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मनोज भावुक

तेलुगु फिल्म पुष्पा पूरा उत्तर भारत के अलावा बिहार में कमाई के रिकॉर्ड बनवले बा। अब पुष्पा अमेजन प्राइम पर रिलीज हो गइल बा। बाकिर ओकरा बादो उ स्क्रीन पर करोड़ में कमाई कर रहल बा। एकरे के कहल जाला हीरो के स्टार पावर आ कहानी के जादू। ओकर खाली पांचवा सप्ताह में कलेक्शन 5 करोड़ के लगभग हो गइल बा। एह सप्ताहन के जवन कलेक्शन रिपोर्ट आइल ह, ओ में सर्वाधिक कमाई वाला हिन्दी पट्टी के राज्य में बिहार दुसरा तीसरा नंबर पर बा। ओइसे भी साउथ के सिनेमा के तरफ बिहार के ऑडियंस बहुत पहिले से शिफ्ट हो चुकल बिया। सैटेलाइट पर सबसे ढेर साउथ के फिल्म चलेला, उ पेड चैनल होखे भा फ्री टू एयर चैनल। यूट्यूब भी बिहार झारखंड के दर्शकन के साउथ सिनेमा देखे में मदद कइले बा। एही से जाहिर बा कि तेलुगु के सुपरस्टार अल्लु अर्जुन के पुष्पा अपना व्होलसम मसाला पैकेज के साथे दर्शकन के सिनेमाघर में खिंचबे करी। सवाल बा कि भोजपुरी सिनेमा के कर्णधार लोग के नींद अभियो खुली कि ना?

“पुष्पा नाम सुनकर फ्लावर समझे क्या, फायर हूँ मैं”। साँचो पुष्पा फायर ही बा। बॉक्स ऑफिस पर आग लगा देहले बा। जब कोरोना के चारु ओर हाहाकार बा, तब भारत के क्षेत्रीय भाषा तेलुगु के फिल्म पुष्पा राष्ट्रीय भाषा हिन्दी के साम्राज्य वाला क्षेत्र में आपन झण्डा गाड़ रहल बा। ऊपर से सिनेमाघर में ओकरा के चुनौती देबे खातिर हिन्दी के एगो बड़ स्टारकास्ट वाली फिल्म ‘83’ भी बा। 83 जेंगा बड़ बजट पर, 3डी में बनावल गइल रहल ह आ पूरा जोर शोर से प्रमोशन कर के रिलीज भइल ह, पुष्पा के ओकरा सामने टीके के कवनो मौका ना रहल ह। बाकिर एहीके कहल जाला जनता के मन। जनता के मन जेकरा इओर हो गइल, उहे राजा हो गइल। पुष्पा फिल्म में जवन मास अपील बा, जवन एगो मसाला मनोरंजन बा, उ दर्शक बहुत दिन से खोजत रहले हं आ जब अइसन फिल्म मिलल ह त बस सगरी प्यार पुष्पा के भेंटा गइल ह। बेचारा 83 आपन बजट भी नइखे निकाल पवले आ तबले पूरा भारत में, सिनेमाघर में पाबंदी लागल चालू हो गइल बा। पुष्पा अभियो सिनेमाघर में चल रहल बा अउरी वर्ल्डवाइड 325 करोड़ के कमाई कर चुकल बा। जे में खाली हिन्दी वर्जन 88।50 करोड़ रुपिया कमइले बा। 90 करोड़ के आंकड़ा जल्दिये छुए वाला बा। अब सोचीं कि लोग ओटीटी पर रिलीज भइला के बादो बड़ा पर्दा पर देखे जा रहल बा, हे कोरोना के महामारी में। ई ओ सब ट्रेड पंडित लोग के करारा जवाब बा जे कहत रहल ह कि ओटीटी के आधिपत्य अइला के बाद अब सिनेमाघर के जादू ओरा जाई।

कुछ दिन पहिले अजय देवगन के स्टेटमेंट आइल रहे कि स्पाइडरमैन – नो वे होम के हिन्दी वर्जन इहाँ आके दू सौ करोड़ के कमाई कर लेत बा अउरी हिन्दी के फिल्मन के बजट भी नइखे निकल पावत। उनकरे लेखां ई सवाल एह बेरा हिन्दी फिल्म उद्योग के सगरो बड़ अभिनेता, निर्माता अउरी निर्देशक के मन में उमड़त होई। पुष्पा भी दोसरा इंडस्ट्री में उहाँ के स्टार के साथे बनल फिल्म ही ह जवन हिन्दी में खाली डब भइल बिया। जब हिन्दी में डब भइल फिल्म एतना बढ़िया कमा रहल बाड़ी सन त हिन्दी के फिल्मन के साथे का भइल बा। पहिला-दूसरा लहर के बाद से खुलल सिनेमाघर में रिलीज भइल हिन्दी फिल्मन में मात्र सूर्यवंशी ही अइसन फिल्म बा जवन बढ़िया कलेक्शन कइले बिया आ सुपरहिट के तमगा लेहले बिया; ना त अउरी कवनो हिन्दी फिल्म नइखे जवन बढ़िया प्रदर्शन कइले होखे। 2020 के दिसंबर में आइल कूली नंबर 1 भी बॉक्स  ऑफिस पर कमाई कइले रहे बाकिर आपना सेन्सलेस स्टोरी के चलते आलोचना भी पवलस।

अजय के एह सवाल पर बहुत लोग के प्रतिक्रिया भी आइल। बाकिर, ई चर्चा छिड़ गइल बा कि हिन्दी सिनेमा के प्लेट से दोसर केहू आके निवाला खा जात बा अउरी हिन्दी निर्माता निर्देशक कुछ नइखे कर पावत लोग। हालांकि ई बात खाली चर्चे ले रही कि एह पर कुछ काम भी शुरू होई, ईश्वर जानें। लेकिन, आपन लचर आ रीमेक फिल्मन के अधिकता के चलते हिन्दी सिनेमा बसा गइल बा। पिछला साल सुशांत सिंह राजपूत के असमय मौत आ ड्रग्स स्कैंडल में आइल इंडस्ट्री के सगरी बड़ नाम हिन्दी फिल्म उद्योग के छवि पर जल्दी ना मिटे वाला धब्बा लगवले बा। अब लोग के लगे ओटीटी के नाम पर ऑप्शन बा अउरी एही हिन्दी जगत के सुलझल लोग बढ़िया कंटेन्ट दे रहल बा। फिल्मन में स्टार आ कुछ विशेष निर्माण कम्पनियन के एकाधिकार के चलते जवन रीमेक आ धड़ल्ले से बायोपिक के आंधी चलल बा, ओहसे दर्शक भी निजात खोजे लागल बा।

हम ई बात भले हिन्दी के संदर्भ में कहत बानी बाकिर ई हूबहू भोजपुरी सिनेमा पर भी लागू हो रहल बा। इहाँ भी स्टार कल्चर बा, स्टार के निर्णय पर सब कुछ फाइनल होखे वाला परंपरा बा। कुछ-एक निर्माण कम्पनियन आ निर्माता लोग के एकाधिकार बा। नया लोग के फफेलिया के इंडस्ट्री से बाहर कर देबे वाला गुंडागर्दी भी इहाँ बा। ओकरा बाद बेतुक के कहानी, हिन्दी आ साउथ फिल्मन के सस्ता रीमेक, कई गो फिल्मन के घोल-मट्ठा के बोलबाला भोजपुरी सिनेमा में बा। कहानी आ गीत लेखक से बंधुआ मजदूर लेखां काम करा के, फिल्म के बजट के अधिकतर माल स्टार के झोरी में उझिले वाला ट्रेंड भोजपुरी में बा। एही के चलते एगो दूर के क्षेत्रीय भाषा के फिल्म, सगरो भोजपुरिया लोगन के तथाकथित भैया, बेटा कहाये वाला स्टार लोग के कगरिया के दमदार कमाई कर रहल बिया आ अभियो बिहार में झण्डा गाड़ के चल रहल बिया।

महाराज! ई पब्लिक ह, सब जानेले। ई केहू के ना हियs, जेने एकर मन करी, ओने जाई। अगर रउआ फिल्मन में, कंटेन्ट में दम बा त साधी ना त माथा पिटीं। अब भोजपुरिया निर्माता निर्देशक लोग एह खतरा के भांप भी सकेला लोग कि ना, ई त ओ लोग के विवेक जानो!


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मनोज भावुक

फिल्मी दुनिया में कुछ भी स्थायी नइखे, जइसे उ दुनिया कागज के बगइचा बा, ओसहीं उहाँ रहे वाला लोग भी कागज के फूल बा। जे में सुगंध से लेके सुंदरता तक सब नकली बा। जब कई कई साल पुरान रिश्ता के टूटल आदमी देखेला त दिल मसोस के रहि जाला। मन में टीस उठेला कि अइसन कइसे हो सकत बा। ई दुनू लोग त साथे बड़ा निम्मन से लउकत रहल ह लोग। हाल हीं में धनुष अउरी रजनीकान्त के बेटी ऐश्वर्या रजनीकान्त आपन 18 साल पुरान शादी के रिश्ता खतम करे के ऐलान कइल ह लोग आ ओकरा बादे से सभ प्रशंसक वर्ग में अउरी मीडिया में एही बात के चर्चा हो रहल बा।

फिल्मी दुनिया में अइसन पुरान पुरान रिश्ता टूटल कवनो नया बात नइखे। ई अक्सर होत रहेला। हालांकि एकर प्रतिशत हॉलीवुड में बहुत ज्यादा बा। उहाँ कब कवनो नामी चेहरा केहू के साथ गलबाहियाँ कर रहल बा, जिए मरे के बात कर रहल बा अउरी कब केहू अउरी के हाथ में हाथ डाल के घूमे लागेला, बुझइबे ना करेला। कम से कम भारत के सांस्कृतिक विरासत अउरी सामाजिक बनावट के लोग थोड़ा खेयाल भा लिहाज करेला, एही से जल्दी रिश्ता तूरे में हिचकिचाला। बाकिर जे तरे रिश्ता टूटे के आवृति बढ़ रहल बा, बुझाता भारत के भी इलीट भा अभिजात्य वर्ग कहाये वाला फिल्म इंडस्ट्री के लोग के हॉलीवुड से ढेरे प्रेरणा मिल गइल बा।

धनुष आ ऐश्वर्या रजनीकान्त के टूटल एतना पुरान रिश्ता के जइसन कुछ और फिल्मी रिश्ता के कहानी बा जवन कई साल सफलता से चलला के बाद टूट गइल। हालांकि अइसन बहुत साल पहिले से होत आ रहल बा। फिल्म के शुरुआती दौर में भी अइसन रिश्तन में टूट आ चुकल बा। धनुष साउथ के सुपरस्टार हवें। उ आपन करियर के शुरुआती दिन में रजनीकान्त के लइकी पर दिल हार गइलें आ उनका से बियाह कर लिहलें। दुनू जाना के लव स्टोरी भी बड़ा चर्चा के विषय रहे अउरी उ दुनू जाना के बीच के मधुर संबंध के अक्सर मीडिया अउरी लाइफस्टाइल पोर्टल उदाहरण के जइसन पेश करत आइल बा। एही के चलते जब दुनू जाना के बीच तलाक के खबर आइल बा त सभे शॉक में बा। धनुष के इंडस्ट्री में उनका अभिनय कला खातिर प्रतिष्ठा त बटले बा, उनके मेगास्टार रजनीकान्त के दामाद होखला के भी बड़ा इज्जत रहल बा। सभे एह कारण से भी उनके बड़ा मान देहले बा। ई बात बिल्कुल नकारे वाला नइखे कि धनुष के एगो बड़ प्रशंसक वर्ग उनके रजनीकान्त परिवार से जुड़ला के चलते भी चाहेला। जवन एह निर्णय के बाद उनका से जरूर नाखुश होई। अब एह ऐलान के धनुष के करियर पर कवनो विपरीत असर पड़ी कि ना पड़ी, ई भविष्य में पता चली।

अइसन ही एगो बिछुड़ाव साउथ के महान अउरी सहृदय अभिनेत्री सावित्री गणेशन के साथे भी भइल रहे। सावित्री के उतार चढ़ाव से भरल जिनगी पर एगो फिल्म भी बनल ‘महानती’(2019)। एह फिल्म के तीन गो राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिलल। सावित्री तेलुगु आ तमिल के बहुत चर्चित अभिनेत्री रहली आ उनके नया पीढ़ी में भी बड़ा इज्जत रहल बा। उनके इंडस्ट्री में सबसे पहिले स्पॉट कइले रहलें साउथ के हीरो जेमिनी गणेशन। जेमिनी के चलते उनके फिल्मन में ब्रेक मिलल आ ओकरा बाद दुनू जाना अपना करियर के शुरुआती फिल्म साथ में कइल लोग। सावित्री के आँख आ हाव भाव के लोग एतना दीवाना रहे कि उ देखते देखते अपना टाइम के सुपरस्टार हीरोइन लोग के पीछे छोड़ के खुद सबसे बड़ अभिनेत्री बन गइली। उनके जेमिनी से प्यार हो गइल जबकि उ पहिले से शादीशुदा रहलें अउरी दू गो बेटी के बाप। दुनू जाना के बीच प्यार बढ़ल त बियाह कर लिहल लोग आ साथे रहे लागल लोग। बाद में सावित्री के दू गो संतान भी भइलें। सब कुछ बढ़िया चलत रहे तले एगो अइसन समय आइल जब जेमिनी गणेशन सावित्री के सफलता से असुरक्षित महसूस करे लगलें। उनके पहिले भी शादी में अफेयर रह चुकल रहे। सावित्री के साथ भी शादी के बादो अफेयर रुकल ना। ई एक बार सावित्री के पता चलल आ दुनू जाना के रिश्ता टूट गइल। ई रिश्ता 16 साल बाद टूटल रहे। एकरा बाद सावित्री बहुत बुरा तरे टूटली अउरी फेर कबो उभर ना पवली। उ शराब के लती हो गइली आ फेर सब धन दौलत बर्बाद हो गइल। 45 के उमिर में सवित्री गणेशन एह क्रूर दुनिया के छोड़ देहली।

अइसने एगो लमहर रिश्ता टूटल रितिक रोशन अउरी सूजैन के। दुनू जाना बचपन से एक दुसरा के जानत रहे लोग बाकिर जवान भइला पर एक दुसरा खातिर प्यार जवान भइल। फेर दुनू जाना 2000 में बियाह कर लिहल लोग। रितिक तबे फिल्मन में डैब्यू कइले रहलें। दुनू जाना के देहि से दूगो बेटा भी भइलsसन। बाकिर ई प्यार के रिश्ता 2013 में अपना अंजाम पर आ गइल अउरी दुनू जाना अलग होखे के घोषणा कइल लोग। 14 साल के रिश्ता खतम हो गइल। कारण पता चलल कि रितिक काइट्स के हीरोइन बारबरा मोरी के नजदीक हो गइल रहलें। एने सुजैन अर्जुन रामपाल के करीब होत रहली। खैर दुनू जाना अभियो एक दूसरा से संपर्क में बा लोग पूर्व पति पत्नी के रूप में। बाकिर शादी जइसन खूबसूरत रिश्ता खतम हो गइल।


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प्रकाश उदय

॥ सुनला प लागे कि सुनत जवन बानीं तवन केहू से कहियो कुछ सुनले कहीँ बानीं त अहोभाग, लागे कि सुनले जवन बानीं तवन एहू से सुनिए के मानीं, अबकियो, एजुगियो, त अहोअहोभाग… ॥

बादशाहूदीन बादशा के बादशाही में जहाँ कहऽ तहाँ, जतना कहऽ ततना, अमन कहऽ अमन, चैन कहऽ चैन। बादशाहूदीन बादशा जेके चाहें कि डेराय, का मजाल कि ऊ ना डेराय ; जेके चाहें कि ना डेराय, का मजाल कि ऊ डेराय।

त एक दिन के बात कि बादशाहूदीन बादशा के मन में आइल कि अहेर करे जाईं। कहला के कवन कहे, चहला के देर, कि मंत्री-संत्री सब तइयार, फौज-फाटा सब तइयार। बादशा से पुछाइल कि नया जंगल बनावल जाय, नया जनावर जुटावल जाय कि पुरनके से काम चलावल जाय ? बादशा अपना एक अँगुरी में धइलन कि नया जंगल बनावल जाय, नया जनावर जुटावल जाय, एक अँगुरी में धइलन कि पुरनके से काम चलावल जाय आ जिन्ह पुछले रहन कि नया जंगल बनावल जाय, नया जनावर जुटावल जाय कि पुरनके से काम चलावल जाय, उनुके के अँगुरी धरवलन। ऊ आँख मून के जवन अँगुरी धइलन, तवना से पता चलल कि नया जंगल बनावल जाय, नया जनावर जुटावल जाय।

त मंत्री-संत्री कहलन कि ठीक बा सरकार, दस-बिस साल देल जाय, दस-बिस लाख दियावल जाय, कि नया बनावल जाय, नया जुटावल जाय। बादशा अपना खजाना में झँकले त दस-बिस लाख त एहू सनूक में, ओहू सनूक में, दस-बिस साल ना एह सनूक में ना ओह सनूक में। त बादशा ओह दस-बिस-साल-लगवइया, दस-बिस-लाख-लगवइया अँगुरी के धरवइया के दस-बिस कोड़ा के सजाय तजबीज कइले आ अबकी जब अँगुरी धरवले त बताऽ के कि कवना अँगुरी में नया बनावल जाय, नया जुटावल जाय, कवना अँगुरी में पुरनके से काम चलावल जाय। त आँख खोल के अबकी जवन अँगुरी धरवइया धइलन तवना से पता चलल कि पुरनके से काम चलावल जाय। बादशा अबकी उनुका के दस-बिस लाख के इनाम-इकराम तजबिजले आ अहेर करे चल दिहले, बिना ई बतवले कि पहिले कवन दिआय, दस-बिस कोड़ा के सजाय, कि दस-बिस लाख के इनाम-इकराम। देनिहार कहले कि पहिले दस में बीस जोड़ के सजाय देब, तब बीस में से दस घटाऽ के इनाम। लेनिहार कहले कि पहिले दस में बीस जोड़ के इनाम लेब, तब बीस में से दस घटाऽ के सजाय। देनिहार कहले कि फोकट में ? लेनिहार कहले कि अँइसे कइसे कि फोकट में, हमार कवनो ईमान-धरम नइखे ?! दूनो जना अपना-अपना फेंटा में से आपन-आपन ईमान आ आपन-आपन धरम निकलले आ मोल-भाव में लगले।

ओने अहेर में, राजा आगा-आगा, फौज-फाटा पाछा-पाछा, जंगल के जनावर सब आड़ा-अलोता। एक दिन बीतल, दुसरको दिन बीतल, तिसरको बीतल। तरकस में धइल-धइल तीरलोग लागल मुर्छाय, मियान में धइल-धइल तरुआरलोग लागल मुर्चाय। ई मुर्चाइल जब खुदा मियाँ से ना सहाइल त आड़ा-अलोता लुकाइल एगो हरिना के हर लेले मति। नया-नया जवान भइल हरिना चौकड़िया मारे खातिर लागल छेरिआय। बाप-मतारी समझवले, भालू-बाघ से डँटववले, ना मानल, बीच राह में मारे लागल चौकड़िया। बादशा के नजर परल, घोड़ा धउराऽ देले। बादशा के बरोबरी भला फौज-फाटा कइसे करी, जतने राजा पीछा करत जायँ, ततने फौज-फाटा पिछुआइल जाय। कोस भर गइले राजा, तले मामा सियार के सलाह से, दोसर एगो हरिना अपना के दहिने लउकाऽ देलस। दहिनवारा के पाछा कोस भ धउरले राजा, तले तीसर एगो हरिना अपना के बाँए लउकाऽ देलस, बँयवारा के पाछा राजा कोस भ धउरले तले चउथा एगो दहिने, ओकरा देने कोस भ धउरले तले पँचवा एगो बाँए। त धउरत-धावत घोड़ा मने-मने कहले कि परवरदिगार ! भूले से, भटके से, कवनो जो पछिला जनम में, हम रहुँईं बादशा आ ई रहुए घोड़ा, त आज, एकरा के, जतना मन ओतना भगावे द, हमरा के भागे द, बाकिर, ना रहे पहिले जो अइसन, त भूले से, भटके से, कवनो जो अगिला जनम में, हम होईं बादशा आ ई होय घोड़ा, त अपने तू रहिहऽ भा हो जइहऽ गायब, बाकिर, भगावे भ, भागे भ जंगल त कम-से-कम, रखिहऽ तू कायम !

बादशा पसेने-पसेन, घोड़ा फेने-फेन। फौज-फाटा के कहीं अता-पता ना। हरिना — पहिलको, दुसरको, तिसरको, चउथको, पँचवो — हेन्ने गइले कि होन्ने गइले, का पता केन्ने गइले ! अब त बदशहवो से, घोड़वो से, भूख कहे कि हम्हीं हतब, पियास कहे कि हम्हीं ! रस्ता कहे कि हम मिलबे ना करब। बाकिर जब केहू ना, कुछुओ ना आवे काम, तब जे कामे आवे ऊहे अल्लाह, ऊहे भगवान। ऊ बाघ बन के अइले आ रस्ता देखइले। ओहर बाघ लउकले, एहर घोड़ा बिदक के चलले भाग। एह भगला में बादशा के बड़ी बेइज्ती रहे, बाकिर एक त कि केहू एह भगला के देखवइया ना, दोसरे कि बादशा अपने त भागत ना रहन, भागत त रहे घोड़ा, आ तिसरे कि भगला में राह-रस्ता मिलत गइल आप से आप, आ चउथे आ पँचवे कि भूख बिलाऽ गइल, पियास हेराऽ गइल।

भला भइल कि ए भगला में जंगल छूट गइल। जब दुचार कोस छूट गइल त घोड़ा के भहराइल बादशा देखले, बादशा के भहराइल घोड़ा देखले, तीसर केहू ना देखल। जले बेहोश रहल गइल तले बेहोश रहल लोग, जब ना रहल गइल त आपन भूख-पियास के लेले-देले ठाढ़ भइल लोग। ठाढ़ भइला के बाद जले घोड़ा चरत रहले, बादशा हहरत रहले। हहरत-डहात, मने-मने कहले कि परवरदिगार ! भूले से, भटके से, कवनो जो पछिला जनम में, हम रहुँईं घोड़ा आ ई रहुए बादशा, त आज, एकरा के, जतना मन ओतना चरे द, हमरा के हहरे द, बाकिर, ना रहे पहिले जो अइसन, त भूले से, भटके से, कवनो जो अगिला जनम में, हम होईं घोड़ा आ ई होय बादशा, त अपने तू रहिहऽ भा हो जइहऽ गायब, बाकिर, चरे भ, हहरे भ हरियरी त कम-से-कम, रखिहऽ तू कायम !

त जवन परवरदिगार घोड़ा के घास लहववले ऊहे परवरदिगार बादशा के देखवले कि दूर दक्खिन देने धुँआ उठत बा। केहू त मिली उहाँ, ईहे सोचत, आ केहू त मिले उहाँ, ईहे मनावत बादशा जब उहँवा पहुँचले त पवले कि एगो खेत बा, खेत के आर बा, खेत में सुस्तात दुगो बैल बा आ आर प सुस्तात एगो बंदा हरवाह बा। घइला में पानी बा आ खाय के तइयारी बा आ चिलम प चढ़े खातिर आग धुँआत बा। पानी देखते पियास बुझाइल कि बादशा के उठाऽ के पटक दी, रोटी देखते भूख बुझाइल कि सँउसे बादशाही गटक ली। चहले कि माँगीं त माँगे ना आइल, चहले कि हाथ पसारीं त हाथो पसारे ना आइल। बादशा के पहिला बेर बुझाइल कि मदरसा के उस्तादलोग उनुका के जवन पढ़ावल, जवन सिखावल तवन सब कुछ अनेर, कूड़ा के ढेर। घोड़वा देखलस त हींक भ हँसल हिनहिनाऽ के कि कइसन कुपातर करमहीन बदशहवा ई सरवा कि एकरा माँगहूँ के लूर ना, हाथो पसारे के सहूर ना। अघाइल घोड़ा के हिनहिनात हँसी भुखाइल बादशा के सहले ना सहाइल। मारे खीस के एँड़ी से मूँड़ी ले कँपकँपात, मारे पित्त के भितरी से बहरी ले पितपितात, जनाइल जे पछाड़ खा के, पिछवड़िए, अब गिरले, तब गिरले, तले अइसन बड़का अगमजानी ऊ बंदा हरवाह कि धउरल आ गिरत बादशा के अँकवारी में ध के खेत के आर प बइठाऽ देलस। बइठाऽ के, अइसन बड़का बैद ऊ बंदा हरवाह, कि ना नाड़ी प अँगुरी धइलस ना लिलार प तरहत्थी, आ बिना कुछ बतवले बूझ गइल कि बेरमिता के कवन बेरामी, आ तवना बेरामी के कँउची दवाई। अधध सेर के दूगो बजरा के रोटी में से एगो उठवलस आ चुटकी भ नून में से चुटकी भ नून आ आठ परत पियाज में से चार परत पियाज के साथे बेरमिता बेचारा के हाथ में दवाई के पहिला खोराक बनाऽ के धइ देलस कि ए बाबू खा ल, राम चहिहें त राम हो जाई — मुँह में रखते, चहु त परते, कंठ से उतरते। बादशा के उस्तादलोग में से केहू ना सिखवले रहे रोटी के हाथ प राख के, नून में बोर के, पियाज के दाँते से काट के खाय के, बाकिर का, कि खइले त खवाऽ गइल,  मेटा में मुँह लगा के जब पियले पानी त पियाऽ गइल, आ इहाँ तक कि दवाई के दोसरका खोराक त बिना बैद बंदा हरवाह के दिहले, अपने से उठाऽ के अइसन चापुर-चापुर चबा के खाय उनुका आ गइल कि ओह चपर-चपर-चापुर-चपुरहट के सुन के बंदा हरवाह त बंदा हरवाह, घोड़वो के मिजाज गनगनाऽ गइल।

बजरा के अधध सेर के एक-प-एक दू-दू गो सँउसे-सँउसे रोटी खइला आ मेटा भर पानी घेंटा भर पियला के बाद बादशा देह झार के ठाढ़ भइले, सके भर मुँह बा के ढेंकरले आ ढेंकरले त अपना एह ढेंकरला में उनुका साज-संगीत के सकल सुर-ताल-झनकार एक्के साथे सुनाइल। तवना के बाद जब भर नजर दुनिया-संसार-ओर तकले त पवले कि ई एगो नवके दुनिया, नवके संसार। चहचह-महमह-गहगह। बाकिर, एही झोंक में जब ऊ बंदा हरवाह के देखले त पवले कि ऊ त माथे हाथ हाथे गाल ध के बइठल बाड़े। पुछले कि ए भाई, का बात, कवन अइसन आफत, कवन अइसन बीपत, हमरा से बतावऽ, हम बादशाहूदीन बादशाह, चाहीं त पल में पहाड़ दीं ढाह, चाहीं त पल में पहाड़ करीं खाढ़। त कहले बंदा हरवाह कि भुक्खड़ तुनाहीं, दुन्नो-के-दुन्नो हमार रोटी भकोस गइलऽ, एक्को कवर हमरा खाती छोड़लऽ ना, अब गोहट के मारी, तोहार बाप कि मतारी ? त बादशा निकलले तरकस से तीर, मियान से तलवार, कि तू हमार पकिया इयार, बतावऽ कहँवा बा गोहट, तीर से मार के, तलवार से गुरिएगुरी काट के, पोरसा भर जमीन में गाड़े खातिर बानीं तइयार…। बंदा हरवाह हरान-हलकान कि ना आँख के देखल ना कान के सुनल अइसन कवनो बुड़बक-बउराह कि गोहट मारे खातिर तीर-तलवार लेके ठाढ़ ! सोचले कि ना एकर पगलेटई छोड़ाइब त एकरा बाप-मतारी के कवन मुँह देखाइब ! त कहले कि हे हो, हई नौटंकी के लाल-पियर कपड़ा उतारऽ, हा ल अँगौछी, करिहाँव में बान्हऽ, तीर-तलवार के फेंकऽ फरदाँवा, कुदारी उठावऽ आ हमरा पाछा-पाछा आवऽ…।

बादशा जब अचकन-पचकन जोड़ा-जामा जिरह-बखतर उतरले त जनले कि उघार देह के छू के जवन बहेला, तवन एगो दोसरे बयार। हहरल हियाव, हींक भ एह आ-हा-हा छुअहा बयार में नहइले। खाली गोड़े फिल्ली भर पाँकी-पानी में उतरले त अपना दरबार के गुलगुल गलइचा के मने-मने गाँज भ गरियवले। बंदा हरवाह पहिले त अपने गोहट मार के बतवले कि हँइसे, आ हँइसे ना हँइसे, तब कुदारी थम्हवले कि ल, लाग जा, गोड़ बचाऽ के, हाथ बढ़ा के…।

बादशा पहिला छेव मरले त छप से सुनाइल। अचंभा में पर गइले कि अइसन बाजा त आज ले देखलीं ना, अइसन बाजल त आज ले सुनलीं ना। त तन-मन दूनो लगाऽ के लगले बजावे। लगले बजावे त आर प बइठल बंदा हरवाह लगले गावे। सात दिन असहीं गावत-बजावत बीतल। बादशा अपना के हर-हेंगा खुरुपी-कुदार सब प अजमवले, सातो दिन दिन-दिन भ पसेने नहइले, साँझ-बिहान हचक के खइले आ अतना सराह के खइले ऊ अपना भउजाई के हाथ के बनावल कि उनुका के उनुकर भउजाई, बंदा बो हरवाहिन, सातो दिन एक रोटी अधिके खियवली, अपना सवांग से। आ तवना के बाद, खरहरे खटिया प सुतले त हाय हो राम, एक्के सुतान अनगुत्ते उठान !

बाकिर का, कि घोड़ा हलकान। सातो दिन पाँचो बखत घोड़ा के एक्के कहनाम कि या अल्लाह, भला कि हमरे के घोड़ा बनवलऽ, बदशहवे के बनवलऽ बदशाह ! सातो दिन पाँचो बखत घोड़ा के एक्के कहनाम कि परवरदिगार, जइसे बदशहवा के, हमरो के सरवा ई बंदा हरवहवा, अद-बद के हर में, हेंगवाही में कहियो मत नाधे !

घोड़वा देखलस कि बदशहवा के खेती-किसानी के सवख बढ़ियाइले जाता, बढ़ियाइले जाता बजरा के रोटी आ नीमक-पियाज से नाता, गहिराइले जाता बंदा-बादशाव के इयारी, त लागल साँझे-बिहाने दुपहरिए-अधरतिए हिनहिनाय। बादशा के बाकिर, ऊ हिनहिनाइल, ना साँझे-बिहाने सुनाइल, ना दुपहरिए-अधरतिए सुनाइल। ना सुनाइल, त सतवाँ दिने होत बिहाने जवन हिनहिनान घोड़ा हिनहिनइले तवना में उनुकर आपन हिनहिनाइले ना रहे खाली, ईहो रहे कि गोतिया-देयाद के हाथे बदशहवा के राज-पाट अब लुटाइल कि तब लुटाइल, ईहो रहे कि अलनिया बेगम हेन्ने ढिमिलाइल, फलनिया बेगम होन्ने ढिमिलाइल, कि मंत्री-संत्री सभकर ईमान अब बिकाइल कि तब बिकाइल !

त अबकी के हिनहिनाइल बादशा के कान से करेजा ले हेल के सुनाइल। कहले कि भाई हो बंदा हरवाह, इयारन के इयार, अब त हम रहे ना पाइब, जाइब। बंदा कहले कि भैवा रे, बोलवला से त आइल ना रहले त रोकला प रुकबे तें कइसे ! हम के आवे वाला के आइल रोके वाला, जाए वाला के जाइल रोके वाला ! अतने रहे कि रह-सह के जइते त बाल-बच्चन खातिर चूरा-चाउर कुछ लेले जइते…। ईहे बा कि ई कुल्ह त अइसन चीझ कि देह-जांगर जहँवे चलइबे तहँवे पइबे। कहले कि नाम तोर बादशा, से त ठीक, बाकिर ई ना कि नामे के नीचे जँताऽ जाय मनई। ई का कि नाम धराइल बा बादशा त अन-मन उन्हनिए-अस घूमल जाय घोड़ा प चढ़ के, फेंटा में बन्हले तलवार, पीठ प तरकस, हाथ में धनुही ! हमार बात मनबे, आ अरियात-बरियात में किराया प चलइबे ई घोड़ा, ई तीर-तरुआर, ई जोड़ा-जामा, त हमरा त बुझाता कि एहू से खाय भ कमइबे…।

बादशा मूँड़ी गोत के सब सिखवन सुनले। जात-जात कहले कि तब्बो ए साथी, कब्बो जो कवनो सकेता में परिहऽ त दिल्ली-ओर अइहऽ, केहू से पूछ लीहऽ नाँव, नून के सैरियत चुकावे के इचिको जो पून हम पाइब त माथे चढ़ाइब…। हँसले सुन के बंदा हरवाह कि मितवा, बुझाता कि नाम के घून तोरा भितरे ले घूस के बइठल बा, ना त तेहीं बताव कि नून त आइल बा समन्दर से, कवन कहीं कि हमरा अंदर से ! त सैरियत चुकावल जे चाहे से लंका-दुअरिका ले जाय, चुकावे। हमरा त पास, एह सात दिन के संगत प, तोरा खातिर बस एक्के गो चीझ — दुलार। लेबे त ले, आ जो। त कहले बादशा कि दे दें। त बंदा हरवाह उनुका पीठ प घोंय-घोंय धइले दुइ हाथ, ध के ऊहो डबडबइले, धरवाऽ के बादशाहो डबडबइले। घोड़ा बाकिर मउज में आ गइले। सोचले कि बदशहवा के पीठ प दुचार घोंय अवरू जब हो जाय, तब्बे अब इहँवा से आगे बढ़े डेग। खुदा मियां के घरे ना देर ना अन्हेर। बंदा हरवाह के हाथ-हरमुठाह के अगिला घोंय घोड़वा के अपने पीठ प आइल, आ दुसरका आइत, एकरा पहिलहिंए ऊ सामकरन घोड़, आन्ही से ले लिहले होड़…।

दिन बीतल दिने भ में, महीना के बीतत महीना भ लागल, साल भ लागल साल के बीते में, आ साले भ में ओह साल के बितला साल भ हो गइल। एकरा बादो, ना दिन आपन बीतल छोड़लस, ना महीना आपन, ना साल आपन। बाकिर, ना जानीं कि कतना दिन, कतना महीना, कतना साल के बाद एगो अइसन साल आइल जवना साल असाढ़-सावन त बरिसल भादो ना बरिसल। तवन साल बीतत-बीतत बीतल। अगिला साल असाढ़ त बरिसल, सावन-भादो ना बरिसल। तवन साल बितावत-बितावत बीतल। अगिला साल बाकिर, ना असाढ़-सावन बरिसल, ना सावन-भादो बरिसल। तवना साल दिन बीते तब त महीना बीते, महीना बीते तब त साल बीते ! बंदा हरवाह बैलन के खूँटा से खोल देले कि मनइन के त अपना घर-परिवार से बन्हाऽ के मुँअही के बा, तोनहन के त कम से कम, मूँए खातिर त कम से कम, छुट्टा मैदान मिले ! जात-जात बाकिर, दहिनवारा बैल कहले बँयवारा के सह पा के, कि बंदा बउराह, अपना इयरवा बदशहवा के भुला गइलऽ का कि का कहले रहे… कहले रहे कि कब्बो जो कवनो सकेता में परिहऽ त दिल्ली-ओर अइहऽ, केहू से पूछ लीहऽ नाँव, नून के सैरियत चुकावे के इचिको जे पून हम पाइब त माथे चढ़ाइब…।

त कहले बंदा हरवाह कि ई ऊ कहले रहे त हम का कहले रहीं तवन भुलाऽ गइल का ! त कहली बंदा बो हरवाहिन कि खेतिहर खातिर त, की त खेत, ना त मैदान। त देस के खेत में त एसों कुछ बा ना, त जा, दिल्ली के मैदाने में जा। त कनमनइले बंदा हरवाह कि जइसन बेचारा ऊ बादशा, तइसने त होई ओकर दिल्ली आ दिल्ली के मैदान ! जोड़ा-जामा कस के, तीर-तरुआर में फँस के, बहुरुपिया-अस सज के, आ घोड़ा प चढ़ के, दू रोटी खातिर देस-देस मारल फिरल जवन ऊ बेचारा बादशा, सेकरा दुआर प, केहू बतावे कि वाजिब बा का, एह अकाल-दुकाल में, हमरा-अस आन-अनगँइया के जा गिरल ? त कहली बंदा बो कि ऊ आके गिरल रहे का ? त कहले कि ना। त कहली कि आन के मान के खेत में खटल रहे का ? त कहले कि ना। त कहली कि ऊ ना गिरल त तू काहे गिरबऽ ! ऊ ना मनलस जब आन-अनगँइया, त तू काहे मनबऽ ! ओकरा खटत लाज ना त तहरा खटत लाज का ! जहाँ खटत होई खट लिहऽ, जहाँ थाके-थहराय तहाँ सम्हरिहऽ, जहाँ थकिहऽ थहरइहऽ तहाँ सम्हारे त सम्हारे दिहऽ। इहँवा त ‘ना’ बा, उहँवा, के जाने होखे कुछ ‘हाँ’, त होखे भा ना, बाकिर होखी, एतने के असरा में जा। आ हमरो के असरा धराऽ के तू जा। जा, कि बालू-ह-जानि-के-झँउरि-मरे-हरिना, तवना से नीमन कि पानी-ह-मानि-के-धउरि-मरे-हरिना… !

बाकिर का, कि बंदा हरवाह जब जतरा प चलले, बंदा हरवाहिन के रोआई, बुझाइल कि ओरियइले ना ओराई। सुनले त बंदा चउकठ ले जा के लवट अइले। त बंदा बो के फेरू से परल समझावे कि हो सँइया, बालू-ह-जानि-के-झँउरि-मरे-हरिना, तवना से नीमन कि पानी-ह-मानि-के-धउरि-मरे-हरिना… ! त कहले कि सहात नइखे बाकिर, तहार रोआई, त कइसे जाईं ! त कहली कि जइसे हमरा खातिर, ओसहीं तोहरो खातिर, रोआई, नाहिंए सहइला के दवाई। त रो ल, बाकिर का, कि खेत-ओर पीठ करऽ, कुरुखेत मुँहे हो ल। त बंदा हरवाह खेत-ओर पीठ कइले, कुरुखेत मुँहे हो गइले।

अब जब चल देले बंदा हरवाह, आ चलते रहले त आज भा हप्ता दस दिन बाद, जहाँ पहुँचे के रहे तहाँ कहियो-ना-कहियो त पहुँचहीं के रहे। त कहिया पहुँचले, ई त पता ना, बाकिर जहिया पहुँचले, तय बात कि तहिया पहुँचले। पहुँचले त हप्ता दस दिन त चिहाते-सिहात बीतल। बाकिर, केहू कतना दिन चिहाई, कतना सिहाई ! खाली चिहइला-सिहइला से कहिया ले पेट पटाई ! बाकिर, ईहो कवनो कम चिहाय लायक थोरे कि पेट पोसाय में खास कवनो दिक्कत ना दिल्ली में, जेकर बोझा उठा दें, ऊहे कुछ-ना-कुछ धराऽ दे। बाकिर, बंदा हरवाह के एक दुख ईहो कि उनुकर भरलो रहे पेट, आ ऊ कहबो करें कि कुछ चाहीं ना, तब्बो, जेकर बोझा उठावें ऊ जबर्दस्ती कुछ-ना-कुछ पकड़ाऽ दे। केहू मनबे ना करे कि केहू केहू के बोझा असहूँ उठावेला, उठवला खातिर अलगा से कुछऊ ना चाहेला, जवन पावे के होला, ओही उठवला में पा लेला। कहियो कहबो कइले केहू से कि भइया रे, हमरा कुछ चाहीं ना बदला में…। सुनले त भइया-रे सकपकइले कि भला अँइसे कइसे कि कुछ चाहीं ना बदला में ! त बतवले बंदा कि बात बस अतनवे कि सकेता में देखलीं हा तहरा के, त देख के रहाइल ना हमरा से। सुनते ऊ भइया-रे उठावल बोझा पटक के भड़क गइले कि तोरा बेमतलब के मदद के जरूर-से-जरूर भितरिया कवनो मतलब बा, कुछ-ना-कुछ साजिश बा एम्मन, कवनो-ना-कवनो खटजंतर बा ! का बा बता दे, ना जो बतइबे त थाना पहुँचाइब, उल्टा लटकवाइब, डंटा से पुछवाइब। बंदा हरवाह हलकान कि कइसन कुदेश ई दिल्ली ! कि कइसन बउराह बदशहवा कि आन बसल इहँवा, अइसन कुजगहा ! बाकिर का, कि आज त बदशहवे बचवलस बंदा हरवाह के जान। दूनो हाथ दसो नोह जोड़ के बतवले कि हे हे हे हे भइया-रे, हमरा बेमतलब ए मदद के, एक इहे मतलब, कि बदला में रुपया ना, पइसा ना, हमरा के हमरा बिछुड़ल संघतिया से कसहूँ मिलवा दे। पुछले कि का नाँव तोहरा संघतिया के ? बंदा बतवले कि बादशा। सुनले त अवरू तनतनाऽ गइले भइया-रे कि का रे, हम थाना के ले लिहलीं नाँव, त बदला में तें हम के एक्के बे बादशा के देबे भौकाल ?! फटहा धोती आ लटहा बबड़ी के अइसन ! अतना !! अतहत औकात !!! बंदा बतवले कि ना-ना-ना भइया-रे, बादशा त बस ओकर नाँव ह, ऊ त बेचारा बस नाटक-नौटंकी के सवखल इन्सान, बजरा के रोटी पियाज खाती ललचत आ हरवाही-हेंगवाही-कुदरवाही में निकहा फरहर…।

भला अइसन कवन बादशा… भइया-रे लगले इयाद पारे। उठ के परले इयाद, बइठ के परले इयाद। ओठंग के परले इयाद त परल इयाद कि हो-ना-हो, फलनवा के पूत चिलनवा…। ऊहे नौटंकी के अइसन रसिया कि बापो से बोले त बोले कि ‘हे बाप’, माइयो के ‘हे माई’ कह के बोलावे। ऊहे कि एक बात एक डेग अगवढ़ बढ़ के बोले, त एक बात बोले पिछवड़ हट के, ऊहे कि हाथ से बतावत, मुँह से बतियावे। ऊहे कि एक बे बादशा बन के उतरल नौटंकी में त अतना जमल, अतना जमवलस कि तहिए से बाश्शा-बाश्शा लागल कहाय। कहीं ऊहे त ना ? त भइल कि कवन ठेकान ! त भइया-रे बंदा के हाथ धइले, धइले-धइले बाश्शा किहाँ पहुँचइले। बाश्शा के देख के बंदा जब मुँह बिजुकवले कि कहाँ हमार बादशा सजीला-गठीला आ कहाँ ई बाश्शा मरगिल्ला, त बाश्शा अँइसे कि जइसे गिड़गिड़ाऽ के कहले कि तनी आगा-पाछा होके निरेखऽ, तनी दहिने-बाएँ होके देखऽ, के जाने हमहीं होखीं, ना जादे अधिका त थोरहूँ-थोर ! बंदा बात मनले, आगे-पीछे होके देखले, दहिने-बाएँ होके निरेखले आ बतवले कि ना हो, तू त ऊ केनियो से इचिको भ हइए ना हउअ, ना अधिका ना थोर। सुन के ई बाश्शा, अइसन जब बित्ता भर मुँह लटकइले कि जइसे कि टूट गइल उनुकर पुरान कवनो आशा, गुनावन में पर गइले बंदा हरवाह, कि कइसन ई कइलीं अनजानल-अनचाहल अपराध। त हँसले ठठाऽ के अचक्के में बाश्शा कि धत् मर्दे, हमरा खातिर त का आस आ का निरास — सब-के-सब निछुने नाटक ! तू बाकिर मत होखऽ इचिको हलकान, बादशा इयार तहार जो ना भेंटइले, त बूझऽ जे नया एगो बन गइले बाश्शा इयार। जवन रूख-सूख खाइब तवन तोह के खियाइब आ तोहरा के तोहरा बादशा इयार से मिलवाइब।

शुरू भइल जोहाई। बंदा के बतवला मोताबिक, लागल जोहाय कि कवन अइसन बादशा कि जवना किहें आपन, निज के, लाम-लहकार बरियार एगो घोड़ा। जोह पहुँचल तीन गो इकवान किहाँ, दू गो साईस किहाँ। एगो त अइसन बादशा भेंटइले जिनिका किहाँ एगो घोड़ा के के कहो, सैंतीस गो गदहा प ईंटा ढोआय। कहले कि भले हम ना निकलनीं तोहार वाला बादशा, बाकिर चाहऽ त दू गदहा ले ल, आजे से लदनी में लाग जा, अधिका अपने कमाऽ, तनिका हमके कमवावऽ। त कहले कि काहे ना कमाइब, काहे ना कमवाइब, बाकिर तब जब अपना हम भाई बदशहवा के पा जाइब। कहबऽ त ओकरो के लिवा आइब, जवन घोड़ा धउरावे में माहिर, सोचऽ कि कइसे ना होई ऊ गदहा चलावे के काबिल !

बंदा के बतवला मोताबिक जब लागल जोहाय कि कवन अइसन बादशा कि जवना के जोड़ा-जामा लाल पियर हरियर लहरदार, त जोह जाके  धोबघाट पहुँचल, जहाँ धोबी के एगो, एगो लरिका नादान, अमीर-उमरा कवनो गाहक के, रंग-बिरंग कवनो कपड़ा जो पावे, त जले अपने ना हबेखे दुचार दिन, दुचार दिन अपने ना पहिरे, पहिर के जले दुचार हितई घूम-टहर ना आवे, तले टरकावे कि अभी त धोआइले नइखे, अभी दरकचात बा, अभी पसरात बा, लोहा दियात बा, तहियावल अभी बाकी बा। तवन लरिका नादान, जले पहिरले रहले अनकर रंग-बिरंग, तले त अड़ल रहले कि हमहीं तहार ऊ बादशा इयार, बाकिर जब बंदा हरवाह ना पतियइले त नाहिंए पतियइले, त अनकर रंग-बिरंग उतार के, असल आपन बदरँग ऊ अइले पहिर के, आ कहले कि भले हम ना भइलीं तहार ऊ असली बादशा इयार, बाकिर हमरा किहाँ बाटे, उनुका से तहरा भेंटाय के पक्का उपाय, कहऽ त बताईं। त भइल कि बताईं। त कहले कि तब्बे बताइब जब तीन रेख खींच के किरिया खइबऽ कि हमार अनकर रंग-बिरंग पहिरला के बात केहू अउर से कबो ना बतइबऽ। त तीन रेख खींच के किरिया खइले कि केहू पूछी ना, त बताइब का ! तब जाके बतवले ऊ लरिका नदान ऊ पक्का उपाय। कि किला मैदान में आजे साँझ के निकली बादशा बहादुर के जलूस। फतह के सलाना तिउहार। सँउसे दिल्ली उपट परी देखे। किला के दुआर प उँचास प तू हो जइहऽ ठाढ़। सभ देखी बादशा बहादुर के, तू देखनिहारन के देखत रहिहऽ मूँह। तहार इयार, होइहें इहँवा त अइहें जरूर। की त तूहीं लेबऽ चीन्ह, ना त ऊहे लीहें चीन्ह।

आ ना अइहें, तब ? त भइल कि अँइसे कइसे कि अइबे ना करिहें, जब सभे आई त ऊहे भला कइसे कि घरे रहे पइहें ! काहे आई सभे भाई, जे आवल चाही सेही आई, कि जे ना चाहत होई सेहू आई ? त भइल कि पहिले के बात रहित त भले केहू आइत केहू ना आइत, बाकिर अब अइसन नइखे। पहिलवा, ईहे बादशाहूदीन बदशहवा, अतना बद, अइसन बदेल कि अझेल। जतने जिद्दी ओतने जाहिल ओतने जालिम। अपने में गाफिल। जेने ताके तेने तबाही, केहू ना चाहे कि केहू प एकर, कवनो बिध परे परिछाहीं। बाकिर का, कि एक बे अहेर में गइल त हप्ता भ रहल नपत्ता। बहुरल त दोसरे हो के। दोसरा के दुख में दुखात, दोसरा के सुख में समात। जतना खात ओकरा से जादे खियावत, जतना जीयत ओकरा से जादे जियावत। त केहू ना चाहत रहे जवना बदशहवा के नजर तर आवल, आज के हवाल कि केहू ना चाहे ओही बदशहवा से नजर हटावल। त आई, सब आई ओकरा जलूस में, जे पाँव पैदल, सेहू जब आई, त तहरा इयार के त घोड़ा बा भाई, कइसे ना आई !

त भइल कि भला कहऽ कइसे ना आई ! जलूस से पहर भर पहिलवे पहुँच के, किला मैदान के दुआर प उँचास प हो गइले ठाढ़ बंदा हरवाह। जेने देखऽ तेने  मुँड़िए-मूँड़ी। पैदल हैदल गैदल। कहीं नाच, कहीं गाना, कहीं नारा, कहीं जैकारा। सँउसे दिल्ली सबके छोड़ के अपना बदशहवा प नजर गड़वले, अकेले एगो बंदा हरवाह कि ओही बदशहवा के छोड़ के सबके प नजर गड़वले। एक-से-एक देह-मुँह लउकल, एगो ऊहे ना लउकल, जवन लउकित त होइत कि हँ हो, कुछ लउके लायक लउकल ! बंदा चाहत त ना रहन, बाकिर उनुका बिना चहले लागल सोचाय कि कहीं झूठ त ना कहले रहे इयरवा कि दिल्ली के बानीं बसिन्दा ! लागल सोचाय त के जाने अपने से मूँद लेले आँख, कि अँखिए लागल मुँदाय कि केहू से कहियो कहे-बदे खातिर हो जाय कि जब अँखिया मुँदाइल रहे, तबे बुला ऊ आइल रहे। तले किला मैदान में घुड़दउड़ के बेरा-बखत आ गइल। गरदा उड़ल आ असमान तकले छा गइल। बाश्शा के चिंता कि गरदा के अइसन उड़ान में कइसे भला लउकी हमरा इयरवा के ओकर इयरवा ! धोबपूत फरके फिकिरियाइल कि अँइसे धुरियाई त त धूर में मिल जाई हमार बतावल ई उपाय, कवना मुँहे कहब कि केहू से कहिहऽ मत अनकर रंगा-बिरंगा पहिरला के बात ! बंदा के बाकिर, मने-मने तोख कि ईहो त हो सकेला भाई कि एही धुरखेल के चलते ना हमरा लउकल इयरवा ना इयरवा के हम !

ओने सामकरन घोड़ा, घुड़दउड़ के पहिलके चक्कर में उँचास के पास से होके जब गुजरले त उनुका ना बुझाइल कि ई गोहट-अस मरला के छप-छप-अस कहाँ से सुनाइल। दुसरका चक्कर में पीठ प बइठल सवरवा दे’ देखले जब, तनी कन्खियाऽ के, त जनले कि के जाने केने से ओकरो कुछ बजरा के रोटी पियाज अस सुँघाइल। बाकिर का, कि एही सुना-सूँघी में, एक त कि बादशा के, दोसरे कि सामकरन घोड़ा, बुझाइल जब, कि बाकी कुल्ह घोड़न से बाँस भ से अधिके पिछुआइल, त अरजा से परजा ले सभे फिकिरियाइल। बाकिर का, कि तिसरका चक्कर में जसहीं उँचास के पास से गुजरल, घोड़वा के अपना पिठाँस प, हाथ हरमुठाह के घोंय-अस आइल जनाइल आ अगिला घोंय आइत, एकरा पहिलहिंए ऊ सामकरन घोड़ आन्ही से ले लिहले होड़। अइसन, कि घुड़दउड़ में जीत के धूहा जब छू के पीछा मुँहे तकले, त सात बाँस पाछा ले, ना कवनो घोड़ा लउकले, ना घोड़वाह। बाकिर का, कि घोड़ा उहाँ रुकले ना जीत के जसन मनावे, रुकले ऊ किला मैदान के दुआर प। ओही उँचास प। रुकले ऊ पहिले कि पहिले हिनहिनइले कि पीठ प से उनुका कूद गइले पहिले सवार, के बतावे कि कूद के धउरले पहिले कि बान्ह के अँकवारी में बंदा हरवाह के उठवले पहिले कि पहिले बाजल ढोल कि बाजल नगाड़ा आ शुरू भइल फतह के सलाना तिउहार के जसन जगराता !

बंदा हरवाह के एकाध दिन त ईहे ना बुझाइल कि भइल का, का होता, कि आगे का होई ! इयरवा भेंटाइल, से त भेंटाइल, बाकिर हतहत दरबार, हजार लोग आगा, हजार लोग पाछा, हाथी के झुमेल आ घोड़ा अनठेल, हतहत गो महल अठमहला, हतहत गो फाटक … जानत त रहले कि इयरवा हमार नौटंकी के सवखीन, बाकिर, बुझाइल ना उनुका कि आखिर, कतहत ई नाटक, कि कतना एह नाटक के पसरल पसारा ! कि के-के बा, का-का बा नाटक के भितरा आ के बाटे, का बाटे नाटक से बहरा ! कि बहरी एगो हमहीं, कि केहू अउरी !

बइठे के सिंघासन दियाइल त जे सिंघासन लेके आइल ओकरा के पहिले त बंदा बहुते समझवले कि भाई, एह नाटक में हम नइखीं शामिल, हम नइखीं एकर, केनियो से कवनो किरदार, बाकिर, ना केहू मानल त का करिते, ओही प मार के अल्थी आ पार के पल्थी बइठ रहले। बगल के सिंघासन प बादशा जब आके बइठले ओलर के, पलर के, त बलु पुछबो कइले कि तहार तबियत त नइखे न खराब ? बतइबो कइले कि तुलसी-गिलोय के काढ़ा त कुल्ही बेरामी में रामबाण। त जइतऽ आ काढ़ा के पहिले अजमइतऽ त अइतऽ, बइठितऽ…। सुन के, बादशा मुसुकइले त जरूर, बाकिर तवना के बाद, जल्दी-से-जल्दी,  ऊहो अपना सिंघासन प, ओसहीं, तन के बइठ रहले, मार के अल्थी, पार के पल्थी। आ देख के, उनुकर ई बइठल, सँउसे दरबार, देखले बंदा हरवाह कि अँइसे चिहाइल जइसे नाटक में ना, सचहूँ चिहाइल !

खाय बइठले जब बंदा हरवाह, त थारी के साथे बहत्तर गो कटोरी तिहत्तर गो तहतरी। सोचले कि जनाता कि गाँव भ से थोरे-थोरे माँग के आइल बा। केहू बरी देले बा केहू बजका। केहू बारा-फुलौरा। केहू भात केहू दाल केहू चोखा। केहू चटनी आ केहू अँचार। केहू नेनुआ के तियना, केहू करइला के भरवाँ। दिलदार कवनो इहाँ ले, कि देले बा खीर, कवनो रबड़ी देले बा, त कवनो मलाई, कवनो मिठाई। दिल्ली में, कवन ठेकान कि ईहो कुल्ह मिलत होखे बोझा के उठवाई ! सोचले कि आखिर कतनन के बोझा उठावेला बेचारा बदशहवा कि बदला में, भलहीं तनकिए-तनी बाकिर हतनवा-हतना पावेला ! कि नाटक-नौटंकी के ह ई कमाई ! कि खेला के बाद चदरा पसराऽ गइल आ पा भ, छटाक भ, जेकरा चुहानी में जवन रहे आ गइल ! सोचले बंदा, कि बलु बदशहवा, खेती किसानी से कमाइत त जवने पाइत, भरखर पाइत ! सितुहा भ खीर खा के खखनित ना, जवन खाइत थरिया भ खाइत, अघाइत ! बाकिर का, कि जवना कटोरी से उठा के ऊ खइले तवन जब फेरू से भर के रखाइल, आ फेरू खइले त फेरू से भर के रखाइल, त तवना के माने कुछऊ ना उनुका बुझाइल। बाकिर का, कि बूझत-बूझत आ बुझात-बुझात जब बुझाइल कि नाँवे के ना ह, सचहूँ के बादशा ह उनुकर इयार, त अपना ए बादशा इयार प बड़ी बिगड़ले बंदा हरवाह। हींक भ डँटले कि काहे तें बात ई छुपवले, बादशा होके, काहें तें अपना के हमरा से अतना डँटववले, कि काहे तें एक त कि अपना के, दुसरे कि हमरा से रे-तें करववले ! काहे बेचारा हरवाह प चढ़वले तें बादशा से अपना कुदारी चलववला के पाप, हर में, हेंगा में, बैलन के साथे नधववला के पाप ! अइसन खिसियइले कि हप्ता दिन लाग गइल बादशा के उनुका मनावे में। बाकिर, तवना के बाद, महिनवन लागल बंदा हरवाह के, बादशा के मनावे में कि भाई हमके जाए द। एक त कि तू, तहार अमला, खरिको खरकावे भ खटे हमके देत नइखे, दोसरे कि तहरा एह दिल्ली दरबार में हाथी बा, घोड़ा बा, खेत नइखे। एक्को हाथे करे कुछ चल दीं त हजार मुँहे अरे-अरे, हजार हाथे धरे-धरे…। लोटकियो भ पानी, अपना से अपने उठावे के, केनियो से कवनो सवाँस ना, आ अँइसे, बइठल-बइठल, हमरा से भाई, खइले खवात ना, घोंटले घोंटात ना…।

बादशा बाकिर, काहें के जे मानें। बंदा आज माँगें बिदाई बादशा काल्ह प टार दें। बंदा जतने उबियायँ ततने उनुकर सेवा-टहल बढ़िआय आ जतने उनुकर सेवा-टहल बढ़िआय ततने ऊ उबियायँ। अंत दाँव, बादशा के सबसे पुरान एगो टकसब-ना-तहरा-टकसवले टहलुआ से  पुछले उपाय कि सोच के बतावऽ कि कवन अइसन बेरा, कवन अइसन बखत, जब बादशा से जवन मँगाय तवना से ना ऊ ना करे पायँ। त टकसब-ना-तहरा-टकसवले टहलुआ सात दिन सोच के बतवले कि नमाज के बाद। त बंदा घात में लगले। रोज सँपर के, नमाज के आस-पास जुट जायँ कि ओने ऊ आपन नमाज फरिआवें आ एने ई सोझा आवें, आपन अरदास सुनावें कि ढेर भइल, जाए द हमरा के अब हमरा गाँवे। बाकिर का, कि देखें जब लागें नमाज त देखते रह जायँ। भुला जायँ सोझा आवल, आपन अरदास सुनावल। एक दिन बाकिर, सँपर के पुछले कि का हो, ई का करेलऽ, काहे करेलऽ, केकरा से का कहेलऽ ? त बतवले बादशा कि भाई, जेकर ई खलक-खुदाई, सातो दीप नवो खंड जेकरा परताप के दोहाई, ओकरे से माँगींले हाथ पसार के, मुलुक के खैर। आ आपनो। कि केहू से केहू ना राखे ना माने कुछ बैर। आ हमहूँ। कि कमी मत रहे केहू के कवनो, कि गमी मत रहे, कतहूँ, केहू के, कवनो। आ हमरो। कि बनल रहे बरकत, बरसत रहे रहमत। कि हथिसार हाथी-हाथी रहे, घुड़साल घोड़ा-घोड़ा रहे, कि चानी के गोदाम चानी-चानी रहे, सोना के सनूक सोना-सोना रहे। त पुछले बंदा कि रोज माँगेलऽ हाथ पसार के ? कहले बादशा कि काहे ना, रोज माँगींले हाथ पसार के। पुछले कि माँगत मुँह ना दुखाय, मन ना लजाय ? कहले कि उनुका से माँगत मुँह ना दुखाय, मन ना लजाय। पुछले कि काल्हो मँगबऽ ? कहले कि काहे ना, काल्हो माँगब। त कहले बंदा कि काल्ह तब हमहूँ माँगब। त कहले बादशा कि काहे ना, तूहूँ मँगिहऽ। कहले कि मँगला प मिल जाई ? कहले कि मन से मँगबऽ त काहे ना मिल जाई !

काल्ह, काल्ह से आज भइल। बादशा तय कइले कि नमाज पढ़ब, पढ़ला के बाद में आस्ते से पूछब इयार से कि हम त हो भाई, रोज जवन माँगींले, मँगलीं हा, आपन बतावऽ कि कहले रहऽ माँगब, त का-का तू मँगलऽ हा, आ जवन-जवन कहिहें कि मँगलीं हा, तवन-तवन उनुका के की त देब, ना त दियवाइब। बाकिर, बंदा से पुछिते, एकरा पहिलहिंए, बंदा बता दिहले कि का उनुका चाहीं। छुट्टी। जाय के इजाजत। कहले कि सुनले हम बानीं कि नमाज के बाद, जे जवन माँगेला, दे दे ल, त माँग देलीं, दे द। त कहले बादशा कि कहले त रहलऽ कि हम जिनसे माँगींले उनुका से माँगब…। त कहले बंदा कि ना भाई, ई त तू सुनलऽ, कहले त रहलीं हम अतने कि माँगब। त मँगलीं। त कहले बादशा कि ठीक बा कि मँगलऽ, बाकिर बतावऽ कि उनुका से मँगबऽ त का मँगबऽ ? त कहले कि उनुका से माँगब त उनुके से माँगब, उनुके बताइब, ओसहीं, जइसे कि तोह से जवन मँगलीं, तोह के बतवलीं। आ उनुका से माँगब, त तूहीं बतावऽ कि इहाँ काहे माँगब, दे दीहें इहँवे त लादे के तूल, लदवावे के तूल, गाँवे ले ढो के पहुँचावे के तूल ! त माँगब, बाकिर अपना गाँवे जा के, भउजी से तहरा बतियाऽ के। बादशा बड़ी कुनमुनइले बाकिर का करिते, कहले कि ठीक बा, जा, बाकिर जवन तहरा चाहीं, जवन-जवन, जतना, हमके बता द, हम तवन-तवन, ततना मँगवा दीं, घरे पहुँचवा दीं। कहले बंदा कि काहे के अतना हलकानी में परबऽ, हमरा जवन चाहीं, हम गाँवे अपना जा के, जेकरा से माँगेलऽ ओकरे से माँग लेब, ऊहे पहुँचा दीहें, सीधे। कतनो कहले बादशा कि अन ले ल, धन ले ल, जर ल, जमीन ल, बाकिर बंदा, काहे के जे मानें ! एक्के रट कि काहे तू देबऽ, ऊहे जब दीहें !

कहले बादशा कि घोड़ा ले ल, त कहले बंदा कि बे मर्दे, गिर-पर जाइब। कहले कि अच्छा त एक्का से जा, त कहले कि महिनवन तहरा महल में बइठल-बइठल बात-पित्त-कफ तीनो बढ़ियाइल बा, पैदल जाइब त कुछ त पचाइब। सुनले त बादशा मने-मने कुछ तय कइले, अपना दरबारी लोग से जाके कुछ-कुछ बतियइले आ आके बतवले कि ठीक बा, जा, बाकिर जे बा दरबार में, सबका से मिल के अँकवार। कहले बंदा कि भाई, सबकर अँकवार के त हमरो दरकार !

गाँवे जाय के चाव में, बंदा के ई ना बुझाइल कि जेकरा के दिहले अँकवार, ऊ उनुका झोरा में, बगली में, इहाँ ले कि पगड़ी में, कुछ-ना-कुछ रख देल, चुप्पे, चुपचाप। मिलत गइले अँकवारी आ होत गइले भारी। ईहो ना कि बंदा एह भारी भइलका के जनबे ना कइले, जनले, बाकिर अगली के, बगली के, झोरा के, पगड़ी के — कुल्हिनी के भारी भइलका के मनवे के भारी भइलका ऊ जनले।

बादशा कहले कि फेरू अइहऽ, आ कहले कि फाँफर पाइब त हमहूँ आइब, बंदा कहले कि काहे ना आइब, आ कहले कि अइहऽ जरूर। साथी के देत अँकवारी जब जादहीं कुछ भारी भइल मन त कहले तनी हँस के कि अबकी बे बजरा के रोटी आ नीमक-पियाज थरिया में तोह के खियाइब, सहूर से, आ तूहूँ तनी खइहऽ त ओही सहूर से, ई ना कि हूर के ! सुन के जब ऊहो मुसुकइले, त कुछ त ईहो, कुछ ऊहो हलुकइले। बाकिर, चार डेग चल के पिछवड़िए, रस्ता प सोझ जब भइले त पइले कि ईहो बगली भारी आ ऊहो बगली भारी आ कपार प के पगड़ी अउरियो भारी। झोरा त अतना ना भारी कि जवना कान्हे लटकल तवना के हड़री बुझाइल कि अब-तब में चटकल। छू-छा के देखले त सोना के असर्फी ! कहँवा हलुकाईं ? त पहिले त धोबघाट गइले आ पगड़ी के सकल असर्फी धोबी के पूत के हाथ में धइले कि हा ल, लाल-पियर-हरियर, जइसन मन, आपन तू अपने से कीन ल धोती-मिर्जई। धोबी के पूत अचकचइले कि ई बाकिर बहुतो से जादे से ढेर तनी अधिका…। ईहे बात कहले बादशा नाँव के सब-सब साईस-इकवान। त कहले बंदा कि जेकर बादशा नाँव, ओकरा से जवन-जवन पवलीं, तवन-तवन, ओकरा के जवना-जवना बादशा के नाँव से जोह के पवलीं, तवना-तवना बादशा के नाँव तक ना जो पहुँचाइब त के हम होइब आ के हम कहाइब ! एक त ई, आ दोसरे ई कि ई मत जानऽ कि पवलऽ, जानऽ ई कि हमके हलुकवलऽ, बीच राह थाकि के थउसे से बँचवलऽ। बाकिर का, कि जवना बादशा के सैंतीस गो गदहा से ईंटा ढोआय, तवन तनी अड़ गइले। कहले कि कइसे खाली तूहीं हलुकइबऽ, हम ना हलुकाइब ? अवरू कुछ ना, त एगो गदहा तू ले जा, अवरू कुछ ना, त गाँवे ले बइठल त जइबऽ…। त कहले बंदा कि बे मर्दे, पैदल जाइब त बात-पित्त-कफ कुछ पचाइब। त आइल जबाब कि पचइहऽ, जब पच जाय, तब्बे बइठिहऽ। त कहले बंदा कि बे मर्दे, गदहा प बइठे हमरा ना आवे, गिर-पर जाइब। त आइल जबाब कि तहरा बइठे ना आवेला त का भइल, हमरा गदहवा के बइठावे त आवेला न ! आ मान ल कि गिरबऽ, त कवन कहीं कि पाँच हाथ के घोड़ा प से गिरबऽ, सरपट के चाल प से गिरबऽ ! गिरबऽ त दू हाथ के गदहा प से गिरबऽ, दुलुकी के चाल प से गिरबऽ, उठ जइहऽ, धूर-गरद झार लिहऽ, झूर लिहऽ, गिरल केहू देखल त ना, तनी घूर लिहऽ…। अब का कहिते बंदा, का करिते बंदा ! अतने कहले कि भाई, तहार गदहा, तहरे के चीन्ही, अनजान के पाई त दुलतिए से बतियाई। त गदहा के मालिक गदहा से उनुकर नीके तरी अरचो-परचो करवा दिहले, पीठ-पोंछ सुहुरवाऽ दिहले आ पगहा धराऽ दिहले। गदहा प बइठिए के बंदा, बाश्शा किहाँ गइले, झोरा सहित्ते बाकी के कुल्ही असर्फी उनुका हवाले कइले कि आपन समियाना तनवइहऽ, आपन पर्दा लगवइहऽ, आपन नाटक अपने बनइहऽ आ खेलिहऽ, खेलवइहऽ। कहले बाश्शा कि नाटक त अपने बनाइब, बाकिर बनाइब तहरा प। हमरा प ?! काहे ना, आ नाँव रही बंदा-बादशाह ! त कहले बंदा कि हद बा, भला कतना तू जानेलऽ हमरा के, कतना तू जानेलऽ हमरा इयार के ? त कहले बाश्शा कि तहरा के जानब तहरा साथे-साथे गाँवे ले, घर तकले चल के, आ तहरा इयार के, रस्ता भर तोहरा से पूछ-बतियाऽ के। बंदा कहले कि भाई, जब अपने से कहलऽ कि जाइब, त आपन घर अछइत कवना मुँहे कह दीं कि ना लेके जाइब, बाकिर, दाँव एगो चलले, कि गदहा त एक्के बा। त हँसले बाश्शा कि हमरो के गिन ल आ अपनो के गिन ल त गदहा के गिनती त तीन बा ! त बूझ गइले बंदा, कि बात बतियावे में दिल्ली के केहू ना उनइस, सब-के-सब बीस बा, तीस बा।

बोलत-बतियावत,  उनुकर सुनत आ आपन सुनावत, आज किदो काल्ह किदो हप्ता दिन बाद, पहुँचल लोग गाँव के गैंड़ा, त सुनले रहन बंदा कि जेकर सगरो सकान, गाँव के गैंड़ा सेकरो गोड़ थकान, त पता ना कि सचहूँ कि सुनलका के राखे खाती मान, जानल एगो पाकड़ के पेड़ झँखाड़ त बइठले, बाश्शा के बइठवले, घरी-छन सुस्ताय कि थकान दुराय। त एगो त गाँव नगिचइला से हरखल, दोसरे, देखले कि खेतन में कादो-कींच पुरहर, त बरखल-भुलाइल-अभी-नइखन-भगवान — एह भरोसा से उलसल हुलसल, कहले बंदा कि ए भाई बाश्शा, कुछ छू देबे अइसन सुनइतऽ, कुछ कढ़इतऽ, कुछ गइतऽ ! बाश्शा जब लिहले अलाप, कहिए से पाछ धइले  आवत, दूइ बैलगाड़ी, थथमले आ थम गइले। गड़िवान लोग उतरले आ अलाप में अलाप मिलावत ओहिजे जम गइले। जम गइले त जम गइल महफिल। गवनई के अइसन उठल लहर-प-लहर कि बुझाइल जइसे अपने मने साज सज गइल, बाज बज गइल। एक सुर त अँइसे कि जइसे कि पाकड़ प से उतरल आ दसो दिसाईं पसर गइल, आ ताकधिनाधिनधिन त कहँवा से आइल, ना केहू जानल ना केकरो जनाइल। इहो ना बुझाइल कि एही में आज, कब आके बीत गइल साँझ ! त भइल कि का भइल, एहिजे फुटेहरी अब लागे, चोखा सनाय। फुटेहरी लगावल लोग, चोखा सानल लोग। हींक भ पावल लोग। सूतत के बेर पुछले बंदा कि केकर ई गाड़ी, त बतवले जा गड़िवान, कि बाड़े एगो भाई भगवान सिंघ उनुके ई गाड़ी। के हवे भाई, ई भाई भगवान सिंघ, त कहले जा कि के जाने, दिल्ली के बादशा बहादुर के बुला कुछ लागेले। उनुकर कुछ लागेले, त तय जानऽ भाई कि हमरो कुछ भाई भगवान सिंघ लागेले — बंदा अगराऽ के बतवले आ पुछले कि गाड़ी में कँउची लदाइल, त बतवले गड़िवान कि ललसा के कलसा। पुछले कि कहँवा ले जाई, त बतवले कि ई त जानस भगवाने सिंघ भाई…।

ठीक अधरात, के जाने पाकड़ प का खड़खड़ाइल कि अचक्के अचकचाऽ के उठ के बइठ गइले बाश्शा निनिआइल। बंदा जब करवट फेर के कहले कि अहो अभी सुत्तऽ, त सुनले जब ‘सुत्तऽ’, तब जाके नीन उनुकर नीके तरी टूटल। टूटल आ दूनो नैन खूलल त पहिले त लागल टकटक्की तब छूटल कँपकँप्पी। लगले बंदा के झोर के जगावे कि उट्ठऽ हो, का भइल, होता का, देखऽ, निरेखऽ, बुझाय त बूझऽ, आ बूझ के हमरो के तनिका बुझावऽ। बंदा देखले कि दूर, डगरल अस चलल जाता दुन्नो-के-दुन्नो बैलगाड़ी आ भीरी, मुँड़तारी-गोड़तारी, एगो आ दूगो आ तीन, चार… चउदह गो साज के राखल बा कलसा। एगो के खोल के पेहान, झाँक के देखले जा भितरा त हीरा आ  मोती आ सोना आ चानी के गहना आ गुरिया, असर्फी-तसर्फी… ! देखले त देख के, ई अलगे जहुअइले, ऊ अलगे भकुअइले।

जे जहुआइल बा, जहुआए दीं, जे भकुआइल बा, भकुआए दीं। सातो भाई चोरवन के सोचीं कि उन्हनी के कतना सत्पिसानी… !

एक भाई के पता लागल कि बादशा के, खेतिहर एगो आइल बा साथी, कवना दो गाँव-गिराँव के, त जा के दुसरका भाई के बतवले। तिसरका भाई कहले कि हो-ना-हो बिदाई में ई खेतिहरवा अपना औकात से अधिके कुछ पाई। चउथकू कहले कि जवने पाई, दाँव लगा के चोराऽ लिहल जाई। पँचऊँ कहले कि एकर, भा केहू के, अबहीं, भा कबहीं — सबकुछ चोरावे के बात कबो सोचिहऽ मत। पुछाइल कि काहे, त छठऊँ कहले कि सबकुछ  चोरइबऽ त सोचऽ कि जेकर चोरइबऽ ऊ आगे अब कइसे कुछ करी-कमाई,  कइसे कुछ सँची-जोगाई, आ ना कुछ करी-कमाई, ना कुछ सँची-जोगाई त सोचऽ कि आगे, हमनिए के, भा केहुए, केहुओ के, कइसे में कुछुओ चोराऽ पावे पाई ? अँइसे त भाई, दुनिया-संसार से चोरी-चकारी के रेवाजे उठ जाई ! त सतऊँ बिगड़ गइले कि आगे जवन होई तवना के सोच के बुड़बक ऊ होई जे अबहिंए से रोई। सुन के पँचऊँ आ छठऊँ भड़क गइले। भड़क गइले त एह लोग के भड़कला प पहिलकू-दुसरकू कुछ अधिके भड़क गइले। बाता-बाती से बात चलल, चलत-चलत मारा-मारी ले जा पहुँचल। तिसरकू-चउथकू कहले कि हमन के का कइल जाई ? त भइल कि जब झगड़ा बढ़ियाई त छोड़ावल जाई। झगड़ा बढ़ियाइल। केहू के भुभुन फूटल, केहू के नाक ; केहू के लोल, केहू के लिलार। जे झगड़ा छोड़ावे आइल ओकर तनी जादे फूटल, तनी जादे फाटल, बाकिर, सबकर जब कुछ-ना-कुछ फूट गइल, फाट गइल, त नीमन बात ई भइल कि झगड़ा फरियाऽ गइल। झगड़ा फरियाइल कि रजवा के साथी खेतिहरवा, अस-मन-जनिहऽ जे हमनी के भाई, कि बिदाई में जवन ऊ पाई, तवना में, दीन के दुहाई, ईमान के कमाई, कि आठ गो बखरा लगा लिहल जाई, एकए गो सातो हमन भाई के, त एगो ए भाई खेतिहरवो के, कि आगहूँ कुछ करी कुछ कमाई, कुछ सँची कुछ जोगाई आ अगिलकी पीढ़ी के चोर बिरादर के, भाई-भैवद्धी के कामे कुछ आई।

त चोर बिरादर के भाई-भैवद्धी के सातो भाई लागल लोग जोह में कि राज-रजवाड़ा से कहिया खेतिहरवा के होई बिदाई। एगो दूबर दरबान के कुछ  घूस-घास दियाइल त ऊ सीधे खेतिहरवे से भेंट करवा देलस कि हम का बताईं, इनहीं से पूछ ल कि कहिया होई इनिकर बिदाई। खेतिहर कहले कि काल्ह। चोर लोग काल्ह के कइल तइयारी बाकिर तइयारी के मोसल्लम खर्चा अकारथ गइल, बिदाई ना भइल। ना भइल त दूबर दरबान के फेरू कुछ घूस-घास दियाइल। त दूबर दरबनऊ फेरू से सीधे खेतिहरवे से भेंट करवा देले कि हम का बताईं, इनहीं से पूछ ल कि कहिया होई इनिकर  बिदाई। खेतिहर फेरू कहले कि काल्ह। चोरऊ कहले कि बे मरदे, तू त काल्हो कहले रहऽ कि काल्ह, लाज नइखे लागत, खेतिहर होके झूठ कढ़ावत ? त हँसले खेतिहर भाई, बंदा हरवाह, बादशा के इयार, कि भाई, हमार ई ना हउए बात, हम त कहलीं कि जाइब हम आज, ई त बादशा के बात कि जइहऽ तू काल्ह। चोरऊ सोचले कि जब बादशा के बात, त होइबे करी साँच। चोर लोग फेरू कइल काल्ह के तइयारी, बाकिर तइयारी के मोसल्लम खर्चा अकारथ गइल, बिदाई ना भइल। फेरू दियाइल कुछ घूस-घास। फेरू पुछाइल। फेरू ऊहे जबाब कि काल्ह। त भइल कि लाज नइखे लागत, बादशा के झुट्ठा बनावत, कहाँ भइल बिदाई तहार आज ? त कहले कि हमहूँ त ईहे कहलीं बादशा से कि कइसन तू राजा-बादशाह कि काल्ह तू कहलऽ कि काल्ह, आ कहियो के सप्फा पलट गइलऽ आज ? त कहले हा बादशा कि हम त भाई, जवन काल्ह कहलीं, तवने कहत बानीं आज, कि काल्ह। जब कहबे ना कइलीं कि आज हम करब बिदाई त कइसे करीं आजे बिदाई ! बिदाई होई काल्ह !

महिनवन बीतल चोरवन के, घूस-घास खियावत आ काल्ह के तइयारी सँपरावत। जमा-पूँजी लागल ओरिआय त सातो भाई बेबात के बात प झगरि जायँ, ई उनके रगरि जाय, ऊ इनके रगरि जाय। एह रगरा-रगरी के बिच्चे एक दिन के बात कि पता चलल कि आज नमाज के बाद अपना बादशा इयार से बंदा इयार कुछ मँगिहें। चोर लोग सोचल कि आज मँगिहें त काल्ह गाड़ी पर लदाई, परसों होई बिदाई। तले पता चलल कि आजे हो गइल बिदाई। त बिना कवनो सुबहित तइयारी के, सातो भाई धावा-धाई लागल लोग पाछा, त पावल कि ना हाथी ना घोड़ा, ना बोरी ना बोरा, पैदल पाँव दिल्ली के गली में सरसरसर चलल जाता, के ? त छछात जे बादशा के जिगरी इयार, से ! तीन भाई कहले कि बुला बादशा बैमनवा कुछ देलस ना, तीन भाई कहले कि बुला बंदा बउरहवा कुछ लेलस ना। बाकिर, एह बात पर छवो भाई झगरिते एकरा पहिलहिंए सतवाँ भाई बतवले कि एकरा अगलो के बगली में बाटे तरमाल, एकरा बगलो के बगली में बाटे तरमाल, पगड़ियो में बाटे भरपूर, आ झोरवा में त कुछ कहहीं के ना ! एह बात प सातो भाई के हुँकारी के आवत-आवत, बाकिर, बंदा पहुँच गइले धोबघाट। उहाँ, करेजा प ध के हाथ, सातो भाई देखल कि कइसे उन्हनी के हिस्सा के सँउसे  एक बगली माल, खेतिहर के जात, बंदा हरवाह, बम्मड़-बउराह, धोबी के पूत के सँउपलस, आ जइसे भइलहिंए ना होखे कुछ, अँइसे, मूँड़ी उठवलस आ चल दिहलस ! त पाँच भाई पाछा लगले, दू भाई रुकले कि हमनी के धोबी के पूत के नीके तरी मूँड़ के आइब जा, आपन हिस्सा वसूल के। कोशिश कइल लोग, बाकिर धोबी के पूत के धोए के आदत, दुन्नो भाई चोरवन के दुन्नो हाथे धो के, फींच-फचकार के गार के पसार देले। बाप-बाप करत भागल लोग त रस्ता में एक भाई मिलले कि इकवनवा सरवा पैने-पैना मरलस हा, एगो दुसरका भाई मिलले कि हमरा के त सइसवा ना, ओकर कुकुरा भँभोरलस हा। जिनका सैंतिस गो गदहा से ईंटा ढोआय, उनका किहाँ बाकिर,  बकियवा तीनो भाई, बड़ा गौं से, सोच-समझ के घात लगावल, केकरो भनक तक ना लागल आ बंदा के दीहल मोसल्लम असर्फी के गठरी उठावल आ चलत-चलत चल आइल लोग बिना कवनो आफत-अफदरा के घर से बीस हाथ बहरा ले। बहरा आ के देखल लोग कि आ-हा-हा, चारो ओर गदहे-गदहा…! सोचल लोग कि गदहे प बइठ के जो भाग चलीं जा त भगला के भागल आ तिन-तिन गो गदहा के आमद अलावा ! जब फान के गदहा प बइठल लोग त गदहन के रोस ई ना कि ई बइठल लोग, रोस मलिकवा प कि कइसन ई सरवा मलिकवा, कि बिना कवनो अरचो-परचो के, बिना कवनो पीठ-पोंछ-सुहुरावन के, तीन तिरछोलन के, अचके में हमनी के उपरे, अँइसे हुमच के अचक्के बइठवलस ! मय गदहा मिल के मलिकवा के मय खीस तीनो एह चोर चल्हाँकन प उतारल, दुलतिए-दुलत्ती बड़ी देर ले बतियावल। बात अभी बाकिए रहे तले तीनो जना जान आ असर्फी के गठरी, दुन्नो के छोड़ के, भगाय भ भागल। चाहल लोग जरूर, सातो-के-सातो भाई, कि ना कुछ आउर, त बाश्शा किहाँ जवन असर्फी के झोरा धराइल, तवने हथियावल जाय,  बाकिर सातो भाई मानल कि ए घरी, गरम-गरम दूध में हर्दी पकावल कुछुओ से जादे जरूरी। त पकावल लोग, मिल-जुल के पीयल लोग, जेकरा से अपना हाथे ना पीयल गइल ओकरो के मिल-बेवहर के पियावल लोग। पी-पा के बइठल लोग त भइल कि सब त गइल, अब का ? सातो भाई सन्मत कि जवन कुछ पवलस ई बंदा बउरहवा, सब कुछ त इहँवे लुटववलस, त का अब पिछुअवला में फैदा ? सातो भाई सन्मत कि बाँचल कुछ हइए ना, त ना अब पिछुअवला में फैदा। बाकिर, सातो के मन में कि जब डिठार में अतना ई पवलस खेतिहरवा, त चुपका त के जाने कतना ई पवले होई ! सातो भाई सोचले कि जब उपरे-उपर अतना लुटवलस त सोचे के बात कि भितरे-भितर कतना जुटवलस ! त सातो भाई सन्मत कि जब अतना दिन लागल गइल पाछ त अँइसे, अचक्के में छोड़ दिहल बहुते बेजाँय।

त लागल लोग बंदा आ बाश्शा आ बंदा आ बाश्शा के गदहा के पाछा। कहँरत आ भचकत, लँगड़ात आ भहरात। लागल लोग त तवन बात जानल लोग जवन बात ना बंदा के जानल, ना बाश्शा के जानल आ मोह-माया से दूर आ अपने में चूर, गदहवा के, जानल त का, न-जानल त का ! जानल लोग कि बंदा आ बाश्शा आ बंदा आ बाश्शा के गदहा जेने-जेने तेने-तेने, कबो अगाड़ी आ अक्सर पिछाड़ी, दूइ बैलगाड़ी। झाँक-झूँक के जानल लोग कि दुनो बैलगाड़ी में सत-सत गो कलसा। कलसा में का बा आ कतना बा — ई, चाहल त बहुते, बाकी जाने ना पावल लोग। जतने मरखाह लखात रहन गाड़ी के बैल, ओतने गड़िवान। सातो भाई सोचले, आपन-आपन घाव सुहुरावत, कि ठीक नइखे खतरा उठावल, जतरा में बनल रहल जाई, त कब्बो-ना-कब्बो त मोका-मोनासिब अपने से चल के इहँवा ले आई ! आइल। गाँव के गैंड़ा, पाकड़ के पेड़ झँखाड़ के नीचे, बाश्शा जब लिहले आलाप। बैलगाड़ी, दुन्नो, जब थथमल आ थम गइल, गड़िवान जब गाड़ी प से कूद के उतरले आ अलाप में अलाप मिलवले। तब तीन भाई पहिला बैलगाड़ी में, तीन भाई दुसरका बैलगाड़ी में घुसले। एक भाई पाकड़ प चढ़  गइले कि खतरा बतइहें। तले अइसन आइल गवनई के लहर-प-लहर कि एक भाई पाकड़ के पेड़ के उपरे से राग-में-राग मिलवले आ गाड़ी के भितरे से तीनो-तीनो भाई सातो-सातो कलसा के, कहाँ ले कि खोल के देखिते, त सब कुछ भुलाऽ के लगले बजावे, एँड़ी से मूँड़ी ले हिल-हिल के लगले धउरावे ताकधिनाधिनधिन। साज बुझाइल जइसे आप-से-आप सज गइल, आप-से-आप बज गइल बाज। अभाग बाकिर अइसन कि ओने गवनई  खतमाइल ना कि एने गड़िवान लोग फुटेहरी-चोखा के टंट-घंट में लागल आ सतुआ-पिसान के इन्तजाम खातिर एह गाड़ी से ओह गाड़ी ले अइसन शुरू भइल आवाजाही कि चोर लोग कसहूँ-कसहूँ गाड़ी से निकल के पाकड़ के पेड़ झँखाड़ प चढ़ के जइसे-तइसे जान बचावल। अब लागल ताका-ताकी कि कब पंच सूते कि कलसा लोग के खोल के देखाय आ तरमाल भेंटाय त चोराऽ के चल दिहल जाय। ऊ बेरा-घरी अइबे ना कइल। बंदा आ बादशा त सुतले निरभेद बाकिर गड़िवानन के त अँखिए ना लागल। भइल अधरात त आपने गाड़ी से आपने कलसा, चोर-अस उतार के आस्ते, धइलन स बंदा के मुँड़तारी-गोड़तारी आ बैलन के घंटी उतार के हाँक ले गइलन स खाली गाड़ी। चोर लोग के त ढेर देर ले बुझइबे ना कइल कि गड़िवानन के एह कारस्तानी प चिहाईं जा कि चल के कलसा चोराईं जा। एही दोपापाही में देर भइल तले छोटका भाई के साँप एगो लउकल, पाकड़ के डाढ़ से लपटाइल, बाँचे खाती आसन बदलले त पतई से डहँगी ले अइसन खड़खड़ाइल कि  अचक्के अचकचाऽ के उठ के बइठ गइले बाश्शा निनिआइल। बंदा जब करवट फेर के कहले कि अहो अभी सुत्तऽ, त सुनले जब ‘सुत्तऽ’, तब जाके नीन उनुकर नीके तरी टूटल। टूटल आ दूनो नैन खूलल त पहिले त लागल टकटक्की तब छूटल कँपकप्पी।  लगले बंदा के झोर के जगावे कि उट्ठऽ हो, का भइल, होता का, देखऽ, निरेखऽ, बुझाय त बूझऽ, आ बूझ के हमरो के तनिका बुझावऽ। बंदा देखले कि दूर, डगरल अस चलल जाता दुन्नो-के-दुन्नो बैलगाड़ी आ भीरी, एक, दू, तीन, चार… चउदह गो राखल बा कलसा। एगो कलसा के पेहान उठवले जा त हाय राम, हीरा आ मोती,  सोना आ चानी ! देख के, ई, अलगे जहुअइले, ऊ, अलगे भकुअइले। जहुअइनी-भकुअइनी जब छूटल त बाश्शा कहले कि भाई, बादशा के मँगला प जवन भेंटल, देखऽ, बिधि के बिधान, कि तहरा तवन भेंटल बेमँगले, बिना कवनो हाथ पसरले। अब जोड़ के हाथ आ मूँद के आँख, मने-मने सरधा से एक बेर सुमिरऽ कि कइसे भगवान सिंघ भाई के भेजल दूगो फरिस्ता लो’ आइल, अपने त संगे-संगे गावल, आ अलोप फरिस्तन तक से अपना, गवावल-बजवावल, संगे-संगे कइल लोग खियान-पियान आ बिरत रात में ललसा के कलसा उतार के आस्ते से, बिना कुछ कहले, बिना कवनो लदले एहसान, निकल गइले लोग, पाकड़ के डाढ़-पात खड़खड़ाऽ के, जगाऽ के। आ सुमिरन के बाद, आवऽ, दुचार गो कलसा तू उठावऽ, दुचार गो हम, बकियवा गदहा प लदाय आ घरे चलल जाय। बंदा कहले कि घरे त चलल जाय, बाकिर अतना कुल्ह लाद के काहे ? जवन भगवान इहाँ ले पहुँचइले तवने भगवान घरे लेके अइहें…! बाश्शा बेचारू अथोर समझवले कि अपना हिस्सा के काम त भाई भगवान सँपरइले, थरिया परोस के धइ देले सोझा, आगे के काम खनिहार के, कि कवर उठावे, चबावे, भला ऊहो भगवाने सँपरावें ? त कहले बंदा कि से त ठीक बा, बाकिर परोसल थरिया सोझा त धराय ! अब एकर का माने कि बइठल बानीं दलान में आ खाय खातिर थारी धराइल सीवान में ! अनसाऽ गइले बाश्शा कि बुड़बकदास, दलान में रहितऽ त दलान में दिहिते, जब बड़ले तू बाड़ऽ सीवान में सुत्तल, त सीवाने में न दीहें बेचारू भगवान ! एगो तोहरे काम त नइखे न उनुका, अउरियो त बा उनुका दुनिया जहान ! त हँसले बंदा कि देखस आपन दुनिया-जहान, केहू छेंकले बा, बाकिर, ईहो त जानस कि बंदा के बसगित ना पाकड़ के पेड़ त, ना खेत के मेंड़ प। छावल-छुअल घर हइन उनुका आ लीपल आ पोतल दुआर !

तब्बो, अपना से बाश्शा बहुते समझवले, बाकिर का, कि एन्ने ऊ जतने समझइले, ओन्ने, पाकड़ प टँगाइल सातो भाई ओतने भगवान से मनइले कि अड़ल रहस बंदा, समझस मत बाश्शा के कतनो समझइले ! त सुनले भगवान, सातो भाई चोर के अरदास। कइसे ना सुनितन, करेजा से रहुए जे निकलल ! बाश्शा बहुबिध जुझले, बाकिर, बंदा, ना बुझले बाश्शा के बात, त नाहिंए बुझले।

ओही अधरात बंदा, बाश्शा के धइलन हाथ आ आगे-आगे चल दिहलन। पाछे-पाछे गदहा। बाश्शा के बुझाइल कि पछवा वाला गदहवा से बड़का गदहवा त हमरा अगवा-अगवा…। एने ई लोग आँखी के अन्ह भइले, ओने सातो भाई चोर, एक-प-एक दन्न-दन्न पाकड़ के पेड़ प से उतरले। ई ना देखल लोग कि सँपवा सर्र-से उन्हनी के पहिले उतरल। उतरल आ खुलल-मुँह कलसा में सर्र-से समा गइल। सब जब उतरि आइल, बड़कू कहले कि केहू हड़बड़ाई मत, बनले बोलत बा बिगड़ल बात, अब खबरदार, केहू गड़बड़ाई मत। कहले कि मँझिलकू, तू तनी हाथ लगा के देखऽ कि कलसा में का बा। मँझिलकू खुलल-मुँह कलसा में जतना बेग से हाथ लगवले ओकरा से अधिके उदबेग से निकलले, निकलल आइल हाथ से लपटाइल हतहत गो साँप। कहऽ कि डँसलस ना, झरले त झर गइल, सर्र-से निकल गइल। बाकिर का, कि जात-जात बिना कुछ कहले बहुत बात कह गइल। एगो त ई कि एह कलसवन बा में का ? कवनो में साँप, कवनो में बिच्छी। कवनो में हाड़ा, कवनो में बिर्हिनी। कवनो में चूँटा होई, कवनो में माटा। बिस्तुइया, कनगोजर। दोसरे ई कि ई कुल्ह बदशहवा आ ओकरा इयरवा के चाल। हमन के त भोला-भाला चोर, जरिको ना जनलीं  जा कि हमनी के जानत ई बाड़न स, आ लगलीं जा पाछा। जरिको ना जनलीं जा कि हमनी के जेकरा पाछा, असल में त ऊहे बा लागल, हमनिए के पाछा ! चोरवन बेचारन के डाहे बदे, बाप-रे-बाप, हतना नौटंकी !  हँइसे हरियरी सुँघाऽ के बोका बनावल ! धोबी से धँगवावल, इकवनवा के पैना से पिटवावल, सइसवा के कुकुरा से कटवावल, गदहन के दुलत्ती खियावल, आ तवनो से ना मन मानल त हे देखऽ हो, हई साँप आ बिच्छी आ हाड़ा आ बिर्हिनी आ चूँटा आ माटा, बिस्तुइया, कनगोजर…! अइसन अनेत ! बादशा के इहे बादशाही ?! ईहे ह सरवा एह बंदा के खेती-किसानी ?! कहँवा से सिखलन स इन्हनी के ई नाटकबाजी ? त छोटका भाई बतवले कि ई जवन इन्हनी के साथी बा, बाश्शा, तवने ह असल नाटकबाज। हम का जानीं कि खाली, करबे करेला ना सरवा ई नाटक, नाटक के जियबो करेला ई सरवा !

त भइल कि तजबीजल जाय एकर सजाय। तजबीजल गइल कि एक्के उपाय। कि जेकर ई पठवल बलाय, ओकरे कपार प पटकल जाय। कि उठावल जाय कलसा आ ओकरे घरे गिराऽ आवल जाय ई साँप आ बिच्छी, ई हाड़ा आ बिर्हिनी, ई चूँटा आ माटा, बिस्तुइया, कनगोजर…। त भारी त बहुत रहे, बाकिर, खीस के बल से उठवले जा सातो भाई चउदहो कलसा आ चलल लोग बाई के बेग में, धरती धमकावत।

धमकावे दीं उन्हनी के धरती। कतने धम-धम आ कतने गो धमक अपना करेजा में धइली ई धरती। ईहो धरिहें। जइसे धइली ई धरती बंदा बो हरवाहिन के बिरह-बियोग। ई बिरह-बियोग जेकरा कहे जोग, कहे, जेकरा सुने जोग, सुने, आपन त अतनवे भ जानल कि बंदा बो हरवाहिन अनेसा के नीन में मातल, सनेसा के सपना में जागल, जब दुआरी के सिकड़ी बाजल, अइसन हड़बड़ाऽ के उठली कि केंवाड़ी खोले चलली त घिरसिर के कलसा में केहुनी लागल आ कलसा भुँइया छितराऽ के नौ-नौ ठँइया। बाकिर, भला भगवान कि कलसा फूटल, करम ना, करम हमार जस-के-तस लवटल। ओसहीं जगमग। एगो सँघाती के जोह में गइले त एगो सँघाती के जोड़ के अइले। कहली कि का भइल, कइसे, कुल्ह कह के सुनावऽ, त कहले कि आपन हम काल्ह सुनाइब, आज तू आपन सुनावऽ। त कहली कि ओने तू गइलऽ एने दिन बदरियाइल, बेलावल बैल लोग लवटि के दुआरी प आइल, आ एकरा से आगे त हमहूँ अब काल्हे सुनाइब। अतने जानऽ कि भले तहार रस्ता अगोरत, बाकिर एक दुख ‘संगे-संगे-तहरा-ना-रहला-के’ छोड़ के आ एक ‘दुख-आउर’ के अलावा बाकी कुछ बाउर ना बीतल। पुछले कि एक दुख आउर का ? त कहली कि ऊहो सहाउर। त कहले कि भलहीं सहाउर, बाकिर, बात त बतावऽ कि कवन दुख आउर ? त कहली कि केहुनी से लाग के निसने एगो कलसा के फूट के छितरइला के दुख, एकरा अलावा कुछ आउर ना।

बाश्शा जब देखले कि कलसा के फूट के छितरइला के जतना पछतावा मलिकाइन के, ओतने मलिकार के पछतावा, त लगलन धिरकारे कि बम्मड़ तुनाहीं, चउदह गो कलसा तू तज अइलऽ पाकड़ के फेंड़ त, तवना के कुच्छ ना, आ एगो के फुटला के अतना गुनावन, अदिमी तू हउअ कि निछुने पैजामा ?! त बंदा बतवले, अँइसे कि जइसे कि भेद के कवनो ई बात, कि भाई, कलसवा ई पानी के रहुए…।

थाकल-खेदाइल सब, सब बात काल्ह प छोड़ के, चैन से सुत्तल, बाश्शा के बाकिर, आँखिन में नीने ना। ढिबरी के टिम-टिम में टुकुर-टुकुर छान्ही निहारत लगले सोचे कि कइसन ई नाटक रचाई, कि आखिर में ना कवनो सुक्ख, ना कवनो दुक्ख। त आखिर में काथी ? त कुछ ना, कुच्छो ना, बंदा हरवाह के बउराही ! कुछ अवरू ऊ सोचिते जरूरे, तले गाँव भ के कुक्कुर, एक्के संग लगले जा भूँके। अब भूँकल ओरिआय त आगे कुछ सोचें भा सुत्तें। बाकिर, भूँकल त अँइसे कि जइसे कि दूर से चलल आ कले-कले अवरू भिरियात गइल। त जबरी मुँदले ऊ आँख। तले अइसन ना हड़हड़हड़, अइसन ना खड़खड़खड़ मच्चल, कि उठ के बइठ रहले बाश्शा कि परवरदिगार ! आन पहुँचल का हो कयामत के रात ! धरती के छुअले कि डोलत त नइखे, त पवले कि डोलत त नइखे। बाकिर, देखले जब छान्ही, त अँइसे कि जइसे कि हहास बन्हले आन्ही…।

एह बंद कोठारी के छान्ही के आन्ही में बाश्शा बेचारू उधिआयँ त उधिआय दिहल जाय, चोरवन के सोचीं कि ना होइत भितरे जो बदला के आग-अंगार त कइसे के ठनितन स गाँव भ के कुकुरन से रार, कइसे कर पइतन स गाँव भ के कुकुरन के पार। बिरत रात पवलन स ढिबरी टिमटिमात, त जान त गइलन स कि ईहे घर बंदा हरवाह के, बाकिर, दुआर प देखलन स बैल मरखाह आ गदहा उपरवार, त कहलन स कि फार के छान्ह सीधे कपार प गिरा दिहल जाय, कलसा चउदहो के साँप आ बिच्छी, हाड़ा आ बिर्हिनी, चूँटा आ माटा, बिस्तुइया, कनगोजर। त फान के चढ़ले जा, ओदार के फरले जा छान्ह आ अपना के बड़ा बचा के, बड़ा तन्देही से दनाक दे दिहले जा उलाट, एक साथ कलसा चउदहो। बाकिर का, कि जब साँप के सर-सर सुनाइल ना, सुनाइल ना हाड़ा के बिर्हिनी के भन-भन, झन-झन के झर-झर सुनाइल झन्कार, त फाँफर से झाँकल लोग। झाँकल लोग त हाय हो राम, हीरा आ मोती, सोना आ चानी आ पन्ना, जवाहर… झराझर…। बरखा अस बरखत गहना आ गुरिया, असर्फी-तसर्फी… सातो भाई सातो भाई के तकले, त सातो के सातो मुँहे करखी ! झाँईं-अस आइल आ सातो के सातो भाई छान्ह से लोंघड़ाइल आ लद्द-लद्द तर-ऊपर धरती प आइल। उठहूँ भ बाँचल ना हूब।

त अब जब उठहूँ भ बाँचल ना हूब, त भाग के जइहें जा थोरे, रहे देल जाय जहाँ बाड़न जा तहँवे भहराइल, जतना कहँरत ओकरा से अधिके हहरत, आ ओकरो से अधिका एह बात प झगरत कि कवना कुभाई के रहे ई सलाह कि जेकर ई भेजल बलाय, ओकरे कपार प पटकल जाय ! त अब जब कुछ कहँरल निकल जाय इन्हनी के, निकल जाय कुछ-ना-कुछ हहरल आ झगरल, तब इहँवा आइब, आ आइब, त बात मानीं, इहाँ सब के इहें रउरा पाइब। तले बाश्शा से मिल लीं कि आन्ही में उधियइले ना, त कइले का ! पहिले त खरहरा उठइले आ चहुँओर छिंटाइल गहना-गुरिया, असर्फी-तसर्फी के अहार-बहार के एकोर कइले, धरन-बँड़ेरी प जवन अँटकल रहे, लटकल रहे, तवना के लाठी-लग्गी लगा के उतरले। तवना के बाद, कलसा उठवले आ साज देले घिरसिर प तर-ऊपर। तवना के बाद, कुल्हि कुकुर-भूँक आ हड़हड़-खड़खड़ के चाँप के, अबहीं ले सुत्तल बंदा हरवाह के झोर के जगवले कि जागऽ ए कुम्हकरन के नाती, आ जा के जगावऽ कुम्हकरन के नतिन पतोह के। त करवट बदल के बंदा बड़बड़इले कि सुत्ते द भाई, महिनवन के हउए जगराता, छटाक भ के नीन से कइसे फरियाई ! त कहले बाश्शा कि जब ले तहार जगराता फरियाई तब ले त हमार खुशखबरी निझाऽ के बुताऽ जाई ! सुनते के साथ कि कवनो खुशखबरी के बात, बंदा बो उठ के बइठ रहली चट-से कि कइसन खुशखबरी ! त बाश्शा बतवले कि जा के घिरसिर प देखऽ कि कइसे, एगो तू कलसा गँववलू, तवना के बदला में कौ गो कलसा तू पवलू ! बंदा बो चलली चिहाऽ के, त बंदा चहले धधाऽ के, कि चलीं तनी देख आईं हमहूँ। त बाश्शा धइले उनुकर हाथ कि तहरा बदे भाई, खुशखबरी कुछ आउर। ऊ का ? त कहले कि ई कि तहरा प नाटक हमार, अब पूरम्पूर पूरा। आ अतने ले थोरे, अपना नाँव के जोरे। बंदा पुछले कि का नाँव ? बाश्शा बतवले कि नाटक के नाँव ‘भगवान छपरफार’। बंदा चिहइले कि ई कइसन नाँव ? त बाश्शा लगले सुनावे शुरुए से नाटक के सँउसे कथानक कि कइसे बादशाहूदीन बादशा के बादशाही में जहाँ कहऽ तहाँ, जतना कहऽ ततना, अमन कहऽ अमन, चैन कहऽ चैन। कि कइसे बादशाहूदीन बादशा जेके चाहें कि डेराय, का मजाल कि ऊ ना डेराय ; जेके चाहें कि ना डेराय, का मजाल कि ऊ डेराय। कि कइसे एक दिन के बात कि बादशाहूदीन बादशा के मन में आइल कि अहेर करे जाईं…

सुनावत गइले, सुनावत गइले कथानक, बाकिर का, कि जब अंत में आइल कि फार के छान्ही लगलन भगवानजी चउदह गो कलसा से हीरा आ मोती आ सोना आ चानी के गहना आ गुरिया, असर्फी-तसर्फी बरिसावे त बंदा ना पतियइले। ना पतियइले त बाश्शा उनुकर हाथ धइले, धइले-धइले गइले आ उपरे देखवले कि देख ल भगवानजी के फारल छान्ही, आ भुँइया देखवले  कि देख ल उनुकर बरसावल ई हीरा आ मोती आ सोना आ चानी के गहना आ गुरिया, असर्फी-तसर्फी आ तवना के बाद, देख ल जा के घिरसिर प चउदह गो कलसा। का बंदा हरवाह आ का बंदा बो हरवाहिन, दुन्नो जन गहले जा बाश्शा के गोड़ कि कइसन भगमानी रउआ बानीं कि पा लिहलीं भगवन के दरसन, जियते जिनगानी ! कि हमनी के कइसन अभागा कि सोवत न जागा ! त हँसले बाश्शा कि छोड़ऽ जा गोड़वा, गिरइबऽ जा का ? हमरा त बरिसल लउकल बस, लउकल बरसावल, तहरा ना लउकले त हमरो त नाहिंए लउकले बरिसावत भगवान। आ सोच के देखऽ कि कइसन बम्मड़ तू बाड़ऽ, कि अतनो ना जनलऽ कि जवन भगवान दूइ बैलगाड़ी प लाद के चउदह गो कलसा पठवले, तवन भगवान तवने कलसवन के लाद के कपारे प इहँवा ले अइहें ? भला भगवान किहाँ कमकर-करिन्दा के कवनो अकाल !

सुनले त बंदा आ बंदा बो दुन्नो जन उठले हबड़ाऽ के, कि हाय राम, उनुकर करिन्दा लोग आइल, पैदल चल के, कलसा कपार प उठा के, त धरम रहे हमन के कि भेजितीं जा दुचार कवर नीमन खियाऽ के, सँपरित त पियरी पहिराऽ के ! कहिहें जा भगवान किहाँ जा के कि अइलीं जा छूँछा, केहुओ ना पूछा, त कइसन मन होई खराब भगवान के ! त भइल कि देखल जाय खेत-बधार में जा के, कवन ठेकान कि कवनो गाछ-बिरीछ तर बइठल सब भेंट जायँ, हाँफत-सुस्तात !

भला कि खेत-बधार ले धावे के ना परुए। दुअरिए प मिल गइले प्रभुजी के  सातो करिन्दा। कहँरत आ हहरत। बंदा आ बाश्शा बारी-बारी से सातो के टांग-टुंग के ले अइले भितरे। बंदा बो दूध में हर्दी पकवली, सातो के पियवली। बाश्शा कुछ जड़ी-बूटी बतइले, बंदा ले अइले, बंदा बो जवन पीस के लगावे के रहे तवन पीस के लगवली, जवन गार के पियावे के रहे तवन गार के पियवली। नीम के पानी गरमा के नहवावल गइल, लेटाइल कपड़ा धोआइल, फाटल सियाइल। खियावल-पियावल गइल, निनिआय लागल लोग त बेना झुलाऽ के, लोर मे घोर के लोरी सुनाऽ के सुतावल गइल। जब जागल लोग सातो भाई त पावल लोग सातो भाई कि तबियत अब ठीक बा, हाथ-गोड़ नीके तरी हिलत बा डोलत बा, जोड़-जोड़ में जवन दरद रहे तवन नदारद बा। एक भाई कहले कि जब टांग-टुंग के भितरे ले अइलन स, हमरा त जनाइल कि काट-कुट के अँगना में गड़िहन स, बाकी ना कटलन स, ना गड़लन स, त अपना से बढ़ के जनइलन स। एक भाई कहले कि जब दूध में हर्दी पियवलन स, हमरा त बुझाइल कि जहरवो एही में होई, महुरवो एही में होई, बाकिर, ईहे ना कि ना जहर रहे, ना माहुर, ईहो, कि पियते बुझाइल कि जान में जान मतिन आइल। एक भाई कहले कि जब बूटी पिसाइल हमरा बुझाइल कि एही में पीस के मरिचाई, घाव प लगावल अब जाई, बाकिर,लगवला प बुझाइल जइसे जांगर जुड़ाइल। एक भाई कहले कि नीम के पानी जब लागल गरमाय त हमरा त बुझाय कि नीके तरी खउलइहन स, हरहरा के  उझिलहन स देह प, बाकी इनरा प जा के, ठंढा पानी मिला के, जब नेह से नहववलन स, हमरा त मन में आइल कि नहाते रह जाईं। एक भाई  कहले कि हमरा त बुझाइल कि इनार प हमनिए से पानी भरवइहन स, भरते बेर पाछा से मरिहन स लात, इनरवे में ढकेल के मुँअइहन स, बाकी का, कि अपने खिंचलन स घइलन पानी, हम त अब सोच लेले बानी कि छाइए के जाइब अब आपन उजारल हम छान्ही। एक भाई कहले कि जब लगलन स कपड़ा उतार के धोए, हमरा इयाद परल धोबिया के पूत, कि बुला ओसहीं हमनियो के धो के, फींच-फचकार के गार के पसरिहन स, बाकिर का, कि आहा ! जब छुअलन स, रूई के फाहा ! एक भाई कहले कि भाई, खइला-पियला के बाद, जब आँख निनिआइल आ ई तीनो जन बेना झुलावत, लोरे घोर के लोरी सुनावत भिरियाइल त हमरा त बुझाइल कि बुला सुतला में घेंटी दबाई लोग, सुतले मुँआई लोग। कि इहाँ के रेवाज ह का दो कि मूँअल के नेवर्तक मुँअलका के मुँअला के बादे रोआई-गवाई, मुँआवल के नेवर्तक मुँआवे के पहिलहीं रोआई-गवाई… बाकिर का , कि खुलल जब आँख त देखलीं हा कि सातो-के-सातो हमन भाई सरगे में बानीं, नरक में नइखीं जा…।

अभी आपन-आपन गावते रहन सातो भाई, तले बंदा हरवाह आ बंदा बो हरवाहिन आ बाश्शा कुछ चर-चबेना, कुछ भेली-भूँजा लेके आइल आ जवन आइल तवन सातो के बीच में चदरा बिछाऽ के रखाइल। कहले बंदा, दुनो हाथ दसो नोह जोड़ के कि भाई जी लोग, माफ कइल जाई, अइसन  गलती अब आगे से ना होई। कब्बो अब घर के दुआरी प बैल भा गदहा, कुछ ना बन्हाई। अबकी जब रउआ सब आइब, घर के दुअरिए से आइब। हमने के गलती से, अबकी बे, सातो आप सभनी के, घर के पिछुत्ती से, छान्ही प चढ़े परल, खपड़ा आ नरिया से लड़े परल, आ ढह के, ढिमिलाऽ के भुँइया में गिरे परल, सहे परल घाव, खाय परल चोट,  त हे हो छछात भगवान के करिन्दा जी लोग, जवन चाहीं हमनी के दे दीं सजाय, बाकिर का, कि अपना मलिकार से बताइब मत, जा के ई बात, कि रउरा सब साथ, कइसे आ कइसन आ कतना भइल घात…।

कहत के साथ बंदा के आँख छलछलाइल, बाकिर सुनत के साथ, सातो भइयवन के आँख से बह-बह के बहरी ले आइल। त थोर-बहुत बड़कू आ थोर-बहुत छोटकू, थोरे मँझिलकू, सँझिलकू आ थोर-बहुत छोटकू से बड़कू आ उनुका से बड़कू आ उनुको से बड़कू बताऽ गइले सब-सब साँच, कि कहाँ भगवान के करिन्दा आ कहाँ हमन चोर-चुहाड़, धरती के भार भइल, अबहिन ले जिन्दा ! बतवले आ चउदहो हाथ से छवो गोड़ छनले कि आईं जा तहरा कुछ काम त जिनिगी सुकलान ! त कहले बंदा कि कइसन साधू आ कइसन सिपाही आ कइसन चोर, जेकर जइसन चाव, जेकर जइसन इच्छा, बाकिर भगवान, जेकरा के चुन-गुन के आपन बनवले करिन्दा, ऊहे भगवान के करिन्दा। त तोनहन के हाथे जइसे-जवन-जतना सब भेजले भगवान, ओमें जतना गाँव भ के हिस्सा, ओतने तहार आ ओतने हमार। आपन लेके जो चाहऽ जा जाइल त कइसे भला रोके हम पाइब, बाकिर, हमार त अतने अरदास कि पहिले साथे मिल के गाँव भ में बैना बँटवा दिहितऽ जा, तब आपन हिस्सा उठवा लिहितऽ जा। तोनहन के हाथे आइल, तोनहने के हाथे बँटाइत त ना केहू देला के गुमाने गुमसाइत, ना केहू लेला के लाजे मसुआइत। त कहले जा सातो भाई कि बाँटब जा भाई, बँटवाइब जा भाई, बाकिर का कि भगइबो जो करबऽ त अब, जाइब जा त ना, आ ना, आ नाहिंए ए भाई। एक भाई कहले कि हम देवाल उठाइब, दुसरकू कहले कि हम छान्ही छाइब। तिसरकू कहले कि हम गोतब सानी, चउथकू कहले कि हम भरब कुँइया से पानी। पँचऊँ कहले कि खेत बाकिर हमहीं पटाइब, छठऊँ कहले कि खेती-किसानी में हमरा से अधिका सहाय त रउरा केकरो ना पाइब। सतऊँ कहले कि हम बाकी अपना भउजिए के काम में हाथ बँटाइब। त कहली बंदा बो भउजाई कि अइसन देवर अब कहँवा हम पाइब !

बाश्शा कहले कि एक बात बाकिर हमार। कि तोनहने सात के बात के बखान से नाटक में हमरा, असल अब आइल बा जान। तोनहने के अरनक आ बरनक से चमकी आ गमकी ई नाटक, नाटक से बढ़ के नौटंकी कहाई। तोनहने के पुन्ने-परताप कि अब जब खेलल ई जाई, त देखनिहारन के लागी धरनिहार। सतमहला समियाना के राखे के होई इन्जाम। त भाई हो सात, अजुए, अबहिंए सँकारऽ जा कि खेलल जब जाई ई नाटक, ‘भगवान छपरफार’, त बिना कवनो ना-नुकुर, बिना कवनो धुकुर-पुकुर, बात हमार मनबऽ जा, सातो भाई सात किरदार में अइबऽ जा…। त कहले जा कि काहे ना आइब जा…आइब जा जरूर, सिखइबऽ त सीखब जा काहे ना, नाटक-नौटंकी के सब-सब सहूर… बाकिर, हमनियो के बा एगो बात, कि घोड़ा बनइहऽ, धउराऽ लीहऽ, हरिना बनाऽ के कुदवाऽ लीहऽ, बनाऽ लीहऽ बाघ भा सियार, सीखब जा सवखे से गरजल आ सवखे से सीखब जा फेंकरल, बैल बनवाऽ के नधवाऽ लीहऽ, गदहा के दीहऽ किरदार, लतियइहऽ, दुलत्ती में तनिको जो कम्मी तू पइहऽ, कुक्कुर बनवा के भुँकवा लीहऽ, बाकिर… आ बाकिर… सातो भाई चोर के किरदार, हमन से करावे के सोचबो जो कइलऽ, त भाँड़ में जा तू, आ भन्सार में जाय तहार नाटक…!


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Hum BhojpuriaMarch 21, 20221min1920

विनय बिहारी सिंह

एमे कौनो दू राय नइखे कि आदि शंकराचार्य सनातन धर्म के एने-ओने छिंटाइल विचारधारा के एकीकरण क दिहले। उनकर जनम केरल के मालाबार इलाका के कालड़ी गांव में नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में भइल रहे। पिता- शिवगुरु आ माता- आर्याम्बा परम ईश्वरभक्त रहे लोग। शंकराचार्य के जन्म सातवीं शताब्दी के मानल जाला। बाकिर एगो मान्यता बा कि उनुकर जनम 508 ईसा पूर्व आ मृत्यु 474 ईसा पूर्व भइल रहे। त हमनी के एकरा पर ढेर सोचला के जरूरत नइखे। ईहे मानि के चलेके बा कि आदि शंकराचार्य ईश्वर के एगो अवतार रहले। काहें से कि ऊ सिरिफ 32 साल के आयु तक जियले। एही बीच में ऊ अद्वैत वेदांत के ठोस आधार बना दिहले, विविध विचारधारा के एकीकरण कइले, उपनिषद आ वेदांत के सूत्र के व्याख्या कइले, बिसेस रूप से ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडुक्य, ऐतरेय, तैतीर्य, वृहदारण्यक आ छांदोग्य उपनिषद के विलक्षण भाष्य लिखले, ब्रह्मसूत्र के व्याख्या कइले, चारो दिशा में चार गो पीठ- ज्योतिष्पीठ (बद्रीनाथ, उत्तराखंड), गोवर्धनपीठ (पुरी, उड़ीसा), शारदापीठ (द्वारका, गुजरात), आ श्रृंगेरीपीठ (मैसूर, कर्नाटक) में स्थापित कइले। एकरा अलावा ऊ दसनामी (दस प्रकार के) संप्रदाय बनवले, जवना के नांव ह- गिरि, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, तीर्थ आ आश्रम। एही से उनुका के ढेर लोग भगवान शिव के अवतार भी कहेला।

आदि शंकराचार्य के जनम के लेके एगो बड़ा रोचक प्रसंग बा। कहल जाला कि माता आर्यांबा आ पिता शिवगुरु के कई साल ले कवनो संताने ना भइल। लागत रहे कि अब माता आर्याम्बा बिना संताने के रहि जइहें। घर के लगिए एगो शिव जी के मंदिर रहे। दूनो परानी ओही मंदिर में पूजा आ ध्यान करे बइठि गइल लो आ ठानि लिहल लो कि जब तक भगवान शिव के पुत्र पैदा होखे खातिर आसिरबाद ना मिली ऊ लोग ओहिजा से टस से मस ना होखिलो। चाहे मृत्यु काहें ना हो जाउ। त कहल जाला कि भगवान शिव कृपा सिंधु हउवन, किरपा के सागर। एह दूनो परानी के बिना खइले-पियले कठिन तप देखि के शिव जी के मन पसीज गइल। ऊ प्रकट हो गइले आ कहले कि बर मांग लोग, का चाहीं। कहाला कि भगवान के सब मालूम रहेला कि के का चाहता। बाकिर उनुकर लीला अइसन ह कि ऊ भक्त के मुंह से ओकर कामना सुने के चाहेले। त शिवगुरु जी कहलन कि प्रभु, हमनी के कौनो संतान नइखे। किरपा करीं आ एगो पुत्र प्राप्ति के आशिरबाद दे दीं। भगवान शिव कहले कि तोहरा लोगन के लइका होखी। बाकिर एगो शर्त बा- तू ढेर उमिर के लइका चाह तार त ऊ बुद्धिमान ना होखी। कम उमिर के लइका होई बाकिर ऊ परम बिदवान होखी। कइसन लइका चाह तार। शिवगुरु स्वयम परम विद्वान रहले, उनुकर माता भी विद्वान रहली। तुरंते कहले- प्रभु, कमे उमिर के लइका दीं, जवन परम विद्वान होखे। तब माता आर्याम्बा के कोख में आदि शंकराचार्य आ गइले। बाकिर उनुका जनम के कुछए महीना बाद पिता शिवगुरु के देहांत हो गइल। जनम के पहिले शिवगुरु अपना मेहरारू आर्याम्बा के वेद-पुराण के पवित्र प्रसंग आ धार्मिक, आध्यात्मिक कथा सुनवले ताकि आदि शंकराचार्य के कान में ई कुल बाति जाउ। आदि शंकराचार्य के आठ बरिस उमिर भइल त उनुका वेद, पुराण, उपनिषद आदि के परम ज्ञान हो चुकल रहे। उनुका मन में परम वैराग्य के भाव उठल। ओही घरी ऊ अपना महतारी से आज्ञा ले के गुरु के खोज आ साधना खातिर घर छोड़ि दिहले।

उनुकरा संन्यास लिहला के भी एगो कहानी बा। घर का लगे अलवाई नदी बहत रहे। ओही में माई-बेटा नहाए गइल लोग। अचानके आदि शंकराचार्य के एगो गोड़ मगरमच्छ पकड़ि लिहलसि। उनुकरा माई के त जइसे पराने निकलि गइल। ऊ रोए लगली। त आदि शंकराचार्य कहले कि ए माई तूं हमरा के संन्यास के आज्ञा दे देबू त ई मगरमच्छ से बांचे खातिर हम प्रार्थना कर सकतानी। माई कहली कि ठीक बा। तू संन्यास ले लीह। बाकिर तोहार जान बांचि जाउ। ज्योंही माई संन्यास के आज्ञा दिहली, मगरमच्छ आदि शंकराचार्य के गोड़ छोड़ि दिहलस। लोग कहेला कि भगवाने मगरमच्छ के रूप में आइल रहले।

आदि शंकराचार्य गुरु के खोज में निकलले त उनुका मन में गहिर आस्था रहे कि गुरु जरूर मिलिहें। ऊ पैदले, नंगे पैर जगह-जगह भ्रमण कइलन। कठिन खोज के बाद आखिरकार हिमालय के बद्रीनाथ के एगो आश्रम में गुरु गोविंद भगवत्पाद से भेंट होइए गइल। आदि शंकराचार्य के बुझा गइल कि ईहे हमार गुरु हउवन। गुरु पुछले कि तूं के हव। आदि शंकराचार्य कहले कि एह शरीर के पिता के नाम शिवगुरु ह। बाकिर हम के हईं, ईहे जाने खातिर हम रउवां शरण में आइल बानी। विनम्र प्रार्थना बा कि हमरा के शिष्य बना लीं। गोविंद भग्वतपाद जी जानत रहले कि ई हमार शिष्य के लायक लइका बा। ओह दिन से आदि शंकराचार्य ओह आश्रम के निवासी हो गइले आ अद्वैत दर्शन के शिक्षा प्रारंभ हो गइल। शिक्षा पूर्ण भइल त ई देश भर के भ्रमण कइलन आ जगह-जगह आपन चेला (शिष्य) बनवलन। बनारस में मंडन मिश्र जइसन विद्वान के शास्त्रार्थ में हरा दिहलन आ उनका के आपन चेला बनवलन।

एक बार के बात ह कि आदि शंकराचार्य गंगा में नहा के अपना चेला लोगन के साथे वापस आवत रहले। सामने से एगो मइल-कुचइल चांडाल चारि गो कुकुर ले के आवत रहे। चेला कहलन स कि चांडाल रास्ता से हटि जा, हमनी के गुरु जी गंगा असनान क के आवतारे। चांडाल सामने आके ठिठकि के रुकि गइल। कहलसि कि हमरा देहि के रउवां सब चांडाल कहतानी। बाकिर हमार आत्मा त ओइसने बा जइसन राउर बा। त केकरा के हटे के कहतानी, देह के कि आत्मा के? रउवां सब त विद्वान हईं सभे। आत्मा पवित्र ह। आदि शंकराचार्य के लागल कि ई कौनो साधारण व्यक्ति ना ह। ऊ तुरंते हाथ जोड़ि के चांडाल के प्रणाम कइले आ कहले कि महाराज रउवां के हईं, रउवां निश्चय रूप से मनुष्य के रूप में कौनो देवता हईं। ई सुनते चांडाल भगवान शिव के रूप में बदलि गइल। भगवान शिव के गुरु आ चेला लोग चरण छुअल लोग आ धन्य भइल लोग। चारि गो कुकुर चारि गो वेद के रूप प्रकट भइलन स।

शंकराचार्य के आनंद के कौनो ठेकाना ना रहे। शिव जी कहलन कि तोहरा के हम आसिरबाद दे तानी कि तू ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखब। तब तक ले ऊ भगवत् गीता पर भाष्य लिखि चुकल रहले। त ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखत के बेरी एगो अउरी घटना भइल। नदी से नहा के आदि शंकराचार्य वापस लौटत रहलन त एगो साधु उनुका से ब्रह्मसूत्र के एगो श्लोक के अर्थ पुछलसि। आदि शंकराचार्य ओकर अर्थ बतवलन। एह पर ऊ साधु उनुका से शास्त्रार्थ करे लागल। आठ दिन ले शास्त्रार्थ भइल। शंकराचार्य के लागल कि ई कौनो साधारण साधु ना हउवन। ऊ हाथ जोड़ि के प्रार्थना कइलन कि रउवां आपन असली परिचय दीं। रउवां के हईं? तब पता चलल कि ऊ ब्रह्मसूत्र के रचयिता वेदव्यास हउवन। आदि शंकराचार्य के त आनंद के ठेकाना ना रहे। वेदव्यास उनुका के कहले कि तू हमरा ब्रह्मसूत्र के सही-सही व्याख्या कर रहल बाड़। जा तोहरा के हमार आशीर्वाद बा।

आदि शंकराचार्य सचहूं ईश्वर के अवतार रहले। उनुका बारे में जेतना लिखाउ कमे कहाई। कहल जाला कि ऊ 262 से ज्यादा ग्रंथ लिखले बाड़े। हमनी के धन्य बानी जा कि ओह धरती पर जनम लेले बानी जा जहां परम पवित्र ईश्वर के अवतार आदि शंकराचार्य के जन्म भइल रहे।  अंत में 32 बरिस के उमिर में ऊ केदारनाथ में आपन शरीर छोड़ि दिहले, महासमाधि में लीन हो गइले।


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Hum BhojpuriaMarch 21, 20222min1850

भगवती प्रसाद द्विवेदी 

नब्बे-पार मोती बीए लमहर बेमारी से जूझत आखिरकार 18 जनवरी, 2009 के सदेह एह लोक से मुकुती पा लेले रहनीं। किशोरे उमिर (1934) से संग-साथ देबे वाली जीवन संगिनी लछिमी सरूपा लक्ष्मी देवी पहिलहीं 1987 में साथ छोड़ि देले रहली। बांचि गइल रहे उन्हुका इयाद में बनावल ‘लक्ष्मी निवास’, जहंवां हिन्दी, भोजपुरी, अंगरेजी, उर्दू के एह समरथी आ कबो सभसे अधिका शोहरत पावेवाला कवि के पहिले आंखि  आउर कान जवाब दे दिहलन स,फेरु अकेलहीं तिल-तिल टूटत,बिलखत-कलपत शरीर से आतमा निकलि गइल,संसा टंगा गइल।

1 अगस्त, 1919 का दिने उत्तर प्रदेश में देवरिया जिला के बरेजी गांव के मालवीय ब्राह्मण परिवार में बाबूजी राधाकृष्ण उपाध्याय आ माई कौलेसरा देवी के सपूत मोतीलाल उपाध्याय हालांकि आगा चलिके एम ए, बी टी, बी एड, साहित्य रत्न के उपाधि हासिल कऽ के इण्टरमीडिएट कॉलेज में प्रवक्ता (इतिहास) हो गइल रहनीं, बाकिर बी ए कइला का बादे साहित्य के हलका में अतना लोकप्रिय हो गइनीं कि ताजिनिगी उहांके नांव मोती का संगें  बी ए तखल्लुस बरकरार रहल। उहां के आखिरी सांस ले कविता के जीयत रहनीं। हिन्दी में तेइस गो, भोजपुरी में आठ गो, उर्दू में पांच गो आउर अंगरेजी में तीन गो कविता-संग्रह देबे वाला मोती बी ए सही माने में भाषा-साहित्य-संस्कृति के मोती रहनीं। डॉ. रामदेव शुक्ल के संपादन में नौ खंड में मोती बी ए ग्रंथावली के प्रकाशन 2011 में दिल्ली के नमन प्रकाशन से भइल रहे। भोजपुरी में ‘सेमर के फूल’, ‘भोजपुरी सानेट’, ‘तुलसी रसायन’, ‘भोजपुरी मुक्तक’, ‘मोती के मुक्तक’, ‘बन-बन बोलेले कोइलिया’, कालिदास के ‘मेघदूत’ के भोजपुरी काव्यानुवाद नियर कृति देबे वाला मोती बी ए कबो कवि सम्मेलन में धूम मचवले रहनीं। भोजपुरी गीतन के सभसे पहिले फिलिम में जगह दियवावे वाला उहेंके रहनीं। हिन्दी आ भोजपुरी में रचल उहां के गीत जहवां जन-जन के जबान पर चढ़ल रहलन स, उहंवें पुरान फिलिमन में उन्हुकर गीत शोहरत के बुलंदी के छूके मील के पाथर साबित भइल रहे।

गिरावट आ क्षरणशीलता के एह बाजारवादी निठुर समयो उहां के डिगा ना पवले रहे आ सरलता, सहृदयता आउर मनुजता के प्रतिमूर्ति रहनीं मोती जी बीए। जवना घरी उहां के अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रहनीं, हमरा के सम्मेलन के महामंत्री बनावल गइल रहे। जब बइठकी में हिस्सा लेबे उहां के देवरिया से आईं, त वरिष्ठ गीतकार विंध्यवासिनी दत्त त्रिपाठी के घरे ठहरीं। हमहूं उहां पहुंचि जाईं आ खूब बतकही होखे, उहां के सम्मान में गोष्ठी आ एकल पाठो होखे।

हम जिज्ञासावश पुछले रहनीं, “ओह घरी, जब कवि सम्मेलन के मंच पर राउर आ डॉ. शंभुनाथ सिंह के चरचा खूब जोर पर रहे, एकाएक रउआं फिलिम में कब आ कइसे चलि गइनीं?”

मुंह में पान चभुलावत मोती जी ओह तथ के खुलासा करत कहले रहनीं, “ओइसे त मुंशी प्रेमचंद, प्रदीप, सुमित्रानंदन पंत, भवानी प्रसाद मिश्र, अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, सुदर्शन, वृंदावन लाल वर्मा, नरेन्द्र शर्मा, नीरज, नेपाली, शैलेन्द्र, राही मासूम रज़ा नियर अनेक साहित्यिक हस्ती कवनो ना कवनो रूप में फिलिम से जुड़ल रहली स, बाकिर हमार जुड़ाव एकदम अप्रत्याशित आ अचानक भइल। भइल ई रहे कि पंडित सीताराम चतुर्वेदी के अध्यक्षता में बनारस में ‘प्रसाद परिषद्’ के एगो कविगोष्ठी में भाई शंभुनाथ जी का संगें हमहूं हाजिर रहलीं। जब ‘रूप भार से लदी तुम चली’ शीर्षक कविता के हम सस्वर पाठ कइलीं, त उहां मौजूद पंचोली आर्ट पिक्चर, लाहौर के मालिक पंचोली साहब आ निर्देशक रवीन्द्र दवे मंत्रमुग्ध हो गइलन आ अगिली फिलिम के गीतकार का रूप में हमार बहाली हो गइल। सन् 1944 से 1952 ले लाहौर आ मुंबई में रहिके हम फिलिम के गीत लिखलीं। प्रमुख फिलिम रहली स-कैसे कहूं, नदिया के पार, सुभद्रा, साजन, सिन्दूर वगैरह।

‘नदिया के पार’ के त उहां के मए गीत सुपरहिट रहलन स। फिलिम रहे हिन्दी के आ गीत रहलन स भोजपुरी के। हम सवाल कइले रहलीं, “सभसे पहिले ‘नदिया के पार’

हिन्दी फिलिम में भोजपुरी गीत डाले के बात रउरा दिमाग के उपज रहे आकि निर्माता के?”

आत्मबिसवास से भरल उहां के जवाब रहे, “हम लरिकाइएं से लोकभाषा के ताकत आ सामरथ के पहिचानत रहलीं। एह से हमहीं निर्माता-निर्देशक किशोर साहू पर जोर डालिके दिलीप कुमार-कामिनी कौशल अभिनीत ‘नदिया के पार’ खातिर सात गो भोजपुरी गीत लिखलीं। दूगो गीत के तनी मुखड़ा देखीं-‘कठवा के नइया बनइहे रे मलहवा कि नदिया के पार दे उतार-‘, ‘अंखिया मिलाके अंखिया रोवे दिन-रतिया हो, कहीं का बतिया, भूले ना सुरतिया हो तोहार-!’ हम ना खाली पहिलकी बेर भोजपुरी गीत के फिलिम में प्रवेश दियवलीं, बलुक ओकरा के स्थापितो कइलीं। जब फिलिम रिलीज भइल, त ऊ गीत जन-जन के जबान प रहलन स। फिलिम के नायक दिलीप कुमार ओह गीतन के पहिला बेर सुनिके झूमि उठल रहलन आ ओही घरी लोकभाषा के एगो फिलिम बनावे के दीढ़ निश्चयो कऽ लेले रहलन, जवन आगा चलिके ‘गंगा जमुना’ बनाके पूरा कइलन।”

हमरा मन में फेरु सवाल उठल रहे, “आठ-नौ बरिस ले फिलिम लेखन का बाद, जब रउरा गीतन के धूम मचल रहे, तबे रउआं फिलिम जीवन से संन्यास काहें ले लिहनीं?”

“ना-ना!” उहांके मूड़ी हिलावत कहलीं,” एकरा के संन्यास ना कहल जा सके। अपना स्वाभिमान के गिरवी राखे के शर्त पर हमरा फिलिम मंजूर ना रहली स। कतिपय बिंदुअन पर हम समझौता ना कऽ पवलीं आ गांवें आके श्रीकृष्ण इण्टरमीडिएट कॉलेज, आश्रम बरहज (देवरिया) में जुलाई, 1952 से इतिहास के प्रवक्ता नियुक्त हो गइलीं। सन् 1980 में सेवानिवृत्ति के बाद हम फेरु भोजपुरी फिलिमन खातिर कुछ गीत लिखलीं, जवना में ‘गजब भइले राम’, ‘चंपा-चमेली’, ‘ठकुराइन’ वगैरह फिलिम रहली स।”

“कविता में राउर रुझान अपने आप जागल आकि केहू के प्रेरना से?” हमरा प्रश्न प  उहां के हठात् कहलीं, “हम हिन्दी के विद्यार्थी ना रहलीं, बस हाई स्कूल ले हिन्दी साहित्य पढ़ले रहलीं। फेरु हम कवि बने के होसला कइसे करितीं! बाकिर हमरा बचपने से सुर में गावे के सवख रहे। सुरीला गीतन के सुनिके सुननिहारन के नीमन लागल। तबे डॉ शंभुनाथ सिंह विद्यालय में अइलन। ऊ हमरा गांव के लगहीं के रहलन। उन्हुके कहला से हमहूं कविता लिखे लगलीं। ओही घरी महादेवी वर्मा के भाई मनमोहन वर्मा के संपादन में हस्तलिखित विद्यालय पत्रिका के शुरुआत भइल रहे, जवना में हमार पहिलकी कविता छपल रहे-

अरी सखि,घूंघट का पट खोल!

कली अभी प्रस्फुटित नहीं है,

मंद समीरन डोल रही है,

रस-परागयुत राग-सुरभि

बिखरा देना अनमोल–!

1938 ले बीए के पढ़ाई कइला तक कविता लिखलीं। फेरु क्रांतिकारी हो गइलीं। डेढ़ साल ले जेहल के सजाइयो कटलीं। सन् 1941 में एमए (इतिहास) के डिग्री मिलल, ओकरा बाद बीटी, साहित्य रत्न कइलीं। बीए आ एमए का बीचे रचल कविता मोती बी ए के लोकप्रिय बना दिहली स। नांव का संगें बीए लिखेवाला तीन गो साहित्यकार भइलन-बाबू श्यामसुंदर दास, संतराम आ हम। ओह घरी के कवि सम्मेलन से हमरा के खूब शोहरत मिलल रहे।”

जब कवि सम्मेलन के चरचा छिड़ल, त मोती जी के चेहरा प खुशी के भाव झलके लागल। हम उहां के कुरेदल चहलीं-“ओह घरी के कवनो यादगार कवि सम्मेलन के इयाद बा का?”

उहांके मुसुकी काटत कहलीं, “ओह घरी के अधिकतर कवि सम्मेलन यादगार होत रहलन स। सन् 1939 में बनारस के एगो कवि सम्मेलन आजुओ मन परत बा, जवना में ओह समय के नामी-गिरामी कवि-बच्चन,श्याम नारयण पाण्डेय वगैरह आमंत्रित रहलन। हम श्रोतन का बीचे लुकाके बइठल रहलीं। तलहीं काव्य-पाठ खातिर हमार नांव पुकारल गइल। हम अउरी लुकाए लगलीं, बाकिर संयोजक हमरा के पकड़िके उठा लिहलन। मंच पर ले जाइल गइल। जब गीत पढ़े लगलीं, त अतना वाहवाही मिलल कि हम खुदे चकित रहि गइलीं। खुद बच्चन जी उठि के शाबाशी देत हमार पीठि थपथपवले रहलन। गीत के पांती रहे-

सृजन, यह आह्वान तेरा!

वेदना में चेतना खो, अचल मूर्च्छित-सा रहा जो

शृंग उर से फूट निकला एक कल-कल गान तेरा,

सृजन,यह आह्वान तेरा!

फेरु एगो आउर गीत के मांग बेर-बेर होखे लागल रहे। तब हमरा ‘वह तुम्हारा मान मानिन’ गीत सुनावे के परल। सन् 1943 में सेठ आनंदीलाल पोद्दार के संयोजन में दूदिनी काव्य समारोहो के खूब इयाद आवत बा, जवना में सोना के मोहर लुटावल गइल रहे आ नेपाली, नीरज का संगहीं एह मोती बी ए पर भी सोना के मोहर के बरखा भइल रहे।”

बाकिर धनाभाव में मोती बी ए के खूब संघर्षो करेके परल रहे। ओह दिनन के इयाद करत उहां के कहनाम रहे-“छात्र जीवन में हम दर-दर के ठोकर खइले रहलीं, पत्रकारितो कइले रहलीं। दैनिक आज,संसार, आर्यावर्त, अग्रगामी जइसन पत्रन में सहायक संपादक रहलीं। जब एमए करत रहलीं, त ‘आज’ (बनारस) में रात के नौ बजे से भोर के चार बजे ले कबीरचौरा में पत्रकारिता कइलीं। उहां से छूटीं त एमए के पढ़ाई करीं। तनखाह के पचीस रोपेया में से पनरह फीस में, दू रोपेया भाड़ा में, चार रोपेया एक सांझि के भोजन में हरेक महीना खरच करत रहलीं आ बाकी के चार रोपेया में मए काम निपटावत रहलीं। बाकिर फांका करहूं में मस्ती रहे ओह घरी।

अपना कवना कृति से उहां के सभसे बेसी प्यार रहे? मोती बी ए के उद्गार रहे-“हम हिन्दी, भोजपुरी, अंगरेजी आ उर्दू में तीन दर्जन किताब लिखले बानीं। अंग्रेजी से शेक्सपिअर आ संस्कृत से कालिदास के काव्य कृतियन के हिन्दी आ भोजपुरी में काव्यानुवादो कइले बानीं। ‘लव एंड ब्यूटी’ में एकावन गो सानेट बा। आंसू डूबे गीत, बादरिका, पायल छम-छम बाजे, हरसिंगार के फूल, मधुतृष्णा, कवि और कविता, प्रतिबिंबिनी, अश्वमेध, कुछ गीत:कुछ कविता (सब हिन्दी कविता-संग्रह), सेमर के फूल, बन-बन बोलेले कोइलिया, भोजपुरी सानेट, तुलसी रसायन, मोती के मुक्तक (मए भोजपुरी कविता-संग्रह), रश्के गुहर, दर्दे गुहर (उर्दू काव्य) वगैरह हमार प्रिय कृति बाड़ी स।”

हमार अगिला सवाल फूटल रहे-“ओइसे त ‘समिधा’ पर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से ‘राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार’, शिक्षा विभाग से आदर्श शिक्षक पुरस्कार, राष्ट्रपति पुरस्कार रउरा के मिलल रहे, तबो  सरकारी पुरस्कार का बारे में राउर का नजरिया बा?”

एह पर उहांके दू टूक जवाब रहे-“दूरदर्शन, आकाशवाणी, सरकारी भा गैर-सरकारी पुरस्कार-सम्मान में हमार कवनो आस्था नइखे रहल। ई सब कुछ अपना लोगन के तुष्ट करे आ पइसा कमाए के चालबाजी ह-बस!

“आजु के साहित्यिक मंच का बारे में राउर खयाल? “सवाल सुनते उहां के बतवनीं-“पहिले के मंच सचमुच साहित्यिक मंच होत रहलन स। अब त सुनेवाला श्रोता, आयोजक, कवि- सभे बदलि चुकल बा। अब दक्षिणा के धियान अधिका रहेला आ कोशिश रहेला कि कइसे दोसरा के नीचा देखावल जाउ।”

“कहल जाला कि गद्य कवि के कसउटी होला। का रउओं गद्य लिखले बानीं? एने का लिखनीं रउआं?” चाह के चुसुकी लेत मोती जी जानकारी दिहनीं-“समय-समय पर हमहूं गद्य लिखले बानीं। गद्य के हमार किताब बा- ‘इतिहास का दर्द ‘। घनानंद, बोला, रसखान के पुस्तक के लमहर-लमहर भूमिका लिखले बानीं। एने आत्मकथा लिखत रहलीं, जवना के प्रकाशन देवरिया के पत्र में धारावाहिक रूप से होत रहे।”

हम दुखी मन से पुछनीं, “राउर विपुल साहित्यिक देन के देखिके अइसन लागत बा कि राउर सार्थक मूल्यांकन अब ले ना हो पावल। आजु के आलोचना का बिसे में राउर का विचार बा?” बेगर लाग-लपेट के उहांके कहनाम रहे-“आजु के आलोचना गोलबंदी के शिकार होके रहि गइल बा। अब आलोचना कृति के पढ़िके ना, कृतिकार के पहुंच आ ओकरा से होखे वाला घाटा-मुनाफा के धियान में राखिके होत बा।”

हमार एगो अउरी उत्सुकता रहे -“जवना तरी फिलिम में रउआं सबसे पहिले भोजपुरी गीत लिखनीं, ओह किसिम के भोजपुरी साहित्यो में का कवनो प्रयोग कइले बानीं?

उहांके तपाके से जवाब दिहनीं-“जरूर!’बन-बन बोलेले कोइलिया’ में रउआं हमार प्रयोग देखि सकींले। ई लोकसंगीतिका के संग्रह ह, जवन आकाशवाणी इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के केशवचंद्र वर्मा के निहोरा पर ‘फोक ऑपेरा’ का रूप में लिखल गइल रहे। ई भोजपुरी के पहिल प्रयोग रहे।”

“आजु कविता के का हाल बा?” सुनते उहांके भावुक हो गइनीं-“आजु के अधिकांश कवितन में काव्यात्मकता सिरा से गायब बा। बाकिर जब कबो हमरा नीमन कविता मिलेला, हम जरूर पढ़ेलीं। हम हरदम कविता के तलाश में रहेलीं-खाली छंद, गीत आ लए में ना, एकरा हर रूप में। लिखे से हमार मन कबो थाकेला ना, काहें कि लेखने हमरा खातिर जिनिगी बा-

कलम जिंदा न होती तो कभी का मर गया होता,

पहुंचने के लिए घर पर खुदा के घर गया होता!

 

हम कविता के परेमी हईं आ आखिरी सांस ले कविता के प्यार करत रहबि, ओकरा के जीयत रहबि।”

फेरु त मोती बी ए के कविताई शुरू हो गइल रहे। कविता के बाबत उहांके कहनीं-

 

जब ले कविताई कला दरबारन से हटिके जनता में न जाई

जबले न दलालन के धोकरी से निकाल के बाहर कइल जाई

जबले चमचा के बजारन में कविताई से पेट के आगि सेवाई 

तबले कवि गंग के खींचल खाल में काहे न ठूंसिके भूस भराई!

 

कृषि के साझा संस्कृति पर ‘कटिया के सुतार’ का बहाने उहांके विचार रहे-

 

खेत-खेत घूमेला तेली-तमोली 

नउवा आ धोबिया के निकलल बा टोली

सुनऽ ताड़ू लोहरा आ कोंहरा के बोली 

भइले गंवार सरदार हो सजनी 

कटिया के आइल सुतार।

 

उहांके गांव के महुआबारी में ले जात कहनीं-

महुआ अइसन ले रेंगइले,जरी-पुलुई ले कोंचइले 

लागल डाढ़ीडाढ़ी डोलिया-कंहार सजनी 

ई गरीबवन के किशमिश अनार सजनी 

असों आइल महुआबारी में बहार सजनी!

 

उहांके ‘चिरई हो चिरई’ के पांती रहे-

खिचड़ी खइबू कि खइबू सतुआ 

लबरी खइबू कि पिंड़िया घोरुआ 

भरुआ मरिचा, आम के चटनी 

ओकरा ऊपर सोगहग मुरई 

खेते जइबू कि कीरा खइबू 

टांगुन रहिला कतहीं ना पइबू 

हमरे अंगना मंगना लोटे 

जब तू अइबू तब पछतइबू 

कहां बनइबू आपन खतोना 

आगि लागल बा गंवई गंवई 

चिरई हो चिरई, चिरई हो चिरई!

 

आजुओ जब मोती बीए के इयाद आवेला, त उहांके रचनाशीलता के अइसन दिया जरत बरत लउकेला, जवना के बुताए के त सवाले नइखे उठत, ऊ त हरदम गह-गह कोना-अंतरा अंजोर करत रही। उहां के ओह शाश्वत जगमगात पांती से स्मृति के प्रणामांजलि!

 

एगो दिया जरेला, जवन कहियो ना बुताय 

जवन परे ना लखाय, जवन हाटे ना बिकाय 

जवन कोना-अंतरा सगरो अंजोर करेला 

एगो दिया जरेला, एगो दिया जरेला!


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Hum BhojpuriaMarch 21, 20221min1610

मार्कन्डेय शारदेय  

विश्वनाथ प्रसाद ‘शैदा’  एगो अइसन नाँव जे आपन व्यक्तित्व आ कृतित्व से अपने ना, अपना साथे आपन जिला-जवार, प्रदेश आ भोजपुरियो के एगो अलगे पहचान देलस। उनुकर कारयित्री प्रतिभा शैक्षणिक प्रमाणपत्रन के ऊँचाइयन के दरकिनार कइके आ सम्पन्नता के बड़-बड़ इमारतन के नजरअंदाज करत ‘स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते’ एह सूक्ति के चरितार्थ कइलस। उनुका में ना शेखी बघारे के आदत रहल आ ना केहू के प्रति बेअदबी से पेश होखे के। अदब के साक्षात् मूर्ति रहन शैदाजी। जे मिलो, जेकरा से मिलसु मुस्काइये के। बच्चा, बूढ़, छोट-बड़ के इंचटेप बिना रखले प्रसन्नता से मिलल उनुकर सहज स्वभाव रहल। हँ, ज्ञानवृद्ध के कवनो उमिर होखे, उनुका  समक्ष सहजता से सिर नवाने में, सड़को प पैर छूवे में परहेज ना करसु।

शैदाजी से हम कतना निकट रहलीं आ ऊ हमरा से कतना निकट रहलें, ई कहल कठिन बा। हम जब प्राइमरी में रहलीं, त ऊ हमार शिक्षक रहलें। ऊ जवना स्कूल के शिक्षक रहलें, ओही में हमार बाबुओ जी शिक्षक रहलें। ऊ जवना महल्ला के रहन, ओकरा से कुछुवे दूरी प हमरो महल्ला रहल। हमरा दरवाजा प हरसाल अनन्तव्रत के कथा बाबूजी बाँचत रहन आ शैदोजी श्रोता लोगन के मण्डली के सदस्य रहसु। कबो बाबूजी के कहत सुनलीं, ‘रउरा हतना दूर काहें आ जाईंला, रउरा नगिचे त कथा होले’। त ऊ तुरते कहलें, ‘जब कौण्डिन्य मुनि अनन्त भगवान के खोजे कहाँ-कहाँ चल गइलें त हम कतना दूर आइल बानी’? फेरु त दूनो जाना के चेहरा भोर का फूल हो गइल।

हमार कवि कब जागल, ई विषय नइखे, बाकिर जब जागल त शुद्धिकरण खातिर गुरु तलाशे लागल। शैदाजी अवकाशप्राप्त हो चुकल रहन। सुनले रहीं जे सुबह उनुकर बइठकी सुग्रीव सिंह जी के इहाँ रहेला, जे डुमराँव राज के मैनेजर रहन आ मैनेजर साहब के नाँवे से विख्यात रहन। अपना शहर में उनुकर सबसे अधिक सम्मान रहल। शाम के सम्भवतः द्वारका प्रसाद के दुकान प उनुकर बइठकी रहे। कवि-सम्मेलन, गोष्ठी भा कवनो सभा-सोसाइटी में ना जाये के रहे त दिनभर घरही रहसु। हमरा घर से उनुकर घर मात्र पाँच से सात मिनट पैदल दूर रहल। बस, जवन लिखीं, लेके पहुँच जाईं। बैठिके बिस्कुट खाईं, चाय पीहीं, आपन कविता सुनाईं आ उनुकर कविता सुनीं। हमार कवि के तराश हो जाउ त घरे आ जाईं।

ऊ पान खाये के बड़ शौकीन रहलें। हमरो घरे पानसंस्कृति रहल। पनबट्टा पासे राखसु। गइला प पान खुदे लगाके खियावसु आ अपनहूँ खासु। कबो बाजार में बाबूजी उनुका मिल गइलें त बताइयो देसु जे मार्कण्डेय अइसन कविता लिखले बाड़ें। बाबूजी पूछियो बइठसु त उनुको के सुनावे के परे।

शैदाजी के कदकाठी मध्यम रहल। शरीर भरल-पूरल। गोल-मटोल। रंग साँवर। मुखमण्डल गोल के साथे तजोदीप्त। साफ-साफ धोती-कुर्ता आ दूनों कान्हें लटकल गमछा। कान्हि ले लटकल बड़-बड़ बाल। लिलार प गोपी चन्दन आ रोरी के टीका। मुँह में पान। बाईं कलाई में घड़ी आ दायाँ हाथ में नक्काशीदार छड़ी। हमरा आँखिन में उनुकर ईहे सजीव सूरत आजुओ बिया। सड़क प मन्थर चाल में जब चलसु त लागे जे वाकई कवनो सरस्वतीपुत्र कहूँ से निकल पड़ल बा। लोगन के दृष्टि से सम्मान छलकत रहल। हम उनुकर शिकायत केहू मुँहे कबो ना सुनलीं। हाँ, कविद्वन्द्व जरूर सुनले रहीं। इयाद त नइखे जे कवन कवि  ‘शैदा के मैदा बनाके कूटिके पीसिके चालिके चूलिके….’ जइसन कविता बनाके उनुका के सुनइले रहन त ऊ ‘खुदा ने कान काटा है, रसूला नाक काटेगा’ कहि सुनइलें। ‘सखि मोर मरदा, बड़ बकलोल रे। ओकरा बजरिया तकरियो ना मिले, सेतिहे के ले आवे रोजे ऊ ओल रे’। ई पंक्तियो कवनो कविये खातिर प्रत्युत्तर में कह गइल रहे। ऊ त अइसन कवि रहन जे राहचलते कविता बना लेसु आ सड़को से कवनो कागज उठाके झट लिख मारसु।

डुमराँव के साहित्यिक इतिहास के एगो भाग अवश्य शैदायुग कहाई। उनुकर समकालीन कवियन में सत्यनारायण ‘सौरभ’, हरिहर प्रसाद ‘बेकार भोजपुरी’, शिवशंकर प्रसाद जायसवाल ‘मौजी’, कालूराम अखिलेश आ जवाहरलाल श्रीवास्तव प्रमुख रहन। उनुकर परवर्ती समकालीन कवियन में किशोर डुमराईं, मुफलिस रमेश, अम्बिकादत्त त्रिपाठी ‘व्यास’, वासुदेव प्रसाद शायर और लल्लूलाल केशरी के नाम विशेष तौर से लीहल जा सकेला। परन्तु शैदाजी के जवन लोकख्याति मिलल, ऊ अउर लोग खातिर दुर्लभे रहल। ऊ बिहार आ बिहार से बाहरो अपना कवित्व के ध्वज फहरावत रहन। ऊ राष्ट्रीय स्तर प रहन। उनुकर गायनकला आ काव्यसौष्ठव से सभे निहाल होते रहे। उनुकर हास्य-व्यंग सभे के गुदगुदावे, काँट चुभावे आ चिंउटी काटत रहे। ऊ मंचीय कवि-महारथियन के पहिल पंक्ति में सुशोभित होत रहन आ कवि-सम्मेलनन के गौरवान्वित करत रहन।

शैदाजी के जन्म बिहार के डुमराँव में रवानी (कमकर) परिवार के रामटहल राम के सुपुत्र के रूप में 24 जनवरी, वर्ष 1911 के भइल रहे। शिक्षा मिडिले तक हो पावल। पारिवारिक जिम्मेदारी के कारण ऊ डुमराँवे के ‘शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालय’ के परिसर में स्थित ‘अभ्यासार्थ मध्य विद्यालय’,जेकरा के ‘प्राक्टिसिंग स्कूलो’ कहल जात रहे, ओही में  बतौर शिक्षक नियुक्त रहलें। ऊ आगे चलिके प्रवेशिको (मैट्रिक) पास कइलें।

शास्त्रकार लोग के शब्दन में शैदाजी के बुद्धिमान कहल जाउ भा आहार्यबुद्धि?; हमरा समझ में दूनों के योग कहल जाई। ऊ अवश्य पूर्वजन्म के संस्कार से बुद्धिमान रहलें। एही से भोजपुरी के पहिला व्याकरण लिखेवाला पुण्यश्लोक पं. रासिहारी राय शर्मा इनिका के जन्मजात कवि कहले बाड़ें (‘श्रीदुर्गा-महिषासुर संग्राम’ के अनुशांत्मक ‘दू शब्द’ में)। परन्तु जइसे दत्तात्रेय के अनेक गुरु रहन, ओसहिये ऊहो गुणग्राही रहन। एही के बदौलत ऊ भोजपुरी, हिन्दी, ब्रजभाषा, उर्दू आ अँगरेजियो में आपनि काव्यप्रतिभा से सभके चमत्कृत करत रहन। उनुकर लाइब्रेरी में हमरा कवनो खास किताबि ना लउकली सँ आ हमरा पता नइखे जे ओह घरी उनुका कवनो आचार्य से सत्संग होत रहे। एहसे स्पष्ट बा जे ऊ जन्मजात कवि रहन। मुहावरा-कहावत से भरपूर चुटीला अंदाज में उनुकर प्रस्तुति साधारणीकरणे रहे।  भोजपुरी साहित्यकारन के बीच प्रयोगधर्मी के रूप में खूब यश पावत रहन। उनुकर नाँव के सोहरत दूर-दूर ले रहल। ऊ अपना समय में त अपना कवितन, गीतन से लोगन के जीभ प बइठले रहन, आजुओ उनुकर कुछ ना कुछ पंक्तियन के लोग बोल-गाके निहाल हो उठेलें। साँच मानल जाउ त ऊ जनता के कवि रहन। शृंगार रस उनुकर अंगी रस रहल, बाकिर व्यंग्य खातिर ऊ कम ख्यात ना रहन। शेष रस घलुवे में कहल जा सकेलें।

शैदाजी नारीहृदय रहन। भोजपुरी नारीगीतन प उनुकर बड़ पकड़ रहल। स्त्रियन के हाव-भाव भा सुख-दुःख, विरह-मिलन, काम-काजे के ऊ मुख्य वर्ण्य विषय रखलें- ‘खटाई बिना कोंहड़ा कइसे बनीं’! ‘फगुआ सखी, निगिचाइल हो, पिया घर ना अइलें’-जइसन  ऊ नारी के पीर त गइबे कइलें समाज-सुधार खातिर व्यंग्यबाणो / गभिया चलावे में कोताही ना कइलें- ‘बहनोइया अपना सरवा के सोरहो आना साला हो गइल। हमरो देस बंगाला हो गइल’।। अन्ततः रामकथा प आधारित ‘रावण-अंगद संवाद’ के रूप में रामगुनो गइलें। जइसे महाराज भर्तृहरि शृंगार, नीति आ वैराग्य के कवि रहन, लगभग ओसही ऊ शृंगार, नीति (व्यंग्य) आ भक्ति के कवि रहन। भोजपुरी के यशस्वी साहित्यकार हवलदारपति त्रिपाठी ‘सहृदय’ जी के ई कथन उनुकर कवित्व प पकिया मोहर बा- ‘अइसे त शैदाजी के हास्य-व्यंग्य कवितन के कवि-सम्मेलन के श्रोता-मंडली खूब सराहना करत आइल बा, बाकिर इहाँ के सिंगार आ बीर रस के कवितो से भोजपुरी साहित्य के कम रसगर नइखीं बनवले। ‘शैदा’ के गाभी निसाना प बड़ा गहरा चोट करेली स’।

प्रसाद गुण के कवि शैदाजी शब्दशिल्प आ भावसौन्दर्य के सिद्धहस्तन में से एक रहन। पद्मश्री शारदा सिन्हा, जोगीन्दर सिंह अलबेला आ निधि दुबे के द्वारा गावल जायेवाला उनुकर प्रसिद्ध गीत ‘बताव चाँद केकरा से कहाँ मिले जाल’ भावुकन के हृदय में उतर जाला नु!  अब लोकगायिका चन्दन तिवारी उनुकर कजरी गीत के स्वर देके जन-जन तक पहुँचावे के काम करताड़ी। दुःखद-सुखद बात ई बिया जे शारदाजी ‘शैदो के आपन बनाल सँघतिया’ के जगह ‘हमरा के अप्पन बना ल सँघतिया’ गावताड़ी। अलबेला आ निधि दुबे के भी ईहे हाल बा, बाकिर चन्दन तिवारी उनुकर नाँव नइखी हटइले। ऊ ओसहीं गावताड़ी,जइसे शैदाजी लिखले बाड़ें –

‘जब से आइल सवतिया मोर, सुखवा लेलस हमसे छोर,

झरे अखियाँ से लोर, नइया मोर परल बा ‘शैदा’ माहाधार में

सावन के बहार में ना’।।

शैदाजी के ‘चाँद’ नामक कविता ‘चितचोर’ के पृष्ठसंख्या 6 में संगृहीत बा। एह पुस्तक के प्रकाशनकाल फरवरी 1953 लिखल बा। ऊ कब से लिखे शुरू कइलें, ई कहल कठिन बा, बाकिर अपना निधनकाल 2 दिसंबर 1985 से लगभग छव महीना पहिले तक लिखते रहन। छव महीना पहिले एहसे जे ऊ ओकरा बाद अस्वस्थे होत गइलें। खटिया पकड़ लेलें। स्मृति मन्द प मन्द होत गइल। पचहत्तरवाँ साल पूरा करे में कुछुवे बचल रहे कि स्वर्ग सिधार गइलें।

उनुकर प्रकाशित प्रमुख कृतियन में- 1.गीतमंजरी (हिन्दी, उर्दू, भोजपुरी में, प्रकाशनकाल-1950 ई)., 2.चितचोर (भोजपुरी गीतसंग्रह, 1953 में), 3.जागरण (ब्रजभाषा, हिन्दी, उर्दू, भोजपुरी, 1955 में), 4.आपन देस आपन गीत (भोजपुरी, 1964 में), 5.डुमरेजिन चलीसा (1973 में), 6.श्रीदुर्गा-महिषासुर संग्राम(भोजपुरी प्रबन्ध,1977 में) आ 7.रावन-अंगद संवाद (भोजपुरी प्रबन्ध-1982 में), आ 8.शैदा व्यंग्य बावनी (…)। एकरा अतिरिक्त अप्रकाशितन में डुमराँव के झाँकी (डुमराँव के बिरासत प आधारित काव्य), जय बंगलादेश (नाटक) के साथ-साथ अउरो कतने फुटुकर कविता रहीं सँ। पता ना, उनुकर पाण्डुलिपि कहाँ बाड़ी सँ।

उनुका के अनेक साहित्यिक संस्था  सम्मानित कइलीं सँ आ उनुका के सम्मानित क के स्वयं सम्मानित भइली सँ। मुजफ्फरपुर विश्वविद्यालयो उनुका समये में ‘करे के ना चाहीं’ कविता के पाठ्यक्रम में स्थान देलस। उनुका के सम्भवतः 14 संस्थानन से सम्मान मिलल रहे, जवना में पटना में 4 फरवरी, 1979 के भोजपुरी अकादमी, पटना द्वारा तत्कालीन राज्यपाल के करकमल से दीहल ताम्र-पत्र विशेष मान राखता। आजु ऊ एह दुनिया में नइखन, बाकिर ऊ आजुओ अपना कृतित्व से बाड़ें आ काल्हुओ रहिहें। उनुकर सारस्वत अवदान उनुका के बिसरले बिसरे ना दी।

शैदाजी के स्मरणीय काव्य-पंक्ति

1.पतरा तू देख पतरातू न जा।

2.शहर की सफाई से का वास्ता है,

जिधर देखिए हँस रहा रास्ता है

शहर के किनारे पड़ा है जो राशन

उसे घर में लाएँ लिये जाएँ बासन,

ये मिस्लेमलाई मुफ्त का नास्ता है।

शहर की सफाई से क्या वास्ता है।

 

3.ये नगारे का है घेरा या कि घेरा नाँद का

या कि चूतड़ है हमारे द्वारिका परसाद का।

 

5.शैदा पियेंगे चाय डुमराँव नजर आएगा मोगलसराय से।

 

6.बड़ सुख देला मोरा दुअरा के नीम रे

 

7.रहलीं करत दूध के कुल्ला, छिल के खात रहीं रसगुल्ला,

सखी,हम खुल्लम-खुल्ला, झूला झूलत रहीं बुनिया फुहार में,

सावन के बहार में ना।

 

8.हमरो देश बंगाला हो गइल,

बहनोइया अपना सरवा के सोरहो आना साला हो गइल।

हमरो देश बंगाला हो गइल।

 

9.गोसाईं जी फेरु आईं भारत में हमरा।

स्वागत में रउरा के चाह पियाइब,

दूध मलाई हम कहँवा से पाइब,

घर-घर पोसाइल बा कुकुरे नु झबरा।

गोसाईं जी, फेरु आईं भारत में हमरा।।

 

10.घर ही पढ़लें भइलें मास्टर,

घरही पढ़लें भइलें डाक्टर

सब गुनवा में गामा हउवें।

 

  1. घिवहा पंडित में गुन अनेक बा,

बुद्धि कम अधिका विवेक बा।

***


-चंद्र-विद्यार्थी-1280x1623.jpg

Hum BhojpuriaMarch 21, 20221min1720

प्रो. (डॉ.) जयकान्त सिंह  जय

आज जब एक-एक करके भोजपुरी सेवी साहित्य सर्जक पूरखन के इयाद कर रहल बानी तब ओह लरी के सबसे अनमोल कड़ी के रूप में ‘ विद्यार्थी जी ‘ के इयाद बरबस आ जाता। विद्यार्थी जी मतलब अविनाश चंद्र विद्यार्थी। सन् उनइस सौ सत्तासी-अठासी के आसपास भोजपुरी के सिद्ध गजलकार जगन्नाथ जी आ जय दुर्गा प्रेस, पटना के संस्थापक साहित्यकार नागेन्द्र जी के संयुक्त सम्पादन में ‘लोग प्रकाशन’ से सितंबर, १९७८ में छपल भोजपुरी का प्रतिनिधि गजलन के एगो उम्दा संग्रह पढ़े के मिलल रहे। ओह गजल संग्रह में विद्यार्थी जी के दूगो गजल छपल रहे। पहिल गजल के एक-एक शेर हम आजुओ आ अबहिंयों गुनगुना रहल बानी –

‘काँटो का संगे नेह निभवलीं हां आजु ले

नाता ना जोरे फूल से पवलीं हां आजु ले

ताकीं कहाँ ले आगे मिरिगा के भइल हाल

पानी का भके रेत पर धवलीं हां आजु ले ‘

आज भोजपुरी में ढ़ेर गजलगो हो गइल बारन। बाकिर उनका गजलन में भोजपुरी भासा आ भाव का जगे उर्दू के सब्द आ मध्यकालीन समाज के जमीन ज्यादे नजर आवेला। उहँवे विद्यार्थी जी के एक सौ बीस गजलन के संग्रह ‘ पतिआत ना केहू ‘ का गजलन के पढ़ला पर भोजपुरी भासा, समाज आ संस्कृति के साक्षात् दरसन हो जाला। उनका गजल लिखे के लकम लागल जगन्नाथ जी का संसर्ग से।  ऊ आपन ई गजल संग्रह उनके के समर्पित कइले बारन।

अइसहीं सन् उनइस सौ छियासी में भोजपुरी स्नातक के विद्यार्थी के रूप में ‘बिहार विश्वविद्यालय भोजपुरी पद्य संग्रह’ में विद्यार्थी जी के दूगो काव्य रचना ‘ अबहीं त बहुत कहे के बा ‘ आ ‘बिनु गीत के’  पढ़े के मिलल। ओही दरम्यान ओह पद्य संग्रह आ कुछ जेठ साहित्यकार लोग से उनका व्यक्तित्व आ कृतित्व के बारे में जाने के अवसर मिलल। जवना के अनुसार उनकर जनम ०४ जनवरी, १९२६ ई. के शाहाबाद के शाहपुर पट्टी में बाबूजी बबन लाल आ माई धीरजा देवी के परिवार में भइल रहे। जनम देला के कुछे देर के बाद माई सरग सिधार गइली आ उनकर फुआ बिरिज कुमारी देवी उनका के पाल-पोसके माई के कमी महसूस ना होखे देली। ऊ अपना फुए के ईआ कहत रहलें। विद्यार्थी जी अपना आराध्य राम भक्त हनुमान जी के नायक बनाके रचल महाकाव्य ‘ सेवकायन ‘ के ओही फुआ भा ईआ स्व. बिरिज कुमारी देवी के समर्पित कइले बारन। जवन फरवरी, १९८४ में भोजपुरी अकादमी, पटना से छपके काफी जस बिटोरलस।

ई ‘सेवकायन’ महाकाव्य हमरा भोजपुरी एम. ए. का सत्र १९९१-९३ का पाठ्यक्रम में लागल रहे। जवना के हम अपना गुरुदेव आ विद्यार्थी जी के परम शिष्य स्व. डॉ. जितराम पाठक जी से उनका हरि जी के हाता अवस्थित आवास पर जा जाके पढ़ले रहनीं।

पाठक जी विद्यार्थी जी मास्टर साहेब कहत बतवले रहीं जे मास्टर साहेब अपना साहित्य में भोजपुरी के निसोख-निरइठ सब्दन के मोती जरिले। विद्यार्थी जी का भाव-विचार आ विषय-विनोद के अनुकुल-अनुरूप सब्द-संजोजन-कला पर लट्टू रही पाठक जी।

पाठक जी के अनुसार ‘विद्यार्थी जी सन् १९४३ में शाहपुर हाई स्कूल से मैट्रिक के परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास कके इंटरमीडिएट खातिर जैन कालेज, आरा में नाम लिखवले रहस आ सन् १९४५ में प्रथम श्रेणी से इंटर के परीक्षा कइले रहस। उनका इंटर पास करते हरिनारायण हाई इंग्लिश स्कूल, शाहपुर पट्टी का सचिव के बुलावा आइल आ ऊ सचिव के इच्छा के सम्मान करत उनका स्कूल में १४ मार्च, १९४५ के भूगोल आ अंगरेजी शिक्षक के रूप में जोगदान कर लिहलें। ओह घरी उहाँ के हेड मास्टर रहलें जानल-मानल शिक्षा शास्त्री आ साहित्यकार सत्यनारायण लाल।’

जब शाहपुर पट्टी हाई स्कूल में विद्यार्थी जी शिक्षक के रूप में बहाल भइलें ओह घरी पाठक जी उहाँ एगारहवां के छात्र रहस। मतलब विद्यार्थी जी पाठक जी से दू-तीने साल जेठ रहल होइहन। जब १९४७ में पाठक जी प्रथम श्रेणी से मैट्रिक पास कइलन त विद्यार्थी जी समय-परिस्थिति के खेयाल करत उपयोगितावादी नजरिया के मोताबिक उनका के राय देलें कि अइसे त तोहार हिन्दी आ सामाजिक विग्यान बहुते मजबूत बा अउर हिन्दी में कवितो-कहानी नीमन लिख लेवे ल, बाकिर जल्दी नोकरी पावे खातिर तोहरा साइंस चाहे कामर्स पढ़े के पड़ी। आ पाठक जी जैन कालेज आरा से इंटर करे खातिर कामर्स विषय ले लिहलें। काहेकि ओह घरी जैन कालेज में विग्यान के पढ़ाई ना होत रहे।

आगे सन् १९५२-५३ तक शाहपुर पट्टी हाई स्कूल में पढ़वला के बाद सरकारी पेंशन के लाभ देखके विद्यार्थी जी पटना सचिवालय के निम्न वर्गीय सहायक के परीक्षा पास करके उहँवें बहाल हो गइनी। एही बीच सन् १९५४ में पटना के एगो मोटर दुर्घटना में उहाँ के पांव के ठेंघुना क्षतिग्रस्त हो गइल आ उहां का पांच-छव साल ले इलाज करावत पटना से बाहर ना निकलनीं। कइसहूं सचिवालय में आ-जा के आपन ड्यूटी करीं। ओह घरी मैथिल लोग के ‘ मैथिली परिषद ‘ पटना में बहुत सक्रिय रहे। जवना से प्रेरित-प्रभावित होके आचार्य शिवपूजन सहाय के सलाह पर पाण्डेय नर्मदेश्वर साहेब आदि सन् १९५९ में ‘ भोजपुरी परिवार ‘ नाम के एगो भोजपुरी सेवी संस्था बनवलें। विद्यार्थी जी ओकर संजोजक बनावल गइलें आ सन् १९६० से एह ‘भोजपुरी परिवार ‘ से ‘ अँजोर ‘ पत्रिका निकाले के भइल त उनका के ओकर सहायक संपादक बनावल गइल। फेर ‘अँजोर’ आ ‘योगी’ पत्रिका में उनकर भोजपुरी रचना छपे लागल।

एकरा बाद त विद्यार्थी जी सन् १९९४-१९९५ तक भोजपुरी के खूब सेवा कइलें। जवना के साक्षात् प्रमाण बा उनकर डेढ़ दर्जन से ऊपर छपल स्तरीय साहित्यिक पुस्तक; जइसे- जय बंगला ( लघु काव्य ), सुदिन ( प्रगतिशील गीत संग्रह ), पँखुरी भइल हजार ( बरवै संग्रह ), लीला ई श्री राम-स्याम के ( गीत रूपक ), भोजपुरी भूँई (कविता संग्रह), अनसाइल राग ( कविता संग्रह ), पतिआत ना केहू ( गजल संग्रह ), गाँव बारहो मास में ( गीत संग्रह ), कौशिकायन ( प्रबंध काव्य ), सेवकायन ( प्रबंध काव्य ), बेटा के नइहर ( ललित निबंध ), घर के गूर ( निबंध संग्रह ), डागा बाज गइल ( कहानी संग्रह ), गइल घर ( उपन्यास ) आदि।

विद्यार्थी जी से आमने-सामने होके सुने आ सुनावे के पूरहर मोका अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के मुबारकपुर अधिवेशन में मिलल। उहाँ का खूब खुल के मिलनीं-बतिअवनीं आ अपना भोजपुरी सेवा पर खुल के बात रखनीं। उहां के अनुसार उनका ऊपर भिखारी ठाकुर, रघुवंश नारायण सिंह, शिवपूजन सहाय, नर्मदेश्वर सहाय, त्रिलोचन शास्त्री, जगन्नाथ, डॉ. अनिल कुमार आंजनेय, प्रोफेसर ब्रजकिशोर आदि साहित्यकार लोग के बहुत प्रभाव पड़ल रहे। उहां के साहित्य के जवन विधा जेकरा से सिखनीं भा प्रभावित हो के लिखनीं ओह विधा के संग्रह ओही व्यक्तित्व के समर्पित कइनीं; जइसे- भोजपुरी गजल संग्रह ‘ पतिआत ना केहू ‘ जगन्नाथ जी के, बरवै संग्रह ‘ पँखुरी भइल हजार ‘ त्रिलोचन शास्त्री के, कविता संग्रह  ‘भोजपुरी भूँइ ‘ रघुवंश नारायण सिंह के,  निबंध संग्रह ‘ घर के गूर ‘ डॉ. अनिल कुमार आंजनेय के, कहानी संग्रह ‘ डागा बाज गइल ‘ प्रो. ब्रजकिशोर के आदि आदि।

‌    विद्यार्थी जी के अनुसार उहां का बचपने से भारी नचदेखवा रहीं। जवार में कहीं भी भिखारी ठाकुर के नाच आवे त उहां का चोरा-छुपाके जरूर देखे जाईं। ओह घरी बड़ घर का लरिका-फरिका के नाच-नवटंकी देखे के मनाही रहे। काहे कि भिखारी ठाकुर आ आउर-आउर नाच मंडली वालन का नाच-पाठ में जगह-जगह पर बेपर्दा के अश्लील संवाद आ बात होखत रहे जवन छोट छोट लरिकन पर खराब प्रभाव डाल सकत रहे। बाकिर विद्यार्थी जी मानस ना। चोरा-छुपा देखबे करस। धीरे-धीरे उनका भिखारी ठाकुर से हेल-मेल हो गइल। हेले-मेल ना भइल ऊ भिखारी ठाकुर आ उनका पाठ-नाटक के विशेषज्ञ जानकार हो गइलन। अइसन मानल जाला कि भिखारी ठाकुर के सही जानकार दूइए लोग रहे- एगो महेश्वर प्रसाद मतलब महेश्वराचार्य आ दोसर अविनाश चंद्र विद्यार्थी। एकर सबूत बा उनका संपादन में प्रकाशित भिखारी ठाकुर ग्रंथावली।

‌विद्यार्थी जी अपना गीत-गजलन आ कवितन तत्कालीन सामाजिक आ राजनीतिक विद्रूपतन आ विसंगतियों पर चोट करे से भी परहेज नइखीं कइले। उनका गीत के एगो कड़ी एकर नमूना बा –

हमरा आम के बगइचवा में उगि रहल बबूर।

  किन के कलम मँगवलीं,

पाँति नापी के लगवलीं,

        राते दिन अगोरीं केतने

        सांढ़ भइंसवा भगवलीं,

    देवता डारी देले डेरा, डाढ़ पर चढ़ल लंगूर।।

बाकिर नरियर जइसन ऊपर से कठोर आ भीतर कोमल हृदय के विद्यार्थी जी घोर आशावादी साहित्यकार रहीं। उहें के दू पाँति कहके बानी के बिराम देब-

 ‘ हमरा बा भरोस रतिया ई पराई मितवा।

  तनिका देर भा सबेर दिनवा आई मितवा।।

 


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Hum BhojpuriaMarch 21, 20221min1600

आर.के. सिन्हा

लता मंगेशकर के शरीर पूरा हो गइल। सरस्वती पूजा के अगिला दिन विदा होत लता मंगेशकर के देख के लागल जइसे मां सरस्वती अबकी बार अपना सबसे प्रिय पुत्री के ले जाये हीं स्वयं आइल रहली। लता मंगेशकर के हमनीं के बीच ना रहला के मतलब बा कि वाग्देवी के एगो वरद लौ बुझ गइल बा। लता जी अपना निर्दोष सुर से भारतीय संगीत वांग्मय के समृद्ध बनवली। उ हमनी के भाव कातर, अहिंसक, रचनात्मक अउर आशावान बनावे में मदद कइली। उनकर साधना आत्म यज्ञ के तरह रहे।

सुरकोकिला लता मंगेशकर किम्वदंती के पर्याय बन चुकल बाड़ी। उनका गीतन के कद्रदान दुनिया भर में मौजूद बा। जेतना लोकप्रिय उ अपना देश भारत में रहली, ओतने लोकप्रियता उनका सरहदी मुल्क पाकिस्तान में भी मिलल। उनकर आवाज़ अउर गायकी के खुबसूरती बा कि पर्दा पर कमसिन नायिका लोग के शोखी, चंचलता, अल्हड़पन व रूठे-मनावे के अभिव्यक्त करे में जेतना जीवंतता महसूस कइल जाला, ओतने हीं भावप्रवणता मां-बहिन पर फिल्मावल गाना में देखे के भी मिलेला।

27 जनवरी, 1963 के दिल्ली में लता मंगेशकर नेशनल स्टेडियम में जब आपन अमर गीत गवली त हजारन लोग रोवत रहे। उहवाँ चीन के साथ भइल जंग में शहीद भइल जवानन के इयाद में एगो कार्यक्रम आयोजित कइल जात रहे। ओ जंग के परिणाम के कारण देश हताश रहे। लता मंगेशकर जइसहीं ‘ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी…”  गवली त उहाँ उपस्थित अपार जन समूह के साथ-साथ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के आंख भी नम हो गइल रहे

ख़ालिस हिन्दी गीत के तौर पर ज्योति कलश छलके जइसन कालजयी प्रस्तुति बा त ऐ मालिक तेरे बंदे हम जइसन गीत निराशा के क्षणो में गहन अंधकार से निकले के रौशनी देला। गांधीवादी जीवन दर्शन के प्रभाव ये प्रस्तुति में झलकेला। ई गीत चेतना के स्पंदित कर आश्वस्ति के भाव जगावेला। अध्यात्म के स्तर पर परंपरागत जीवन मूल्य-बोध के असर के बावजूद आशावाद के ज़िंदा राखे के पाठ ह। अइसन स्वच्छ निर्मल मन के व्यक्तित्व दुर्लभ होला जइसे लता जी रहली। संस्कृत के श्लोकन के गायन होखे चाहे रामचरितमानस के गायन होखे चाहे उर्दू के गजल होखे, चाहे बांगला के कवनों गीत होखे, उ एक समान सहजता से सुमधुर स्वर में गाके श्रोतागण के कुछ क्षण में ओही स्वप्नलोक में पहुंचा देत रहली। उ अपना स्वर के साथे हमेशा हमनीं के पास अमर रहियें, समय कवनों भी आवे। उनकर स्वर कबो ना लडखड़ाइल, उनके आवाज में उहे ताजगी रहल जवन कवनों बच्चा के आवाज में होला. उ शुद्ध चरित्र अउर निर्मल मन के स्वामिनी रहली। उनकर प्रशंसा आ श्रद्धांजलि में शब्द नइखे मिलत। मृत्यु हमेशा शोक के विषय ना होला। मृत्यु जीवन के पूर्णता ह। लता जी के जीवन जेतना सुन्दर रहल, उनकर मृत्यु भी ओतने हीं सुन्दर भइल। उनके जइसन सुन्दर अउर धार्मिक जीवन विरले के हीं प्राप्त होला। लगभग पांच पीढ़ी उनका के मंत्रमुग्ध हो सुनले बा आ हृदय से सम्मान देले बा।

 

उनकर पिता जी जब अपना अंतिम समय में घर के बागडोर उनके हाँथ में थमवले, तब उ तेरह वर्ष के नन्ही जान के कंधे पर छोट-छोट चार बहन-भाई के पालन के जिम्मेवारी रहे। लता जी आपन समस्त जीवन ओ चारू के समर्पित कर देहली। आ अब जब उ गइली ह त उनकर परिवार भारत के सबसे सम्मानित प्रतिष्ठित परिवार में से एक बा। कवनों भी व्यक्ति के जीवन एसे अधिक सफल का होई? लता मंगेशकर के पवित्र शख्सियत के हीं परिणाम रहे कि आजाद भारत के सभ राष्ट्रपति अउर प्रधानमंत्री उनका से आदरभाव से मिलत रहे। उनकर कद देश के कवनों भी नागरिक से बड़ा रहे। देश के पहिला राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से लेके मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अउर पहिला प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु से लेके नरेन्द्र मोदी से उनकर निजी संबंध रहे। उ जब राज्यसभा सदस्य रहली तब हीं उनके भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजल गइल रहे। ई बात साल 2001 के ह। उनका पद्म भूषण 1969 में, पद्म विभूषण 1999 में आ दादा साहेब फाल्के पुरस्कार 1989 में मिल गइल रहे। जाहिर बा, उ ये सब पुरस्कार के लेवे खातिर भी राजधानी आवत रहली। लता मंगेशकर 1983 में राजधानी के इंद्रप्रस्थ स्टेडियम में आपन पसंदीदा गीत सुना के दिल्ली के कृतज्ञ  कइले रहली। ओ कार्यक्रम के आयोजन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) कइले रहे ताकि कपिल देव के नेतृत्व में वर्ल्ड कप क्रिकेट चैंपियन बनल भारतीय टीम के खिलाड़ी सबके पुरस्कृत कइल जा सके। लता जी इहाँ कार्यक्रम पेश कइला के बदला में एक पइसा भी ना लिहली। ओ कार्यक्रम में उ रहें ना रहें हम महका करेंगे… – ऐ मालिक तेरे बंदे हम… अजीब दास्तां है ये… मेरी आवाज ही पहचान है… आज फिर जीने की तमन्ना है… जइसन आपन अमर गीत सुनवले रहली। येही बीच जब से उनकर राज्यसभा के कार्यकाल 2005 में समाप्त भइल त फिर उ संभवत: एने ना अइली। केतना अद्भुत संयोग बा कि अपना लगभग सत्तर बरिस के गायन कैरियर में लगभग 36 भाषा में हर रस/भाव के 50 हजार से भी अधिक गीत गावे वाली लता जी अपना पहिला आ अंतिम हिन्दी फिल्मी गीत के रूप में भगवान के भजन हीं गवले बाड़ी। ‘ज्योति कलश छलके’ से ‘दाता सुन ले’ तक के यात्रा के सौंदर्य इहे बा कि लताजी ना कबो अपना कर्तव्य से डिगली ना अपना धर्म से! ये महान यात्रा के पूर्ण भइला पर हमनीं के रोम रोम रउआ के प्रणाम कर रहल बा लता जी। हमनीं जेतना चाहीं ये बात पर गर्व कर सकेनीं कि हमनीं अपना जीवनकाल में लता मंगेशकर के देखले सुनले बानीं।

 

( लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


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Hum BhojpuriaMarch 21, 20221min2200

अगर अन्हरिया से अँजोरिया के तरफ बढ़े के बा त आपन धरती आ आकाश बढ़ावे के पड़ी। आपन सुरुज खुद उगावे के पड़ी। तबे भीतर अँजोर होई। राउर आपन औरा (आभा) बनी। मन खुश रही। जीवन मजबूती से जीयब आ बोध के क्षमता बढ़ी।

हम बुद्धि के बात नइखीं करत, बोध के बात करत बानी। बुद्धि त युद्ध करा रहल बा। यूक्रेन आ रसिया में उठल बवाल से त पूरा दुनिया में भूचाल आइल बा। मानवता तबाह बा। मानव जवना अदभुत गिफ्ट या वरदान ‘’ बुद्धि’’ के चलते प्राणियन में सर्वश्रेष्ठ बा, उहे बुद्धि ओकरा के उलझवले बा। बुद्धि आदमी के बालनोचवा बना देले बा। सभे आपन बाल नोचत बा। सुख आ आनंद देवे में समर्थ बुद्धि दुख, डर, पीड़ा आ दहशत दे रहल बा।

दरअसल बुद्धि ई त बता देले कि दिल का ह, कहाँ बा, कइसे काम करेला बाकिर दिल में का बा, ई बुद्धि ना बता पावेले। ई बोध से पता चलेला। एहसास से पता चलेला। ओकरा खातिर अपना मन के धरती आ विश्वास के आकाश के बढ़ावे के पड़ी। कई गो सरहद के तूरे के पड़ी। देश, जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा, लिंग आदि के सरहद। इहाँ तक कि अपना देह के सरहद भी तूरे के पड़ी आ अध्यात्म के एह गूढ़ रहस्य के समझे के पड़ी कि हम ना त देह हईं ना मन…. हमरा विस्तार के कवनो सीमा नइखे। एह से हमरा के सीमा आ सरहद में नइखे बान्हल जा सकत।

दरअसल समझ के तीन गो स्तर बा- बुद्धि, बुद्धू आ बुद्ध। बुद्धि के हालत त रउरा देखते बानी। दिया जरा के अँजोर करे के जगह लुकार भाँज के घर जरा रहल बा। दोसरो के आ अपनो। आपन बुद्धि अपने खिलाफ बा।

त परेशान लोग थोड़े देर खातिर बुद्धू बने के कोशिश करता। दारू, अफीम, गाँजा पीके  भा सेक्सुआलिटी में जाके भा ड्रग्स के इस्तेमाल करके थोड़े देर खातिर अपना नर्वस सिस्टम के, अपना तंत्रिका तंत्र के डाइवर्ट करता भा ओकरा एक्टिविटी के कम करता। हउ गनवा नइखीं सुनले, ‘’ मुझे पीने का शौक नहीं, पीता हूँ गम भुलाने को ‘’। त इहे हाल बा।

जानवर के पास बुद्धि नइखे। एह से ओकरा टेन्शनो नइखे। ओकर संघर्ष खाली प्रजनन आ भोजन भर बा। ओकरा ना त घर आ गाड़ी के ई. एम. आई. देवे के बा, ना यूक्रेन, पाकिस्तान से लड़े के बा। लड़ाई अंतिम समाधान नइखे। रहित त सम्राट अशोक बौद्ध धर्म के प्रचारक अशोक ना बनितन। हर युग में युद्ध भइल बा बाकिर अंततः प्रेम के प्रकट होखहीं के पड़ल बा।

अभी महामारी (कोरोना) खतमों ना भइल कि युद्ध शुरू हो गइल। अभी त प्रकृति के करीब जाये, आपन जीवन शैली सुधारे, अपना के सजावे-सँवारे आ वृहत्तर अर्थ में मानवता के बचावे के कोशिश होखे के चाहीं। .. बाकिर हमनी के बारूद के ढेर पर बइठ गइनी जा। त ई बुद्धि हमनी के असंवेदनशील बनवले बा कि जागरूक?

कोरोना में लाश प लाश गिरल ह। अब युद्ध में गिरता। चीख-पुकार जारी बा। साँच पूछीं त टेंशन बुद्धि वाला के बा। बुद्धू आ बुद्ध के ना। काहे कि बुद्ध बनला पर राउर बुद्धि राउर दोस्त बन जाले। उ रउरा खिलाफ काम ना करे। उ परम आनंद आ परम शांति में ले जाले आ मन में करुणा भर देले, अहंकार के गला देले। .. ना त एह घरी आदमी के बुद्धि आ ओकरा भीतर बइठल अहंकार लाख रूपिया के प्रॉपर्टी खातिर करोड़ रूपिया के किडनी डैमेज करवा देता। देह-रूप-रस से बहकल शैतान मन अच्छा-अच्छा लोग के साम्राज्य मटियामेट क के जेल भेजवा देता। हम ई नइखीं कहत कि पइसा भा सेक्स जरूरी नइखे। अरे भाई पैसा ना रही त जियले मुश्किल हो जाई। सेक्स ना रही त सृजन भा यौवन सुख कइसे प्राप्त होई। ई त जरूरिए बा। एह में कहाँ कवनों दिक्कत बा। बाकिर ई जहां रहे के चाहीं, ओही जी रहे त ठीक बा। पइसा पॉकेट में रहे, सेक्स देह में रहे त समय आ जरूरत पर सुख दी, कामे आई बाकिर ई कपार पर चढ़ जाई त दुख दी, जेल भेजवाई।

त कपार में जवन रहे के चाहीं, उहे रहो .. कचड़ा ना। एकरे खातिर योग जरूरी बा। योगी बनल जरूरी बा। योग पूरा दुनिया में हर आदमी खातिर अनिवार्य शर्त होखे के चाहीं। तबे आदमी के भूमि तत्व आ आकाश तत्व सुधरी भा विकसित होई। तबे आदमी पंच तत्व के मरम बूझीं आ एकर श्रेष्ठतम उपयोग करी आ परिणाम दी। योगी ही विश्व के आ मानवता के बचा सकेलें। काश! विश्व के हर बच्चा योगी बने।

विश्व बंधुत्व के भावना के विकास के कामना के साथ ..

प्रणाम!

मनोज भावुक


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Hum BhojpuriaMarch 21, 20221min1700

सामग्री संकलनीय बा

‘भोजपुरी जंक्शन’ पत्रिका बहुत अच्छा निकल रहल बिआ। आरोही जी पर संस्मरण बहुत विस्तृत आ सटीक लागल। भोजपुरी साहित्यकारन के बारे में लिखल सामग्री संकलनीय बा। संपादक दल के बहुत-बहुत बधाई ।

अंकुश्री, पटना

सकारात्मक संपादन आ समाज-उन्मुख पत्रकारिता के ई निकहा उदाहरन बा

एह संपादकीय के कथ्य समस्या गिनावत खलसा हाहाकारी बवलवे नइखे मचावत, जवन आजुके पत्रकारन के एगो गोल के लत भ गइल बा, बलुक सोझ ठाढ़ समस्यवन के समाधनओ पर अपना रङे चरचा क रहल बा। सकारात्मक संपादन आ एही लगले समाज-उन्मुख पत्रकारिता के ई निकहा उदाहरन अस सोझा आइल बा। अंक के एकवटिये देख गइनीं। भोजपुरी-संसार ब्रजभूषण भइया के समहुत जोगदान के पीढ़ियन माथे लगाई। अंक के कथ्य आ कलेवर खातिर एक हाली फेर से बधाई।

सौरभ पांडेय, प्रयागराज

 

नया इतिहास गढ़त भोजपुरी जंक्शन

वाह!

डॉ. ब्रजभूषण मिश्र जी ‘भोजपुरी जंक्शन’ के यशस्वी सम्पादक मनोज भावुक जी सहित पत्रिका परिवार आ संकलन-प्रकाशन में सहयोग करे वाला अन्वेषी जन के हार्दिक बधाई।

बढ़त भोजपुरी

चढ़त भोजपुरी

रोजे नया इतिहास

गढ़त भोजपुरी

मनोज भावुक खातिर असीम मंगलकामना।

डॉ. जयकांत सिंह जय, मुजफ्फरपुर

 

जन उपयोगी पत्रिका बा

गजब! बहुत हीं असरदार संपादकीय बा। एक-एक पंक्ति प्रभावकारी बा। ‘’ जीहीं अइसे कि मुअला के बादो जीहीं ‘’ ..  बेहरतीन संपादकीय बा। बहुत-बहुत बधाई आ हार्दिक शुभकामना।

सम्पादकीय के साथ-साथ दिवंगत भोजपुरी साहित्य सेवी आ हिंदी अउर भोजपुरी सिनेमा पर राउर दृष्टिकोण बहुत हीं सरहानीय बा। ई वास्तव में जन उपयोगी पत्रिका बा।

बहुत बहुत शुभकामना आ बधाई।

अखिलेश्वर मिश्र, बेतिया

 

 

 

बहुते नीमन बाटे भोजपुरी जंक्शन के फंक्शन

भोजपुरी जंक्शन के फंक्शन,

बहुते नीमन बाटे।

ई जिनगी ह संभावना,

अटल कथन ई बाटे।

अमर हो गइल जे साहित्य में,

ओकर लिहनी नाम।

हे भावुक जी! बहुते सुन्दर,

बाटे राउर काम।।

माहिर विचित्र, देवरिया

 

बसंत के रूप लेले भोजपुरी जंक्शन

आरोही रंग में रंगल , गावे गहमरी गीत

गजब के संपादकीय, भोज भावुक के प्रीत

मास्टर साहब के स्मृति, भय भगवान आलेख

एक सौ एक पुरोधा के, संकलन वर्णातीत।

 

भोजपुरी जंक्शन सदा, लिए बसंत के रूप

नया-नया प्रतिमान से, बदले आपन स्वरूप

हम भोजपुरिया के आँगन, नया नया साहित्य

भरत चले भंडार रोज, हरसत मन देखी रूप।

 

समर्पण देखि भावुक के, भोजपुरी अगराय

मातृभाषा के प्रेमी बन, हृदय गाँव बसाय

भोजपुरी सुगंध फैलावत, चलत देस विदेस

देखी उनकर गुण के,  हमरो मन हरसाय।

कनक किशोर, राँची



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भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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