img1391.jpg

Hum BhojpuriaJune 7, 20211min3720

जन्मतिथि- 09 अप्रैल 1893 |  पुण्यतिथि- 14 अप्रैल 1963

लेखक- मनोज भावुक

पहिला बार जब हम जननी कि राहुल बाबा भोजपुरियो में किताब लिखले बाड़न, उहो नाटक… उहो एगो-दुगो ना, आठ गो त विश्वासे ना भइल। राहुल बाबा माने महापंडित राहुल सांकृत्यायन।

बात 1996 के ह। तब हम बिहार आर्ट थियेटर, कालिदास रंगालय, पटना में नाट्यकला डिप्लोमा के छात्र रहीं। चुकि लेखन में भी रुचि रहे त नाटक में शोध करे लगनी। स्पेशली भोजपुरी नाटक में, जवन दू साल बाद भोजपुरी अकादमी पटना के पत्रिका में एगो लमहर लेख ‘ भोजपुरी नाटक के संसार ‘ के रूप में छपल। ओही शोध के दौरान ई बात पता चलल आ पता का चलल… बिहाने भइला भोजपुरी साहित्य के पर्याय गुरुवर आचार्य पाण्डेय कपिल जी से राहुल बाबा के लिखल तीन गो नाटक मिलियो गइल पढ़े खातिर- नइकी दुनिया, जोंक आ मेहरारुन के दुर्दशा। ई तीनों नाटक भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका में छप चुकल रहे।

राहुल बाबा के भोजपुरी नाटक पर त बात करबे करब। पहिले उहाँ के भोजपुरी आ भोजपुरियापन पर बात करेम। उहाँ के घुमक्कड़ी स्वभाव आ हर भाषा के जाने-सीखे के ललक आ चाव पर बात करेम। साथ हीं इहो कि आखिर 09 अप्रैल 1893 ई। में आजमगढ़ के पन्दहा गांव में जनमल केदार पाण्डेय, केदार पाण्डेय से बाबा रामोदार दास आ रामोदार दास से राहुल सांकृत्यायन कइसे बन गइलें।

बिहार के छपरा जिला में एकमा के पास एगो जगह बा परसागढ़। ‘परसागढ़’ पुरान संत प्रसादी बाबा के नाम पर बा। परसागढ़ के मठो बहुते प्राचीन हऽ। एही मठ में महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम केदार पाण्डेय से ‘बाबा रामोदार दास’ धराइल। ई कइसे भाई ?

केदार पाण्डेय से बन गइलें बाबा रामोदार दास

एकमा के प्रोफ़ेसर राजगृह सिंह बतावेनी कि परसागढ़ मठ के महंथ बाबा लक्ष्मण दास महंथ चिंतित रहत रहनी, काहे कि युवा साधु रामोदार दास के मृत्यु हो चुकल रहे आ उनके नाम से मठ के जमीन-जायदाद रहे। युवा साधु के महंथी देत समय बाबू लोग (जमींदार, परसागढ़) नाखुश हो गइल रहे। मठ के जमीन-जायदाद पर बाबू लोग मुकदमा ठोक देले रहे। मठ के जमीन-जायदाद के सुरक्षा खातिर एगो अइसन युवक के तलाश रहे, जे तेज-तर्रार अउर महंथी के काबिल होखे।

नयका मंदिर खातिर पत्थर खरीदे बाबा लक्ष्मण दास महंथ वाराणसी गइल रहनी। ओहिजा के महंथ के एगो छावनी रहे, जवना में संस्कृत के अध्यापन भी होत रहे। अचानके बाबा लक्ष्मण दास के धेयान एगो अइसन 19 वर्षीय युवक पऽ गइल जवन ओहिजा संस्कृत पढ़े आइल रहे अउर ओकरा साधु बने के मनो रहे। ऊ पंडित राजकुमार जी के माध्यम से आइल रहे। ओह युवक के नाव केदार पाण्डेय रहे अउर उ आजमगढ़ के पंदाहा के रहे वाला रहे। बाबा लक्ष्मण दास के संपर्क में आ के अउर पंडित राजकुमार के कहला पऽ केदार पाण्डेय छपरा परसागढ़ चले खातिर तइयार हो गइले। महंत जी केदार पाण्डेय के छपरा लेके अइनी आ 2 दिन रुक के तीसरा दिने एकमा होत परसागढ़ पहुंचनी। केदार पाण्डेय के मठ में ओही चबूतरा प बइठावल गइल, जवना चबूतरा पऽ रामोदार दास बइठत रहनी। एकादशी, 1912 के केदार पाण्डेय के नाम बदलके रामोदर दास कऽ दिहल गइल। शुभ मुहूर्त में वैदिक रीति से उनकर नामकरण संस्कार कइल गइल आ उनका से कहल गइल कि आज से रउरा रामोदार दास साधु हो गइनी। जमीन-जायदाद रउरे नाम से बा। ओकर देखभाल करे के होई अउर मुकदमा के सगरी कागजात रउरे देखे के होई।

परसागढ़ मठ के महंथी स्वीकार ना कइलें बाबा     

बाबा के महंथी करे के ना रहे। जमीन-जायदाद के लालच रहे ना। सब सुख-सुविधा के बावजूद  ऊ उहां से भाग के दक्षिण चल गइलन आ मठ से संबंधित स्थानन के भ्रमण करे लगलन। महंथ लक्ष्मण दास के निहोरा पर ऊ 1913, 1914, 1917 अउर 1918 में परसागढ़ आवत रहलन अउर मुकदमा के देखभाल करत रहलन। देश के पूरा तीर्थ, मठ से जुड़ल स्थानन के घूमत रहलन। आगरा में जाके 1915 में आर्य समाजी हो गइलन। एक दिन महंथ जी के तार पढ़के ऊ सर्वे के काम से मठ के जमीन के देखभाल करे खातिर परसा आ गइलन। बाकिर महंथी स्वीकार ना कइलन आ महंथ लक्ष्मण दास के मर गइला के बाद मठ में आइल भी ना के बराबर हो गइल। प्रोफ़ेसर राजगृह सिंह बतावेनी कि ओकरा बाद परसागढ़ मठ से कमे नाता रहल उहाँ के बाकिर 1993 में जब कमला जी (बाबा के पत्नी) एकमा आइल रहली त कहत रहली कि बाबा इहाँ के लोगन के खूब ईयाद करीं।

11 साल के उमिर में 8 साल के कन्या से बिआह भइल

गोबर्द्धन पाण्डेय आ कुलवन्ती देवी के संतान राहुल बाबा के लालन-पालन आ पढ़ाई कन्नौल गांव के नाना राम शरण पाठक के देखरेख में 16 साल के उमिर तक चलल। नाना अवकाशभोगी पल्टनिहा रहलन, जेकरा देश-विदेश के घुमला के अनुभव से बाबा काफी प्रभावित रहस। 11 साल के उमिर में 8 साल के कन्या से बाबा के बिआह कऽ दीहल गइल। पुरान विचार के परिवार में घर-गृहस्थी संभाले खातिर एही तरे लोग शादी-बिआह कर देत रहे। बाबा का मन में समाज का प्रति विद्रोह जागल आ उ 16 साल के उमिर में घर बार छोड़ के बनारस भाग अइलन। इहां दयानंद हाई स्कूल में संस्कृत के शिक्षा लेत रहलन। एही बीच उनकर मुलाकात लक्ष्मण बाबा से हो गइल आ उ अपना साथे ले के परसागढ़ मठ चल अइलन।

जेलो गइलें बाबा 

1921 में बिहार अइला के बाद गांधीजी के असहयोग आंदोलन के आकर्षण बढ़ल। कादो, गांधीजी के एकमा बोलावे के श्रेय बाबा के रहे। आन्दोलन में सक्रिय भइला के चलते उनका 6 महिना खातिर बक्सर जेल आ 1923 के आस-पास हजारीबाग सेंट्रल जेल में भी जाए के पड़ल। हजारीबाग सेंट्रल जेल में उ मार्क्सवाद से प्रभावित पुस्तक ‘बाइसवीं सदी’ लिखलन।

कइसे पड़ल नाम महापंडित राहुल सांकृत्यायन

बाबा 1927 में संस्कृत के अध्यापक होके लंका गइलन आ उहां 1928 में उनका ‘त्रिपिटिकाचार्य’ के उपाधि मिलल। भारत लौटला पर 1928 में काशी के पंडित लोग उनका के ‘महापंडित’ के उपाधि से सम्मानित कइल। 30 जुलाई 1930 में बाबा आर्य समाज आ कांग्रेस राजनीति के विचार त्याग के बौद्ध भिक्षु बन गइलन। एह उपलक्ष में उ आपन नाम बदल के ‘राहुल सांकृत्यायन’ रख लेहलन। बुद्धपुत्र ‘राहुल’ आ गोत्र ‘सांकृत्यायन’ मिल के राहुल सांकृत्यायन हो गइल। तब से दुनिया में इहे नाम प्रचलित भइल।

लंका से लंदन आ लंदन से रूस के यात्रा       

1932 में बौद्धधर्म के प्रचार खातिर लंका से लंदन गइलन। यूरोप के यात्रा कके 1933 में लद्दाख लौट के हिमालय, तिब्बत आ मध्य एशिया के यात्रा कइलन। तिब्बत से कई सौ के संख्या में संस्कृत, पाली, प्राकृत आ अपभ्रंश के पाण्डुलिपि लेके अइलन जवन पटना संग्रहालय में सुरक्षित बा। 1937 में लेनिनग्राड (रूस) में प्राचीन भाषा-संस्थान के अध्यापक बन के गइलन आ संस्थान के सचिव एलेना (लोला) से गंधर्व विवाह कर लेलन। 1939 में लौट के भारत अइलन आ सहजानंद सरस्वती का किसान आंदोलन का साथे जुट गइलन। 1939 में छपरा जिला (आज सिवान जिला) के अमबारी में जमींदार के खिलाफ भारत के पहिलका किसान आंदोलन के नेतृत्व कइलन जवना खातिर उनका लाठी, भाला आ जेल सभ मिलल। एशिया, यूरोप के अनेक देश के बार-बार यात्रा कके अपना अनुभव के लाभ लोग के देत रहलन। 24 माह फेर रूस रह के 1949 में राहुल जी भारत लौटलन। 1942 का आस-पास अपना निजी सचिव ‘कमला जी’ के धर्मपत्नी  का रूप में स्वीकार कइलन।

राहुल बाबा के भोजपुरी साहित्य  

राहुल बाबा 1948 में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के सभापतित्व कइलन आ लमहर लिखित भाषण दिहलन जे भोजपुरी के धरोहर बा। साथ हीं उ आठ गो नाटक भोजपुरी में लिखलन जवन 1942 ई। में छपल।

नइकी दुनिया– आजादी के बाद कइसन होई हमनी के दुनिया एह पर फोकस बा।

जोंक– मिल के मालिक, जमींदारन, साहूकारन आ अन्य समर्थ लोग कइसे कमजोर आ गरीब लोग के जोंक बन के चूसता, एही पर फोकस बा।

मेहरारुन के दुरदसा- नामे से साफ़ बा कि औरतन के शोषण के खिलाफ आवाज उठावत बा ई नाटक।

ई हमार लड़ाई जर्मनी के खिलाफ जनता के लड़े खातिर प्रेरित करे वाला नाटक।

जपनिया राछछ- जापान द्वारा कोरिया आ चीन पर अत्याचार केंद्र में बा। जापान में बढ़त वेश्यावृत्ति पर भी फोकस बा।

जरमनवा के हार निहिचय हिटलर के प्रति आक्रोश बा। ओकरा हार के कामना बा।

देस रच्छक– जापान द्वारा बमबाजी से त्रस्त वर्मावासियन के आजाद हिंद फौजियन द्वारा सेवा टहल के प्रशंसा कइल गइल बाटे एह नाटक में।

ढुनमुन नेता- कॉग्रेसी नेता के दोहरा चरित्र के उजागर करत बा इ नाटक। जमींदारी प्रथा स्क्रिप्ट के आधार बा।

दुर्भाग्यवश उनकर लिखल खाली तीन गो नाटक (मेहरारूअन के दुरदसा, नइकी दुनिया आ जोंक) उपलब्ध बा। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन पत्रिका में ई तीनों नाटक के प्रकाशन भइल बा। संस्कृत, पाली, प्राकृत से लेके हिन्दी भोजपुरी तक के दुनिया में राहुल जी समान विचार रखेवाला विद्वान रहस। लोकभाषा के विकास पर उनकर काफी जोर रहे। जहां जास उहें भाषा सीख लेस आ ओही में आपन विचार प्रचार शुरू कर देस। राहुल जी अद्भूत मस्तिष्क वाला व्यक्ति रहस। उनकर लेखन कार्य विचित्र ढंग से चलत रहे। उनका साथे बराबर टाइपिस्ट रहत रहे आ उनकर बोली आ भाषण टाइप होत रहे। अइसन विचार आ चिन्तन के धनी आदमी संसार में दुर्लभ बा।

प्रोफ़ेसर राजगृह सिंह बतावेनी कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन जमींदार लोग का व्यवहार से क्षुब्ध हो के भीष्म प्रतिज्ञा कइले रहस कि जब तक जमींदारी प्रथा के अंत ना होई हम एकमा-परसागढ़ में गोड़ ना राखब। एकर उ निर्वाहो कइलन। छपरा-सीवान आवस बाकिर एकमा ना उतरस। जब जमींदारी के अंत हो गइल त 1956 में राहुल जी के प्रतिज्ञा टूटल आ उ परसागढ़-एकमा अइलन।

राहुल जी स्वतंत्र आ स्वाभिमानी रहस। साम्यवाद में उनका आस्था रहे बाकिर हिन्दी राष्ट्रभाषा बने, एह मुद्दा पर उ 1948 से 1958 तक पार्टी (साम्यवादी) से अलग रहलन। हिन्दी के उनकर सेवा अपूर्व बा। सैकड़ो ग्रंथ कहानी, उपन्यास, इतिहास, शोधग्रंथ आदि हिन्दी में लिख के एह भाषा आ साहित्य के सम्पन्न कइलन। 1959 से 1961 तक लंका के विद्यालंकार विश्व विद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष-अध्यापक रहलन आ उहे विश्वविद्यालय उनका के डी। लिट् के उपाधि देहलस।

14 अप्रैल 1963 में उनके पार्थिव शरीर सदा खातिर एह दुनिया से चल गइल बाकिर राहुल जी के यशस्वी शरीर अमर बा। मरणोपरांत भारत सरकार से उनका ‘पद्मभूषण’ के उपाधि मिलल।


img439.jpg

Hum BhojpuriaFebruary 17, 20211min5780

  लेखक- मनोज भावुक

लोकधुन के सफल चितेरा चित्रगुप्त ना खाली भोजपुरी बलुक हिन्दी फिलिम के संगीत के भी अमर सितारा बानी। उहां के जनम 16 नवम्बर 1917 ई0 के बिहार, गोपालगंज जिला के करमैनी नाम के गांव में भइल। स्कूलिंग सिवान आ बनारस में भइल। पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए. आ साथे-साथे पत्रकारिता भी कइनीं। उहां के देश के स्वतंत्रता संग्रामों में भाग लेले रहनीं आ परचा बांटत में रंगइले हाथ पकड़इला पर एक महीना जेलो काटे के पड़ल रहे।

चित्रगुप्त जी के रूचि गीत-संगीत में बचपने से रहे। एक बार पटना में एगो विशाल जनसभा में उहां के नेहरू जी का सामने देश-भक्ति गीत गावे के मौका मिलल। नेहरू जी चित्रगुप्त जी के एतना प्रशंसा कइनीं कि चित्रगुप्त जी गायक बने के फैसला कऽ लेनी। 1945 ई. में अपना एगो छायाकार मित्र मदन सिन्हा (जे बाद में ‘इम्तिहान’ के निर्देशन कइलन) के प्रोत्साहन आ सहयोग पाके उनहीं का साथे बम्बई चल गइनीं आ आपन किस्मत आजमावे लगनीं। उहां भारतखण्डे संगीत के अध्ययन कइनीं आ बंबई में टिकल रहे खातिर लइकन के संगीत सिखावे के काम कइनीं। बाद में एगो संघतिया सर्वोत्तम बादामी के मार्फत संगीत निर्देशक श्री एस. एन. त्रिपाठी से परिचय भइल जे ओ समय ‘अभिमन्यु’ में संगीत देत रहनी। त्रिपाठी जी चित्रगुप्त जी के दू-तीन गो गीत दिहनी आ धुन बनावे के कहनी। चित्रगुप्त जी जब धुन बना के दीहनी त त्रिपाठी जी उहां पर मोहा गइनी आ उहां के अपना सहायक के रूप में रख लिहनी। एतने ना, अपना दू-तीन गो फिलिम में संगीत निर्देशक के रूप में अपना नांव के साथे चित्रगुप्त जी के नांव दीहनी।

नौजवान चित्रगुप्त जी ‘भगवान मैं तुझको खत लिखता’ आ ‘सर्दी का बुखार बुरा’ (मनचला), ‘सिंदबाद’ (सिंदबाद द सेलर), ‘ये कौन आ गया’ (शौकीन) आ ‘तेरी ऊंची-ऊंची है दुकान’ (किस्मत) जइसन गीतन से पाश्र्वगायक के रूप में अपना प्रतिभा के परिचय देनी बाकिर एस. एन. त्रिपाठी जी के सलाह मान के उहां के बाद में आपन ध्यान गायन के बजाय संगीत निर्देशन पर केन्द्रित कर देनी।

शुरुआत में उहां के धार्मिक फिलिम में ज्यादा संगीत देनी। ‘शिव भक्त’ उ पहिला फिलिम रहे, जहां से लता मंगेश्कर आ चित्रगुप्त जी के साथ शुरू भइल। उ गीत रहे ‘बार-बार नाचो’। फेर त करीब 75 गो फिलिम में लगभग 250 गीत लता जी चित्रगुप्त जी के संगीत निर्देशन में गवलीं। मोहम्मद रफी भी आपन सबसे ज्यादा गीत चित्रगुप्त जी का संगीत निर्देशन में गवनीं। एह दूनू पाश्र्वगायक का साथे चित्रगुप्त जी 1975 ई. में एगो सुपरहिट फिलिम ‘भाभी’ दीहनीं जेकर ‘ओ कारे कारे बादरा जा रे जा रे बादरा’, ‘चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना’, ‘टाई लगा के माना बन गये जनाब हीरो’, ‘चली चली रे पतंग मेरी चली रे’ आ ‘छुपा कर मेरी आंखों से, वो पूछे कौन हो जी तुम’ जइसन मधुर गीत देश भर में धूम मचा के रख देलन स।

‘भाभी’ के गीतन के जबरदस्त सफलता के बाद उहां के संगीत के लोहा मनवावे में ‘दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज एक हैं’, (इन्साफ), ‘दगा दगा वई वई वई’, आ ‘लागी छूटे ना अब तो सनम’ (काली टोपी लाल रूमाल), ‘दिल को लाख संभाला जी’ आ ‘तेरा जादू न चलेगा ओ सपेरे’ (गेस्ट हाउस), ‘तेरी दुनिया से दूर चले होके मजबूर’ (जब तक), ‘दिल का दिया जला के गया ये कौन मेरी तनहाई में’ आ ‘मुझे दर्दे दिल का पता न था मुझे आप किसलिए मिल गये’ (आकाशदीप), ‘रंग दिल की धड़कन भी लाती ही होगी’ आ ‘तेरी शोख नजर का इशारा’ (पतंग), ‘मुफ्त हुए बदनाम किसी से हाय दिल को लगा के’ (बरात), ‘दीवाने हम दीवाने तुम’ (बेजुबान), ‘महलों में रहनेवाली दिल है गरीब का’ (तेल मालिश बूट पालिश), ‘नगमा ए दिल छेड़ के होठों में क्यों दबा लिया’ आ ‘पायलवाली देख ना’ (एक-राज), ‘बांके पिया कहो दगाबाज हो’ (वर्मा रोड), ‘एक रात में दो-दो चांद खिले’ (बरखा), ‘चांद को देखो जी’ आ ‘तेरी आंखों में प्यार मैंने देख लिया’ (चांद मेरे आजा), ‘अगर दिल किसी से लगाया न होता’ (बड़ा आदमी), ‘आ जा रे मेरे प्यार के राही’ आ ‘जाग दिले दिवाना’ (ऊंचे लोग), ‘तुमने हंसी ही हंसी में क्यों दिल चुराया जवाब दो’ (घर बसा के देखो), ‘आधी ना रात को खनक गया मेंरा कंगना’ (तूफान में प्यार कहां), ‘छेड़ो न मेरी जुल्फें’ आ ‘मचलती हुई हवा में छमछम’ (गंगा की लहरें), ‘कोई बता दे दिल है जहां’ आ ‘तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो’ (मैं चुप रहूंगी) जइसन अमर गीतन के अनमोल धरोहर चित्रगुप्त जी के आम जीवन से जुड़ल संगीतकार के रूप में स्थापित क देलस। बाकिर शोहरत के ओह चकाचैंध से उहां के हमेशा वंचित राखल गइल, जवना के उहां के हकदार रहनी। एतना प्रभावशाली भइला का बावजूदो उहां के बड़ सितारा वाली बड़ फिलिम ना मिल पावल, काहे कि उहां के कवनो गिरोह भा गुट में शामिल ना रहनी। जइसे कि राजकपूर, शम्मीकपूर आ राजेन्द्र कुमार के साथ शंकर जयकिशन, दिलीप कुमार के साथ नौशाद आ देवानंद के साथ एस. डी. वर्मन।

अब बात चित्रगुप्त जी के भोजपुरी फिलिमन के। कहल जाला कि चित्रगुप्त जी के पाले लोक धुन के अपार भंडार रहे तबे नू ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के निर्माता शाहाबादी जी अपना फिलिम में संगीत निर्देशन खातिर चित्रगुप्त जी के चुननीं। गीतकार शैलेन्द्र जी का साथे चित्रगुप्त जी एह फिलिम में ‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो, सइयां से कर द मिलनवा’, ‘काहे बंसुरिया बजवलऽ’, ‘सोनवा के पिंजरा में बन्द भइल हाय राम चिरई के जियरा उदास’ जइसन हृदयस्पर्शी गीत लता आ रफी के आवाज में दीहनी, जवना के खूब लोकप्रियता मिलल। एह फिलिम के सफलता में संगीत के सबसे बड़ हाथ रहे। फेर त भोजपुरी सिनेमा में उहें के संगीत के एकछत्र राज्य हो गइल। बलम परदेसिया, हमरी दुलहिनिया, सैंया ले जा तू गवनवा, भैया दूज, बिहारी बाबू, गंगा किनारे मोरा गांव, पिया के गांव, धरती मइया, दुलहिन, गंगा कहे पुकार के, विरहिन जनम-जनम के, हमार भौजी, गोदना, पान खाए सइयां हमार, सेनुर आदि कई गो फिलिम में उहां के संगीत दीहनी।

1974 के आस-पास उहां के लकवा मार देलस आ उहां के शारीरिक रूप से बहुते कमजोर हो गइनी। करीब ढाई सौ (250) फिलिम में बारह सौ (1200) से अधिक गीतन के संगीतकार चित्रगुप्त जी जीवन के अन्तिम क्षण में भले ही संगीत के क्षेत्र में सक्रिय ना रहनी बाकिर उहां के ई संतोष रहे कि उहां के बेटा आनन्द आ मिलिंद ओह सुमधुर संगीत परम्परा के आगे बढ़ा रहल बाड़न। संजोग देखीं कि 14 जनवरी के मकर संक्रांति का दिने जब आकाश में रंग बिरंगा पतंग उड़ावल जात रहे आ पतंगे का तरे मन में एगो प्यारा सा गीत उड़ान भरत जात रहे ‘चली चली रे पतंग मेरी चली रे’…… केकरा मालूम रहे कि संगीत के आकाश पर सुरीला गीतन के पतंग उड़ावे वाला चित्रगुप्त जी ओही दिन ई संसार छोड़ देब ……. ठीक अपना गीते का तरे -‘चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना।’


download-2.jpg

Hum BhojpuriaFebruary 17, 20212min5300

  ज्योत्स्ना प्रसाद

“नौ बरस के जब हम भइलीं, विद्या पढ़न पाट पर गइलीं

वर्ष एक तक जबदल मती, लिखे ना आइल राम गती                                                                    

मन में विद्या तनिक न भावत, कुछ दिन फिरलीं गाय चरावत

भिखारी ठाकुर के विद्या आरम्भ भइल उनका नौ बरीस के भइला पर। बाकिर उनकर पढ़ाई में मन ना लागल। कहल जाला कि पूत के पाँव पालने से ही बुझाये लागेला। बाकिर जीवन के असली आनन्द त लीक से हट के चले में ही आवेला। भेड़ नाहिंन पक्तिबद्ध होके सिर झुकवले एक के पीछे एक के चलला में भला कवन आनन्द बा? एही से त प्रकृति अपना एह नियम के समय-समय पर तोड़े ले भी। ऊ भी मातृभूमि के आशीर्वाद से। अपना देश के माटी के आशीर्वाद जेकरा मिल जाला ऊ धन्य हो जालाl अपना देश के माटी के चमत्कार के त कहहीं के का बा ? एह माटी के रंग में जे रंगा गइल समझी ओकर त जिन्दगी बदल गइल। एह माटी के रंग जब केहू पर चढ़ेला त ऊ आपन रंग दिखावेला आ खूंखार डाकू भी ब्रह्मदेव के समान हो जाला-“ उल्टा नाम जपत ज़ग जाना,वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना l” एतना ही ना जब ओकर आशीर्वाद मिलेला त महामूर्ख भी महाज्ञानी बन ‘मेघदूतम्’ जइसन श्रेष्ठ कृति के रचइता बन जाला। अस्सी बरिस के उमिर में भी जवानी हिलोर मारे लागेला आ ऊ वीर कुँवर सिंह बनके दुश्मन के नाको चना चबवा देला। एही परंपरा के अगिला कड़ी रहले भिखारी ठाकुर। जेकरा लगे स्कूल-कॉलेज के कवनों डिग्री ना रहे आ ऊ भोजपुरी के शेक्सपियर कहाये लगले। काहे कि कवनों भी स्कूल-कॉलेज के पढ़ाई आदमी के डिग्री त दे देला, बाकिर विवेक- बुद्धि आ समझदारी में विस्तार खातिर अभी ले कवनों संस्था नइखे खुलल। कारण ई त हमनी के  अंदर अपने आप विकसित होला हमनी के आन्तरिक ज्ञान आ जीवन के अनुभव से। अगर अइसन ना रहित त एगो गणित के शिक्षक अपना गणित के ज्ञान के परिचय देत अपना छात्रन के लम्बाई के औसत निकाल नदी के पानी में भला काहे डूबा दित ?-“लेखा-जोखा थाहे लइका डूबले काहे ?”

भिखारी ठाकुर नाई जाति के रहले। उनकर बचपन भी एक सामान्य नाई के बच्चा नाहिंन ही बीतल। कहीं अइसन कुछ चमत्कारी उनकर व्यक्तित्व ना रहे जे उनका के सामान्य से विशेष बनावत होखे। गाँव के अपना दोस्त-साथियन नाहिंन पढ़ाई से परहेज आ गाय चरावत घूमत फिरले।

हमनी में जे भी अपना गाँव से जुड़ल बा। एह शहरी चकाचौंध के दुनिया से दूर अपना इहाँ के पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के देखले बा, ऊ एह बात के ठीक-ठीक समझ सकेला कि अपना इहाँ के सामाजिक व्यवस्था में नाई के का काम ह ? चाहे ओकर ओह समाज में का स्थान होला ? नाई अपना समाज के अभिन्न अंग ह। काहेकि ओकरा बिना कवनो सामाजिक काम संपन्न ना होला। जनेव-मुड़न, शादी-विआह में ही ना बल्कि मरला-जियला में भी पण्डित जी लोग के बाद सबसे पहिले उहे नेवताला। ई बात अलग बा कि दूनू लोगन के सम्मान में अंतर रहेला। बाकिर एकरा साथे इहो बात साँच ह कि पण्डित जी लोग त जगे-परोजन में विशेष रूप से पुछाला, बाकिर नाई लोगन के त समाज में रोजे के आना-जाना लागल रहेला। कभी केश कटावे, हजामत बनावे खातिर त कभी अपना हितयी-नतयी में कवनों शुभ-अशुभ के नेवता पेठावे खातिर।

भिखारी ठाकुर भी प्रारम्भ में अपना जीविका खातिर आपन पैतृक पेशा ही अपनवलें। ओह घड़ी सैलून के प्रचलन त रहे ना, एह से उनका अपना काम के सिलसिला में रोजे घर-घर जाये के पड़त होई। एह तरह से उनका घर-घर के कहानी से नित्य दो-चार होखे के पड़त होई। एही तरह से अपना गाँव-जवार से जुड़ल समस्या उनका दिल-दिमाग में आवत गइल होई आ अपना सुसुप्ता अवस्था में उनका दिल-दिमाग के कवनो कोना में आपन जगह बनावे लागल होई।

बिहार के धरती शस्य-श्यामला ह बाकिर ओकरा पर एतना लोगन के पेट भरे के बोझ बा कि ऊ स्वयं त्राहिमाम-त्राहिमाम करत रहेले। बिहार के जनता के सारा बोझ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीका से खेती पर ही बा। आजादी के पहिले से ही एह बोझ के कम करे के कभी कोई ठोस उपाय ना सरकार के ओर से भइल ना कोई गैर सरकारी संस्था के ओर से ही। एकर परिणाम ई भइल कि अर्थशास्त्र के अनुसार जवना के ‘छिपी बेरोजगारी’ कहल जाला ओकर शिकार हमेशा से बिहार रहल बा। जवना घर मे खर्ची के तंगी रहेला ओह घर में लड़ाई-झगड़ा बहुत होला। एही लड़ाई-झगड़ा आ भूखमरी से अपना आ अपना परिवार के बचावे खातिर बिहार से सैकड़न बरिसन से पलायन जारी बा। आजो गाड़ी में भर-भर के लोग बिहार से दोसरा-दोसरा राज्यन में जाला। ई लोग कहीं गिरमिटिया कहाइल, कहीं अप्रवासी भारतीय। कई बार त अपनही देश में ओह लोगन के अपना से ओछा समझत ‘भैया लोग’ कहल जाला। बिहारियन के ई दुरगती एह से होला काहे कि आज भी गाँवन में किसानी के अलावे दोसर कवनों कामे नइखे जवना से ओह लोगन के नगदी आमदनी हो सके। एह नगदी के पावे खातिर बिहार में पलायन के अलावे कोई दोसर उपाय भी नइखे। काहे कि एकरा पर गंभीरता से कभी सोचल ना गइल आऊर कुछ ना त खेती के साथे मुर्गी-पालन, मछली-पालन आ गौशाला के ही व्यवस्था हो गइल रहित त बिहारियन के मुम्बई जाके ठेला पर साग-भाजी बेचे के जरूरत ना परित आ ना ही अपना घर-परिवार से एतना दूर जाके रिक्शा चलावे के चाहे अपार्टमेंट-अपार्टमेंट के चौकीदारी ही करे के पड़ित।

भिखारी ठाकुर के भी एह समस्या से जूझे के पड़ल रहे बाकिर एही बीच उनका साथे एगो अच्छा घटना ई भइल कि जब ऊ कुछ कमाये-धमाये लगलन त उनका पढ़ाई में रुचि बढ़े लागल-

“जब कुछ लगलीं माथ कमाये, तब लागल विद्या मन भाये

माथ कमाईं  नेवती चिट्ठी,  विद्या में  लागल रहे डीठी

बनिया गुरु नाम भगवाना, उहे ककहरा साथ पढ़ाना

भिखारी ठाकुर के पाण्डुलिपि कैथी लिपि में लिखल मिलल बा। वइसे उनकर शिक्षा-दीक्षा त कुछ खास भइल ना रहे। ऊ रामायण भी टो-टो के ही पढ़त रहले। ऊ जबले अपना गाँव में रहले अपना उमीर के गाँव के दोसरा नाऊ नाहिन गाय चरावत, चिट्ठी-पतरी पेठावत, लोगन के हजामत बनावत आपन समय काट लेहले। बाकिर आपन एतना देह धूनला के बाद भी उनका का मिलल ? एह से अपना गाँव-जवार के दोसर नवजवान नाहिंन उहो ज्यादा कमाये आ परिवार के कलह से बचे खातिर अपना जातीय पेशा के बल पर बंगाल के खड़गपुर भाग अइले।

“अल्पकाल में लिखे लगलीं, तेकरा बाद खड़गपुर भगलीं l

बंगाल अइला के बाद ही भिखारी ठाकुर के जीवन में परिवर्तन आइल। ऊ बंगाल के मेदनीपुर जिला में रामलीला देखे गइले। ओह रामलीला के उनका जीवन पर एतना प्रभाव पड़ल कि ऊ रामचरित मानस के अध्ययन आ चिंतन-मनन खातिर बेचैन हो गइले। भले ही ऊ टो-टो के ओकरा के बाँचत होखस। बाकिर उनका लगे ओह भावना के समझे के मौलिक शक्ति रहे। –

“गइलीं मेदनीपुर के जिला, ओही जे कुछ देखलीं रामलीला

ठाकुर दुअरा उहाँ से गइलीं, चनन तालाब समुद्र नहइलीं

दर्शन करि डेरा पर आईं, खोलि पोथी देखलीं चौपाई

फुलवारी में जगह बुझाइल, तुलसीकृत में मन लपटाइल

इहई से भिखारी ठाकुर के जीवन में एक नया मोड़ आइल। ओह घड़ी ले उनकर उमिर तीस के लपेट में आ गइल रहे। उनका मन में रामचरित मानस के प्रति जहाँ एक ओर श्रद्धा उपजल उहई दोसरा ओर समाज के कुरीति के प्रति सजगता भी बढ़ल। बंगाल त कवनों भगवान शंकर के त्रिशूल पर अवस्थित रहे ना जेकरा के कवनों परेशानी छू ना सकत रहे। एह से समाज के उहे कुरीति ओहू जा व्याप्त रहे जे भिखारी ठाकुर के गाँव में रहे। अंतर बस इहे रहे कि बंगाल में ओकर स्वरूप बदल गइल रहे।

देश के कोना-कोना में पहिले से ही समाज-सुधार के बयार बहे लागल रहे। राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, ईश्वरचंद विद्यासागर जइसन लोग अपना-अपना सुधार के क्षेत्र में अलख जगा चुकल रहे। ओकर प्रभाव देश व्यापी भइल भी रहे। भिखारी ठाकुर भी ओह प्रभाव के अपना पर पड़े से रोक ना पइले। ऊ बंगाल गइल त रहले कमाये बाकिर उहाँ से रामलीला के गुण सीख के वापस अपना गाँवे आ गइले। अपना गाँवे वापस अइला के बाद ऊ आपन पुश्तैनी काम छोड़ लगले रामलीला करे। फेर आपन नाच-मंडली बनवले आ अपना घर-परिवार से छिपा के लागल नाच के साटा लिखाये।

भिखारी ठाकुर जे बीजरूप में अपना समाज के दुर्दशा के छवि अपना दिल-दिमाग में सँजो के रखले रहले, ऊ बंगाल के बयार लागते अंकुरित होखे लागल रहे। देखते-देखते ऊ अब एगो सघन पेड़ में परिवर्तित भी होखे लागत। एह से ऊ अपना ओही सब भाव के कला में पिरो के अपना आजीविका के साधन बनवले त दूसरा ओर समाज सुधार के हथियार भी। कहल जाला कि ऊ बिना पईसा के कहीं भी अपना नाच-मंडली के ले ना जात रहले। ऊ एह बात के स्वीकारत कहsतारन-

“नाच-मण्डली के धरि साया, लेक्चर दिहीं जै कहि रघुनाथा   

राम शब्द जय जब तब कहिके, सभा खुश करीं नाच में रहिके  

एह पापी के कवन पुन्न से, भइल चहुँ दिसि नाम  

भजन भाव के हाल न जनलीं, सबसे ठगलीं दाम

भिखारी ठाकुर के रामलीला से लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़े लागल, जवना चलते इलाका के लोग उनका के जाने-पहचाने लागल। एकरा बाद समाज में व्याप्त कुरीति के प्रति जे आक्रोश उनका दिल-दिमाग में रहे, ऊ ओकरा के नाटक के रूप में जनता के सामने परोसे लगले, जेकरा के दर्शक बहुत पसंद कइलें। उनका 10 नाटकन के एक संपादक-मण्डल द्वारा ‘भिखारी ठाकुर ग्रंथावली खण्ड 1-2’ के रूप में संपादित कइल गइल बा।

भिखारी ठाकुर के सबसे पहिला रचना ह ‘बिरहा बहार’। ई गीत-संवाद शैली में बा। इहे उनकर पहिला नाटक रहे आ गीत पुस्तक भी। बाद में ‘नवीन बिरहा’ के नाम से एगो दोसर किताब निकलल। इनकर अन्य गीत पुस्तकन के नाम बा- भिखारी हरिकीर्तन, नाई-बहार, श्रीनाथ रत्न, रामनाममाला, भिखारी शंका समाधान, जयहिनू खबर, नर नव अवतार इत्यादि। एकरा अलावें उनकर कुछ स्फुट रचना बा जेकर अभी प्रकाशन बाकी बा।

भिखारी ठाकुर के गीतन के विषय के दृष्टि से मोटा-मोटी तीन भागन में बाँटल जा सकेला, जवना में-

  • एक भाग समर्पित बा हिन्दू-समाज में स्थापित देवी-देवता यथा- राम, कृष्ण, शिव, गंगा आदि के। एकरे साथे ओमे स्थानीय देवता-पितर के स्तुतियो बा।
  • दूसरा भाग समर्पित बा समाज-सुधार, प्रकृति-प्रकोप आ हिन्दू-मुस्लिम एकता पर।
  • तीसरा भाग समर्पित बा शृंगार रस पर, जवना में शृंगार के दूनू पक्ष- संयोग आ वियोग पक्ष के रचना बा बाकिर एह में वियोग पक्ष के गीतन में ही भिखारी ठाकुर के अधिक सफलता मिलल बा।

भिखारी ठाकुर के कुल 28-29 पुस्तकन के प्रणेता बतावल जाला, जवना में इनका प्रसिद्धि के राज़ छुपल बा। इनका प्रसिद्धि में सबसे बड़ा योगदान इनका नाटकन के ही रहे। जवना के ई लेखन आ निर्देशन ही ना करत रहले बल्कि अपना नाच-मण्डली के साथे ओकरा मंचन में भी आपन सहयोग देत रहले। ई बहुआयामी प्रतिभा के धनी रहले। ई एक ही साथे एगो सफल लोक कलाकार, कवि, गीतकार, नाटककार, रचनाकार, निर्देशक ही ना रहले बल्कि कुशल संयोजक भी रहले। इनका नाचमण्डली में बहुत अनुशासन रहे। ई कभी भी तत्काल लोकप्रियता के ललक में अश्लील प्रस्तुति देके अपना नाच-मण्डली के स्तर गिरवले ना। इनका नाटकन के विषय प्राय: सामाजिक आ पारिवारिक बा। काहे कि ई अपना नाटक के माध्यम से समाज में घटित घटना आ समस्या के ही उठवले बाड़न। काहे कि इनका में समाहित कलाकार जानत रहे ‘नाच कांच हs बात साँच हs’। इनकर सबसे लोकप्रिय नाटक ह ‘विदेसिया’, जेकर कथा अइसन बा कि बिहार के हर गाँव के लोग से आपन  निजता के सम्बन्ध जोड़ लेला। सभे के लागेला कि एह नाटक में उनके गाँव के बात कहल बा। एह नाटक के कथा जीविका खातिर गाँव से पलायन के बा। कथा-नायक के गवना कराके अपना कनिया के देहात में छोड़ कलकत्ता कमाये जाये के मजबूरी बा। उहाँ के शहरी चकाचौंध में चौंधिआइल ओकरा मन के शहर के एक औरत के फंदा में फँसला से आपन जिनगी तबाह क लेबे के बात बा। फिर बटोही के समझवला पर अपना घरे वापस आवे के कथा बा। एह नाटक के अंत सुखांत भइल बा।

‘पियवा निसइल’ में गाँव में गृह-उद्योग के अभाव, बाढ़-सूखा के मार झेलत किसान, खेती के वैज्ञानिक संसाधन के कमी, समुचित शिक्षा के अभाव में नैतिक आचरण से क्षीण होत लोग अपना जीविका खातिर दोसर-दोसर नगर-महानगर में पलायन करता आ उहाँ नशाखोरी के ओर प्रवृत हो जाता, जवना के परिणति ई होता कि ओकरा आचरण में अन्य कई दोष भी शामिल हो जाता, जवना के चलते परिवार बर्बाद हो जाता।

‘बेटी बेचवा’ में अपना गरीबी के चलते तिलक ना जुटला के कारण अपना बेटी के दादा के उमिर के आदमी के साथे बिआह के नाम पर बेच देहला के लाचारी बा। एकरा के कुछ लोग बेमेल बिआह के नाम देहले बा बाकिर एक बेमेल बिआह में हमेशा कनिए छोट रहेले कभी भी वर ना। हमरा नजर से अभी ले मात्र एके गो उपन्यास गुजरल बा जे उर्दू के ह। ई उपन्यास राजिन्दर सिंह बेदी के ‘एक चादर मैली-सी’ ह, जवना में देवर से समाज के लोगन के दबाव पर बड़ भाई के विधवा पर चादर डलवा देहल जाता। समाज के सोच देखीं कि ओह चादर के ‘मैली-सी’ कहल जाता। ई प्रचलन खाली बिहारे में ना रहे आ ना ही सिर्फ भिखारी ठाकुर ही एकरा के उठवले बाड़न बल्कि दोसरा-दोसरा भाषा के कई रचनाकार भी अपना रचना के माध्यम से ई मुद्दा उठवले बा। बंगाल के ही कथाशिल्पी शरत चंद चट्टोपाध्याय अपना उपन्यासन में औरतन के मुद्दा उठवले बाड़े। उनकर बहुचर्चित उपन्यास ‘देवदास’ में भी त पार्वती के बिआह तीन गो बच्चा के बाप से करावल जाता। ऊ का बेटी बेचवा के ही रूप ना ह ? मुट्ठीभर अपवाद के छोड़ दीं त पूरा भारत के किस्सा इहे रहे। आजो कभी-कभी कवनों ना कवनों रूप में अइसन घटना देखे-सुने के मिल जाला।

‘गबरघिचोर/ घिचोर बहार’ नाटक में बेटा पर माई, बाप आ प्रेमी के अधिकार पर सवाल उठावल बा। ई नाटक इनकर अन्तिम आ सबसे प्रौढ़ नाटक मानल जाला। एह नाटक में नायिका अपना कोख पर अपना अधिकार के बात करतिया। एह नाटक में स्त्री वर्ग के पुरुष वर्ग के समक्ष खड़ा कइल गइल बा। जवना से आवे वाला पीढ़ी खातिर भिखारी ठाकुर मार्ग प्रशस्त्र कइले बाड़न। एह दृष्टिकोण से ई नाटक ‘विदेसिया’ से बहुत आगे निकल गइल बा। हालाँकि लोकप्रियता के दृष्टि से ‘विदेसिया’ नाटक ही भिखारी ठाकुर खातिर मिल के पत्थर साबित भइल। जबकि कई समीक्षक इनका के एह नाटक के चलते जर्मन के प्रसिद्ध कवि, नाटककार, नाट्य निर्देशक आ ‘बर्लिन एन्सेंबल नाट्य-मंडली’ के मालिक बर्तोल्ट ब्रेष्ट के समकक्ष खड़ा क देले बा आ इनका एह नाटक के ‘कॉकेशियन चाक सर्किल’ के बराबर बतवले बा। वास्तव में एह दूनू रचना में विस्मयकारी समानता ही एह दूनू व्यक्ति के एके धरातल पर ला के खड़ा कर देले बा। जबकि दूनू के कथा भिन्न बा। एकरा अलावें भी भिखारी ठाकुर के कई अन्य नाटक बा, जइसे ‘गंगा स्नान’ जवना में ढोंगी साधु से ठगाइल बा। ‘पुत्र-वध’ में गहना के लालच में बेटा के हत्या के जिक्र बा। ‘विधवा-विलाप में धन खातिर विधवा के मारे के मनसा बा त ‘भाई-विरोध में कुटनी के बात लहरवला से संयुक्त परिवार के टूटन के जिक्र बा।

लोक-कलावंत भिखारी ठाकुर के मातृभाषा भोजपुरी रहे आ ऊ एही के अपना काव्य आ नाटक के भाषा बनवलन। ऊ अपना साहित्य के माध्यम से लोक-जागरण के संदेश वाहक ही ना बनले बल्कि नारी आ दलित विमर्श के उद्घोषक भी बनले। एह से ऊ जहाँ एक ओर अपना नाटकन में नारी के समस्या उठावत रहले, उहई दोसरा ओर उनका नाच-मण्डली में सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगन के तरजीह देहल जात रहे। जइसे-यादव, बिंद, लोहार, नाई, कहार, मनसुर, गोंड, दुसाध, पासी, भाँट इत्यादि जाति के लोगन के। एकर दूगो कारण रहे। पहिला ई कि ई नाच-पद्धति एही लोगन के उपज रहे आ दूसरा कि बहुसंख्यक होके भी जे लोग समाज के हासिया पर रहे ओकरा जीविको पार्जन के साधन जुटावल। भिखारी ठाकुर के नाच में स्त्री पात्र के अभिनय पुरुष पात्र द्वारा स्त्री के साज-शृंगार में कइल जात रहे। जवना के ‘लौंडा’ कहल जात रहे, जेकरा के समाज में हेय दृष्टि से देखल जाला।  फिर भी मनोरंजन के एह विधा के ही ऊ अपना जीविकोपार्जन आ सृजनात्मक अभिव्यक्ति खातिर चुनले। ऊ अपना एह नाच-मण्डली के माध्यम से ही लोकप्रिय भी भइले।

भिखारी ठाकुर नाटक के शुरुआत त कइले रामलीला से बाकिर बहुत जल्दी ही रामलीला छोड़ आपन नाच-मण्डली बना लेहले। ऊ अपना नाटकन में गोंड, नेटुआ, धोबी के नाच के नकल भी करत रहलें। उनका जिंदगी में ही उनकर नाम चारो ओर फइल गइल रहे। उनका प्रदर्शन में टिकिट लागत रहे।  बावजूद एकरा उनका कार्यक्रम में एतना भीड़ उमड़े कि पुलिस के इंतजाम करे के पड़े। एतना ही ना भोजपुरी के ई अमर कलाकार अपना मण्डली के साथे सिर्फ बंगाल, आसाम में ही ना गइले बल्कि देश से बाहर मॉरीशस, केन्या, सिंगापुर, युगांडा, म्यांमार, नेपाल, मैडागास्कर, दक्षिण अफ्रीका, फिजी, त्रिनिडाड आदि जगह पर भी गइले जहाँ कम या ज्यादा भोजपुरी संस्कृति रहे।

भिखारी ठाकुर के ब्रिटिश शासन में रायबहादुर के खिताब देहल गइल त बिहार सरकार का ओर से ताम्र-पत्र से सम्मानित कइल गइल। इनकर ‘विदेसिया’ एतना मशहूर हो गइल बा कि आज भिखारी ठाकुर आ ऊ एक-दूसरा के पर्याय बन गइल बा। ‘विदेसिया’ पर फिल्म भी बनल बा जवना में इनका छोटा-मोटा भूमिका भी मिलल रहे बाकिर ओह फिल्म में कहानी बदला गइल रहे।

पं० राहुल सांकृत्यायन उनका के भोजपुरी के शेक्सपियर आ अनगढ़ हीरा कहले बाड़न। सचहूँ अल्प शिक्षा प्राप्त करके ऊ अपना समय से एतना आगे रहले त अगर उनका समुचित शिक्षा मिलल रहित त ऊ का करते? जगदीशचन्द्र माथुर उनका के ओह भरतमुनि-परम्परा के कहले बाड़न, जेकर ‘नाट्यशास्त्र’ भारतीय नाट्य आ काव्य-शास्त्र के आदिग्रंथ ह। सबसे पहिले रस सिद्धांत के चर्चा एही नाट्यशास्त्र में एह प्रसिद्ध सूत्र- ‘विभावनुभाव संचारी भाव संयोगद्रस निष्पति:’ से कइल गइल बा।  भरतमुनि अपना एह नाट्यशास्त्र के उत्पत्ति ब्रह्मा से मनले बाड़न।

भिखारी ठाकुर के अपना भविष्य के जानकारी ही ना रहे बल्कि उनका अपना कृति पर एतना विश्वास रहे कि उनकर ई कृति सब दिनों-दिन उनका कीर्ति में चार चाँद लगाई। एह से मानो ऊ अपना एह विश्वास के उद्घोषणा करत कहत होखस –

“अबहीं नाम भइल बा थोरा, जबई छूट जाई तन मोरा 

तेकरा बाद पचास बरीसा, तेकरा बाद बीस दस तीसा 

तेकरा बाद नाम होई जइहन, पण्डित,कवि,सज्जन, यश गइहन

नइखीं पाठ पर पढ़ल भाई , गलती बहुत लउकते जाई

भिखारी ठाकुर के कहल बात आज साँच साबित हो रहल बा। उनका योगदान के केहू भुला ना सकेला।  ओह महान आत्मा के हमार शत-शत नमन आ श्रद्धांजलि।

 

 


10.jpeg

Hum BhojpuriaFebruary 17, 20211min3990

जन्मतिथि – 8 जनवरी 1944
पुण्यतिथि – 9 दिसंबर, 2006

डा. पुष्कर

 

‘भक्ति के रंग में रँगल गाँव देखा,

धरम में, करम में, सनल गाँव देखा।

अगल में, बगल में सगल गाँव देखा,

अमौसा नहाये चलल गाँव देखा।’  (अमौसा के मेला )

 

पंक्ति सुनते भा याद आवते कैलाश गौतम जी के चेहरा आ उ भाव नजरी के सोझा दउरे लागेला। चाहे ‘अमौसा के मेला ‘ होखे भा ‘गुलबिया के चिठ्ठी ‘ चाहे ‘बड़की भौजी, ‘कचहरी न जाना’,’ गाँव गया था गाँव से भागा’, चाहे ‘पप्पू की दुल्हन’। कैलाश गौतम जी के हर कविता में लोक के प्रति संवेदना,  मनःस्थिति के मनमोहक चित्रण, गाँवन के मिट्टी के खुशबू आ मिठास भरपूर मिलेला। अइसन नइखे कि कवि के दृष्टि ओह सामाजिक व्यवस्था प नइखे गइल जेकर आज जरूरत बा। कचहरी न जाना व्यंगात्मक कविता में त खु़लेआम गौतम जी दहाड़त बानी –

 

“कचहरी की महिमा निराली है बेटे

कचहरी वकीलों की थाली है बेटे

पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे

यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे

 

कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे

यही जिन्दगी उनको देती है बेटे

खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं

सिपाही दरोगा चरण चूमतें है।”

 

गागर में सागर भरे वाला क्षमता, मन के अपना सरसता, सहजता से भावविभोर क देवे वाला हिंदी आ ओह भाषा में भोजपुरी आंचलिकता के पिरोवे वाला जनप्रिय आधुनिक कवि  कैलाश गौतम ज़ी के जन्म 8 जनवरी 1944 में डिग्घी गाँव, जिला- चंदौली (उत्तर प्रदेश) में भइल रहे। कैलाश गौतम जी छात्र जीवन से ही साहित्यानुरागी रहीं। एम.ए., बी.एड. के डिग्री लेला के बाद अध्यापक बने के चाह बनारस से इलाहाबाद ले आइल। बाकिर बने के कुछ अउर लिखल रहे। कैलाश जी आल इंडिया रेडियो के आकाशवाणी इलाहाबाद केंद्र प कंपेयरर के पद प आसीन हो गइनी आ आजीवन आकाशवाणी से ही जुड़ल रहनी।  आकाशवाणी के दायित्व से मुक्त होते कैलाश गौतम जी हिंदुस्तान अकादमी के अध्यक्ष पद प मनोनीत हो गइनी।

कैलाश गौतम जी के रचनात्मकता आ रागात्मकता खातिर बड़-बड़ पुरस्कारन से सम्मानित भी कइल गइल। उत्तर प्रदेश सरकार के सर्वोच्च सम्मान यश भारती सम्मान, प्रसिद्ध ऋतुराज सम्मान आ परिवार सम्मान त मिलबे कइल, सबसे बड़ जवन सम्मान मिलल कि जनता इहाँ के दिल में बसा लेलन। जइसे भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर के मानल जाला, ओइसे जनक़वि कैलाश गौतम जी भी ओही रूप में पाठक आ श्रोता लोगन के हृदय में जगह बनवले बानी। गौतम जी के भाषा में पूर्वी उत्तर प्रदेश के टोन, बनारसी बोली आ भोजपुरी के जवन मिठास पढ़े, सुने आ देखे के मिलेला ऊ अद्वितीय बा। बदलत गाँव गौतम जी के रास ना आइल, जवन कवि ‘ अमौसा के मेला ‘ में गँवई संस्कृति से भरल पूरल, भौतिक आ आधुनिक सुविधा से अलग बिल्कुल गंगाजल लेखा शुद्ध जीवन, सरलता आ सहजता, ईमानदारी, परस्पर सौहार्द्र आ सामूहिक सोच के बखान कइनी, उहे कवि के वेदना साफ झलकल बा कविता ‘ गाँव गया था, गाँव से भागा ‘में –

“गाँव गया था,

गाँव से भागा,

रामराज का हाल देखकर,

पंचायत की चाल देखकर,

आँगन में दीवाल देखकर,

सिर पर आती डाल देखकर,

नदी का पानी लाल देखकर,

और आँख में बाल देखकर,

गाँव गया था,

गाँव से भागा।”

ए से गांव के गांवे रहे दियाव त भारत के संस्कृति आ सभ्यता अक्षुण बनल रही। अइसन मत करीं जा कि गाँवन के नया आ आधुनिक बनावे के चक्कर में गाँव के नामों निशान ही गायब हो जाये। काहे कि जब ले गांव बा तबे ले खेती बा, गाँवन के चलते ही भारत कृषि प्रधान राष्ट्र कहात आवता। गाँव में ही माटी के असली संस्कृति देखे के मिलेला। कवि कैलाश गौतम जी इहे चाहत रहीं कि गाँवन के विकास आ ओकर संप्रभुता तबे अखंडित रही, जब हमनी के एगो गांव के बुनियादी संस्कृति के संरक्षित रखत ओकर विकास करीं जा। जवन गाँव से खरिहान गायब हो गइल, दालान उजड़ गइल, किसान भाई के पहचान बदल गइल, मेहमान बोझ बन गइलन, घिघियात आदमी बा, अहरा, पोखरा भरा गइल, कुँआ के रेहट गायब हो गइल ओह गाँव में कवि के बेचैन मन कइसे रमी –

” गाँव गया था,

गाँव से भागा।

जला हुआ खलिहान देखकर,

नेता का दालान देखकर,

मुस्काता शैतान देखकर,

घिघियाता इंसान देखकर,

कहीं नहीं ईमान देखकर,

बोझ हुआ मेहमान देखकर,

गाँव गया था,

गाँव से भागा।”

कैलाश गौतम जी के कविता में किसान खातिर संवेदना साफ लउकेला। जइसे हल्कू खातिर प्रेमचंद जी के। इहाँ के पात्र रोअत नइखे, ऊ ओह समस्या के अपना भितरे पी जाता। केहू के एहसास नइखे होत। गौतम जी बड़ी बारिकी से ओह समस्या के ‘अमौसा के मेला ‘ में लिखत बानी-

 

“नुमाइश में जा के बदल गइली भउजी,

भईया से आगे निकल गइली भउजी,

आयल हिंडोला मचल गइली भउजी,

देखते डरामा उछल गइली भउजी ।

 

भईया बेचारु जोड़त हउवें खरचा,

भुलइले ना भूले पकौड़ी के मरीचा,

बिहाने कचहरी कचहरी के चिंता,

बहिनिया के गौना मशहरी के चिंता ।

 

फटल हउवे कुरता टूटल हउवे जूता,

खलीका में खाली किराया के बूता,

तबो पीछे पीछे चलल जात हउवें,

कटोरी में सुरती मलत जात हउवें।”

9 दिसंबर, 2006 के ऊ मनहूस दिन रहे, जब हिंदी आ भोजपुरी साहित्य के एह जनकवि के देहा़वसान भइल। ओकरा पहिले  ‘सीली माचिस की तीलियाँ ‘(कविता संग्रह), जोड़ा ताल ‘(कविता संग्रह), ‘तीन चौथाई आंश’ (भोजपुरी कविता संग्रह), ‘सिर पर आग ‘(गीत संग्रह) प्रमुख रूप से प्रकाशित हो चुकल रहे आ ‘तंबुओं का शहर ‘(उपन्यास), ‘आदिम राग’ (गीत-संग्रह),

‘बिना कान का आदमी’ (दोहा संकलन) अउर  ‘चिन्ता नए जूते की ‘(निबंध-संग्रह) जइसन कृति भी जल्दिये पाठक लोगन के संवेदित करी। अइसन जनवादी सोच आ ग्रामीण संस्कृति के साहित्य में पिरोवे वाला कवि बिरले पैदा होलें आ जब होलें त एगो इतिहास रच देवे लें। श्रोता, पाठक के जेहन में जवन पैठ कैलाश गौतम जी के बा ऊ सभके ना मिल सके। आपन सोंच के कैलाश गौतम जी जवन कविता में धार देनी ओकरा के हम नमन करत बानी।

निष्कर्षतः कैलाश गौतम जी आपन रचनन में लोकभाषा, लोकविश्वास, लोक संस्कृति के पुरहर जगह देनी आ मिथक, अन्धविश्वास, अव्यवस्था प प्रहार भी कइनी। इहाँ के अधिकांश रचना में ग्रामीण जीवन के अंतरात्मा बसेला,जवना में ग्रामीण जीवन के यथार्थ रूपन के साक्षात दर्शन होला। आज कैलाश गौतम जी नइखीं, लेकिन उहाँ के रचना ओतने प्रासंगिक बा।

कवि आपन रचनन में जवन गांव, खेत, बधार, मेला, खरिहान, गँवई विचार के स्थापित कइलन, आज दुख के बात इहे बा कि साहित्य आ संस्कृति  से उ गांव आ किसान दूर होत जात बाड़न। ओह निधि के बचावे के जरूरत बा तबे कैलाश गौतम जी के प्रति हमनी के आंतरिक संवेदना आ श्रद्धांजलि मुखरित होई।

 

परिचय- डा. पुष्कर, हिंदी आ भोजपुरी के युवा आलोचक आ रचनाकार बानी। आरा (बिहार) से शिक्षा ग्रहण कइला के बाद सम्प्रति शिक्षा निदेशालय, दिल्ली में कार्यरत बानी।

 


img320.jpg

Hum BhojpuriaJune 11, 20202min12110

   लेखक : मनोज भावुक

जन्मतिथि – 2 मई 1940  /  पुण्यतिथि – 30 मार्च 2009

भोजपुरी आंदोलन के अगुआ डॉ० प्रभुनाथ सिंह के जन्मदिन ह 2 मई। 30 मार्च 2009 के दिल्ली से छपरा जात में गोंडा का लगे वैशाली एक्सप्रेस में हृदयाघात से उहाँ के मौत हो गइल। ओकरा एके दिन पहिले हमार उहाँ से बातचीत भइल रहे।

–  ना, अभी हमरा इहां हमार टी वी नइखे आवत.—-ह हो सोचते रह गइनी……अच्छा, गांव से लौट के आवत बानी त हमार टी वी के आफिस आएम। मतंग सिंह से बहुत पहिले के भेंट ह—– ह,  तहरो से भेंट भइला बहुत दिन हो गइल …. खुश रहs ।

…. तब हमरा का मालूम रहे कि प्रभुनाथ चाचा से फेर कबो भेंट ना होई आ इ हमनी के अंतिम बातचीत ह।

डॉ० प्रभुनाथ सिंह से हमार पहिला मुलाकात सन 1998 में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के एकमा अधिवेशन में भइल रहे। तब हम भोजपुरी में नियमित रुप से लिखे-पढे लागल रहीं आ भोजपुरी के लगभग हर महत्वपूर्ण कार्यक्रम में सक्रियतापूर्वक भाग लेबे लागल रहीं। कवि सम्मेलन में जब हम आपन गीत सुनइले रहीं       ( बबुआ भइल अब सेयान कि गोदिये नू छोट हो गइल/ माई के अंचरा पुरान अंचरवे में खोट हो गइल ) त मंच पर आके उहां के हमार पीठ ठोकनी। हांलाकि ओकरा बादो कवनो खास बातचीत ना रहे। ह, उहां के दू चार बार हमरा के आचार्य पाण्डेय कपिल जी ( हमरा साहित्यिक गुरु ) किहां देखले रही आ एह से उहां के इ समझत रहीं कि हम कपिल जी के रिश्तेदार हईं।

सन 2000 में विश्व भोजपुरी सम्मेलन में हमरा सक्रिय भागीदारी के बाद उहां से विशेष स्नेह मिले लागल आ जब नौकरी के सिलसिला में हम दिल्ली से मुंबई चल गइनी तब त पत्राचार  भी शुरु हो गइल। आज भी हमरा पास उहां के हिंदी, अंग्रेजी आ भोजपुरी में लिखल दर्जनों चिठ्ठी थाती के रुप में संभाल के रखल बा जवना में भोजपुरी आंदोलन के दशा-दिशा आ ओह मे युवा के भूमिका आ भोजपुरी खातिर गहरी चिंता व्यक्त कइल गइल बा। मुंबई से एह चिठ्ठी -चिठ्ठियांव आ फोन पर बात चीत के दौरान ही उहां के जननी कि हम उहां के करीबी मित्र प्रो० राजगृह सिंह के भगिना हईं। तब उहां के  कन्फ्यूजन दूर भइल आ फेर त नानी के कजिया में उहां के हमरा खातिर रिश्ता लेके भी पहुंच गइनी।

प्रभुनाथ चाचा से जुडल कई गो रोचक आ सारगर्भित  संस्मरण बा। उहां के मजाके मजाक में बहुत बड सिख दे जात रहीं।

एगो संस्मरण के जिक्र त हम अपना गजल-संग्रह ” तस्वीर जिंदगी के” में भी कइले बानी–

फगुआ के दिने रात के बारह बजे हमरा दाँया नाक से ब्लीडिंग शुरू भइल त रुके के नामे ना लेत रहे। हमार इंडस्ट्रीयल मित्र सुनील राय (क्वालिटी कंट्रोल इंजिनियर) आ राजेश कुमार उर्फ दीपू (फैशन डिजाइनर) हमरा के लाद-लूद के कॉलरा हास्पीटल में डाल दीहल लोग। दू दिन में डाक्टर 15 हजार रुपिया चूस गइल बाकिर कुछ लाभ ना मिलल। बाद में डॉ० प्रभुनाथ सिंह जी हमरा के उमेश भइया का साथे डॉ० राम मनोहर लोहिया अस्पताल भेज देनी। कुछ ना रहे। नाक के झिल्ली सूख के नखोरा गइल रहे।

अस्पताल से तालकटोरा वाला रेजिडेन्स पर वापस अइनीं तऽ डॉ० प्रभुनाथ सिंह जी पूछनीं- “ का हो उमेश, का कहलऽ सऽ डाक्टर ? “ उमेश भइया मजाक कइलन – “ कहलऽ सऽ कि नाक के हड्डी टेढ़ हो गइल बा। “ एह पर डॉ० प्रभुनाथ सिंह जी कहनीं कि… ए भावुक देखऽ … नाक के हड्डी टेढ़ हो जाय, कवनो बात नइखे, …नाक से खून बहे, कवनो बात नइखे, …इहाँ तक कि नाक टूट जाय कवनो बात नइखे। बाकिर नाक कटे के ना चाहीं। इहे भोजपुरिया स्वभाव हऽ।

प्रभुनाथ चाचा हर भोजपुरिआ में इहे तेवर आ जोश भरे के कोशिश करीं। हम बराबर उहां के संपर्क में रहनी, अफ्रिका आ लंदन प्रवास के दौरान भी। हमार टीवी में अइला के बाद हमार व्यस्तता कुछ बेसिये बढ गइल। हम दिल्लिये में रह के दिल्ली के मित्र लोग से ना मिल पाईं। फोने के आसरा रहे। बहुत दिन के बाद चाचा से बात भइल रहे कि …….

डॉ० प्रभुनाथ सिंह के निधन से भोजपुरी समाज के अपूरणीय क्षति भइल बा। प्रभुनाथ बाबू अध्यापक का रूप में, राजनेता का रुप में आ भोजपुरी आन्दोलन के एगो कर्मठ कार्यकर्ता का रूप में सभका खातिर एगो आदर्श छोड  गइल बानी। लंगट सिंह महाविद्यालय मुजफ्फरपुर का अर्थशास्त्र विभाग में व्याख्याता का पद से आपन कर्मशील जिनिगी शुरु करे वाला प्रभुनाथ बाबू तरैया विधानसभा सीट से दू हालि विधायक चुनइलीं आ बाद में डॉ० जगन्नाथ मिश्रा के मंत्रीमण्डल में वित्त राज्य मंत्री के पद पर रहलीं।

डॉ० प्रभुनाथ सिंह के जनम 2 मई 1940 के सारण जिला के मुबारकपुर गांव मे भइल रहे। गांव उहां के रचनन में रचल-बसल बा। अर्थशास्त्र आ प्रबंध शास्त्र के अलावा भोजपुरी में भी इहां के कई गो किताब लिखले बानी- हमार गीत (निबन्ध संग्रह), गाँधी जी के बकरी (संस्मरण), हमार गांव हमार घर (ललित निबन्ध के संग्रह) आ पड़ाव (कहानी संग्रह )।

अइसे त डॉ० प्रभुनाथ सिंह जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी रहल बानी लेकिन उहां के मुख्य पहचान भोजपुरी आंदोलन के प्रणेता के रूप में ही रहल बा। भोजपुरी के उचित हक खातिर उहां के उम्र भर लडत रह गइनी। भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में ले आइल उहां के सपना रहे जवन उहां के जिनगी में पूरा ना हो सकल। एह सपना के पूरा कइल ही उहां के प्रति सच्ची श्रद्धांजली होई।

वर्ष 2008 में इग्नू में भोजपुरी कोर्स इंट्रोड्यूस होत रहे। सब विशेषज्ञ लोग आइल रहे।  हमरो बोलाहट रहे। इग्नू कैंपस में उहां से भोजपुरी के कई गो ज्वलंत मुद्दा पर बातचीत भइल रहे।  प्रस्तुत बा बातचीत के खास अंश –

सवाल  डॉ० साहब भोजपुरी के सरकारी मान्यता के का स्थिति बा आ आठवीं अनुसूची में एकरा शामिल होखे में काहे विलम्ब हो रहल बा?

जबाब  “डुमरी कतेक दूर अब निअराइल बा” स्थिति ई बा कि आज हो जाये काल्ह हो जाये.. सरकार के एक तरह से निर्णय हो चुकल बा… अब एकरा के संसद में ला के एकरा से संबंघित कानून जवन बा, ओकरा के बनावे के बात बा.. आ हमरा बुझाता कि अगिला चुनाव के पहिले ई भी काम सरकार कर दी…

सवाल  अगर भोजपुरी आठवीं अनुसूची में शामिल हो गईल, त एकरा से आम आदमी के का लाभ होई?

जबाब  आम आदमी के लाभ ई मिली कि जब सरकार एकरा के मान्यता दे दी त एकरा में बहुत बङा हित भोजपुरी भाषा-भाषी लोग के छिपल बा जइसे कि राज्यसेवा आयोग के भोजपुरी एगो विषय हो जाई। फेर नौकरी अउर रोटी के सवाल से भोजपुरी जुङ जाई… त भोजपुरी भाषा-भाषी लोग के चेहरा पर भी एगो मुस्कान आ जाई…आ ..जे लोग भोजपुरी भाषा से जुङल बा, भोजपुरी पढता-लिखता….एगो अच्छा भविष्य ऊ लोग के हो जाई।

सवाल  हिन्दी के विद्वान लोग ई कहेला कि भोजपुरी के विकास से हिन्दी के अहित होई, नुकसान होई ऊ लोग खातिर राउर का कहनाम बा?

जबाब  ई जे प्रश्न लोग उठावेला…. हमरा ई बात समझ में ना आवे……. काहे कि वस्तु स्थिति ई बा कि प्रायः जे भोजपुरी के साहित्यकार बाङे, ऊ लोग कवनो ना कवनो रूप में हिन्दी के भी साहित्यकार रहल बाङें, चाहें बाङें… अइसन बहुत कम आदमी होइहें जे केवल भोजपुरी के साहित्यकार बाङें, लेकिन हिन्दी के साहित्यकार नइखन… प्रायः लोग अइसन बा कि ऊ हिन्दी के साहित्यकार के रूप में ऊँचाई पा चुकल बा… ओकरा बाद से भोजपुरी के साहित्यकार के रूप में ऊँचाई मिलल बा….लेकिन आज तक हमरा एगो अइसन उदाहरण नइखे मिलल कि हिन्दी में लिखला से ओह लोग के भोजपुरी गङबङाइल होखे .. आ भोजपुरी में लिखला से ऊ लोग के हिन्दी गङबङाइल होखे… एक तरह से ई आपन आपन एगो सोच हो सकेला… हमरा नइखे बुझात कि एह  सोच में कवनो तरह के दम बा… दोसर बात हम ई संबंध में ई कहे के चाहत बानी कि हिन्दी हमार राष्ट्र भाषा ह .. भोजपुरी हमनी के मातृभाषा ह… अउर जवना घङी ई समझ में आ जाई कि भोजपुरी के विकास से हिन्दी के क्षति होई.. त ओह दिन हमनी के भोजपुरी में लिखल बंद कर देब.. जेतना मान-सम्मान के प्रश्न बा ऊ जेतना भोजपुरी भाषा-भाषी लोग के हिन्दी के प्रति बा, ओतना हिन्दी वाला लोग के नइखे… राष्ट्रभाषा खातिर हमनी के कवनो कुर्वानी कर सकेलीं।

सवाल  डॉ० साहेब रउआ पिछला पचीस-तीस बरिस से भोजपुरी आंदोलन से जुङल रहल बानी, लोग त इहां तक कहेला कि रउरा लगला बिना भोजपुरी के कवनो अधिवेशन, कवनो कांफ्रेंस, कवनो जग, कवनो अनुष्ठान सफल ना होला त कइसन रहल सफर पिछला पचीस-तीस बरिस के…

जबाब  जहां तक भोजपुरी आंदोलन के एगो दिशा देवे के सवाल बा…कांफ्रेंस करके, ओकर सम्मेलन करके साहित्यकार लोग के जुटान करके हमरा बराबर एकर सुखद अनुभव रहल बा… पहिला ए मामला में कि, जे भी साहित्यकार लोग के अधिवेशन में बोलाबल गइल .. हम समझतानी कि भोजपुरी साहित्य में एगो अलग तरह के साहित्यकार बाङें कि सब लोग अपना खेबा-खर्चा से पहुँचेला, अपना खेबा-खर्चा से जाला… आज ले केहू टी.ए. डी.ए. के मांग ना करेला … दोसर विशेषता ई बा कि जे लोग भी एह में रचना कइले बा, उ आपन खेत-बधार बेंच के रचना के छापल …….ओकर बाजार त ओतना नइखे, लेकिन एह सम्मेलन में जाके ओकरा के बाँट के….ओकरा प्रचार-प्रसार में जवन इ लोग आपन जीवन के आहुति देले बा,  उ एगो चिरस्मरणीय भोजपुरी साहित्य के इतिहास में एगो अलग अध्याय बा…. तीसर बात ई बा कि जहां तक लोग के सवाल बा रउआ दुआरी केतना छु्अतानी, एकरा पर आधारित बा… लेकिन आज तक हमरा पइसा के कमी ना भइल, लेकिन समय के कमी जरूर बुझाइल….रउआ अगर सच्चा दिल से, सच्चा भाव से भोजपुरी साहित्य-संस्कृति के विकास खातिर आगे बढ़त बानी… त भोजपुरी भाषा-भाषी क्षेत्र के लोग रउआ से दू डेग आगे बा।

सवाल  आज रउआ इहां इग्नू कैंपस में आइल बानी। इग्नू में भोजपुरी के आधार पाठ्यक्रम बन रहल बा। इग्नू में अब भोजपुरी के पढ़ाई शुरू होखे जा रहल बा.. रउआ बताईं भोजपुरी अउर कवना-कवना विश्वविद्यालय में पढावल जाता.. अउर कब से एकर पढाई शुरू भइल.. रउआ त विश्व में भोजपुरी के पहिला व्याख्याता रहल बानी.. त एकरा बारे में तनी विस्तार से बताई…

जबाब  ई एगो ऐतिहासिक क्षण बा.. कि इग्नु भोजपुरी के पाठ्यक्रम के शुरू करे जा रहल बा…दोसर विश्वविद्यालय अउर इग्नू में अंतर बा… हम धन्यवाद देब भोजपुरी भाषा-भाषी लोग आ साहित्यकार लोग के ओर से इग्नू विश्वविद्यालय के कुलपति आ विशेषकर शत्रुध्न प्रसाद जी के, जे एकर अगुवाई कर रहल बानी,…. अउर विश्वधालय में भोजपुरी के पढ़ाई आ इग्नू में भोजपुरी के पढ़ाई में जमीन असमान के फर्क बा. इग्नू भोजपुरी के पढ़ाई शुरू कर रहल बा त एकर मतलब बा कि पठन -पाठन के ममिला में भोजपुरी अंतरराष्ट्रीय क्षितिज़ पर स्थापित हो रहल  बा… विश्वविद्यालय में जहां तक भोजपुरी के पढाई के सवाल बा त सबसे पहिले 1968 में स्नातक स्तर तक बिहार विश्वविद्यालय में भोजपुरी के पढाई प्रारंभ भइल। ओकरा बाद कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में एम. ए. स्तर पर भोजपुरी के पढाई शुरू भइल। बिहार के प्राय: सब विश्वविद्यालय में भोजपुरी एगो स्वतंत्र पत्र के रूप में पढावल जाला। स्वतंत्र पत्र के रूप में ना त कवनो विशेष पत्र के रुप में ……त हमरा बुझाता कि पूर्वांचल के जेतना विश्वविद्यालय बा उ सब में एकर पढाई प्रारंभ हो चुकल बा  लेकिन बिहारे एगो अइसन प्रदेश बा जहां कि भोजपुरी एगो स्वतंत्र पत्र के रूप में B.A, I.A से लेके M.A तक पढावल जाता.. एकर भविष्य बडा उज्ज्वल लागता। अब जे लोग एकरा के एगो बोली मानत रहे, ओह सब लोग के जबाब मिल चुकल बा कि भोजपुरी आज उ नइखे जे 50-51 में रहे। भोजपुरी आज एगो साहित्य के दर्जा ले चुकल बा, एकर पठन-पाठन शुरु हो चुकल बा त अब लोग के कवनो तरह के शंका ना होखे के चाहीं। अब भोजपुरी साहित्य के ….. चाहे देश के कवनो साहित्य होखे चाहे विश्व के कवनो साहित्य होखे ओकरा सामने सम्मान के साथ रखल जा सकेला।

सवाल  रउरा भोजपुरी सिनेमा में गीतो लिखले बानी। आज जे भोजपुरी फिल्म बनता ओकरा बारे में का कहनाम बा?

जबाब  कवनो भी सिनेमा के ….चाहे उ हिंदी होखे, भोजपुरी होखे या अंग्रेजी …ओकर आपन एगो बाजार होला आ बाज़ार के इ मतलब ह कि उपभोक्ता जवन मांग करेला ओकरे आपूर्ति कइल जाला। आज से 15-20 साल पहिले जे उपभोक्ता के मन अउर मिजाज रहे, समय के साथ अउर वैश्वीकरण के साथ ओकरा में बदलाव आ गइल बा। ओकर असर त सिनेमा पर होखबे करी, चाहे उ हिंदी के सिनेमा होखे चाहे भोजपुरी के। एकरा के रोकल त कठिन बा। चूंकि जवन देखे वाला पसंद करी, उहे सिनेमा बनाई काहे कि ओकर इ रोज़गार बा। उ कवनो गांधी जी अउर महत्मा बुद्ध नइखे जे समाज आ देश के सेवा खातिर उ सिनेमा बनावता। ओकर व्यवसायिक जवन उदेश्य बा उ त मूल बा …..आ एकरा बाद ओकर साहित्यिक-सांस्कृतिक जवन उदेश्य बा ओकर भी भरसक पालन होखे के चाहीं। तब अइसन स्थिति में हमार इ सुझाव बा कि कुछ बाजार खातिर भी सिनेमा बने त कुछ कलात्मक आ ऊंचाई वाला सिनेमा भी।

सवाल  अब त भोजपुरी के चैनल भी आ गइल। राउर प्रतिक्रिया ?

जबाब  एहू में दूनू के बढिया समन्वय होखे, व्यवसायिकता के भी आ स्वस्थ सांस्कृतिक जवन पक्ष बा ओकर भी। हमरा जहां तक बुझाता कि आम दर्शक अच्छा स्वाद के बाडन। कुछे दर्शक अइसन बाडन जेकर स्वाद बिगडल बा। … आ जइसन रउरा परोसब लोग उहे खाई। जब अच्छा चीज रउरा परोसब त लोग अच्छे खाई। खराब चीज रउरा परोसल शुरु करब त कवनो उपाय नइखे, लोग खराबे खाई। लेकिन भोजपुरी में जवन भी रउरा परोसब लोग खाई काहे कि एह में जवन स्वाद बा, संप्रेषण के जवन ताकत ब, उ अउर कहीं नइखे। एह से भोजपुरी चैनल के भविष्य उज्ज्वल बा। हमार शुभकामना।


img342.jpg

Hum BhojpuriaJune 10, 20201min6550

‘ टोअलो में टिसेला छिँउकिया के साटी राम ‘ जइसन गीतन के रचनाकार चंपारन के रहे वाला कवि अश्विनी कुमार ‘आँसू ‘ के 29  मई के निधन हो गइल। उहाँ के बिहार विश्वविद्यालय में भोजपुरी पाठक्रम लागू भइला पर पद्य आ गद्य संग्रह के संपादन में भरपूर सहयोग कइले रहीं। मंच अउर पत्रिका दुनों के सक्रिय रचनाकार रहीं उहाँ का। सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ ब्रजभूषण मिश्र जी बतवनी कि उहाँ के गीत टोअलो में टिसेला छिँउकिया के साटी राम पर प्रसिद्ध आलोचक महेश्वराचार्य चौदह पृष्ठ में आपन उद्गार व्यक्त कइले रहीं। हम भोजपुरिआ परिवार के तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि।


img294.jpg

Hum BhojpuriaJune 9, 20207min11430

 लेखक : भगवती प्रसाद द्विवेदी

भोजपुरी के गालिब के रूप में लोकप्रिय जगन्नाथ जी 19 जनवरी 2020 के छियासी बरिस के उमिर पूरा क के सतासीवां साल में डेग बढ़वलें रहनीं। उहां के व्यक्तित्व-कृतित्व पर जब परास ( संपादकः डॉ. आसिफ रोहतासवी ) के ताजा अंक हमरा अतिथि संपादन में छपि के आइल, त फगुआ का पहिले उहां के अंक देखत दिल से हुलसल रहनीं, फेरू दार्शनिक भाव से कहनीं-‘अब हमरा चले के चाहीं, अब कवनो लालसा शेष नइखे रहि गइल।’

‘ना-ना  अइसन मत कहीं,  हमनीं के मार्गदर्शन करत रउआं शतक पूरा करे के बा।’ कहत ई तय भइल कि 17 मार्च के उहां के साधनापुरी के आवासे पर ‘परास’  के विशेषांक के लोकार्पण होई। 14 मार्च के फजीरहीं उहां के फोन से सूचना लिहनी कि कइसे-कइसे आयोजन होई आ के-के ओमें शामिल होई। बाकिर ओही दिन सांझ के बेरा जब उहां के बेटा संजय के फोन आइल त हमरा कठिया मारि दिहलस- ‘ चाचा जी, बाबूजी ना रहनीं। सांझ खा साढ़े चार बजे पानी पीयत घरी अइसन सरकल कि बेहोश हो गइनीं आ सांस टंगा गइल।’ घर-परिवार के लोगन के सेवा-टहल के मोको ना दिहनीं आ उहां के परान-पखेरू उड़ि गइल-‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया…’

कविवर जगन्नाथ भोजपुरी-गजल के हलका में इतिहास रचेवाला एगो अइसन गौरव-स्तम्भ के नाव ह, जेकरा बेगर ना त भोजपुरी गजल के चरचा कइल जा सकेला, ना ओकर इतिहासे लिखल जा सकेला। खाली अतने ले ना, भोजपुरी के कई नामी-गिरामी गजलगो के एकल संग्रहन के व्याकरणिक दोष दूर करे आ उन्हनीं के संशोधित-परिमार्जित क के खास बनावे के श्रेय उहें के सलाहियत के जात बा। एकरा संगहीं, गजल के शास्त्रीयता, छंद-विन्यास आ विधागत विकास-यात्रा पर प्रकाशित उहां के प्रामाणिक समालोचनात्मक पुस्तक गजल लिखे वालन आउर भोजपुरी-गजल पर शोध करेवालन- दूनों खातिर निहायत जरूरी बाड़ी स।

जगन्नाथ जी के सिरिजनशील व्यक्तित्व बहुआयामी रहल बा आ गीत, गजल, समालोचना-शोध का संगहीं कहानी अउर नाटक में उहां के विशेष सृजनात्मक अवदान रेघरियावे-जोग रहल बा। 1966 से लेके 1978 का बीच उहां के कहानी भोजपुरी कहानियां आ ‘भोजपुरी कथाकहानी‘ में छपत रहली स, जिन्हनीं में गांव के ऊबड़-खाबड़ जमीन पर आदर्शोन्मुख जथारथ के बिनावट आ सकारात्मक सोच मरम के बेधे बेगर नइखे रहत। ओह कहानियन के संग्रह 2009 में बांचलखुचल शीर्षक से प्रकाशित भइल रहे। अइसहीं, सात रंग के छोट-छोट एकांकी नाटकन के संग्रह सात रंग 2010 में छपि के चर्चित भइल रहे। हंसिए-हंसी में गंभीर घाव  करेवाला सातो एकांकी चोट-कचोट से लैस बाड़न स। भोजपुरी-कविता के एकलउती मानक पत्रिका ‘कविता‘ (तिमाही) के यादगार संपादन-प्रकाशन क के उहां के एगो आउर मील के पाथर गाड़े में कामयाबी हासिल कइले रहलीं। सन् 1999 से 2012 तक लगातार प्रकाशित ओह पत्रिका के हरेक अंक संग्रहणीय आ ऐतिहासिक महत्व के होत रहे। साहित्यिक पत्रकारिता खातिर उहां के ई समरपन कबो ना भुलाइल जा सके।

बाकिर, एह सबके बावजूद जगन्नाथ जी मूलतः कवि हईं  आ उहां के साफ-साफ मानत रहल बानी  जे कविता मानवीय संवेदना के लयात्मक अभिव्यक्ति ह । अपना आत्मखत में उहां के कहलहूं बानी – ‘ लिखला से हमरा  सुकून मिलेला । हमरा रचनन में जीवन के विभिन्न पक्षन से जुड़े के प्रयास होला, बाकिर कवनो खास पक्ष के लेके आग्रह ना होला।’

जगन्नाथ जी के गीतन के पहिला संग्रह पांख सतरंगी 1967 में प्रकाशित भइल रहे, जवना में कुदरत के जियतार छटा देखते बनेला। एक तरफ बिछुड़न के टीस, उहंवे दोसरा ओर संघर्षशीलता के अविराम सफर। लोकधुनन में आधुनिक संदर्भन के अभिव्यक्त करत गीतकार कबो ‘भरि जाला अंखिया सपनवां हो रामा, चइत महिनवां‘ जइसन चइता गीत के सिरिजन करत बा त कबो जनम जनम के आस कबे मन के बुति गइल रहित निर्मोही / छनभर एको बेर कबो जे सांसन के दुलरवले रहितs’ नियर भावप्रवण गीतन के। कवि मन के दियना बारे के आवाहन करत कहत बा- ‘थाके राह भले, ना थाके मन के भरल हियाव कबो रे/ आवे माया में किनार के ना जिनगी के नाव कबो रे/ लहरलहर के तालताल पर नांचत चले बहार रे/ मंजिल अबहीं दूर बटोही, मन के दियना बार रे!’

हालांकि ‘पांख सतरंगी‘ में दूगो गजलो संग्रहित रहली स, बाकिर 1977 में जब जगन्नाथ जी के पैंतीस गो गजलन के मोतिन के लर ‘लर मोतिन के‘ शीर्षक से प्रकाशित भइल, त ऊ भोजपुरी गजल-लेखन के दिसाईं ‘टर्निंग प्वाइंट’ साबित भइल। ओइसे त, भारतेन्दु युग के तेगअली ‘तेग’ के इश्किया शायरी से भोजपुरी गजल के शुरुआत उनइसवीं सदी के आखिरी चरन में हो गइल रहे, जब सन् 1885 में उन्हुका तेइस गजलन के संग्रह ‘बदमाश दर्पण‘ के भोजपुरी गजल के पहिल एकल संग्रह होखे के गौरव मिलल रहे, बाकिर सांच कहल जाव त आधुनिक हिन्दी-भोजपुरी गजल के उत्कर्षकाल 1976 से शुरू होत बा, जब दुष्यंत कुमार के  समय-संदर्भ आ आज काल्ह के जरत-बरत जमीनी हकीकत से जुड़ल गजल तहलका मचवली स आ उहंवें से गजल-लेखन में एगो अइसन मोड़ आइल, जवन गजल के दिसा बदलि दिहलस आ तेवर आउर तल्खी का संगे गजल कहे के नया परिपाटी शुरू भइल। तब आधुनिक गजल अपना के लौकिक प्रणये ले सीमित ना रखलस। एकरा दायरा के फइलाव इश्केमजाजी आ इश्केहकीकी से लेके तमाम सामाजिक विसंगति-विद्रूपता ले होत चलि गइल, जवन जनजीवन से एकर गहिर जुड़ाव आ दृष्टि-संपन्नता के सूचक बा। ओकरे नतीजा रहे-1978 में जगन्नाथ जी के संपादन में ‘भोजपुरी के प्रतिनिधि गजल‘ के प्रकाशन। तबहूं ई कमी शिद्दत से महसूसल जात रहे कि भोजपुरी गजल के एगो अइसन संकलन आवे,जवना में हर पीढ़ी के प्रतिनिधि गजलगो अपना चुनिंदा रचनन का साथे शामिल होखसु आ ओह गजलन के जरिए सुधी समालोचक, आ शोधकर्ता हरेक रचनिहार के मूल्यांकन का संगही समकालीन भोजपुरी गजल के दसा-दिसा निर्धारित करि सकसु। एकर भरपाई  भइल 2003 में जगन्नाथ जी एह पांती के लेखक के संपादकत्व में 151 गजलन के गुलदस्ता ‘समय के राग‘ के प्रकाशन से, जवना में सोरह प्रतिनिधि गजलकारन के चुनिंदा गजलन के संकलन मूल्यांकनपरक आलेख का साथे छपल रहे। नवकी से लेके वरिष्ठतम पीढ़ी तक के गजलगो के प्रतिनिधित्व भोजपुरी गजल के उठान आ बढ़न्ती में ओह सभ लोगन के अवदान के रेघरियावल गइल रहे। हर पीढ़ी के मौजूदगी आ हर रंग के गजल एकर अतिरिक्त खासियत रहे।

एकरा पहिले 1997 में गजलगो जगन्नाथ के कलम से गजल लिखे आ शोध करेवालन खातिर गजल के शास्त्रीयता पर केन्द्रित किताब ‘गजल के शिल्प विधान‘ के रचना भइल रहे आ ओही साल भोजपुरी गजल-लेखन के इतिहास ‘भोजपुरी गजल के विकासयात्रा‘ शीर्षक से लिखाइल रहे। एही क्रम में 1999 में छपल उहां के एगो अउर किताब ‘हिन्दीउर्दूभोजपुरी के समरूप छंद‘ भोजपुरी छंदशास्त्र खातिर एगो अनमोल देन बा, जवना में हिन्दी-उर्दू-भोजपुरी के छंदन में अचरज-भरल समानता ना खाली तार्किक ढंग से विवेचन-विश्लेषण कइल गइल बा, बलुक अइसन चौसठ छंदन के तीनों भाषा के उदाहरणों दिहल गइल बा।

खुद के तलाशत‘ बेयासी बरिस के उमिर में छपल आदरणीय जगन्नाथ जी के समकालीन गजलन के दोसर संग्रह रहे, जवना के जद में रहे एह लोकतांत्रिक देस के नियंता जन-गण के नियति आ रोज-रोज के जिए-मूवे के बेबसी। जिनिगी के जद्दोजहद गजलगो जगन्नाथ के गजलन के कथ के स्थायी भाव रहल बा। इन्हनीं में तरल रागात्मकता बा, त आंतर के ताकत देवेवाली दनाउर आगियो बा। प्रयोगधर्मिता उहां के गजलन के बनल-बनावल लीखि से अलगावेले आ मुहावरा-लोकोक्तियन के सुघर इस्तेमाल रचना के जियतार बना देले। ‘पानी’ वाली गजल के त हरेक शे’र में एगो चटख मुहावरा सलीका से मोती मतिन गुंधाइल बा- ‘जिंदगी का निसा बढ़ल बाटे / उम्र के बा उतर गइल पानी/ खुद के ऐनक में देख के लागल / जइसे घइलन बा पर गइल पानी / कइसे ऊ शख्स अबो जिंदा बा / जेकरा आंखिन के मर गइल पानी

भोजपुरी मिजाज आ बिम्ब-प्रतीकन के अनछुअल इस्तेमाल उहां के गजलन के खूबी में चार चान लगा देत बा। ‘नेह के झिंटिकी‘ गिरते ‘मन के कुअंना में लहरेलहर‘ हो जाए वाला दृश्य आ दरद पाके गजल देबे आ रउरा नांवे ‘बयाना’ करे के वादा जगन्नाथे जी जइसन समरथी / गजलगो के बूता के बा। कवि के आस्था बा- ‘जिंदगी भर जरेमरे के बा / मेघ अस रातदिन झरेके बा।

शहरो से अधिका बनावटी, सवारथी आ सियासी दांव-पेंच के पर्याय बनल आधुनिक गांव से जगन्नाथ जी भलहीं विमुख हो गइल होखीं, बाकिर उहां के आंतर के एगो कोना-अंतरा में गांव हमेशा जिंदा रहल, जवन कवि-मन के कचोटत-घवाहिल करत रहे। तबे नू गजलन के अशआर गाहे-बगाहे गंवई संदर्भ से जुड़ि के गहिर संवेदना जगावत बाड़न स। किछु बानगी देखीं- ‘गांव बा, एगो असरा रहल हs मगर / अब त सुनलीं ह, ऊहो शहर हो गइल‘, ‘गांव के छोड़ के शहर भगलीं / हमरा लेखा गंवार के होई!’, पता ना, बा बांचल कि ना हमरा गांवें / ई राउर शहर हs, शराफत त होई!’, गांव के खोज में गइलीं त मिलल गायब ऊ / फेरू शहरे में ना अइतीं, त अउर का करितीं!’, आंख में बा शहर, गांव बा प्रान में / बानीं अहजह में, अबहीं विचारे त दीं!’, लाख चहलो प बसलीं ना हम गांव में / गांव हमरा में, बाकिर, बसल रह गइल ‘…

बाजारवादी सोच में तार-तार होत नेह-नाता, सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-नैतिक मूल्यन के पतनशीलता आ लोप होत मनुजता पर रचाइल एक से बढ़िके एक शे’र एह संग्रह के बेशकीमती बनावत बाड़न स- ‘खोज इंसानियत के जारी बा / खनतलासी अबे लियाइल ह‘, काट जो ली, त ना लहर आई / आदमी जात हs, चिहाईं जनि‘, ‘ बा नजर भले रउआ / पास ना नजरिया बा‘, जिअल बाटे मुश्किल, मरल बाटे मुश्किल / पता ना कइसन ई पहल हो गइल बा‘, हाथ से हाथ मिल जा, इहे बा बहुत / दिल से दिल के मिले के चलन उठ गइल‘…

कविता के मौजूदा सेहतो पर कवि फिकिरमंद बा-गूंग शब्दन के कविता भइल संकलन / व्यंजना के बुला अपहरन हो गइल।‘ एह दिसाईं गजलगो के सलाहियतो गौरतलब बा- ‘बात अइसन लिखीं कि वक्त कहे / शायरी बेजबान तक पहुंचल।कवि कतई निराश नइखे, काहेंकि ओकरा भीतर के आल्हर रचनिहार के जिजीविषा बरकरार बिया। कविता के इहे भूमिका होइबो करेला। कवि के कहनाम बा- ‘रोशनी बा, भले बेमरिहा बा / ई नया प्रातः ह, चिहाईं जनि!’, ‘ जिंदगी लाख बुढ़ाइल, बाकिर / साधसपना त अबहूं आल्हर बा‘,  ‘ऊ त जीजी के ना मरे जनलन / हमरा मरमर के जिए आइल बा‘…

भाव-भाषा के स्तर पर जगन्नाथ जी के शीर्षस्थ गजलगो मानत प्रो.हरि किशोर पांडेय जी ‘झकोर‘ के गजल विशेषांक ( जून-सितंबर,1981 ) में लिखले रहलीं-‘हमरा समझ से भोजपुरी गजल में सबसे बड़ नाम बा-जगन्नाथ। भोजपुरी-गजल के अपना जगन्नाथ पर गर्व होखे के चाहीं। जगन्नाथ भाव-भाषा, दूनों में गजल के मिजाज जइसे समझले बाड़न, ओइसहीं कवनो भोजपुरी-गजल लिखनिहार के समझे के चाहीं। गजल में कथ्य के गहराई ओकर दबगर भइल ना ह, महीन भइल ह, कोमल-सूक्ष्म भइल ह। औरत के मन जब एह दशा के भोगेला, त ऊ फेर में पड़ जाले; ओठ कुछ बुदबुदाला, शब्द आके थथमे लागेला, आंख मछरी बन जाले, गाल लाल हो जाला, गर्दन झुक जाला, धड़कन बढ़ जाला, ओकरा कथ्य तक जाए के ईहे व्याकरण ह, ईहे भाषा ह- ‘तनिकी हवा में नेह के अतना जे हिल गइल / मन ना भइल ई हो गइल पीपर के बुला पात। ( जगन्नाथ )’

चाहे छोट बहर के गजल होखो भा बड़ बहर के, दोहा छंद में रचाइल होखो भा दोसर कवनो रूप में, जगन्नाथ जी अपना गजलन के बेरि-बेरि से मांजत रहीं, तरासत रहीं आ नया-नया चमक, आभा आउर असर पैदा करत रहीं। एही से ‘लर मोतिन के‘ के किछु शे़’र कथ-शिल्प-संवेदना का स्तर पर अउर बेहतर छाप छोड़त दोसरका संग्रह में मौजूद बाड़न स। उहां के कहलहूं बानीं- तलासत रहीला अपना के / लोगन के नजर में / तरासत रहीला अपना के / अपना नजर से।‘ ई तलाश आ तराश सिरिफ रचने के ना बलुक इंसानो के उम्दा आ मुकम्मल बनावेला। गजलगो  के एह शे’र का ओर तनी अखियान करीं- ‘बहुत देखलीं रउवा उनका के अब तकतनी खुद में खुद के तलाशत त देखीं।

पिछिला चालीस साल से कविवर जगन्नाथ जी के नेह-छोह हमरा मिलत आवत रहे। जब नब्बे के दशक में साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था ‘अस्मिता‘ गठित भइल रहे, त उहां के अध्यक्ष आ हमरा के महामंत्री बनावल गइल रहे। जब भोजपुरी कविता के पहिल पत्रिका ‘कविता‘  के श्रीगणेश भइल, त सह-संपादक का रूप में उहां के  संगे काम करे के मोका मिलल। गजल संकलन समय के राग हमनी के दूनों आदिमी के संपादन में छपल रहे। डेगे-डेग उहां के छत्रछाया हमरा पर बनल रहत रहे। अब हम सांचहूं अनाथ हो गइलीं।

जगन्नाथ जी जिनिगी में बहुते झंझावात झेलनीं, इहां ले कि आपन सबसे प्रिय होनहार जवान बेटा आ किशोर नातियो के गंवा दिहनीं, बाकिर एह सभके बावजूद चट्टान नियर सृजन-पथ पर अडिग रहनी आ कबो चेहरा प शिकन के भाव आवे ना दिहनीं। छल-छद्म से कोसन दूर उहां के विसवास आत्मीय छोह-सनेह, सहजता आ दरियादिली में रहे।

सुधी पाठकन, शोधार्थियन के परेमे उहां खातिर सभसे बड़ सम्मान रहे। ना कवनो पुरस्कार के चाह, ना पैरवी-तिगड़म में आस्था। ना कबो मूल्य से डिगनीं, ना कवनो समझौता कइनीं। भोजपुरी साहित्य-संस्कृति आ साहित्यिक पत्रकारिता के शीर्ष उन्नायकन में एक एह सेसर सृजनशील कर्मयोगी के स्मृति में हम लोर से सउनाइल अंजुरी से सरधा के फूल चढ़ावत बानीं।

(शताधिक पुस्तकन के प्रणेता आ उत्कृष्ट बालसाहित्य सर्जना खातिर बालसाहित्य भारती सम्मान प्राप्त लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी हिन्दीभोजपुरी के नामचीन कथाकार, कवि, समालोचक आ लोकसाहित्य के अध्येता हईं ।)

 


img271-1280x884.jpg

Hum BhojpuriaJune 8, 20201min7490

लेखक : प्रो. राजगृह सिंह

बिहार के एकमा-मांझी के धरती ढेर उर्वर आ ऐतिहासिक हऽ। संत-शिरोमणि धरनी दास के जन्मभूमि मांझी के इतिहास बहुते पुरान बा। इहां गढ़ के खोदाई में जवनपुरान सामान मिलल बा, उ प्रमाणित करता कि ई गढ़ बुद्धकाल से भी पहिले के हऽ। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पुरातत्त्व विभाग तऽ इहां ले प्रमाणित कइले बा कि मांझी प्रागैतिहासिक स्थान हऽ। ओही तरे एकमा के परसागढ़ के प्राचीनता भी असंदिग्ध बा। ‘परसागढ़’ पुरान संत प्रसादी बाबा का नाम पर बा। परसागढ़ के मठो बहुते प्राचीन हऽ। एही पुरान परंपरा में जगत विख्यात विद्वान प्रसिद्ध घुमक्कड़ महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम ‘बाबा रामोदार दास’ संज्ञा से जुड़ल बा। बाबा के जनम भलहीं उत्तर प्रदेश (आजमगढ़) में भइल होखे बाकिर उनका के विश्व प्रसिद्ध व्यक्ति एकमे-पारसगढ़ बनवलस। बाबा के कर्मक्षेत्र आ ज्ञानक्षेत्र इहे रहल बा। एह जगह का लोग से आ एह स्थान से उनका एतना स्नेह रहे कि स्मृति भंग भइलो पऽ एह जगह आ पुरान साथी सब के बार-बार नाम लेस। ई बात कमला जी (बाबा के पत्नी)1993 का एकमा परसागढ़ के यात्रा में हमनी से बतावत रहली।

केदार पाण्डेय के रामोदार दास रूप में परसागढ़ आगमन

महापंडित राहुल सांकृत्यायन के जिनगी के आधार एही एकमा परसागढ़ से शुरू भइल। बाबा लक्ष्मण दास महंथ (परसागढ़ मठ) चिंतित रहत रहनी, काहे कि युवा साधु रामोदार दास के मृत्यु हो चुकल रहे। उनका नाम से मठ के जमीन-जायदाद रहे। युवा साधु के महंथी देत समय बाबू लोग (जमींदार, परसागढ़) नाखुश हो गइल रहे। मठ के जमीन-जायदाद पर बाबू लोग मुकदमा ठोक देले रहे। मठ के जमीन-जायदाद के सुरक्षा खातिर एगो अइसन युवक के तलाश रहे, जे तेज-तर्रार अउर महंथी के काबिल होखे।

नयका मंदिर खातिर पत्थर खरीदे बाबा लक्ष्मण दास महंथ वाराणसी गइल रहनी। ओहिजा के महंथ के एगो छावनी रहे, जवना में संस्कृत के अध्यापन भी होत रहे। अचानके बाबा लक्ष्मण दास के धेयान एगो अइसन 19 वर्षीय युवक पऽ गइल जवन ओहिजा संस्कृत पढ़े आइल रहे अउर ओकरा साधु बने के मनो रहे। ऊ पंडित राजकुमार जी के माध्यम से आइल रहे। ओह युवक के नाव केदार पाण्डेय रहे अउरउ आजमगढ़ के पंदाहा के रहे वाला रहे। बाबा लक्ष्मण दास के संपर्क में आ के अउर पंडित रामकुमार के कहला पऽ केदार पाण्डेय छपरा परसागढ़ चले खातिर तइयार हो गइले। महंत जी केदार पाण्डेय के छपरा लेके अइनी आ 2 दिन रुक के तीसरा दिने एकमा होत परसागढ़ पहुंचनी। केदार पाण्डेय के मठ में ओही चबूतरा प बइठावल गइल, जवना चबूतरा पऽ रामोदार दास बइठत रहनी। एकादशी, 1912 के केदार पाण्डेय के नाम बदलके रामोदर दास कऽ दिहल गइल। शुभ मुहूर्त में वैदिक रीति से उनकर नामकरण संस्कार कइल गइल। सनातनी पद्धति के अनुरूपे उन्हका के कंठी-माला दिहल गइल। छापा लगावल गइल अउर झूल पहिनल अनिवार्य कऽ दिहल गइल। राम मंत्र से उन्हका के दीक्षा दिहल गइल। उन्हका से कहल गइल कि आज से रउरा रामोदार दास साधु हो गइनी। जमीन-जायदाद रउरे नाम से बा। ओकर देखभाल करे के होई अउर मुकदमा के सगरी कागजात रउरे देखे के होई।

परसागढ़ मठ के जिम्मेवारी

बाबा लक्ष्मण दास के बात सुनि के केदार पाण्डेय जी के लागल कि ऊ कहां आ के फंस गइलन। हालांकि जमीन-जायदाद अउर मठ के मिलकियत देखे के भार त ऊ ले लेलन, बाकिर उनका लागल कि उनका अपना सोच के उल्टा एहिजा रहे के पड़ी। उनकर शिक्षा ना हो पाई। महंथ जी  रामोदार दास के आश्वस्त कइनी कि उनकर पढ़ाई-लिखाई के पूरा व्यवस्था होई। खाली उहां के जमीन-जायदाद के रक्षा करे के बा। रामोदार दास के बड़ा आराम आ चैन से नौकर-चाकर के बीच में रहे के पड़ल। राजकुमार के जइसन उनकर देखभाल शुरू भइल। रामोदार दास जमीन-जायदाद के सुरक्षा के जिम्मा त ले लेहलन बाकिर ऊ बंध के ओहिजा रहे के ना चाहत रहन। एह से उहां से भाग के दक्षिण चल गइलन मठ से संबंधित स्थानन के भ्रमण करे लगलन। महंथ लक्ष्मण दास के निहोरा पर ऊ 1913, 1914, 1917 अउर 1918 में परसागढ़ आवत रहलन अउर मुकदमा के देखभाल करत रहलन। देश के पूरा तीर्थ, मठ से जुड़ल स्थानन के घूमत रहलन। आगरा में जाके 1915 में आर्य समाजी हो गइलन। एक दिन महंथ जी के तार पढ़के ऊ सर्वे के काम से मठ के जमीन के देखभाल करे खातिर परसा आ गइलन। ई सोचत कि हम त अब आर्य समाजी हईं,  वैष्णव मठ से हमार का संबंध? महंथ जी के विस्तृत पत्र पढ़ के अउर उनकर बूढ़ारी के कारण मठ में लवट आइल रहन अउर मठ के संपत्ति के देखभाल करे लगलन। 1917- 18 के बीच महंथ जी कहनी – अब त हमार जिनगी के कवनो ठिकाना नइखे, रामोदार के नाम लिख- पढ़ देवे के चाहीं। रामोदार दास कहनी कि हम महंथ हरगिज ना बनब। हम मठ के संपत्ति के रक्षा खातिर आ गइल बानी। हमरा पढ़े के बा अउर देश के काम करे के बा। अगर रउवा महंत बनावे के बा तऽ दोसर साधु बरदराज जी के बनाईं। ई कह के फेर ओहिजा से चल गइनी। 1918 के बाद उहां के लगातार घूमते रहनी बाकिर उहां का ईयाद में हमेशा परसा मठ बनल रहल। महंथी उहां के स्वीकार ना कइनी बाकिर अपना प्रतिज्ञा से बंधल रहनी। महंथ लक्ष्मण दास के मर गइला के बाद मठ में आइल ना के बराबर हो गइल।

शुरुआती जिनगी

09 अप्रैल 1893 ई. में आजमगढ़ के पन्दहा गांव में बाबा राहुल सांकृत्यायन के जनम गोबर्द्धन पाण्डेय आ कुलवन्ती देवी के ब्राम्हण कुल में भइल। बाबा के बचपन के नाम केदार पाण्डेय रहे। लालन-पालन आ पढ़ाई कन्नौल गांव के नाना राम शरण पाठक के देखरेख में 16 साल के उमिर तक चलल। रानी का सराय गांव के एगो छोट मदरसा में बाबा उर्दू के शिक्षा लिहलन। नाना अवकाशभोगी पल्टनिहा रहलन, जेकरा देश-विदेश के घुमला के अनुभव से बाबा काफी प्रभावित रहस। 11 साल के उमिर में 8 साल के कन्या से बाबा के बिआह कऽ दीहल गइल। पुरान विचार के परिवार में घर-गृहस्थी संभाले खातिर एही तरे लोग शादी-बिआह कर देत रहे। बाबा का मन में समाज का प्रति विद्रोह जागल आ उ 16 साल के उमिर में घर बार छोड़ के बनारस भाग अइलन। इहां दयानंद हाई स्कूल में संस्कृत के शिक्षा लेत रहलन एही बीच उनकर मुलाकात लक्ष्मण बाबा से हो गइल। लक्ष्मण बाबा एह अनाथ ब्राह्मण बाल के मेघा के पहचान गइलन आ अपना साथे ले के परसागढ़ मठ चल अइलन।

सार्वजनिक जिनगी

1921 में बिहार अइला के बाद गांधीजी के असहयोग आंदोलन के आकर्षण बढ़ल। एकमा में सौभाग्य से उनकर अनेक साथी लोग एह आंदोलन से जुड़ल रहे। प्रभुनाथ सिंह, गिरीश तिवारी, लक्ष्मी नारायण सिंह, हरिहर, मधुसूदन, राम बहादुर, छबीला, बासुदेव जइसन एक दर्जन साथी 24 घंटा राष्ट्रीय काम में लागल रहे लोग। रामोदार दास एह साथियन के लेके आंदोलन के अउर जागृति प्रदान कइनी। गांधीजी के एकमा में बोलावे के श्रेय बाबा के रहे। एकमा में गांधी विद्यालय खोलल गइल। करघा आ चरखो रखाइल। विद्यालय में पढ़ावे वालन में राम उदार, रामबहादुर आदि लोग रहे। महात्मा गांधी के जय, भारत माता की जय आदि नारा के साथ जुलूस निकाल के आंदोलन के आगे बढ़ावल गइल। आस-पास के इलाकन में सभा कइल जाव। पंडित नगनारायण तिवारी एह सभ सभा में शामिल होखीं। उनकरे गीत से सभा शुरू होत रहे। विदेशी चीजन के बहिष्कार होखे आ देशी चीजन के अपनावल जाव। ई आंदोलन पुरनका छपरा जिला (छपरा, सीवान, गोपालगंज) के कोना-कोना में फइल गइल। एह असहयोग आंदोलन के केंद्र एकमे में रहे। रामोदार दास के नाम से गिरफ्तारी वारंट निकलल। तब तक ऊ कांग्रेस कमेटी छपरा के सचिव हो गइल रहलन। एकमा ओकर मुख्यालय रहे। उनका के जेल भेजल गइल बक्सर में 6 महीना खातिर। 6 महीना जेल के बाद फेरू ऊ कांग्रेस के मंत्री होके सिसवन, एकमा, महाराजगंज, कुचायकोट, मशरख आदि स्थानन के भ्रमण करे लगलें। रूद्र नारायण, महेंद्र नाथ सिंह आदि लोग साथ देहल शुरू कइल। मथुरा बाबू, गोरखनाथ त्रिवेदी, हरि नंदन सहाय उनकरा साथे आ गइल लोग। ब्रजकिशोर बाबू, राजेंद्र बाबू, देशबंधु दास, मजहरूल हक साहब आदि लोगन के सहयोग मिलल। नतीजतन फेर रामोदार दास पकड़ा के 1923 में हजारीबाग सेंट्रल जेल में चल गइलन। ओहिजा ऊ 1923-25 तक रहलन। 18 अप्रैल 1925 के जेल से छूटलन। 1925 में असहयोग आंदोलन कमजोर पड़े लागल। 1926 में एह आंदोलन के काफी कमजोर पड़ गइला से उनकर दिल बइठ गइल। ऊ निराश हो गइलन।

1927 ई. में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चुनाव में एकमा से श्री लक्ष्मी नारायण अउर बाबू शिवजी (राजदेव प्रसाद, नारायण सिंह) परसा के जमींदार के बीच झड़प हो गइल। उनका ओह झड़प में अपमान भी सहे के पड़ल। 30 मार्च 1927 के ऊ उनकर अंतिम बार परसा के दर्शन रहे। ओही दिन राति के ऊ प्रतिज्ञा लेहलन कि जबले जमींदारी प्रथा रही तबले ऊ परसा में गोड़ ना रखिहें। 2 मई 1927 के उनका लंका जाए के तय भइल। ओह असहयोग के साथी लोगन में से कुछ लोग आजादी मिलला प देश के ऊंचा-ऊंचा पद प जइसे राष्ट्रपति, मंत्री, सांसद अउर विधायक भइल।

ऊ परसागढ़ छोड़ के, छपरा, सिवान, एकमा आदि जगह प  मउका-कु-मउका आवत रहलन। 1939 में अमवारी के किसान आंदोलन सहजानंद सरस्वती के बतावल रास्ता के ही आंदोलन रहे। ओकर अगुआ राहुल सांकृत्यायन ही रहलन। ऊ एह आंदोलन में पिटा गइलन आ उनका जेलो  जाए के पड़ल। असहयोग आंदोलन के दौर में 1923 के आस-पास बाबा के हजारीबाग सेंट्रल जेल जाये के पड़ल रहे, जहां मार्क्सवाद से प्रभावित पुस्तक ‘बाइसवीं सदी’ लिखलन। बाइसवीं सदी में रामराज्य से मिलत-जुलत कल्पना साम्यवाद के अंतिम फलाफल के रूप में कइल गइल बा।

बाबा 1927 में संस्कृत के अध्यापक होके लंका गइलन आ उहां 1928 में उनका ‘त्रिपिटिकाचार्य’ के उपाधी मिलल। भारत लौटला पर 1928 में काशी के पंडित लोग उनका के ‘महापंडित’ के उपाधी से सम्मानित कइल। 30 जुलाई 1930 में बाबा आर्य समाज आ कांग्रेस राजनीति के विचार त्याग के बौद्ध भिक्षु बन गइलन । एह उपलक्ष में उ आपन नाम बदल के ‘राहुल सांकृत्यायन’ रख लेहलन। बुद्धपुत्र ‘राहुल’ आ गोत्र ‘सांकृत्यायन’ मिल के राहुल सांकृत्यायन हो गइल। तब से दुनिया में इहे नाम प्रचलित भइल।

1932 में बौद्धधर्म के प्रचार खातिर लंका से लंदन गइलन। यूरोप के यात्रा कके 1933 में लद्दाख लौट के हिमालय, तिब्बत आ मध्य एशिया के यात्रा कइलन। तिब्बत से कई सौ के संख्या में संस्कृत, पाली, प्राकृत आ अपभ्रंश के पाण्डुलिपि लेके अइलन जवन पटना संग्रहालय में सुरक्षित बा। 1937 में लेलिन ग्राड (रूस) में प्राचीन भाषा-संस्थान के अध्यापक बन के गइलन आ संस्थान के सचिव एलेना (लोला) से गंधर्व विवाह कर लीलहन। ई इनकर विवशता रहे। 1939 में लौट के भारत अइलन आ सहजानंद सरस्वती का किसान आंदोलन का साथे जुट गइलन। 1939 में छपरा जिला (आज सिवान जिला) के अमबारी में जमींदार के खिलाफ भारत के पहिलका किसान आंदोलन के नेतृत्व कइलन जवना खातिर उनका लाठी, भाला आ जेल सभ मिलल। 1934 का बिहार भूकंप में राहुल जी काफी जी-जान से लोग के मदद कइले रहस। 1942 का आंदोलन में त राहुल जी भाग ना लेहलन बाकिर देश के आजादी खातिर अपना रचना का माध्यम से अनेक काम कइलन। एशिया, यूरोप के अनेक देश के बार-बार यात्रा कके अपना अनुभव के लाभ लोग के देत रहलन। 24 माह फेर रूस रह के 1949 में राहुल जी भारत लौटलन। 1942 का आस-पास अपना निजी सचिव ‘कमला जी’ के धर्मपत्नी  का रूप में स्वीकार कइलन। कमलाजी के सम्पूर्ण जीवन के तइयारी में राहुल जी के हाथ बा। राहुल जी के पुत्रजेता जी आ पुत्री जमा जी आ खुद कमलाजी राहुल जी के विविध विचार के प्रचार में जुटल बा लोग।

राहुल जी स्वतंत्र आ स्वाभिमानी रहस। साम्यवाद में उनका आस्था रहे बाकिर हिन्दी राष्ट्रभाषा बने, एह मुद्दा पर उ 1948 से 1958 तक पार्टी (साम्यवादी) से अलग रहलन।  हिन्दी के उनकर सेवा अपूर्व बा। सैकड़ो ग्रंथ कहानी, उपन्यास, मालावृत्त, इतिहास, शोधग्रंथ आदि हिन्दी में लिख के एह भाषा आ साहित्य के सम्पन्न कइलन। 1959 से 1961 तक लंका के  विद्यालंकार विश्व विद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष-अध्यापक रहलन आ उहे विश्वविद्यालय उनका के डी. लिट् के उपाधि देहलस।

14 अप्रैल 1963 में उनके पार्थिव शरीर सदा खातिर एह दुनिया से चल गइल बाकिर राहुल जी के यशस्वी शरीर अमर बा। जवना देश में राहुल जी पैदा भइलन आ विश्व में जे देश के नाम फइलवलन ओह अमर विभूति के मरणोपरांत भारत सरकार से ‘पद्मभूषण’ के उपाधि मिलल। महान आत्मा के इहे फल मिलेला।

राहुल जी के बहुविध स्वरूप

राहुल जी बहुभाषा विद् रहस। उनका अनेक भाषा पर अधिकार रहे। अनेक भाषा के रचना करे  के क्षमता उ रखत रहस बाकिर हिन्दी आ भोजपुरी से उनका मोह रहे। भोजपुरी में उ आठ गो नाटक आ कुछ फुटकर निबंध लिखलन। दुर्भाग्यवश उनकर लिखल खाली तीन गो नाटक (मेहरारूअन के दुरदसा, नइकी दुनिया आ जोंक) उपलब्ध बा। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन पत्रिका में ई तीनों नाटक के प्रकाशन भइल बा। संस्कृत, पाली, प्राकृत से लेके हिन्दी भोजपुरी तक के दुनिया में राहुल जी समान विचार रखेवाला विद्वान रहस। लोकभाषा के विकास पर उनकर काफी जोर रहे। जहां जास उहें भाषा सीख लेस आ ओही में आपन विचार प्रचार शुरू कर देस। राहुल जी अद्भूत मस्तिष्क वाला व्यक्ति रहस। उनकर लेखन कार्य विचित्र ढंग से चलत रहे। उनका साथे बराबर टाइपिस्ट रहत रहे आ उनकर बोली हर वाची टाइप होत रहे। अइसन विचार आ चिन्तन के धनी आदमी संसार में दुर्लभ बा।

राहुल जी के जीवन के बहुविध स्वरूप मिलेला बाकिर उनका समूचा जीवन के चार गो रूप के विशेष महत्वपूर्ण बा।  पहिला वैष्णव साधु के रूप, दोसरा-आर्य समाजी रूप, तीसरा-बौद्ध भिक्षु रूप आ चउथा-साम्यवादी रूप। राहुल जी के विकास में उनकर बौद्ध आ साम्यवादी रूप ज्यादे महत्वपूर्ण बा। अइसे कांग्रेस सेवक के राजनीति के रूप में भी उ कम आकर्षक नइखन। एक साथे साधु, साहित्यिक, राजनीतिक, घुम्मकड़ शोधकर्त्ता आदि के मेल एक व्यक्ति में देखे के होखे त राहुल  सांकृत्यायन में देख ली। ई रूप संसार में कवनो अउर व्यक्ति में ना मिली। अइसन महामानव सांचो पूज्य होलन।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन के सच्चा कर्मभूमि बिहार के सारण जिला ही रहे। असहयोग आन्दोलन से ले के किसान आन्दोलन तक के शुरुआत उ सारणे जिला से कइलन। परसागढ़ के जमींदार का खिलाफ ई पहिलका आन्दोलन 1928 के आस-पास शुरू कइले रहस जवना में उनका काफी अपमान मिलल रहे। जमींदार का व्यवहार से उ क्षुब्ध हो के भीष्म प्रतिज्ञा कइले रहस कि जब तक जमींदारी प्रथा के अंत ना होई हम एकमा-परसागढ़ में गोड़ ना राखब। एकर उ निर्वाहो कइलन। छपरा-सीवान आवस बाकिर एकमा ना उतरस। जब जमींदारी के अंत हो गइल त 1956 में राहुल जी के प्रतिज्ञा टूटल आ उ परसागढ़-एकमा अइलन। घर-घर घुम के पुरान साथी लोग से मिललन आ कई गो बैठको कइलन। राहुल जी के दर्शन के सौभाग्य 1956 में हमरो मिलल रहे जब उ एकमा में एगो सभा मंच से बोलत रहस। ओह लंबा, छरहरा, गौर, सौम्य मूर्त्ति में एगो विचित्र आकर्षण मिलल जवन आजो प्रेरणा के स्रोत बन के श्रद्धा सुमन अर्पित करे खातिर विवश कइले रहेला।

( नंदलाल सिंह डिग्री कॉलेज से अवकाश प्राप्त  प्रोफेसर अउर हिंदी विभागाध्यक्ष राजगृह सिंह हिंदी-भोजपुरी  के वरिष्ठ कथाकार-निबंधकार आ समाजसेवी हईं ।)


img413.jpg

Hum BhojpuriaMay 20, 20201min8730

लेखक-निर्देशक अनिल अजिताभ के 4 मई के पटना में निधन हो गइल। चित्त बहुत अशांत बा। अभी जाये के उमर त ना रहल ह। भोजपुरी सिनेमा के एगो अइसन निर्देशक जेकरा पर नाज़ रहल ह,  जेकरा से बहुत उम्मीद रहल ह, ओकर असमय गइल झकझोर देलस। जे भोजपुरी में बाहुबली आ रणभूमि जइसन फ़िल्म के निर्देशन कइल, जे हिंदी में जय गंगाजल, अपहरण आ दिल क्या करे जइसन फ़िल्म के असोसिएट डायरेक्टर रहल, जे दामुल,  मृत्युदंड,  अपहरण,  राजनीति आ बंदिश जइसन फ़िल्म खातिर स्क्रीनराइटर के रूप में योगदान दिहल, ओह कमाल के व्यक्तित्व आ सरल-सहज इंसान अनिल अजिताभ जी के निधन सिनेमा के साथे हमार व्यक्तिगत क्षति भी बा। एक दशक के साथ-संगत रहल ह। अनेक बार साथे स्क्रीन शेयर करे के अवसर मिलल बा। हमरा किताब ‘ भोजपुरी सिनेमा के संसार’ में उहां के दर्द छलक के आइल बा। भोजपुरी सिनेमा आ भोजपुरी सिनेमा के निर्देशक के फटेहाली पर उहां के बेबाकी से बोलले बानी। आज उ सब बतिया आ एक दशक के साथ के संस्मरण रह-रह के मन परता। स्मृतिशेष के भावभीनी श्रद्धांजलि।


BISMILLAH_KHAN-RAS_BARSE_.jpg

Hum BhojpuriaMarch 17, 20201min12010

जयंती विशेषः जन्म : 21 मार्च, 1916
मृत्यु : 21 अगस्त, 2006

 लेखक : डॉ. सुनील कुमार पाठक

बिहार के सपूत बिस्मिल्लाह खां के जन्म बक्सर जिला के डुमरांव के पटवा टोली में भइल रहे। साहित्य, संगीत आउर कला के भरपूर सम्मान आ राज्याश्रय प्रदान करेवाला डुमरांव के महाराज बिस्मिल्लाह खां के परदादा जनाब पीरबक्श के बनारस से बोला के अपना इहां भरपूर आदर-भाव से सत्कार कइले रहनी। जनाब पीर बक्श के बेटा रसूल बक्श आ रसूल बक्श के बेटा पैगम्बर बक्श ऊर्फ बचई मियां रहनी (जेकर लाड़ला बिस्मिल्लाह खां ‘शहनाई के शहंशाह’ के नाम से पूरा दुनिया में मशहूर भइनी।)

बिस्मिल्लाह खां के तीन पीढ़ी डुमरांवे में रहल रहे। बिस्मिल्लाह जी जब से होश सम्हरनी, तब से भारतीय संगीत के सबसे प्राचीन आ लोकप्रिय वाद्ययंत्र शहनाई के तरफ उहां के झुकाव रहल। बाद में तऽ ई अनुराग एतना ले बढ़ गइल कि शहनाई आ बिस्मिल्लाह साहेब दूनू एक दोसरा के पर्याय हो गइले।

बिस्मिल्लाह साहेब के पिताजी पैगम्बरो साहेब के शहनाई-वादन के उस्ताद मानल जात रहे। सांच पूछल जाव तऽ ‘शहनाई’ बिस्मिल्लाह खां के विरासत में मिलल रहे उनकर दादा अउर परदादा भी शहनाई के उस्ताद रहनी। ना खाली ददहर के खानदान बलुक मामा विलायत हुसैन आ छोटका मामा अली बक्श साहेब से शहनाई-वादन के गुर बिस्मिल्लाह खां भरपूर सिखले रहनी। दूनू मामा लोग जब रियाज करे बइठे, तऽ बालक बिस्मिल्लाह बड़ा प्रेम से बइठ के उहां सबके सुनस-गुनस आ मोका पा के खुदो शहनाई के होठ से सटा लेस।

अपना बाबूजी के आपन प्रेरणा-स्रोत स्वीकारे वाला बिस्मिल्लाह खां जी अपना छोटका मामू अली बक्श साहेब से शहनाई-वादन के शिक्षा लेले रहनी। अपना ममहर बनारस में शहनाई के विधिवत सब गुर सीखेवाला बिस्मिल्लाह साहेब बहुत कमे उमिर में संगीत समारोहन के सिंगार बन गइल रहनी। ठुमरी, कजरी, चइती आ ना जाने केतना-केतना धुन में महारथ हासिल क के, उहां के हर महफिल के बादशाहियत हासिल कऽ लेबे में माहिर हो गइल रहनी। बचपने में ख्याल गायकी आ अउरो कइगो रागन पऽ उहां के बढि़या पकड़ बन गइल रहे।

शुरुआतिये दौर में ढेर नाम आ जश कमइला के बावजूदो उहां के विदेश-दौरा पर जाये के कवनो उत्सुकता ना रहत रहे। हवाई यात्रा से उहां के काफी घबरात रहनी। 1965 में लंदन जा के कार्यक्रम देवे के जब उहां के नेवता मिलल तऽ आपन यात्रा टाले के खेयाल से उहां के एगो शर्त रख दीहनी कि ‘हम तबे जायेब जब हमार सगरी समाजी लोग जाई।’ 1966 ई. में दोबारा नेवता आइल आ ई बतावल गइल कि सगरी शर्त माने खातिर आयोजक तइयार बाड़न, तब उहां के आपन मन-मिजाज हार-पाछ के बनवनी। उहां के सब समाजी संगे मक्का-मदीना घुमावल गइल आ फेरू उहां के एडिनबर्ग सबकरा साथे पहुंचनी। ओजवा के संगीत-समारोह में बिस्मिल्लाह खां के शहनाई-वादन के जादू सिर चढि़ के बोलल आ उहां के ओजवा के अखबारन के सुर्खी बन गइनी। बाद में खां साहेब जहाज से अमेरिको गइनी आ अपना प्रतिष्ठा के पताका लहरा के लवटनी। एक बेर अहस खुल गइला के बाद तऽ लगातार बिदेशन से उहां के बोलावा आवे लागल आ ओजवा जा के बिस्मिल्लाह खां भारतीय संगीत आ अपना ‘शहनाई-वादन’ के काफी लोकप्रिय बना दिहनी।

बिस्मिल्लाह जी वचन के पक्का आ ईमानदार आदमी रहनी। जेतना बड़ कलाकार ओतने बड़ आ सच्चा इंसान। एचएमवी कम्पनी के एगो अधिकारी श्री जीएन जोशी आपन एगो किताब -‘डाऊन मेलोडी लेन'(1984) में लिखलें बाड़न कि ‘मुम्बई में अप्रैल महीना में एगो बड़हन संगीत समारोह हर साल होत रहे। बिस्मिल्लाह जी ओकर उद्घाटन करत रहनी। ओही दौरान कम्पनी खातिर रिकॉर्डिंग करावे के हम निहोरा कइनी। कार्यक्रम शनिचर के शुरू होखे वाला रहे। हमनी के एक दिन पहिले शुक्रवार के रिकॉर्डिंग के दिन रोपनी जा। शुक्रवार के जुम्मा के नमाज के चलते उस्ताद बिस्मिल्लाह खां तय कइनी कि रिकॉर्डिंग सबेरे 8:30 बजे से होई। उहां के अपना वचन के मोताबिक सबेरे ठीक 8:15 बजे स्टूडियो पहुंच गइनी। आंख पर करिया चश्मा पेन्हले आइल रहनी। हम पूछनी कि करिया चश्मा काहे चढ़वले बानी? बोलनी -रियाज में तनिका देरी हो गइल रात। आंख गड़त बिया। एही से लगा लेले बानी। हम कहनी- ‘रउरा ना आवे के चाहत रहल हटे तब।’ उहां के जवाब प्रेरणादायी रहे-‘हम रउरा के वचन दे दिहले रहनी। हम ई ना सुने के चाहीले कि केहू कहो कि उस्ताद कहके ना अइले। वादाखिलाफी के आरोप हमरा से बर्दाश्त ना हो सकेला।’ बिस्मिल्लाह साहेब के अइसन विचार एह बेरा के ओह कलाकारन के माथा ठनकावे खातिर काफी बा जे करार ना निभावल अपना महानता के पैमाना मान लेत बा लोग।

बिस्मिल्लाह खां के भोजपुरी संस्कृति, भाषा आ भोजपुरिआ लोग से बड़ा लगाव रहे। भोजपुरी कजरी, पूरबी, ठुमरी आ अउरो कइगो धुन पऽ आधारित गीतन के पूरा दुनिया में उहां के बेहद लोकप्रिय बनवनी। भोजपुरी लोकगीतन आ संस्कार गीतन के शहनाई पऽ सुना के उहां के जन-मानस के खूब रिझवनी। हिन्दी-भोजपुरी फिल्मन में उहां के शहनाई-वादन सिने-जगत में खूब नाम कमइलस।

बिस्मिल्लाह खां के डुमरांव के पटवा टोली स्थित पैतृक निवास के ‘स्मारक’ के रूप में विकसित करे के दिशा में सरकार के ठोस कदम जल्दिये उठावे के चाहीं, ताकि उहां के स्मृति के सहेजल जा सके आ बिहार के एह सपूत के ईयाद में सरधा के फ़ूल हर साल चढ़ावल जा सके।

(लेखक के कई गो किताब छप चुकल बा, जवना में कविता का सर्वनाम  कविता संग्रह 2- उमड़े निबन्ध मेघ निबंध संग्रह प्रमुख बा।)

 

 



About us

भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


Contact us



Newsletter

Your Name (required)

Your Email (required)

Subject

Your Message