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Hum BhojpuriaMay 19, 20211min8080

  आर.के. सिन्हा

दिल्ली विश्वविद्यालय के हालिया संपन्न 97बेवाँ दीक्षांत समारोह में 670 डॉक्टरेट के डिग्री देहल गइल। मतलब ई कि ई सब पी.एच.डी. धारी अब अपना नाम के आगे डॉ. लिख सकsता। का ये सब के शोध पहिले से स्थापित तथ्यन से कुछ हट के रहे ?  बेशक, उच्च शिक्षा में शोध के स्तर अहम होला। एही से इहो तय कइल जाला कि पीएचडी देवे वाला विश्वविद्यालय के स्तर कवना तरह के बा। अगर अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नालॉजी (एमआईटी), कोलोरोडा विश्वविद्लाय, ब्रिटेन के कैम्ब्रिज अउर आक्सफोर्ड विश्वविद्लायन के लोहा सारा दुनिया मानेला त कवनों त बात होइबे नु करी ? ई सिर्फ अखबारन में विज्ञापन देके दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्लाय नइखे बनल। ये सबके नाम उनके विद्यार्थियन द्वारा कइल मौलिक शोध के कारण ही बा।

बड़ा सवाल ई बा कि का हमरा इहाँ हर साल जे थोक के भाव से पीएचडी के डिग्री देहल जाला, ओकर आगे चल के समाज या देश के कवनों रूप में लाभ भी होला ?  सिर्फ दिल्ली विश्वविद्लाय एक वर्ष में 670 पीएचडी के डिग्री देले बा। अगर देश के सब विश्वविद्लायन से अलग-अलग विषयन में शोध करे वाला रिसर्चर के मिले वाला पीएचडी के डिग्री के बात करीं त ई आंकड़ा हर साल हजारन में पहुँच जाई। मतलब हरेक दस साल के दौरान देश में लाखों नया पीएचडी प्राप्त करे वाले पैदा हो ही जाला लोग। का ये शोध करे वाला लोग के शोध भी मौलिक होला ?  का ओ सब में कवनों ये तरह के स्थापना कइल गइल होला जवन नया होला ?  ई सवाल पूछल एसे भी जरूरी बा, काहे कि हर साल केन्द्र आ राज्य सरकार बहुत मोट राशि पीएचडी खातिर शोध करे वाला शोधार्थी सब पर व्यय करेला। ये लोग के शोध के दौरान ठीक-ठीक राशि दिहल जाला ताकि इनके शोध कार्य में कवनों तरह के व्यवधान या अड़चन ना आवे अउर इनकर जीवन यापन भी चलत रहे। निश्चय ही उच्च कोटि के शोध से ही शिक्षण संस्थानन के पहचान बनेला। जे संस्थान अपना शोध अउर ओकर क्वालिटी पर ध्यान ना देवे ओके कभी गंभीरता से ना लिहल जाला।

देश में सबसे अधिक पीएचडी के डिग्री तमिलनाडू, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में देहल जाला। मानव संसाधन मंत्रालय के 2018 में जारी एक रिपोर्ट पर यकीन कइल जाय त ओ साल तमिलनाडू में 5,844 शोधार्थियन के पीएचडी देहल गइल। कर्नाटक में पाँच हजार से कुछ अधिक शोधार्थी पीएचडी के डिग्री लेवे में सफल रहे। उत्तर प्रदेश में 3,396 शोधार्थियन के ई डिग्री मिलल। बाकी राज्य भी पीएचडी देवे में कवनों बहुत पीछे नइखे। भारत में साल 2018 में 40.813 नया पीएचडीधारी सामने अइलन। आखिर एतना शोध भइला के लाभ केकरा मिल रहल बा? शोध पूरा भइला अउर डिग्री लेहला के बाद ओ शोध के का होला? का एमे से एकाध प्रतिशत शोध के प्रकाशित करे खातिर कवनों प्रकाशक तैयार होले ? कवनों प्रतिष्ठित अखबार के नजर भी ओ शोधन पर जाला ? का हमरा इहाँ शोध के स्तर सच में स्तरीय या विश्व स्तरीय होला ?  ई बहुत जरूरी सवाल बा। ये पर गंभीरता से बात कइल भी जरूरी बा। जवन भी कहीं हमरा इहाँ शोध के लेके कोई भी सरकार या विश्वविद्यालय बहुत गंभीरता के भाव ना राखे।

भारत में जब उच्च शिक्षा संस्थानन के शुरुआत भइल तबो क्वालिटी रिसर्च के बहुत महत्व ना देहल गइल। निराश करे वाली बात ई बा कि हमनीं शोध पर कायदे से कभी फोकस हीं ना कइनीं। अगर हर साल हजारन शोधकर्ता लोग के पीएचडी के डिग्री मिल रहल बा त फेर ये लोग के विश्व स्तर पर सम्मान काहे नइखे मिलत। माफ करेम हमनीं के आईआईटी संस्थानन के चर्चा भी बहुत होला। इहाँ पर भी हर साल बहुत से विद्यार्थी के पीएचडी मिलेला। का अपना कवनों आईआईटी या इंजीनियरिंग कॉलेज के केहू छात्र के उनका मूल शोध खातिर नोबेल पुरस्कार के लायक मानल गइल? ना नू। अगर रउआ अकादमिक दुनिया से जुड़ल बानीं त रउआ जानते होखेम कि अपना इहाँ शोध के मतलब होला पहिले से प्रकाशित सामग्री के आधार पर ही आपन रिसर्च पेपर लिख लेहल। राउर काम खतम। इहे वजह बा कि शोध में नयापन के घोर अभाव देखाई देला। ई सच में एक घोर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बा कि अपना इहाँ पर शोध के प्रति हर स्तर पर उदासीनता के भाव बा। शोध ये खातिर कइल जाला ताकि पीएचडी मिल जाए आ फेर एक अदद नौकरी। रउआ अमेरिका के उदाहरण लीं। उहाँ के विश्वविद्लायन में मूल शोध पर जोर दिहल जाला। एही चलते उहाँ के शोधार्थी लगातार नोबेल पुरस्कार जीत पावे में सफल रहेलन।

ये बहस के तनि अउर व्यापक क दे तानी। अपना फार्मा कंपनियन के ही लीं। ई लोग नया दवा ईजाद करे पर होखे वाला रिसर्च पर केतना निवेश करेला?  ई मुनाफ़ा के अनुपात में बहुत ही कम राशि शोध पर लगावेला। इहे हालत अपना स्वास्थ्य क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम सबके रहल बा। इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल लिमिटेड (आईडीपीएल) के हीं बात कर लीं। एकर स्थापना 1961 में कइल गइल रहे, जेकर प्राथमिक उद्देश्य आवश्यक जीवनरक्षक दवाइयन में आत्मनिर्भरता हासिल कइल रहे। पर एकरा करप्शन के कारण घाटा पर घाटा भइल। इहाँ भी कबो कवनों महत्वपूर्ण शोध ना भइल। अब देखीं कि भारत में शोध खातिर सुविधा त बहुत बढ़ल, इंटरनेट के सुविधा सभी शोधार्थियन के आसानी से उपलब्ध बा, प्रयोगशाला सबके स्तर भी सुधरल बा, सरकार शोधकर्ता सबके आर्थिक मदद भी करेला। एकरा बावजूद अपना इहाँ शोध के स्तर घटिया ही हो रहल बा। त फेर हम काहे एतना सब पीएचडी के डिग्री बांटते ही जा रहल बानीं? आखिर हम साबित का करे के चाह रहल बानीं ? हम अइसन अनेक शोधार्थियन के जान रहल बानीं जे कुछ साल तक अपना विश्वविद्लायन से पीएचडी करे के नाम पर पैसा लिहलस अउर उहाँ के छात्रावास के भी भरपूर इस्तेमाल कइलस। ओकरा बाद उ बिना शोध पूरा कइले अपना विश्वविद्लाय के छोड़ देहलस या उहें बइठ के राजनीति करे लागल।

एक बात समझ लीं कि हमनीं के शोध के गुणवत्ता पर बहुत ध्यान देवे के होई। ओ शोधार्थियन से बचे के होई जे दायें-बायें से कापी-कट आ पेस्ट क के आपन शोध थमा देला। ये मानसिकता पर तत्काल से रोक लागे के चाहीं। शोध के विषय तय करे के एक मात्र मापदंड इहे होखे कि एसे भविष्य में देश अउर समाज के का लाभ होई ? शोधार्थियन के गाइड्स पर भी नजर रखल जाए कि उ कवना तरह से अपना शोधार्थी के सहयोग कर रहल बाड़ें। बीच-बीच में शिकायत मिलत रहल बा कि कुछ गाइड्स अपना शोधार्थियन के प्रताड़ित करत रहेला लोग। ये सब बिन्दुअन पर भी ध्यान दिहल जाए।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


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Hum BhojpuriaApril 19, 20211min8300

आर.के. सिन्हा

रतन टाटा के भारत-रत्न देवे के हाल में सोशल मीडिया में चलल कैंपेन अपने आप में अइसे त कतई गलत ना रहे। पर जे देश भर के रत्न होखे ओकरा भारत रत्न चाहे कोई दोसर पुरस्कार मिले या ना मिले, ओसे का फर्क पड़ता। उ त देश के नायक पहिलहीं से ही बाड़े। उनका के रउआ नायकन के नायक कह सकsतानी। जब रतन टाटा के भारत रत्न से सम्मानित करे के मांग जोर पकड़ल त रतन टाटा के खुद ही कहे के पड़ल कि ‘ऊ अपना प्रशंसक सबके भावना के कद्र करsतारे लेकिन अइसन कैंपेन के बंद करे के चाहीं। हम भारतीय भइला आ भारत के ग्रोथ अउर समृद्धि में योगदान करे में खुद के भाग्यशाली मानsतानी। जाहिर बा, ये तरह के बात कवनों शिखर शख्सियत ही कर सकsता। सामान्य कद के इंसान रतन टाटा के तरह के स्टैंड त नाहिंये ली। के ना जानेला कि बहुत से सफेदपोश हस्ती भी पद्म पुरस्कार पावे खातिर अनेक तरह के लाबिंग अउर कई समझौता करेला।

टाटा समूह के पुराण पुरुष जे.आर.डी. टाटा के 1993 में निधन के बाद रतन टाटा नमक से लेके स्टील अउर कार से लेके ट्रक आ इधर हाल के बरिस में आई टी सेक्टर में भी टाटा समूह के एक शानदार अउर अनुकरणीय नेतृत्व देले बाड़न। रतन टाटा के भारत हीं ना बल्कि सारा संसार के सबसे आदरणीय कॉरपोरेट लीड़रन में से एक मानल जाला। जे.आर.डी टाटा के संसार से विदा भइला के बाद शंका अउर आंशका जाहिर कइल जात रहे कि का उ जे.आर.डी के तरह के उच्चकोटि के नेतृत्व अपना समूह के देवे में सफल रहिहें?  इ सब शंका वाजिब भी रहे, काहे कि जे.आर.डी टाटा के व्यक्तित्व सच में बहुत बड़हन रहे। लेकिन ई त कहे के परी कि रतन टाटा अपने आपके सिद्ध करके दिखा दिहलन I अइसे त सब बिजनेस वैंचर के पहिलका लक्ष्य लाभ कमाइल हीं रहेला। एमे कुछ गलत भी नइखे। पर टाटा समूह के लाभ कमाए के साथ-साथ एक लक्ष्य सामाजिक सरोकार अउर देश के निर्माण में लागल रहल भी बा। ये मोर्चा पर कम से कम भारत के त कवनों भी बिजनेस घराना टाटा समूह के आगे पानी भरेsला। टाटा समूह के सारा देश एही खातिर आदर करेला कि उहाँ पर लाभ कमाइल ही लक्ष्य ना रहेला। रतन टाटा त अब टाटा समूह के चेयरमेन भी नइखन। उ चेयरमेन के पद टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस (टीसीएस) के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के सौंप देले बाड़े। उनका में प्रतिभा के पहचाने के कमाल के कला बा। उ सही पेशेवरन के सही जगह काम पर लगावेले। उनका एकर अभूतपूर्व नतीजा भी मिलेला। रतन टाटा एन. चंद्रशेखरन के बड़हन जिम्मेदारी देते समय ई ना देखलन कि उ कवनों नामवर अंग्रेजी माध्यम के स्कूल या कॉलेज में नइखन पढ़ले। रतन टाटा ई देखलन कि चंद्रशेखरन के सरपरस्ती में टीसीएस लगातार बुलन्दी के छू रहल बा। एही से उ टाटा समूह के इतिहास में पहिलका बार टाटा समूह के चेयरमैन एक गैर-टाटा परिवार से जुड़ल गैर-पारसी व्यक्ति के बनवलन। ये तरह के फैसला कवनों दूरदृष्टि रखे वाला शख्स ही कर सकsता। चंद्रशेखरन आपन स्कूली शिक्षा अपना मातृभाषा तमिल में ग्रहण कइले रहलन। उ स्कूल के बाद इंजीनियरिंग के डिग्री रीजनल इंजीनयरिंग कालेज (आरईसी), त्रिचि से हासिल कइलन। चंद्रशेखरन के टाटा समूह के चेयरमेन बनला से इहो साफ हो गइल कि तमिल या कवनों भारतीय भाषा से स्कूली शिक्षा लेवे वाला विद्यार्थी भी आगे चल के कॉरपोरेट संसार के शिखर पर जा सकsता। ऊ भी अपना हिस्सा के आसमान छू सकsता।

अगर आज भारत के सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया सबसे खास शक्तियन में से एक मानsता आ भारत के आईटी सेक्टर 190 अरब डॉलर तक पहुंच गइल बा त एकर श्रेय़ कुछ हद तक त रउआ रतन टाटा के भी देवे के होई। रतन टाटा में ई गुण त अदभुत बा कि उ अपना कवनों भी कम्पनी के सीईओ के काम में दखल ना देले। ओ लोग के पूरा आजादी देले कि उ कंपनी के अपना बुद्धि आ विवेक से आगे ले जाय। उ अपने सीईओज के छूट देले काम करे के। हालांकि उनका पर पैनी नजर भी रखस। ओ सबके समय-समय पर सलाह-मशविरा भी देत रहले। ये पॉजिटिव स्थिति में ही उनके समूह के कम्पनी सब दोसरा से आगे निकलेला।

रउआ कह सकsतानी कि जेआरडी टाटा के तरह रतन टाटा पर भी ईश्वरीय कृपा रहे कि उ चुन-चुन के एक से बढ़ के एक मैनेजर के अपना साथे जोड़ सकले। एही खातिर टाटा समूह से एन. चंद्रशेखरन (टीसीएस), अजित केरकर (ताज होटल),  ननी पालकीवाला (एसीसी सीमेंट), रूसी मोदी (टाटा स्टील) वगैरह जुड़ले। ई सब अपने आप में बड़े ब्रांड रहलन। रतन टाटा के पास अगर प्रमोटर के दूरदृष्टि ना रहल रहित आ उ अपना सीईओ पर भरोसा ना करते त फेर बड़हन सफलता के उम्मीद कइल ही व्यर्थ रहे। टाटा अपना सीईओज के आपन विजन बता देले। फिर काम होला सीईओ के कि उ ओ विजन के अमली जामा पहनावस आ ओकरो से भी आगे जाये के सोचे।

अगर रतन टाटा के सम्मान सारा देश करsता त एकरा पीछे उनकर बेदाग शख्सियत बा। इयाद करीं पिछला साल जनवरी में मुंबई में आयोजित एगो कार्यक्रम में रतन टाटा के इंफोसिस समूह के फाउंडर एम. नारायणमूर्ति चरण स्पर्श करके आशीवार्द लेत रहले। रतन टाटा आ नारायणमूर्ति के बीच 9 साल के अंतर बा। मूर्ति टाटा से 9 साल छोट बाड़न, लेकिन नारायणमूर्ति भी माने लन कि उपलब्धियन के स्तर पर रतन टाटा उनका से ढेर आगे बाड़े।

दरअसल रतन टाटा के संबंध भारत के ओ परिवार से बा, जवन आधुनिक भारत में औद्योगीकरण के नींव रखलस। ई मान लीं कि बिल गेट्स आ रतन टाटा जइसन कॉरपोरेट लीडर रोज-रोज ना होखे। ई कवनों भी सम्मान या पुरस्कार के मोहताज नइखन। ये लोग से पीढ़ी प्रेरित होला। इनका सामने कवनों भी पुरस्कार या सम्मान बौना बा। ई सच में भारत के सौभाग्य बा कि रतन टाटा हमार हउअन आ हमरा बीच में अभी भी सक्रिय बाड़े। उनकर हमनीं के बीच रहल ही बहुत सुकून देला।

( लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं. )


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Hum BhojpuriaFebruary 15, 20211min10370

  आर.के. सिन्हा

पाकिस्तानी फौज के तरफ से बलूचिस्तान में कइल जा रहल जुल्म-सितम के खिलाफ आवाज उठावे वाली प्रखर महिला एक्टिविस्ट करीमा बलोच के हाल ही में कनाडा में सुनियोजित निर्मम हत्या में पाकिस्तान के धूर्त अउर शातिर इंटेलिजेंस एजेंसी आईएसआई के नाम सामने आ रहा बा। बलोच पाकिस्तान सरकार, सेना अउर आईएसआई के आँख के किरकिरी बन चुकल रहली। ऊ पाकिस्तान सरकार के काली करतूतन के कहानी लगातार दुनिया के बतावत रहली। एही से उनका के आईएसआई ठिकाने लगा देहलस। बलोच के कत्ल साफ कर देले बा कि कनाडा एक अराजक मुल्क के रूप में आगे बढ़ रहल बा। उहाँ पर खालिस्तानी तत्व त पहिलहीं से जड़ जमा चुकल बा। अब उहाँ पर आईएसआई भी सक्रिय हो गइल बा। ओकरा तरफ से अब ओ लोगन पर वार होत रही जे पाकिस्तान में मानवाधिकार आ जनवादी अधिकार के हनन अउर बढ़ रहल कठमुल्लापन के खिलाफ बोले ला।

गौर करीं कि ई सब ओही कनाडा में हो रहल बा जेकर प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भारत सरकार के प्रवचन दे रहल बाड़े किसानन के आंदोलन के ले के। जस्टिन ट्रूडो कह रहल बाड़े कि भारत सरकार अपना आंदोलनकारी किसानन के मांग के माने। कहल जाला, जे शीशा के घर में रहेला ओकरा दोसरा के घर पर पत्थर ना फेंके के चाहीं। जस्टिन ट्रूडो के अपने देश में जंगल राज वाली स्थिति बन रहल बा, पर ऊ भारत के आंतरिक मामला में बेशर्मी से हस्तक्षेप करे से बाज नइखन आवत। ऊ अभी तक बलोच के कत्ल पर एक भी शब्द नइखन बोलले। काहे?  उनका ये सवाल के जवाब त विश्व के देवहीं के परी।

करीमा बलोच के भारत से बहुत उम्मीद रहे। ऊ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आपन भाई मानत रहली। दरअसल, साल 2016 के रक्षाबंधन पर करीमा बलोच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राखी भेजले रहली अउर आपन भाई बनवले रहली। ये राखी के साथ ही करीमा बलोच मोदीजी से बलूचिस्तान के आजादी के गुहार लगवले रहली। साल 2016 में करीमा बलोच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम एक संदेश भेजले रहली, जेमे ऊ कहले रहली कि रक्षाबंधन के दिन एगो बहिन रउआ के भाई मान के कुछ मांगे के चाहsतारी। बलूचिस्तान में केतने भाई शहीद हो गइले आ वापस ना अइले। बलूचिस्तान के लोग रउआ के मानेला। अइसे में रउआ दुनिया के सामने हमनीं के आंदोलन के आवाज बनीं। दरअसल करीमा बलोच 2016 से हीं कनाडा में शरण ले के रहत रहली। कनाडा के प्रधानमंत्री बतावस कि ऊ बलोच के पर्याप्त सुरक्षा काहे ना देहलन I  हालांकि, कुछ वक्त पहिलही ऊ एक वीडियो संदेश में अपना जान के खतरा होखे के बात कहले रहली? करीमा बलोच के गिनती दुनिया के 100 सबसे प्रेरणादायी महिला लोग में कइल जात रहे। करीमा बलोच के कत्ल से समझ आ जाता कि पाकिस्तान सरकार बलूचिस्तान में चल रहल अलगाववादी आंदोलन के ले के केतना परेशान बा।

बलूचिस्तान पाकिस्तान के सबसे पिछड़ल सूबा ह। विकास से कोसों दूर बा बलूचिस्तान। बलूचिस्तान पाकिस्तान से शुरू से ही अलग होखे के चाहsता। कायदे से ऊ बंटवारा के समय भारत के साथ ही रहे के चाहत रहेI स्वतंत्र राज्य रहे ही, पर पंडित नेहरु ओके उदारतापूर्वक पाकिस्तान के दान में दे देहलेI बलूचिस्तान पाकिस्तान के पश्चिम के राज्य ह जेकर राजधानी क्वेटा ह। बलूचिस्तान के पड़ोस में ईरान आ अफगानिस्तान बा। 1944 में ही बलूचिस्तान के आजादी देवे खातिर माहौल बनत रहे। लेकिन, 1947 में एके जबरन पाकिस्तान में शामिल कर लेहल गइल। तबे से बलूच लोग के संघर्ष चल रहल बा अउर ओतने ही ताकत से पाकिस्तानी सेना आ सरकार बलूच लोगन के कुचलत रहल बा। पाकिस्तानी सेना के ताकत ही ओके पाकिस्तान के हिस्सा बना के रखले बा। पर मजाल बा कि जस्टिन ट्रूडो कभी एक शब्द भी बलूचिस्तान के स्थिति पर भी बोलले होखस। पाकिस्तानी सेना स्वात घाटी अउर बलूचिस्तान में विद्रोह के दबावे खातिर आये दिन टैंक आ लड़ाकू विमानन तक के इस्तेमाल करे ला। जवन पाकिस्तान बात-बात पर कश्मीर के रोना रोवत रहेला, ऊ कभी भी बलूचिस्तान में कवनों विकास कार्य ना कइलस। बलूचिस्तान कमोबेश अंधकार के युग में जी रहल बा। का ई सब जस्टिन ट्रूडो के देखाई नइखे देत? बलूचिस्तान में चल रहल सघन पृथकतावादी आंदोलन पाकिस्तान सरकार के नाक में दम कर रखले बा, ई सब जानतारे पर ट्रूडो अपना अनभिज्ञता के स्वांग भर रहल बाड़े।

पाकिस्तान के चार सूबा बा: पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान अउर ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा। एकरा अलावा पाक अधिकृत कश्मीर अउर गिलगित-बल्टिस्तान भी पाकिस्तान द्वारा नाजायज ढंग से नियंत्रित बा, जेकरा के पाकिस्तान अवैध रूप से भारत से हड़प लेले बा। एक न एक दिन ई दूनू जिला भारत से मिलबे करी । पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान में महिला सबके साथ आये दिन खुलेआम बलात्कार करत आ रहल बा। मर्द सबके बड़ी बेरहमी आ बेदर्दी से मारेला। बलूचिस्तान के जनता तब से पाकिस्तान से अउर ही दूर हो गइल रहे जब कुछ साल पहिले बलूचिस्तान के एकछत्र नेता नवाब अकबर खान बुगती के हत्या कर देहल गइल रहे। उनके हत्या में पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ के हाथ बतावल जाला।

बहरहाल, बलूचिस्तान के अवाम के कहना बा कि जइसे 1971 में पाकिस्तान से कट के बांग्लादेश बन गइल रहे ओही तरह एक दिन बलूचिस्तान अलग देश त बनिये जाई। बलूचिस्तान के लोग कवनो भी कीमत पर पाकिस्तान से अलग हो जाए के चाहsता। करीमा बलोच के हत्या के लेके कनाडा के प्रधानमंत्री भलही ना बोलस पर भारत के बलूचिस्तान के जनता के हक में आपन आवाज बुलंद करहीं के होई। बलोच के शहादत कवनों भी सूरत में खाली ना जाये के चाहीं। ये बीचे, भारतीय नागरिकन के, खासतौर पर पंजाब प्रांत से संबंध रखे वालन के, कनाडा के ले के आपन सोच बदले के चाहीं। रउआ कभी मौका मिले त सोमवार से शुक्रवार तक के बीच राजधानी के चाणक्यपुरी इलाकन के चक्कर लगा लीं। एने सुबह से ही रउआ बड़ी तादाद में महिला, पुरुष आ बच्चा तइयार घूमत मिलिहें। इनका के देख के लागे ला, मानी ई सब लोग सुबह ही कवनों विवाह समारोह में भाग लेवे खातिर जा रहल बाड़े। ई लोग अधिकतर कनाडा हाई कमीशन के आसपास घूमत रहेला। ई लोग अलग-अलग समूहन में खड़ा होके आपस में बतियावत भी रहेले। अइसे त कुछ अउर दूतावासन आ उच्चायोगन के बाहर भी वीजा के चाहत रखे वाला लोग खड़ा होखेलें, पर कनाड़ा हाई कमीशन के त का काहे के। एने आवे वालन के चेहरा के भाव पढ़ला पर त लागेला मानी वीजा के जगह भीख मांग रहल बा लोग। का इनका ओ देश में जाये के पहिले सोंचे के ना चाहीं जहाँ पर भारत विरोधी गतिविधि लगातार बढ़ रहल बा आ जवन अराजकता के जाल में फँस रहल बा?

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं)


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Hum BhojpuriaJanuary 19, 20211min12080

  आर. के. सिन्हा

सरदार बूटा सिंह के निधन तब भइल जब अय़ोध्या में राम मंदिर के निर्माण कार्य के श्रीगणेश हो चुकल रहे। ये तरह से, पूर्व गृहमंत्री बूटा सिंह जी के आत्मा के शांति मिलल होईI ये तथ्य से कम लोग ही वाकिफ बा कि बूटा सिंह भगवान राम के अनन्य भक्त रहलन आ सुप्रीम कोर्ट में मंदिर-मस्जिद मसला पर जवन केस चलल रहे ओमे ऊ हिन्दू पक्ष के एगो महत्वपूर्ण सलाह भी देहले रहलन। कहे वाला त इहो कहेला कि अगर रामलला के ये केस में पक्षकार ना बनावल गइल रहित त फैसला अलग हो सकत रहे। ई जानल दिलचस्प बा कि रामलला के पक्षकार बनावे के पीछे तत्कालीन राजीव गांधी सरकार में गृह मंत्री बूटा सिंह के महत्वपूर्ण भूमिका रहे। जब राम मंदिर आंदोलन जोर पकड़े लागल अउर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ताला खुलवा देहले त बूटा सिंह शीला दीक्षित के जरिए विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल के संदेश भेजववले कि हिन्दू पक्ष के तरफ से दाखिल कवनों मुकदमा में जमीन के मालिकाना हक नइखे माँगल गइल अउर एसे उनकर मुकदमा हारल तय बा।

अजीब बिडबंना बा कि अयोध्या विवाद के हिन्दू-मुस्लिम मसला के रूप में ही देखल जात रहल बा। लेकिन ये सब प्रकरण से सिख नेता भी करीबी से जुड़ल रहलन। बूटा सिंह के भूमिका एही बात के पुष्टि कर रहल बा। ये पहलू के अभी तक अनदेखी ही भइल बा या ई कहीं कि ई पक्ष सही रूप से जनता के सामने नइखे आइल। देखल जाय त बूटा सिंह ओही परंपरा के आगे बढ़ावत रहले जेकर नींव गुरु नानकदेव भी सन 1510-11 के बीच में डलले रहलन। बाबा नानक अयोध्या जाके राम जन्म मंदिर के दर्शन कइले रहलन। प्रभाकर मिश्र अपना पुस्तक “एक रुका हुआ फैसला” में लिखले बाड़न कि बाबा नानक अय़ोध्या में बाबर के आक्रमण (सन 1526) से पहिले आइल रहले। बाद में नउआँ, गुरु तेग बहादुर जी अउर दसवाँ गुरु, गुरु गोबिन्द सिंह जी भी श्रीराम जन्मभूमि के दर्शन कइले रहलन।

161 साल पहिले विवादित ढाँचा के अंदर सबसे पहिले घुसे वाला व्यक्ति एक निहंग सिख रहे। सुप्रीम कोर्ट के फैसला में 28 नवंबर 1858 के दर्ज एक शिकायत के हवाला दिहल गइल बा जेमे कहल गइल बा कि ‘इस दिन एक निहंग सिख फकीर सिंह खालसा ने विवादित ढांचे के अंदर घुसकर पूजा का आयोजन किया। 20 नवंबर 1858 को स्थानीय निवासी मोहम्मद सलीम ने एक एफआईआर दर्ज करवाई जिसमें कहा गया कि निहंग सिख, बाबरी ढांचे में घुस गया है और राम नाम के साथ हवन करा रहा है।’ यानी राम मंदिर खातिर पहिलका एफआईआर हिन्दु लोग के खिलाफ ना, सिख लोग के खिलाफ ही दर्ज भइल रहे। अब जरा सोचीं कि ई निहंग सिख पंजाब से केतना लंबा सफर तय करके अयोध्या तक पहुँचल होइहें।

पर अफसोस ई देखीं कि आज कल बहुत से शातिर तत्व हिन्दू अउर सिख में वैमनस्य पैदा करे के हर मुमकिन कोशिश कर रहल बाड़े। भगवान राम के महिमा सिख परंपरा में भी बखूबी विवेचित बा। सिख के प्रधान ग्रंथ “गुरुग्रंथ साहब” में साढ़े पाँच हजार बार भगवान राम के नाम के जिक्र मिलल बा। सिख परंपरा में भगवान राम से जुड़ल विरासत रामनगरी में ही स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड में पूरा शिद्दत से प्रवाहमान बा। गुरुद्वारा में हरेक वर्ष राम जन्मोत्सव मनावल जाला। पूर्वाह्न अरदास-कीर्तन के साथ भगवान राम पर केंद्रित गोष्ठी आ मध्याह्न भंडारा आयोजित होला। एही तरह से सब सिख गुरु भी समस्त हिन्दू लोग खातिर भी आराध्य बाड़न। निश्चित रूप से भगवान राम, अयोध्या में बन रहल राम मंदिर अउर सिख के गहरा संबंध पर शोध अउर चर्चा होखे के चाहीं। जाहिर बा, जब ये बिन्दू पर अध्ययन होई त बूटा सिंह के उल्लेख भी बड़ा आदर पूर्वक होई। उनका के सिर्फ एक राजनीतिक हस्ती या केन्द्रीय मंत्री बता देहल भर से बात ना बनी। उनका मृत्यु पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शोक जतवले रहनीं। ई ये बात के प्रमाण बा कि बूटा सिंह के कवनों दल के नेता कहल सही ना होई।

बूटा सिंह अनुभवी प्रशासक त रहले हीं, ऊ गरीबन के साथ-साथ दलित के कल्यान खातिर भी एक प्रभावी आवाज रहले। बूटा सिंह के देहांत से देश एक सच्चा जनसेवक आ निष्ठावान नेता खो दिहलस। ऊ आपन पूरा जीवन देश के सेवा आ जनता के भलाई खातिर समर्पित कर दिहले, जवना खातिर उनका के हमेशा इयाद रखल जाई। ऊ अंतरंग बातचीत में बतावत रहले कि वाल्मिकी समाज में जन्म लेवे के कारण उनका बचपन में केतना घोर कष्ट सहे के पड़ल। उनहीं से स्कूल के टीचर सुबह क्लास साफ़ करे के कहस, काहे कि ऊ वाल्मिकी समाज से रहलन। उ ओ दौर के इयाद करत उदास हो जात रहलन। बूटा सिंह लगातार सफाई कर्मियन के हक़ में बोलत रहलन। ऊ साफ़ कहस कि दलितन में भी सबसे खराब स्थिति वाल्मिकी समाज के बा। उनका सीवर साफ करत सफाई कर्मी के मौत बहुत विचलित कर देत रहे। ऊ ये लिहाज से भी सही रहलन। कवनों सफाई कर्मी के मौत पर ले-देके उनकर घऱ वाला लोग ही आँसू बहा लेला। इनका मरला के खबर एक दिन अइला के बाद अगला दिन से ही कहीं दफन होखे लागेला। ये बदनसीबन के मरला पर ना केहू अफसोस जतावेला, न ही ट्वीट करेला। कवनों तथाकथित प्रगतिवादी मोमबत्ती परेड भी ना निकालेलाI चूंकि मामला कवनों बेसहारा गरीब के मौत से जुड़ल बा, त ओके रफा-दफा कइल भी आसान होला। ये गरीबन के ना त कवनों सही नाम पता ठेकेदार के पास रहेला ना ऊ घटना के बाद कुछ बतावे के कष्ट ही करेलाI  बूटा सिंह जब देश के केन्द्रीय गृह मंत्री या शहरी विकास मंत्री रहले, ऊ तबो अपना वाल्मिकी समाज से जुड़ल मसलन के प्रति बेहद सजग अउर संवेदशील रहलन। एसे समझल जा सकेला कि देश के असरदार अउर शक्तिशाली पद पवला के बाद भी ऊ अपना लोगन के अपना से दूर ना कइलन। बूटा सिंह के प्रति सही श्रद्धांजलि इहे होई कि देश के दलित अउर वाल्मीकि समाज के शैक्षणिक आ सामाजिक स्थिति में सुधार कइल जाय।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं )


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Hum BhojpuriaJanuary 1, 20211min9300

आर.के.सिन्हा

कभी-कभी हमरा ये बात के हैरानी होला कि काहे हमरा देश के मुसलमानन के एक बड़ा तबका नकारात्मक सोच के शिकार हो गइल बा? इनका फ्रांस में गला काटे वाला के हक में त बढ़-चढ़ के बोले के होला, पर मोजाम्बिक में इस्लामिक कट्टरपंथियन द्वारा दर्जनों मुसलमान लोगन के जब कत्लेआम होला तब ई लोग चुप रहेला। ई लोग हर मसले पर केंद्र के मोदी सरकार के आदतन भले ही रस्म अदायगी खातिर ही काहे ना होखे, विरोध त अवश्य ही करेला। एसे ये लोग के का लाभ बा, ई समझ से परे के बात बा। ये लोग के पूरा तरह से ब्रेन वाश कर देहल गइल बा, स्वयंभू सेक्यूलरवादियन आ  कठमुल्लन द्वारा।

पाकिस्तान में जनमल आ अब कनाडा में निर्वासित जीवन बीता रहल प्रसिद्ध लेखक आ पत्रकार ठीक ही कहेले कि कठमुल्लन अउर जिहादी आतंकवादी सबके निहित स्वार्थ के कारण अल्ला के इस्लाम अब तेजी से “मुल्ला का इस्लाम” बनत जा रहल बा जेसे विश्व के अमन चैन खतरा में पड़ गइल बा। सबसे ज्यादा खतरा एसे मुसलमान लोग के ही बा, काहे कि सबसे ज्यादा निर्दोष मुसलमान ही मारल जा रहल बा। दरअसल, देश के चाहीं डॉ. ए. पी.जे.अब्दुल कलाम, अब्दुल हमीद, अजीम प्रेमजी, सानिया मिर्जा, मौलाना वहीदुद्दीन खान, उर्दू अदब के चोटी के लेखक डॉ. शमीम हनफी जइसन मुस्लिम शख्सियत। ये तरह के अनगिनत मुसलमान चुपचाप अपने ढंग से राष्ट्र निर्माण में लागल बाटे। मौलाना वहीदुद्दीन खान के हमनी के बीच भइल सुकून देला। गांधीवादी मौलाना के अमेरिकी जार्जटाउन यूनिवर्सिटी दुनिया के 500 सबसे ज्यादा असरदार इस्लाम के आध्यात्मिक नेता लोग के श्रेणी में रखले बा। जामिया मिलिया इस्लामिया में लम्बा समय तक पढ़ावत रहल हनफी साहब जइसन राष्ट्रवादी मुसलमानन पर भारत गर्व करेला। ऊ आज के दिन उर्दू अदब के सबसे सम्मानित नाम बा। ऊ जब गालिब या इकबाल पर बोलेलन त ओके बड़ ध्यान से आ अदब से सुनल जाला।

आईटी कंपनी विप्रो के संस्थापक अजीम प्रेमजी शुरू से ही परामर्थ कार्यन में बढ़-चढ़ के हिस्सा लेत रहल बाड़े। ऊ देश के एक महान नायक बाड़े। ऊ पिछला वित्त वर्ष 2019-20 में परोपकार से जुड़ल सामाजिक कार्य खातिर हर दिन 22 करोड़ रुपया यानी कुल मिला के 7904 करोड़ रुपया दान देले बाड़न। दूसरे तरफ पिछले लगभग 70 वर्ष से साम्प्रदायिक दंगा प्रायोजित कराके स्वयंभू सेक्युलरवादी नेता गरीब मुसलमानन के संघ के डर देखावत रहेला। ये लोग के सोचे के चाहीं कि मोदी शासन के 6 वर्ष में जवन अमन-चैन के माहौल बनल बा, का अइसन कभी कवनो दूसरा प्रधानमंत्री के कार्यकाल में रहल? नेहरू से लेके मनमोहन सिंह तक के शासन काल में आये दिन दंगा ही होत रहल।

अब मौलाना आजाद के पौत्र फ़िरोज़ बख्त अहमद के ही लीं। ऊ दशको दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में अंग्रेजी पढ़ावत रहलन। लेकिन, उनका से मुसलमानन के एक कट्टरपंथी तबका एसे नाराज हो गइल कि केंद्र सरकार उनका के हैदराबाद के मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के चांसलर बनवलस। का रउआ यकीन करेम, कवनो विश्विद्यालय के उपकुलपति कुलपति खातिर दरवाजा ये लिए बंद कर देहले होखे कि कुलपति उहाँ पर कुछ सुधार लावे के चाहत होखस, छात्रन के पढ़ावे के चाहत होखस, विश्विद्यालय में मौलाना आजाद “सेंटर फॉर प्रोग्रेसिव स्टडीज अउर सेंटर फॉर इम्पावरमेंट टू मुस्लिम वूमेन” के स्थापना करे के चाह राखत होखस अउर जे उर्दू बाल साहित्य पर कार्यक्रम करे के चाह रखत होखस? फिरोज बख्त के साथ ई सब कुछ एसे भइल कि ऊ संघ से जुड़ल रहल बाड़े। ऊ संघ के शाखा में भी जाले। बख्त साहब एक बार बतावत रहनी कि जब उहाँ के संघ के लोगन के साथ वक्त गुजारे लगनी त उहाँ के अलग तरह के एहसास भइल। तब पता चलल कि संघ त कत्तई मुस्लिम विरोधी नइखे।

माफ करीं दू बार उपराष्ट्रपति रहल हमीद अंसारी जइसन मुसलमान त ये देश के कत्तई ना चाहीं। ऊ जब तक कुर्सी पर रहलन त सरकार के खिलाफ एक शब्द भी ना बोललन अउर जब उनका के तीसरा बार उपराष्ट्रपति ना बनावल गइल (वोइसे ऊ राष्ट्रपति बने के अरमान पलले रहलन) त ऊ मुस्लिम नेता बन गइले। अइसन लोगन के उटपटांग कारनामन के खामियाजा सामान्य मुसलमान लोग के उठावे के परे ला जेकरा ये राजनीति से कवनो मतलब ही नइखे। ऊ लोग त बस रात-दिन मेहनत कर के कमाए-खाए के फ़िक्र में ही लागल रहेले। उनकर स्थिति बहुत खराब हो जाला। ऊ लोग हर जगह पिसते रहेला। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह जब रिटायर भइलें त उनके कवनों देश के राजदूत, राज्यसभा सांसद अथवा राज्यपाल ना नियुक्त कइल गइल। त फेर ऊहो मुस्लिम नेता बन गइले। ऊ मोदी जी के विरुद्ध पुस्तक “द सरकारी मुसलमान: लाइफ एंड ट्रावेल्स ऑफ़ ए सोल्जर” लिख डललन अउर उन पर गुजरात दंगा के आरोप ठोक देहलन। यदि जनरल साहब एतने ही बहादुर रहले आ मुस्लिम कौम के बफादार रहले त ऊ तुरंत सेना के उच्च जनरल के पद से या बाद में कुलपति पद से इस्तीफा देके मुसलमानन के नेतागिरी करते। कुलपति पद पर बइठ के मलाई डकारे के का आवश्यकता रहे? अइसन लचर आ दोगला चरित्र के लोगन के केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान से सीख लेवे के आवश्यता बा जे अपने व्याख्यानन में कुरान अउर गीता के कथन पर सद्भाव बनावे के प्रयत्न करेले।

देश के चाहीं एयर चीफ मार्शल इदरीस हसन लतीफ जइसन महान मुसलमान। ऊ 31 अगस्त 1978 के एयर चीफ मार्शल एच मूलगांवकर के रिटायर भइला के बाद भारतीय एयर फोर्स के प्रमुख नियुक्त कइल गइल रहले। सन 1947 में देश के बँटवारा के वक्त सशस्त्र सेनन के विभाजन के बात आइल त एक मुस्लिम अफसर भइला के नाते इदरीस लतीफ के सामने भारत या पाकिस्तान दुनू में से कवनों भी एक वायुसेना में शामिल होखे के विकल्प मौजूद रहे। परंतु ऊ भारत के ही चुनलन। ऊ 1950 में गणतंत्र दिवस के अवसर पर पहली सलामी उड़ान के नेतृत्व कइले रहले। ऊ 1981 में सेवानिवृत्त भइले। एकरा बाद ऊ महाराष्ट्र के राज्यपाल अउर फिर फ्रांस में भारत के राजदूत के पदभार सम्हरले। आपन कार्यकाल पूरा करके इहाँ के 1988 में फ्रांस से वापस अइनीं अउर अपना गृह स्थान हैदराबाद में रहे लगनी।

अब बात करsतानी, 1965 के जंग के नायक शहीद अब्दुल हमीद (परमवीर चक्र) के बहादुरी के। देश निश्चित रूप से 1965 के जंग में अब्दुल हमीद के शौर्य के इयाद राखी। येही तरह अगर कारगिल जंग के बात होई त इयाद आवत रहिहें कैप्टन हनीफुद्दीन। ऊ राजपुताना राइफल्स के कैप्टन रहले। कैप्टन हनीफुद्दीन कारगिल के जंग के समय तुरतुक में शहादत हासिल कइले रहलन। कारगिल के तुरतुक के ऊँची बर्फ से ढँकल ऊँची पहाड़िन पर बइठल दुश्मन के मार गिरावे खातिर हनीफुद्दीन भीषण पाकिस्तानी गोलाबारी के बावजूद आगे बढ़त रहलन। उनके बहादुरी के कहानी आज भी देश वासी सबके जुबान पर बा। पाकिस्तानी सैनिक मई 1999 में कारगिल सेक्टर में घुसपैठियन के शक्ल में घुसलन आ नियंत्रण रेखा पार कर हमनी के कई चोटिन पर कब्जा कर लेहलस। दुश्मन के ये नापाक हरकत के जबाब देवे खातिर आर्मी, “ऑपरेशन विजय” शुरू कइल, जेमे 30 हजार सैनिक शामिल रहे। ओही में से रहले बहादुर मोहम्मद हनीफुद्दीन। हाल के दौर में देश देख आ पहचान लिहले बा राष्ट्रवादी अउर कठमुल्ला मुसलमानन के। “कठमुल्ला मुसलमान के कौम” देश के हितैषी नइखे। अब देश चाहता सिर्फ राष्ट्रवादी मुसलमानन के जे भारत के मिट्टी से प्यार करे आ सभ देशवासी के साथ मिलजुल के रहे। ई काहे भुलातानी सन कि सभ भारतवासी लोग के पूर्वज तब से एक ही बा जब ना त ईसायत के जनम भइल रहे नाहीं इस्लाम के। फिर काहे पैदा करsतानी भेदभाव अउर कट्टरपूर्ण माहौल?

(लेखक वरिष्ठ सम्पादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं)


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Hum BhojpuriaDecember 15, 20201min18750

  आर.के. सिन्हा

18 नवम्बर 2020 के दिन भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्तन खातिर खासकर बिहार से जुड़ल लोगन खातिर अत्यंत दुःखद रहल, जब मृदुला भाभी( गोवा के भूतपूर्व राज्यपाल मृदुला सिन्हा) के देहावसान हो गइल। सुबह लगभग 7 बजे ही बिहार के नव-नियुक्त उप-मुख्यमंत्री श्रीमती रेणु देवी के फोन आइल अउर उ चिंता भरल लहजा में कहली- “भइया, मामी के हालत सीरियस हो गइल बा।” ऊ मृदुला जी के मामी कहल करस। मृदुला जी हमरा खातिर हमार प्रिय भाभी रहनी। एही तरे देशभर के कार्यकर्तन में ऊ केहू के भाभी, केहू के चाची, केहू के दीदी, केहू के ताई, केहू के नानी, केहू के दादी, ना जाने का-का रहली। वात्सल्य के साक्षात् ऊ एक अइसन भारतीय विदुषी नारी रहली, जेकर कल्पना भारतीय संस्कृति में आदर्श पत्नी, आदर्श माता अउर आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता आ कुशल गृहणी के रूप में होत रहल बा।

मृदुला भाभी के हृदय में भारतीय संस्कृति अउर खासकर बिहार आ मिथिला के लोक संस्कृति रोम-रोम में बसल रहे। उहाँ के ओ क्षेत्र से आवत रहनी जेकरा बहुत निकट सीतामढ़ी में जनक पुत्री सीता जी के जन्म स्थान बा। ई संयोग कहल जाई कि राजा रामचंद्र के पत्नी सीता पर गहन शोध क के एक अद्भुत उपन्यास लिखे के श्रेय भी मृदुला भाभी के ही जाला। ओ अद्भुत उपन्यास के नाम ह- “सीता पुनि बोली।” सीता के चरित्र के, सीता के मनोदशा के, उनका अंतर्व्यथा के, उनके विडम्बनन के, सीता के समक्ष उपस्थित समस्यन अउर ओ सबके निदान के जवना तरे से रोचक वर्णन डॉ. श्रीमती मृदुला सिन्हा जी “सीता पुनि बोली” में कइले बानी ओके पढ़ के कई बार अइसन लागेला कि उहाँ के अपना चरित्र के वर्णन कर रहल बानी। उहाँ के खुद भी मिथिला के ही रहनी। मृदुला सिन्हा जी बाल्यकाल से ही अइसन संस्कारन में पलनी-बढ़नी, कि उनके संस्कार आ उनके रुचि में लोक संस्कृति, लोक साहित्य, लोक कथा आ लोक गीतन के समन्यव गहराई से पनप गइल।

ओह समय में लड़किन के होस्टल में रख के पढ़ावे वाला ग्रामीण परिवार कम ही होखे। लेकिन मृदुला जी के पिता जी उनके बाल्यावस्था में ही बिहार के लखीसराय के बालिका विद्यापीठ में पढ़े खातिर भेज देहले रहनी। ई विद्यापीठ ओ घरी एतना उच्च कोटि के और अच्छा शिक्षण संस्थान रहे कि ओके बिहार के “वनस्थली” कह के पुकारल जाय। मृदुला जी जब बी.ए. के पढ़ाई करत रहनी तबे उनकर विवाह डॉ. रामकृपाल सिन्हा जी से हो गइल, जे मुजफ्फरपुर में बिहार विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहनी। लेकिन डॉ. रामकृपाल सिन्हा जी के प्रोत्साहन से ना केवल उहाँ ले बी.ए. के परीक्षा पास कइनी बल्कि एम.ए. भी कइनी अउर उहें के प्रोत्साहन से लोक कथा के लिखल शुरू कइनी, जवन साप्ताहिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, धर्मयुग, माया, मनोरमा आदि पत्र पत्रिकन में लगातार छपत रहल। बाद में ये सब लोक कथा के दू खण्ड में ” बिहार की लोक कथाओं” के नाम से प्रकाशन कइल गइल।

1968 में डॉ. रामकृपाल सिन्हा भाई साहब एम.एल.सी. होके पटना अइनी। हम भागलपुर में आयोजित वर्ष 1966 के संघ शिक्षा वर्ग पूरा कर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के आशीर्वाद से भारतीय जनसंघ में शामिल हो गइल रहनी। हम पटना महानगर के एक सामान्य सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में काम करत रहनी। साथ ही हिन्दुस्थान समाचार में रिपोर्टर भी रहनी। पटना महानगर में जे भी प्रमुख कार्यकर्ता पटना आवे, उनके देखभाल के जिम्मेवारी सामान्यतः हमरे के देहल जाय। एसे हम रामकृपाल भाई साहब के सम्पर्क में 1968 में अइनी। जब बिहार में 1971 में कर्पूरी ठाकुर जी के नेतृत्व में संयुक्त विधायक दल के सरकार बनल त जनसंघ कोटा से डॉ. रामकृपाल सिन्हा जी कैबिनेट मंत्री भी बननी। अप्रैल 1974 में जब उहाँ के एम.एल.सी. के कार्यकाल समाप्त भइल तब रामकृपाल भाई साहब भारतीय जनसंघ के टिकट पर राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित होके दिल्ली आ गइनी।

1977 में जब जनता पार्टी के सरकार बनल तब रामकृपाल सिन्हा जी के मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल में संसदीय कार्य मंत्रालय एवं श्रम मंत्रालय में राज्य मंत्री बनावल गइल।

1980 में जब उहाँ के राज्यसभा के कार्यकाल समाप्त हो गइल, त उहाँ के वापस मुजफ्फरपुर जाके बिहार विश्विद्यालय में पढ़ावे लगनी। लेकिन, मृदुला भाभी दिल्ली में ही रह गइनी। काहे कि तीनू बच्चा नवीन, प्रवीण और लिली छोट रहे लोग अउर दिल्ली में ही पढ़त रहे। ओ समय बिहार प्रदेश के संगठन मंत्री श्री अश्विनी कुमार जी राज्य सभा में आ गइल रहनी अउर रफी मार्ग पर विट्ठल भाई पटेल भवन में 301 अउर 302 नं. कमरा में रहत रहनी। मृदुला भाभी अउर उनकर बच्चा लोग 302 नं. कमरा में आ गइनी। माननीय अश्विनी कुमार जी 301 नं. कमरा के बॉलकनी के घेर के एक छोटा सा कमरा बनवा लेले रहीं आ ओही में रहत रहनी। हमनी पटना के कार्यकर्ता जब दिल्ली जाईं त 302 नं. के कमरा में जेमे एक सोफा आ एक बेड लागल रहे ओही पर सोईं जा। 302 नं. कमरा में हमनी के भोजन बने। भोजन, जलपान, चाय, नास्ता आदि के पूरा जिम्मेवारी मृदुला भाभी अपना ऊपर उठा लेहले रहनी। चाहे हम पटना से दो या चार लोग भी जाईं, सबका के ओतने प्यार से पूछ-पूछ के मनपसंद भोजन बना के खियावल अउर सबके देखभाल कइल, केहू के कवनो तकलीफ ना होखे, एकर ख्याल उहें के करीं। कपड़ा गंदा हो जाये त बी.पी. हाउस से धोबिन के बोला के कपड़ा देके धुलवावल, इहाँ तक कि जब हम पटना वापस लौटीं त पराठा-सब्जी बना के ट्रेन में खाए के वास्ते दे देहल, एतना सारा कुछ करत रहनी। उहाँ के बात इयाद कइला पर आँख भर आवेला। हमरा के त एतना प्यार देत रहीं जेतना आपन भाभी लोग भी ना देहले होई।

जब उहाँ के भारतीय जनता पार्टी के महिला मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बननी,  महिला आयोग के अध्यक्ष बननी, तब उहाँ के ग्वालियर के महारानी विजया राजे सिंधिया पर उपन्यास लिखनीं। चाहे मामला व्यक्तिगत या राजनीतिक रहे, जब भी उहाँ के दुविधा में रहीं त हमरा से जरूर बात करीं। जब कहीं कुछ काम ना हो पावत रहे त हमरे से ही कहीं। जब उहाँ के गोवा के राज्यपाल बननी त हमरा के सपत्निक  गोवा बोलववनी। राजभवन में ठहरवनी। कई बार त उहाँ के अपने रसोई घर में घुस जाईं अउर मना कइला पर कहीं, “मेरे देवर जी आए हैं। मैं स्वयं उन्हें उनके मनपसंद बिहारी व्यंजन बनाकर खिलाऊँगी।” ई सब घटना सबके बतावल भी मुश्किल बा।

हम उहाँ के अपने विद्यालय द इंडियन पब्लिक स्कूल, देहरादून में एक कार्यक्रम में बोलवनी त उहाँ के आगमन के दिने उत्तराखंड के राज्यपाल राजभवन के गाड़ी अपने ए.डी.सी. के साथ एयर पोर्ट भेजनी। उहाँ के राजभवन के गाड़ी में ना बइठ के हमरा गाड़ी में बइठनी आ कहनी कि “मैं राज भवन में न ठहर कर अपने देवर जी के यहाँ ही ठहरूँगी।” उहाँ के हमरा विद्यालय परिसर के हमरा आवास पर ही रूकनी  अउर एक दिन के कार्यक्रम खातिर आइल रहनी पर चार-पाँच दिन रुकनी। अइसन अनेकों संस्मरण बा। अभी कुछ महीने पहिले महान साहित्यकार, लेखक, सांसद डॉ. शंकर दयाल सिंह जी के पुत्री डॉ. रश्मि सिंह अपना आवास पर 9 अप्रैल के एक कार्यक्रम में मृदुला भाभी अउर हमरा के साथे बोलवनी। ओह कार्यक्रम में मृदुला भाभी हमरा के शाल ओढ़ा के सम्मानित कइनी। उहाँ के हमरा प्रति एतना सम्मान रहे। उहाँ के जब लागल कि उहाँ के कार्यक्रम में आइल बानी त हमरो सम्मान मिले के चाहीं। अइसन विदुषी भारतीय नारी रहनी मृदुला जी। उहाँ के कवना प्रकार से श्रद्धांजलि अर्पित कइल जाय ई समझ मे नइखे आवत। उहाँ के व्यक्तित्व बार-बार ईयाद आ रहल बा। एक बार दीदी मां साध्वी ऋतंभरा जी के वृन्दावन आश्रम में एक कार्यक्रम में उहाँ के मंच पर बइठल रहनी आ हम उहाँ के ठीक सामने नीचे के कुर्सी पर बइठल रहनी। उहाँ के अपना भाषण में मंच पर से कहनी कि” मेरे सामने मेरे देवर जी आर.के.सिन्हा बैठे हैं।” मैंने भी कहा फिर अपने देवर को एक गीत सुना दीजिएगा। उहाँ के आपन भाषण समाप्त कइला के बाद एक लोकगीत गाके सुनवनी। सारा श्रोतागण खुशी से झूम उठल। ई हमार मर्मस्पर्शी क्षण ही रहे। एही तरे बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के, पटना में “शताब्दी समारोह” मनावल जात रहे। हम स्वागताध्यक्ष रहनीं। ओह समय के तत्कालीन राज्यपाल अउर अब देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी के आमन्त्रित कइले रहनी। मृदुला भाभी के भी हम आग्रहपूर्वक बोलवले रहनी। उहाँ के पटना अइनी। दुनू तत्कालीन राज्यपाल सब के साथ मंच पर बइठे के सौभाग्य मिलल। उहाँ के मंच पर बइठले-बइठल रामनाथ कोविंद जी के हमरा बारे में बहुत सारा बात कह गइनी। ऊ सब ईयाद कर के मन भर आवता।

ईश्वर से प्रार्थना बा कि उहाँ के पवित्र आत्मा के चीर शांति प्रदान करीं अउर डॉ. रामकृपाल सिन्हा जी, नवीन, प्रवीण, लिली अउर सभ परिवार जन आ उनके चाहे वाला लाखो कार्यकर्ता भाई लोग के शोक के घड़ी में शक्ति अउर संबल प्रदान करीं। अइसन महान कार्यकर्ता बार-बार भाजपा में आवत रहे। ओम शांति! ओम शांति!! ओम शांति!!

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं।)


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Hum BhojpuriaNovember 23, 20201min21836

आर.के.सिन्हा

फ्रांस अउर इटली में जेहादी कठमुल्लन के करतूतन से सारी दुनिया स्तब्ध बा। ई लोग बेवजह कत्लेआम करे से बाज नइखे आवत। बम बिस्फोट आ कत्लेआम कइल जा रहल बा। ई लोग कोरोनो के विश्वव्यापी काल में सारी दुनिया के सामने एगो लमहर चुनौती पेश क देले बा। सबसे गम्भीर बात ई बा कि ए कठमुल्लन के बहुते मुसलमान सबके साथ आ समर्थन मिल रहल बा। विश्वभर से आ भारत में भी। उम्मीद के किरण जवन आइल बा उ ई कि जावेद अख्तर, शबाना आजमी आ नसीरुद्दीन शाह जइसन कुछ खास मुस्लिम हस्ती फ्रांस हमला के निंदा कइले बा। ई लोग मुनव्वर राणा सरीखे कुछ मुस्लिम धार्मिक अउर राजनीतिक नेतन के जरिए देहल गइल अपमानजनक बयान के खारिज क देहले बा जेमे ऊ लोग फ्रांस में भीषण हत्यन के तर्कसंगत होखे के बात कहले रहे।

संवेदनशील सवालन पर खामोशी-

अभी तक देश के असरदार मुस्लिम लेखक, कलाकार आ बुद्धिजीवी मुसलमान सबसे जुड़ल संवेदनशील सवालन पर गम्भीर चुप्पी साध लेहल करत रहे। ए आलोक में मुख्य रूप से जावेद अख्तर, शबाना आजमी अउर नसीरुद्दीन शाह के खुल के सामने आइल स्वागत योग्य बा। इहे मौका बा जब आमिर खान, शाहरुख खान, सलमान खान अउर बाकी तमाम असरदार मुसलमान लोग कठमुल्लन के हरकतन के खारिज क के उनके सभ्य मुसलमान सबसे अलग-थलग करे। उनका ऑस्ट्रिया के वियना शहर में भइल भीषण”आतंकी” हमला के भी निंदा करे के होई। वियना में मारल गइल बंदूकधारी हमलावर इस्लामिक स्टेट के समर्थक रहे।

वियना के कुछ हथियार बंद बंदूकधारी सब छह जगहन पर गोलीबारी कइल जेमे बहुत से लोग मारल गइल अउर दर्जनो अभी भी मौत से संघर्ष कर रहल बाड़े। ए आतंकी हरकत के निंदा खातिर भी महत्वपूर्ण मुसलमान सबके आगे आवे के होई। ओ सबके अब चुप नइखे बइठे के। मुस्लिम बुद्धिजीवी सबके साथ दिक्कत ई बा कि ऊ सब अपने समाज के कठमुल्लन आ गुंडन से डरे ला। ओकनी से लड़े खातिर कबो सामने ना आवे। ना जाने काहे ए सबसे एतना डरे ला लोग। एही से ई गुंडा सब आतंक मचावेलन। रउआ सबके वफ़ादारी धर्म के साथ जरूर रहे के चाहीं, लेकिन राष्ट्रहित के ताक पर रख के ना, राष्ट्रहित त सर्वोपरि होखे के चाहीं।

चीन पर चुप्पी-

चीन में मुसलमान सब के साथ का हो रहल बा, ये पर कवनो कठमुल्ला आवाज ना उठावे। उहाँ केहू के गर्दन ना काटल जाला आ गोली ना मारल जाला। के ना जाने कि चीन में मुसलमान सब पर लगातार भीषण अत्याचार हो रहल बा। चीन मुस्लिम बहुल शिनजियांग प्रांत में रहे वाला मुसलमान सबके कस रखले बा। वो लोग के खानपान के स्तर पर ऊ सबकुछ मजबूरी में करे के पड़ रहल बा, जवन उनका धर्म में पूर्णरूप से निषेध बा। ई सबकुछ शासक कम्युनिस्ट पार्टी के इशारा पर ये लोग के धर्म भ्रष्ट करे खातिर हो रहल बा। सारी इस्लामी दुनिया ये अत्याचारन पर चुप बा। कहीं कवनों प्रतिक्रिया सुनाई नइखे देत।

इस्लामिक देशन के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कारपोरेशन(ओआईसी) चीन में मुसलमानन पर हो रहल ज्यादतिन पर एक शब्द विरोध के दर्ज नइखे कइले। पाकिस्तान भी पूरी तरह चुप बा। ऊ त चीन के खिलाफ कबो ना बोली। ऊ चीन के पूरा तरह गुलाम बन चुकल बा। इहे स्थित सऊदी अरब आ ईरान के भी बा। शिनजियांग प्रांत के मुसलमान सबके री-एजुकेशन कैम्प सब में ले जाके कम्युनिस्ट पार्टी के विचारधारा से रू-ब-रू करवावल जा रहल बा। बतावल जा रहल बा कि ये शिविरन में अभी दस लाख से अधिक चीनी मुसलमान लोग बा। इहाँ ये लोग से जबरन इस्लाम के निंदा करे के कहल जाला। ये लोग के डेरवावल,धमकावल जाला। अइसन आहार देहल जाला जवन इस्लाम में हराम मानल जाला। ई सब कुछ एह खातिर हो रहल बा ताकि चीनी मुसलमान कम्युनिस्ट विचारधारा अपना लेस। ऊ लोग इस्लाम के मूल शिक्षा से दूर हो जास।

गौर करीं कि चीन के खिलाफ हमरा देश के वामपंथी आ सेक्युलरवादी भी कबो ना बोले। मजाल बा कि ई लोग कभी कठमुल्लन या फिर चीन के मुस्लिम विरोधी अभियान पर एक शब्द बोले। ये लोग के तबो जबान सिल गइल रहे जब भारत में ट्रिपल तलाक के खिलाफ कानून बनत रहे। ई लोग तबो ना मानत रहे कि भारत में मुस्लिम औरत सब के स्थिति बहुत खराब बा।

बुनियादी सवालन से परहेज काहे-

फ्रांस में हत्यारन के हक में मुंबई, भोपाल अउर सहारनपुर में प्रदर्शन करे वाला मुसलमान महंगाई, बेरोजगारी या अपना इलाका में नया इस्कूल, कॉलेज या अस्पताल खुलवावे आदि के  माँग के लेके कभी सड़क पर ना उतरे। का केहू बता सकsता कि ई लोग अपना बुनियादी सवालन के लेके भी सड़कन पर उतरी? का ये लोग खातिर महंगाई, निरक्षरता या बेरोजगारी जइसन सवाल गौण बा? का कबो देश के मुसलमान, किसान, दलित, आदिवासी या समाज के अन्य कमजोर वर्ग के हित खातिर भी आगे आइल बा? कभी ना। लेकिन ई लोग ओ हत्यारन खातिर सड़क पर आ जाला जे मासूमन के फ्रांस या आस्ट्रिया में मारेला। ई लोग कबो कश्मीर में इस्लामिक कट्टरपंथी सबके हाथे मारल गइल पंडित सब खातिर ना लड़े। ये लोग के अपना के हमेशा विक्टिम बतावे के शौक बा। ई लोग सिर्फ अपने अधिकार के बात करेला। ई लोग कर्तव्यन के चर्चा करते हत्थे से उखड़ जाला। अब देखीं जवना मुनव्वर राणा के ई देश दिल से प्यार देले बा ऊ आदमी विक्षिप्त के तरह बात कर रहल बा। काहे लिबरल मुसलमान राणा के कसके ना कोसे ताकि ओकरा एहसास हो जाय कि ऊ केतना नीच बन्दा बा। राणा ई साबित क देहलन कि ऊ उन्मादी, असहिष्णु आ कट्टर हउअन। ऊ घोर कट्टर, साम्प्रदायिक आ सामंती निकललन। लेकिन मुसलमानन के बौद्धिक वर्ग उनके कहे पर चुप्पी सधले बा। मुस्लिम बुद्धिजीवी लोग के साथे इहे समस्या बा कि ऊ आतंकवाद के लेके उदासीन रहेला। एही से पूरा मुस्लिम बिरादरी नाहक कटघरा में आ जाला। अभी भारत अउर पूरी दुनिया देख रहल बा कि बात-बात पर हस्ताक्षर अभियान चलावे वाला बुद्धिजीवी, वाममार्गी, सेक्युलर वगैरह जेहादी आतंकवाद के खिलाफ कवना तरे स्टैंड लेला।

जहाँ तक भारत के बात बा त औसतन मुसलमान हिन्दू सबसे उम्मीद राखेला कि ऊ नास्तिकता के हद तक सेक्युलर हो जाय लेकिन ऊ लोग खुद कठमुल्ला बनल रहे। ई विकृत आ ओछी मानसिकता ह। एके भारत के आम जनता द्वारा अच्छी तरह पहचान लेहल गइल बा। अब भारत अपना देशवासी मुसलमान सबसे उम्मीद करsता कि ऊ लोग अपने ही कौम के कठमुल्लन से लड़े। उनके परास्त करे। उनका ए जंग में देश के समर्थन मिली अउर तब उनका एक स्वाभिमानी आ राष्ट्रवादी कौम के रूप में पूरा सम्मान भी मिली।

 

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं। )


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Hum BhojpuriaNovember 11, 20201min10830

आर.के.सिन्हा

कवनो युवक-युवती में प्रेम भइल या एकतरफा प्रेम भइल सदियन से चलत आ रहल सामान्य बात बा। इहो होला कि अनेक बार एक दोसरा के चाहे वाला में कई कारन से विवाह भी ना होखे। एकर तमाम वजह हो सकsता जेकर चर्चा क के राउर समय बर्बाद नइखीं करे के चाहत। लेकिन कवनो कन्या से एकतरफा प्रेम कइल आ फेर ओकरा पर आपन धर्म बदल के इस्लाम धर्म स्वीकार कर शादी करे के जिद्द करे वाला इंसान के रउआ का कहेम। बेशक ऊ त मानसिक रूप से विक्षिप्त ही होई। एके जेहादी अउर कट्टरपंथी मानसिकता भी कहल जा सकsता। अइसन विक्षिप्त इंसान केतना भयानक कदम उठा सकsता, ई हाले में पूरा देश हरियाणा के औद्योगिक शहर बल्लभगढ़ शहर में देखले बा। ई राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के करीब हीं बा। उहाँ बीकॉम के पढ़ाई कर रहल 21 वर्षीय मेधावी  छात्रा निकिता तोमर के एक सिरफिरा कट्टरपंथी विक्षिप्त नवयुवक के द्वारा अपना एक मित्र के मदद से हत्या कर देहल गइल। ओके 21 साल के तौसीफ नाम के इंसान खाली ए खातिर गोली से भून दिहलस कि ऊ निकिता से एकतरफा प्यार करत रहे आ ओकरा पर साथ भाग के अउर धर्म परिवर्तन करके शादी करे के दबाव बनावत रहे जेमे असफल भइला पर ऊ ये अपराध के अंजाम दिहलस। पुलिस के शुरुआती तफ्तीश अउर निकिता के माँ के बयान से साफ बा कि तौसीफ आ ओकर माँ भी लगातार निकिता पर दबाव डालत रहे लोग कि ऊ इस्लाम धर्म के स्वीकार करके उनकर बहू बन जाय। ऊ ई सब ना कइलस त ओकर जान ही ले लेहल गइल। एकरा पहिले निकिता के अपहरण भी कइल गइल रहे।

ताज्जुब त ई हो रहल बा कि अइसन भयावह घटना के बाद भी ऊ सारा लोग चुप बा जे हाथरस में एक दलित कन्या के बलात्कार अउर हत्या के घटना के ले के सोशल मीडिया से ले के सड़कन तक उतर आइल रहे। का ऊ लोग अपना चुप्पी के वजह के जरा खुलासा भी करी? का केहू इहो बताई कि भारत में ऊ कौन सा तत्व बा जे तौसीफ जइसन नवजवानन के जेहादी बना रहल बा? जवना उम्र में तौसीफ के पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देवे के चाहत रहे, ओ उम्र में ऊ एक युवती पर धर्म परिवर्तन के दबाव बनावत रहे।

आरोपी तौसीफ के संबंध हरियाणा के सम्पन्न कांग्रेसी परिवार से बा। ओकर दादा कबीर अहमद विधायक रहल बाड़े। ओकर चाचा खुर्शीद अहमद हरियाणा के पूर्व मंत्री रहलन। नूंह से कांग्रेस विधायक आफताब अहमद ओकर चचेरा भाई हउअन। का जवन राहुल गाँधी आ प्रियंका गाँधी हाथरस के घटना पर सड़क पर उतरल रहे लोग ऊ अपना पार्टी के विधायक के भतीजा के खिलाफ भी तत्काल कठोर कार्रवाई के माँग करी अउर निकिता के घर जाके उनका घर वालन के भी सांत्वना दी? फिलहाल उनके अल्पसंख्यक प्रेम के पूर्व के इतिहास के कारण अइसन लागत त नइखे। बल्लभगढ़ घटना के तीन दिन बाद तक गाँधी परिवार के तरफ से कवनो प्रतिक्रिया तक ना आइल रहे। फिलहाल तौसीफ आ ओकर साथी रेहान के त हरियाणा पुलिस गिरफ्तार कर लेले बा। पर एक निर्दोष बच्ची के जान त चल गइल। निर्भया, हाथरस अउर अब बल्लभगढ़ के घटना में हिंसा के बर्बर अतिरेक बा। ई भी विचार करे के होई कि तौसीफ जइसन अपराधी कइसे आ काहे बनेला?  ये बिंदु पर अपराध शास्त्री के अउर राजनेता लोग के भी गम्भीरता से सोचे के होई।

काबू पावल जाय जेहादी मानसिकता पर

याद रखीं कि बल्लभगढ़ के घटना एकतरफा प्रेम तक ही सीमित नइखे। एकर एक बड़ा आयाम जेहादी मानसिकता भी बा, जवन सारी दुनिया में तेजी से फइल रहल बा। अब जरा देखीं कि यूरोप के जवन देश दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम शरणार्थिन के शरण देहलस ओकरा बदला में का मिलल? सीरिया, अफगानिस्तान, रोहिंग्या के शरणार्थिन के सबसे ज्यादा शरण फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, इंग्लैंड आ ऑस्ट्रेलिया ही देहलस। जर्मनी सीरिया में गृह युद्ध के दौरान 1 लाख शरणार्थिन के शरण देवे वाला खास देश रहल। गौर करीं कि कवनो मुस्लिम मुल्क त उपर्युक्त देशन के शरणार्थिन के अपना इहाँ ना बुलवलस। काहे? का सभी पचास से ज्यादा इस्लामिक राष्ट्र जेहादिन के मूक समर्थन करत रहे?

विगत कुछ समय पहिले स्वीडन में जे कुछ घटल ओके दुनिया देखलस। करीब एक दशक पहिले स्कैंडिनेवियायी देश जइसे स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क में इस्लाम के उपस्थिति नाम मात्र के ही रहे, लेकिन सीरियाई अरब शरणार्थिन के खुले दिल से स्वीकार करे के उदारता के कारण ही आजकल उहाँ जिहादी सब जम के बवाल काट रहल बा। कारण ई बतावल जा रहल बा कि उहाँ पर कुछ शरारती तत्व कुरान के साथ अनादर कइल। स्वीडिश जनता के त अपना काम आ मौज-मस्ती से भरपूर जिंदगी के अलावा और कवनों शरारतीपूर्ण कार्य से कभी कवनों मतलब ही ना रहल। फिर भी अफवाह फइलला के बाद उहाँ पर तगड़ा बवाल काटल गइल। ओही शरणार्थी मुसलमान सबके भीड़ सड़कन पर उतर आइल जेके स्वीडन सीरियाई कत्लेआम से बचाके अपना देश में शरण देले रहे। ये पूरा हिंसा के पीछे उहे शरणार्थी सब रहे जेके स्वीडन के सरकार मानवता के आधार पर अपनही देश में शरण देले रहे। ई बा ये जेहादी मानसिकता वालन के एहशान फरामोशी।

मतलब बल्लभगढ़ से लेके स्वीडन तक एक ही प्रकार के कट्टर जेहादी मानसिकता साफतौर पर नजर आ रहल बा। ई सारा संसार में उठल-पुथल मचा के रख देले बा। ये मानसिकता में लोकतांत्रिक तरीका से बहस खातिर कवनों जगह नइखे। बोलबs त मार दिहल जइबs। एमे कवनों इंसान के हत्या चाहे मासूमन के मजहब के नाम पर मार देहल सामान्य सा बात ही मानल जाला। निकिता के साथ इहे त भइल। चूंकि ऊ लफंगा तौसीफ से शादी करे से मना कइलस, ओके सरे राह पहिले खींच के अपहरण करे के कोशिश कइल गइल आ जब उ तइयार ना भइल त गोली मार दिहल गइल।

ई मत भूलीं कि इहे जेहादी सब अपने देश के बैंगलुरू जइसन आधुनिक महानगर में कुछ समय पहिलही जम के आगजनी कइले रहे। एकर वजह ई बतावल गइल रहे कि बैंगलुरू में कांग्रेस के एक विधायक के एक कथित रिश्तेदार पैगम्बर मोहम्मद के लेके सोशल मीडिया पर कवनो अपमानजनक पोस्ट कर देले रहलन, जवना के प्रतिक्रिया में ई सुनियोजित व्यापक हिंसा भइल। अब सवाल ई बा कि का विरोध जतावे खातिर हिंसा के ही सहारा लेहल जाई? आखिर मुस्लिम समाज के जेहादी तत्व कानून के अपना हाथ में काहे लेते जा रहल बा?  ई हम बल्लभगढ़, बैंगलुरू, यूरोप वगैरह सब जगह देख रहल बानी। अइसन क के ई जेहादी सब इस्लाम के बदनाम ही त करsता। ये लोग के शांति से रहे अइबे ना करे। पड़ोसी पाकिस्तान में ई जेहादी ही शिया अउर अहमदी लोग के मारत रहेला। उनका मस्जिद पर बम बिस्फोट करेला। ई समझ में ना आवे कि दरअसल ई लोग चाहेला का? फिलहाल त सारी दुनिया के सामने कोविड-19 अउर इस्लामिक चरमपंथी दुनु लमहर चुनौती के रूप में सामने आइल बा। कोविड-19 के त वैक्सीन मिल ही जाई पर तौसीफ जइसन जालिम जेहादिन के दुनिया कइसे मुकाबला करी? ये विषय पर सारी दुनिया के विशेषकर इस्लामिक राष्ट्रन के खासकर इस्लामिक धर्म गुरुअन के त तत्काल सोचे के होई। कहीं अइसन ना होखे कि ये कुकृत्यन के व्यापक प्रतिक्रिया से भारी नुकसान हो जाय। अइसन स्थिति से सबका बचें के चाहीं।

( लेखक वरिष्ठ सम्पादक, स्तम्भकार अउर पूर्व सांसद हईं)


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Hum BhojpuriaOctober 26, 20201min11750

  आर. के.सिन्हा

बिहार एक बार फेर चुनावी समर खातिर तैयार बा। राज्य में राजनीतिक माहौल गरमा गइल बा। नेता लोग के जनसंपर्क अभियान जारी बा। केतना अच्छा होइत अगर अबकी बिहार विधान सभा चुनाव जाति के सवाल के बजाय विकास के मुद्दा पर ही लड़ल जाइत। ये मसला पर सभ क्षेत्रन में गम्भीर बहस होखे। सब दल अपना विकास के रोडमैप जनता के सामने रखे। दुर्भाग्यवश बिहार में विकास के सवाल गौड़ होते जा रहल बा। हम पिछला राज्य विधान सभा चुनाव भी देखले रहीं। तब कैम्पेन में विकास के सवाल पर महागठबंधन के नेता लोग फोकस ही ना कर पावत रहे। अभी त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विकास के सब कैंपेन के केंद्र में लाके खड़ा कर देले बाड़न।

पिछला चुनाव में त एनडीए के खिलाफ खड़ा तमाम शक्ति राज्य के विकास के बिंदु पर बात करे से भी कतरात रहे। ओ सब में जाति के नाम पर वोट हासिल करे के होड़ सा मचल रहे। एही मानसिकता के चलते बिहार विकास के दौड़ में बाकी राज्यन से कहीं बहुत पीछे छूट गइल। ई सही में बड़ी गम्भीर मसला बा। बिहार में जाति के राजनीति करे वाला लोग के कारण ही राज्य में औद्योगिक विकास ना के बराबर भइल। रउए बता दीं कि बिहार में बिगत तीस साल में कवन औद्योगिक घराना आपन कवनो इकाई लगवलस ?  टाटा, रिलायंस, महिंद्रा, गोयनका, मारुति, इंफोसिस जइसन कवनो भी बड़हन कम्पनी बिहार में निवेश कइल उचित तक ना समझल आ यही के नतीजा ह कि बिहार के नौजवान के अपना घर के आसपास कवनो कायदा के नौकरी ना मिले। उनका घर से बाहर दूर निकलहीं के पड़ेला। आप दिल्ली, मुंबई, पुणे, चेन्नई, हैदराबाद, बैंगलुरू, लुधियाना समेत देश के कवनो भी औद्योगिक शहर में चल जाईं, उहाँ पर रउआ बिहारी नौजवान हर तरह के नौकरी करत मिली। का बिहार में जाति के राजनीति करे वाला लोग ये सवाल के कवनो जवाब दे पाई कि उनके गलत नीतियन के कारण ही राज्य में निजी क्षेत्र से कोई निवेश करे के हिम्मत तक ना करे।

 

इयाद रख लीं कि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडू जइसन राज्यन के तगड़ा विकास एही से हो रहल बा काहे कि उहाँ हर साल भारी निजी क्षेत्र के निवेश आ रहल बा। केंद्र सरकार हर साल एगो रैंकिंग जारी करेला कि देश के कवना राज्य में कारोबार कइल आसान आ कहाँ सबसे मुश्किल बा। सरकार हाल हीं में “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” के रैंकिंग जारी कइलस। एमे पहिला पायदान पर आंध्र प्रदेश बा। एकर मतलब बा कि देश में आंध्र प्रदेश में कारोबार कइल आज के दिन सबसे आसान बा। तेलांगना दूसरा पायदान पर बा। हरियाणा तीसरा नम्बर पर बा। कारोबार करे में आसानी के मामला में आंध्र प्रदेश चौथा त झारखंड पाँचवा स्थान पर बा। उहें छत्तीसगढ़ 6वाँ, हिमाचल प्रदेश 7वाँ आ राजस्थान 8वाँ स्थान पर बा। एकरा अलावे पश्चिम बंगाल अबकी बार शीर्ष 10 में शामिल होते हुए 9वाँ नम्बर पर पहुँच गइल बा। उहवें गुजरात ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के मामला में 10वाँ पायदान पर बा। लेकिन बिहार त एमे 15वाँ स्थान तक कहीं नइखे। कइसे होई बिहार के विकास?  दरअसल ये रैंकिंग के उद्देश्य घरेलू अउर वैश्विक निवेशक सबके आकर्षित करे खातिर कारोबारी माहौल में सुधार लावे खातिर राज्यन के बीच प्रतिस्पर्धा शुरू कइल बा। सरकार राज्यन के रैंकिंग के कंस्ट्रक्शन परमिट, श्रम कानून, पर्यावरण पंजीकरण, इन्फॉर्मेशन तक पहुँच, जमीन के उपलब्धता अउर सिंगल विंडो सिस्टम के आधार पर मापी करेला।

उपर्युक्त रैंकिंग से बिहार के सब नेता आ दल के सबक लेहीं के चाहीं। ये लोग के पता चल गइल होई कि उनका राज्य के स्थिति कारोबार करे के लिहाज से कतई उपयुक्त नइखे। ई सही बा कि पिछले लंबा समय से बिहार में औद्योगिक क्षेत्र के विकास थम सा गइल बा। अब बिहार में जवन भी नया सरकार बने ओकरा देश के प्रमुख उद्योग अउर वाणिज्य संगठन जइसे फिक्की, सीआईआई या एसोचैम से तालमेल रख के उद्योगपति सबके राज्य में निवेश करे खातिर प्रयास करे के होई। ई केहू के बतावे के जरूरत नइखे कि बिहार के औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ापन के कई कारण बा। जइसे कि राज्य में नया उद्यमी आ पहिले से चल रहल उद्योग के मसलन के हल करे खातिर कवनो सिंगल विंडो सिस्टम नइखे बनावल गइल। बिहार में आपन कारोबार स्थापित करे वाला उद्योग खातिर भूमि आवंटन के कवनों ठोस व्यवस्था ना कइल गइल आ राज्य में इंफ्रास्ट्रक्चर के मजबूत करे के जरूरत तक ना समझल गइल।

अर्थात बिजली-पानी के आपूर्ति के व्यवस्था तक पक्का नइखे। सड़कन के खस्ताहाल बा। पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था बेहद खराब बा। स्वास्थ्य सेवा भी भगवान भरोसे बा। हालांकि नीतीश जी के शासन में विकास के प्रयास कम भइल, अइसन भी नइखे। पर लालू राज्य में जवन छवि राज्य के बन गइल ओके निवेशक सबके मन से निकालल आसान भी त नइखे। ये सब हालात में बिहार में के निवेशक आके निवेश करी भला?  बिहार में फूड प्रोसेसिंग, कृषि आधारित हजारों उद्योग, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर उद्योग, कपड़ा, कागज और आईटी उद्योग वगैरह के भारी विकास संभव बा। ए तरफ ध्यान त देवहीं के परी।

 

बिहार काहे ना बनल औद्योगिक हब

विगत 20-25 साल के दौरान देश के अनेक शहर मैन्युफैक्चरिंग अउर सेवा क्षेत्र के हब बनत चल गइल। पर ये लिहाज से बिहार पिछड़ गइल। बिहार के कवनो भी शहर नोएडा, मानेसर, बद्दी या श्रीपेरंबदूर ना बन सकल। नोएडा अउर ग्रेटर नोएडा के हीं देखीं। इहाँ इलेक्ट्रॉनिक सामान आ आटोमोबाइल सेक्टर से जुड़ल सैकड़न उत्पाद के उत्पादन हो रहल बा। एकरा अलावा इहाँ सैकड़ों आईटी कंपनी सब में लाखों नौजवानन के रोजगार मिल रहल बा जेमे एगो बड़ा प्रतिशत बिहारी जवानन के भी बा। एने दक्षिण कोरिया के एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स, मोजर बेयर, यमाहा, न्यू हालैंड ट्रेक्टर्स, वीडियोकॉन इंटरनेशनल श्रीराम होंडा पॉवर इक्विमेंट अउर होंडा सियल नॉएडा- ग्रेटर नॉएडा में तगड़ा निवेश कइले बा।

 

एही तरे से हरियाणा के शहर मानेसर एगो प्रमुख औद्योगिक शहर के रूप में स्थापित हो चुकल बा। मानेसर गुड़गांव जिला के एगो तेजी से उभरत औद्योगिक शहर ह। साथ ही ई दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एनसीआर के एगो हिस्सा भी ह। मानेसर में ऑटो और ऑटो पार्ट्स के अनेक इकाई खड़ा हो चुकल बा। एमे मारुति सुजुकी, होंडा मोटर साइकिल एंड स्कूटर इंडिया लिमिटेड शामिल बा। इहाँ भी लाखों लोग काम करेला जेमे बड़ी संख्या में बिहारी बाड़न। मानेसर के रउआ उत्तर भारत के श्रीपेरंबदूर मान सकेनी। तमिलनाडू के श्रीपेरंबदूर में भी ऑटो सेक्टर के कम से कम 12 बड़हन कम्पनी उत्पादन कर रहल बा आ एही सब कम्पनीन के पार्ट्-पुर्जा सप्लाई करे खातिर सैकड़न सहयोगी उद्योग भी चल रहल बा।

 

आ अब चलीं महाराष्ट्र के चाकण में। चाकण पुणे से 50 किलोमीटर अउर मुंबई से 160 किलोमीटर के दूरी पर स्थित बा। इहाँ पर बजाज ऑटो अउर टाटा मोटर्स के अनेक इकाई बा। ये दुनू बड़हन कम्पनीन के इकाईं आ गइला के बाद चाकण अपने आप में एक खास मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप ले चुकल बा। इहाँ हजारों पेशेवर अउर श्रमिक काम कर रहल बाड़े। अब महिंद्रा समूह भी चाकण में दस हजार करोड़ रुपया के लागत से आपन एगो नया इकाई स्थापित करे के फैसला कइले बा। वाल्कसवैगन भी इहाँ आ चुकल बा। एकरा अलावे भी देश के अनेक शहर एही तरे मैन्युफैक्चरिंग चाहे सेवा क्षेत्र के केंद्र बनल।

 

दूसरा तरफ जवन बिहार टाटा नगर अउर डालमिया नगर जइसन निजी औद्योगिक शहर आजादी से पहिले बसा रखले रहे,   ओही बिहार के कवनो शहर काहे मैन्युफैक्चरिंग चाहे सेवा क्षेत्र के हब ना बन सकल ? ये बिहार के बिहार विधान सभा के चुनाव में ये सब मसला पर भी बात होखे आ जनता उनहीं के वोट देवे जे बिहार में निजी क्षेत्र के निवेश ले आवे तब त कवनो बात बनी।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं)


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Hum BhojpuriaOctober 9, 20201min4490

  आर.के.सिन्हा

चीन खातिर जासूसी के आरोप में गिरफ्तार वरिष्ठ पत्रकार राजीव शर्मा के गिरफ्तारी ये ज्वलंत बहस के जन्म दे देले बा कि का पत्रकार के कुछ भी करे के छूट मिलल बा?  का ऊ लोग ये देश आ इहाँ के कानून से ऊपर बा? का अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के नाम पर सब कुछ कइल जायज बा? लोग इहो मांग कर रहल बा कि जे लोग चाहे कवनो भी पद पर काहे ना होखे यदि राष्ट्रीय हित के नुकसान पहुँचा रहल बा, ओकरा कठोरतम सजा मिलहीं के चाहीं।

वास्तव में ई बेहद शर्मनाक स्थिति बा कि अपना देश में ही कुछ प्रतिष्ठित कहल जाए वाला लोग चीन खातिर जासूसी कर रहल बा। अइसन लोग में पत्रकार लोग भी शामिल बा। एह सिलसिला में स्वतंत्र पत्रकार राजीव शर्मा के  ‘ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट’  (ओएसएस) के तहत गिरफ्तारी आँख खोल देवे वाला बा। यतीश यादव अपना किताब रॉ: अ हिस्ट्री ऑफ इंडियाज कवर्ट ऑपरेशंस’ , जे कुछ दिन पहिलही आइल बा, में लिखले बाड़े – ई निर्विवाद तथ्य ह कि साइबर जासूसी के मामला में चीन दुनिया में सबसे सक्रिय देश ह। उ अपना जासूसी नेटवर्क के विस्तार करे खातिर ठीक ओही तरे ‘सॉफ्ट पॉवर’  के इस्तेमाल कर रहल बा जइसन कबो अमेरिका आ रूस कइले रहे। उ भारत के सांस्कृतिक आदान-प्रदान के ओट में जासूसी गतिविधि के बढ़ा रहल बा। एकरा खातिर उ शैक्षणिक संस्थान, विद्वान, कारोबारी, पेशेवर आ इहाँ तक कि पत्रकार के भी इस्तेमाल कर रहल बा। हद त ई हो रहल बा कि कुछ पत्रकार मीडिया से जुड़ल संस्थान के भी ई लागता कि पुलिस द्वारा राजीव शर्मा के गिरफ्तारी अन्यायपूर्ण बा।

ई लोग दिल्ली पुलिस के ही कसूरवार ठहरा रहल बा कि उनकर रिकॉर्ड ‘संदिग्ध’ बा। एही तरे कई वेबसाइट भी राजीव शर्मा के पक्ष में उतर आइल बा,  जेकरा बारे में ई आम धारणा बा कि ऊ लोग “अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता” के नाम पर कवनो भी हद तक चल जाला। जब ओ लोग के कुछ कहल जाला, त ऊ लोग आपन आवाज दबावे आ लोकतंत्र के हत्या के राग छेड़ देला। अइसन लोग के एगो शक्तिशाली गठजोड़ बा, जे खुद पर आँच आवत देख एक सुर में हल्ला मचावे लागेला, जबकि ये पत्रकार आ संस्थान सबके ई अच्छा से पता बा कि ओ लोग के बयान के भारत विरोधी ताकत ही भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फइलावे में उपयोग करेला। एकर ढेरों उदाहरण मौजूद बा। राजीव शर्मा के मामला में भी ई बात एक बार फेर सामने आ गइल बा। भारत के घोर विरोध करे वाला तुर्की के एक वेबसाइट त बाकायदा राजीव शर्मा के पक्ष में आर्टिकल लिख के उनका के निर्दोष तक बता देले बा। उ वेबसाइट ये संदर्भ में ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ के बयान के भी उद्धृत कइले बा।

 

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया पत्रकार कहल जाए वाला पियक्कड़न आ नशेड़ियन के अड्डा बन के रह गइल बा ई बतावल जरूरी नइखे। ई पूरा तरह से जग जाहिर बा। अब त केहू प्रतिष्ठित पत्रकार उहाँ दिखाई तक ना देला।

 

राजीव शर्मा के बचावे खातिर ई प्रोपेगेंडा भी फइलावल शुरू कर देहल गइल बा कि उ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से जुड़ल रहलन। उनका से कई बार मिल चुकल बाड़े आ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में डोभाल के नियुक्ति के जोरदार समर्थन भी कइले रहलन। का ई कवनो उचित तर्क बा कि केहू से मिल लेहला से, ओकर प्रशंसा कर देहला से कोई केहू के करीबी हो जाला? दरअसल ई सब मूल मुद्दा से लोग के ध्यान भटकावे के कोशिश ह। मामला के ट्विस्ट देवे के एक सुनियोजित चाल ह। खुफियागिरी करे वाला के त ई विशेष रूप से सिखावल जाला कि जवन भी तू कर रहल बाड़s  ओकरा से ठीक उलटा दिखs।

 

ये देश के कुछ पत्रकार लोग के मानना बा कि पत्रकार भइला के नाते ऊ सारा नियम-कानून से ऊपर बा। ओ लोग पर कवनो प्रकार के कोई रोक ना होखे के चाहीं, चाहे ऊ लोग राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ ही काहे ना करे। अतीत में भी कई घटना अइसन भइल बा, जेमे जाने- अनजाने कवनो पत्रकार के वजह से सैन्य गतिविधि, संवेदनशील सुरक्षा संस्थानन के जानकारी आसानी से देश विरोधी ताकतन के मिल गइल। ओह लोग पर जब कार्रवाई के मांग उठल, त “अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता” के हल्ला मचा देहल गइल। हमार त अमित भाई शाह से ई अनुरोध होई कि अइसन सब लोग पर भी सख्त निगरानी अउर गहन जाँच करे के जरूरत बा जे राष्ट्र विरोधी हरकत में लागल लोग के बचाव करे में लागल बा।

 

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल ई उठsता कि का पत्रकार देश के सुरक्षा से ऊपर बा?  का उनका राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करे के खुला छूट बा? राजीव शर्मा प्रकरण में कुछ लोग के प्रतिक्रिया से त अइसहीं लागsता कि ऊ लोग अइसहीं माने ला। लेकिन ओह लोग के मान्यता ही अंतिम सत्य त ना ह। अइसन पत्रकार लोग आपन विश्वसनीयता खो चुकल बा। देश के अधिकांश लोग एह लोग के बात पर भरोसा ना करे ला। राष्ट्रीय सुरक्षा के दांव पर लगावे वाला के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी बा। अइसन कार्रवाई जे आगे खातिर मिशाल बन जाय। अइसन लोग के अपराध दोहरा बा। देश के सुरक्षा के साथे खिलवाड़ आ लोग के भरोसा के हत्या। कई हलका से त अब ई भी आवाज आवे लागल बा कि अइसन लोग के फाँसी के सजा दे देवे के चाहीं।

 

ई सुन के मन वास्तव में बहुत उदास आ क्षुब्ध हो जाला कि हमरा सेना में ही कार्यरत कुछ देश के गद्दार महत्वपूर्ण सूचना देश के शत्रु सब के देत रहेला लोग।

 

एक बात जान लीं कि सेना के तीनों अंगों में प्रत्येक संवेदनशील दस्तावेज के सुरक्षा के दृष्टि से अलग-अलग श्रेणी में रखल जाला। एमे गोपनीय, रहस्य, गुप्त और अति गुप्त के श्रेणी बा। ये सब के x के निशान से पहचानल जाला यानि एक x अगर गोपनीय बा त xxxx अति गोपनीय होई। सेना में सोशल मीडिया के इस्तेमाल खातिर एक सख्त नकारात्मक नीति बा। सेना के अधिकारी के सोशल मीडिया के इस्तेमाल के सीमित इजाजत त बा, लेकिन ऊ लोग सेना के वर्दी में आपन फोटो पेस्ट नइखे कर सकत। साथ ही उ कहाँ  तैनात बा, ये संबंध में भी जानकारी साझा नइखे कर सकत। एकरा अलावा कोई भी अधिकारिक जानकारी, प्लान आ इहाँ तक कि कार्यालय के बुनियादी ढांचा के संबंध में भी कोई जानकारी नइखे दे सकत।

 

हम 1970-71 में भारत-पाक युद्ध (बांग्लादेश आजादी के लड़ाई) के समय युद्ध संवाददाता के रूप में कार्यरत रहनी। ओह समय कोलकाता और ढाका में तथाकथित वामपंथी पत्रकारन के जवन गुट भारतीय सेना के बांग्लादेश जाए के विरोध करत रहे, अउर पाकिस्तान के समर्थन करत रहे, कुछ अइसहीं समझ लीं कि उनके मानसपुत्र ही आज भी चीन-पाकिस्तान के जासूसी कर रहल बा।

 

संसद के एह पर गंभीरता से विचार करे के चाहीं कि अइसन लोग खातिर कठोर से कठोर सजा के प्रावधान होखे। देश के सुरक्षा से बढ़के त कुछ भी नइखे। देश बा तभिये त हम सब बानी।

 

भारत के रक्षा संबंधी तैयारी से संबंधित दस्तावेज बेचे वाला जयचंद के मौत के सजा होखे। इनके केस पर कोर्ट तुरंत अउर लगातार सुनवाई करके फैसला लेवे। ई केस कवनो भी हालत में लटके के ना चाहीं। अगर केहू पर आरोप सिद्ध होता त ओकर सजा सिर्फ फांसी ही होखे के चाहीं।

( लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार अउर पूर्व सांसद हईं। )



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