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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min5760

गजब के अंक बा जी ! कमहीं में ढेर, तनिके में भरपूर

गजब के अंक बा जी ! कमहीं में ढेर। तनिके में भरपूर। अबगे डाउनलोड कइनीं हँ।

सबले पहिले नजर परल हा सम्पादकीय प। जवना के कथ्य के मूल एह पंक्तियन में बा। ’’प्रेमे इलाज बा नफरत के। प्रेमे इलाज बा तनाव के। दिमाग के प्रेम के कटोरा बना लीं। सब ठीक हो जाई’’। आजु सउँसे संसार में जइसन माहौल बनल बा, लगातारे बनत जा रहल बा, एह बिचार के हर जगहा के समाज में पगावल पहिल काम होखे के चाहीं। भोजपुरिया समाज के लेके तनिका अउरी सचेत भइल जरूरी बा। भोजपुरिया समाज के जमाव जुड़ाव लगाव के अंतर्बहाव हरमेसे ’सादा जीवन, उच्च बिचार’ रहल बा जवना के सोर अध्यात्म से रस पावेला। आध्यात्मिक समाज के मनइयन के मन में जवना ढंग से नफरत आ क्रोध परसत जा रहल बा, एकर मतलब जानल-बूझल अब निकहा जरूरी भ गइल बा। एह खातिर खलसा प्रशासने ना, बलुक समाज के पुरोधा लोगनो खातिर सवाचल जरूरी बडुए। कवनो समाज अपना पुरोधा लोगन के उचित सीख आ उनका आचरन के नैतिकता से सजग-सहज रह सकेला। मनोज भाई अपना सम्पादकीय के जउरे कमहीं में ढेर कुछ उपलब्ध करा देलन।

एह अंक के उपलब्धी बा भोजपुरी साहित्य के पहिल-पाँति-पुरुख पाण्डेय कपिल जी के आलेख ’भोजपुरी पत्रकारिता के विकास-यात्रा’। सन् 2008 के ई सार्वकालिक आलेख कवनो जागरुक पाठक खातिर थाती बा। ई जोगाइ के राखे लाएक आलेख बा। आ तवना प डॉ. स्वर्णलता जी के आलेख ’भोजपुरी बालगीत : खेलवना’ उनकर सर्वकालीन मजगर लेख कहा सकेला। डॉ. ब्रजभूषण भाईजी के दिवंगत भोजपुरी सेवियन के लेके जवन शृंखला प्रकाशित होत आ रहल बा, एकर सगरो ओर से स्वागत हो रहल बा। अपना पुरखन के बिचार आ साहित्यिक-कर्म से प्रेरना लीहल, अपना लिखाई में उत्तरोत्तर सुधार लेआवल जागरुक युवा वर्ग के धरम होखे के चाहीं।

एही लगले जवन अतुल कुमार राय के व्यंग्य ’जो रे कोरोना तोरा माटी लागो’ आजुके विडंबनाकाल प नीमन रचनाकर्म भइल बा। बाकिर, रवीन्द्र किशोर सिन्हा जी के आलेख के चर्चा ना कइल उचित ना होई। हालिया सम्पन्न ओलिम्पिक में भारतीय टीम के प्रदर्शन प समहुत नजर डालत ई आलेख जरूरी बन पडल बा। डॉ. दीप्ति, सुरेश कांटक जी आ विष्णुदेव तिवारी जी के कविता-गीतन के प्रकाशित भइला प एह लोगन के हार्दिक बधाई।

सम्पादक आ सम्पादकीय टीम के उत्जोग आ पुरकस कोरसिस से ई अंक ’थोर में ढेर’ बन के सोझा आइल बा। अनघा बधाई !

 

सौरभ पाण्डेय, वरिष्ठ साहित्यकार, नैनी, प्रयागराज

एगो पुरहर आ सुरुचिपूर्ण अंक बा ई

भावुक जी ,

कई गो विशेषांकन के बाद ‘ भोजपुरी जंक्शन ‘ के अक्तूबर-2021 के पहिला पख वाला अंक, सामान्य अंक के रूप में आइल बा, बाकिर कई मायने में इह़ो विशेषांके बा। पहिले राउर संपादकीय के बात करीं त ऊ बड़हन संदेश देत बा। विसंगतियन से भरल एह काल में लोग दोसरा के नीचा देखा के बड़का बने के फेर में बा, काहे से ओकरा भितरी प्रेमभाव के घोर कमी बा। जहाँ कहीं तनिक देखाई देतो बा त ऊ ऊपरे ऊपर के भाव से बा। मन में प्रेम बचावल जरूरी बा। सिन्हा साहेब के ‘ सुनीं सभे ‘ में महिला हॉकी में लइकिअन के जुझारुपन के चरचा बा आ भारतीय महिला हॉकी के बढ़त ग्राफ उछाह पैदा करत बा। पांडेय कपिल जी के भोजपुरी पत्रकारिता पर लेख हमनी खातिर धरोहर बा। डॉ. स्वर्ण लता के बाल गीत में खेलवना आलेख एह से महत्त्व राखत कि ई सब विषय अछूता बा। ऊ एह विषय पर शोध कइले बाड़ी। अतुल जी बड़ा सधल व्यंग्य लिखिले। उनकर उपस्थिति सुखद बा। सिनेमा आ बारिश के बीच एगो संबंध कायम हो चुकल बा। ई भोजपुरी सिनेमा में अछूता नइखे। हमार दिवंगत भोजपुरी सेवी वाला श्रृंखला आगे बढ़ावे खातिर साधुवाद। विष्णुदेव जी गद्य के अलावे पद्यो में जोरदार कलम चला रहल बानी। उहाँ के कविता उत्तर आधुनिकता वाद के ओर जात बा। एगो पुरहर आ सुरुचिपूर्ण अंक खातिर रउरा के साधुवाद। मान अपमान के चिंता से दूर समरपन भाव से भोजपुरी के सेवा करत बानी, देर सबेर फल प्राप्ति होई।

डॉ. ब्रजभूषण मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार, मुजफ्फरपुर

पत्रिका के हर अंक बेजोड़ निकलता

“भोजपुरी जंक्शन” के 1-15 अक्तूबर के अंक बहुते बढ़िया बा। एकर संपादकीय “प्रेमे इलाज बा तनाव के” हर ओह आदमी के पढ़े के चाहीं जे छोटे-छोटे बात पर भी तनाव में आ जाता। एह अंक में कई गो आकर्षक विषय बाड़न स जइसे- “भोजपुरी पत्रकारिता के विकास-यात्रा”, “सिनेमा में बारिश आ बारिश में सिनेमा”, दिवंगत भोजपुरी सेवी: परिचय, आ अउरी बहुत कुछ। पत्रिका के हर अंक बेजोड़ निकलता। एकरा खातिर निश्चित रूप से संपादक मनोज भावुक के धन्यवाद देतानी आ उनुका प्रति आभार प्रकट करतानी। मनोज भावुक जी एही तरे रचनात्मक पत्रिका निकालत रहसु आ अपना क्रिएटिविटी से हमनी के नीमन-नीमन सामग्री उपलब्ध करावत रहसु।

विनय बिहारी सिंह, वरिष्ठ पत्रकार, कोलकाता

एक सम्पूर्ण सामाजिक आ सांस्कृतिक पत्रिका बा भोजपुरी जंक्शन

भोजपुरी जंक्शन के ताजा अंक (1-15 अक्टूबर ) मिलल। सबसे पहिले सम्पादकीय

आलेख आकृष्ट कइलस। सम्पादकीय आलेख आज के ज्वलंत विषय ‘तनाव’ के संदर्भ

में कुछ महत्वपूर्ण विन्दुअन के रेखांकित करता। एह बात पर ज़ोर देहल बा

कि तनावग्रस्त मानसिकता केतना विध्वंसक होके विकास में बाधक हो सकेला!

सही बात बा कि ज़िंदगी तोहफ़ा ह आ एकरा के तनाव, अवसाद, विषाद, आ मौत

से जेतने बचावल जाव ओतने अच्छा रही।

एह अंक में खेल, पत्रकारिता, बालगीत, कोरोना महामारी, सिनेमा, दिवंगत

भोजपुरी सेवी लोग के परिचय, आ साहित्यिक सामग्री बाटे। हर अंक लेखा एक

सम्पूर्ण सामाजिक आ सांस्कृतिक पत्रिका जे संग्रहणीय बा।

एह धरोहर के सम्पादित करे ख़ातिर हम मनोज भावुक जी आ उहाँ के टीम के

साधुवाद देतानी। लोग से निवेदन बा कि लोग एह पत्रिका के अपने पढ़े आ

दोसरा के पढ़ावे।

अनिल कुमार प्रसाद, वरिष्ठ लेखक, नागेश्वर कालोनी, पटना

भोजपुरी जंक्शन : भोजपुरी साहित्य के धरोहर

‘भोजपुरी जंक्शन’ पाक्षिक पत्रिका 1-15 अक्टूबर 2021 के जे कलेवर भा तेवर बा, ऊ बहुत कुछ कह रहल बा। आज के हालात में सकारात्मक सोच आ समझ का साथे मनोज भावुक जी के लिखल संपादकीय ‘प्रेमे इलाज बा तनाव के’ सोरहो आना सार्थक बा। भाई रवीन्द्र किशोर सिन्हा जी के आलेख ‘ओलंपिक हॉकी में जुनून के जीत’ पढ़ के हमरा अइसन बुझाइल कि काश अइसने जुनून भोजपुरिया साहित्यकारन के बीच देखे के मिलित। आपन-आपन डफली बजावल आ आपन-आपन राग छेड़ल छोड़ के भोजपुरी साहित्य के विकास, समृध्दि आ उत्थान ख़ातिर मन के खटास भुलावल बहुते जरूरी बा। साँच कहीं त ई समय के तकाज़ा आ माँग भी बा। एह पत्रिका में एगो बहुते महत्वपूर्ण आलेख ‘भोजपुरी पत्रकारिता के विकास यात्रा’ नाम से छपल बा, जवन ज्ञानपरक के साथे-साथे भोजपुरी साहित्य में पत्रकारिता के सम्पूर्ण इतिहास बा। डॉ० स्वर्ण लता जी के के आलेख ‘भोजपुरी बालगीत: खेलवना’ आ मनोज भावुक के लिखल ‘सिनेमा में बारिश आ बारिश में सिनेमा’ बहुते रोचक आ मनभावन बा। डॉ० दीप्ति, सुरेश कांटक जी आ विष्णुदेव तिवारी जी के स्तरीय कविता पढ़े के मिलल। ख़ास रूप से एह पत्रिका के ‘भोजपुरी साहित्य के गौरव’ स्तंभ में डॉ० ब्रजभूषण मिश्र जी के लिखल दिवंगत साहित्यकार लोग के संक्षिप्त परिचय बहुते सराहनीय, सार्थक आ ऐतिहासिक पहल बा। कुल मिला के देखल जाव त आज के समय में जे भोजपुरी के पत्रिका निकल रहल बा, ओह में ‘भोजपुरी जंक्शन’ आपन एगो स्तर बना के रखले बा। अइसन ठोस काम खातिर मनोज भावुक जी धन्यवाद के पात्र बाड़न। उनकर सोच-समझ आ भोजपुरी के प्रति समर्पण सराहनीय बा। पत्रिका स्वास्थ्य आ दीर्घायु रहे इहे कामना बा।

डॉ० रंजन विकास, सह-संचालक ‘भोजपुरी साहित्यांगन’, पटना


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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min8760

मनोज भावुक

जिनगी के दुपहरिया खोजे जब-जब शीतल छाँव रे

पास बोलावे गाँव रे आपन, पास बोलावे गाँव रे।

गाँव के माटी, माई जइसन

खींचे अपना ओरिया

हर रस्ता, चौराहा खींचे

खींचे खेत-बधरिया

गाँव के बात निराला बाटे, नेह झरे हर ठांव रे।

पास बोलावे गाँव रे आपन..

भोर इहाँ के सोना लागे

हीरा दिन-दुपहरिया

साँझ सेनुरिया दुलहिन जइसन

रात चनन-चंदनिया

केसर के खुशबू में डूबल बा आपन गाँव-गिराँव रे।

पास बोलावे गाँव रे आपन..

कचरी, महिया, छेमी, चिउरा

शहर में कहाँ भेंटाये?

कांच टिकोरा देख-देख के

मन तोता ललचाये

गाँव में अवते याद पड़ेला जाने केतना नाँव रे।

पास बोलावे गाँव रे आपन..

हर मजहब के लोग साथ में

फगुआ-कजरी गावे

जग-परोजन पड़े त सब

मिल-जुल के पार लगावे

दुखवा छू-मंतर हो जाला गाँव में पड़ते पाँव रे।

पास बोलावे गाँव रे आपन..

भारत के जाने के बा तs

जाईं गाँवे-गाँवे

स्वर्ग गाँव में बाटे

ई  त ऋषियो-मुनि बतावें

सुनs संघतिया, गाँव में घुसते, हुलसे मन-लखराँव रे ।

पास बोलावे गाँव रे आपन..

 


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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min3020

लेखिका: सुरभि सिन्हा

बंटी दुबे सिनेमा जगत के एगो अइसन नाम, जे झारखण्ड के एगो छोट जिला से निकलके बॉलीवुड तक के सफर तय कइलन अउर आपन पहचान बनवलन। बंटी दुबे आज कवनो पहचान के मोहताज नइखन। ई आपन लगन आ मेहनत से साबित कर दिहलन कि अगर इंसान कुछ करे के ठान लेव त ओकरा के आपन मंजिल पावे से केहू रोक ना सकेला।

साल 1988 में झारखंड के मेदिनीनगर (पलामू) में एगो ब्राह्मण परिवार में जनमल बंटी दुबे के बचपन से ही सिनेमा देखे के बड़ा शौक रहल। पढ़ाई-लिखाई के दौरान बंटी दुबे दिल्ली में रह रहल आपन बड़ भाई पिंकू दुबे के पास जाए के मौका मिलल। उहाँ ऊ आपन भाई के थियेटर में हिस्सा लेत देखलन, त उनको मन में थियेटर के प्रति रुझान पैदा भइल। एकरा बाद बंटी जबे-तबे आपन भाई के पास दिल्ली जाए लगलन आ उनके साथे थियेटर में हिस्सा लेवे लगलन। एकरा बाद उ आपन भाई के मदद से हिमाचल कल्चरल रिसर्च फोरम एंड थियेटर एकेडमी (एचसीआरएफटीए), मंडी हिमांचल प्रदेश में दाखिला ले लेहलन और उहां से प्रशिक्षण लेहला के बाद रुख कइलन सपनन के नगरी मुंबई के ओर। मुंबई जा के खुद के स्थापित कइल एतना आसान ना रहे जेतना बंटी दुबे सोचले रहलन। ऊ दिन आ रात अपना के स्थापित करे खातिर मेहनत कइलन। उनकर मेहनत तब रंग ले आइल जब उनका के साल 2007 में सहारा वन के धारावाहिक जर्सी नंबर 10 में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम करे के मौका मीलल। इ धारावाहिक बंटी खातिर बंद किस्मत के दरवाजा खुले जइसन रहे। एह धारावाहिक के बाद बंटी के असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर कई गो आउर प्रोजेक्ट में काम करे के मौका मिलल, जेकरा में कैसी लागी लगन, रिलायंस एंटरटेनमेंट के शो हॉरर नाइट सहित कईएक धारावाहिकन के साथे कई गो बड़हन ब्रांड के विज्ञापनन आउर साउथ के कई गो फिल्म भी शामिल बा। एही दौरान बंटी कईअन शॉर्ट फिल्म के भी निर्देशन कइलन जवना के कई गो फ़िल्म फेस्टिवल में सराहल गइल। इनकर शॉर्ट फिल्म में द स्टोरी,चोर, क्विट, हामिद,पजल आदि शामिल बा। हमरा (सुरभि सिन्हा) से बातचीत में बंटी दुबे बतवले कि उनके द्वारा निर्देशित शॉर्ट फिल्म क्विट के कांस फिल्म फेस्टिवल में देखावल गइल रहे। एकरा बाद बंटी हिंदी सिनेमा में ही एगो फिल्म बनावे के तैयारी में लाग गइलन आउर फिल्म जैकलीन आई एम कमिंग के निर्देशन कइलन, जवन साल 2019 में रिलीज़ भइल रहे। एह फिल्म में रघुवीर यादव आ धनोया मुख्य भूमिका में रहे लोग।

फिल्म जैकलीन आई एम कमिंग एक 40 साल के अविवाहित हिंदू व्यक्ति काशी तिवारी (रघुवीर यादव) के कहानी हवे। काशी के चर्च में जैकलीन (दीवा धनोया) से भेंट होता आ उनका जैकलीन से प्यार हो जाता। दूनो लोग शादी कर लेता। एह फिल्म के समीक्षक लोग आ दर्शक लोग बहुत सराहल। मनीष गिरी एह फिल्म के निर्माता हवन। पिंकू दुबे एकर लेखक हवन। बंटी दुबे आज कल एगो अउरु फिल्म बनावे के तैयारी में बाड़न, जेकरा में उ बॉलीवुड के कौनो बड़ा अभिनेता के लिहन। कोरोना महामारी के कारण देश में लागल लॉकडाउन के चलते बंटी आपन अगला फिल्म के ऐलान ना कइलन, लेकिन बंटी जल्दिये आपन फिल्म के ऐलान करिहन। फिलहाल बंटी के आवे वाला ई फिल्म के बारे में ज्यादा जानकारी त ना बा, लेकिन बंटी कहत रहन कि कई बड़हन अभिनेता लोगन से बात चलता जइसही फिल्म खातिर कवनो अभिनेता फाइनल हो जइहें हम अन्नोउंसमेंट कर देब। बंटी दुबे आज अपना क्षेत्र के ओह हर युवा खातिर उदाहरण बाड़न जे छोट शहर से आपन सपना पूरा करे खातिर बड़ शहर में आवेला लेकिन कठिन परिस्तिथि के आगे जल्दिये हार मानके घुटना टेक देवेला। बंटी दुबे के उनकर आवे वाला जीवन अउर फिल्म खातिर भोजपुरी जंक्शन के तरफ से शुभकामना!

 


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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min3240

लेखक: मनोज भावुक

हर साल 14 सितंबर के हमनी के मातृभाषा हिन्दी के सम्मान में हिन्दी दिवस मनावेनी जा। हिन्दी एगो सेतु भाषा भी ह, दू अलग अलग लोक भाषा के बोलनिहार के बीच संवाद खातिर। हालांकि हिन्दी के एह उपयोगिता पर बार बार विदेशी भाषा अंग्रेजी के प्रहार होत रहल बा लेकिन तबो हिन्दी आपन दमखम बनवले बिया आ धीरे धीरे विदेश में भी आपन असर देखा रहल बिया। कवनो भी भाषा के दोसरा क्षेत्र में भी लोकप्रिय करे में ओकरा सिनेमा के बड़ जोगदान रहेला। हिन्दी के विदेशन में बढ़त लोकप्रियता के एगो कारण हिन्दी सिनेमा भी बा। बहुते लोग हिन्दी एह से सीखेला कि उ इहाँ बनल सुंदर फिल्मन के देख सके, ओकर सही ढंग से आनंद ले सके। रउआ ई त जानते होखब कि राज कपूर के एक टाइम में विदेशन में बहुत फैन रहलें। बाद के हिन्दी फिल्म के सुपरस्टार लोग के साथे भी अइसन रहल बा। अब जइसे शाहरुख खान के फैन मिडल ईस्ट में बहुत बाड़ें, उहाँ शाहरुख के फिल्म बड़ा चाव से देखल जाला। दक्षिण भारत के फिल्मन में जे तरे उहाँ के साहित्य के महान कृति के रूपांतरण भइल बा, ओह तरे हिन्दी फिल्मन में त नइखे भइल। बाकिर अइसनो नइखे कि साफे नइखे भइल। हिन्दी सिनेमा में भी कइगो फिल्मन के कहानी हिन्दी साहित्य के बड़ उपन्यास भा कहानी से लिहल गइल बा। हालांकि अंग्रेजी आ दूसर कवनो भाषा में लिखल उपन्यास अउरी कहानी पर हिन्दी में ज्यादा फिलिम बनल बा, बजाय हिन्दी के। अब एकरा के दुर्भाग्य कह लीं भा विडंबना। एगो बड़ हिन्दी सिनेमा के आलोचक अपना रिपोर्ट में लिखले रहलें कि एह घरी के अधिकांश हिन्दी फिल्म निर्देशक अगर कवनो साहित्य पढेलें त उ अंग्रेजी, स्पैनिश भा दोसर भाषा के होला, हिन्दी साहित्य के उ लोग पूछबो ना करेला। कहे के माने बा फिलिम बनावे के बा हिन्दी में, रोटी कमाए के बा एही से बाकिर साहित्य पढ़ल जाई विदेशी। रउआ लोग के ई जान के बड़ा हैरत होई कि अधिकतर हिन्दी सिनेमा के स्क्रिप्ट अंग्रेजी में लिखाला। अगर संवाद भी लिखल जाला त उ रोमन लिपि में होला। कहे के माने कि कुछ अपवाद के छोड़ दीं त निर्देशक से लेके कलाकार ले हिन्दी सिनेमा से आपन कला अउरी पेट के भूख मिटावता बाकिर हिन्दी भाषा से ओकरा कवनो लसी-धागा नइखे रखे के। का बताईं, ई तथ्य जान के कई बार बहुत दुख होला।

हम टीवी उद्योग में लगभग डेढ़ दशक से बानी। एक बार एगो टीवी चैनल के घटना बतावsतानी। एगो निर्माता अपना सहायक के साथे आपन सीरियल के प्रोजेक्ट लेके चैनल के दफ्तर गइलें। उहाँ शानदार एसी रूम में एगो अंग्रेजी दां मेम बइठल रहली, उमीर लगभिग निर्माता के बेटी के बराबर होई, माने 25 से 30 के बीच में। उहे कहानी सुन के आपन हामी भरती त बात आगे बढ़ित। कहानी के नैरेशन भइल, ओकरा बाद उ अंग्रेजिए में पुछली कि एकर ओरिजनल लेखक के ह। निर्माता कहलें प्रेमचंद। उ कहली कि कहानी त हमरा अच्छा लागल ह बाकिर हमनी के ओरिजनल राइटर से भी एक बार मीटिंग कइल चाहतानी जा। इस सुन के बेचारु निर्माता के त जोर के हंसी आइल बाकिर उ अपना के रोक लिहलें आ कहलें कि मैडम हम एक बार मीटिंग फिक्स करे के कोशिश करब, आ बाहर चल अइलें। बाहर आवते उ ठठा के हँसले। उनके सहायक पुछलस, काहें ना कहनी हँ कि प्रेमचंद से मिले के बा त उपरे चल जा, उहाँ फुरसत में भेंटा जइहें।

तs, ई कुल्ह हाल चाल बा एह बेरा के हिन्दी सिनेमा के रोटी खा रहल लोग के। खैर, हम रउआ के कुछ अइसन फिल्मन के नाम बताएब जवन हिन्दी के उत्कृष्ट कृति पर बनल बाटे। प्रेमचंद पर बात भइल ह त उनकरे सबसे प्रसिद्ध उपन्यास गोदान पर साल 1963 में फिल्म गोदान बनल रहे, राजकुमार और कामिनी कौशल ओह में मुख्य भूमिका में रहे लोग। एही फिल्म में गीतकार अंजान अपना करियर के शुरुआती हिट गीत लिखले रहलें। फिल्म बड़ा सुंदर बनल रहे आ लोग अभिनो एकरा के पसंद करेला। प्रेमचंद के ही लोकप्रिय उपन्यास गबन पर 1966 में ‘गबन’ नाम से फिल्म बनल जे में सुनील दत्त अउरी साधना रहे लोग। ई फिल्म कृष्ण चोपड़ा आ ऋषिकेश मुखर्जी मिल के निर्देशित कइले रहे लोग। प्रेमचंद के कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर एही नाम से फिल्म भी बनल 1977 में। एकर निर्देशक महान निर्देशक सत्यजीत रे रहलें। एह फिल्म के ओ साल के सर्वश्रेष्ठ फिल्म के श्रेणी में राष्ट्रीय पुरस्कार मिलल। सत्यजीत रे पर प्रेमचंद के रचना संसार के बहुत असर रहे। उ ओम पूरी अउरी स्मिता पाटील के ले के फिल्म सद्गति बनवलें। ई फिल्म भी प्रेमचंद के एही नाम के कहानी पर आधारित रहे।

भीष्म साहनी के हिन्दी सिनेमा से एगो रिश्ता रहे, हालांकि हिन्दी सिनेमा से ना जुडलें बाकिर उनके भाई बलराज साहनी हिन्दी के एगो प्रतिष्ठित अउरी सफलतम कलाकार मानल जालें। भीष्म साहनी के कई गो नाटक के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रस्तुति भइल। उनके लिखल स्क्रीनप्ले पर चर्चित टीवी शो तमस बनल। भगवती चरण वर्मा के लिखल चित्रलेखा हिन्दी के बड़ उपन्यास ह, ओ पर किदार शर्मा 1941 अउरी 1964 में दू बार हिन्दी फिल्म बनवलें अउरी दुनू सफल भइल। फणीश्वर नाथ रेणू के हिन्दी साहित्य में एगो बड़ साहित्यकार के दर्जा मिलल बा। उनके लिखल कहानी मारे गए गुलफाम पर आधारित फिल्म तीसरी कसम बनल जवन हिन्दी सिनेमा के क्लासिक फिल्म मानल जाले। एह फिल्म के निर्माता गीतकार शैलेन्द्र रहलें। 1978 के सफलतम फिल्म में से एक ‘पति पत्नी और वो; कमलेश्वर के लिखल कहानी पर रहे। उहे एह फिल्म के स्क्रीनप्ले भी लिखलें।

अउर भी कई गो बड़ फिल्मन के नाम बा जवन हिन्दी साहित्य के बड़ कृतियन पर बनल बा।

 

 

 

 

 

 

 


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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min3020

शशि प्रेमदेव

एही धरती का कवनो कोना में एगो देस रहे। ओह् देस में एगो नगर रहे — तमाम छोट-बड़  मकान-दोकान से भरल-पूरल। आ ओही मकानन-दोकानन का बीच से बहत रहे एगो उदास नदी। कुछ आबादी नदी के एह् पार। कुछ ओह पार।

नगर का ओह पार वाला हिस्सा में एगो परम पावन इमारत रहे। ओह इमारत में वइसे तs रोजे कुछ लोगन कs आवा-जाही रहे बाकिर हर हफ्ता जुमा (शुक्रवार) का दीने उहंवां एकही किसिम के भेसभूसा वालन क भीड़-भाड़ खास तौर पर दिखाई देव।

एह इमारत कs- जहवां जुटे वालन में एकहू औरत जात कब्बो ना लउके- सबसे बड़का अदिमी के उनकर समर्थक लोग ‘मौलाना’ कहि के पुकारत रहे।

संजोग से नदी के एह पार भी एगो परम पावन इमारत मौजूद रहे — तनी भिन्न किसिम कs ! बाकिर उहंवां जुमा के ना, अकसरहा मंगर आ सनीचर का दिने लोग जुटत रहलन- एके लेखा भेसभूसा में ना, मनचाहा भेसभूसा में! आ खलिसा नरे ना, नारी लोग भी !

एह इमारत क सबसे पूजनीय अदिमी के केहू ‘स्वामी जी’ तs केहू ‘महातमा जी’ कहि के पुकारत रहे।

ओही नगर में एगो ढींठ परिंदो क वजूद रहे। ओह परिंदा के जेतना मनोरंजक एह इमारत का भीतर होखे वाला प्रवचन लागत रहे, ओतने मजेदार ओह इमारत का भीतर होखे वाला प्रवचन ! जब-जब ओकरा के मन बहलावे कs कवनो दोसर जोगाड़ ना भेंटाव, ऊ कब्बो एह पार वाली इमारत पर जाके बइठि जाव, कब्बो ओह पार वाली इमारत पर …

एक दिन क बाति हs । परिंदा जसहीं ओह पार वाली इमारत के छरदेवाली पर जाके बइठल, मौलाना साहेब क गूंजत आवाज ओकरा कान में परल — ” हजरात ! हमारा मज़हब सबसे महान है … इंशाअल्लाह एक दिन सारी कायनात में सिर्फ़ हमीं होंगे … ग़ैर मज़हब वाले इन दिनों ख़ुद ब ख़ुद हमारे मज़हब की तरफ़ खींचे चले आ रहे हैं … कुछ दिनों पहले हमें पंजाब में एक बंदा मिला जिसने हाल ही में इस्लाम अपनाया था … जब मैंने उससे इसकी वज़ह जानना चाहा, तो उसने बताया कि उसकी जवान बहन मर गई थी … जब चिता पर उसे जलाया जा रहा था, तो यह देखकर उसे बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई कि कफ़न के जलते ही उसकी बहन का जवान जिस्म नंगा हो गया और आस-पास खड़े लोग उसे फटी आंखों से निहार रहे थे… इसलिए उसने वहीं तय कर लिया कि ऐसे बकवास धर्म से आइंदा कोई वास्ता नहीं रक्खेगा जिसमें पर्दानशीं बहन-बेटियों की लाशें इस शर्मनाक तरीके से जलायी जाती हों.”

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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min3150

प्रो. (डॉ.) जयकान्त सिंह जय

‘ भाषा ‘ के ‘ भासा ‘ लिखल देख के बिदकी जन। भोजपुरी के उचारन के दिसाईं इहे सही बा। भोजपुरी में भाषा के भासा बोलल आ लिखल जाला। काहे कि ई बैदिक परम्परा से आइल देसी प्राकृत भासा ह। प्राकृत मतलब बोले भा उचारे के प्रकृति आ प्रवृत्ति के हिसाब से लिखाए वाली ना, लिखाए वाला भासा। कवनो भासा में लिंगो ओह भासा-भासी जनसमूह के बेवहार से तय होला जइसे-संस्कृत के पुलिंग ‘आत्मा’ हिन्दी में स्त्रीलिंग हो जाला। हिन्दी के स्त्रीलिंग ‘चर्चा’ आ ‘धारा’ उर्दू में पुलिंग हो जाला। खैर, इहाँ बात होत रहल ह भाषा आ भासा के, त ऋग्बेद के 7/7/4 आ 8/23/5 में ‘अभिख्या भासा बृहदा ‘ क के प्रयोग भइल बा आ भाषा चाहे भासा ‘ भाष् ‘ चाहे ‘ भास् ‘ धातु से बनल बा। जवना के अर्थ होला- ब्यक्त वाक् मतलब समुझे-बूझे जोग बोलल। संस्कृतो में लिखल बा कि ‘ भास् व्यक्तायां वाचि।’ एह से भोजपुरी में भाषा के भासा चली। अइसहूं भोजपुरी के उचारन में अकसरहाँ जुड़वा ब्यंजन के बेवहार ना होला चाहे होइबो करेला त संस्कृत आ हिन्दी के प्रभाव से होला, ओही तरह से भोजपुरी में  ण, श आ ष के जगे न, स आ ख के उचारन होला। जवना के बारे में आगे बात राखल जाई। अबहीं असली मुद्दा मातृभासा के बा।

भोजपुरी हमार मातृभासा ह, मात्र भासा ना ह। मातृभासा मतलब हमरा आ हमरा मतारी द्वारा अपनावल हमरा पैतृक परिवार आ पड़ोस के कम से कम तीन-चार पीढ़ी के पारंपरिक संस्कार-पारिवारिक बेवहार के भासा। हमरा जिनगी के ऊ पहिल भासा,जवन हम अपना मतारी के गर्भ में पलात-पोसात छठे-सतवाँ महीना से सुभद्रा के अभिमन्यु जइसन महसूसे लगनीं आ जनम लिहला के बाद मतारी आ परिवार-पड़ोस के गोदी में तुतरात ‘तूती’ के रूप में पाके अबोध से सबोध भइनीं। सबोध भइला के बाद जिनगी के ओही पहिल भासा के जरिए आगे के जीवन सुखमय जीये खातिर आउर-आउर भासा के सिखनीं, पढ़नीं, लिखनीं आ अपनवनीं। एह तरह से बाद के अरजल हर उपयोगी भासा के मातृभासा भइल हमार भोजपुरी। एह तरह से हमरा खातिर भोजपुरी भासा हमरा अरजल हिन्दी, संस्कृत, अंगरेजी आदि हर भासा के मातृभासा बा।

साँच कहीं त पुरान भारतीय वाङ्मय में ‘ मातृभासा ‘ जइसन कवनो सब्द नइखे। ई अंगरेजी का ‘मदरटंग’ के हिन्दी अनुबाद ह। ऋग्वेद का एगो ऋचा में कहल गइल बा – ‘ इला सरस्वती मही तिस्त्रो देवीर्मयोभुव:। ‘ पच्छिम के बिद्वान एकर अंगरेजी में उल्था कइलें – ‘ वन शुड रेस्पेक्ट हिज मदरलैंड, हिज कल्चर एंड हिज मदरटंग, बिकौज दे आर गिभर्स ऑफ हैप्पिनेस।’ ( One should respect his motherland, his culture and his mothertongue, because they are givers of happiness.

एह अनुबाद में ‘ सरस्वती ‘ मतलब ‘ बानी ‘ खातिर ‘ मदरटंग ‘ माने मातृभासा सब्द के पहिला बेर प्रयोग भइल। बच्चा का मतारी के भासा के मातृभासा कहल गइल। जवना से कई गो सवाल खड़ा हो गइल; जइसे- जदि बच्चा के जनम देते ओकरा मतारी के मृत्यु हो जाए तब ओह बच्चा के मातृभासा का होई?, बच्चा का मतारी के मातृभासा ओकरा बिआह के पहिले ससुरार का परम्परागत पारिवारिक भासा से अलग होखी तब ओह बच्चा के मातृभासा का होई? आदि। तब पच्छिम के भासाविद् लोग कहल कि बच्चा के मतारी, बाप सहित ओकरा परिवार आ पड़ोस के परम्परागत बेवहारिक बोली भा भासा के ही ओह बच्चा के पहिल भासा, निज भासा, स्वभासा भा मातृभासा कहल जाई। जवना में ऊ बच्चा तुतरात अबोध से सबोध होखी आ ओही सीखल-अरजल पहिल पारिवारिक भासा के माध्यम से जीवन-जगत से जुड़ल जानकारी अउर दोसर भासा सबके बोले, पढ़े आ लिखे के काबिल बनेला। एह से ओह बच्चा के उहे परम्परागत पारिवारिक भासा ओकर मातृभासा कहाई। एकर पच्छिम के बिद्वान लोग अंगरेजी में कहल- ” द टर्म ‘ मदरटंग ‘ शुड बी इंटरप्रेटेड टू मीन दैट इज दि लैंग्वेज ऑफ वन्स मदर। इन सम पैटर्नल सोसाइटीज, दि वाइफ मूव्स इन विथ द हस्बैंड एंड दस मेय हैव ए डिफरेंट फर्स्ट लैंग्वेज, ऑर डायलेक्ट, दैन द लोकल लैंग्वेज ऑफ द हस्बैंड, येट देयर चिल्ड्रेन यूजुअली वनली एस्पीक देयर लोकल लैंग्वेज। ऑनली ए फ्यू विल लर्न टू एस्पीक मदर्स लैंग्वेज लाइक नैटिव्स। मदर इन दिस कन्टेक्स्ट प्रोबेब्ली ओरिजनेटेड  फ्रौम द डिफिनिशन ऑफ मदर एज सोर्स, ऑर ओरिजिन; एज इन मदर कन्ट्री ऑर लैंड।—— इन द वर्डिंग ऑफ द कोस्चन ऑन मदरटंग, द एक्सप्रेसन ‘ एट होम ‘ वाज एडेड टू एस्पेसिफाई द कान्टेक्स्ट इन विथ द इंडिविजुअल लर्न्ड द लैंग्वेज।”

 

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ज्योत्स्ना प्रसाद

जन्मतिथि- 19 अक्टूबर 1927        पुण्यतिथि- 31 दिसम्बर 1989

‘अपि स्वर्णमयी लङ्का न में लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । । ’

ई कथन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के ह। एह कथन से ही ई बात प्रमाणित हो जाता कि सनातन धर्म आ भारतीय परम्परा में माता के केतना ऊँचा स्थान बा? बाकिर एकर अर्थ ई ना भइल कि माता के महत्त्व के कवनों धर्म-विशेष के चौहद्दी में बाँध के देखल जाव।  काहेकि प्राय: हर धर्म में माता के स्थान बहुत ऊँचा बा। मुस्लिम परम्परा में भी मानल जाला- ‘माँ के क़दमों के नीचे है जन्नत। ’ वइसे ही मरियम के बिना यीशु मसीह के कल्पना ही ना कइल जा सकेला। एह से हर धर्म में ही ना बल्कि जीव-जन्तु में भी अपना माता के प्रति विशेष लगाव देखल जाला। आखिर केहू के अपना माता के प्रति लगाव रहे काहे ना ? माता ही ऊ माध्यम हई जे ईश्वर-अंश के अपना गर्भ में धारण करेली, ओह अंश के कष्ट सहके भी शरीर प्रदान करेली। ओकरा दु:ख-सुख में शामिल होली। एह से कवनों बच्चा अपना सुख में महतारी के इयाद करे चाहे ना लेकिन दु:ख के छाया पड़ते ऊ सबसे पहिले अपना माई के ही इयाद करेला। एही से त महतारी के भगवान के दूसरा रूप भी कहल जाला।

हम अपना माई के अम्मा कहत रहनी। हमरा अम्मा शैलजा कुमारी श्रीवास्तव (जन्म- 19 अक्टूबर 1927- मृत्यु- 31 दिसम्बर 1989) के जन्म पिलुई, दाउदपुर, सारण (बिहार) के एगो सम्पन्न, शिक्षित आ प्रतिष्ठित परिवार में भइल रहे। उहाँ के प्रारम्भिक शिक्षा अपना गाँव में यानी पिलुई में ही भइल रहे जबकि माध्यमिक शिक्षा सीवान से भइल। चूँकि शैलजा जी के परिवार पढ़ल-लिखल रहे, उहाँ के बाबूजी उर्दू-फारसी-अरबी के शायर आ विद्वाने भर ना रहनी स्वयं एम. ए., एल. एल. बी. भी कइले रहनीं। एह से अपना बेटी के उच्च शिक्षा देबे खातिर उहाँ के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस भेजनीं। जहाँ से शैलजा जी स्नातक कइनीं आ साहित्याचार्य के परीक्षा-बिहार संस्कृत समिति से स्वर्ण पदक के साथे उत्तीर्ण कइनीं। जवना के बाद ही शैलजा जी दिघवलिया (सीवान) निवासी रसिक बिहारी शरण (एम. ए., एल. एल. बी.) के चौथा लड़िका (पाँचवीं संतान) श्री महेन्द्र कुमार (एम. ए., एम. काम., डीप. एड.) से परिणय-सूत्र में बँध गइनीं। बाकिर अपना शादी के बाद भी उहाँ के आपन पढ़ाई जारी रखते हुए पटना विश्वविद्यालय से डिप-एड कइनीं आ बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से संस्कृत में एम. ए. कइनीं।

शैलजा जी बिहार में शिक्षा विभाग के विभिन्न पदन के शोभा बढ़ावत अंत मे प्राचार्या, महिला प्रा० शिक्षक शिक्षा-महाविद्यालय, सीवान के साथे-साथे जिला विद्यालय निरीक्षिका, सारण-सह-सीवान एवं गोपालगंज के पद से 31-10-85 के सेवनिवृत्त हो गइनीं। शैलजा जी अपना घर-गृहस्ती आ नौकरी के साथे-साथे साहित्य-सेवा में भी सदा सक्रिय रहत रहनीं।  एकर प्रमाण ई बा कि सन् 1970 में उहाँ के पुरनका सारण जिला भोजपुरी साहित्य-सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष रहनीं त सन् 1972 में कानपुर भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में सचिव के पद पर चयनित भइनीं। सन् 1977 में उहाँ के अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के तिसरका अधिवेशन सीवान में स्वागत-समिति के संयुक्त सचिव के पद पर चयनित भइनीं। ऊहई उहाँ के अ. भा. भो. महिला साहित्य सम्मेलन 1977 के स्वागत मंत्री के पद के शोभा भी बढ़वनीं। सन् 1981 में तिसरका जिला महिला भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षता कइनीं।

शैलजा जी के साहित्य-सेवा के मद्दे नज़र उहाँ के सन् 1984 में साहित्य संचेतना द्वारा सम्मानित कइल गइल रहे। सन् 1990 में भोजपुरी निबन्ध संग्रह ‘चिन्तन कुसुम’ पर अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन द्वारा चित्रलेखा पुरस्कार से मरणोपरांत उहाँ के पुरस्कृत कइल गइल।

चिन्तन कुसुम (भोजपुरी निबन्ध संग्रह, 1981) के अलावा उहाँ के दू गो अउर प्रकाशित किताब लोकप्रिय भइल – कादम्बरी (वाणभट्ट के ‘कादम्बरी’ पर आधारित भोजपुरी में लिखल कथा, 2003) आ श्रद्धा-सुमन (भोजपुरी-हिन्दी-उर्दू कविता संकलन, 2016)।

गोरा रंग, मध्यम कद-काठी, सिन्दूर से भरल मांग, माथा पर बिंदी, कमर के नीचे तक लटकत एगो लम्बा चोटी या कभी जुड़ा बनवले, सिल्क या सूती साड़ी में सीधा पल्ला कइले शैलजा जी के देखते कोई सहज ही समझ सकत रहे कि उहाँ के सादगी के प्रतीक हईं।

शैलजा जी बचपन से ही प्रखर बुद्धि के रहनीं। उहाँ के मिडिल स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा में भी विशेषता के साथे उत्तीर्ण भइल रहनीं। पारिवारिक माहौल भी साहित्यिक रहे। बाकिर सीवान में ओह समय चूँकि लड़कियन के स्कूल ना रहे। एह से बुझाइल कि उहाँ के पढ़ाई में व्यवधान आ जाई। बाकिर अइसन भइल ना। काहेकि उहाँ के 1934 में डी.ए. वी. स्कूल सीवान में नाम लिखा गइल। शैलजा जी के कविता लिखे के क्षमता के एहसास पहिला बेर एही स्कूल में भइल। जब स्कूल में नशाखोरी के रोके खातिर कविता बनावे के छात्र-छात्रा से कहल गइल। शैलजा जी अपना ओही उमिर में जे कविता लिखनी ओकर बानगी देखीं-

ताड़ी दारू गाँजा भाँग पिअला के फल इहे, घरवा में खरची ना देहिया पर लुगवा

नाहीं जो तूँ मनब पिअल नाहीं छोड़ब त, उड़ि जइहें देह रूपी पिंजड़ा से सुगवा

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डॉ. ब्रजभूषण मिश्र

” भोजपुरी साहित्य के गौरव ” स्तम्भ में दिवंगत साहित्य सेवियन के संक्षिप्त परिचय के सिलसिला पीछला कई अंकन से जारी बा। अब तक निम्नलिखित 93 गो दिवंगत साहित्यकारन के संक्षिप्त परिचय रउरा पढ़ चुकल बानी। ओह 93 गो साहित्यकार लोगन के लिस्ट पढ़ीं आ फेर आगे बढ़ीं। – संपादक

अंक 11 में –    

1- महापंडित राहुल सांकृत्यायन

2- दूधनाथ उपाध्याय

3- महिन्दर मिसिर

4- रघुवीर नारायण

5- भिखारी ठाकुर

6- मनोरंजन प्रसाद सिंहभाग

7- महेन्द्र शास्त्री

8- दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह ‘ नाथ ‘

9- राम विचार पांडेय

10- डॉ. उदय नारायण तिवारी

11- धरीक्षण मिश्र

अंक 12 में

12-  प्रसिद्ध नारायण सिंह

13- रघुवंश नारायण सिंह

14- राम बचन द्विवेदी ‘ अरविंद ‘

15- डॉ. कमला प्रसाद मिश्र ‘ विप्र ‘

16 -शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी

17- हवलदार त्रिपाठी ‘ सहृदय’

18- डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय

19- विश्वनाथ प्रसाद ‘ शैदा’

20- पांडेय नर्मदेश्वर सहाय

21- कुलदीप नारायण राय ‘ झड़प’

22- पं. गणेश चौबे

अंक 13 में

23 – डॉ.स्वामी नाथ सिंह

24- राघव शरण मिश्र ‘ मुँहदूबर ‘

25- जगदीश ओझा ‘ सुन्दर ‘

26- रामनाथ पाठक ‘ प्रणयी ‘

27- मोती बी ए

28- महेश्वराचार्य

29- ईश्वर चंद्र सिन्हा

30- रामनाथ पांडेय

31- राधा मोहन राधेश

32- हरेन्द्रदेव नारायण

33- मास्टर अजीज

अंक 14 में

34- पांडेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह

35- बिसराम

36- भुवनेश्वर प्र. श्रीवास्तव ‘ भानु’

37- बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव ‘ ढीबरी लाल’

38- रुद्र काशिकेय / गुरु बनारसी

39- श्याम बिहारी तिवारी ‘ देहाती ‘

40- रामदेव द्विवेदी ‘अलमस्त ‘

41- राहगीर

42- दूधनाथ शर्मा  ‘ श्याम ‘

43-  दंडी स्वामी विमलानंद ‘ सरस्वती ‘

44- राम बचन लाल श्रीवास्तव

अंक 15 में – ( भोजपुरी जंक्शन – अंक 1 )

45- कुंज बिहारी  ‘ कुंजन ‘

46- प्रभुनाथ मिश्र

47- रामजियावन दास ‘ बावला ‘

48- सिपाही सिंह ‘ श्रीमंत ‘

49- डॉ. विवेकी  राय

50- भोला नाथ गहमरी

51- अविनाश चंद्र ‘ विद्यार्थी ’

52- प्रो. सतीश्वर सहाय वर्मा  ‘ सतीश ‘

53- डॉ. बसंत कुमार

54- अर्जुन सिंह ‘अशांत ‘

55- अनिरुद्ध

अंक 21 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 7 )

56- सन्त कुमार वर्मा

57- रमाकांत द्विवेदी ‘रमता

58- डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘ बेसुध ‘ उर्फ चतुरी चाचा

59-  पद्मश्री रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ उर्फ लोहा सिंह

60- प्राचार्य विश्वनाथ सिंह

61- पद्मभूषण विद्यानिवास मिश्र

62- डॉ. जितराम पाठक

अंक 22 में – ( भोजपुरी जंक्शन अंक 8 )

63- रमेश चंद्र झा

64- गौरीशंकर मिश्र ‘ मुक्त ‘

65- प्राध्यापक अचल

66- पं. नर्मदेश्वर चतुर्वेदी

67- शारदानंद प्रसाद :

68- उमाकांत वर्मा

69- अक्षयवर दीक्षित

70- पांडेय कपिल

अंक 31 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 17 )

71- रामजी सिंह ‘ मुखिया ‘

72- विन्ध्याचल प्रसाद श्रीवास्तव

73- डॉ. अनिल कुमार राय ‘ आंजनेय ‘

74- डॉ. धीरेन्द्र बहादुर ‘ चाँद ‘

75- डॉ. विश्वरंजन

76- नरेन्द्र रस्तोगी ‘ मशरक ‘

77- नरेन्द्र शास्त्री

अंक 32 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक 18 )

78- डॉ. रसिक बिहारी ओझा ‘ निर्भीक ‘

79- परमेश्वर दूबे शाहाबादी

80- राधा मोहन चौबे ‘ अंजन ‘

81- गणेश दत्त ‘ किरण ‘

82- डॉ. प्रभुनाथ सिंह

83- गिरिजा शंकर राय  ‘ गिरिजेश ‘

84- चंद्रशेखर मिश्र

85- पशुपति नाथ सिंह

अंक 40 में ( भोजपुरी जंक्शन अंक  )

86- रामजी पांडेय अकेला
87- कैलाश गौतम

88- कुबेरनाथ मिश्र ‘ विचित्र ‘

89- प्रो. ब्रजकिशोर

90- जगन्नाथ

91- हरि शंकर वर्मा

92- डॉ० बच्चन पाठक सलिल
93- जमादार भाई

 

अब आगे पढ़ीं —

 94- बालेश्वर राम यादव

बालेश्वर राम यादव के जनम उ. प्र. के बलिया जिला के जगदेवाँ गाँव में 05 दिसम्बर, 1937 ई. के भइल रहे आ निधन 17 सितम्बर,1917 ई. के रायरंगपुर, उड़िसा में हो गइल। इहाँ के पिताजी के नाम शिव बालक यादव आ माता के नाम तेतरी देवी रहे। परिवार गोपालक रहे आ उहे विरासत में बालेश्वर जी का मिलल रहे। मगर रुचि पढ़ाई में रहे। बालेश्वर राम जी के पिता जमशेदपुर में खटाल चलावत रहीं आ दूध के कारोबार करत रहीं। मैट्रिक पास कइला के बाद आगे के पढ़ाई खातिर बालेश्वर राम जी जमशेदपुर चल अइनी। जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज से बी. ए. कइनी आ रॉची विश्वविद्यालय, रॉची से हिंदी में एम. ए. कइलीं। उहाँ का बी. एड. भी कइलीं। काव्यलोक, जमशेदपुर नाम के संस्था उहाँ के मानद ‘ विद्यालंकार’ के उपाधि देले रहे। पढ़ाई-लिखाई के बाद जमशेदपुर के अंगरेजी इसकूलन में हिन्दी शिक्षक रूप में कार्य कइनी। राउर विवाह उड़िसा के रायरंगपुर के आस पास रामदुलारी जी से भइल। ओकरा बाद सरकार का रायरंगपुर के ब्वायज हाई इसकूल में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गइल, जहाँ से 1995 ई. में सेवा निवृत्त भइनी। जहाँ तक साहित्यिक रुचि के सवाल बा, ऊ हाई इसकूल में पढ़त खानी रामचरित मानस पढ़ला आ गाँव में दस बेर ओकर पाठ करके सुनवला से जागल। अपने के आवाज़ अतना सुरीला रहे कि लोग मोहा जात रहे। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना आ गठन के पाछे राउर एही सुकंठ गायकी के कमाल रहे। को-ऑपरेटिव कॉलेज के कैम्पस में 1955 ई. में डॉ. बच्चन पाठक सलिल सहित अउर संहतिया लोग के बीचे बालेश्वरराम जी के आवाज़ गूँजत रहे – ‘मोरे पिछुअरवा सिरिसिया के गछिया, झहर-झहर करे पात कि निंदियो ना आवे हो राम ‘। ई आवाज़ कॉलेज के भोजपुरिया अध्यापक डॉ. सत्यदेव ओझा आ मेजर चंद्रभूषण सिन्हा के कान में पड़ल आ भोजपुरी साहित्य परिषद के असथापना भइल, जवना के महासचिव डॉ सलिल बनावल गइलीं आ बालेश्वर राम जी सचिव। भोजपुरी हिंदी में लिखल पढ़ल जारी रहल। भोजपुरी में तीन गो किताब छपल  —  ‘ भोजपुर के रतन ‘ ( गीत संग्रह, 1957 ई.),       ‘गाँव के माटी ‘ ( उपन्यास , 1973 ई. ) आ ‘ कृष्ण चरित पीयूष ‘ ( महाकाव्य , 2011ई. )।  पत्नी रामदुलारी यादव के अनुरोध पर ‘महाभागवत पुराण ‘ के कथा के भोजपुरी भाषा मे दोहा – चौपाई – सोरठा में छंदबद्ध करत ‘ कृष्णचरित पीयूष ‘ महाकाव्य रचाइल। हिंदी में  ‘ मेरी लाली ‘ (1997 ई. ) आध्यात्मिक गीत संग्रह बा। दू गो हिंदी पत्रिका- ‘ पुष्पांजलि ‘ आ ‘ तरंग ‘ रायरंगपुर से संपादित करत रहलीं। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद आ ललित कला मंच ( रायरंगपुर ) से सम्बद्ध रहलीं। भोजपुरी समाज, बिष्टुपुर, जमशेदपुर; जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद ; गुरुमंच, विद्यालय परिवार, रायरंगपुर आ ललित कला मंच, रायरंगपुर अपने के सम्मानित कइलस।

 

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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min2990

आर.के. सिन्हा

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जा के बाद भयंकर हाहाकार मचल बा। उहाँ सरेआम कत्लेआम चालू बा। नतीजा, ज्यादातर स्थानीय अफगानी नागरिक भी कहीं अउर जाके बसे के चाह रहल बा। उनका अफगानिस्तान में अब अपना बीबी बच्चन के साथे एक मिनट भी रहल सही नइखे लागत। अफगानिस्तान से बहुत सारा हिन्दू-सिख समुदाय के लोग भारत आ रहल बा। उनका इहाँ पर सम्मान के साथ शरण भी मिल रहल बा। पर अफगानिस्तान के मुसलमानन के इस्लामिक देश अपना इहाँ शरण देवे खातिर आगे नइखे आवत। सब केहू ये लोग के अपना इहाँ शरण देवे या शरणार्थी के रूप में जगह देवे से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से मना कर देले बा। दुनिया के इस्लामिक देशन के अपना के नेता माने वाला पाकिस्तान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरत, तुर्की आ बहरीन जइसन देश या त चुप हो गइल ह या फिर ऊ लोग अपना अफगानिस्तान से लागे वाली सरहदन के ज्यादा मजबूती से घेर लेले बा। चौकसी बढ़ा दिहले बा ताकि कोई घुसपैठ ना कर सके। ले-दे के सिर्फ शिया बहुल ईरान ही ये अफगानियन खातिर आगे आइल बा। इहाँ पहिले से ही लगभग साढ़े तीस लाख सुन्नी अफगानी शरणार्थी रहेला। ईरान के तीन तरफ से सीमा अफगानिस्तान से मिलेला। शिया शासित ईरान के भारी संख्या में सुन्नी शरणार्थियन के शरण देहल वाकई काबिले तारीफ बाI

अफगानिस्तान संकट में धूर्त पड़ोसी पाकिस्तान के काला चेहरा खुल के सामने आ रहल बा। ऊ अपना अफगानिस्तान से लागल सरहदन पर सेना के तैनात कर देले बा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कह रहल बाड़े कि हमरा इहाँ त पहिलहीं से लाखन अफगानिस्तानी शरणार्थी बाड़ें। हम अब अउर ना लेम। त फेर पाकिस्तान अपना के सारी दुनिया के मुसलमानन के रहनुमा काहे मानता। अफगानिस्तान संकट के बहाने पाकिस्तान के दोहरा चरित्र के समझल आसान होई। पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के मुसलमानन के हक खातिर सारी दुनिया के मुसलमानन के आये दिन खुल के आह्वान करत रहेला। ऊ संयुक्त राष्ट्र से ले के तमाम अन्य मंचन पर भारत के घेरे के भी नाकाम कोशिश करेला। लेकिन पाकिस्तान ई त बताओ कि उ अफगानिस्तान के मुसलमानन के अपना इहाँ शरण काहे नइखे देत? का कुछ हजार मुसलमानन के अउर आ जाए से पाकिस्तान में भुखमरी के हालात पैदा हो जाई?

पाकिस्तान त बांग्लादेश में रहे वाला अपना बेसहारा उर्दू भाषी बिहारी मुसलमान नागरिकन के भी अपना इहाँ लेवे के तैयार नइखे जे 1971 के बांग्ला देश आजादी के लड़ाई में पाकिस्तानी सेना के खुल के साथ दिहले रहे आ अभी शरणार्थी कैंपन में आपन जिंदगी काट रहल बा। पाकिस्तान के मालूम बा कि सिर्फ ढाका में एक लाख से अधिक बिहारी मुसलमान शरणार्थी कैम्पन में नारकीय जिंदगी गुजार रहल बाड़ें। बिहारी मुसलमान 1947 में देश के बंटवारे के वक्त पाकिस्तान चल गइल रहलें। जब तक बांग्लादेश ना बनल रहे तब तक त इनका कवनों दिक्कत ना रहे। पर बांग्लादेश बनते बंगाली मुसलमान बिहारी मुसलमानन के आपन जानी दुश्मन माने लागल। वजह ई रहे कि बिहारी मुसलमान तब पाकिस्तान सेना के खुल के साथ देत रहे जब पाकिस्तानी फौज पूर्वी पाकिस्तान में बंगालियन के ऊपर कत्लेआम मचावत रहे। इयाद करीं कि बिहारी मुसलमान ना चाहत रहे कि पाकिस्तान कभी भी बंटे।

ई लोग 1971 में मुक्ति वाहिनी के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सेना के खुल के साथ देले रहे। तब से ही इनका के बांग्लादेश के आम लोगन द्वारा नफरत के निगाह से देखल जाला। ओइसे ई बांग्लादेश में अभी भी लाखन के संख्या में बाड़ें अउर नारकीय यातना सहे के मजबूर बाड़ें। ई लोग पाकिस्तान जाए के भी चाहेला। पर पाकिस्तान सरकार ये लोग के अपना देश में लेवे के कत्तई तैयार नइखे। जरा सोंची कि कवनों जब देश अपनही देशभक्त नागरिकन के लेवे से मना कर दे। ई घटियापन पाकिस्तान ही कर सकेला। चीन में प्रताड़ित कइल जा रहल मुसलमानन के दर्द भी ओकरा सुनाई नइखे देत।

जब भारत धारा 370 के खतम कइलस त तुर्की अउर मलेशिया भी पाकिस्तान के साथ सुर में सुर मिलाके बात करत रहे। ऊ लोग भारत के निंदा भी करत रहे। मलेशिया के तब के राष्ट्रपति महातिर मोहम्मद कहत रहले, हम ई देख के दुखी बानी कि जवन भारत अपना के सेक्युलर देश होखे के दावा करेला, ऊ कुछ मुसलमानन के नागरिकता छीने खातिर क़दम उठा रहल बा। अगर हम अपना देश में अइसन करीं, त हमरा पता नइखे कि का होई? हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री आ अस्थिरता होई आ हर कोई प्रभावित होई। महातिर एक तरह से अपना देश के लगभग 30 लाख भारतवंशियन के खुल के चेतावनी भी देत रहले। ई दुनू देश पाकिस्तान के कहला पर संयुक्त रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलत रहे। पर ई दुनू मुल्क भी अफगानियन के अपना इहाँ रखे खातिर तइयार नइखे। अब इनका इस्लामिक प्रेम के हवा निकल गइल।

दुनिया भर में फइलल 57 इस्लामिक देशन के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के ईरान के छोड़ शेष सदस्य अपना तरफ से अफगानिस्तान के शरणार्थियन के हक में मानवीय आधार पर सामने नइखे आवत। कुल मिला के अफगानिस्तान संकट ओआईसी के खोखलापन के भी उजागर कर देलेबा। ई लोग सिर्फ इजराईल आ भारत के खिलाफ ही बोले आ बयान देवे के जानेला। अगर रउआ करीब से इस्लामिक देशन के आपसी संबंध के देखेम त समझ में आ जाई कि ये सबके एकता दिखावा भर खातिर बा। इयाद करीं कि रोहिंग्या मुसलमानन के म्यांमार के सबसे करीबी पड़ोसी बांग्लादेश शरण देवे से साफ इंकार कर दिहलस। बांग्लादेश के एक मंत्री मोहम्मद शहरयार कहलन कि ई रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश के सुरक्षा खातिर गम्भीर खतरा बाड़ें। हमरा इहाँ पहिले भी कई घटना घट चुकल बा। इहे कारण बा कि हम उनका लेके सावधान बानीं।

रोहिंग्या मुसलमानन के जाने वाला बतावेलें कि ई रोहिंग्या जल्लाद से कम ना ह। ई म्यामांर में बौद्ध कन्या सबसे बलात्कार के बाद उनकर हत्या कर के उनका अतडिंयन के निकाल फेंके से भी गुरेज ना करे लोग। इनके कृत्य के इनका देश में पता चलल त म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमान के खदेड़ल जाये लागल रहे। एकरा बाद से इनके हाथ-पैर फूले लागल बा आ ई लोग बांग्लादेश आ भारत में शरण के भीख माँगे लागल। हालांकि इनका के कवनों इस्लामिक देश त सिर छिपावे के जगह ना देवे। पर भारत में इनका हक में तमाम सेक्युलरवादी सामने आवत रहल बा। एही से ही ई लोग भारत में कई राज्यन में घुस भी गइल बा। बहरहाल, बात होत रहलs ह इस्लामिक देशन के अफगान संकट के लेके बनल नीति के। अब कोई कम से कम ई मत कहे कि इस्लामिक देशन में आपस में बहुत प्रेम आ सौहार्द बा।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


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Hum BhojpuriaNovember 15, 20211min2700

अक्टूबर-नवंबर के फेस्टिवल मन्थ यानी कि पूजा-पाठ के महीना कहल जाला। नवरात्र-दशहरा से दिवाली-छठ ले पूजे-पूजा। अनुष्ठाने-अनुष्ठान। एगो आध्यात्मिक माहौल। सवाल ई बा कि ई सब खाली पूजा के रस्म-अदायगी भर बा आ कि लोग बाग पर एकर असरो बा ?

कवनो दिया में कतनो तेल होखे, कतनो घीव होखे, उ बुताइल बा त ओकर महत्व नइखे। जरते दिया के मान बा। बुताइल दिया या त फेर से जरावल जाला या विसर्जन में चल जाला।

हमरा बुझाला कि पूजा-पाठ, प्रार्थना मन के दिया के जरावे खातिर होला। मन के शोधन खातिर होला। मन के रिचार्ज करे खातिर होला। कठिन से कठिन समय में भी सकारात्मक रहे खातिर होला, संभावना खोजे खातिर होला।

प्राण यमराज के हाथ में जाये ओकरा पहिले तक अपना हाथ में ठीक से रहे के चाहीं। ठीक से माने ठीक से। अपना नियंत्रण में। एही खातिर साधना कइल जाला। परमात्मा भा प्रकृति से जुड़ल जाला। अपना इहाँ के सब पूजा-पाठ आ तीज-त्योहार के वैज्ञानिक महत्व बा। ई सब अंततः स्वास्थ्य, शांति, सकून, शक्ति, साहस, समाधान, समृद्धि आ सद्भावना प्रदान करे खातिर बनल बा। ओकरा ऐतिहासिक महत्व के एगो अलग आयाम बा।

दशहरा आ नवरात्रि में राम गूँजत रहेलें। रामलीला चलत रहेला। खुद राम के लीला अपना आप में हर समस्या के समाधान समेटले बा। राम जेतना दुख, राम जेतना परीक्षा से के गुजरल बा? मंच भा टेलीविजन के रामलीला में दुख के ग्लैमराइज कइल गइल बा। लोग के ग्लैमराइज्ड दुख, विषाद भा लड़ाई देखे में मजा आवेला बाकिर जे ओकरा के भोगले बा, जे ओह में तपल बा, ओकरा से पूछीं। शायर साहिर लुधियानवी के एगो गीत के पंक्ति बा-

जो तार से निकली है वो धुन सब ने सुनी है

जो साज़ पे गुज़री है वो किस दिल को पता है

हिन्दी-उर्दू-भोजपुरी के शायर भाई साकेत रंजन प्रवीर के एगो शेर बा –

गम सुनावे में दम निकल जाला  

हं मगर मन तनी बहल जाला

गम, दुख, पीड़ा, कष्ट, तनाव जिंदगी के हिस्सा ह। ई सब ऊर्जा के क्षीण करेला। मन के बैटरी के डाउन करेला। हमरा समझ से पूजा-पाठ, योग-अनुष्ठान, ध्यान आदि मन के चार्ज करे खातिर होला ताकि कष्ट, बीमारी, दुख आदि होखबो करे त ओकर एहसास ना होखे भा कम होखे। बाहर में कतनों हलचल होखे, अंदर (मन) शांत होखे। इहे साधना ह। साध लेला पर ई संगीत जइसन लागेला।

मनोज भावुक के एगो शेर बा –

दुखो में ढूंढ ल ना राह भावुक सुख से जीये के

दरद जब राग बन जाला त जिनगी गीत लागेला

आ साँच पूछीं त जिनगी गीते ह, बस एकरा के राग आ लय में रखे के पड़ी। समय, परिस्थिति आ कुछ राक्षसी प्रवृति के लोग रउरा के बेलय करे के कोशिश करी बाकिर साधना इहे ह कि बाहरी परिस्थिति के असर अंदर ना पड़े। मुश्किल समय भी संभावना बन जाय। दरअसल हर समस्या में एगो संभावना छुपल रहेला, बस सकारात्मक नजरिया के बात बा।

एक बार, जहां एक आदमी बेरोजगारी के रोना रोअत रहे, उहें दुसरका बेरोजगार आदमी कहलस- “ हमनी के सौभाग्यशाली बानी जा कि बेरोजगार बानी जा। बेरोजगार आदमी के पास असीम संभावना बा। उ कुछओ कर सकेला। कुछओ बन सकेला। काहे कि उ कवनो खूँटा से नइखे बंधल। बंधन मुक्त बा। जे  डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस बन गइल बा या कवनो खास प्रोफेशन से बंध गइल बा, उ बंध गइल बा। हमनी कहीं से, कुछुओ से बंधल नइखीं त हमनी खातिर आकाश खुला बा। पूरा आकाश आपन बा। कहीं उड़ सकत बानी जा। “

कहे के मतलब कि हर परिस्थिति में सकारात्मक नजरिया रखल जा सकेला। हर जगह संभावना बा। दुख, निराशा आ परेशानी जइसन कवनो चीज हइये नइखे। आत्मा के असली प्रकृति उल्लास ह। देह आ मन त बाहरी चीज ह। अध्यात्म सोच के इहाँ तक पहुंचा देला। एह साँच तक पहुँचा देला। इहाँ तक पहुंचे में पूजा-प्रार्थना, योग, ध्यान, स्वाध्याय, उपवास, व्रत आदि मदद करेला। एह सब से आत्मा के रिचार्ज करीं।

दशहरा, नवमी, दियरी-बाती आ छठ के शुभकामना के साथ

प्रणाम

मनोज भावुक



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