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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min5110

गजब के अंक बा जी ! कमहीं में ढेर, तनिके में भरपूर

गजब के अंक बा जी ! कमहीं में ढेर। तनिके में भरपूर। अबगे डाउनलोड कइनीं हँ।

सबले पहिले नजर परल हा सम्पादकीय प। जवना के कथ्य के मूल एह पंक्तियन में बा। ’’प्रेमे इलाज बा नफरत के। प्रेमे इलाज बा तनाव के। दिमाग के प्रेम के कटोरा बना लीं। सब ठीक हो जाई’’। आजु सउँसे संसार में जइसन माहौल बनल बा, लगातारे बनत जा रहल बा, एह बिचार के हर जगहा के समाज में पगावल पहिल काम होखे के चाहीं। भोजपुरिया समाज के लेके तनिका अउरी सचेत भइल जरूरी बा। भोजपुरिया समाज के जमाव जुड़ाव लगाव के अंतर्बहाव हरमेसे ’सादा जीवन, उच्च बिचार’ रहल बा जवना के सोर अध्यात्म से रस पावेला। आध्यात्मिक समाज के मनइयन के मन में जवना ढंग से नफरत आ क्रोध परसत जा रहल बा, एकर मतलब जानल-बूझल अब निकहा जरूरी भ गइल बा। एह खातिर खलसा प्रशासने ना, बलुक समाज के पुरोधा लोगनो खातिर सवाचल जरूरी बडुए। कवनो समाज अपना पुरोधा लोगन के उचित सीख आ उनका आचरन के नैतिकता से सजग-सहज रह सकेला। मनोज भाई अपना सम्पादकीय के जउरे कमहीं में ढेर कुछ उपलब्ध करा देलन।

एह अंक के उपलब्धी बा भोजपुरी साहित्य के पहिल-पाँति-पुरुख पाण्डेय कपिल जी के आलेख ’भोजपुरी पत्रकारिता के विकास-यात्रा’। सन् 2008 के ई सार्वकालिक आलेख कवनो जागरुक पाठक खातिर थाती बा। ई जोगाइ के राखे लाएक आलेख बा। आ तवना प डॉ. स्वर्णलता जी के आलेख ’भोजपुरी बालगीत : खेलवना’ उनकर सर्वकालीन मजगर लेख कहा सकेला। डॉ. ब्रजभूषण भाईजी के दिवंगत भोजपुरी सेवियन के लेके जवन शृंखला प्रकाशित होत आ रहल बा, एकर सगरो ओर से स्वागत हो रहल बा। अपना पुरखन के बिचार आ साहित्यिक-कर्म से प्रेरना लीहल, अपना लिखाई में उत्तरोत्तर सुधार लेआवल जागरुक युवा वर्ग के धरम होखे के चाहीं।

एही लगले जवन अतुल कुमार राय के व्यंग्य ’जो रे कोरोना तोरा माटी लागो’ आजुके विडंबनाकाल प नीमन रचनाकर्म भइल बा। बाकिर, रवीन्द्र किशोर सिन्हा जी के आलेख के चर्चा ना कइल उचित ना होई। हालिया सम्पन्न ओलिम्पिक में भारतीय टीम के प्रदर्शन प समहुत नजर डालत ई आलेख जरूरी बन पडल बा। डॉ. दीप्ति, सुरेश कांटक जी आ विष्णुदेव तिवारी जी के कविता-गीतन के प्रकाशित भइला प एह लोगन के हार्दिक बधाई।

सम्पादक आ सम्पादकीय टीम के उत्जोग आ पुरकस कोरसिस से ई अंक ’थोर में ढेर’ बन के सोझा आइल बा। अनघा बधाई !

 

सौरभ पाण्डेय, वरिष्ठ साहित्यकार, नैनी, प्रयागराज

एगो पुरहर आ सुरुचिपूर्ण अंक बा ई

भावुक जी ,

कई गो विशेषांकन के बाद ‘ भोजपुरी जंक्शन ‘ के अक्तूबर-2021 के पहिला पख वाला अंक, सामान्य अंक के रूप में आइल बा, बाकिर कई मायने में इह़ो विशेषांके बा। पहिले राउर संपादकीय के बात करीं त ऊ बड़हन संदेश देत बा। विसंगतियन से भरल एह काल में लोग दोसरा के नीचा देखा के बड़का बने के फेर में बा, काहे से ओकरा भितरी प्रेमभाव के घोर कमी बा। जहाँ कहीं तनिक देखाई देतो बा त ऊ ऊपरे ऊपर के भाव से बा। मन में प्रेम बचावल जरूरी बा। सिन्हा साहेब के ‘ सुनीं सभे ‘ में महिला हॉकी में लइकिअन के जुझारुपन के चरचा बा आ भारतीय महिला हॉकी के बढ़त ग्राफ उछाह पैदा करत बा। पांडेय कपिल जी के भोजपुरी पत्रकारिता पर लेख हमनी खातिर धरोहर बा। डॉ. स्वर्ण लता के बाल गीत में खेलवना आलेख एह से महत्त्व राखत कि ई सब विषय अछूता बा। ऊ एह विषय पर शोध कइले बाड़ी। अतुल जी बड़ा सधल व्यंग्य लिखिले। उनकर उपस्थिति सुखद बा। सिनेमा आ बारिश के बीच एगो संबंध कायम हो चुकल बा। ई भोजपुरी सिनेमा में अछूता नइखे। हमार दिवंगत भोजपुरी सेवी वाला श्रृंखला आगे बढ़ावे खातिर साधुवाद। विष्णुदेव जी गद्य के अलावे पद्यो में जोरदार कलम चला रहल बानी। उहाँ के कविता उत्तर आधुनिकता वाद के ओर जात बा। एगो पुरहर आ सुरुचिपूर्ण अंक खातिर रउरा के साधुवाद। मान अपमान के चिंता से दूर समरपन भाव से भोजपुरी के सेवा करत बानी, देर सबेर फल प्राप्ति होई।

डॉ. ब्रजभूषण मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार, मुजफ्फरपुर

पत्रिका के हर अंक बेजोड़ निकलता

“भोजपुरी जंक्शन” के 1-15 अक्तूबर के अंक बहुते बढ़िया बा। एकर संपादकीय “प्रेमे इलाज बा तनाव के” हर ओह आदमी के पढ़े के चाहीं जे छोटे-छोटे बात पर भी तनाव में आ जाता। एह अंक में कई गो आकर्षक विषय बाड़न स जइसे- “भोजपुरी पत्रकारिता के विकास-यात्रा”, “सिनेमा में बारिश आ बारिश में सिनेमा”, दिवंगत भोजपुरी सेवी: परिचय, आ अउरी बहुत कुछ। पत्रिका के हर अंक बेजोड़ निकलता। एकरा खातिर निश्चित रूप से संपादक मनोज भावुक के धन्यवाद देतानी आ उनुका प्रति आभार प्रकट करतानी। मनोज भावुक जी एही तरे रचनात्मक पत्रिका निकालत रहसु आ अपना क्रिएटिविटी से हमनी के नीमन-नीमन सामग्री उपलब्ध करावत रहसु।

विनय बिहारी सिंह, वरिष्ठ पत्रकार, कोलकाता

एक सम्पूर्ण सामाजिक आ सांस्कृतिक पत्रिका बा भोजपुरी जंक्शन

भोजपुरी जंक्शन के ताजा अंक (1-15 अक्टूबर ) मिलल। सबसे पहिले सम्पादकीय

आलेख आकृष्ट कइलस। सम्पादकीय आलेख आज के ज्वलंत विषय ‘तनाव’ के संदर्भ

में कुछ महत्वपूर्ण विन्दुअन के रेखांकित करता। एह बात पर ज़ोर देहल बा

कि तनावग्रस्त मानसिकता केतना विध्वंसक होके विकास में बाधक हो सकेला!

सही बात बा कि ज़िंदगी तोहफ़ा ह आ एकरा के तनाव, अवसाद, विषाद, आ मौत

से जेतने बचावल जाव ओतने अच्छा रही।

एह अंक में खेल, पत्रकारिता, बालगीत, कोरोना महामारी, सिनेमा, दिवंगत

भोजपुरी सेवी लोग के परिचय, आ साहित्यिक सामग्री बाटे। हर अंक लेखा एक

सम्पूर्ण सामाजिक आ सांस्कृतिक पत्रिका जे संग्रहणीय बा।

एह धरोहर के सम्पादित करे ख़ातिर हम मनोज भावुक जी आ उहाँ के टीम के

साधुवाद देतानी। लोग से निवेदन बा कि लोग एह पत्रिका के अपने पढ़े आ

दोसरा के पढ़ावे।

अनिल कुमार प्रसाद, वरिष्ठ लेखक, नागेश्वर कालोनी, पटना

भोजपुरी जंक्शन : भोजपुरी साहित्य के धरोहर

‘भोजपुरी जंक्शन’ पाक्षिक पत्रिका 1-15 अक्टूबर 2021 के जे कलेवर भा तेवर बा, ऊ बहुत कुछ कह रहल बा। आज के हालात में सकारात्मक सोच आ समझ का साथे मनोज भावुक जी के लिखल संपादकीय ‘प्रेमे इलाज बा तनाव के’ सोरहो आना सार्थक बा। भाई रवीन्द्र किशोर सिन्हा जी के आलेख ‘ओलंपिक हॉकी में जुनून के जीत’ पढ़ के हमरा अइसन बुझाइल कि काश अइसने जुनून भोजपुरिया साहित्यकारन के बीच देखे के मिलित। आपन-आपन डफली बजावल आ आपन-आपन राग छेड़ल छोड़ के भोजपुरी साहित्य के विकास, समृध्दि आ उत्थान ख़ातिर मन के खटास भुलावल बहुते जरूरी बा। साँच कहीं त ई समय के तकाज़ा आ माँग भी बा। एह पत्रिका में एगो बहुते महत्वपूर्ण आलेख ‘भोजपुरी पत्रकारिता के विकास यात्रा’ नाम से छपल बा, जवन ज्ञानपरक के साथे-साथे भोजपुरी साहित्य में पत्रकारिता के सम्पूर्ण इतिहास बा। डॉ० स्वर्ण लता जी के के आलेख ‘भोजपुरी बालगीत: खेलवना’ आ मनोज भावुक के लिखल ‘सिनेमा में बारिश आ बारिश में सिनेमा’ बहुते रोचक आ मनभावन बा। डॉ० दीप्ति, सुरेश कांटक जी आ विष्णुदेव तिवारी जी के स्तरीय कविता पढ़े के मिलल। ख़ास रूप से एह पत्रिका के ‘भोजपुरी साहित्य के गौरव’ स्तंभ में डॉ० ब्रजभूषण मिश्र जी के लिखल दिवंगत साहित्यकार लोग के संक्षिप्त परिचय बहुते सराहनीय, सार्थक आ ऐतिहासिक पहल बा। कुल मिला के देखल जाव त आज के समय में जे भोजपुरी के पत्रिका निकल रहल बा, ओह में ‘भोजपुरी जंक्शन’ आपन एगो स्तर बना के रखले बा। अइसन ठोस काम खातिर मनोज भावुक जी धन्यवाद के पात्र बाड़न। उनकर सोच-समझ आ भोजपुरी के प्रति समर्पण सराहनीय बा। पत्रिका स्वास्थ्य आ दीर्घायु रहे इहे कामना बा।

डॉ० रंजन विकास, सह-संचालक ‘भोजपुरी साहित्यांगन’, पटना


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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min8050

मनोज भावुक

जिनगी के दुपहरिया खोजे जब-जब शीतल छाँव रे

पास बोलावे गाँव रे आपन, पास बोलावे गाँव रे।

गाँव के माटी, माई जइसन

खींचे अपना ओरिया

हर रस्ता, चौराहा खींचे

खींचे खेत-बधरिया

गाँव के बात निराला बाटे, नेह झरे हर ठांव रे।

पास बोलावे गाँव रे आपन..

भोर इहाँ के सोना लागे

हीरा दिन-दुपहरिया

साँझ सेनुरिया दुलहिन जइसन

रात चनन-चंदनिया

केसर के खुशबू में डूबल बा आपन गाँव-गिराँव रे।

पास बोलावे गाँव रे आपन..

कचरी, महिया, छेमी, चिउरा

शहर में कहाँ भेंटाये?

कांच टिकोरा देख-देख के

मन तोता ललचाये

गाँव में अवते याद पड़ेला जाने केतना नाँव रे।

पास बोलावे गाँव रे आपन..

हर मजहब के लोग साथ में

फगुआ-कजरी गावे

जग-परोजन पड़े त सब

मिल-जुल के पार लगावे

दुखवा छू-मंतर हो जाला गाँव में पड़ते पाँव रे।

पास बोलावे गाँव रे आपन..

भारत के जाने के बा तs

जाईं गाँवे-गाँवे

स्वर्ग गाँव में बाटे

ई  त ऋषियो-मुनि बतावें

सुनs संघतिया, गाँव में घुसते, हुलसे मन-लखराँव रे ।

पास बोलावे गाँव रे आपन..

 


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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min2710

लेखक: मनोज भावुक

हर साल 14 सितंबर के हमनी के मातृभाषा हिन्दी के सम्मान में हिन्दी दिवस मनावेनी जा। हिन्दी एगो सेतु भाषा भी ह, दू अलग अलग लोक भाषा के बोलनिहार के बीच संवाद खातिर। हालांकि हिन्दी के एह उपयोगिता पर बार बार विदेशी भाषा अंग्रेजी के प्रहार होत रहल बा लेकिन तबो हिन्दी आपन दमखम बनवले बिया आ धीरे धीरे विदेश में भी आपन असर देखा रहल बिया। कवनो भी भाषा के दोसरा क्षेत्र में भी लोकप्रिय करे में ओकरा सिनेमा के बड़ जोगदान रहेला। हिन्दी के विदेशन में बढ़त लोकप्रियता के एगो कारण हिन्दी सिनेमा भी बा। बहुते लोग हिन्दी एह से सीखेला कि उ इहाँ बनल सुंदर फिल्मन के देख सके, ओकर सही ढंग से आनंद ले सके। रउआ ई त जानते होखब कि राज कपूर के एक टाइम में विदेशन में बहुत फैन रहलें। बाद के हिन्दी फिल्म के सुपरस्टार लोग के साथे भी अइसन रहल बा। अब जइसे शाहरुख खान के फैन मिडल ईस्ट में बहुत बाड़ें, उहाँ शाहरुख के फिल्म बड़ा चाव से देखल जाला। दक्षिण भारत के फिल्मन में जे तरे उहाँ के साहित्य के महान कृति के रूपांतरण भइल बा, ओह तरे हिन्दी फिल्मन में त नइखे भइल। बाकिर अइसनो नइखे कि साफे नइखे भइल। हिन्दी सिनेमा में भी कइगो फिल्मन के कहानी हिन्दी साहित्य के बड़ उपन्यास भा कहानी से लिहल गइल बा। हालांकि अंग्रेजी आ दूसर कवनो भाषा में लिखल उपन्यास अउरी कहानी पर हिन्दी में ज्यादा फिलिम बनल बा, बजाय हिन्दी के। अब एकरा के दुर्भाग्य कह लीं भा विडंबना। एगो बड़ हिन्दी सिनेमा के आलोचक अपना रिपोर्ट में लिखले रहलें कि एह घरी के अधिकांश हिन्दी फिल्म निर्देशक अगर कवनो साहित्य पढेलें त उ अंग्रेजी, स्पैनिश भा दोसर भाषा के होला, हिन्दी साहित्य के उ लोग पूछबो ना करेला। कहे के माने बा फिलिम बनावे के बा हिन्दी में, रोटी कमाए के बा एही से बाकिर साहित्य पढ़ल जाई विदेशी। रउआ लोग के ई जान के बड़ा हैरत होई कि अधिकतर हिन्दी सिनेमा के स्क्रिप्ट अंग्रेजी में लिखाला। अगर संवाद भी लिखल जाला त उ रोमन लिपि में होला। कहे के माने कि कुछ अपवाद के छोड़ दीं त निर्देशक से लेके कलाकार ले हिन्दी सिनेमा से आपन कला अउरी पेट के भूख मिटावता बाकिर हिन्दी भाषा से ओकरा कवनो लसी-धागा नइखे रखे के। का बताईं, ई तथ्य जान के कई बार बहुत दुख होला।

हम टीवी उद्योग में लगभग डेढ़ दशक से बानी। एक बार एगो टीवी चैनल के घटना बतावsतानी। एगो निर्माता अपना सहायक के साथे आपन सीरियल के प्रोजेक्ट लेके चैनल के दफ्तर गइलें। उहाँ शानदार एसी रूम में एगो अंग्रेजी दां मेम बइठल रहली, उमीर लगभिग निर्माता के बेटी के बराबर होई, माने 25 से 30 के बीच में। उहे कहानी सुन के आपन हामी भरती त बात आगे बढ़ित। कहानी के नैरेशन भइल, ओकरा बाद उ अंग्रेजिए में पुछली कि एकर ओरिजनल लेखक के ह। निर्माता कहलें प्रेमचंद। उ कहली कि कहानी त हमरा अच्छा लागल ह बाकिर हमनी के ओरिजनल राइटर से भी एक बार मीटिंग कइल चाहतानी जा। इस सुन के बेचारु निर्माता के त जोर के हंसी आइल बाकिर उ अपना के रोक लिहलें आ कहलें कि मैडम हम एक बार मीटिंग फिक्स करे के कोशिश करब, आ बाहर चल अइलें। बाहर आवते उ ठठा के हँसले। उनके सहायक पुछलस, काहें ना कहनी हँ कि प्रेमचंद से मिले के बा त उपरे चल जा, उहाँ फुरसत में भेंटा जइहें।

तs, ई कुल्ह हाल चाल बा एह बेरा के हिन्दी सिनेमा के रोटी खा रहल लोग के। खैर, हम रउआ के कुछ अइसन फिल्मन के नाम बताएब जवन हिन्दी के उत्कृष्ट कृति पर बनल बाटे। प्रेमचंद पर बात भइल ह त उनकरे सबसे प्रसिद्ध उपन्यास गोदान पर साल 1963 में फिल्म गोदान बनल रहे, राजकुमार और कामिनी कौशल ओह में मुख्य भूमिका में रहे लोग। एही फिल्म में गीतकार अंजान अपना करियर के शुरुआती हिट गीत लिखले रहलें। फिल्म बड़ा सुंदर बनल रहे आ लोग अभिनो एकरा के पसंद करेला। प्रेमचंद के ही लोकप्रिय उपन्यास गबन पर 1966 में ‘गबन’ नाम से फिल्म बनल जे में सुनील दत्त अउरी साधना रहे लोग। ई फिल्म कृष्ण चोपड़ा आ ऋषिकेश मुखर्जी मिल के निर्देशित कइले रहे लोग। प्रेमचंद के कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर एही नाम से फिल्म भी बनल 1977 में। एकर निर्देशक महान निर्देशक सत्यजीत रे रहलें। एह फिल्म के ओ साल के सर्वश्रेष्ठ फिल्म के श्रेणी में राष्ट्रीय पुरस्कार मिलल। सत्यजीत रे पर प्रेमचंद के रचना संसार के बहुत असर रहे। उ ओम पूरी अउरी स्मिता पाटील के ले के फिल्म सद्गति बनवलें। ई फिल्म भी प्रेमचंद के एही नाम के कहानी पर आधारित रहे।

भीष्म साहनी के हिन्दी सिनेमा से एगो रिश्ता रहे, हालांकि हिन्दी सिनेमा से ना जुडलें बाकिर उनके भाई बलराज साहनी हिन्दी के एगो प्रतिष्ठित अउरी सफलतम कलाकार मानल जालें। भीष्म साहनी के कई गो नाटक के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रस्तुति भइल। उनके लिखल स्क्रीनप्ले पर चर्चित टीवी शो तमस बनल। भगवती चरण वर्मा के लिखल चित्रलेखा हिन्दी के बड़ उपन्यास ह, ओ पर किदार शर्मा 1941 अउरी 1964 में दू बार हिन्दी फिल्म बनवलें अउरी दुनू सफल भइल। फणीश्वर नाथ रेणू के हिन्दी साहित्य में एगो बड़ साहित्यकार के दर्जा मिलल बा। उनके लिखल कहानी मारे गए गुलफाम पर आधारित फिल्म तीसरी कसम बनल जवन हिन्दी सिनेमा के क्लासिक फिल्म मानल जाले। एह फिल्म के निर्माता गीतकार शैलेन्द्र रहलें। 1978 के सफलतम फिल्म में से एक ‘पति पत्नी और वो; कमलेश्वर के लिखल कहानी पर रहे। उहे एह फिल्म के स्क्रीनप्ले भी लिखलें।

अउर भी कई गो बड़ फिल्मन के नाम बा जवन हिन्दी साहित्य के बड़ कृतियन पर बनल बा।

 

 

 

 

 

 

 


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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min2750

शशि प्रेमदेव

एही धरती का कवनो कोना में एगो देस रहे। ओह् देस में एगो नगर रहे — तमाम छोट-बड़  मकान-दोकान से भरल-पूरल। आ ओही मकानन-दोकानन का बीच से बहत रहे एगो उदास नदी। कुछ आबादी नदी के एह् पार। कुछ ओह पार।

नगर का ओह पार वाला हिस्सा में एगो परम पावन इमारत रहे। ओह इमारत में वइसे तs रोजे कुछ लोगन कs आवा-जाही रहे बाकिर हर हफ्ता जुमा (शुक्रवार) का दीने उहंवां एकही किसिम के भेसभूसा वालन क भीड़-भाड़ खास तौर पर दिखाई देव।

एह इमारत कs- जहवां जुटे वालन में एकहू औरत जात कब्बो ना लउके- सबसे बड़का अदिमी के उनकर समर्थक लोग ‘मौलाना’ कहि के पुकारत रहे।

संजोग से नदी के एह पार भी एगो परम पावन इमारत मौजूद रहे — तनी भिन्न किसिम कs ! बाकिर उहंवां जुमा के ना, अकसरहा मंगर आ सनीचर का दिने लोग जुटत रहलन- एके लेखा भेसभूसा में ना, मनचाहा भेसभूसा में! आ खलिसा नरे ना, नारी लोग भी !

एह इमारत क सबसे पूजनीय अदिमी के केहू ‘स्वामी जी’ तs केहू ‘महातमा जी’ कहि के पुकारत रहे।

ओही नगर में एगो ढींठ परिंदो क वजूद रहे। ओह परिंदा के जेतना मनोरंजक एह इमारत का भीतर होखे वाला प्रवचन लागत रहे, ओतने मजेदार ओह इमारत का भीतर होखे वाला प्रवचन ! जब-जब ओकरा के मन बहलावे कs कवनो दोसर जोगाड़ ना भेंटाव, ऊ कब्बो एह पार वाली इमारत पर जाके बइठि जाव, कब्बो ओह पार वाली इमारत पर …

एक दिन क बाति हs । परिंदा जसहीं ओह पार वाली इमारत के छरदेवाली पर जाके बइठल, मौलाना साहेब क गूंजत आवाज ओकरा कान में परल — ” हजरात ! हमारा मज़हब सबसे महान है … इंशाअल्लाह एक दिन सारी कायनात में सिर्फ़ हमीं होंगे … ग़ैर मज़हब वाले इन दिनों ख़ुद ब ख़ुद हमारे मज़हब की तरफ़ खींचे चले आ रहे हैं … कुछ दिनों पहले हमें पंजाब में एक बंदा मिला जिसने हाल ही में इस्लाम अपनाया था … जब मैंने उससे इसकी वज़ह जानना चाहा, तो उसने बताया कि उसकी जवान बहन मर गई थी … जब चिता पर उसे जलाया जा रहा था, तो यह देखकर उसे बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई कि कफ़न के जलते ही उसकी बहन का जवान जिस्म नंगा हो गया और आस-पास खड़े लोग उसे फटी आंखों से निहार रहे थे… इसलिए उसने वहीं तय कर लिया कि ऐसे बकवास धर्म से आइंदा कोई वास्ता नहीं रक्खेगा जिसमें पर्दानशीं बहन-बेटियों की लाशें इस शर्मनाक तरीके से जलायी जाती हों.”

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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min2830

प्रो. (डॉ.) जयकान्त सिंह जय

‘ भाषा ‘ के ‘ भासा ‘ लिखल देख के बिदकी जन। भोजपुरी के उचारन के दिसाईं इहे सही बा। भोजपुरी में भाषा के भासा बोलल आ लिखल जाला। काहे कि ई बैदिक परम्परा से आइल देसी प्राकृत भासा ह। प्राकृत मतलब बोले भा उचारे के प्रकृति आ प्रवृत्ति के हिसाब से लिखाए वाली ना, लिखाए वाला भासा। कवनो भासा में लिंगो ओह भासा-भासी जनसमूह के बेवहार से तय होला जइसे-संस्कृत के पुलिंग ‘आत्मा’ हिन्दी में स्त्रीलिंग हो जाला। हिन्दी के स्त्रीलिंग ‘चर्चा’ आ ‘धारा’ उर्दू में पुलिंग हो जाला। खैर, इहाँ बात होत रहल ह भाषा आ भासा के, त ऋग्बेद के 7/7/4 आ 8/23/5 में ‘अभिख्या भासा बृहदा ‘ क के प्रयोग भइल बा आ भाषा चाहे भासा ‘ भाष् ‘ चाहे ‘ भास् ‘ धातु से बनल बा। जवना के अर्थ होला- ब्यक्त वाक् मतलब समुझे-बूझे जोग बोलल। संस्कृतो में लिखल बा कि ‘ भास् व्यक्तायां वाचि।’ एह से भोजपुरी में भाषा के भासा चली। अइसहूं भोजपुरी के उचारन में अकसरहाँ जुड़वा ब्यंजन के बेवहार ना होला चाहे होइबो करेला त संस्कृत आ हिन्दी के प्रभाव से होला, ओही तरह से भोजपुरी में  ण, श आ ष के जगे न, स आ ख के उचारन होला। जवना के बारे में आगे बात राखल जाई। अबहीं असली मुद्दा मातृभासा के बा।

भोजपुरी हमार मातृभासा ह, मात्र भासा ना ह। मातृभासा मतलब हमरा आ हमरा मतारी द्वारा अपनावल हमरा पैतृक परिवार आ पड़ोस के कम से कम तीन-चार पीढ़ी के पारंपरिक संस्कार-पारिवारिक बेवहार के भासा। हमरा जिनगी के ऊ पहिल भासा,जवन हम अपना मतारी के गर्भ में पलात-पोसात छठे-सतवाँ महीना से सुभद्रा के अभिमन्यु जइसन महसूसे लगनीं आ जनम लिहला के बाद मतारी आ परिवार-पड़ोस के गोदी में तुतरात ‘तूती’ के रूप में पाके अबोध से सबोध भइनीं। सबोध भइला के बाद जिनगी के ओही पहिल भासा के जरिए आगे के जीवन सुखमय जीये खातिर आउर-आउर भासा के सिखनीं, पढ़नीं, लिखनीं आ अपनवनीं। एह तरह से बाद के अरजल हर उपयोगी भासा के मातृभासा भइल हमार भोजपुरी। एह तरह से हमरा खातिर भोजपुरी भासा हमरा अरजल हिन्दी, संस्कृत, अंगरेजी आदि हर भासा के मातृभासा बा।

साँच कहीं त पुरान भारतीय वाङ्मय में ‘ मातृभासा ‘ जइसन कवनो सब्द नइखे। ई अंगरेजी का ‘मदरटंग’ के हिन्दी अनुबाद ह। ऋग्वेद का एगो ऋचा में कहल गइल बा – ‘ इला सरस्वती मही तिस्त्रो देवीर्मयोभुव:। ‘ पच्छिम के बिद्वान एकर अंगरेजी में उल्था कइलें – ‘ वन शुड रेस्पेक्ट हिज मदरलैंड, हिज कल्चर एंड हिज मदरटंग, बिकौज दे आर गिभर्स ऑफ हैप्पिनेस।’ ( One should respect his motherland, his culture and his mothertongue, because they are givers of happiness.

एह अनुबाद में ‘ सरस्वती ‘ मतलब ‘ बानी ‘ खातिर ‘ मदरटंग ‘ माने मातृभासा सब्द के पहिला बेर प्रयोग भइल। बच्चा का मतारी के भासा के मातृभासा कहल गइल। जवना से कई गो सवाल खड़ा हो गइल; जइसे- जदि बच्चा के जनम देते ओकरा मतारी के मृत्यु हो जाए तब ओह बच्चा के मातृभासा का होई?, बच्चा का मतारी के मातृभासा ओकरा बिआह के पहिले ससुरार का परम्परागत पारिवारिक भासा से अलग होखी तब ओह बच्चा के मातृभासा का होई? आदि। तब पच्छिम के भासाविद् लोग कहल कि बच्चा के मतारी, बाप सहित ओकरा परिवार आ पड़ोस के परम्परागत बेवहारिक बोली भा भासा के ही ओह बच्चा के पहिल भासा, निज भासा, स्वभासा भा मातृभासा कहल जाई। जवना में ऊ बच्चा तुतरात अबोध से सबोध होखी आ ओही सीखल-अरजल पहिल पारिवारिक भासा के माध्यम से जीवन-जगत से जुड़ल जानकारी अउर दोसर भासा सबके बोले, पढ़े आ लिखे के काबिल बनेला। एह से ओह बच्चा के उहे परम्परागत पारिवारिक भासा ओकर मातृभासा कहाई। एकर पच्छिम के बिद्वान लोग अंगरेजी में कहल- ” द टर्म ‘ मदरटंग ‘ शुड बी इंटरप्रेटेड टू मीन दैट इज दि लैंग्वेज ऑफ वन्स मदर। इन सम पैटर्नल सोसाइटीज, दि वाइफ मूव्स इन विथ द हस्बैंड एंड दस मेय हैव ए डिफरेंट फर्स्ट लैंग्वेज, ऑर डायलेक्ट, दैन द लोकल लैंग्वेज ऑफ द हस्बैंड, येट देयर चिल्ड्रेन यूजुअली वनली एस्पीक देयर लोकल लैंग्वेज। ऑनली ए फ्यू विल लर्न टू एस्पीक मदर्स लैंग्वेज लाइक नैटिव्स। मदर इन दिस कन्टेक्स्ट प्रोबेब्ली ओरिजनेटेड  फ्रौम द डिफिनिशन ऑफ मदर एज सोर्स, ऑर ओरिजिन; एज इन मदर कन्ट्री ऑर लैंड।—— इन द वर्डिंग ऑफ द कोस्चन ऑन मदरटंग, द एक्सप्रेसन ‘ एट होम ‘ वाज एडेड टू एस्पेसिफाई द कान्टेक्स्ट इन विथ द इंडिविजुअल लर्न्ड द लैंग्वेज।”

 

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भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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