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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min3120

लेखक: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

१९७९ – १९८० के साल रहल होई , जब बुढ़िया माई आपन भरल पुरल परिवार छोड़ के सरग सिधार गइनी । एगो लमहर इयादन के फेहरिस्त अपने पीछे छोड़ गइनी , जवना के अगर केहु कबों पलटे लागी त ओही मे भुला जाई । साचों मे बुढ़िया माई सनेह, तियाग आउर सतीत्व के अइसन मूरत रहनी , जेकर लेखा ओघरी गाँव जवार मे केहु दोसर ना रहुए । जात धरम से परे उ दया के साक्षात देवी रहनी । सबका खाति उनका मन मे सनेह रहे , आउर छोट बच्चन खाति त उ सनेह के दरिया रहनी । बाक़िर उनकर  जीवन सुरुए से दुख आउर दरद के लमहर बवंडर ले के आइल रहे ।

बुढ़िया माई के बचपन के नाम त राजेश्वरी रहल । उनकर नइहर खुसहाल आउर भरल पुरल रहे। बालपन त सबही के हंसी-खुसी में बीतिए जाला , उनकरो बीत गइल । फिर गवें गवें उनका बियाह के खाति लइका के खोज होखे लागल । उनका दुनो भाई , बाबू , चाचा – पीती लोग जीउ  – जाँगर से जुट गइल रहे । आखिर एक दिन लइको मिल गइल , पढल – लिखल नीमन संस्कारी परिवार से रहल उहो । खूब धूम-धाम  से बरात आइल आउर उनकर बियाह  हो गइल । लेकिन ओहि दिन से जइसे उनका सुख चैन मे केहु के नजर लाग गइल । उ मरद जेकर उ मुहों ना देखले रहस , बियाहे के चार महीने के भीतरी मू गइलें । ओहि दिन से उनका नइहरे में बिधवा के बस्तर पहिने के पड़ गइल । अपना मरद के सुख आउर साथ का होला , उनका भीरी जीए के एको छन नसीब ना भइल ।

एक त बिधवा लइकी ऊपर से नइहर में रहल , गाँव जवार मे त बहुते शिकाइत के बात होला । उनकर भाई उनके ससुरारी जा के लइकी के बिदाई खाति निहोरा कइल लोग । बाकि आपन लइका खोवला क दरद आउर ऊपर से गाँव समाज मे होखे वाला खुसुर फुसुर से तंग उहो लोग हामी ना भरलस । थक हार के बात पंचइती में गइल , पंच लोग समहुत हो के ई निर्णय कइलस कि बात के लइकी के ऊपर छोड़ दिआव , लइकी चाहे त दुनों परिवार मिल के दोसर बियाह करावे या फेरु ससुरारी जाइल चाहे त ससुरारी वाला लोग बिदा करा के ले जाव । वैधव्य आउर सुहागिन होए क चुनाव रहल , बाक़िर ओकरे बादो उ बिधवा बन के रहल मंजूर कइली । बिधवापन के आपन किस्मत आउर ससुरारी के आपन करम भूमि मान के उ ससुरारी आ गइली

बुढ़िया माई अपना घरे यानि ससुरारी मे एगो बिधवा नीयन अइनी । उहवाँ अइला के बाद सबका के आपन बानवे ला सगरी उताजोग कइनी आउर कामयाबों भइनी । घर के दशा संभारे खाति उनका कई गो निरनय लेवे के परल । अपना साहस से उ हर लीहल निरनय सफल बनवली । उनकर पहिलका निरनय छोट देवर के बियाह करावल रहल । बुढ़िया माई घर मे सबसे बड़ रहली , से सभे केहु उनका से सउंजा जरूर करसु । उनका परयास से घर में खुसी लवटल । देवरानी के साल भर मे बेटा क जनम भइल , खूब खुसी मनावल गइल , सोहर गवाइल , बायन बटाइल । आपन कुले गोतिया दयाद नेवतबों कइली । बाक़िर बुढ़िया माई से बीपत के त जइसे चोली दामन के साथ रहे , बेटवा जब ४ बरीस के भइल तब उनकर देवरो साथ छोड़ गइलन । अब घरे मे दु गो बिधवा मेहरारू , एगो छोट बच्चा , एगो उनका सबसे छोटका देवर , अइसन हालत मे अइला के बाद घर सम्हारल आउर मुसकिल हो जाला । बुढ़िया माई त सती नीयन जीवन जीयते रहनी , उनका देख उनकर सबसे छोटका देवरो जिनगी भर बियाह न करे क ठान लीहने ।

बुढ़िया माई क समय के संगे संघर्ष जारी रहल । अब घर आउर बाहर ,खेती बारी के कुल्हि जीमवारी दुनों लोग अपना अपना सीरे ले लीहलस । एह तरे जिनगी के गाड़ी आगे घसके लागल । बुढ़िया माई दिन रात लइका के परवरिस करसु अउर घर सम्हारे में लाग गइलिन, काहे से कि उनका देवरानी आपन मानसिक संतुलन  अपना मरद के जइते खो चुकल रहनी । बुढ़िया माई ओह लइका पर आपन कुल्हे दुलार लूटा दिहली । अब उहे लइका पूरे घर खनदान के चिराग रहल । लइका के देख- भाल आउर ओकर नीमन परवरिस दीहल बुढ़िया माई के जीवन के सार बन गइल । बुढ़िया माई ओहमे सफलों भइनी । समय क चकरी त कबों न रुकेला । धीरे धीरे उ लइकवो बियाह जोग हो गइल। बुढ़िया माई फेनु अपना के एगो नवकी जिमवारी खाति तइयार कइली । लडिका क बियाह भइल , बुढ़िया माई लडिका के माँई आउर बाबू दुनों के फरज निभवलीन । बहुरिया के नचिगो न बुझाये दीहनि कि उ आपन सासु ना बानी । उ त बहुरिया खाति सग महतारी से बढ़ के हो गइनी ।

गवें-गवें समय बीतत रहे , बुढ़िया माई घर आउर बाहर के सगरी जिमवारी अपने सिरे ओढ़ लिहली , काहें से कि उनकर सबसे छोटकों देवर जवन ओह घरी घर मे अक्सरुआ  सवांग रहलन  , एगो दुर्घटना के चपेट मे आ गइलन । चलहूँ  फिरे जोग नाही बचलन । ओहि घरी घर मे एगो नवका मेहमानो आवे वाला रहल । नियति के का मंजूर बा, ई कोई ना जनेला । नवका मेहमान बेटवा के रूप में घर में आइल । ई समाचार एक बेरी फेरु से घर मे गीत गवनई , सोहर , बायन के दिन लउटा दीहलस । बाक़िर खाली दु – चार दिन खाति , पंचवे  दिन उनका छोटको देवर उनका साथ छोड़ गइलन । शायद इहो दुख बुढ़िया माई के ओतना नाहीं दुखी कइलस , जेतना दुखी उ आपन जिनगी मे अपना देवर के एगो बात के मान लीहनी । उ घटना बुढ़िया माई के जीवन के अइसन घटना रहल जवना के उ कबों न भुला पवली । एक दिन अइसन भइल कि उनका देवर उनका के बोलवलन, आउर कहलन कि सुनत हऊ  हमरे लगे कुछ रूपिया हउवे , एके तू अपना  दिन रात खाति रख ला । कहे से कि हम अब कुछे दिन के मेहमान बानी , ई रूपिया तहरा काम आई । का पता बा कि जवने लइका पतोह में तू दिन रात एक कइले बालू , ओहनी के तोहरे बुढ़ाई मे तोहार सेवा टहल करिहन सन कि नाही । ई सुनते बुढ़िया माई रोवे लगलिन आउर उ अपने लइका के बोलाय के कहनी कि ए बचवा सुनत हउवा , तोहार छोटका बाबू कुछ रूपिया रखले बाड़न , उ तोहरा से छुपा के हमरा के देवल चाहत बाड़न । सुना ए बचवा , एगो तिल्ली लिया के ओह रूपिया मे तू आगी लगा द । हमरा के उ रूपिया ना चाही । अगर हमरा आपन ए लइका के पाले पोसे मे कवनों कमी होखल होई , त ऊपर वाला एगो आउर दुख दे दी , लेकिन उहो हमरा खाति कम्मे होखी । उनकर ई बात सुनके ओह घरी घर मे मौजूद सभे कोई रोवे लागल । अइसन रहनी उ बुढ़िया माई । अजुओ ले उनकर कहल कुल्हि बातन के लछिमन रेखा नीयन उनका घर मे मानल जाला । धन्य रहनी उ बुढ़िया माई आउर धन्य बा ओह घर के लोग जिनका के देवी नीयन बुढ़िया माई के सँग मिलल ।


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min2570

लेखक: अजय कुमार पाण्डेय

बिहार के पश्चिमोत्तर, नेपाल-उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिला चंपारण के एगो भौगोलिक, ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक दृष्टि से मशहूर आ महत्वपूर्ण शहर । उत्तरे-दखिने लमा-लामी बसल हमनी के शहर में एगो रेलवे स्टेशन जेकर नाम हरीनगर रहे, एगो हाई-स्कूल, एगो संस्कृत हाई स्कूल, दु गो मिडिल स्कूल आ तीन-चार गो प्राइमरी स्कूल रल स। प्राइवेट स्कूल के कौनो नामो-निशान ना रहे ओ घरी। एगो सिनेमा घर, ” हिन्द-सिनेमा “, चीनी मिल आ सबसे मशहूर प्राचीन शिव मंदिर रहे। शिव मंदिर तबो रामनगर के पहचान रहे आ आजो पहचान बा।

मध्यकालीन सेन वंश के बनवावल मंदिर एतना भव्य बा कि कौनो तरे फोटो खिचला पर पांचों गुम्बद के फोटो एक साथे ना आवेला। रामनगर में राज घराना आ राज महल भी बा। नेपाल के राणा खानदान के लोग उहां के राजा रहल बा लोग आ आजो राजपरिवार के लोग रामनगर में रहेला।

ई सब त हो गइल हमरा शहर के एगो संक्षिप्त परिचय, अब कुछ हमरो बारे में जानी लोगन। बाबू जी हमार ओतहिए ” हरीनगर उच्च विद्यालय ” में शिक्षक रनी। हमनी के तीन भाई आ एगो सबसे बड़ बहिन रहे। हम माझिल रनी। माई-बाबू जी आ हमनी के चार भाई-बहिन के परिवार के बाबू जी अपना औकात भर ठीक-ठाक से चलावत रनी। भैया आ दीदी के जनम के बाद बाबू जी गांव से रामनगर आ गइनी। हमार आ हमर छोट भाई के जनम-करम एतहीये भइल।

बाबू जी मारवाड़ी मोहल्ला में एगो किराया के घर ले के हमनी के रखले रनी आ कहे के गरज नइखे कि हमनी के अधिकांश संघतीया मारवाड़ी समाज के हीं लइका रल स। ओहिमे कुछ गैर-मारवाड़ी लइका भी हमनी के मित्र मंडली में रहल लोग।

हमार लंगोटिया इयारन में, निर्मल, पप्पू, प्रदीप, सुशील ( टुनिया ), अरुण, सुमन, रमेश, रामायण, सुनील, पुरुषोत्तम आदि ढेर लइका रलन स। सब एक से एक खुराफाती आ करामाती।

सुशील ( टुनिया ) के त भगवान एके पीस बना के भेजले रलें। ओकरा दिमाग में खुराफात आ शैतानी के सिवा दोसर कुछु अइबे ना करे। ओकर खुराफत पर पूरा एगो किताब लिखा सकsता।

रामायण, सुमन आ रमेश के तिकड़ी रहे। ऊहो नमूने रहलन स।

निर्मल सामान्य लइका रहे आ पप्पू के हमेशा नाक बहत रहे। प्रदीप दु गो रलन स आ दूनू एक गोल के, शातिर बदमाश। पुरुषोत्तम आ अरुण शांत स्वभाव के लेकिन हमेशा ग्रुप में रहे वाला संघतीया रलन स। एकरा अलावे भी ढेर इयार-दोस्त रहे लोग लेकिन ई हमनी के कोर-ग्रुप रहे।

आज हम सुमन आ रमेश के एगो किस्सा सुनावतानी।

सुमन बहुत जिद्दी टाइप के रहे। जे दिमाग में आ जाए, कर डाले।

रमेश दुबर-पातर, सुमना जे कहे, ऊहे करे।

एक दिन सुमन शायद घर पर डटाईल-पिटाईल रहे। स्कूल दु किलोमीटर पर रहे। रोज रमेश ओकरा घरे आ जाए आ दुनु एके साथे स्कूल जा स। स्कूल के रास्ता में रेलवे क्रासिंग रहे।

ओह दिन सुमन के मुड खराब रहे। जब ऊ दुनू स्कूल चललs स त सुमन बड़ा गंभीर रहे। ओकरा दिमाग में कुछ चलत रहे।

आधा रास्ता गइला पर सुमन रमेश से कहलस,

” चल रमेश साधु बन जाइल जाव।”

रमेश अचकचाइल आ पूछलस ,

“काहे रे, साधु काहे बनल जाई?”

” घर में कौनो भैलू नइखे। जेकरे मन करsता, लतिया देता।

अइसन घर में रह के आदमी का करी।”

” बाक, घरे त हमु पिटानी त का घर-दुआर छोड़ के साधु बन जाइल जाई?”

रमेश, सुमन के समझावे के प्रयास कइलस। लेकिन सुमन ना मानल आ ऊ आपन बात आ तर्क से रमेश के भी साधु बने के तैयार क लेलस।

रेलवे क्रासिंग पर आ के दुनू आपन-आपन बस्ता नचा के क्रासिंग पर के गड्ढा में फेंकलसs आ लाइन ध के नरकटियागंज की तरफ चल पड़लस।

घर के लोग बुझत रहे कि बबुआ लोग पढ़े गइल बा लेकिन दुनू संघतीया वैराग्य के राह पर निकल पड़ल लोग।

रास्ता में रमेश कई बार सुमन से अभिओ से घर लौट चले के कहलस लेकिन सुमन रहल जिद्दी स्वभाव के, ऊ माने के तैयार ना रहे। साधु बने के बा त बने के बा।

करीब 18 किलोमीटर पैदले, लाइने-लाइने चल के दुनु नरकटियागंज स्टेशन पहुंच गइलन स। नरकटियागंज पहुंच के रमेश, सुमन के अंतिम बार बहुत समझावे के प्रयास कइलस लेकिन सुमन ना मानल, त ना मानल। नरकटियागंज 18 किलोमीटर पैदल चलत-चलत रमेश के दोस्ती निभावे के सारा जोश काफूर हो गइल रहे। ऊ आगे जाए के तैयार ना भइल आ ओतहिए से ट्रेन ध के रामनगर लौट आइल। घर लौट के रमेश चुपचाप खा-पी के सुत गइल।

एने सुमन नरकटियागंज से ठोरी ( भारत-नेपाल के बार्डर पर एक पर्वतीय पर्यटक स्थल, जेकरा से थोड़ा पहले गांधी जी के भितिहरवा आश्रम बा ) के लाइन पकड़ के साधु बने चल पड़ल। ओकरा मालूम रहे कि ठोरी में जंगल आ पहाड़ बा आ साधु बने ला जंगल आ पहाड़ सबसे सही जगह होला। आखिर वाल्मीकि जी भी त जंगल में हीं रहस जहां सीता जी जा के लव-कुश के जनम देली।

इहे सब सोचत सुमन बढ़े लागल। कबो रमेश के मन हीं मन गरिअबो करे कि डरपोक भाग गइल।

नरकटियागंज से ठोरी के दूरी करीब 25-30 किलोमीटर से कम ना रहे लेकिन सुमन भी धुन के पक्का रहे। पैदल चलत-चलत सांझ के सात बजे के आसपास ऊ ठोरी पहुचिये गइल। चारो ओर अंहार हो गइल रहे। वीरान स्टेशन आ आसपास जंगल आ पहाड़। कोढ़ में खाज ई हो गइल रहे कि मौसम खराब हो गइल आ बरखा बरसे लागल। अब सुमन के हिम्मत आ साधु बने के जोश डगमगाए लागल। रात के जंगल वाला रास्ता पर लौटलो मुश्किल रहे। स्टेशन मास्टर के ऑफिस में जाए में डर लागत रहे कि पूछला पर का बतइहें। पैदल चलत-चलत थकान से भी बुरा हाल रहे। भूख से अतडी अलगे कुलबुलात रहे। साधु बनला में एतना दुर्गत होई, ई पहिले पता रहित त माई-बाबू जी के दु लात खा के भी घरहीं रहते। भूख त केहू तरे बर्दास्त हो जाइत लेकिन रात के यदि बाघ-भालू आ जाए त बाघ-भालू के हीं भोजन बन जाए के पडीत।

एक त बरखा में भींजल देह, आ सांय-सांय बहत बेयार, रात बढ़त जात रहे आ सुमन बाबू लगातार बजरंग बली आ दुर्गा महारानी के गोहरावत रहे कि आज के रात जान बच जाई त बाप किरिया फेर कबो साधु बने के सोचबो ना करब।

एने सुमन के घर खोज-बीन शुरू हो गइल रहे। कई गो मोटर साइकिल सुमन के पता लगावे निकल गइल।

एने रमेश अपना घर दमी साध के सुतल रहे। ना त ऊ सुमन के घर कुछ बतवलस ना हीं अपना घर पर।

रात ले जब कुछ पता ना लागल त थाना में भी खबर भइल।

सुमन के कुछु ना बुझाइल त दुसरका लाइन पर लागल एगो पुरान माल गाड़ी के डिब्बा में घुस के चुका मुका बइठ गइलें। बाहर टप-टप बुनी पडत रहे आ भीतर सुमन के करेजा बैठल जात रहे। कइसे रात कटी, बुझाते ना रहे। अंहार में ना कुछु भीतरा लउकत रहे ना बहरा। आंख फार-फार के बस कुछ देखे के असफल प्रयास करत रले सुमन बाबू। पता ना कब ओकर आंख लग गइल आ ओतहिए ढिमला गइल।

केहू सुमन के गोजी के हुरा से खोद-खोद के जगावत रहे। कुनमुनात उठल सुमन त देखलस ओकरा के एगो सिपाही जगावत रहे। ऊ हड़बड़ा के उठल।

“इंहा काहे सुतल बाडs हो, कहां घर ह?

सुमन बिना कुछ बोलले खाली सिपाही के मुंह ताकत रहे।

“बोलत काहे नइखs, काहे इहां सुतल बाड़s ?

सिपाही फेर पुछलें लेकिन जवाब फेर नदारद।

सिपाही सुमन के उठवलें आ स्टेशन मास्टर के ऑफिस में ले गइले।

ढ़ेर देर पूछताछ कइला के बाद सुमन धीरे-धीरे बतवलस कि के तरे ओकरा दिमाग में साधु बने के बात आइल आ केतरे ऊ घर से रमेश के साथे ठोरी ला चल पड़लें।

रात में सुमन के खिया-पिया के स्टेशने में सुतावल लोग आ दोसरा दिन सुबह पहिलका ट्रेन से एगो सिपाही सुमन के लेके चललें आ दुपहरिया ले रामनगर ओकरा घरे पहुंचा देहलें।

ए बीच सुमन के घर के लोग ओकरा के खोजत-खोजत हलकान हो गइल रहे लोग। सुमन के माई के रोअत-रोअत बुरा हाल हो गइल रहे।

सुमन के बाद में का हाल उनका बाबू जी कइलें, एकर बस कल्पना क लीं सभे, बाकी रमेश के घरे ओकरा केतना चइली के मार पड़ल ई हम ना बताइब।


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लेखक: डॉ. रंजन विकास

गौरी हमार पैतृक गाँव हऽ। दरौली प्रखण्ड के अन्दर पड़ेला। हमार गाँव तीन नदी के बीच में घिरल बा। गाँव के पूरब में झरही नदी, दक्खिन में सरयू नदी आ पच्छिम में निकारी नदी बा। एकरा बादो हमरा गाँव में आज ले कबहूँ बाढ़ नइखे आइल। लगभग हर साल गर्मी आ बड़ा दिन के छुट्टी में गाँव जाए के सिलसिला स्कूली पढ़ाई ले बनल रहे। पचरुखी से हमरा गाँव जाए के तीन गो राहता बा। पहिला, पचरुखी स्टेसन से पसिन्जर गाड़ी से मैरवा स्टेसन आ उहाँ से दरौली वाला बस धके दोन चिमनी पर उतर के पूरब दिसा में एक कोस पैदल चलला के बाद हमनी गौरी पहुँची सन। एह राहे एगो बरसाती नदी “निकरी” हेले के पड़त रहे, जवन गर्मी के दिन में एकदम सूखल रहत रहे, बाक़िर बरसात के दिन में कहीं डांड़ भर त कहीं छाती भर पानी हेले के पड़त रहे। ओह समय नाव के कवनो सुविधा ना रहे। अब बड़की दोन के सोझा ओही नदी पर पुल बन गइल बा आ हमरा गाँव ले पक्की सड़क हो गइल बा। दोन में एगो बहुते पुरान किला के खण्डहर बा, जे महाभारत के कौरव आ पांडव के महान गुरु द्रोणाचार्य के रहे, अइसन लोग के मान्यता बा। दोसर राहता भारत के पहिलका राष्ट्रपति आ भारतरत्न डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के गाँव जीरादेई होत नरिनपुर आ शिवपुर होत झरही नदी हेलला के बाद बिसवनिया होके गौरी पहुँचल जाव। एह राहे पैदल चार कोस चले के पड़त रहे। जीरादेई से गाँव ले कवनो सवारी के सुविधा ना रहे। एही से एह राहे लोग के आइल-गइल कमे होत रहे। बाबूजी से सुनले रहनीं  कि पहिले पुरनिया लोग के आवे-जाए के इहे राह रहे, जहाँ अब सीवान से गाँव ले सवारी के सुविधा हो गइल बा। तिसरका राहता सीवान से हुसेनगंज, फरीदपुर, आन्दर होत असांव पहुँच के फेर उहाँ से पैदल एक कोस ज़मीन चलला के बाद नाँव से झरही नदी हेले के पड़े। ओकरा बादे गाँव पहुँचल जाव, बाक़िर सीवान से असांव के कवनों सीधा सवारी ना रहे। सवारी रहबो कइल त खाली आन्दर ले रहे। आन्दर से असांव पैदले नापे के पड़त रहे आ फेर असांव से गाँव के पैदल राहता अलगे रहे आ बीच में झरही नदी हेले के पड़त रहे। एही से एह राहे हमनीं के गाँव आइल-गइल कमें होत रहे। जादेतर पहिलके राहे गाँव आइल-गइल होखे।

ब्रिटिश शासन काल में एयर फ़ोर्स बेस, पानागढ़ में बड़का बाबूजी धर्मनाथ प्रसाद स्टोर सहायक के पद पर नोकरी करत रहनीं। कम पढ़ल-लिखल रहला के बादो खूब फर्राटेदार अंग्रेजी बोलत रहनीं। अमेरिकन सोल्जर बड़ी मानत रहले सन। दोसरका विश्व-युध्द के बाद जब अमेरिकन ट्रूप लवटे लागल, ओह घरी ओकनी के समझवला के बादो बड़का बाबूजी नोकरी छोड़ के गाँव लवटे के मन बना लेले रहनीं। गाँव लवटला के बाद खेती-बारी के सिलसिला शुरू कइनीं आ उहाँ के जिनगी के आखिरी समय ले खेती-बारी के सिलसिला बहुते बढ़िया से निबहल। बड़का बाबूजी के गाँव के राजनीति से कवनो मतलब ना रहत रहे। एकदम निष्पक्ष रहत रहनीं, जेकरा चलते हर जाति आ तबका से उहाँ के मधुर सम्बन्ध बनल रहल। गाँव-जवार के लोग का बीच में बड़का बाबूजी धर्मू लाल भा चाचा के नाम से जानल जात रहनीं। पता ना काहे तीन पीढ़ी के लोग जइसे कि दादा, बाप आ बेटा उहाँ के चाचा कहत रहे ? आज ले ई बात हमरा समझ में ना आइल।

जइसन गाँव के पुरनिया लोग बतावत रहे कि हमार दादा स्व० वंशीधर प्रसाद अपना जमाना के पहिलका ग्रेजुएट रहनीं  आ वर्मा देस के राजधानी रंगून में शिक्षक रहनीं। जब गाँव आईं त लोग के बीच में पढ़ाई के महत्त्व पर जोर देत रहनीं। दादाजी के देखल त दूर के बात रहे। कवनो फोटो भी ना रहे, जवना से उहाँ के आकृति के कवनो रूपरेखा के अंदाज लगावल जा सके। एगो किताब पर उहाँ के हस्ताक्षार ही एकमात्र स्मृतिशेष बाचल बा। बाबूजी आ बड़का बाबूजी के बचपने में हमार दादा आ दादी परलोक सिधार गइल रहे।

गौरी नाम के दूगो गाँव बा। दोन चिमनी के पच्छिम में मिसिर लोग के गौरी बा आ पूरब में हमार गाँव गौरी बा, जवन बाबू साहेब के गौरी नाम से जानल जाला। हमरा गाँव में राजपूत लोग के संख्या बेसी रहे। ओह समय लगभग बावन घर राजपूत के रहे। आउरो सब जाति रहे, बाक़िर एको घर ब्राम्हण आ भूमिहार ना रहे। गिन-चुन के कायस्थ लोग के दूगो घर रहे – एगो हमनी के घर आ दोसर हमनी के पटीदार बिकाऊ लाल के। आज कायस्थ जाति में एको परिवार गाँव पर नइखे। दुनू घर में ताला लटकल बा। रोजी-रोटी ख़ातिर सभे गाँव से बहरिया गइल।

साँच कहीं त ओह समय में हमार गाँव एकदम अटट देहात रहे। अगर कवनो राहगीर दरवाजा पर पहुँच जाव त गुड़ के भेली के एक टुकी आ एक लोटा पानी छोड़ के दोसर कवनो चीज से ओकर स्वागत कइल संभव ना होखे। बिजली, सड़क, आवे-जाए के कवनो सवारी, दउरी-दोकान भा स्वास्थ्य सुविधा त रहबे ना कइल। गाँव में खाना बनावे ख़ातिर गैस आ कोयला के भी कवनो सुविधा ना रहे। आमतौर पर रहर के खूंटी आ ओकर झांगी, मकई के ढाठा आ मकई के बाल के लेंढ़ा, धान के भूसी, लकड़ी आ गोंइठा जलावन के नाम पर रहत रहे, जवना के लोग पूरा साल भर ख़ातिर जमा कर के रखत रहे। अगर बरसात में जलावन भींज जाव त रसोई में खाना बनावत बेर बड़ दिकदारी होखे। चूल्हा जरावे ख़ातिर लोग एक दोसरा के घर भा घोनसार से कलछुल में आग के भउर माँग के ले आवत रहे आ ओही से चूल्हा जरावे। कई बेर हमहूँ घोनसार से कलछुल में आग के भउर ले आवत रहनीं। माचिस के उपयोग तबे होखे, जब कबो ढेबरी चाहे लालटेन जरावे के पड़े भा कवनो पूजा पाठ होखे। हमरा इयाद बा कि जादेतर घर में लोग कद्दू, नेनुआ आ तरोई के तरकारी बनावते ना रहे, काहेंकि ई सब तरकारी बनावत बेर कड़ाही में एतना जादे पानी छोड़ देत रहे, जवना के सुखावे में जलावन के खरचा जादे होत रहे। ओह समय हर घर में जलावन बहुत सीमित मात्रा में रहत रहे। अगर केहू के घर में कबहूँ कद्दू, नेनुआ आ तरोई के तरकारी कबो बनबो करे त ओह में छर-छर पानी रहत रहे।

अभाव त बहुते रहे, तबो आपसी मेल-मिलाप आ भाईचारा के चलते सामाजिक तानाबाना बहुते नीक रहे। खरीद फरोख्त करे के अवकात बहुते कम लोग के रहत रहे। निहायत जरुरी सामान जइसे नून, तेल, मसाला, साग–सब्जी, मछरी भा आउर कवनो चीज के खरीदारी करे के होखे त अनाज से बदलेन होत रहे। ओहू में अगर मोट अनाज होखे त जादे अनाज देबे के पड़त रहे। गृहस्थ परिवार में केतनो संपन्नता रहत रहे, बाक़िर नगदी के अभाव त रहबे कइल। गाँव-जवार में बहुते लोग अइसनो रहे, जेकरा गोड़ में चपल रहल त दूर के बात रहे। देह पर सही-सलामत कवनो कपड़ा भी ना रहत रहे। जाड़ा के मौसम त एह लोग ख़ातिर सराप जइसन ही रहे। जब देह पर ही मोसलम कपड़ा ना रहत रहे त ओह लोग के ओढ़ना-बिछौना के बारे में का कहे के बा ? आमतौर पर पुअरा ही बिछौना के काम करत रहे। बोरा ओढ़ना आ बिछौना दुनू के कामे आवत रहे। केहू-केहू धोती भा एगो पातर चादर से ही ओढ़ना के काम चलावे। रात में जब जाड़ सेके लागे भा पाला बर्दास से बहरी हो जाव त लोग उठके कऊड़ा तापत रात बितावे। जे संपन्न किसान रहे, ओकरो लगे अइसन कवनो सुबहित कपड़ा ना रहत रहे, जे पहिर के हित-नाता में कवनो शादी-बियाह के मोका पर जा सके। हमरा आजो इयाद बा कि लगन में जब गाँव-जवार के लोग के कहीं भी हित-नाता में शादी-बियाह भा आउर कवनो मोका पर जाए के पड़त रहे त अक्सर बड़का बाबूजी से धोती-कुर्ता आ जूता पहिरे ख़ातिर माँग के ले जात रहे लोग। ऊ लोग अपना कंधा पर धोती-कुर्ता धइले आ हाथ में जूता लेहले अपना रिश्तेदारी जाए ख़ातिर निकल जात रहे। पैदल चलत-चलत जब कुटुम्ब के गाँव नियरा जाव त कवनो इनार भा चापाकल पर जाके आपन हाथ आ गोड़ रगड़-रगड़ के धोवे आ कुल्ला-गलाला करे। एह से सऊँसे राहता के थकान तनी कम हो जात रहे। ओहिजा आराम से धोती-कुर्ता आ जूता पहिर के तइयार होखे। ओकरा बादे रिश्तेदार में पहुँचत रहे। रिश्तेदारी से लवटला के बाद धोती-कुर्ता धोवा के आ जूता झार-झुर के बड़का बाबूजी के वापस लवटा देत रहे। एही सब काम ख़ातिर बड़का बाबूजी अलगे से एक-दू सेट धोती-कुर्ता रखत रहनीं।

हमनी के दुआर पर एगो बड़हन इनार रहे, जे चाचा के इनार नाम से जानल जात रहे। एह इनार के चारू ओर गोलाहे बड़हन चबूतरा बनल रहे, जवन ज़मीन से लगभग तीन फीट ऊँच रहे। एह चबूतरा पर रोज एक भोरे से देर रात ले एक से एकाल रोचक नजारा देखे-सुने के मिलत रहे। भोरहीं से चहलकदमी शुरू हो जाव। अड़ोस-पड़ोस के घर में पानी पीये, बर्तन धोवे, खाना बनावे आ औरतन के नहाए ख़ातिर डोल से पानी भर के ले जाए के सिलसिला दिनों भर लागल रहत रहे। दतुअन करत लोग एक भोरे इनार पर पहुँच जात रहे आ चबूतरा पर घंटों बइठकी होखे। बतकही के ना त कवनो ओर रहत रहे आ ना कवनो छोर। ओही में खूब हँसी-ठाठा के बात होखे। पूरा जवार के सगरी खबर एहीजा सुने के मिल जाव। कबो-कबो अइसन मजगर बात होखे कि दुआर से हटे के मन ना करे। जब तनी धूप निकले त एही चबूतरा पर लोग के नहाइल शुरू होखे। ओहिजा कुछ लोग लोटा में जल लेहले सूरज भगवान के जल ढ़ारे। ई सिलसिला रोजे दूपहरिया ले चलत रहे। दिन में गाँव के कुछ औरत सब चबूतरा पर अनाजो सुखावत रहे। साँझ होते चबूतरा पर लोग के जुटान शुरू हो जाव आ फेर शुरू होखे उहे बतकही, हँसी-ठाठा के बात आ हेने-होने के गरमा-गरम खबर। गर्मी में जब बइठकी खतम होखे, तले इनार के चबूतरा पर सूते ख़ातिर अगल-बगल से दस से पन्द्रह आदमी रोजे पहुँच जात रहे। साँच कहीं त ई इनार आ एकर चबूतरा हमनी के दुआर के एगो बड़हन रौनक रहे।

एही इनार के एगो रोचक प्रसंग याद आ रहल बा। एगो रहली बीजू बो। सऊँसे गाँव के भउजाई लागत रहली। उनका से लोग खूबे हँसी-ठाठा करे, बाक़िर ऊ अकेले ही सब पर बीस पड़त रहली। अकेले में उनका से केहू मज़ाक करे के जल्दी हिम्मत ना करे। रोज सबेरे-साँझ के बेर हमनीं के इनार पर डोल से पानी भरे आवस। जसहीं इनार में आपन डोल डलले रहस, ठीक ओही बीचे गाँव के कवनो लइका दूरे से उनका के रिगा देव – ‘लड्डू लाते मारेली आ जिलेबी दांते काटेली।‘ ई बात सुनते बीजू बो आपन डोल आ ओकर रसरी ओसहीं इनारे में छोड़-छाड़ के ओह लइका के पीठियावे लागस। लइका आगे-आगे भागल जाव आ ई ओकरा के पीछे-पीछे चहेटत रहस। बीजू बो से केहू के जीतल एतना आसान ना रहे। ऊ त अपने दस गो मरद के बराबर रहली। आखिर में ऊ लइका आपन हार मान लेव। तब जाके ओकरा के छोड़स। लगभग रोजे इनार में काँटा डाल के उनकर डोल निकलाव।

हमरा गाँव में कवनो तरह के सरकारी भा प्राइवेट स्वास्थ्य सेवा के सुविधा ना रहे। दू किलोमीटर के दूरी पर बिसवनिया गाँव बा। ओही से सटले झरही नदी के बाँध पर एगो सरकारी स्वास्थ्य उपकेंद्र रहे, जहाँ एगो केरालियन ए०एन०एम० रहत रहे। ओहिजा कवनो दवाई रहते ना रहे। गाँव से आठ किलोमीटर के दूरी पर दरौली प्रखंड मुख्यालय में एगो सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रहे, जहाँ एम०बी०एस० डॉक्टर उपलब्ध रहे, बाक़िर पूरा जवार भर में कतहूँ एम०बी०एस० डॉक्टर ना रहे। कहीं-कहीं आर०एम०पी० डॉक्टर जरुर भेंटा जात रहे। गाँव भा आसपास में दवाई के कवनो दोकान भी ना रहे। अगर कवनो दवाई के जरूरत पड़ जाव त ख़रीदे ख़ातिर दरौली भा शिवपुर जाए के पड़त रहे। हमरा गाँवे सप्ताह में एक भा दू दिन नागा पर एगो आर०एम०पी० डॉक्टर आपन राजदूत मोटरसाइकिल से आवत रहले। उनकर मोटरसाइकिल भी एतना पुरान रहे कि चलते-चलते बीचे में बन्द हो जाव। हमेसा खराबे रहत रहे। गाड़ी स्टार्ट करे ख़ातिर डॉक्टर साहेब किक मारत-मारत एकदम फेनेफेन हो जात रहले, तबो उनकर मोटरसाइकिल जल्दी स्टार्टे होखे के नामे ना लेव। आखिर में हारपाछ के गाँव के लइकन से ठेलवावस, तब जाके उनकर मोटरसाइकिल स्टार्ट होखे। डॉक्टर साहेब जाति के तेली रहले। उनकर असली नाम केहू जानतो ना रहे। सभे उनका के तेलिया डॉक्टर साहेब के नाम से जानत रहे आ एही नाम से उनका के बोलइबो करे। उनका मुँहो पर सभे तेलिया डॉक्टर साहेब कहे, बाक़िर एह सम्बोधन के ऊ कबहूँ बाउर ना मानत रहले। कवनो लइका आके बोले ए तेलिया डॉक्टर साहेब ! माई बेराम बिया, चल के तनीं देखलीं। डॉक्टर साहेब जाके देखस आ अपना पास से दवाई भी देस। अगर पानी चढ़ावे भा सुई देबे के जरुरत होखे त उहो काम करस। अइसे डॉक्टर साहेब फीस के नाम पर अलगा से रुपया-पइसा ना लेत रहले, बाक़िर सुई, दवाई आ पानी चढ़ावे के जवन चार्ज होखे, ओही में आपन फीसो हनठ के जोड़ देत रहले।

एगो रोचक घटना इयाद पड़ रहल बा। घर के आँगन के दक्खिन छोर पर चउका रहे। बड़की अम्मा खाना बनावत रहली। चउका के ठीक सामने आँगन में हमनी के बाल-मण्डली के गपशप चलत रहे आ खेल भी होत रहे। एही में हमार चचेरा भाई पुनु माने रंजन आलोक कुछ खुटचाली करत रहले। चउका में बइठल बडकी अम्मा उनकर सब खुटचाली देखत रहली आ ओहिजा से उनका के बार-बार मना भी करत रहली। कतनो मना करस बाक़िर पुनु मनबे ना करस। उनकर खुटचाली खतम होखे के नामे ना लेव। आजिज़ आके खीस में बड़की अम्मा उनका ऊपर छोलनी चला देहली। छोलनी हवा में लहरात आलोक के नाक से लागत थोड़े दूर पर जाके गिरल। उनकर नाक के एगो कोना कट गइल। खून बहे लागल। खून देख के सभे घबरा गइल। घर में अफरा-तफरी मच गइल। सभे परेसान रहे। विचार भइल जे शिवपुर लेजा के डॉक्टर से मरहम-पट्टी करावल जाव। उनका साथे पैदले एक कोस ज़मीन चल के झरही नदी हेलत हमनी के शिवपुर पहुँचनीं सन। उहाँ एगो आर०एम०पी० डॉक्टर भेंटाइल। दूगो टाँका पड़ल आ एगो सुई घोंपाइल। डॉक्टर खाए के कुछ दवाई भी देहलस। दवा लेके फेर पैदले झरही नदी हेलत बिसवनिया होत हमनीं के गाँवे पहुँचनीं सन। शिवपुर के बात आइल त एगो आउर प्रसंग इयाद पड़ गइल। पहिले हमरा गाँव में कवनो आटा चक्की ना रहे, जवना के चलते गेहूँ पिसवावे ख़ातिर शिवपुर जाए के पड़त रहे। बाद में जब हमरा गाँव में सरल लोहार के घरे आटा चक्की बइठल त गेहूँ पिसवावे में तनी सुबहिता हो गइल।

बड़का बाबूजी के एगो लंगोटिया इयार रहले धारी सिंह। उनका के हमनी सभे धारी बाबा कहत रहनीं। रोज साँझ आ सबेरे दुनू आदमी के मिलल-जुलल होत रहे। कवनो समस्या के एक-दोसरा से साझा करत रहे लोग। बुझाव जइसे एह लोग के एक दोसरा में परान बसेला। आपस में अइसन भुनुर-भुनुर बतियावे लोग कि बगले में बइठल आदमी के ना त कुछ सुनाई पड़े आ ना कुछुओ बुझाव जे का बतियावता लोग। कतहीं भी जाए के होखे त एके साथे जात रहे लोग। पूरा गाँव-जवार में धारी-धर्मू के जोड़ी बहुते नामी रहे। जर-जमीन के खरीद-बिक्री दरौली में होत रहे, काहेंकि सबसे नजदीक रजिस्ट्री कचहरी दरौली में रहे, जे हमरा गाँव से करीब आठ किलोमीटर के दूरी पर रहे। आवे-जाए ख़ातिर पैदल छोड़ के दोसर कवनो सवारी के साधन ना रहे। जवार में केहू के भी जमीन के जब खरीद भा बिक्री होखे त ऊ लोग अपना साथे बड़का बाबूजी के रजिस्ट्री कचहरी जरूर लेके जात रहे। साथे-साथे धारी बाबा जात रहले। बड़का बाबूजी के जर-जायदाद के दस्तावेज के बढ़िया जानकारी रहे। रजिस्ट्री कचहरी के प्रक्रिया आ दस्तावेज के लिपि से परिचित भी रहनीं। हमरा इयाद बा जे गर्मी के दिन में बड़का बाबूजी दरौली से लवटत बेर गोड़रा मछरी जरुरे लेके आवत रहनीं। दरौली में सरयू नदी रहला के चलते गोड़रा मछरी आसानी से मिल जात रहे। ओह समय गोड़रा मछरी दस रुपया में एक सेर मिलत रहे। नाप-तौल ख़ातिर बटखरा में छटाक, सेर, पसेरी आ मन चलत रहे। किलोग्राम के कवनो चलन ना रहे।

हमार गाँव के जमीन बहुते उपजाऊ रहे। जादेतर धनहर खेत रहे। धान के पैदावार भी जादे होत रहे। एकरा अलावे मकई, मसुरिया, टंगुनी, कोदो, मडुआ, चिना, अरहर, मटर, सरसों, तीसी, पटसन, गन्ना, आलू, पियाज आ साग–सब्जी के उपज भी बढ़िया होखे। गेहूँ के फसल लगभग नाहिए के बराबर होत रहे। बाकिर जौगोजई के खेती खूब होखे। जौगोजई में जौ के मात्रा जादे रहत रहे आ गेहूँ नाम भर के रहत रहे। दवनी-ओसवनी के बाद जब जौगोजई घरे आवे त ओह में से औरत लोग बइठल-बइठल लगभग दस किलो ले गेहूँ चुन के अलगे निकालत रहे आ ओकरा के छठब्रत ख़ातिर नेमहा रख देत रहे। छठ पूजा के समय एही गेहूँ के जांत में पिस के आटा तइयार कइल जाव, आ ओकरे ठेकुआ पाके, जवन अरघ पर चढ़ावल जाव। हर घर में असहीं होत रहे। जौगोजई के आटा के रोटी होखे त तनी मोटाह, बाक़िर खाए में खूबे मीठ आ सवदगर लागे। रफेज भी बहुते रहत रहे, जवन स्वास्थ्य के लिहाज़ से बढ़िया रहत रहे। एगो अइसन समय आइल कि जौ के खेती साफे बन्द हो गइल। जौ के जगह पर लोग गेहूँ बोए लागल। अब त पूरा गाँव-जवार में खोजलो पर पूजा-पाठ ख़ातिर जौ ना भेंटाला। बाजार से ही खरीदे के पड़ेला।

कबो-कबो अंधविश्वास के सामाजिक मान्यता मिल जाला, जवना के कवनो वैज्ञानिक आधार ना होखे। तबो लोग एगो परम्परा के रूप निभावे लागेला। एही परम्परा के निभावे में पहिले हमरा गाँव में कबहूँ चना ना बोआत रहे। आमलोग के अइसन धारणा रहे कि हमनी के गाँव में चना बोअल ना सहेला। एक बेर हम बड़का बाबूजी से चना बोए ख़ातिर बहुते जिद कइनीं। बड़का बाबूजी मनबे ना करीं आ हम रहनीं जे अपना जिद पर अड़ल रहनीं। बड़का बाबूजी के लगे लरिआइल रहत रहनीं आ बार–बार एके गो रट लगवले रहनीं। आखिर में हार पाछ के बड़का बाबूजी चना बोए ख़ातिर तइयार भइनीं। ओही साल नवरा के गढ़ई के बगल वाला खेत में चना बोआइल। पूरा गाँव-जवार में कानाफूसी शुरू हो गइल। लोग तरे-तरे के बात करे लागल। धारी बाबा आके सब बात बड़का बाबूजी से बतावस। एक दिन धारी बाबा घरे आइल रहले। बड़का बाबूजी से कहत रहले – ‘धर्मू ! काहें अइसन काम कइलऽ हऽ ? पूरा जवार में हल्ला बा। लोग तरे-तरे के बात करत बा। तू जानते बाड़ऽ कि गाँव-जवार में चना बोअल ना सहेला। तहरा ना बोए के चाहत रहे।‘ बड़का बाबूजी कहनीं – ‘अरे लइका के मन रखे ख़ातिर छव कट्ठा में चना बोवा देहनीं। जइसे आउर सब फसल बोआला, ओसहीं चना भी एगो फसल हऽ। अगर बोआइए गइल त एह में हरजे का बा ? छोड़ऽ गाँव के लोग के बात। अब त बोआ गइल बा। अब अगिला साल देखल जाई।‘ चना त खूबे लहलहाई। देख के मन गदगद हो जाव। चना के साग भी खूब खाए के भेंटाइल। गाँव के लोग भी खूब चना के साग खोंट के खइले रहे। गाँव-जवार के लोग मोटा-मोटी आधा खेत के चना के झांगी उखाड़ के खा गइल रहे। ओकरा बादो बहुते चना भइल। अगिला साल से पूरा गाँव-जवार में चना बोआए लागल।

बात ओह समय के हऽ, जब भैया आ हम पटना में पढ़त रहनीं। छठ में सभे पचरुखी से गाँव चल गइल रहे। हमनी के भी पटना से गांवे जाए के विचार भइल। ओह समय पटना में गंगा नदी पर कवनो पुल ना बनल रहे। उत्तर बिहार जाए ख़ातिर स्टीमर से गंगा नदी हेले के पड़त रहे। भैया आ हम सबेरहीं गाँव जाए ख़ातिर पटना से निकलनी सन। बाँसघाट पहुँचला के बाद बच्चा बाबू के स्टीमर से गंगा नदी हेल के पहलेजा पहुँचनी सन। पहलेजा घाट से सरकारी बस स्टैंड पैदल जाए में पाँच से सात मिनट लागत रहे। ओहू में बस धरे ख़ातिर आपन बक्सा-पेटी माथा पर भा हाथ में लेहले धउर के जाए के पड़त रहे। ना त बस में बइठे के जगह ना भेंटाव। बस में खड़े-खड़े जाए के पड़े। उहाँ से सरकारी बस से सीवान आ सीवान से दरौली के प्राइवेट बस धराइल। दोन पहुँचे से पहिलहीं किरिन डूब गइल रहे। हमनी के आगपाछ में पड़ल रहनीं  कि अंधेरा में निकरी नदी कइसे हेलल जाई ? एक त एकदम सूनसान राहता आ ओह पर से किरिन डूबला के बाद नदी के विकराल रूप देख के असहीं भयावह लागे। भैया कहलन कि बड़की दोन में ही उतर जाए के आ ओहिजा बच्चा बाबू के इहाँ रात में ठहर जाव। बच्चा बाबू दोन के नामी आदमी रहले। उनकर कई गो बस चलत रहे। ऊ बाबूजी आ बड़का बाबूजी से परिचित रहले। हमनी दुनू भाई उनका इहाँ पहुँच के आपन परिचय देहनी। बहुते खुश भइलन। बाबूजी आ बड़का बाबूजी के हालचाल पुछलन आ हमनी के रात में रुके के इन्तजाम भी करवले। रात के मछरी-भात खइला के बाद आराम से सूतनीं सन। एक भोरे उठ के फ्रेश भइला के बाद भरपेटाहे नाश्ता भइल। ओकरा बाद हमनी के गाँवे जाए ख़ातिर निकल गइनीं। निकरी नदी के गहराई त जादे ना रहे, बाक़िर नदी बड़ी छितनार रहे। कहीं डांड़ भर त कहीं छाती भर पानी हेलत करीब नौ बजे सबेरे हमनी के गाँव पहुँचनीं सन।

गाँव गइला के एगो अलगे मज़ा रहत रहे। आजो ओसहीं लागेला। खेत-खरिहान घूमल, गर्मी के दिन में आन्ही-बतास अइला पर एके सांस में नवरा के गढ़ई वाला बगइचा में धउर के आम आ जामुन चुनल, हल से जोतल खेत हेंगावत बेर हेंगा पर बड़का बाबूजी के दुनू गोड़ के बीच बइठ के मज़ा मारल, बैल से गेहूँ के दवनी कइल, चलत पछुआ में ओसवनी के नजारा, खेत पटावत बेर इनार पर चलत राहट भा ढेकुल के ठंढा-ठंढा पानी पीअल, सीजन में मकई के खेत के बीच मचान पर बइठ के होरहल भुट्टा के सवाद लिहल, जाड़ के रात में दुआर पर कउड़ा तापे के बेरा बइठल-बइठल तीन-चार गो उँख चाभल, ओही कउड़ा में कोन पका के ओकरा के खपड़ैल के ओरी पर रात भर ओस में छोड़ल आ होत भिनसहरे ओकर सवाद लिहल, कोल्हू से पेरात उँख के रस पीअल आ एह रस के बनल रसिआव के सवाद लिहल, ताजा-ताजा महिया खाइल, धान के खेत में लागल पानी में बन्सी से टभका पर मछरी मारल, ढेकी के कुटल सुरका चिउरा के सवाद लिहल, लगन के दिन में चोरी-छिपे लौंडा नाच देखल, जतरा पार्टी के अइला पर रामलीला देखल आजो इयाद बा। एह सब में जवन मज़ा मिलत रहे, ओकर बाते कुछ आउर रहे। समय के साथे सम्पन्नता त बहुते बढ़ल, बाक़िर ओइसन मज़ा फेर कबहूँ ना भेंटाइल। साँच कहीं त ऊ सब एगो अलगे दुनिया रहे, जे अब सपना जइसन लागेला। कतनों अभाव रहे, बाक़िर “मन चंगा त कठउती में गंगा” कहावत सोरहो आना सही रहे। ओह ज़माना में सीमित संसाधन के साथे आदमी के जरूरत भी सीमित रहत रहे। थोड़-थाड़ जवने साधन रहत रहे, ओही में खूब मस्ती रहत रहे। बाबूजी के कहल एगो बात हमरा आजो इयाद बा कि जे आदमी आपन जरूरत के जेतने सीमित रखी, ओकरा ओतने कम मानसिक तनाव रही आ ओतने जादे सुखी रही। आज आदमी भले भौतिकवादी सुख-सुविधा से संपन्न त हो गइल, बाकिर पहिले जवन मन के सुख मिलत रहे ऊ त अब गूलर के फूल हो गइल। अब बुझाला जे बाबूजी के जवन सोच आ विचार रहे ऊ केतना सार्थक रहे।

हमार गाँव बाबू साहेब के गाँव हऽ। जातिगत सोभाव के चलते ओह लोग के दबंगई कवनो नया बात ना रहे। पहिलहूँ थोड़-बहुत दबंगई त रहते रहे, बाक़िर एगो सीमा के भीतरे रहत रहे। लोकलाज आ मान-मार्यादा के तनी खेयाल रहत रहे। साँच कहल जाव त एही भावना के चलते समाज के तानाबाना मजबूत रहत रहे। जब समाज-परिवार बा त लोग के सोच-विचार में अंतर भइल स्वभाविक बा। बाकिर मतभेद जब मनभेद के रूप में बदल जाला त उहाँ अहम् आ आन के जनम होला, जवन सामाजिक संरचना के तार-तार करे में कवनो कसर ना छोड़े। अइसने कुछ हालत हमरा गाँव के हो गइल रहे। देखते-देखते बाबू साहेब लोग दू खेमा में बँट गइल। एकरा बादो हमरा गाँव के जादेतर लोग के राजनीति से कवनो सरोकार ना रहत रहे। एगो रहले गोविन्द सिंह, जे हमरा गाँव के राजनिति के असली केंद्र बिंदु रहले। साँच कहल बा कि अगर टोकरी के एगो आम सड़ जाव त पूरा टोकरी के आम के सड़ा देला। कुछ अइसने हाल हमरा गाँव के भी रहे। एकाध आदमी के सवारथ के चलते सँउसे गाँव के परिवेश बदरंग हो गइल। देखते-देखते गाँव में पहिले जइसन ना त माहौल रह गइल आ ना पहिले जइसन सोच वाला लोग। सब कुछ उलट-पलट हो गइल।

सन् 1973 आवत-आवत हमरा गाँव–जवार के राजनीति एगो अलगे राह धलेले रहे। हमरा गाँव में चरमनी के गड़हा पर कब्जा करे के चक्कर में एके दिन में तीन आदमी के लाश गिरल। अब लोग गोलबंद होखे लागल रहे, जवना के पूरा फायदा माले पार्टी के कुछ नेता लोग उठावल। हमरा गाँव में माले के एगो अलगे खेमा तइयार हो गइल। गाँव में कुछ नया नेता भी पैदा हो गइलन। देखते-देखते पूरा दरौली प्रखंड माले के गढ़ बन गइल। हमरा गाँव में माले के कुछ नेता लोग के आवाजाही बढ़े लागल। बाबू साहेब लोग के खिलाफ पूरा गाँव में लोग लामबंद होखे लागल। लमहर समय ले दुनू तरफ से ह्त्या के सिलसिला चलत रहल। माहौल एतना खराब हो गइल रहे कि गाँव जाए में डर लागे। साँझ होते लोग अपना-अपना घर के भीतर बन्द हो जात रहे। हालत अइसन हो गइल कि आपन जान बचावे ख़ातिर कुछ बाबू साहेब लोग त हमेसा ख़ातिर गाँव छोड़ दिहल आ फेर कबहूँ लवट के ना आइल। सब बिमारी के इलाज हो सकत बा, बाक़िर गलतफहमी आ शक के कवनो इलाज नइखे। एही बेमारी के चलते हमरा गाँव में कुछ निर्दोष लोग के भी ह्त्या हो गइल, जवना में एगो रहले नथुनी सिंह। उनकर मकान हमरा घर के ठीक सामने रहे। नथुनी सिंह गहिलापुर हाई स्कूल में हेडमास्टर रहले। लम्बा आ छरहरा बदन पर सफ़ेद धोती-कुर्ता में उनकर व्यक्तित्व बहुते निखरत रहे। रोज साइकिल से स्कूल जात-आवत रहले। सालो भर नाव से झरही नदी हेले के पड़त रहे। घर से स्कूल आ स्कूल से घर अइला के अलावे गाँव में उनकर कहीं भी बइठकी ना होत रहे आ गाँव के राजनीति से कवनो खास सरोकार भी ना रखत रहले।


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min2770

लेखक: मनोज भावुक

हमरा ईयाद बा जब हम छठवां-सातवाँ में पढ़त रहीं त माई हर साल गरमी आ जाड़ा के छुट्टी में बहरा से गाँवे निकल जाय। एकरा अलावे भी महिना-दू महिना पर गाँवे चलिए जाय। ओकर परान गाँवे में बसत रहे।

हम नया-नया शहर में आइल रहीं। शहर माने रेनूकूट, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश। हमरा बुझाय जे गाँव में बुरबक भा मजबूर लोग रहेला। जे चाल्हाक बा, तेज बा, सफल बा, प्रतिभावान बा उ शहर भागेला, शहर में बसेला। शहर में ओकरा बिल्डिंग पिटाला। उ हमार लड़िकबुद्धि रहे, बाद में त मजबूरी। कबो पढ़े खातिर, कबो नोकरी खातिर, कबो कुछ त कबो कुछ खातिर शहरे-शहर छिछिअइनी। अफ्रीका-यूरोप ले गइनी। धावते बानी, ना जाने कहिया से।

बस कोरोना में गोड़ तूड़ के बइठे के पड़ल बा। एकरा के लॉकडाउन कहाता। लॉकडाउन में ढेर लोग के गाँवे भागल देखनी ह। ढेर लोग के कहल सुनत बानी कि अब गाँवे में रहल ठीक बा।

कबो-कबो हमरो मन करsता कि गाँव के दुआर पर एगो कोना में खोंपी आ पलानी होखे। खूँटा पर गाय-बछरू बान्हल जाय। खाँटी दूध मिले। गाय के गोबर वाला खाद से फरहरी लागे आ ताज़ा तरकारी मिले। दुआर पर एगो-दूगो पेड़ लागे आ प्राणवायु ऑक्सीजन मिले। त हमार माई ठीके कहत रहे कि बबुआ हो जनमधरती से ना कटे के, ना छोड़े के, बुरा वक्त में ओही जी लौटे के पड़ेला।

आज जब मानव जीवन संकट में बा त सब बुझाता। बुझाता कि पंच तत्व जवना से जीवन बनल बा, देह बनल बा, ओकरा से जुड़ के रहल केतना जरूरी बा। माटी में रहल भा रोज माटी के छूअल केतना जरूरी बा। नीम, बरगद, पीपल के छाँव में रहल केतना जरूरी बा। घाम लोढल केतना जरूरी बा।

साँच कहीं त माई के बतिया बेर-बेर मन परsता आ मन परsता हमार गाँव। हमार स्टेशन दिमाग में नाचsता।

ई सिवान, रघुनाथपुर थाना के कौसड़ स्टेशन ह मगर आजो इहां से ना कवनो ट्रेन गुजरेला, ना  बस। आजो ई गाँवे बा। हमार गाँव। सरयू (घाघरा नदी) के किनारे गाँव के दक्षिण में जवन बांध बा उ 20 फीट चौड़ी पक्की सड़क में तब्दील हो गइल बा। एह से विकास के कई गो अउर गुंजाइश बनत बा। बिजली बत्ती भी कम से कम बीस घंटा रहते बा। पानियो लोग  खरीद के पीये लागल बा। कुछ घर में एसियो लागल बा। ओसारा भा बगइचा में बेना डोलावत लोग अब नज़र नइखे आवत।

हालाँकि कुछ लोग के माली हालत अभियो बहुत खराब बा। हमरा आपन एगो शेर मन पड़त बा-

कहीं शहर ना बने गाँव अपनो ए भावुक

अंजोर देख के मड़ई बहुत डेराइल बा

गाँव में हम बहुत कम रहल बानी बाकिर गाँव हमरा भीतर हमेशा रहल। हमरा हर रचना, हमरा हर संस्कार, हमरा जीवन शैली में रहल। इहाँ तक कि जवना महानगर भा महादेश में गइनी, आपन गाँव लेले गइनी। 1993 में हम अपना गाँव के बायोग्राफी लिखनी- कौसड़ का दर्पण। ओकर सारांश पोस्टर के रूप में तब होली के आस-पास कई गो गाँव के देवाल पर चिपकल रहे। तब हम आईएससी पास कइले रहनी। हमरा गाँव में 29 गो जाति के लोग रहेला। गाँव के बॉयोग्राफी के बहुत सारा हिस्सा हम पद्य में भी लिखनी। ओह में जातियन के जिक्र कुछ अइसे बा –

अहीर, गोंड़, नोनिया, बनिया, डोम, दुसाध, चमार

भर, भांट, कमकर, कुर्मी, बरई और लोहार

ततवा, तेली, तीयर, बीन, नट, कोइरी, कोंहार

महापात्र, मुस्लिम, मल्लाह, धोबी और सोनार

नाउ, पंडित, लाला, ठाकुर।

 

29 जातियों का ये झुंड

सीधा-शरीफ, हुंडा तो हुंड

कौसड़ के दर्पण में निहार

मन बोल रहा है बार-बार

हे कौसड़ तुमको नमस्कार !

लमहर कविता बा जवना में कौसड़ के लोग के जनजीवन के विभिन्न बिंदुअन के छूवे के प्रयास कइल गइल बा।

1993 में हम जवन जनगणना कइले रहनी, उ हमार खुद के शौकिया प्रोजेक्ट रहे। गाँव के जाने के रहे ठीक से। 3 महीने तक लागल रहनी। गर्मी के महीना रहे। कई बार सिवान के चक्कर लगावे के पड़ल गाँव से संबंधित कागजात खातिर।

हमरा से 20 साल पहिले ई काम हमरे गाँव के एगो वैज्ञानिक फूलदेव सहाय जी कइले रहनी।  उहाँ के आत्मकथा में एगो अध्याय ‘’ मेरा गाँव कौसड ‘’ भी बा। हालाँकि तब ओह किताब के भा जनगणना के बारे में हमरा कवनो जानकारी ना रहे। जब हम आपन काम शुरू कइनी आ लोग से मिलल-जुलल शुरू कइनी त हमरा गाँव के गणेश सिंह ओह किताब के जानकारी दिहले, बल्कि उ किताबो उपलब्ध करवले। गणेश जी ओह जनगणना में फूलदेव सहाय के सहयोगी रहलें।

अपना गाँव के चौहद्दी के बात करीं त पूरब में गभिराड़, पश्चिम में बड़ुआ, उत्तर में पंजवार आ दक्षिण में घाघरा नदी बा। पंजवार हीं मुख्य सड़क बा जवन सिवान या छपरा, पटना से कनेक्ट करेला। पंजवार से डेढ़-दू किलोमीटर अंदर बा गाँव के लोग के रेसिडेंशियल एरिया। पंजवार रोड से लेके रेसिडेंशियल एरिया तक खेत बा। एही खेतन के बीच एगो खाड़ी बा जे दक्षिण में घाघरा नदी से कनेक्ट हो जाला। खाड़ी के निर्माण खेत के सिंचाई खातिर कइल गइल बा। एह खेत के कुछ भूभाग के चंवरा कहल जाला। खाड़ी ओह पार (पूरब दिशा में) के खेत के डीह पर के खेत कहल जाला आ दक्षिण में घाघरा नदी के किनारे वाला खेतन के दियर / दियारा कहल जाला। गेहूँ, धान, अरहर, जौ, बाजरा, मक्का, तरकारी आ दियर में ऊंख (गन्ना) के खेती होला। मक्का या मकई के बाल अगोरे खातिर मचान पर रात में सूते या दिन भर गपियावे के बचपन के कई गो संस्मरण जेहन में बा। हल अउर हेंगा के कहानियो ईयाद बा जवना के आज ट्रैक्टर रिप्लेस कर देले बा। गाय आ भईंस खातिर सांड़ आ भईंसा के ‘’ कर छो-कर छो ’’ कर के तलाशे के रोचक किस्सा-कहानी आ बचपन के जिज्ञासु मन में एह बाबत उठत तमाम सवालन के जबाब अपना बालमण्डली में खोजे आ विचित्र-विचित्र जबाब के ठहाकन से गुलजार याद भी बा हमरा साथे जवन शहर आ मेट्रो के बच्चा लोग खातिर त दुर्लभे बा।

तब खाना बनावे खातिर लगभग सभ घर में माटी के एक मुंहा आ दू मुंहा चूल्हा हीं होत रहे जवना में ईंधन के रूप में रहेठा या चइली लवना के रूप में प्रयोग कइल जात रहे। अब त मोदी जी घर-घर गैस के चूल्हा पहुंचा देले बाड़े। शौच करे खातिर अब शायदे केहू घर से दू किलोमीटर दूर खेत में जात होई। घर-घर शौचालय बा। अब कवनो माई, बहिन, भइजाई के शौच खातिर पेट दबाके अन्हार होखे के इंतज़ार ना करे के पड़ेला।

हमरो गाँव में कई गो अंग्रेजी मीडियम स्कूल खुल गइल बा। तब पंजवार से कौसड़ आवे वाली सड़क के अंतिम छोर, टी पॉइंट पर एगो सरकारी प्राइमरी स्कूल रहे, जवन आजो बा।  बस बिल्डिंग थोड़ा बड़ा आ नंबर ऑफ रूम्स बढ़ गइल बा। हमरा नइखे मालूम कि अब के मास्टर जी हमनी के समय के पंडीजी के तरह रोज पेड़ के नीचे समूह में खड़ा करके पनरह का पनरह, पनरह दूनी तीस, तिया पैतालीस, चऊके साठ करवावेले कि ना। उ गाँवे के गिनती पहाड़ा के बेस रहे कि हम रेनुकूट, सोनभद्र (तब मीरजापुर) उत्तर प्रदेश में चौथी कक्षा में एडमिशन लेहनी तब से हाई स्कूल तक गणित में 100 परसेंट अंक मिलत रहल। ओही स्कूलिया पर हर मंगर आ शनिचर के साँझी खानी बाज़ार लागेला।

गाँव में चिक्का, कबड्डी, गुल्ली-डंडा के खेल अब ना के बराबर रह गइल बा। (बल्कि ई दुर्लभ खेल गाँव से पार्लियामेंट में सिफ्ट हो गइल बा। ) बच्चन में मोबाइल गेम इहवों हावी बा।

गाँवों में अब डायन ना के बराबर पावल जाली। पहिले त बाते-बात पर डायन अस्तित्व में आ जात रहली ह। केहू के बुखार भइल ना कि घर के लोग उचरल शुरू कर दी,  डायन कइले होई। फेर डॉक्टर से ज्यादा ओझा के महत्त्व रहे आ दवा से ज्यादा करियवा डांरा के। हर बच्चा के कमर में एगो काला धागा होखे। केहू के इहां चोरी भइला पर पुलिस के पास लोग बाद में पहुँचे, पहिले पहुँचे गाँव के खुशी भगत के पास। खुशी भगत के बांध के किनारे देव स्थान रहे। उहवें ऊ भाखस आ बता देस कि केकर पाड़ा के चोरा के ले गइल बा। केकरा हाड़े कब हरदी लागी। केकर गाय गाभिन बिया आ केकरा कब लइका होई। सब सवालन के जबाब रहे खुशी भगत के पास। उनका पर परी आवत रहे लोग। उ बीड़ी पीयत रहस आ परी के आवते बीड़ी फेंक देस आ भाखे लागस, समाधान बतावे लागस। अब खुशी भगत ना रहलें।

गाँवो पहिले वाला ना रहल। हमरा याद बा तब जाड़ा के दिन में दियारा गइला पर लोग पूछ-पूछ के ऊँख के रस पियावे, महिया खियावे। अब एक दूसरा के पूछे आ मिले-जुले के रवायत कम हो गइल बा। बरगद के पेड़ भी अब पहिले जइसन छाँव नइखे देत। इंफ्रास्ट्रक्चर त बढ़ रहल बा बाकिर दिल के कंनेक्शन कमजोर हो रहल बा। गाँव त गाँव पड़ोसी गाँव भी ईर्ष्यालु आ आत्ममुग्ध हो गइल बा। उ रउरा काम के मान ना दी। एह से ओकरा अस्तित्व के खतरा बा। उ हज़ार, दू हज़ार, छह हजार किलोमीटर दूर कवनो आका खोज ली आ ओकरा के पूजी आ रउरा बड़ से बड़ उपलब्धि के नकार दी।

गाँव जहां भारत के आत्मा बसत रहे उहाँ के जड़ में सियासी घुन लाग गइल बा। जनकवि कैलाश गौतम के एगो कविता बड़ा लोकप्रिय बा, ” गाँव गया था, गाँव से भागा” ..  स्थिति ओहू से बदतर होत जा रहल बा।

क्रिएटिविटी खातिर जरूरी बा कि गाँव आ चौहद्दी के गांवन में सौहार्द्र, सहयोग आ एक-दूसरा के आगे बढ़ावे के प्रवृति जागृत होखे। सहयोग हीं गाँव के मूल आत्मा रहे आ एही के बल पर बड़ से बड़ अनुष्ठान होत रहल बा।

एही सहयोग आ सौहार्द के पुनर्स्थापित करे के जरूरत बा। सबका आंगन में सूरज स्थापित हो, अइसन कोशिश होखे।

दूसर जरुरी बात गाँव के प्रति नज़रिया बदले। गाँव में महत्त्वपूर्ण काम करे वाला भी कुछ लोग के नज़र में बुरबक या लड़बक होला आ शहर में गोबर पाथे वाला भी होशियार। ई घटिया सोच बदले के चाहीं। अइसे कोरोना ढेर लोग के दिमाग दुरुस्त कइले बा। लोग के बुझाए लागल बा कि अब गाँव के ओर हीं लौटे के होई। शहर के आबोहवा जहरीला हो गइल बा। हमनी के  मुखनली आ श्वासनली दुनों से जहर ले रहल बानी सन। एह से जीवन के बचावे के बा त गाँव के ओर लौटहीं के परी, बाकिर जीवन में जीवन रहे एकरा खातिर प्रेम आ सौहार्द्र के भी स्थापित करे के होई।

भागवान करस, हमार ई शेर झूठा साबित हो जाय –

लोर पोंछत बा केहू कहां

गाँव अपनों शहर हो गइल


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min1920

लेखक- महेन्द्र प्रसाद सिंह

सन 1990 के बात ह। हमार पहिलकी किताब, भोजपुरी नाटक, “बिरजू के बिआह” खातिर हमरे अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का ओर से जगन्नाथ सिंह पुरस्कार लेबे खातिर नेवतल गइल रहे।  हमरा 26 मई 1990 के रेणुकोट पहुंचे के रहे। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के 11वां अधिवेशन के आयोजन उंहवे भइल रहे। पुरस्कार, सम्मेलन के अध्यक्ष डा. विद्या निवास मिश्र का हाथे मिले वाला रहे। विज्ञान आ विधि के विद्यार्थी रहल हमरा अइसन इस्पात उद्योगकर्मी के साहित्य सृजन खातिर पुरस्कार मिलल बहुते बड़ बात रहे। खुशी आ उत्साह से भरल हम बोकारो स्टील सिटी से 25 मई  के चल के 26 के रेणुकोट पहुँच गइल रहीं। दिनभर साहित्यकार मित्र लोगिन से भेंट मुलाक़ात में समय बीतल। आपन जवारी आ सबसे  प्रिय कवि, कुमार विरल संगे कुछ बेसी समें बीतल। सांझ होते रेणुकोट के स्टेडियम खचा-खच भर गइल रहे। ओह दिन के आकर्षण रहे दिल्ली से आवे वाली आर्केस्ट्रा दल के प्रस्तुति।

पुरस्कार के आखिरी कड़ी पर हमार नाम रहे। रात के करीब आठ बज के बीस मिनट होखे वाला रहे। पुरस्कार मिलते पाण्डेय कपिल जी हमरा कान में गते से कहनी, “महेंद्र जी, दिल्ली से जवन आर्केस्ट्रा टीम पाँच बजे सांझ के पहुँचे वाला रहे ऊ अभी ले आइल नइखे। गाड़ी पाँच घंटा लेट बिया। रउआ “बिरजू के बिआह” के कुछ डायलग सुना देब? हम अनाउंस कर दिहीं ? कपिल जी “बिरजू के बिआह” नाटक, सम्मेलन के अमनौर (7वां) अधिवेशन, सन 1982 में,रांची (9वां) सन 1985 में, बोकारो (10वां) सन 1988 में आ ओकरा अलावे पटना, रवीन्द्र भवन में देख चुकल रहीं। उहाँ के लागल कि ओह नाटक के संवाद सुना के, हम लोग के शांत कर लेब। सांच बात त ई रहे कि आयोजक लोगिन खातिर दर्शक के ओतना देर तक सम्हारल एगो भारी चुनौती रहे। हमरो खातिर एकल अभिनय से करीब 7 हजार से बेसी लोग के मनोरंजन कइल, आ ऊहो लगातार डेढ़ घंटा तक, बड़हन चुनौती रहे बाकि एगो बहुत बड़ अवसरो रहे- आपन हुनर देखावे के। कपिल जी के आँख में हम देखनी आ समस्या के गंभीरता आ अपना खातिर अवसर भांपत कहनी, “एनाउंस कर दिहीं ।”

कपिल जी के आवाज़ गूंजल, “अब रउआ सभे के महेंद्र जी आपन “बिरजू के बिआह” नाटक के डायलाग सुनाइब जवन नाटक खातिर इहाँ के अबके पुरस्कार भेंटल हा।”

देखते-देखत, भरल-पूरल मंच खाली होखे लागल। मंच पर खड़ा रहे एगो माइक ओकरा पीछे हम। सोझा दर्शक के शोर शराबा आ हुटिंग के मिलल-जुलल तेज आवाज, “आर्केस्ट्रा-आर्केस्ट्रा” से स्टेडियम गूंजत रहे। मंच खाली हो गइल रहे आ हम शुरू हो गइल रहीं। माइक का सोझा खाड़ बोलत जात रहीं, बिना आवाज निकसले। बोले के माइम चलते रहे, तबले दर्शकदीर्घा से साफ साफ आवाज सुनाये लागल।

….चुप…चुप… सुन स ना, का बोलता। थोरहीं देर में सन्नाटा छा गइल। हम गुरु गंभीर आवाज़ में कहनी, “त अब बोलीं ?” जोरदार ठहाका गूंजल। लोग हँसत-हँसत लोट पोट हो गइल। हा हा हा हा……अरे तबे ले चुप रहे!

बिना कुछ बोलले ऑडिएंस के अइसन ठहाका हम पहिलहूँ देख चुकल रहीं। बोकारो ट्रेनिगं सेंटर के वार्षिकोत्सवन में जब हम आपन एकल प्रस्तुति खातिर  मंच पर खड़ा होत रहीं त अइसहीं लोग बिना कुछ बोलले हँसत रहे।अब हम ओही आत्मविश्वास से भरल मंच पर आपन  गोड़ जमा चुकल रहीं। लोग हँसत रहल हम मुस्कात रहनी। फेनु आपन अलग-अलग नाटकन के अंश सुनावत गइनी। लोग एक-एक शब्द पर ठहाका लगावत रहल। दस बज गइल रहे आने डेढ़ घंटा पर। कपिल जी गते से आ के कहनी। गाड़ी पहुँचहीं वाली बिया। आउर आधा घंटा घींची। हम उहाँ के चिंता मुक्त करत कहनी, “ठीक बा” आ कुछेक हास्य व्यंग्य आ अनुकृति सुनइनी। आधा घंटा बीतल आ दिल्ली से आइल गायन मंडली आपन साज-बाज मंच पर रखे लागल। हम विदा लेवे के अंदाज में लोग के तसल्ली देनी कि जेकर इंतज़ार में रउआ सभे रहीं ऊ दल पहुँच गइल बा। अब रउआ… तब तक गायक दाल के मुखिया (नाम इयाद नइखे) आके कान में कहलें, “दस मिनट आउरी सम्हारी हमनी के बस नेहा के आवत बानी जा। “हम समझ सकत रहीं कि गर्मी का मौसम में दिनभर के ट्रेन सफर के थकान क बाद नेहाइल केतना जरूरी बा। आ उहो जब रात भर गावे-बजावे के होखे तब। हम ओही साहस से आगे बढ़नीं । 30 मिनट बीत गइल। मण्डली के कलाकार मंच पर आके आपन-आपन साज बाज मिलावे के शुरू कर देले रहन।10 मिनट का बाद जब दल प्रस्तुति खातिर तैयार हो गइल, हम बिदा लेबे लगनी। आडिएंस के शोर उठल, “एगो आउर- एगो आउर”, 5 मिनट आउरी कुछ सुना के खानपुरी कइनी आ विदा लेनी। मने-मने कहनी, “रन जीतलअ ए महेंद्र सिंह”। ई हमार पहिलका आ आखिरी अवसर रहे जब हम अकेले सवा दू घंटा ले लोग के हंसावत रहनी। एकल नाटकन में कुछ रिकॉर्डेड म्यूजिक के भा टीम  के नेपथ्य से भा  मंच से सपोर्ट रहेला। एह में त ओइसन कुछ रहे ना। खैर सभे दिल खोल के सराहल। लखनऊ से आइल भोजपुरी लोक के संपादक श्रीमती डा राजेश्वरी शांडिल्य आ उनकर पति डा राम बिलास तिवारी जी हमरे लखनऊ में दू महीना बाद आयोजित होखे वाला आपन सांस्कृतिक कार्यक्रम के संचालन आ एकल प्रस्तुति खातिर नेवता दिहल लोग। आवे-जाये के ac 2 टियर के टिकट कटा के भेजलें आ कार्यक्रम के बाद सम्मानजनक उपहारो दिहलें। खैर ऊ त बाद के बात भइल। रेणुकूट में दोसरका दिने सांझ के कवि सम्मेलन रहे। कवि लोग से मंचो खचाखच ओइसही भरल रहे जइसे कि स्टेडियम। संचालन एगो वरिष्ठ कवि के हाथ में रहे। हमहूँ मंच के पिछला भाग में कविता सुनावे के अपना पारी के इंतज़ार में बइठल रहीं। कवि सम्मेलन नियम के उद्घोषणा भइल। पहिला राउंड में हर कवि के आपन बस एकेगो कविता सुनावे के बा। संचालक महोदय जेकर नाम पुकरलें ऊ कवि आके माइक संभार लिहलें। बाकि ऑडिएंस सुने के तैयारे ना रहे। ज़ोर-ज़ोर से लोग चिचियात रहन, “बोकारो-बोकारो”। पाण्डेय कपिल जी हस्तक्षेप कइनीं । संचालक महोदय से निहोरा कइनीं कि महेंद्र जी के लोग सुनल चाहत बा। उनहीं के पहिले बोला लिहीं। संचालक जी दर्शक के बुद्धिहीनता के आ कुरुचि के खूब कोसनी आ फेनु हार के हमरे आपन कविता सुनावे खातिर आमंत्रित कइनीं। जोरदार थपरी बजा के लोग स्वागत कईलस। हम आपन एगो हास्य व्यंग्य के कविता सुनइनीं आ अपना जगहा पर लवट अइनीं। लोग चिचियाइल, “एगो आउर- एगो आउर”। संचालक के पारा गरम भइल त कपिल जी खाड़ भइनी आ लोग के समझावे के कोसिस कइनी। बाकि सब बेकार। उहाँ के फेनु संचालक से कहनीं कि महेंद्र जी के बोला लिहीं। हमार फेनु बोलाहट भइल संगहीं उहाँ का दर्शक लोग से भी बहुते परेम से कवि सम्मेलन के नियमपूर्वक चलावे में सहयोग के मांग कइनी। दर्शक मान गइलें। हम आपन दोसरको हास्य व्यंग्य कविता सुनाके रेनूकूट के माटी आ उहाँ के दर्शक लोगिन के मनहीं मने प्रणाम कइनीं जे आजो हमरा जिनगी के एगो सबसे प्रेरक संस्मरण का रूप में ताज़ा रहेला। ओहि रेणुकोट में पढ़ल-बढ़ल मेधावी संपादक मनोज भावुक जी के पहल पर हम आपन संस्मरण के कागज पर उतारत बानी। उमेद बा कि उहाँ के एह संस्मरण के आपन पत्रिका में स्थान देब।


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min1460

लेखक- विनय बिहारी सिंह

तीन गो एकदम सांच आ रोचक घटना हमनी के भोजपुरिया समाज के लौह पुरुषता के उदाहरण बाड़ी सन। अइसे त अनगिनत घटना बाड़ी सन, बाकिर आजु तिनिए गो प्रेरक घटना पढ़ीं।

 पहिला घटना

उत्तर प्रदेश के बलिया जिला के कौनो गांव के घटना ह। लइकाईं में ई घटना सुनाके हमार ईया (दादी) सीख देसु कि कौनो प्रण कइला के बाद पीछा ना हटे के चाहीं आ अपना दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर प्रण कइल काम पूरा क देबे के चाहीं। ईया घटना बतावत का घरी ईहे कहसु कि दक्खिन का ओर एगो गांव रहे। ओइजा एगो मंदिर बनावे के प्लान बने आ कौनो ना कौनो कारन से रुकि जाउ। जमीन तक तय हो चुकल रहे। एह गांव में एगो परम भक्त आदमी रहले जिनकर नांव लोग साधु जी रखले रहे। उनुकर असली नांव से ज्यादा पुरुब टोला के साधु जी बड़ा प्रसिद्ध रहे। त मंदिर के प्लान बने आ रुकि जाउ। साधु जी अचानके एक दिन प्रण कइले कि जब तक मंदिर ना बनी, हम अन्न ना खाइब। एह प्रण का बाद ऊ सबकरा से मंदिर खातिर चंदा बटोरे लगले। भोजन में ऊ कबो आलू उबाल के खा लेसु त कबो कंद- मूल। कबो दही त कबो दूध। नाम मात्र के मजदूरी लेके मंदिर बनावे खातिर दू गो मजूरन के साधु जी तय क दिहले। मंदिर के नींव खोदा/कोड़ा गइल। कौनो ईंटा के भट्ठा वाला मालिक उनुका के एक हजार ईंटा दे दिहलस। नींव डला गइल। मंदिर बने शुरू हो गइल। एही बीच में साधु जी के मलेरिया हो गइल। मंदिर के काम रुकि गइल। काहें से कि दोसर केहू मंदिर बनावे में साधु जी जतना सक्रिय ना रहे। मलेरिया उग्र रूप ले लिहलस आ साधु जी के टायफाइड हो गइल। बोखार में ऊ का जाने का बड़बड़ासु आ देह तावा नियर जरे। लागल कि साधु जी मरि जइहें। जब तनी बोखार कम भइल त डॉक्टर कहलस कि मांस- मछरी खाईं। अनाज खाईं, तब देह में ताकत आई। बाकिर साधु जी कहले कि मरि जाइब बाकिर आपन प्रण ना छोड़बि। बेमारी में गांव के सक्षम लोग उनुकरा पर रुपया- पइसा खरच करेके तेयार रहे लोग। तीन महीना ले मृत्यु से लड़ाई कके साधु जी जीत गइले। आखिर ले ऊ अन्न टच ना कइले। दूध- दही आ फल के बल पर स्वस्थ हो गइले। मांस- मछरी उनुका खातिर आजीवन निषिद्ध चीज हो चुकल रहे। मंदिर त छोटहने बनल बाकिर ओकरा बने में दस साल लागि गइल। ओमें भगवान शिव के स्थापना भइल। गांव के लोग कहल कि साधु जी ओह मंदिर के पुजारी बनसु। साधु जी विवाहित रहले। उनुकर पत्नी भी सरल, सहज आ साधु स्वभाव के रहली। जब गांव के लोग आपन जिद्द ना छोड़ल त साधु जी बात मान लिहले। मंदिर के पुजारी बनि गइले बाकिर मंदिर बनला का बादो ऊ अनाज ना खइले। कहसु कि अब त अनाज का ओर ताकहूं के मन नइखे करत। बिना अनाज के जीए के आदत परि गइल बा। सचहूं मलेरिया से ठीक भइला का बाद साधु जी फेर बेमार ना परले। अनाज छोड़ला का बाद उनुकर चेहरा में का जाने कइसे निखार आ गइल। नब्बे साल के उमिर ले जियला का बाद अंतिम सांस लिहले।

  दोसरकी घटना-

हम बलिया रेलवे स्टेशन पर भोर में उतरनी आ अपना बड़ भाई का घरे जाए खातिर एगो रिक्शा कइनीं। रिक्शा वाला बड़ा धीरे- धीरे चलावत रहे। हम रिक्शा वाला के कहनीं- अरे भाई तूं रेक्सा चलावतार कि बैलगाड़ी? एतना धीरे- धीरे चलबs त घरे हम दुपहरिया खान पहुंचब। रिक्सा वाला जवान लइका रहे, कहलस- जी बाबू। आ पैडल पर पैर मरलस त ठक दे बाजल। हम हैरान। पैर मरला पर ठक दे त बाजे ना। ओकरा गोड़ का ओर तकनी त हमार छाती धक्क दे हो गइल। ई का? रिक्सा वाला के एगो गोड़ के जगह पर डंटा/लाठी बांन्हल रहे। हमरा बड़ा अफसोस भइल। अपना पर ग्लानि भइल। ओह रिक्सा वाला के एकही गोड़ रहे। दोसरका गोड़ जांघ तक रहे। ओही जांघ में डंटा बान्हि के ऊ रिक्सा चलावत रहे। हम ओकरा से पुछनी कि तोहार गोड़ कइसे कटाइल? रिक्सा वाला कहलस कि ओकरा गोड़ में गैंगरीन हो गइल रहे, एही कारन से गोड़ काटे के परल। कहलस- “हमरा घर में हम बानी आ हमार माई बिया। आय के कौनो साधन नइखे। खाए- पीए आ माई के दवाई खातिर धन चाहीं। ओही खातिर हम रिक्सा चलावतानी।” हम त अपराध बोध से चुप रहनीं। घरे पहुंचि के ओकरा के बीस रुपया का बदला चाली गो रुपया देबे लगनी बाकिर रिक्सावाला बीस रुपया लौटा दिहलस। कहलस कि रउरा से त बीसे रुपया किराया तय भइल रहल ह। त हम चालीस रुपया काहें लेब। हमरा पर दया मत देखाईं। बस राउर प्रेम बनल रहो, ईहे चाहीं। रिक्सावाला पढ़ल- लिखल रहे। अगिला दिने ओकरा के खोजे निकललीं बाकिर फेर ओकरा से हमार भेंट ना भइल।

   तिसरकी घटना-

ओह घरी ट्रेक्टर के नांव बहुते कम लोग सुनले रहे। आजकाल नियर ट्रेक्टर से खेत जोतल आम घटना ना रहे। रबी के फसल बोआई के समय रहल। तले एगो किसान के बैल मरि गइल। किसान के नांव रहे अयोध्या। अयोध्या के चिंता भइल कि खेत कइसे जोताई? रबी के फसल कइसे बोआई? अयोध्या सबका से बैल मंगले। बाकिर सबका आपन खेत बोए के रहे। त बैल के उधार दी। पहिले आपन खेत बोई कि बैल उधार दी। एक दिन रात खान अयोध्या प्रण कइले कि पूरा तीन बीघा/बिगहा खेत फरुहा/फावड़ा से कोड़ देब। अगिला दिने फरुहा लेके खेत कोड़े शुरू कइले अयोध्या। लोग हंसे आ कहे कि पागल भइल बाड़े अजोध्या। आरे आधा कट्ठा, एक कट्ठा के बात रहित त कौनो बात रहल ह। ई तीन बिगहा खेत कइसे कोड़िहें। बाकिर अयोध्या सबकर बात अनसुना कके खेत कोड़े लगले। आ उनुका धुन के प्रणाम बा कि 15 दिन में तीन बिगहा कोड़ि दिहले। अब जे फरुहा भा कुदारी/कुदाल चलवले नइखे ऊ का जानी कि खेत कोड़े में कतना कठिन परिश्रम के जरूरत बा आ कतना एनर्जी लागेला। कहाला कि खेत कोड़ला पर हाड़ के पसीना निकलि आवेला। हाड़ से पसीना एगो मुहावरा ह। त एतना कठिन काम कके अयोध्या हंसते हंसत खेत के बो दिहले। ओकर विधिवत सिंचाई क दिहले आ उनुकर रबी के फसल लहलहाए लागल। आसपास के गांव में शोर हो गइल कि अयोध्या त लोहा के आदमी बाड़े। उनुकर मुकाबला के करी।

ई तीन गो कहानी सुनि के आजुओ हमार मन जुड़ा जाला। हम आजकाल अइसन कौनो लौह पुरुष के नइखीं देखत जौन एहतरे के उदाहरण मनुष्य के सामने राखत होखे। पहिले के लोग उदाहरण राखि देत रहल ह। मीडिया में आवे के ओकर कौनो इच्छा ना रही। बस हम आपन प्रण पूरा क दिहनी, एही के खुशी ओकरा खातिर पर्याप्त रहल ह। आजकाल त सुनाता कि बिना कौनो पराक्रम के ही लोग चाहता कि हमार नांव होजा, यश होजा। अइसना लोगन के अपना पुरनियन से सीख लेबे के चाहीं। लोहा बने खातिर एह लोगन के उदाहरण काफी बा।


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min1990

डॉ. अन्विति सिंह

गुजरल दिन के कुछ-कुछ घटना अइसन ह जवन अकसरहे चेहरा पर मुस्कान लिया देवेला आउर  याद अगर अम्मा, पापा आ मामा के तिकड़ी के होखे त सोने प सुहागा। ऊ लोग के सब याद हमार अनमोल थाती ह। जेतना बेर याद करीले ओतना बेर हम ओह समय के यात्रा क लेवेनी।

जाड़ा के दिन में अक्सर उहाँ के माने कलकत्ता के याद आवेला काहे कि मामा जाड़ा हमेशा उहवें बितावस। हावड़ा पंहुच के अम्मा के साथ मिलते मामा एकदम निश्चिन्त आ बेफिकिर हो जात रहले।

सुबह सवेरे मामा चौक के एगो चक्कर लगा अइहें आ मंदिर प धीरे से मिठाई के डिब्बा रख दीहें। अम्मा जब पूजा करे पंहुचिहें त डिब्बा देखते मामा के देखिहे। मामा हँसे लगिहें आ कहिहें,  “तहरा ठाकुर लोग के भूख लागल होई, भोग चढ़ा द।”

अम्मा हमार अपना ठाकुर लोग के बर्तन के लेके एकदम सजग रहेली। चमचमात रहें के चाहीं हमेशा। जब मामा देखिहें कि ऊ पूजा के बर्तन धोअतारी त कहिहें ,”अभी जूठ लागल बा, तनी ठीक से धोऊ !” आ अम्मा ‘बे भईया’ कह के हंसे लगिहें। भाई बहिन के ई चुहलबाज़ी एक सबेर से रात ले चलते रही। एह पूरा समय में मामा केतना बेर अम्मा के कहत होइहें, “तोरा कुछ बुझाला, बुरबक !” एकर केहू  अंदाज़ा नइखे लगा सकत।

सबसे जादा ई अम्मा तब सुनिहें जब ऊ मामा के खाना चाहे नाश्ता करावत रहिहें। जेकरा के भी अम्मा खाना परोस के खियवले बाड़ी ऊ जानेला कि अम्मा के संतोष ना होला। उनका पता ना काहे हमेशा ई लागेला की खाए वाला अधपेटे  खाता। एही मारे खाना परोसते जाली। माने अम्मा जेतने खियावे में तेज मामा ओतने कम खाए वाला। कहल जा सकेला कि उहाँ का चिरई लेखा चुगत रहनी खाना। अम्मा कम खियइहे ना, एकाध रोटी चाहे दो मुठ्ठा भात थरिया में बेसी डलबे करिहें,  त बस सुनिए एकही डायलॉग तोरा कुछ बुझाला!

एही तरे हम्मर छोट बहिन अधिकतर रूसले रहेली। घर के कवनो ना कवनो कोना में रूस के बइठले रहेली। मामा उनकर नाम देवता रखले रहले। देखते कहिहे, “अब आज देवता काहे रुसल बाड़ी?”

दिन दुपहरिया केहू आ जाए बेधड़क भोजन पर नेवत दिहे, ओकरा बाद आ के धीरे से पूछिहे, दू लोग क खाना हो जाइ नू? बाकी जवाब के कब्बो इंतज़ार ना कइले होइहेँ। काहे कि पूछला के बाद भी ऊ पुरा निश्चिंत रहिहें कि इहो कवनो पूछे वाला बात रहल ह। बिल्कुल हो जाई!

भलही मामा के कर्मभूमि दिल्ली रहे। कलकत्ता में भी उनकर दोस्त मित्र के कमी ना रहे। जबले उहाँ का कलकत्ता रहीं, रोज शाम के कहीं कवनो आयोजन रही,  ना त घरवे लोगन के जमावड़ा रही।

बाहर जब भी जाए के होई, उनकर कोशिश रही कि पापा भी उनकरा संगे जास। मामा एगो त चिरई चुरमुन लेखा खाए वाला रहले ऊपर से उ एकदम सादा भोजन खाएवाला रहले। बेसी मसालेदार सब्जी त पापा भी ना खात रहलें।

त होखे ई कि मामा के सब्जी अलग बने आ सभकर वाला सब्जी में भी मरिच मसाला तनी हाथ रोकिए के डालल जाओ। एक बार मामा आ पापा दुन्नों जने कहीं निमंत्रित रहे लोग रात के भोजन प। हमनी के तनी सुतारे मिलल त तय कइनी जा कि आलू गोभी मटर टमाटर के एकदम चटपटा मसालेदार तरकारी आ पूड़ी खाइल जाव। तरकारी बनला के बाद ओकर रंग एतना अच्छा लागल कि मुंह में पानी आ गइल। सोचनी जा कि जल्दी से पुड़ी छानल जाव आ पेट पूजा कइल जाव। तबले केहू घंटी बजइलस। गेट खोले के जिम्मेदारी हमरे रहे। भाग के जइसे गेट खोलनी, सामने पापा आ मामा! देखते हमरा एक्के बात बुझाइल कि ई लोग बिना भोजन पानी कइले आइल बा लोग। अभी बेचारा लोग गेटवो ना पार कइले होई लोग तबले हम खुद के तसल्ली देवे खातिर पूछ लेनी, “पापा खाना खइबs लोग का?

बुझला पापा कवनो बात पर चिढ़ल रहले। एकदम्मे से खिसिया के बोलले “ई कवन पूछे वाला बात ह, खाइम जा ना? पापा इतना पिनक के बोललें कि जवाब देवे के हिम्मते ना भइल कि कहीं, तंहs लोग खाना बनावे से मना कइले रहलs  लोग।

हमार त पसीना छूट गइल ई सोच के कि अब का होई। ई लोग लायक कुछ बनल नइखे आ अइसन कुछ हइयो नइखे जवन हाली से बन जाए। बजारे जा के सब्जी लियावे के समय रहे ना। अम्मा से कहती त उहो डटबे करती। काहे कि ऊ हमसे कहले रहली सब्जी लियावे के, हमहीं मना क दिहले रहनी।

ई सब लोग के डांट से बचे के इहे उपाय सूझल कि आंगन के पपीता बाबा के शरण में जाइल जाव। रात के समय रहे। पपीता बाबा से माफी मंगनी आ एगो पपीता तोड़ के ले अइनी। जल्दी-जल्दी काट-कूट के कूकर में छौंक दियाइल कि जल्दी बन जाव। लेकिन अभी एगो आउर दिक्कत रहे। हमनी के खीर भी न बनइले रहनी जा।

एके चम्मच सही,  मामा खीर जरूर खात रहनी, खजूर के गुड़ वाला। जो खाना परोसाइल आ मामा खीर मांग दिहें तब ? फेर अम्मा डांटी। अम्मा के डांट में कवनो त अइसन बात रहे कि बचे के उपाय खुद ब खुद सूझ जाए।

बस हम का कइनी जे दूध खउला के ओहमे गुड़ आ इलाइची पाउडर डाल दिहनी आ दिन के बचल भात अच्छा से मिला के ओही में डाल देनी। भाभी के ए उपाय प तनी शक रहे। हम कहनी कुछ ना रहला से बढ़िया बा कि कुछ रहे। अभी आपन इज़्जत बचइला में भलाई बा। एतना जल्दी हमनी के उ लोग लायक भोजन के इंतज़ाम कइले रहनी जा कि अपना पर गर्व महसूस होखे लागल रहें। लेकिन लाख उपाय क ल जब किस्मत में डांट सुनल लिखल रही त पड़बे करी। आ पड़ल जबरदस्त डांट। अम्मा से ना बाकी मामा आ पापा से।

भइल ई कि मामा अपना तरकारी के साथ सभकर वाला तरकारी भी मांग लेस। एही से जब तक उहां का कलकत्ता रहीं हमनी के मरीचा वरिचा तनी कम्मे डाली जा। बाकिर ओह दिन त सब कुछ तनी जम के डलले रहनी जा। आ रोज लेखा ओहू दिन मामा मांग लेले। हम ना नुकूर करते रह गइनी। के सुनता। कहबो कइनी कि तनी तीत बन गइल बा। तब्बो नाई सुननी उहां का। का करतीं, दे देनी। …आ ओकरा बाद जवन डांट सुननी। बाप रे बाप। भगवान बचावस। दुन्नो जने एक्के साथ बोलत रहे लोग। आ दुनो जने के संगे दिक्कत ई कि ऊ लोग आ कुच्छुओं  बोले लोग, जे सुनी ऊ हंसबे करी। त हम त चुपचाप मुस्कुरात रहनी आ अम्मा आपन अलग राग अलापत रहली कि  “जब कहले रहल  लोग कि खा के आवे के बा त बिना खइले काहें आ गइल ह लोग? “अम्मा जेतने बोलस ओतने हमके हंसी आवे आ  उ दुन्नो जने के ओतने खीस बरे। पापा के त नाक प गुस्सा रहेला बाकी हम मामा के खीस पहिला आ अंतिम बार देखले रहनी। बाद में पता चलल कि उ लोग के खीस केहू और के रहल जवन हमरा प निकलल रहे। अम्मा अगला दिन मामा के भात के खीर के भेद  भी बता दिहली। ओकरा बाद त मामा जब्बे खीर देखिहे कहिहे, “भात के खीर ना नू ह ?”


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min2350

केशव मोहन पाण्डेय

जब कवनो लेखक अपना निजी अनुभव के ईयाद क के कवनो मनई, घटना, वस्तु चाहें क्रियाकलाप के बहाने लिखेला त उ सब पाठक के मन से जुड़ जाला। पाठक अपना देखल-सुनल-भोगल समय-काल में ओह चीजन के, बातन के, जोहे-बीने लागेला। संस्मरण एगो अइसनके विधा ह, जवना के पढ़ के पाठक लेखक के लेखनी से एकात्म हो के जुड़ जाला।

उत्पत्ति के आधार पर देखल जाव त संस्मरण शब्द ‘स्मृ’ धातु में सम् उपसर्ग आ ल्युट् प्रत्यय के मिलला से बनल बा। एह तरे से एकर शाब्दिक अर्थ सम्यक् स्मरण होला। माने पूरा तरे से कवनो आदमी, घटना, दृश्य, वस्तु आदि के आत्मीयता आ गम्भीरता से कइल वर्णने संस्मरण ह।

कहल गइल बा कि संस्मरण सबसे लचीला साहित्य-विधा ह। संस्मरण के ढेर गुन साहित्य के ढेर विधा-शैली में रचल-बसल मिलेला। सुभावगत ई मिलेला कि रेखाचित्र, जीवनी, रिपोर्ताज आदि अउरियो साहित्यिक रूपन के छाँक संस्मरण में मिलेला। माने बात ई कि ईयाद के आधार पर कवनो विषय पर चाहें कवनो व्यक्ति पर लिखाइल आलेख संस्मरण कहाला। यात्रा-साहित्य एही के अन्तर्गत आ जाला। वइसे ढेर विद्वान लोग संस्मरण के साहित्यिक निबन्ध के एगो रूप मानेला लोग।

विकिपिडिया के मानी त हिंदी में संस्मरण के साहित्यिक रूप में लिखे के प्रचलन आधुनिक काल में पछिमी प्रभाव के कारण भइल बाकिर हिन्दी साहित्य में संस्मरणात्मक आलेखन के भरपूर विकास भइल। हिंदी में पहिला संस्मरणात्मक आलेख सन् 1905 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के ‘अनुमोदन का अन्त, अतीत स्मृति’ मिलेला। ओकरा बाद 1907 में काशी प्रसाद जायसवाल जी के ‘इंग्लैंड के देहात में महाराज बनारस का कुआँ’ 1907 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के ‘सभा की सभ्यता’ मिलेला बाकिर आजु एहिजा हम बात भोजपुरी में संस्मरण लेखन पर आपन बात राखे के प्रयास करत बानी। हमरा पता बा कि हमरा अल्पज्ञान के कारन ई प्रयास सूरूज के दीया देखावल बा, बाकिर बहाना अइसन समृद्ध मंच बा त बात राखहीं के पड़ी।

अब बात कइल जाव भोजपुरी में संस्मरण लेखन के। एह बारे में लिखे खातिर कुछ खोजबीन में लागल रहनी। ओही खोजबीन में ‘इग्नू’ के एगो प्रपत्र मिलल – ‘इकाई-दू, भोजपुरी भाषा आ लिपि’। 13 पेज के एह प्रपत्र के पाँचवा पेज पर जब हम गइनी त एगो उपशीर्षक रहे – ‘आधुनिक काल में भोजपुरी के विकास’।1 एह में लिखल बा कि ‘डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय आधुनिक भोजपुरी साहित्य के आरंभ 1875 ई. से मनले बानी आ लिखले बानी कि आधुनिक भोजपुरी साहित्य के प्रारंभिक काल (1885 ई. – 1920ई.) में एह भाषा में विशेष रचना उपलब्ध नइखीसन।’ ……. ओही में आगे लिखल बा कि ‘जइसन कि बतावल गइल बा कि ‘उक्तिव्यक्तिप्रकरण’ में भोजपुरी गद्य के पुरान नमूना मिलेला। एकरा बाद राजाज्ञा, सनद, पत्र आ दस्तावेजन में भोजपुरी गद्य के नमूना मिलेला। बाकिर आजादी के बाद भोजपुरी गद्य आपन विकास तेज गति से कइलस। आजादी के पहिले भोजपुरी के गद्य विधा में कुछ नाटक जरूर लिखाइल रहल बाकिर भोजपुरी उपन्यास, कहानी, निबंध, जीवनी, संस्मरण आदि के भरपूर लेखन आजादी के बाद भइल।’

कहल जाला कि भोजपुरी भाषा के इतिहास लगभग दस हजार बरीस से बा। अइसन पुरान भाषा में गद्य के विकास 1947 के बाद भइल। ओह में संस्मरण जइसन सरस आ मनलुभावनो विधा बा। एकरा बाद हम आपन ज्ञान बढ़ावे खातिर हमरा नजर में भोजपुरी के जीवंत इनसाइक्लोपिडिया आदरणीय डॉ. ब्रजभूषण मिश्र जी से बात कइनी। बात में डॉ. जयकांत सिंह ‘जय’ सर के किताब ‘भोजपुरी गद्य साहित्यः स्वरूप, सामग्री, समालोचना’ के चर्चा भइल। ओह किताब में जय सर कथेत्तर भोजपुरी गद्यन में चर्चा करत फिचर, शब्दचित्र आ संस्मरण आदि के चर्चा कइले बानी।

बात कइला पर भोजपुरी में संस्मरण लेखन के जतरा के बारे में पता चलल कि शुरुआती दौर के बात कइल जाव त पं. गणेश चैबे जी के किताब ‘भोजपुरी प्रकाशन के सै बरिस’ में उहाँ के ‘संस्मरण आ जीवनवृत्त’ नाम से एगो खंड बनवले बानी जवना में ओह घरी, माने 1983 में आठ गो किताब के चर्चा कइले बानी। जीरादेई के सदासत, आश्रम दत्त, राधामोहन राकेश के बा जवन कि राजेन्दर प्रसाद पर केन्द्रित बा। ‘गांधी यात्रा’ 1969 में निकलल, जवना में गांधी जी से संबंधित कविता चाहे उनकर चंपारण सत्याग्रह आदि के चर्चा बा। आचार्य महेंद्र शास्त्रीः व्यक्तित्व और कृतित्व 1971 में प्रकाशित भइल। ओहमें कइगो संस्मण शमिल बा। ‘आजादी के हलचल’ उमादत्त शर्मा के किताब ह। एहमें स्वतंत्रता संग्राम के संस्मरण के रूप में प्रस्तुत कइल गइल बा। गया से प्रकाशित होखे वाला ‘नवकल्प’ में आचार्य महेंद्र शास्त्री से जुड़ल कइगो संस्मरण छपल बा। देवरिया से छपल सदानंद स्मृति ग्रंथ, ओहू में स्वामी जी के व्यक्त्वि से संबंधित संस्मरण बा। सन 1977 में संत कुमार जी के एगो किताब बाबू राजेंद्र प्रसाद पर आइल, उहो संस्मरणात्मके बा। मोतिहारी के साँवलिया विकल जी के किताब ‘तरपन-अरपन’ में भोजपुरी के दिवंगत पुरोधा लोग पर संस्मरण बा। डी एन राय के ‘यादन के खोह में’ भोजपुरी लोककलाकार लोग पर केंद्रित संस्मरण के किताब बा। ‘स्मृतांजलि’ डॉ. शिव हर्ष पाण्डेय जी के संपादन में छपल संस्मरण के किताब ह।

आदरणीय डॉ. ब्रजभूषण मिश्र जी अपना बात में कहनी कि ‘भोजपुरी में संस्मरण विधा में ई सब कुछ के अलावा और किताब छपल बा बाकिर ढेर नइखे।’ ई बतिया सुन के हमार मन बइठ गइल। सोचे लगनी कि भाषा आ साहित्य के नाव पर सबसे ढेर हाल्ला भोजपुरिए में सुनाला-लउकेला आ ओहमें सबसे मनोरम विधा संस्मरण के हेतना अकाल। हम एगो बात साफ क दीं कि हमके व्यक्तिगत रूप से संस्मरण विधा बहुत प्रिय आ रोचक लागेला। वइसहीं कहल जाला कि बितल बात ईयाद अइला पर मन बेचैन हो जाला। संस्मरण बितले के त लिखल रूप ह। अपना जिनगी में सभे कबो ना कबो, कवनो ना कवनो अइसनका व्यक्ति से मिलल रहेला चाहें बेरा से गुजरल रहेला कि ओकर खट-मीठ ईयाद आवते रहेला। ओहि के त साहित्यिक रूप से लेखन संस्मरण विधा हऽ। संस्मरण लिखे खातिर कवनो अभ्यास आ अध्ययन के गरज ना पड़ेला। समय के साथे बहत कवनो काल-खंड में मिलल-गुजरल कवनो आदमी, अथान चाहें घटना के ईयाद कऽ-कऽ के लिखल संस्मरण ह। अइसन संस्मरण लेखन में सबसे ढेर मौलिकता रही। तनी सोंझो-टेढ़ रही त का हऽ, आपन रही, मौलिक रही। कहले जाला, घीव के लड्डू टेढ़ो भला।

भोजपुरी में संस्मरण अबहिनो लिखात बा, बाकिर किताब रूप में बहुत कम आवत बा। भोजपुरी के संस्मरण लेखन के गति, मति आ स्थिति के जाने खातिर हम प्रो. अर्जुन तिवारी जी के ‘भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ देखे लगनी। ओह किताब में पेज नंबर 387 से ‘संस्मरण’ के बारे में बतावल बा। पन्ना पलटे लगनी आ मन तनी चाकर होखे लागल। ओहमें सबसे पहिले संस्मरण के कुछ उदाहरण दिहल बा जइसे कि श्री रवींद्र श्रीवास्तव ‘जुगानी’ जी के लिखल संस्मरण ‘फिराक गोरखपुरी: हमार बाबा’ के कुछ अंश बा। 2 अगिला संस्मरण गीतपुरुष पं. हरिराम द्विवेदी जी के लिखल ‘जनकवि रामजियावन दास बावला’ 3  के प्रस्तुत कइल गइल बा। ओकरा बाद के संस्मरण सूझ-बुझ के संपादक श्री कृपाशंकर प्रसाद के लिखल ‘रेस के घोड़ा थथमलः मैना अब ना बोली’ बा। 4  जब हम अगिला संस्मरण पढ़नी त मन भरि गइल। अगिला पेजवा पर आदरणीय डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय जी के लिखल ‘हमार सिराज भाई’ संस्मरण के चर्चा आ कुछ अंश बा। जनाब सिराज अहमद अंसारी जी के नेह-छोह हमरो पर बरसल बा। सेवरही में श्री आर डी एन श्रीवास्तव सर आ डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय जी के आशीष से हम ‘संवाद’ संस्था के संयोजन करीं। हर महिना में दूसरका शनिचर के एह संस्था के गोष्ठी होखे। साहित्य से सदा स्नेह करे वाला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सिराज साहब लगभग सगरो गोष्ठी के अपना उपस्थिति से ऊँच बना दीं। एह संस्मरण के पढ़ि के थोड़ि देर ले हमहूँ थथम गइनी। वइसे ई संस्मरण ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ के 2007 के अंक 27 (संस्मरण अंक) में छपल रहल। एह बात के पता आदरणीय डॉ. अरुनेश नीरन सर आ आदरणीय डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय से बात कइनी त चलल। पाण्डेय सर के लगे ई अंक बाटे, से ओह अंक में छपल अउरियो संस्मरण के पता चलल। ऊहाँ के लगभग 16 पेज के फोटो खींच के हमके ह्वाटस्एप्प कइनी। कुछ के नाव देखीं- पाण्डेय कपिल जी के लिखल ‘भोजपुरी के भाषिक अस्मिता के उद्घोषक: डॉ. उदय नारायण तिवारी’, आचार्य रामदरस मिश्र जी के लिखल ‘बिकाऊ पंडित’, प्रो. रामदेव शुक्ल जी के लिखल ‘सुगना के आखिरी पयान’, गिरिजाशंकर राय ‘गिरिजेश’ जी के लिखल ‘समय के शिला पर’, अनिल कुमार पाण्डेय जी के ‘जुझारू जनकवि: आचार्य महेंद्र शास्त्री’, प्रसिद्ध कहानीकार मिथिलेश्वर जी के लिखल ‘जब लिखे शुरु कइनी’, विनय बिहारी सिंह के ‘कइसे भुलाईं कलकत्ता के ऊ दिन’, सतीशचंद्र भास्कर जी के ‘मस्ताना कवि श्याम जी’, रमाशंकर श्रीवास्तव जी के ‘भादो चउथ चाँदनी’, श्री रविकेश मिश्र जी के ‘गगन घन घेरि आई कारी बदरिया’, सतीश त्रिपाठी जी के ‘सरकारी तंत्र आ अजीज खाँ पठान’, अनिल ओझा ‘नीरद’ के ‘खरवा खोंटत, पनीया पीअत’, भगवती प्रसाद द्विवेदी के ‘भिखारी ठाकुर के जनमभूइँ’, पद्मभूषण विन्देश्वर पाठक जी के ‘सुलभ आंदोलन के कहानी’, पं. हरिराम द्विवेदी जी के ‘जिनगी के उछाह के कवि कैलाश गौतम’, प्रसिद्ध कथाकार कृष्ण कुमार जी के ‘लइकाईं के मइल आ माई के गइल’ के अलावा प्रेम प्रकाश पाण्डेय जी के ‘मम्मा के बुझउवल’, अनिरूद्ध त्रिपाठी अशेष जी के ‘साक्षात तुलसी से भेंट’, रवीन्द्र श्रीवास्तव ‘जुगानी’ जी के ‘फिराक गोरखपुरी: हमार बाबा’, जगन्नाथ त्रिपाठी जी के ‘जिनगी क पुरनका पन्ना’, सुनील सरीन के ‘युवानीति वाला ऊ दिन’ आ सुरेश त्रिपाठी के ‘हमके राजा से का काम’, ई सब संस्मरण ओह अंक के शोभा रहल आ अब भोजपुरी में संस्मरण लेखन के थाती बा। 5

‘भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ में विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सतीश त्रिपाठी जी के लिखल ‘पाताललोक से बहुरि के’ यात्रा-संस्मरण के अंश बा ओकरा बाद प्रगतिशील विचारधारा के पोषक जनकवि विजेन्द्र अनिल पर अविनाश नागदंश जी के संस्मरण के अंश प्रस्तुत कइल गइल बा। ई सगरो स्वतंत्र संस्मरण बा ना कि किताब के रूप में। एह सब के बाद तीन गो किताबन के नाव प्रस्तुत कइल गइल बा। सन् 1975 में छपल उमादत्त शर्मा जी के ‘आजादी के हलचल’, 1982 में छपल साँवलिया विकल जी के ‘तरपन-अरपन’, 2002 में छपल शारदानन्द प्रसाद जी के ‘सुरता के पथार’ बा।

संस्मरण पर तइयार करत एह लेख के सिलसिला में हम भोजपुरी साहित्य के एगो ई-ठेहा ‘भोजपुरी साहित्यांगन’ के वेबसाइट पर गइनीं। ऊँहा जा के मन में तनी स्थिरता आइल। ओहिजा हमके संस्मरण के पाँच गो किताब मिलल। ‘हमहूँ माई घरे गइनी’ डॉ. आशा रानी लाल के यात्रा-संस्मरण हऽ, जवन सन् 2001 में भोजपुरी विकास मंडल, सिवान के ओर से छपल रहल। सन् 2013 में पाण्डेय कपिल जी के किताब ‘घर आ बाहर’ भोजपुरी संस्थान पटना से छपल रहे। जवना में यात्रा-संस्मरण आ लेखो के संकलन बा। ‘पड़ाव’ डॉ. प्रभुनाथ सिंह जी के लिखल ‘भोजपुरी कहानी, संस्मरण आ ललित निबंधन’ के ई संकलन के प्रकाशन 2004 में विश्व भोजपुरी सम्मेलन, दिल्ली के ओर से भइल रहे। शारदानन्द प्रसाद जी के ‘सुरता के पथार’ भोजपुरी संस्थान पटना से 2002 में छपल रहल। राजीव रंजन सिंह ‘हिंमांशु’ जी के संस्मरण संग्रह ‘पंच दर्शन’ जवना में यात्रा-कथा बा, सन् 2002 में छपल रहल।

जइसन कि पहिलहूँ कहल बा, यात्रो साहित्य संस्मरणे में आवेला। एकर कारण हमरा ई लागेला कि इहो इयादे पर, स्मरणे के आधार पर लिखाला। डायरी लेखनो त ईयादे पर होला। ताजा प्रकाशित भइल डॉ. रामरक्षा मिश्र जी के डायरी नीक जबुन में पढ़ि के ई बाति पोढ़ हो जात बा। भोजपुरी में संस्मरण लेखन के जाने खातिर हमके ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ के 32 वाँ अंक मिलल जवन यात्रा विशेषांक रहे आ 2014 में छपल रहे। देखि-पढ़ि के अच्छा लागल। ओहमे भोजपुरी के समृद्ध-समृद्ध साहित्यकार लोग के रचना पढ़े के मिलल। ओह अंक आदरणीय डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय जी के ‘राजस्थान में दस दिन’ के अलावे पाण्डेय कपिल जी के ‘आगरा दर्शन’, अंतर्राष्ट्रीय दीदी सरिता बुधु जी के ‘हमार बिहार यात्रा: चंपारण के पुकार’, प्रो. रामदेव शुक्ल जी के ‘धरती आ किसान के मन एक्के बा इहाँ से उहाँ ले’, श्री बलराम पाण्डेय जी के ‘मारीशस: सिन्धु में बिन्दु’, आदरणीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी के ‘गया: आत्मा के मुकुती के धार्मिक पड़ाव’, डॉ. रविकेश मिश्र जी के ‘सातों बहिनियन के देश’, परिचय दास जी के ‘भाषा के जीभ से चखत’, सत्यदेव त्रिपाठी जी के ‘किन्नौर प्रांतर में छह दिन’, चंद्रदेव यादव जी के ‘जहाँ पाँव रूके वहीं पड़ाव’ आ डॉ. प्रेमशीला शुक्ल जी के ‘समुन्दर जी, समुन्दर’ यात्रा-संस्मरण के अलावे अनिल ओझा नीरद जी के ‘पुरुरवा के यात्रा कथा’, अनिरुद्ध त्रिपाठी ‘अशेष’ के ‘शहीदन के महातीर्थ में सात दिन’ आ सुरेश्वर त्रिपाठी जी के ‘देवरिया ताल के रोमांचक यात्रा’ छपल बा। 6

एतना छानबीन के बाद एतने पवला पर मन तनी दुखी भइल काहें कि एहू सब में ढेर स्वतंत्रे संस्मरण रहे, किताब के रूप में कम। एही में ईयाद पड़ल कि ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ के अठरहवाँ अंक में विवेकी राय जी के लिखल ‘का हो गइल गाँव के’ छपल रहे। कबो एही के प्रेरणा से हमहूँ लिखले रहनी ‘हमार गँउवा बदलि गइल बा’। तऽ ओह संस्मरण में विवेकी राय जी अपना गाँव सोनवारी के ईयाद करत लिखले बानी।

मन धीरे-धीरे हरिहराए लागल कि गँवे गँवे सहीं, भोजपुरी भाषा में पहिलहूँ संस्मरण लिखात रहल बा, आजहूँ लिखात बा। समय के साथे आजु भोजपुरी के फलक ढेर बढ़ल बा। ई साँच बा कि जेतना फलक बढ़ल बा, ओतना भोजपुरी में कथेत्तर गद्य के बढंती नइखे भइल। नइखे भइल त का, ई बड़ा प्रसन्नता के बात बा कि अब खूब होत बा। हमार संस्मरण ‘एगो त्रिवेनी ईहवों बा’ सन् 2012 में पहिला बेर ‘अँजोरिया’ में आ बाद में ‘भोजपुरी पंचायत’ में छपल रहे। ‘बरम बाबा’ आखर में आ ‘साँस-साँस में बाँस’ ‘भोजपुरी पंचायत’, ‘भोजपुरी संगम’ आ ‘भोजपुरी साहित्य सरिता’ में छपल रहल। अइसहीं भोजपुरी के कालजयी पत्रिका ‘पाती’ के लगभग हर अंक में संस्मरण छपत रहेला। कुछ उदाहरण देखीं – अंक 87 में डॉ. रामदेव शुक्ल जी के ‘ऑक्सफोर्ड युनीवर्सिटी में एक दिन’  7  यात्रा-संस्मरण बा त अजय कुमार जी के ‘एगो बैंकर के डायरी’ 8  ललित संस्मरण बा। पाती के अंक 90 में श्री आनन्द दुबे जी के लिखल ‘लूटल नीमन ना हऽ’  9   छपल बा आ अंक 91.92 में तीन तरह के संस्मरण छपल बा। श्री आनन्द दुबे जी के यात्रा-संस्मरण ‘यात्रा आ आस्था’, स्थान-संस्मरण के श्रेणी में श्री गुलरेज शहजाद जी के ‘संत कबीर आ चंपारन’ के सथवे स्मरण के रूप में आदरणीय डॉ. ब्रजभूषण मिश्र जी के ‘पं. गणेश चैबेः भोजपुरी लोक के सौन्दर्यशास्त्री’ छपल बा। स्मरण पर लिखइला के कारन हम एहके संस्मरणे के श्रेणी में राखे के धृष्टता करत बानी। आदरणीया डॉ. सुमन सिंह के ‘पगलो आजी’ पाती के 88 वाँ अंक में छपल रहल। सर्व भाषा ट्रस्ट से प्रकाशित भइल ऊहाँ के ‘हूक-हुँकारी’ किताब में छपल ‘मउगा चाचा’, ‘जादूगरी’, आ मनतोरना फुआ आदि ढेर समृद्ध संस्मरण पाठक लोग के सामने पढ़े खातिर उपलब्ध बा, जवन भोजपुरी संस्मरण विधा के समृद्धि के ओर आस बन्हावत बा। एकरा सथवे श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के दू गो संस्मरण ‘बुढ़िया माई’ आ ‘अवघड़ अउर एगो रात’ आ एगो यात्रा संस्मरण ‘एगो रोमांचक यात्रा’ भोजपुरी पंचायत में हमके पढे़ के मिलल रहल। एह सब से मन में ई विश्वास हो गइल कि अनगिनत लोग संस्मरण लिखत आ छपत होई।

भोजपुरी संस्मरण के बात करत में केदारनाथ सिंह जी के संस्मरण ‘हिंदी भुला जानी’ आ गोपेश्वर सिंह जी के लिखल ‘भोजपुरी के पहिलका सोप ओपेरा लोहा सिंह’ जवन हिंदी समय पर प्रकाशित बा, आपन उपसिथति दर्ज करइबे करी। सथवे आदरणीय मार्कण्डेय शारदेय जी के ‘डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव’ आ ‘पाण्डेय कपिल’ पर लिखल संस्मरण अपने आप में भावात्मक महत्व के बा।

भोजपुरी के बात, विचार, व्यवहार, संस्कार, गीत, संगीत से ले के ढेर भोजपुरिया लेखक लोग ढेर कुछ लिखले बा, संस्मरणों में ओकर उपयोग कइले बा, हो सकेला कि भोजपुरियो में संस्मरण लिखले होखे, हमरा पता नइखे, हम नाम नइखीं ले पावत, ओह खातिर क्षमा। बस पहिले मन जे तरे दुखी रहे, अब आह्लादित हो गइल बा कि भोजपुरियो में संस्मरण लेखन सदा से होत रहल बा, होत बा। आगहूँ होत रही। रउरा सब से हमार दसोनोह जोड़ के निहोरा बा कि मन में कवनो बितल व्यक्ति या वस्तु-अथान के ईयाद के भाव आवे, विधा ना समझ में आवे त चुपचाप माई सरस्वती के गोड़ लागीं आ लेखनी उठा के लिखल शुरू क दीं। राउर उ लेखनी असली मौलिक होई आ भोजपुरी साहित्य के संस्मरण के थाती समृद्ध करी।

संदर्भः

  1. ‘इग्नू’ प्रपत्र/ इकाई-दू, भोजपुरी भाषा आ लिपि/2.2.3 आधुनिक काल में भोजपुरी के विकास
  2. भोजपुरी साहित्य के इतिहास/डाॅ. अर्जुन तिवारी/ पृष्ठ 387.388
  3. उहे/ पृष्ठ 388.390
  4. उहे/ पृष्ठ 390.391
  5. पाती/अंक-87/ पृष्ठ 20.24
  6. पाती/अंक-87/ पृष्ठ 25.28
  7. पाती/अंक-90/ पृष्ठ 39.40
  8. समकालीन भोजपुरी साहित्य/अंक-27
  9. समकालीन भोजपुरी साहित्य/अंक-32


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