगीत विविधता  से भरल बा बाकिर भोजपुरी साहित्य के इतिहास में एह विषय पर चरचा खोजलो पर ना मिलेला। लोक साहित्य में बालगीत एकल गीत आ समूह गीत दुनो रूप में मिलेला। मुख्य रूप से बालगीत मनोरंजन के साधन हऽ। भोजपुरी बालगीत में खेल खेलवना, खेलवनिया पर गीत प्रचुर मात्रा में पावल जाला। चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह भोजपुरी बाल गीतन के आठ भाग में बॅटले बानी ओकरा में खेलावे के गीत-खेलवना एगो प्रमुख भाग बा। खेल गीत खेलत खा बालक/बालिका/ किशोर/ किशोरी के द्वारा गावल जाला बाकिर खेलवना फुसलवना, अझुरवना गीत परिवार के बड़-बुजूर्ग सदस्य आ नजदीकी रिश्तेदार द्वारा गावल जाला। खेल गीत बालक बालिका, किशोरी/किशोर, के होला तब खेलवना, फुसलवाना, बझवना, अझुरवना गीत बालक, बालिका, किशोर, किशोरी खातिर होला। मतलब कि बालक के पारिवारिक बड़-बुजूर्ग आ रिश्तेदार द्वारा जवना गीतियन के सस्वर लय-ताल मे, कोमल से कोमल आ सुमघुर आवाज में गावल जाला ओही पारंपरिक गीतियन के खोज के, अध्ययन करि के एहिजा राखल गइल बा। पारंपरिक बाल गीत प्राकृतिक नदी के धारा अस होले जवन कवनो घेरा के ना माने आ एक कियारी से दोसर तीसर कियारी में, एक ताल तलइया से दोसर-तीसर ताल तिलइया में मांकत रहेले स। एह गीतियन के गावत, खेलावत, फुसुलावत, अझुरावत, बझावत बडो़-बुजूर्ग के व्यायाम हो जाला। एह भाग के गीतियन के सुने खातिर लइका-लइकी बड़ बुजूर्ग के घेरले रहेलन सं। एह से बूढ़ो-बूढी के मनसायन रहेला, घर में शांति रहेला। पढ़े आ सीखे खातिर बइठे के आदत लइकन/लइकिन में  स्वाभाविक रूप से पनपेला। बड़-बुजूर्ग के छोट-मोट टहल-टिकोरो हो जाला। बड़-बुजूर्ग के आ रिश्तेदार के अनुभव/ज्ञान के लाभ अगिला पीढी में स्थानातंरित होत रहेला। एह गीतियन से जवन अनुभव/सीख मिलेला उ भावी जिनगी में  काम के साबित होला। बालक/बालिका के ज्ञान क्षितिज के विस्तार बिना अतिरिक्त मेहनत, समय के स्वाभविक रूप  से हो जाला। जवन भावी जिंदगी के सफर में आइल समस्यन के हल करे  में मददगार साबित होला। ओह में से कुछ बाल गीतन के नीचे देल जा रहल बा।

  1. अंतर मंतर घोघा साड़ी।

कोठी तर पितिआइन बाड़ी।।

से दुख देले बाड़ी।

से दुख लेले जास।। 

एह गीत के चोट लगला पर रोवत लइका चुप करावे खातिर गावल जाला। भोजपुरी क्षेत्र में लोग भूत-प्रेत डायन ओझा पर विश्वास करेलन। हालाकि ई आदमी युगीन लोक आस्था ह बाकिर एह वैज्ञानिक उपलब्धियनो के युग में नेस्त-नाबुत नइखे भइल। कहल जाला कि गोतिया आ दाल गलावे कि चीज ह। पितिआइन सामने से ना छिप के वार कइले बाड़ी। उन्हुंकरे मंतर मरला से चोट लागल बा। जे दोसरा के राह में कांटा बोवेला ओकरो राह कंटकित हो जाला। ए बाबू तू चूप हो जा। रोवला से कुछ ना होई। तू देख लिहs तहार पितिआइन खुद एक दिन चोटिल हो जइहें। छू  कहत मतारी चोटिल जगह पर मुंह से फूंक मार देली। यानि विश्वास धरावेला कि ऊ डायन हई तऽ हमहूं ओझाई के मंतर जानिला। झार देनी, उन्हूंकर मंतर खा गइनी।

बहुत महीनी से बालमन में सीख भरल गइल बा कि दोसरा के बेमतलब ना तंग करे के चाहीं ना तऽ दुख देबहूँ वाला के एक ना एक दिन दुखित होखे के पड़ेला। दुख में विचलित ना होखे के चाहीं। महात्मा बुद्व कहले बाड़न कि संसार में दुख बा तऽ दुख दूरो करे के साधन बा। दुख देवेवाला बा तऽ दुख दूरो करे वाला बा।

  1. अरर बरर के पतवा,

बिलइया चाटे पतवा,

चाटत चाटत बिलइया,

गइल पिछुअरिया

कुकुरा धरलेलस,

भर अंकवरिया,

छोड़ छोड़ कुकुरा

अब ना आइब

तोरा पिछुअरिया।।

एह गीत में एगो बिलाई बिया जवन दोसरा के हकमारी कर के ओकर खाद्य पदार्थ लेके राजा के पिछुआरी में भाग के जाके खाए लागल। ऊ समझत रहे कि राजा के पिछुआरी में केहू ना आई। बाकिर पिछुआरी में खटका भइला पर राजा अपना कुकुर के लिलकार देलन आ ऊ धरि के बिलार राम के भभोरे लागल। बिलाई कान धरि के उठ बइठ करे लगली कि माफ कर दऽ अब से हम इहंवा कबो ना आइब।

एह गीत में सीख भरल बा कि केहू गलत काम कतनो सुरक्षित जगह पर छिप के करी ऊ सजाय से बांच ना सके। आदमी सामाजिक प्राणी हऽ ओकरा दोसरा के हक ना हथवसे के चाहीं। समरस समाज के निर्माण बदे आगे चलके बालक/ बालिका काम करे, इहे कामना गीतकार के मन में होई-गीत के रचना करत खा।

  1. आगे मइया कलावती।

सिर पर देबो पउती।

गंगा पार बियाह देबो।

आवे के ना जाए के।

टुसुर टुसुर रोव के।।

कवनो रोवत लइकी के समझावल गइल बा एह गीत में कि चोट लागल बा तऽ ठीक हो जाई। साथ साथ धमकावल जात बा कि चुप हो जा ना तऽ रोवले चाहत बाडू तब दूर देश में माथा पर थोड़ा सा सामान देके बियाह करिके भेज देब जहंवा से आ ना सकबू आ जिंदगी भर बइठ के रोवत रहबू। बालमन में सीख भरल गइल बा एह गीत में कि रोवत रहे से समस्या के हल ना होई आ समय बर्बाद होई यानि समय बेसकीमती होला ओकरा के बर्बाद ना करे के चाहीं।

  1. आव रे खेदन चिरइया

    गुलगुल अंडा पार

तोहरा अंडा मे आग लागो

  बाबू के खेलाव।।

  1. आव रे गइया अगरी,

दूधवा दे भर गगरी,

बबुआ पीही भर गगरी।।

दूध पिआवत खा लइका / लइकी छेरिआ जालिस। दूध पीअल ना चाहेलीस तब उपरांकित गीत गा गा के गीत में फुसला-फुसला के लइका / लइकी के दूध पियावल जाला। दूध पिआवे वाला जानत बा कि पीआवत खा जोर जबरदस्ती ना करे के चाहीं नाही तऽ पाचन क्रिया गड़बड़ा जाई। एही से अपना गीत में अझुरा के दूध पिआवे ला। बालक / बालिका के सुंदर शरीर के कामना मतारी-बाप के, भाई-बहिन के मन में रहेला।

  1. आहा जी आहा, दू गोड़ दू बांहा,

पीठ पर पोंछ नाचे, ई तमासा कहां ?

छोट लइका / लइकी के खेलवनिया दूनो हाथ से उछाल उछाल लोकि-लोकि के गावेला। ऊ चाहेला कि अइसन बेला में बालक / बालिका के मन बाझ के बहल जाय। बालक/बालिका के हंसला पर खेलवनिया के आनंद के शब्दन मे व्यक्त ना कइल जा सके। ऊ हनुमान अस बलिष्ट शरीर के ध्यान दिला के ओकरा के शक्तिमान बनावे के कामना करेला।

  1. ए बबुआ। तू कथी के?

खने सोना, खने रूपा के ।

बाबू चउवा चनन के,

पितिया पीताम्बर के,

मातारी हऽ लवंग के,

लोग बिराना माटी के ?

………………………?

  1.  ए बाबू तोहार बाबा कइसन?

कुर्सी ऊपर राजा अइसन।

ए बाबू तोर इया कइसन

मचिया बइठन रानी अइसन।

ए बाबू तोहार बाबू कइसन ?

कुर्सी बइठल कलक्टर जइसन।

ए बाबू तोर फुआ कइसन।

बेग लटकवले मेम जइसन। 

ए बाबू तोर माई कइसन?

घर घर घूमत बिलाई जइसन।

इहे गीत जब माई आ चाची गावेली तब फुआ के जगह पर  चाची  आ माई के जगहो पर फुआ गावेली। छने छने छेरिआत लइका के कांहा पर पार के फुआ खेलावेली आ गा गा के बझावे के प्रयास करेली। एह गीत मे कुल खानदान के मान मर्यादा  के ओर ध्यान लगावल जाला। एकरा प्रति हमेशा चौकस चेतना बालमन, अचेतन, में भरल जाला। बाबा घर के सर्वोच्च स्थान पर होले। जीवनानुभव से पाकल। सर्वशक्तिमान घर-परिवार के मालिक एही से उन्हूंका के राजा कहल गइल बा। अइसने राजा के पत्नी रानी बन के पूजन जाली। संपूर्ण व्यवस्था के कर्ता पिता परिवार में जिलाधीश के हैसियत वाला होला। जेकर भाई कलक्टर होई ओकर बहिन सान से अकड़ के मेम अस चलबे करी। बबुआ के फुआ माई के ननद भइली, ननद भउजाई में हंसी-मजाक बराबर से चलत आइल बा। इहां पर गीत में हास्य में पुट देल गइल बा। एही के तहत बबुआ के माई के घर घर घुमत बिलाई कहल गइल बा। एक तरह से गीत में बेमतलब ना घूमे के हिदायत दिहल गइल बा। जवन जीवन में सीख के अनमोल भीख दे रहल बा।

गीत सं 7 के देखल जाय। बबुआ के तनी भर ओठ बिजकावते मातारी के करेज करकरा के फाटे लागेला। ऊ कांही पर पार के गीत गावे लागेली। स्नेह के उतुंग चोटी पर पहुंच के देह गेह के सुधि हेरा जाला। मातारी बदे सबसे सुंदर बबुआ होले आ बबुआ खातिर मतारी। उत्तम रूपक पल पल पर बिटोरत-छिटांत रहेला। गीत में बाबू चउआ चनन के कही के निर्माता के प्रति अगाध स्नेह आ आदर के भाव उकेरल गइल बा। पितिया यानि चाचा के पीतांबर  कहल गइल बा। पीताम्बर भगवान विष्णु/ कषण के पहिरन हऽ। पावन चंदन चर्चित बेदी पर पीताम्बर धारण करिके बइठले पर दूनों के मान मर्यादा बढेला। बाप-चाचा में अभेद भाव राखे के, भाईचारा राखे के परोक्ष रूप से बतावल गइल बा। साथे साथे चेतावल गइल बा कि अपना बाप-पितिया अस मिल-जूल के रहब तबे जीवन में सफल होईब। एह से हमेश ख्याल रही कि तू का हवऽ।

  1. कांची कुची कउआ खाय।

घी के लोंदा बबुआ खाय।।

बबुआ/बबुनी के तेल लगा के आंख मुंह पोछत गीत के गा-गा के बझावल जाला। एह गीत में कहल गइल बा कि काम निकाले खातिर ठकुरसुहाती बोलल अनुचित ना हऽ। तेल लगावे वाला/वाली के बबुआ/बबुनी के गीत में अझुरा के स्थिर राखलो मकसद रहेला ताकि आंख-कान खोदाय मत।

  1. चमन अइसन चुमन अइसन।

महना जुआठ अइसन। 

तेलिया के झंवड़ा दुबरा। 

                       हमार बाबू कुमना।।

तेल लगावत खा ई गीत गा-गा के बाबू के स्थिर राखे के कामना राखल जाला।

  1. काहे तू रोवलिस बुची रे ?

पाएंट ला कि टोपी ला ?

  1. गलर गलर पुआ पाकेला।

चिलरा खोईछा नाचेला।।

जो रे चिलरा खेत खरिहान।

लेके अइहे कनकजीर धान ।।

ओही धान के चुरा कुटइबो। 

बाभन-बिसुन भोजन करइबो।।

बभना के पूत दिही असीस। 

जीय बबुआ लाख बरीस।।

13 घुघुआ घुघेली, आतम चउरा ढेरी।

पत्ता उडिआइल जाय, बिलइया खदेड़ले जाय। 

चल लइके दानापुर, दानापुर में का बा ?

लाल लाल सिपहिया बा, दूनो कान कटावल बा,

  परती में बेलावल बा। परती में सुगवा,

बिनेला खटोलवा, ओह पर सूते मामा-मामी,

बीच में बालकवा।

ए……….बहू हंडिया-पतुकी सहरले रहिहऽ

  बबुआ जात बा भड़ाक

मामा के छंवड़ा रोवत बा। 

केरा दूगो जोहत बा।

रोवे दे खकचोदा के 

नाचे दे पंवरिया के,

देखे दे महाजन के। 

  1. घुघुआ माना, उपजे धाना।।

बाबू के छेदा दे नाक दूनो काना।।

भा

घुघुआ माना, उपजे धाना,

अइहें बचिया के मामा

छेदा दिहें काना

पेन्हा दिहें बाला

नया भीत गिरेले, पुराना भीत उठेले,

सम्हरिहे बुढिया, छिपा लोटा।

भा

घुघुआ माना उपजे धाना,

धनि धनि अइले बबुआ के मामा,

 बबुआ के नाक कान-कान दूनो छेदवले,

सोनरा के देले भर सूप धाना

सोनरा के पूतवा देला असीस

बबुआ जीए लाख बरीस। 

   अथवा

घुघुआ माना मनेर से, अरवा चावल डेढ सेर

बबुआ खाई दूध भतवा, बिलइया चाटी पतवा

पत्ता उडिया गइल, बिलाइया लजा गइल।।

बालक/बालिका के हाथ-पांव तनिक दीढ़ हो जाला। ऊ बइठे लागेला।

ओकर गर्दन-मुंडी दीढ़ हो जाले तब खेलवनिया चीताने सूत के अपना दूनो गोड़वन के पेट-छाती पर मोड़ के ओकरे पर बालक के बइठा के ओकर दूनो हाथ अपना हथवन से धरि के उपरांकित घुघुआ-गीतियन के गा के खेलावेला।

राम आ कृष्णा के माई अपना शाही सामर्थ के बल पर अपना पूत के सोना के पलना पर झुलावत होइहें बाकिर भोजपुरिया खेलवनिया के पांवे पलना बनि गइल बा। एही पांव पलना पर जीवन के शास्वत संगीत गा के अपना पूत के मन-प्राण में जीवन के सार तत्व बइठावत बाड़ी। एह गीत में ई बतावल गइल बा कि आदमी के विवेक हर दम जागल रहे के चाहीं। उड़िआत पतई के पाछा-पाछा धावल आ दोसरा के जूठ पतल चाटल नीच कर्म हऽ। जातो जाला आ  भातो ना भेंटाय। नया भीत गिरेले, पुराना भीत उठेले में महात्मा कबीर के उल्टवांसी के शिल्प शैली में जीवन के अनिवार्य परिवर्तन के बात बतलावल गइल बा यानि परिवर्तन प्रकृति के शास्वत नियम हऽ जवना के देख के घबड़ाए के ना चाहीं। नया-पुरान आ पुरान-नया होत रहेला। एकरा के रोकल संभव नइखे। आदमी के अमर करे के प्रयास युग-युग से होत आ रहल बा आजो हो रहल बा। अविष्कार सतत चलत रहेवाली प्रक्रिया हऽ, चलत रही एहू में दू राय नइखे। आदमी अमरत्व प्राप्त करे लागी तब जल-जमीन-हवा के समस्या कइसे हल होई? एकर कल्पनो अबहीं ना कइल जा सके। सुख दुख में समभाव से रहल ज्ञानी आदमी के काम हऽ।

एह गीत में अंग्रजी राज के गंध बा। कहल जात बा कि दानापुर चलल जाय तब सवाल उठत बा कि उहंवा जाके का मिली? जवाब जन्मत बा कि उहां चल के सैनिक बनल जाई। देस में कवनो राजा महराजा रह नइखन गइल। भर्ती हो रहल बा। उहंवा भर्ती हो गइला पर सभ दुख दलिदर भाग जाई। बाकिर सुनेवाला, प्रतिरोध करत कहत बा कि ना ना। ई अनुचित होई। जे लोक भर्ती होके अंग्रजी सेवा में बा। ऊ धर्म के विरोध काम कइला के चलते समाज से बहिस्कृत कर दीहल गइल बा। स्वधर्में मरन…….के याद करावल गइल बा-एह गीत में। बहाल लोग के ना धर्म रह गइल बा ना जात। ऊ लोग जात धर्म के बंधन से अलग बा।

धान के पइआ फेंके लाएक होला बाकिर आदमी के पइया फेंकल ना जाय। रचल खटोला पर मामा मामी के बीच बालक बिहंस सकेला।   खकचोदा  में एगो व्यंग भरल बा। द्वेश के भाव के दखल अंदाज नइखे। घर में जब बालक के रोवाई सुनाई, ऊ बिहंसी तब पांव नचबे करी। महाजन दीदा भर के निहार लेस कि पूत पवला के खुशी धनी गरीब के घर में एक समान होला। आपन पूत सभका प्यारा होला। पूत के जवान होखते दुख भाग जाई। सुख-दुख में समभाव राखे के, जीवन समर में हरवे हथियार के हरदम चौकस रहे के, निर्माण के जुझारू उत्साह राखे के चटक रंग भरल बा-एह गीत में। हार के हार मान के जीवन जंग से पराइल कायर के काम हऽ।

  1. चंदा मामा। आरे आव, बारे आव,

नदिया किनारे आव

सोना के कटोरवा में

दूध-भात ले ले आव

बबुआ के मुहंवा में घूट।।

खाना, खाए में कवनो बालक नाकुर-नुकुर करे लागेला, मुँह के पास कवर ले गइला पर रोए लागेला, मुंह हटा-हटा लेला तब खिआवे वाला आदमी लइका के घर के बाहर भा छत पर ले जाके चंदा के देखा-देखा के उपरांकित गीत गा गा के कवरे कवर खाना खिआ देला। ए गीत में नजदीकी रिश्तेदार के संपन्न के बखान आ बालक के सुख-चैन के कामना भरल बा। खात खा मन चंचल ना रहे के चाहीं। शांति के साथ खाना खइले पर नीक से देहे लागेला, ई खिआवे वाला के मन में बा। एही से ऊ बहला, फुसला, खेला-खेला के खाना खिला रहल बा कवनो तरह के जोर जबरदस्ती नइखे करत। एह में सुख समृद्वि के कामना भरल बा।

  1. चुप्प रहs चुप्प रहs बालबचना

बाप-माई गलहू चिचोर कोड़ना

सांझी खानी देख लीहs भर अंगना

उहंवा से ले अइहें भर ढ़कना

मोटरी पटक दिहें भर अंगना

दूधवा पिआ दिहें तीन ढ़कना।।

  1. ते तइया, ते तइया, बाबू तइया,

तेल के घटाई चढ़ो, बाबू के मोटाई,

बाबू कोतल सन, बाबू कोतल सन,

धोबिया के पाठ सन, तेली के जुआठ सन,

गंगा जी के सेवार सन,

काचर-कुचर कउआ खाई, घी के लडु बबुआ खाई,

दिनो दिन होखस बीस, बबुआ जीअस लाख बरीस।

मतारी-बहिन, चाची, मामी भा फुआ दादी के मुंह से बहला के तेल लगावत खा ई वात्सल्य के गीत गावल जाला। एह गीत में लइका के सोगहग विकास के कामना कइल गइल बा। बालमन के प्रौढ़ प्रौढ़ चीज से परिचित करावे के प्रयास कइल गइल बा। अइसने बने के सीख देल गइल बा।

  1. तोर मइया ना डोलावे

तेर बाप ना डालावे

तेाके हमहीं डोलाई

एह गीत में मइया बाप के जगह पर मउसी, मउसा, आजी-बाबा, चाचा चाची फुआ-फुफा लगा के गावल जाला। आकास में उड़त चिरई आ झुला झुलत किशोरियन के देख के झूले खातिर लइका जिद करेला। बाप मतारी कवनो कारण बस लइका के मांग पूरा ना कर पावे तब दोसर केहू नजदीकी रिश्तेदार एक हाथ लइका के दूनो गोड़ आ एक हाथ से ओकर दूनो बांह धरि के झुलावत आ गावत रहेला। एह गीत के द्वारा हमरा समुझ से लइका के अवचेतन में ई भाव भरल गइल बा कि अपना नजदीकी से नजदीकी आदमी के मददगार ना बनलो पर समाज के केहू ना केहू आगे आके मदद कर सकेला एह से खाली अपना नजदीकी रिश्तेदार के अलावे दोसरो केहू के गैर ना समझे के चाहीं।

  1. बबुआ के मइया अउरी, भर हाड़ी रिंहेली जउरी,

अपने खाली कठवतिया में बबुआ के देली उलदिया मे।।

तेही खातिर बाबू हमार रूसेलन 

उलदी कठउती के दूसेलन,

रूसल रूसल बाबू ममहर जाय,

उहंवा से अनले कनकजीर धान,

ओही धान के चुड़ा कुटाईब,

कमकजीर के चुड़ा सोरहिया-दूध,

खालऽ बबुआ जइब बड़ी दूर।।

  1. बबुआ के मामा अइले, घोड़ा पर कि हाथी पर?

कुकर  भुकत आवेला, बानर नाचत आवेला। 

चीलर काटत आवेला, सुअर देखत आवेला। 

बइठ मामा चैकी पर, अडरे मडेर के झोपड़ी

कउआ रे कहंरिया, मइनी के बजनिया 

छोटकी के तेल देनी, बड़की के आग

उठ रे जटिनिया, बेटी भइली तमासा

मामा कउआ नीचे दाढी

अब ना मामा जीही, गुड़ गुड़ हुक्का पीही। 

बबुआ के मामा आवेले 

घोड़ा पर कि हाथी पर ?

कुकुर भूंकत आवेला

बानर नोचत आवेला

चीलर काटत आवेला

सुअर देखत आवेला। 

लइकन के अपना मामा से बहुत प्रेम होला। बबुआ के मामा से बबुआ के बाप पितिया के मजाक के रिश्ता होला। एही से मामा के नांव पर उपरांकित गीतियन में हास्य व्यंग भरल गइल बा।

20 सुगवा धनवा खात बा

मार बेटी भक्षनी, गोड़ में देवो पैजनी,

खाए के देबो भोजनी

गंगा पर बिआह देब

आवे के ना जाए के 

टुसुर टुसुर रोवे के ।।

21 हाल हाल बबुआ, कुरूई में ढेबुआ

बाप दरबरूआ, मातारी अकसरूआ,

माई तोहार गइली चिचोर खनना,

सांझी खानी अइहे तऽ भर अंगना।

आदमी देखो भा आपन आंख मुंदी लेवो बाकिर वातावरण के प्रभाव से ऊ बाच ना सके। हवा-पानी हमेशा आपन प्रभाव सीधे भा घुमा के डालत रहेला। घर में द्वेष पैदा करिके सोना के कटोरा केहू ले भागल। भोजन करे-करावे बदे बाच गइल काठ के उलदी। आदमी के खून में बइठल सोना के कटोरा के संस्कार अबहीं भुलाइल नइखे। लइका के रूसले एक मात्र अस्त्र होला, जवना के प्रयोग बालगीतन में जगहे-जगह पावल जाला। चहबचा के जगह पइसा जोगा के राखे बदे माटी के कुरूई बांच गइल बा। गरदन में गुलामी के फंदा डालके दरबार कइला के बादो पेट नइखे भरत। घर-आंगन में बालक के अकसरूआ छोड़ि के भंवरा-भंवरा धाके मतारी के सामने चिचोर खने के मजबूरी सर पर सवार बा। घर के तंगेहाली से लइका ममहर जाके नीमन खाए लाएक धान ले आवत बा। एह बात में सहयोग के स्नेहिल भावना के पावल जाता। साथे-साथ भोजपुरिया संस्कृति के सुगंध भरल बा कि विवाहोपरांतो भाई अपना बहिन के भुला-त्यागि ना देवेला आ मौका पर मदद करे में आना-कानी ना करे। धरती पर उपलब्ध जानवरन में सनातनी आदमी खातिर गाय सबसे पावन-पवित्र जानवर होले। ओकरो में सोरही। जवना के पोंछ के बाल के चंवर बनेला। गाइ के स्थान उंच पीढा पावेला। बाकिर ई प्रजाती दूर हिमालय क्षेत्र में पावल जाले, भोजपुरी क्षेत्र में ना। इहां सोरही के अर्थ सोरह नीमन गुण लक्षण वाणी  समझल जाए के चाहीं। चुड़ा-दूध खा के यानि सहयोग पा के, मंजिल के दूरी बता के जीवन या़त्रा के प्रति प्रोत्साहन देल गइल बा। मिथिला क्षेत्र के गीत रहित तब चूड़ा-दूध के बदला मे चूड़ा-दही रहित। ई गीत मोतिहारी (बेतिया) तरफ के हऽ ना तऽ चुड़ा-दूध के बदला दूध-भात गावल जाइत। ऊ इलाका मीथिला से सटल क्षेत्र हऽ ऐ्ही से भात ना चूड़ा रखल गइल बा। बालपन में लइकन में कल्पना के बहुलता रहेला। धीरे धीरे वास्तविकता से परिचित करावेले सुझाव मनौवैज्ञानिक सच्चाई द्वारा उपरांकित दूनो गीतियन में मनो वैज्ञानिक भाव के उतारल गइल बा। मनौवैज्ञानिक कसउटी पर कसाला पर दूनो गीत खरा बाड़ीस।

पारंपरिक बाल गीत बालक बालिका में संस्कार के जड़ रोपे में त मददगार होखबे करेला साथ ही बचपन में अभाव का होला ई ना जाने देवे। ऊपर वर्णित गीतन से स्पष्ट बा कि गीतन के रचना बाल मनोविज्ञान के आधार पर कइल गइल रहे जे आजो प्रासंगिक बा।



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भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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