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Hum BhojpuriaMay 6, 20221min680

संजय कुमार पांडेय सिद्धांत 

केहू के असरा मत करिह, बस करिह अपना बल के। कोई भी देश के प्रमुख के ई पहिला जिम्मेदारी बा कि आपन देश के जनता के रक्षा के ध्यान रखीं आ कोई भी दूसरा देश के साथे कभी भी अपना स्वार्थ में या अपना आन में भा दोसरा के बहकवला में युद्ध करे में जोश मत दिखाईं। कुछ अइसने भूल से गुज़र रहल बा यूक्रेन, जेकर अंदाजा ओकरा कभी भी ना रहे। अपना लोग से लड़े के आ दोसरा लोग से सहयोग मांगे के भूल कर रहल बा यूक्रेन।

यूक्रेन-रूस के मनमुटाव सन 2013 से प्रारंभ होके उहे गलती के दुबारे घटवला के कारण आज महायुद्ध जइसन तबाही के मंज़र देखे के मिल रहल बा। एगो कहावत बा भोजपुरी में कि आपन हित-अनहित जानवरो बुझेला, काहे कि उ हर तरफ असुरक्षा के भाव से गुजरेला। अभी मामला सरिया के अझुराइल बा। एह युद्ध के परिणाम रूस के पक्ष में होई, ई निश्चित बा, काहे कि यूक्रेन के लड़कपन के जब ले मुंहतोड़ जवाब ना दियाई, तब ले रूस के शक्ति के लोहा ना त अमेरिका मानी, ना ही नाटो।

थोड़ा सा पीछे देखल जाव त बात और स्पष्ट  हो जाई। देखल जाव त रूस-यूक्रेन के बीच तनाव सन 2013 में तब शुरू भइल, जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर  यानुकोविच के कीव में विरोध शुरू भइल। इनका रूस के समर्थन मिलत रहे, जबकि उहां के प्रदर्शनकारी के ब्रिटेन के साथ मिलत रहे। अइसन स्थिति में फरवरी 2014 में यूक्रेन के राष्ट्रपति यानुवोकोविच के देश छोड़े के पड़ल और उनका रूस में जाके शरण लेवे के पड़ल। ओही समय रूस दक्षिणी यूक्रेन क्रीमिया पर कब्जा  कइलख। एतने से बात खत्म ना भइल, रूस यूक्रेन के अलगाववादी लोग के खुला समर्थन देवे लागल। तबे से यूक्रेन सेना और अलगाववादी के बीच जंग होखे लागल। आज भी पूर्वी यूक्रेन के कई इलाका में रूस समर्थित अलगाववादी के कब्जा बा। एही सब के कारण डोनेटस्क और लुहानस्क के रूस अलग देश के रूप में मान्यता दे देले बा। आज एही से पुतिन सैन्य एक्शन के आर्डर दे तारन।

इहाँ एक बात अच्छा से समझे के होई कि यूक्रेन जब से अइसन रणनीति बनइलख कि नाटो से दोस्ती करके अमेरिका के शरण में रहके अलगाववादी लोग से निपटल जाव, तब से एह युद्ध के शुरुआत हो गइल। रूस  एकर भरपूर विरोध कइलख काहे कि रूस ना चाहत रहे कि यूक्रेन नाटो से मिले। काहे कि अइसन भइला पर रूस चारों ओर से घिर जाइत। आगे चलके नाटो देश के कुल जना मिलके रूस पर मिसाइल तानी त रूस  खातिर ई बहुत बड़ा चुनौती हो जाई।

रूस नइखे चाहत कि नाटो आपन विस्तार करे, एही से रूस यूक्रेन और पश्चिमी देश पर दबाव बनावता। अइसन बदतर स्थिति में  रूस के ना चाहते  हुए भी अमेरिका और दोसर देश के पाबंदी के नजरअंदाज करत युद्ध शुरू के पड़ल। आज 25 दिन भइला पर भी युद्ध थमे के जगह और बढ़ल जाता, भारत आज भी एकरा के बातचीत से सुलझावे के सलाह देता। युद्ध कवनो भी समस्या के हल  नइखे, बल्कि विनाश के दोसर नाम ह। जनहित के बारे में सोचके समय रहते राष्ट्र प्रमुख लोग के सही निर्णय लिहल ही बुद्धिमानी होई। जय भारत जय अमन।


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Hum BhojpuriaMay 6, 20221min730

तारकेश्वर राय तारक

समय बड़ा बलवान होला, ई कब केकरा सामने कवना रूप में आई कहल मोसकिल बा। देखीं ना कुछ समय पहिले तक यूक्रेन के नागरिक सपनो में ना सोचले होखिहन कि युद्ध जइसन कवनो बिपत से दू दू हाँथ करे के परी। काहे रूस रिसिया गइल आ यूक्रेन पर हमला कई दिहलस ?

सोवियत संघ 25 दिसम्बर 1991 के टूटल गइल आ 15 गो  स्वतंत्र गणराज्यन के नीव पड़ल, जेकर नाव रहे- आर्मीनिया, अज़रबैजान, बेलारूस, इस्टोनिया, जॉर्जिया, कजाखस्तान, कीर्गिस्तान, लातिवा, लिथुआनिया, मालदोवा, रूस, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन अउरी उज़्बेकिस्तान।

सोवियत संघ टूटला के बादो रूस आ यूक्रेन के संबंध ठीके ठाक रहे। यूक्रेन के विदेश नीति पर रूस के प्रभाव साफ झलके। स्वतन्त्र होखला के बावजूद रूसी शासन के आदेश पर ही काम करे यूक्रेन सरकार। हर दिन होत ना एक समाना, समय के साथ हालत करवट लिहलस महंगाई बढे लागल अर्थब्यवस्था  बिगड़े लागल। गिनती में कम होखला के बावजूद रूसी भाषा भाषी लोगन के शासन बहुसंख्यक यूक्रेनी लोग के निक ना लागत रहे एही से गते-गते विद्रोह के चिंगारी सुनगे लागल। यूक्रेनी अवाम के घोर बिरोध के चलते रुस के समर्थक राष्ट्रपति के पद छोड़ के भागे के परल, तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की 2019 में यूक्रेन के संविधान में फेरबदल करके खुद के यूरोपीय संघ अउरी नाटो सैन्य संगठन के हिस्सा बने के ऐलान कई दिहलन। बस एही बात पर रूस के मरीचा लाग गइल, ओके लागल यूक्रेन भविष्य में खतरा बन सकत बा, एही से सख्त बिरोध कइलस। यूक्रेन बनर भभकी समझ के  बिरोध पर ढेर ध्यान ना दिहलस। अपना बात पर अमल ना होखत देख रूस 24 फरवरी 2022 के  यूक्रेन पर सैन्य ऑपरेशन के ऐलान कइलस अउरी जंग शुरू हो गइल। अइसन बात नइखे कि संवाद ना भइल, कई बेर भइल बाकी कवनो हल ना निकलल। रूसी सेना शहर दर शहर के बर्बाद करत यूक्रेन के राजधानी पर कब्जा करे खातिर भारी हमला कर रहल बिया। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की  18 से 60 साल के पुरुषन पर  देश छोड़े पर प्रतिबंध लगा देले बाड़े, एही से पलायन करेवाला में ज्यादातर संख्या महिला, बच्चा अउरी बुजुर्गन के बा।

जिन्दगी के सारा खेल त नियति के रचल होला, रहल बात इन्सान के त उ त खाली आपन किरदार निभावेला। ओकर हाँथ में कुछउ ना होला ओके त समय के साथ आपन जिनगी के सफर जारी रखही के परी। इंसान के फितरत ह, केतनो कठिनाई होखे उ आपन जिनिगी के जिए के जुगाड़ खोजी लेला। ठीके कहाला युद्ध भूख आ आफत-बिपत आदमी के आपन भूगोल बदलेके मजबूर क देला। इहे दुख से गुजर रहल बिया यूक्रेन के आम जनता, रउवा कह सकत बानी दूसरका बिश्व युद्ध के बाद ई एगो बड़का पलायन के नाजिर बा। खबर बता रहल बा 20 लाख से अधिक मेहरारू लईकी लईका आ बुजुर्ग पड़ोसी देश के सीमा पार कर चुकल बा लो, पलायन रुकल नइखे अबहीयो जारी बा। सीरिया अफगानिस्तान के बाद यूक्रेन के नाव भी ओह सूची में दर्ज हो गइल बा जहवां के लोग अपना जर से टूट के बसल आशियाना आपन जमीन देश के छोड़ी के गैर मुल्क के रहमो करम पर जीवन काटे के मजबूर बा।

युद्ध खाली तबाहिये लेके ना आवे एकरा साथे आवेला सभ्यता संस्कृति के नेस्तनाबूद करे वाला ज्वालामुखी। शरणार्थी के रूप में जान बचावे के कीमत अदा करे के पड़ेला देश के नागरिकन के। एगो उन्मादी शासक के भू-राजनीतिक उन्माद के चलते लाखन लोग के जिनगी  जीवनभर संघर्ष के आगि में जरे के मजबूर भइल बा। दुनिया भर में करीब 8 करोड़ लोग शरणार्थी के रूप में जीनगी जी रहल बा। यूक्रेन के टटका शरणार्थी संकट कई गो नया सवाल के जन्म दे रहल बा। दुनिया के एगो बड़हन जनसँख्या विस्थापन के संकठ से कइसे बहरियाइ ? हेतना बड़हन जन सैलाब के कहवाँ जगह भेटाइ ? के देहि ?  भरण पोषण के जिम्मा के लिही? अबही त पोलैंड सहित दूसर देश इंसानियत के चलते जगह दे रहल बान। लेकिन केतना दिन ? पनाह देवे वाला देशन के भी आपन एगो सीमा बा।

संयुक्त राष्ट्र पहिलहीं एह त्रासदी के दुनिया के सबसे बड़हन शरणार्थी समस्या घोषित क चुकल बा। युद्ध फिलहाल त यूक्रेन आ रूस के बीच बा अगर एह लड़ाई में दूसर देश सामिल हो गइलन स त स्थिति अउरी भयावह हो जाई। रोकले ना रोकाई तबाही।

हमनी के पड़ोसी देश पाकिस्तान नेपाल आ खुद भारत भी बरिसन से शरणार्थी समस्या से जूझ रहल बा। भारत मे बांग्लादेशी, म्यांमारी, तिब्बती, अफगानी, सोमाली, रोहिंग्याई, पाकिस्तानी, अउर श्रीलंकाई सहित अउरी पड़ोसी देशन से आइल शरणार्थी के मसला काफी संवेदनशील बा। शरणार्थी समस्या खाली भारते ना कवनो देश बदे स्थाई समस्या बन जाला। देश के आर्थिक अउरी प्राकृतिक संसाधन पर अनावश्यक जोर बढेला। आपन हिस्सा में से ही शरणार्थी के देवे के मजबूरी होला। कब तक बाँटे के परी एकरो समय सीमा तय नइखे।

मौजूदा शरणार्थी समस्या के बीच कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टुडो के हालिए पोलैंड यात्रा के दौरान दिहल बयान जख्म पर मरहम जइसन सुखदाई बा “युद्ध के चलते यूक्रेन के छोड़े वाला लोग के कनाडा शरण देवे के तैयार बा, ना सिर्फ शरण दिही बल्कि पढ़े-लिखे रोजी रोजगार के भी बेवस्था करी। युद्ध ख़तम भइला के बाद इहो बिकल्प दियाई के जे जाईल चाही ओके जाए के बेवस्था कइल जाइ आ जे ना जाइल चाही आगे के जिनिगी कनाडा में ही बितावल चाही, ओहू के क्षमता अनुसार सरकारी सहायता दियाई।”

एह अंहियारी रात के सुबह जल्दी होखो, युद्ध कवनो समस्या के स्थायी हल नइखे हो सकत। एकरा से दुनो देश के सिर्फ आर्थिक आ समाजिक नुकसान होला। संसाधन त बर्बाद होइबे करेला साथे साथ मानसिक भावनात्मक आघात भी पहुंचेला। युद्ध वर्तमान आ आवे वाली पीढ़ी पर बुरा असर त डलबे करेला एकरा से पूरा दुनिया पर प्रत्यक्ष भा  अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव परेला, ब्यापार त प्रभावित होखबे करेला तनाव के माहौल में जिए के मजबूर हो जाला पूरा आदम जात।

परिचय : लेखक तारकेश्वर राय तारक जी त्रैमासिक भोजपुरी ई-पत्रिका सिरिजन के उपसम्पादक अउरी गाँव गिरांव आ माटी से जुड़े खातिर उत्सुक कलमकार हईं।

 


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Hum BhojpuriaMay 6, 20221min570

अखिलेश्वर मिश्र

युद्ध कवनों भी स्थिति में समस्या के समाधान ना ह। युद्ध समस्या बढावेला। ई विश्व के कई तरह से प्रभावित करेला। कवनों भी देश के अपना सुरक्षा के चिंता होला आ रहे के भी चाहीं। एकरा वास्ते उ साम-दाम-दण्ड-भेद के भरपूर इस्तेमाल करे के चाहेला। हर देश अच्छा आ मनोनुकूल पड़ोसी चाहेला। भारत भी अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के गठन के समय खासे चिंतित रहे आ बा।

रूस अपना सुरक्षा के ले चिंतित बा। यूक्रेन के नाटो में शामिल होखे के इच्छा रूस के हित में नइखे, रूस ये बात के भलीभांति समझ रहल बा। रूस के लाख समझवला के बाद भी यूक्रेन अमेरिका आ यूरोपीय दबाव में आके नाटो के सदस्य बने वास्ते आतुर बा। आ इहे ये युद्व के कारण भी बा। हालांकि  यूक्रेन अब एकरा पर संदेह व्यक्त कर रहल बा।

ई युद्ध यूक्रेन के हित में नइखे। ई स्पष्ट बा कि यूक्रेन रूस के सामरिक शक्ति के आगे बौना बा।

अभी तक ये युद्व में जानमाल के काफी नुकसान पहुँचल बा। रिहायशी इलाका में बमबारी आ मिसाइल हमला आम लोग के जनजीवन के तहस नहस कर रहल बा। बहुत अधिक संख्या में यूक्रेन के सैन्य ठिकाना, सरकारी इमारत तबाह हो रहल बा। दोसरा तरफ दूनू देश एक दूसरा के क्षति पहुँचावे के दावा भी कर रहल बा। एतना त तय बा कि यूक्रेन में तबाही के आलम बा।

ये युद्ध में अमेरिका के भी बहुत बड़ा कूटनीतिक चाल बा। उ यूक्रेन के बहाने रूस के कमजोर करे  के चाह रहल बा। उ रूस के तानाशाह बता रहल बा।

रूस नइखे चाहत कि ओकर पड़ोसी अमेरिका आ यूरोपीय संघ के कठपुतली बन के रहे। उ एकरा के अपना सुरक्षा के प्रतिकूल देख रहल बा। अमेरिका आ यूरोपीय देश के उकसवला पर यूक्रेन रूस से लोहा लेवे खातिर तैयार बा। आ रूस कवनों भी कीमत पर युद्ध समाप्त करे के पक्ष में नइखे, जब तक यूक्रेन रूस के अनुरूप आपन विचार नइखे बदलत।

भारत हमेशा के तरह युद्ध के पक्ष में नइखे। भारतीय प्रधानमंत्री रूस आ यूक्रेन दूनू देश के राष्ट्रपति से वार्ता के द्वारा अपना कूटनीतिक भूमिका के प्रदर्शन कर रहल बाड़े।

भारत यूक्रेन में फँसल भारतीय नागरिक आ विद्यार्थी सबके सफल देश वापसी के लेके खासे चिंतित रहल बा। आ एकरा खातिर हर संभव प्रयास भी कइले बा। ऑपरेशन गङ्गा के माध्यम से करीब बाइस हजार से  अधिक लोग के सुरक्षित वापसी साधारण काम नइखे भइल। उहाँ शिक्षा ग्रहण कर रहल छात्र सबके सुरक्षित निकालल बड़हन चुनौती रहल ह आ सरकार के प्रयास अभी भी जारी बा। ‘सूमी’ से घमासान युद्ध के स्थिति में भी करीब सात सौ विद्यार्थिन के सुरक्षित निकालल बहुत बड़ सफलता मानल जाई।

भारत आपन चार केंद्रीय मंत्री के यूक्रेन के पड़ोसी देशन में भेज के ये काम के सफलता पूर्वक निर्वहन कइले बा। प्रधानमंत्री के ई प्रयास प्रशंसा योग्य बा।

इतिहास गवाह बा कि यूक्रेन भारत के कभी भी हितैषी नइखे रहल। चाहे कश्मीर के मामला होखे, चाहे परमाणु परीक्षण के बात होखे आ चाहे संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के स्थायी सदस्यता के समय रहल होखे। वर्तमान में भी यूक्रेन से लौटल छात्र सबके आपबीती से यूक्रेन के अधिकारी, नागरिक आ पुलिस के नकारात्मक रवैया स्पष्ट झलक रहल बा। फिर भी भारत उक्रेन से कवनों तरह के दुर्भावना नइखे प्रदर्शित करत।

ई युद्व हमनीं भारतीय खातिर भी बड़हन चुनौती बा। एमे कवनों दू राय नइखे कि रूस भारत के पुरान मित्र ह आ भारत के सामरिक समृद्धि में लगभग सत्तर प्रतिशत रूस के भागीदारी बा। दोसरा तरफ अमेरिका के साथ भी भारत के व्यापारिक संबंध जुड़ल बा। ये स्थिति में भारत फूँक-फूँक के कदम बढ़ा रहल बा।

युद्ध के जवन स्थिति बा, नइखे लागत कि ई तत्काल समाप्त होई। अमेरिका आ  यूरोपीय देश चाहे जेतना भी प्रतिबंध रूस पर लगाले, रूस के नइखे झुका सकत, ई पुतिन के रुख से साफ झलक रहल बा। पुतिन के अभी तक रूसी जनता के भी भरपूर समर्थन मिल रहल बा। अमेरिका आ यूरोपीय देश रूसी जनमानस के भड़कावे के भी भरपूर प्रयास कर रहल बा। यूरोपीय मीडिया रूस के जमीनी हालात के अपना ढंग से बता रहल बा जवना के रूस अपना खिलाफ अमेरिका आ यूरोपीय देश के दुष्प्रचार बता रहल बा।

जइसे जइसे समय बीत रहल बा विश्व के चिन्ता भी बढ़ल जाता। अमेरिका अपना वर्चस्व खातिर यूक्रेन के इस्तेमाल कर रहल बा, ई बात यूक्रेन के भी समझे के परी। यूक्रेन के एगो पड़ोसी राष्ट्र के रूप में रूस से अच्छा संबंध राखल जरूरी बा। अगर यूक्रेन ना सम्हलल, त यूक्रेन के भविष्य भारी खतरा में पर जाई आ यूक्रेन में तख्ता पलट होई, रूसी प्रभाव वाली सरकार स्थापित हो जाई आ यूक्रेन रूसी दबदबा में आ जाई, अइसन दिखाई पड़ रहल बा। मगर विश्व के मिजाज ये युद्व के लेके कब कवना रूप में रही आ कब करवट  बदली कहल मुश्किल बा

अगर युद्ध नइखे रुकत त  ई भारी विध्वंस के संकेत बा। अभी युद्ध के असर साफ दिखाई देता। कच्चा तेल के दाम में लगातार वृद्धि से निकट भविष्य में महंगाई बढ़ल तय बा। एसे भारत के ये युद्व के लेके चिंता स्वाभाविक बा। हालांकि रूस पर अमेरिका के प्रतिबंध के कारण रूस के तेल निर्यात पर बहुत असर परल बा। अब रूस में कच्चा तेल के कीमत में गिरावट आइल बा। अब रूस भारत के कच्चा तेल सस्ता दर पर देवे के पहल कइले बा। अब भारत के आपन वैश्विक बाजार नीति के आधार पर निर्णय लेवे के बा, जवना के इंतजार बा। एतना त तय बा कि अगर युद्व अभी ना थमल त यूरोपीय देशन के व्यवहार देख के लाग रहल बा कि एकर वैश्विक दुष्परिणाम अधिकाधिक देशन के आपसी संबंध बहुत अधिक प्रभावित करी।

रूस आपन सैन्य कारवाई रोके के तनिक भी पक्ष में दिखाई नइखे देत। अभी हालहीं में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के निर्णय कि रूस आपन सैन्य कारवाई बंद करो, निरर्थक साबित हो रहल बा। रूस ये निर्णय के बावजूद सैन्य कार्रवाई जारी रखले बा।

एने दूनू देशन के बीच कई दौर के बातचीत भी बिना कवनों सार्थक परिणाम के समाप्त हो चुकल बा। बातचीत अभी भी जारी बा आ एकर समाधान भी बातचीत के द्वारा हीं संभव बा। यूक्रेन के भी अपना हित के ध्यान में रख के, आपन अड़ियल रवैया छोड़ के, रूस के साथ समझौता के सार्थक पहल करे के चाहीं।

 


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Hum BhojpuriaMay 6, 20221min620

हरेन्द्र कुमार पाण्डेय

3 मार्च, 2022 के बिहार के मुख्यमंत्री के एगो बयान खूब चर्चा में आइल। उ साफतौर पर कहले जे उनका मालूम ना रहल ह कि भारत के हजारो-हजार पढुआ यूक्रेन जइसन देश में पढ़े गइल बाड़न। ए से नितीश कुमार के ईमानदारी त झलकता, साथही ईहो जाहिर होता कि भारत के भाग्य बिधाता लोग ईहाँ के जमीनी हालत से कतना अनभिज्ञ बा। शिक्षा जगत में फइलल अराजकता आ माफियागिरि राजनीति खातिर एगो बड़ा हथियार जइसन उपयोग होत रहल बा।

खैर ई बिषयान्तर समझ के आगे बढ़ल जाव। अपना देश में चूँकि शिक्षा के बुनियाद अंग्रेजी पद्धति पर आधारित बा हमनी के ना केवल जानकारी के बल्कि सोचे के भी जड़ ब्रिटेन आ अमेरिका जइसन बा। भारत के अखबार आ टी.वी. पश्चिम के कब्जा में बा जवना कारण हमनी के सोच आ समझ ओकरे विचार से अवगत बा। रूस-यूक्रेन युद्ध के पीछे के इतिहास जानल जरूरी बा। द्वितीय विश्वयुद्ध में रूस विजेता के तरह उभरल आ सबके मालूम बा कि दुनिया के राजनीतिक ध्रुवीकरण भइल। पूर्वी यूरोप पर रूस के आधिपत्त्य हो गईल- इहाँ तक कि जर्मनी के दू हिस्सा हो गइल। 1953 में स्टालीन के मृत्यु के बाद खुरस्चेव के शासनकाल में रूस तेजी से औद्योगीकरण के ओर बढ़ल आ साथ-साथ ओकरा क्षमता में भी वृद्धि भइल। लेकिन 80 के दशक में उदारीकरण के बयार के साथ ही वैश्वीक बाजार के आँधी में सोवियत पिछड़ गइल। अन्ततोगत्त्वा, सोवियत संघ 15 देश में विभक्त हो गइल—रूस, यूक्रेन, जौर्जिया, बेलारूस, उजबेकिस्तान, अर्मेनिया, अजेरबिजान, कजारिस्तान, कैरिस्तान, माल्डोवा, तुर्केनि, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तम आ लाटिवा। इहाँ जानल जरूरी बा जे रूस एशिया आ यूरोप दुनो महादेश में फइलल बा लेकिन ओकर आत्मा यूरोप में ही बसेला। आ इहे कारण बा कि रूस के दुश्मनी यूरोपीय देशन से हमेशा रहल बा।

अब एक नजर यूक्रेन के स्थिति पर डाल लीहल जाव। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 19 मार्च, 1918 में यूक्रेनियन कांग्रेस आ सोवियत रूसी सोवियत के बीच समझौता भइल। एकरे बाद यूक्रेन हो गइल यूक्रेनियम सोवियत गणतन्त्र। रूस आ यूक्रेन मिलके सोवियत संघ गणराज्य के स्थापना कइले रहे। संक्षेप में यूक्रेन सामाजिक आ राजनैतिक रूप से रूस के नजदीक रहल बा। सोवियत संघ के विघटन के बाद भी दूनो में संबंध में खास गिरावट ना देखल गइल रहे। तब बर्तमान युद्ध के कारण का बा?

दिसम्बर, 2013 में अमेरिका के दूनो मुख्य राजनीतिक दल के सदस्य जॉन मैकॉन (रिपब्लिक पार्टी) आ क्राईस मर्फी (डेमोक्रेटिक पार्टी) यूक्रेन में आइल रहस। भीड़ के संबोधित करे के क्रम में वो सब के बक्तव्य रहे—यूक्रेन यूरोप के बेहतर बना सकता आ यूरोप यूक्रेन के। यूक्रेन के आपन बेहतर भविष्य खातिर यूक्रेन स्वाधीन आ स्वतंत्र बा। हमनी एजा ई बतावे चाहत बानी कि अमेरिका यूक्रेन के पक्ष में बा।

एही बीच यूरोपियन यूनियन के स्थापना भइल आ समस्त यूरोप में एक मुद्रा  “यूरो“ के चलन शुरू हो गइल। बतावे के जरूरत नइखे कि विश्व व्यापार अमेरिकन डॉलर आ यूरोपियन यूरो से ही चलेला। आर्थिक वैश्वीकरण के बाजार यूक्रेन के प्रभावित कइलस। लेकिन नवम्बर में यूक्रेन के जनता भी दू भाग में बँट गइल। एक त नया हवा के पक्ष में जहाँ सबकुछ चकाचौंध करत रहे जेकरा के आधुनिक तकनीक इंटरनेट, मोबाईल हवा देत रहे। दोसर जवना के जड़ सोवियत समाजतंत्र में रहे। नतिजन सोच त बदल गइल लेकिन यूक्रेन के आधारभूत ढाँचा रसियन रह गइल। इहाँ तक कि यूक्रेन अपना परमाणु संयंत्र जवन चर्नोबाइल में बा खातिर नाभिकीय इंधन रूस से ही लेला।

यूक्रेन से रूस के संबंध खुला तौर पर सामने आइल जब रूस क्रिमीया राज्य के अपना में मिला लीहलस आ पश्चिमी प्रभाव में यूक्रेन, नाटो के सदस्यता के ओर बढ़े लागल। अमेरिका कवनो ना कवनो बहाना से यूक्रेन के फंड देबे लागल।

फरवरी 2012 में पुतीन के राष्ट्रपति पद संभलला के बाद रूस भी अपना पुराना गौरव प्राप्त करे के दिशा में पुरजोर कोशिश करे लागल। यूक्रेन जवन सोवियत संघ के प्रमुख हिस्सा रहे ओकरा के अमेरिकन ब्लॉक में जात उ कइसे सहे। एकरा के घेरे खातिर उ आपन तैयारी बहुत दिन से करे लागल रहे। लेकिन पश्चिमी मिडिया ओह चीज के प्रचार ना कइल। इहाँ तक कि जब रूस अपना सेना में यूक्रेन के तीनों ओर से घेराबंदी करत रहे त अमेरिका का ओकर पिछलग्गू यूरोपीय देश यूक्रेन के पीठ थपथपावत रहे।

इहाँ हम प्रसंग से बाहर आवेके अनुमति ले तानी। इंटरनेट का युग में एगो धारण जन्मल बा कि हम सब जानतानी। आ हमरा जानकारी के अलावा बाहर कुछ होईए ना सके। अमेरिका एह सोच आ समझ के पुरोधा बा। कुछे दिन पहिले अफगानिस्तान में जवन घटल ओकरा से कवनो शिक्षा ना मिलल। टी.वी. में रोज दिखावल जाय जे तालिबानी विद्रोही के काबुल आवे में कम-से-कम 40 दिन लागी। लेकिन एक हफ्ता के अंदर ही तालिबन काबुल पर दखल कर लिहलस।

ठीक एही तरह पश्चिमी दुनिया आराम से रहे रूस गीदड़ भड़की देता। ओकरा युद्ध करे लायक सामर्थ नइखे। ओने रूस आपन सेना बेलारूस होके यूक्रेन में ढूकावे लागल। यूक्रेन के राष्ट्रपति सबका से गुहार लगावे लगलन। अब सब लोग रूस से ओके बचावे मे ब्रिटेन, फ्रान्स, अमेरिका जइसन देश फुफकारे लगलन। रूस से व्यापार बंद करे के एक पर एक घोषणा होखे लागल। सभे चिल्लात रहल जे रूस से लड़ाई मे हमनी यूक्रेन के साथ बानी लेकिन केहू लड़े ना आइल।

लड़ाई बंद करे के एके गो शर्त पुतिन बतवले-यूक्रेन आ पश्चिमी देश ई शर्त मानलेव कि उ नाटो के सदस्य ना बनी। नाटो माने नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी अर्गरनाइजेसन जवना में अमेरिका सहित यूरोप के करीब-करीब सब देश बा। एकर, महत्वपूर्ण उद्देश्य बा जे कवनो सदस्य देश पर आक्रमण पूरा नाटो बिरादरी पर आक्रमण समझल जाई। अब एही बात के बहाना के तरह इस्तेमाल करत अमेरिका कहता यूक्रेन चूँकि नाटो के सदस्य नइखे ओकरा खातिर हमनी का लड़ ना सकीला। लेकिन युद्ध के सामान के आपूर्ति करब। पूरा प्रदर्शन के सुयोग आ गइल बा। खैर ई सूजोग रूस के पक्ष में भी ओतने बा। लड़ाई अभी चल रहल बा।

अब थोड़ा यूक्रेन के भौगोलिक स्थिति भी देख लिहल जाव। पूर्वी यूरोप में रूस का बाद यूक्रेन के क्षेत्रफल सबसे ज्यादा बा 6,03,623 वर्ग किलोमीटर। अधिकांश जमीन कृषि योग्य बा जवना से ई दुनिया में सबसे अधिक अनाज निर्यात करेवाला देसन में शामिल बा। यूक्रेन में प्राकृतिक संसाधन के भी प्रचुरता बा जेमे लिथियम आ प्राकृतिक गैस जइसन महत्त्वपूर्ण खनिज बा। एकरा पश्चिम में पोलैंड, स्लोवाकिया, उत्तर में बेलारूस, दक्षिण में रोमानिया आ पूर्व में रूस बा। पश्चिम छोड़ के तीन ओर से ई रूस का बंलारूस से घिरल बा।

यूक्रेन के अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित बा। लेकिन कंट्रोल सरकारी कंट्रोल वाला पुरान व्यवस्था से बाहर निकलल ओकरा खातिर कठिन रहल बा। दु शब्द में कहल जाव त यूक्रेन के एक श्रेणी आज भी पुराना सरकारी नियंत्रण वाला व्यवस्था के पक्षपाती बा। आ ई एगो बड़हन कारण बा वर्तमान युद्ध के। समाज के एक श्रेणी आधुनिकीकरण के पक्ष में बा जबकि एक पक्ष पुराना सिस्टम के पक्ष बा। 2000 साल से यूक्रेनियन सरकार आधुनिकीकरण के पक्ष में रहल बा। 2012 में राष्ट्रपति विक्टर यानूकोव यूरोपियन यूनियन से जुड़े वाला समझौता कइले ओकरे बाद रूस आवे वाला दिन में आपन नुकसान के अंदाज लगावे लागल। काहे कि रूस के मुख्य व्यापार के हिस्सेदार यूक्रेन ही रहे।

अब पुराना विचार वाला के सरकार विद्रोही बतावे लागल जबकि रूस ओह ग्रुप के समर्थन करे लागल। ई ग्रुप द्वारा एगो आंदोलन चले लागल जवना के “यूरोमयदान” कहल जाला। संक्षेप में वर्तमान युद्ध के पृष्टभूमि सन 2000 से तैयार होखे लागल रहे। अब जबकि अमेरिकन बर्चस्व के कमजोरी जग जाहिर होखे लागल बा रूस आपन पुराना बर्चस्व हासिल करबे करी। यूक्रेन के युद्ध कवनो आखिरी युद्ध नइखे। ई त शुरूआत बा। भारत खातिर ई बड़का संदेश बा। इहाँ त पहिलहीं से समाज बंटल बा। एकर सुयोग लेवे खातिर कब के मोहरा बन जाई समझल मुश्किल बा। बर्तमान सरकार अपना पुरान गुट निरपेक्ष वाला नीति के अनुशरण कर रहल बा जवना के चिरशत्रु पाकिस्तान भी सराहना कर रहल बा। स्थिति भयंकर बा। ई लड़ाई उन्नत देसन के अंदर उपजत असुरक्षा के भाव बा।  अपना के ऊपर रखे खातिर उ सब कुछ भी करे खातिर तैयार बारन। आज के तारीख मे जबकि ज्ञान पर सबकर अधिकार भइल जाता, उन्नत देसन के कमाई के रास्ता कम भइल जाता। हथियार के बिक्री ओ सबके कमाई के मुख्य स्रोत बा। लड़ाई हथियार बाजार के असल प्रदर्शनी बा। त उक्रेन आ रूस के बीच चले वाला लड़ाई के पीछे उहे मकसद बा।   भारत जइसन देसन खातिर ई बहुत बड़ा शिक्षा बा।  हमनी का जात धर्म से ऊपर उठ के राष्ट्र खातिर सोचे के समय आ गइल बा।  उक्रेन मे मेडिकल पढे खातिर आपन लड़ीकन के ना भेजे के पड़े ओह दिशा मे सोचे के चाही।


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Hum BhojpuriaMay 6, 20221min910

मंजूश्री

जब कवनो देश के मूढ़ मू़र्ख हठी अनुभवहीन नकलनवीस शासक मिल जाला तब तबाही बरबादी के मंजर देखे के मिलेला। युक्रेन के वर्तमान राष्ट्रपति के भी इहे हाल बा। हालाँकि उ चुनाव से ही आइल बाडे़ लेकिन कवनो राष्ट्र के निर्माण कइसे होला, राजनीति-कूटनीति का होला देसभक्ति के माने का होला, एगो नागरिक के कीमत का होला ई बात कत्तई नइखन जानत। उ युक्रेन आ अपना महादेश के हित नइखन जानत, जानत रहिते त परमाणु युद्ध के खतरा ना उत्पन्न भइल रहित। युक्रेन में जवन तबाही मचल बा उ ना मचल रहित। ओहिजा के सुख शान्ति समृद्धि शिक्षा साधन खेतीबारी नष्ट ना भइल रहित। दुनियाँ में प्रदूषण आ महँगाई भुखमरी के खतरा ना पैदा भइल रहीत ।

आज युद्ध के चौदहवाँ दिन बीत गइल, हालत नाजुक से नाजुक बद से बदतर हो आइल बा, ओहिजा से विदेशी लोग त भागिए आवता ओहुजा के लोग शरणार्थी बने खातिर मजबूर हो गइल बा। शरणार्थी का कहाला, ई बात पचासन बरिस से जे अपना जमीन से उखड़के दर-दर के ठोकर खाता उ जानता। बांग्ला देशी चाहे रोमा बंजारा चाहे हाल ले जमीन के टुकड़ा खातिर लड़त मरत इजरायल होखे। युद्ध के त्रासदी इहे लोग जानता। जे युद्ध में मरा गइल से वीरगति पा लेहल, लेकिन जे घायल हो गइल, हताहत हो गइल, ओपर से परमाणु हथियार के शिकार हो गइल, ओकर त आदो-औलाद गलल पचल पैदा होला, नागासाकी के याद बानू।

ई लडा़ई कवनो एक दिन के खेला ना ह, हमरा लागता ई चुनाव के पहिलहीं गोटी बइठावल बा, आम जनता का सुख के साधन चाही चमक दमक पर ओकर मत बदल जाला। लडा़ई से बिजनेस करे वाला, जान के सौदा क के पेट पाले वाला लोग का विश्वात्मा के दुख से का मतलब। उ त अपना हवस से मजबूर बा।

सोवियत संघ के विघटनो धकड़ईए के लड़ाई रहो, ओहू बेरा रस्साकस्सी चलत रहे दूसरका विश्वयुद्ध के समे मित्र राष्ट्र के संगे सोवियत रूस रहे लेकिन उ समय के जरूरत रहे, लेकिन वास्तव में रूस के प्रकृति आ यूरोपिय देशन के मूल प्रकृति मे ताल मेल के कवनो सवाले ना रहे। आदमी खातिर पूँजी एगो आवश्यक साधन ह लेकिन ओकरा संग्रह आ वितरण में साम्यवादी देश आ पूँजीवादी देश में भारी अंतर होला। पूँजीवादी देश अपना नागरिक के भी धन संग्रह के मौका देला आ साम्यवादी देश निजि धनसंग्रह ना करे देला ओजी सब धन गोपाल के होला माने कमाई देश के नागरिक लेकिन उत्पादन देस के हो जाई। सभका कोटा से भोजन वस्त्र मिली, अपना मने कहीं केहू ना जाई आई ना बोली बतिआई।

सोवियत साम्यवाद में माई बेटा, मरद-मेहरारू भी एक दोसरा पर जासूसी करे लो। लोग खुल के ना जी  सके। दमघोटू वातावरण रहे। कइसे-कइसे लोग जिनगी काटत रहे लेकिन धन देश के विकास में लागे। सोवियतो अपना ढंग से आगे बढत रहे।  इहाँ ले कि धरती से अंतरिक्ष ले ओकर कदम आगे चलत रहे।   ई बात तारीफ के आ इर्ष्या दुनू के रहे।

लेकिन तारीफ केहू ना करेला बाकी इर्ष्या तुरंत करेला। सोवियत संघ के लोग कथित समाजवाद आ सचउकी मार्क्सवादी तानाशाही से वेंटिलेटर पर हाँफत रहे लोग तबे गोर्वाचोव सत्ता में अइले। उ उदारवादी सोच राखत रहले। उ लोग के खुलापन देबे लगले जवना के फल भइल कि सोवियत संघ टूट गइल आ 19 गो देश बन गइल। दुनियाँ में सोवियत संघ के रूस के नाम से जानल जात रहे, उ रूस एगो छोट प्रान्त बराबर रह गइल।

लेकिन तीसे बरिस में ओइजा के नया विकास भइल।  उन्निसो देश के विकास भइल। विकास के दौर में युक्रेनो विकसित भइल। उ गेंहूँ के बड़हन उत्पादक देश बन गइल आ यूरोपीय देशन के गेंहूँ के आपूर्तिकर्ता ह।  उ खाद्यानन के तेलो बनावेला।  उ एगो बड़हन शिक्षाहब के रूप में भी विकास कइले रहल ह। पच्चीसन हजार छात्र त उहाँ भारतीय रहले हं।  ए घातक जंग के समय ओ लोग के सुरक्षित वापस बोलावल भारत के पहिलका ड्युटि बन गइल ह। आज वैश्विकरण के चलते हर देश के लोग हर देश में बा।  कवनो आपदा के बेरा ओ लोग के सुरक्षा के गम्भीर जिम्मेवारी सरकार पर आ जाला। सोचीं, जहाँ परमाणु ठिकाना पर बम्मवारी होता ओहिजा से सुरक्षित वापसी केतना खतरनाक होई ?

हं युक्रेन के विकास के बात होत रहल ह- उ व्यापारिक कृषि शिक्षा व्यापार आ पारमाणविक विकास में अपना पैर पर खडा़ हो गइल रहल ह, लेकिन दुनियाँ के कुटनीति ए चीज के सीधी सरल नजर से कइसे देखी ?  दुनियाँ में वर्चस्व के अदृश्य लडा़ई चलत रहेला।

ओ लड़ाई के शिकार युक्रेनो हो गइल ह।  विरोधी कुटनीत का एकर मौका चुनाव के बेरा मिल गइल।  प्रचार-प्रसार में चमक-दमक देखा के विदेशी ताकत के बले एगो हास्य अभिनेता ओजा के राष्ट्रपति बन गइल। वोटर के ई एगो बड़हन दोष ह कि उ तत्काल फायदा देखके बदल जाला। मतदाता के ई दोष देशहित ना अनहित क देला। एगो अराजनैतिक राष्ट्राध्यक्ष स्वभाविक बा कि विदेशी कठपुतली बन जाई, उ नॉटो के पीछे दउड़ले ह अमेरिका के भरोसा कइले ह, जबकि इ मूल रूप से सोवियत विरोधी हउवन स। ई बात बेचारा के समझ के बाहर के बा, शत्रु कबो शत्रु होला। जब भी देश टूटो चाहे घर, राष्ट्रदेवता या कुल देवता रोवेला काहे से कि एकता अपना कमजोर स्थल के रक्षा करेला आ टूटला का बाद उ सेंसिटिवप्वाॅइण्ट अपना के पूर्ण इकाई बुझ के उलूलजूलूल काम करे लागेला जवना का ताक में दुश्मन लागल रहेला बस उ घात क देला, इहे हाल युक्रेन के भइल बा।

या चने की खेती या बेटीन के बाढ़।

एतनो पर जो धन ना घटे तो करो बड़न से राड़।।

अभी युद्ध क्लाइमेक्स पर बा एक ओर भयंकर हालत बा दुसरा ओर रोजे युद्ध रोके के वार्ता चलता लेकिन रूके के आसार नइखे।  शस्त्रवार के संगे संगे न्युजवार भी चलता

युक्रेन त तबाह होइए गइल बा रूस भी जंगे दलदल में फँसल बा क्रिया के प्रतिक्रिया होला दोसरा के एक चटकन मारला पर आपनो हाथ झनझनाला। रूस सोचलहुं ना होई भयानक टक्कर होईउ शुरू में सोचले होई गीदड़ भभकी से काम चल जाई पूर्व राष्ट्रपति रूस भाग आइल बाडे़ विदेशमंत्री आ रक्षामंत्री सीज फायर खातिर तत्पर बाडे़ त जेलेंस्की हार मान लिहें लेकिन ना हार आ प्राणभय से त्रस्त जेलेंस्की लड़े खातिर मजबूर बाड़े।

युद्ध के फल कबो शुभ ना होलावर्तमान त तबाह होईए जाला आवे वाला पीढी़ भी ओकर खमिआजा भोगेला। अभी सारा संसार कोरोना से लड़ते रहल ह ओपर से इ लडा़ई विश्वात्मा के पीडा़ पहुँचावे खातिर आ खडा़ भइल बा। हम त इहे कामना करब कि विश्वजनमत एकजूट होखो आ ई लडा़ई जल्दि से जल्दि बंद कइल जाए।


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Hum BhojpuriaMay 6, 20221min720

अजय कुमार पांडेय

लइकाई में हमनी के गोल में जौन सबसे खुराफाती लइका रहे, ओकर काम रहे कौनो के कौनो के  लड़ा-भिड़ा के अपने अलगा हो के मजा लेहल। हमरा ईयाद बा, हमरा गांव में एगो नउआ, नौमी ठाकुर रलें। बोली में बड़ी मीठ, बाकिर रलें भारी बिसखोपड़ा। गांव में जेतना लड़ाई-झगड़ा आ बवाल होखे, अधिकांश उनकरे बोवल होखे।

कोर्ट-कचहरी में भी जेतना केस-मुकदमा होला ओकरा पाछे भी लगावे-बझावे आ चढ़ावे-भिड़ावे वाला लोग होला। सुलझत मामला के भी ई चढ़ावे-बढ़ावे वाला फ़रिआवे ना देलsस।

रूस-यूक्रेन विवाद कबो विनाशकारी युद्ध के रूप ना लित, यदि अमेरिका आ नाटो ग्रुप यूक्रेन के लिहो-लिहो ना करीत आ रूस के ना उकसाइत। अमेरिका के हमेशा ई नीति रहल बा कि युद्ध जइसन हालात बनल रहो आ ओकर हथियार आ गोला-बारूद बिकात रहो। आपन ई नकारात्मक नीति में उ बहुत हद तक सफल भी रहेला आ पड़ोसी मुल्कन के कबो शांति से रहे ना देवेला। भारत के खिलाफ़ पाकिस्तान के चढ़ावत-चढ़ावत ओकरा के कंगाल आ भिखारी बना देलस आ विश्व के बहुत से देशन में अमेरिका के इहे लड़ावे-भिड़ावे के नीति चल रहल बा। अमेरिका के वजह से आज यूक्रेन पूरी तरह से तबाह आ नेस्तानाबूद हो गइल बा आ अभी भी युद्ध खतम होखे के आसार नजर नइखे आवत।  युद्ध खतम भइला के बाद वर्षों लाग जाई यूक्रेन के खड़ा होखे में।

अइसन बात नइखे कि ई युद्ध से केवल उहे दुनु देश प्रभावित बा, दुनिया भर के देश ई युद्ध के आंच महसूस कर रहल बा। जइसे कौनो भी शहर के कौनो एक सड़क पर जाम के असर अउर  दोसरो सड़क आ क्षेत्र पर दिखे लागेला, ओइसहीं यूक्रेन के समस्या से कौनो ना कौनो तरह अन्य देश भी प्रभावित बा। भगवान ना करें एमें यदि अमेरिका या कोई भी नाटो देश सीधे शामिल हो गइल त स्थिति बहुत भयावह हो सकsता। यूएनओ जइसन वैश्विक संस्था बिना कारतूस के बंदूक हो गइल बा जेकर कौनो भी प्रस्ताव के कौनो महत्व अमेरिका, रूस, चाइना आ कौनो नाटो देश ना देला। यूक्रेन के जब केहू ना लउकत रहे त उ भारत से मदद के गुहार लगवले रहे बाकिर भारत  परम्परागत मित्र रूस के सीधे तौर पर खिलाफ़त ना कर सकत रहे। एही से यूएनओ में रूस के खिलाफ पारित प्रस्ताव में तटस्थ के भूमिका निभवलस।

भारत भी रूस-यूक्रेन युद्ध के आंच से अप्रभावित नइखे आ आर्थिक-राजनीतिक समस्या से दो-चार होखे के पड़ल बा। तेल के मूल्य होखे भा शेयर बाजार के भारी उतार-चढ़ाव, भारत के भी झेले के पड़ल बा। भारत के सबसे बड़ा चिंता के विषय युद्ध ग्रस्त यूक्रेन से आपन नागरिक आ मेडिकल के पढ़ाई खातिर उहां गइल लइकन के सुरक्षित आपन देश वापस लावल रहे जे ” ऑपरेशन गंगा ” के वजह से संभव हो सकल। एमे भारत के माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी आ उनकर सुलझल आ सकारात्मक विदेश- नीति बहुत कामे आइल।

पृष्ठभूमि 

रूस-यूक्रेन के मौजूदा विवाद के नींव तबे पड़ गइल रहे जब 2013 में रूस समर्थक यूक्रेनी राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच यूरोपीय यूनियन से चल रहल एगो महत्वपूर्ण राजनीतिक आ कारोबारी डील पर आपन सहमति ना देहलें आ उ डील पर रोक लगा देहलें। एकरा विरोध में यूक्रेन में कई हफ्ता हिंसक विरोध-प्रदर्शन भइल। मार्च ‘ 2014 में रूस क्रीमिया पर नियंत्रण क लिहलस। एकरा कुछ हीं समय बाद यूक्रेन के डोनेतस्क आ लुहान्सक में जहां रूस समर्थक लोग के संख्या ज्यादा रहे, के रूसी अलगाववादी ई क्षेत्रन के स्वायत घोसित क देहलन स। 2014 से यूक्रेन के रूस समर्थक क्षेत्र में छिटफुट लड़ाई जारी रहल आ यूएनओ के मुताबिक मार्च ‘ 2014 से अब तक लगभग 3000 से ज्यादा नागरिकन के मौत हो चुकल बा।

हथियार, प्रशिक्षण आ सैनिक के रूप में यूक्रेन के लागातार मिल रहल सहायता के रूस अपना ला खतरा मानेला। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अइसन समझौता चाहताड़े जेमे ई बात के गारंटी होखे कि यूक्रेन नाटो में शामिल ना होई आ नाटो रूस के तरफ अब ज्यादा विस्तार ना करी। रूस के स्पस्ट  रुख बा कि यदि अमेरिका आ नाटो यूक्रेन के मामले में आपन रवैया ना बदली त रूस आपन सुरक्षा खातिर कौनो भी कदम उठावे के स्वतंत्र बा। दोसरा तरफ यूक्रेन के आपन मामला में रूस के दखलंदाजी पसन्द नइखे आ अमेरिका आ नाटो से आपन गठजोड़ बढ़ावे के पक्षधर बा।

रूस के चिंता भी गैर वाजिब नइखे।  रूस के अमेरिका आ नाटो पर तनिको भरोषा नइखे, काहे कि ऊ कई बार धोखा खा चुकल बा।

1991 में सोवियत संघ के 15 स्वतंत्र राष्ट्र में विघटन के बाद रूस पूर्व सोवियत संघ के उत्तराधिकारी देश के रुप में स्थान पवलस। सोवियत संघ के विघटन के बाद अपेक्षाकृत कमजोर हो चुकल रूस अमेरिका से बेहतर संबंध बनावे के बहुत प्रयास कइलस लेकिन अमेरिका ए बात के बहुत तजब्बो ना देहलस। उदाहरण के तौर पर 1989 में अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री रूस के ओ समय के राष्ट्रपति मिखाइल गार्बाच्योब के ई भरोसा देहलें कि नाटो के विस्तार रूस के तरफ ना होई, जबकि अइसन भइल ना आ अब तक रूस के सीमा के करीब 14 देश नाटो के सदस्य हो चुकल बाड़ें। ई देशन में या त नाटो के सैन्य अड्डा बन गइल बा या बने वाला बा। अब यूक्रेन भी नाटो में सम्मिलित होखे के कमर कसले रहे त रूस के चिन्ता बढ़ गइल रहे। रूस के ई बात कौनो भी हालत में स्वीकार्य ना रहे कि ओकरा छाती पर खड़ा होके अमेरिका आ नाटो देश रूस के संप्रभुता पर खतरा उत्पन्न कर दे।

” नोर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन “, विवाद के दोसर मुद्दा 

एगो दोसर ताजा विवाद के मुद्दा ” नोर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन ” भी बा। अभी रूस से यूरोप तेल के आपूर्ति करेवाला पाइपलाइन यूक्रेन से होते गुजरेला लेकिन ई नया करीब-करीब बन के तैयार पाइपलाइन यूक्रेन से हो के ना जाई आ समुद्र के नीचे-नीचे सीधा जर्मनी चल जाई। यूक्रेन से गुजरे वाला वर्तमान पाइपलाइन के यूक्रेन आपन सुरक्षा के गारंटी मानेला आ बहुत बड़ा राशि रूस से किराया के रूप में भी पावेला। नया पाइपलाइन के यूक्रेन अपना खातिर खतरा के बहुत बड़ा कारण मानता  आ एसे भी आपन सुरक्षा खातिर नाटो के सदस्य बने ला बेचैन बा। रूस ई बात ला कौनो भी हालत में तैयार नइखे कि यूक्रेन नाटो के  सदस्यता ग्रहण करे आ वर्तमान गतिरोध आ संकट के ई भी बहुत बड़ा कारण बा।

उल्लेखनीय बा कि रूस विश्व के लगभग 13 प्रतिशत पेट्रोलियम आ 17 प्रतिशत प्राकृतिक गैस के उत्पादन करेला। दुनिया के कुल तेल आपूर्ति के 10 % रूस करेला। यूरोप के  40% प्राकृतिक गैस रूस हीं देला। अमेरिका आ सऊदी अरब के बाद रूस दुनिया के तीसरा सबसे बड़ तेल उत्पादक देश ह ।

रूस के यूक्रेन से होके गुजरे वाला पाइपलाइन रूस पर दबाव बनावे के हथियार के रूप में यूक्रेन के इस्तेमाल करके मंशा रहल ह। रूस ई दबाव में पड़े के तैयार ना रहे या एही से उ ” नोर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन ” परियोजना युद्ध स्तर पर चालू कइलस जे रेकार्ड समय में पूरा भी हो गइल। अब रूस यूक्रेन पर सख्ती करे ला और भी स्वतंत्र हो गइल आ यूक्रेन के नाटो में सम्मिलित होखे से रोके खातिर कौनो भी हद तक जाए के तैयार हो गइल बा।

चढ़ जा बेटा सूली पर 

रूस पूरी तैयारी आ रणनीति के साथ रूस-यूक्रेन के सीमा पर सेना के जमावड़ा शुरू क देले रहे। अमेरिका ई बात पर लागातार चेतावनी भी देत रहे कि रूस कभी भी यूक्रेन पर हमला कर सकsता आ रूस के धमकावल भी शुरू क देले रहे कि यदि यूक्रेन पर हमला भइल त रूस के एकर गंभीर परिणाम भुगते के पड़ी। रूस पर ई धमकी के कौनो असर ना पड़ल आ उ बदस्तूर आपन सेना द्वारा यूक्रेन के घेराबंदी जारी रखलस।

युक्रेन  ई बात के मुगालता में रहे कि रूस केवल डेरवावता, हमला ना करी लेकिन जब तक उ सच्चाई से वाकिफ़ होइत, बहुत देर हो चुकल रहे। 24 फरवरी 2022 के रूस, यूक्रेन पर हमला क देलस। यूक्रेन के अमेरिका आ नाटो देशन के भरोसा रहे कि ऊ मदद करीहन स, लेकिन एतहिये यूक्रेन से चूक हो गइल। अमेरिका आ नाटो यूक्रेन के चढा-बढ़ा के युद्ध में अकेले लड़े के छोड़ देहलें आ स्पस्ट रूप से घोषणा क देहलें कि यूक्रेन में उ आपन सेना ना भेजिहें आ लड़ाई में शामिल ना होइहें। यद्यपि अब जबकि युद्ध लंबा खींच गइल बा अमेरिका आ नाटो देश अघोषित रूप से यूक्रेन के सैन्य सहायता कर रहल बाड़ें आ रूस के यूक्रेन पर ताबड़तोड़ हमला जारी बा। रूसी हवाई हमला से बचे ला नीदरलैंड्स रॉकेट लांचर, एस्टोनियाई देश एन्टी टैंक मिसाइल, पोलैंड आ लातविया सतह से हवा में मार करेवाला मिसाइल, चेक गणराज्य मशीन गन, स्नाइपर राइफल, पिस्तौल आ अन्य हथियार भेज रहल बाड़न। ईहां तक कि औपचारिक रूप से तटस्थ स्वीडन आ फिनलैंड भी हथियार भेज रहल बा।

भारत-यूक्रेन संबंध 

यूक्रेन के स्वतंत्र देश बनला के बाद भारत हीं उ पहिलका देश रहे जे उंहा आपन दूतावास  खोललस। लेकिन यूक्रेन कभी भी भारत के प्रति सकारात्मक ना रहल। चाहे काश्मीर के मामला हो चाहे परमाणु-परीक्षण के, यूक्रेन कबो भारत के साथ ना देहलस। उ पाकिस्तान के सैन्य आपूर्ति भी करत रहल। एकरा बावजूद भले हीं संयुक्त राष्ट्र संघ में  रूस के खिलाफ आइल प्रस्ताव पर भारत तटस्थ रहल उ कभी भी यूक्रेन के संप्रभुता के हनन के सही ना ठहरवलस।

भारत के साथे दिक्कत ई बा कि ओकरा रूस जइसन मित्र कोई दिखाई नइखे पड़त। उल्लेखनीय बा कि जब सोवियत संघ के विघटन भइल त अमरीकी मीडिया में बहुत चटखारा ले के ई बात के चर्चा चलल कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत अनाथ हो गइल। ई बात बहुत हद तक सही भी रहे आ रूस विरोधी रहला के कारण यूक्रेन भी भारत के विरोध में हीं रहल। यूक्रेन ई बात के भी ख्याल ना रख सकल कि करीब 20 हजार भारतीय छात्र के ऊंहा मेडिकल के पढ़ाई कइला से यूक्रेन भारी विदेशी मुद्रा अर्जित करत बा।

यूक्रेन- एक संक्षिप्त परिचय

यूक्रेन के सीमा से सटल, बेलारूस, रूस, रोमानिया, हंगरी, स्लोवाकिया आ पोलैंड बा । एकरा उत्तरी छोर पर काला सागर आ जार्जिया बा। यूक्रेन के राजधानी कीव ह। रूस आ बेलारूस के सीमावर्ती उत्तरी शहर, चेर्निहिव, सूमी आ खारकीव जबकी दक्षिण में काला सागर के तटवर्ती शहर, रोस्तोव, मारियोपोल आ माइकोलेव बा।

यूक्रेन के राजधानी कीव रूसी हमला के पहिले तक एगो समृद्ध आ सुंदर शहर रहल ह जे आपन मेडिकल के पढ़ाई खातिर भी जानल जात रलs।

रूसी हमला में अपुष्ट जानकारी के अनुसार एक हजार से ज्यादा लोग मारल जा चुकल बा आ कई हजार लोग बेघर हो गइल बा। 300 से ज्यादा स्कूल-कालेज, 50 के आसपास हस्पताल आ 2000 से अधिक मकान अब तक ध्वस्त हो चुकल बा। नागरिकन के सुरक्षित जगह पलायन जारी बा आ लोग दिनचर्या के जरूरी सामान आ भोजन ला परेशान बा।

लड़ाई अभी रुके के संभावना नइखे बुझात आ रूस के ताबड़-तोड़ हमला जारी बा।

ऑपरेशन गंगा

रूस में करीब 20 हजार भारतीय छात्र आ नागरिक फंसल रलें। युद्धग्रस्त यूक्रेन से बम-बारुद के बीच से भारतीयन के  निकालल भारत सरकार ला  बड़ा टास्क रहे। खासतौर पर खारकीव आ सूमी के खौफनाक हालात से भारतीय छात्रन के सुरक्षित सीमा तक पहुँचावल बहुत जोखिम के काम रहे। एकरा पहिले भी कुवैत, अफगानिस्तान आ कुछ अन्य देश से भारत सरकार भारतीय नागरिक के सुरक्षित निष्कासन कर चुकल रहे, लेकिन ई पहिला बार  रहे जब मिसाइल हमला, गोलाबारी टैंक आ सैनिकन के सामने से भारतीय छात्र आ नागरिकन के सुरक्षित निकासी भइल।

जनवरी में हीं भारत सरकार के तरफ से अपना नागरिक लोग के ई नोटिस दिया गइल कि जे जहां बा उहें से आपन ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर दें कि सरकार उ लोग के निकाले के व्यवस्था कर सकें। पहिले ई बुझात रहे कि युद्ध ना होई लेकिन जब युद्ध होखे के संभावना बढ़ गइल त 15 जनवरी के भारत सरकार आपन पहिला ‘ एडवाइजरी ‘ जारी करके नागरिकन के निकले के कहलस। अगिला ‘ एडवाइजरी ‘ 20 आ 22 जनवरी के जारी कइल गइल। ‘ एडवाइजरी ‘ के बाद चार हजार छात्र व्यवसायिक उड़ान से निकललें। लेकिन यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदोमिर जेलेन्सकी सर्कुलर जारी करवले कि हालात सामान्य बा आ छात्र लोग के परेशान भइला के जरूरत नइखे। ये बीच विमानन के किराया 50 से 70 हजार के बीच हो गइल आ करीब सोलह हजार छात्र बहुत मुश्किल हालात में उहाँ फंस चुकल रलें।

अब भारतीय प्रधानमंत्री एक्शन में अइलें आ कई राउंड उच्चस्तरीय बैठक कइलें। एयर इंडिया आ वायुसेना के विमान 87 से ज्यादा उड़ान भरलें। 300 से ज्यादा घंटा लगल। भारतीय प्रधानमंत्री युद्धग्रस्त राष्ट्राध्यक्षन से पांच बार सीधे बातचीत कइलें। चार केंद्रीय मंत्री स्लोवाकिया, हंगरी, पोलैंड आ रोमानिया में डेरा जमवलें। भारतीय अधिकारी गोलाबारी आ बमबारी के बीच युद्धग्रस्त क्षेत्रन में गइलें। हंगरी स्थित भारतीय दूतावास बुडापेस्ट में एगो कंट्रोल रूम बनवलस। एकर कमान भारतीय विदेश सेवा के 30 युवा अधिकारियन के हाथ में दिआइल। बुडापेस्ट में होटल के एगो छोट कमरा में बनावल ई कंट्रोल रूम में 30 युवा आईएफएस अधिकारी 150 से ज्यादा स्वयंसेवक आ टेक्निकल टीम के साथ रात-दिन काम में लागल रहलें।

निकासी अभियान के सुविधा ला चार टीम बना के अलग-अलग जिम्मेवारी सौपल गइल।  एक टीम सीमा पर अलग-अलग साधन से पहुचे वाला लोग पर नजर रखले रहे आ उनका के निकटवर्ती सुरक्षित स्थान पर पहुँचावे के काम कइलस। दुसरका टीम लोग के ठहरावे के व्यवस्था में रहे। तिसरका टीम सबका ला भोजन-पानी के व्यवस्था करे में रहे या चउथा टीम के ड्यूटी एयरपोर्ट पर रहे।

एतना पुख्ता आ चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भारतीय छात्र आ नागरिक सुरक्षित भारत लौट सकलें। देखला आ पढ़ला पर ई सब फिल्मी कहानी जइसन लागता जेमें देशभक्ति, परिवार, आंसू, खुशी आ एक्शन बा, लेकिन ई हकीकत बा कि घोर युद्धग्रस्त क्षेत्र से भारतीय सुरक्षित आपन- आपन घरे, परिवार, माई-बाबूजी के लगे पहुँच गइलें।

ई सब के बीच एगो दुखद पहलू ई भी रहल कि युद्धग्रस्त यूक्रेन के खारकीव शहर में भारी गोलाबारी के बीच भारत के कर्नाटक राज्य के एक मेडिकल छात्र नवीन शेखरप्पा के खाना खातिर लाइन में लगला के दौरान गोलीबारी में मौत हो गइल। पंजाब के बरनाला निवासी मेडिकल छात्र चंदन जिंदल के ब्रेन हेमरेज के कारण मृत्यु हो गइल।

युद्ध के दौरान भारत के तिरंगा के महत्व दिखल जब कई दूसरा देश के नागरिक आ छात्र सुरक्षित निकले खातिर तिरंगा के सहारा लिहलें आ तिरंगा के साथे सुरक्षित बाहर निकल गइलें।

सर्वेंट ऑफ पीपल “

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदोमीर जेलेन्सकी राजनीति में आवे से पहिले टीवी कलाकार आ कॉमेडियन रलें। ई यूक्रेन के छठा राष्ट्रपति हउवें। जेलेन्सकी करीब 45 वर्ष के बाड़न आ  ईनकर पत्नी के नाम ओलेना जेलेन्सकी ह। इनका दु गो संतान बा आ आकर्षक छवि के मालिक बाड़न।

आज पूरा विश्व में रूस जइसन शक्तिशाली देश से बहादुरी से टक्कर लेवे खातिर चर्चा में बाड़न। जेलेन्सकी के पार्टी के नाम ” सर्वेंट ऑफ पीपल ” ह आ पार्टी के ई नाम जेलेन्सकी द्वारा अभिनीत उ लोकप्रिय टीवी धारावाहिक के नाम ह जेमें उ एगो हाई स्कूल शिक्षक के भूमिका कइले बाड़े जे बाद में यूक्रेन के राष्ट्रपति बन जाता। 2015 से 2019 तक चलल ई धारावाहिक बहुत लोकप्रिय रहे।

टीवी आ सोसल प्लेटफॉर्म के लोकप्रियता से जेलेन्सकी राष्ट्रपति के चुनाव लड़े के मन बनवले आ आज सचमुच यूक्रेन के चर्चित राष्ट्रपति बाड़न।

भारतीय मेडिकल छात्र और उनका भविष्य

यूक्रेन संकट से विश्व के अलग-अलग देश अलग-अलग तरह के मुद्दा से जूझ रहल बाड़े। यूक्रेन में चल रहल युद्ध के साथहीं भारत में मेडिकल शिक्षा के कमजोर आ मध्यम वर्ग के पहुँच से दूर व्यवस्था पर सवाल उठे लागल बा। भारत के आबादी आ आबादी के हिसाब से कम आ महंगा मेडिकल पढ़ाई, चर्चा के विषय बन गइल बा। देश के आजादी के बाद से बढ़त आबादी के हिसाब से मेडिकल शिक्षा के मुद्दा पर कभी भी गंभीरता से विचार ना भइल।

आज देश में कुल 586 मेडिकल कॉलेज बा जेमें 276 निजी मेडिकल कॉलेज बाड़न स। जहां कम सीट भइला के वजह से सामान्य विद्यार्थी 500 से 600 के बीच अंक अइला के बावजूद सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नइखन पावत उहें निजी मेडिकल कॉलेजन के करोड़ रुपया फीस जुटावल उनका ला आकाश-कुसुम बा। एही से बड़ी संख्या में छात्र यूक्रेन, रूस, फिलीपींस, चीन, तजाकिस्तान आ इहां तक कि नेपाल आ बांग्लादेश भी जा रहल बाड़ें। ई देशन में बिना नीट परीक्षा पास कइले भी सीधे प्रवेश मिल जाला। ई देशन में 20 से 25 लाख में मेडिकल के पूरा पढ़ाई हो जाला। एही वजह से करीब 40 हजार छात्र हर साल मेडिकल के पढ़ाई खातिर विदेश जालें।

अबकी ई समस्या पर मोदी सरकार के ध्यान गइल बा आ ई निर्णय भईल बा कि निजी मेडिकल कॉलेजन के आधा सीट पर सरकारी मेडिकल कॉलेज के बराबर हीं फीस लिआई। निर्णय त हो गइल लेकिन एकर अनुपालन कइल आ करावल आसान नइखे। निजी मेडिकल कॉलेज चलावे वाला लोग छोट-मोट लोग नइखे। ई कॉलेज बड़ा-बड़ा नेता, नौकरशाह आ पूँजीपतियन के गंठजोड़ चलावे ला जे पूरा सरकारी तंत्र आ निर्णय के प्रभावित करेके ताकत रखsता। अब अइसन स्थिति में ई समस्या के समाधान आसान काम नइखे।

दोसर बड़का समस्या बा आधा-अधूरा पढ़ाई छोड़ के आइल मेडिकल छात्रन में भविष्य के ले के चिंता। यदि युद्ध आज ख़तम भी हो जाता त यूक्रेन के फिर से खड़ा होखे में बहुत समय लग जाई। अब समस्या  लइकन के बाकी पढ़ाई आ ओमें लागल पैसा के भी बा।  मध्यम वर्ग के विद्यार्थी खातिर 20-25 लाख के व्यवस्था भी के तरे भइल होई ई उ परिवारे जानत होई। सरकार भी ई बात पर मंथन कर रहल बा, बाकिर ई समस्या के कौनो ठोस समाधान के रास्ता फिलहाल नइखे लउकत।


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Hum BhojpuriaMay 6, 20221min730

मनोज भावुक

रूस यूक्रेन युद्ध के चलत सवा महीना से ऊपर हो गइल बा अउरी यूक्रेन के हजारो नागरिक आ दुनू ओर के मिला के हजारों सैनिक के जान चल गइल बा। शहर के शहर तबाह भइल बाड़s सन तवन त अलगे बा। युद्ध हमेशा जान माल के नुकसान ही लेके आवेला।

अब रिपोर्ट्स के हिसाब से रूस आपन समर नीति में बदलाव कइले बा। उ अपना सिपाहियन के जुटा रहल बा ताकि फेर से सक्रिय युद्ध कर सके। अभी यूक्रेन में रूस के गोलाबारी कम भइल बा। रूस एह फिराक में बा कि यूक्रेन के पूर्वी क्षेत्र के अपना अधिकार क्षेत्र में पूरा तरह से ले लेव। एही के चलते उ डोनबास पर ही केंद्रित कइले बा। रूस के ई योजना भी बा यूक्रेन आर्मी जवन पूरब में लड़ रहल बा, ओकर जरूरी सामान के आपूर्ति बंद कइल जाव। एही के चलते उ ईंधन, गोला बारूद के खेप पर धावा बोल रहल बा। रूस चाहत बा कि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेन्सकी मजबूर होखस आ यूक्रेन के पूर्वी भाग में स्थित डोनबास अउरी क्रिमिया के रूस के अधिकृत राज्य मान लेस। देश दुनिया के समर विशेषज्ञ ई कह रहल बाड़ें कि रूस यूक्रेन के दू हिस्सा में बांटे चाहत बा, काहें कि उ अकेले सगरो यूक्रेन पर आधिपत्य ना जमा पाई। जइसन रूस के युद्ध नीति चल रहल बा, ओकरा हिसाब से रूस यूक्रेन के अंदर बॉउन्ड्री लाइन खींचे में सफल हो जाई।

रूस-यूक्रेन झगड़ा के बिया आज से नइखे बोआइल। ई सोर पुरान बा अउरी सगरो यूक्रेन में फइलल बा। बात ह 2014 के जब रूस यूक्रेन के हिस्सा में रहे वाला राज्य क्रीमिया के अपना अधिकार में ले लेहलस। रूस तब डॉनबास के पूर्वी हिस्सा भी अपना अधिकार में ले लेहलस। ओह साल भी बड़ा हो हल्ला भइल, काफी नुकसान भइल, तबे से ई सीमा-विवाद चल रहल बा। दुनू ओर कूटनीतिक रूप से दांव पेंच त लगातारे होत रहल बा। पूर्ण रूप से युद्ध अब जाके चालू भइल बा जब यूक्रेन के भविष्य दांव पर लागल बा, साथही रूस के भी। काहें कि नुकसान त दू-तरफा बा।

रूस-यूक्रेन विवाद के इतिहास का बा

रूस अउरी यूक्रेन एक जइसन सांस्कृतिक विरासत साझा करे वाला दू देश हवें। उहाँ भाषा के भी बहुत हद तक समानता बा। यूक्रेन के सीमा उत्तर में बेलारूस, पुरुब में रूस, आजोव के सागर आ दक्षिण में काला सागर, दक्षिण पश्चिम में मालडोवा आ रोमानिया अउरी पच्छिम में स्लोवाकिया, हंगरी आ पोलैंड से संबंधित बा। एह बेरा जवन युद्ध चल रहल बा, उ रूस के ओर से चल रहल बा। यूक्रेन यूरोप महाद्वीप के रूस के बाद दूसर सबसे बड़ क्षेत्रफल वाला देश ह। साथे, सबसे गरीब यूरोपीय देश भी मानल जाला। सभे जानत बा कि यूरोप कई सौ वर्ष से सगरी महाद्वीपन पर आपन कॉलोनी बनावे में आगे रहल बा अउरी उहाँ सबसे पहिले औद्योगिक क्रांति भइल, एही के चलते समृद्धि के मामले में यूरोपी देश सबसे आगे बाड़ें सन बाकिर यूक्रेन  एमें सबसे पीछे बा।

18वीं शताब्दी में रूस के महारानी कैथरीन द ग्रेट यूक्रेन के रूस में मिला लेहली। तब यूक्रेन एगो जातीय समूह रहे जवन एगो भूभाग पर निवास करे। जब रूसीकरण बढ़ल त यूक्रेन के जातीय आ भाषायी पहचान के मिटावल चालू भइल। ई त सबसे पहिले होला जदी कवनो देश भा संप्रभु राज्य के समाप्त करे के बा त ओकर पहचान मिटावल जाला। हालांकि समय के मांग के चलते यूक्रेनी लोग आपन संघर्ष रोक के रूस के ही तंत्र में सम्मिलित होत गइल। हालांकि यूक्रेनी लोग में स्वतंत्रता के आग शांत ना भइल रहे, एही के चलते उ आपन जनमत संग्रह में लागल रहलें। जब प्रथम विश्वयुद्ध भइल तब सगरो राजनीतिक समीकरण बदलल। 1922 में यूक्रेन भी यूएसएसआर (सोशलिस्ट रिपब्लिक) के हिस्सा बन गइल।

करीब 70 साल बाद जब 1991 में सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक के विघटन भइल तब यूक्रेन भी स्वतंत्र राष्ट्र बनल। हालांकि यूक्रेन के स्वतंत्रता के मांग कई साल पहिले से जोर शोर से उठे लागल रहे। 1990 में करीब तीन लाख से अधिक यूक्रेनी लोग मानव शृंखला बना के प्रदर्शन कइले रहे। एकरा बाद यूएसएसआर के खात्मा के बाद 24 अगस्त 1991 मे सोशलिस्ट रिपब्लिक के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव के हटा दिहल गइल। यूक्रेन के संसद स्वतंत्रता अधिनियम बनवलस आ संसद के प्रमुख लियोनिद कार्वाचुव यूक्रेन के पहिला राष्ट्रपति बनलें।

रूस यूक्रेन विवाद कइसे शुरू भइल

यूक्रेन में अइसन लोग के भी समूह रहल बा जवन शुरू से अपना के रूस के हिस्सा मानत आइल बा अउरी उ अक्सर रूस के साथे भी खड़ा रहल बा। यूक्रेन के स्वतंत्रता के बाद से ही अलगाववाद के आग सुलगत रहल बाकिर 2004 में रूस समर्थक विक्टर यानुकोविच के राष्ट्रपति बनला के बाद यूक्रेन अउरी रूस के बीच नजदीकी आवे लागल। बाकिर आंतरिक धांधली के आरोप में विक्टर के संलिप्त होखला के चलते चुनाव भइल। पूर्व प्रधानमंत्री युशचेंको 2005 में राष्ट्रपति बनले अउरी यूक्रेन के पश्चिमी देशन के साथे गठबंधन में जाए के प्रयास कइलें। उ नाटो के सदस्य बने खातिर कोशिश में लाग गइलें। 2008 में नाटो यूक्रेन से वादा कइलस कि उ जल्दी ही आपन सदस्य बनाई।

बाकिर फेर राष्ट्रपति चुनाव भइल अउरी 2010 में विक्टर यानुकोविच फेर रूस के राष्ट्रपति बनलें। उ काला सागर के बंदरगाह पर रूस के साथ सौदा कइलें अउरी रूसी नौसेना के बंदरगाह पर लीज देहला के बदले गैस मूल्य समझौता भइल। फेर रूस आ यूक्रेन के बीच नजदीकी आइल। उ पश्चिमी देशन से चल रहल व्यापार समझौता अउरी नाटो आ अन्य पश्चिमी देशन के दल में शामिल होखे के वार्ता खतम कर देहलें। उनके जोर रहे कि मास्को यानि कि रूस से फेर व्यापारिक समझौता कइल जाव।

2014 में यूक्रेन के अलग-अलग हिस्सा में हिंसक प्रदर्शन भइल आ एह दरम्यान क्रिमिया आ डोनबास के पूर्वी क्षेत्र रूस के अधिकार में चल गइल, यूक्रेन के सेना अउरी रूस के समर्थन देबे वाला अलगाववादी दल के भिड़ंत भइल। एही साल यानुकोविच के हटा के उद्योगपति पेट्रो पोरोशेंको यूक्रेन के राष्ट्रपति बनलें। एकरा बाद यूक्रेन के अन्य यूरोपीय देशन के यूनियन से वार्ता शुरू भइल आ सेवा अउरी उत्पाद के मुक्त बाजार खुलल।

2019 के राष्ट्रपति चुनाव में पोरोशेंको के हरा के पूर्व कॉमेडियन वोलामिदीर जेलेन्सकी राष्ट्रपति बनलें अउरी यूक्रेन के पूर्वी सीमा पर चल रहल संघर्ष के खत्म करे के वादा कइलें। 2021 में उ अमेरिका में बनल बाइडन सरकार से यूक्रेन के नाटो में शामिल होखे खातिर अपील कइलें। ओही साल के मध्य में विपक्षी नेता अउरी रूस समर्थक विक्टर मेडमेडचुक पर सरकार प्रतिबंध लगवलस। एह सबके चलते रूस के कड़ा आपत्ति आइल। फेर पूर्वी सीमा पर यूक्रेन तुर्की में बनल बेरक्टर डीबी2 ड्रोन के इस्तेमाल कइलस। एकरा बाद रूसी सेना यूक्रेन के सीमा पर आपन जमावड़ा लगावल चालू कर देहलस। साल 2022 आवत रूस आ यूक्रेन के बीच बढ़ रहल विवादन के आग धधकत गइल। फेर फरवरी में रूस यूक्रेन के क्षेत्र डोनेत्स्क अउरी लुगंस्क के अलग देश के रूप में मान्यता दे देहलस। ओकरा बाद 24 फरवरी से रूस आ यूक्रेन के युद्ध शुरू हो गइल।

भविष्य में का होखे वाला बा, ई त अज्ञात बा। बाकिर जवन नुकसान यूक्रेन अउरी रूस के भइल बा, उ सदियों तक इतिहास के एगो करिया कागज लेखां रही। कई गो देश, जे में भारत भी अग्रणी भूमिका में बा, युद्ध विराम आ शांति बहाल खातिर लगातार प्रयास कर रहल बाड़ें।


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Hum BhojpuriaMay 2, 20221min790

यशेन्द्र प्रसाद

भगवान् बुद्ध कहले –

“तथागत सिखावेले कि हर युद्ध, जेकरा में एक मानुस दोसरा मानुस के बध करेला, शोचनीय ह। लेकिन तथागत ई कबो ना सिखावेले के शांति बनावल रखे के हरसंभव परयास जब बिफल हो जाओ त न्यायसंत युद्ध करे वाला के निंदा होखो। जे युद्ध के कारण पैदा करेला ऊ अवश्य दोषी होला।” (17)

” तथागत स्वार्थ के पूर्ण समर्पण करे के अवश्य सिखावेले। लेकिन तथागत गलत शक्ति के सामने कवनो चीज के समर्पण करे के शिक्षा ना देले, चाहे ऊ शक्ति मानुस हो, देवता हो भा प्राकृतिक तत्त्व होखो। संघर्ष त रही, काहे कि समूचा जीवने कवनो ना कवनो तरह के संघर्षे ह, लेकिन संघर्ष करे वाला कहीं ऊ सत्य आ सदाचार के खिलाफ त स्वार्थ के संघर्ष नइखे करत !” (18)

“हे सिंह!जे युद्ध में न्यायसंगत उद्देश्य खातिर जाता ओकरा शत्रुअन के बध करे खातिर तैयार रहे के चाहीं। काहे कि योद्धा लोगन के इहे नियति ह, आ अगर ओकर नियति ओकरा के धर लेले बा तब शिकायत करे के कवनो कारणे नइखे।” (22)

“जे न्याय अउर सदाचार के पक्ष में बाटे ऊ कबो असफल ना होला, बलुक आपन उद्यम में सफल होला आ ऊ सफलता टिकाऊ भी होला।” (28)

” हे सेनापति ! ई सब समझ के तू युद्ध करs, आपन युद्ध शूरता से लड़s, लेकिन सत्य के योद्धा बन के ! तबे तथागत तहरा के असिरवाद दीहें !” (30)
( ‘धम्मपद‘ से )

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यूक्रेन युद्ध के एक से एक दर्दनाक वीडियो आ फोटो के बमबारी हमनी सभ पर टीवी आ इंटरनेट के माध्यम से हो रहल बा। भारत के टीवी चैनल सब ‘ वॉर रूम’ खोल लेले बाड़े सन आ देखला से त बुझाता कि इहे लोग के लगे युद्ध के सब कंट्रोल बा। चिल्ला-चिल्ला के मिसाईल दगवावत बाड़े सन आ हवाई हमला त लगातार चलवावत बाड़े सन सुरुये से। रिपोर्टर सब घबड़ा -घबड़ा एतना जोर से चिचियाले सन जे जिउ धक् से हो जाला कि कहीं पुतिन बाबू उनके माथा पर बम त ना फोड़ देले !

भइल ई बा कि भारत सहित दुनिया के अधिकतर मीडिया पच्छिम माने अमेरिकी आ यूरोपियन परभाव में बा आ खाली एकतरफा ओपिनियन के परचार करs ता। रूस के विलेन बना दीहल गइल बा आ रूस के दृष्टिकोण का बा ई दियरी लेके खोजे के पड़s ता। रूस कियोर से आवत खबर बड़ी मुश्किल से मिलs ता।

एकर कारन बा कि आज इंटरनेट के जुग में इंटरनेट, गूगल, फेसबुक, ट्विटर, यू ट्यूब सबके हथियार बना के अमेरिका आ यूरोप के देस यूज करs तारे सन। बैंक सिस्टम, क्रेडिट कार्ड, रेस्टोरेंट आ खाये-पिये के आ आउरो सामान के भी अस्त्र-शस्त्र बना दीहल गइल बा। सूचना, खबर, जानकारी, समाचार सभन के हथियार बना के परजोग होता। सुपरपावर सब राउर सोच के, राउर विचार आ ओपिनियन के अपना लाभ खातिर कंट्रोल करे के चाहs तारे सन, राउर पसंद-नापसंद के, राउर अवचेतन मन के अपना फायदा खातिर ढाले में लागल बाड़े सन।

एहीसे यूक्रेन समस्या के ठीक से बूझल जरूरी बा।

रूस आ यूक्रेन दूनो में एक race ( जाति) के लोग रहेला जेकरा के स्लाव नाम से जानल जाला। स्लाव के दू गो धारा बा– पूर्वी आ पश्चिमी। रूस आ यूक्रेन के लोग पूर्वी स्लाव ह लोग। पोलैंड के विस्तुला नदी के पूरब में पूर्वी स्लाव आ पच्छिम में पश्चिमी स्लाव। विस्तुला ( उच्चारण – विश्वा) शब्द के उत्पत्ति संस्कृत के ‘अवेषन्’ से मानल जाला जेकर अर्थ ह ‘धीरे-धीरे बहत’। ऋग्वेद  10.114.1 में उदाहरण देखल जा सकेला। एह ऋचा में वैदिक देवता मातरिश्वा के भी उल्लेख बा। स्लाव लोग एक देवी के नाम ह ‘मदर स्वा’ जे मातृ स्वा अथवा मातर स्वा ही भइल। जैसे वैदिक वांग्मय में मातरिश्वा के गरुड़ जइसन पक्षी रूप में उल्लेख बा ओइसहीं स्लाव लोग भी मदर स्वा के पक्षी रूपी देवी मानेला। अंग्रेज़ी के स्वान शब्द (हंस) आ स्वीडन देश के नाम भी एकरे अभिव्यक्ति ह। स्वीडन पश्चिमी स्लाव लोग के एक देश ह।

स्लाव के लोग के पूर्वज वेनेति समुदाय से ह जे लोग विस्तुला ( विश्वा) नदी के उत्तर में रहे। वेनेति शब्द के वैनतेय (गरुड़) से संबंध के बारे में कुछो कहल सम्भव नइखे। लेकिन वेनेति शब्द के कई गो अर्थ बा जइसे प्रिय, मित्रतापूर्ण, यौन संवेग आ एकरा के वीनस ( शुक्र) ग्रह से भी जोड़ के देखल जाला जिनकर सम्बंध प्रेम आ यौन संवेग से बाटे। ‘उत्तर’ दिशा के अर्थ भी वेनेति से निकलेला आ गाथा ई बा कि पुरा काल में ई लोग उत्तर के स्कन्द क्षेत्र ( स्कैंडिनेविया) से एने काऊर आइल रहे। कुछ इहे सब कारण बा कि आर्य जाति से स्लाव जाति के घनिष्ठ संबंध देखल जाला। एह तरीका से स्लाव लोग आर्य जाति के ही एक धारा ह। वैदिक संस्कृत आ वैदिक देवी-देवता से स्लाव भाषा समूह आ स्लाव संस्कृति के आश्चर्यजनक मेल बा। रूस, यूक्रेन, स्वीडन, पोलैंड, साइबेरिया, नॉर्वे आ स्लाव के सब उप-धारा सभन में ई बहुते स्पष्ट बा। रूस के प्रसिद्ध वोदका संस्कृत के ‘उदक’ ह जेकर माने होला पानी/ द्रव्य। रूस के वल्गा नदी प्रसिद्ध ह त अथर्ववेद में वल्गा-स्तोत्र बा। वल्गा देवी बगलामुखी के नाम से मशहूर बाड़ी। दुनिया के सबसे पुरान ‘स्वस्तिक’ चिन्ह यूक्रेन में ही मिलल बा। स्लाव में भगवान के ‘भग’ शब्द ‘बग’ बन जाला। दूनो जगह अर्थ एके ह- ऐश्वर्य।

ई सब बातन के चर्चा एहसे जरूरी बा काहे कि बिना मूल में गइले ओकर विस्तार आ बाद के रूपांतरण समझ ना आवे।

ई सब जानकारी से ई पता चलs ता कि रूस, यूक्रेन आदि स्लाव समुदाय आ हमनी के आर्य पूर्वज लोग एक्के रहे। कालांतर में अलग-अलग दिशा में बँटत गइल लोग आ भिन्न रक्त के संपर्क में आवत एके संस्कृति के कई-कई गो रूप होत चल गइल।

आज के यूक्रेन के कीव रूस क्षेत्र से ही ‘रूस’ नाम धराइल काहे कि कीव रूस ही पूर्वी स्लाव लोगन के पहिलका राज्य बनल रहे। ई बात बहुत माने राखs ता कि जवन कीव शहर खातिर आज पूर्वी स्लाव के दू वर्ग में घमासान मचल बा उहे रूसी सांस्कृतिक राष्ट्र के हिरदय ह।

दसवीं से बारहवीं शताब्दी के समय कीव रूस एक बहुते शक्तिशाली देश रहल। सन् 980 से 1015 के कालखण्ड के कीव रूस के स्वर्ण युग कहल जाला जब व्लादिमीर महान् के शासन रहल। लेकिन तेरहवीं सदी में भयंकर मंगोल आक्रमण कीव रूस के तहस-नहस कर देलस।

फेर हेन्ने-होन्ने से संपर्क होत रूस के तीन उप-क्षेत्र भइल– पूरब में मस्कोवा नदी क्षेत्र में मस्कोवा रूस, कीव रूस आ बेलाउ रूस (बेलारुस)। मस्कोवा रूस के प्रभुत्व बढ़ल त मस्कोवा के महत्व बढ़ल आ कीव शहर के घटत चल गइल। मस्कोवा माने मॉस्को राजधानी बनल आ रूस एक विशाल देश के रूप में विकसित भइल। यूक्रेन शब्द के माने ह — ‘सिवान पर’ माने सीमा पर। ई क्षेत्र रूस के एगो सीमांत प्रदेश ह।

रूसी सम्राट ज़ार निकोलस द्वितीय के 1917 के खूनी रूसी क्रांति में तख्तापलट आ हत्या कर के वामपंथी लेनिन सोवियत संघ नाम से वामपंथी देश के गठन कइले।

एगो रोचक तथ्य ई बा कि पहिलका विश्व युद्ध में रूस के सम्राट ज़ार निकोलस द्वितीय, इंग्लैंड के सम्राट जॉर्ज पंचम आ जर्मनी के चांसलर कैज़र विल्हेम द्वितीय ई तीनो लोग आपस में भाई रहे लोग ! विल्हेम जॉर्ज के फुफेरा भाई रहले आ निकोलस आ जॉर्ज मौसेरा भाई रहे लोग ! यूरोप के शाही रजवाड़ा में आपस में शादी-बिआह होखला से अइसन भइल रहे। तीनो जन लइकाई में संगे खेललो रहे लोग। बाकी जब दुस्मनी ठनल त विश्व युद्ध करा दीहल लोग। जॉर्ज आ निकोलस एके पच्छ से लड़ल लोग बाकी जब रूसी क्रांति में निकोलस जान बचावे खातिर जॉर्ज से शरण मंगले त जॉर्ज नकार देहले आ निकोलस के सपरिवार जघन्य हत्या हो गइल।

गाँव-जवार में पटीदार लोग दू धूर खातिर जइसे लठ्ठम-लाठी से लेके खून-खराबा ले कर देला ठीक ओइसहीं मारापीटी विश्व-स्तर पर भी होला। खाली अस्त्र-शस्त्र के लेभेल ऊँच हो जाला। पर असली लड़ाई उहे स्वार्थ के संघर्ष भा न्याय-अन्याय के संघर्ष रहेला। मानुस जबले रही तबले संघर्ष रही। मानुस के भीतरी जगत में भी आ बाहर एक-दोसरा से भी। इहे बात के भगवान् बुद्ध उल्लेख कर के कहले कि संघर्ष त हमेशा रहबे करी, बेकति के देखे के ई बा कि उ सत्य आ न्याय के पच्छ में बा कि विरोध में ! युद्ध के सुरु करs ता एकरा से गलत-सही ना तय होला। तय एकरा से होई कि न्याय आ सत्य में बाधा के डलले बा ? युद्ध के दोषी उहे मानल जाई। युद्ध में भइल समस्त नरसंहार आ बर्बादी के दोष ओकरे माथे जाई। एही कारन भगवान् बुद्ध न्याय आ सत्य के स्थापना खातिर युद्ध से पीछे हटे के मना करत बाड़न। उहॉं के कह तानी कि देवते लोग काहे ना होखो, भा क़ुदरते होखो भा मानुस, केहू अगर अन्याय चाहे असत्य करत बा त ओकरा सामने तनिको समझौता नइखे करे के।

ब्लादिमीर जेलेन्सकी आ ब्लादिमीर पुतिन आमने-सामने बा लोग। ब्लादि माने होला विश्व, आ मीर माने शासक। काहे कि अब यूक्रेन अलग देश बा आ रूस अलग। वामपंथ के दुर्भोग भोगला पर रूस के बड़ी हानि भइल। भीतरे-भीतर हालत खस्ता होत चलत गइल। आ बाहिर से अमेरिका से शीत युद्ध चलते रहे। रूस के ख़िलाक अमेरिका नाटो नाम से युद्धक संघ बनवले रहे। अमेरिका आ नाटो हर समय इहे फिराक में रहत रहे कि कइसे रूस के टुकड़ा-टुकड़ा क के बर्बाद कर दिहल जाव। अंदर-बाहर दूनो ओरिया से पड़त मार के आगा सोवियत संघ ना ठठ पावल आ बिखर गइल। 1992 में यूक्रेन, जॉर्जिया जइसन कई गो अलग देश के रूप ले लेलस। सोवियत संघ टुकड़ा-टुकड़ा हो गइल।

सोवियत संघ नाटो के ख़िलाफ़ कुछ देशन के संगे मिल के जौन वार्सा-सन्धि कइले रहे ओकर अस्तित्व ही खत्म हो गइल। लेकिन अमेरिका आ इंग्लैंड लोग नाटो के खत्म ना कइल जौन खाली रूस के मुकाबला करे ख़ातिर बनल रहे ! एकर कारन तलासे जाएब सन त नज़र आई कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सगरी दुनिया के तीन गो माफिया मिल के चलावत बाड़े सन — हथियार माफिया, तेल माफिया आ दवाई माने फार्मास्युटिकल माफिया। अब हथियार माफिया के कमाई आ लूट हथियार बेच के होला आ कवनो देश ज़ादे से जादे हथियार तबे कीनी जब ओकरा कवनो देश से डर होई, आ एकरा खातिर दुनिया में कवनो विलेन होखे के चाहीं। से अमेरिकी आ पश्चिमी माफिया खातिर जरूरी रहे कि रूस विलेन बनल रहो। बड़का विलेन बने खातिर भी कैनो सुपरपावर चाही। सद्दाम हुसैन आ गद्दाफ़ी, ईरान, सर्बिया, कोसोवो जइसन छोट-मोट विलेन ढेर दिन ना चल पावे।

1991 में यूक्रेन के अलग देश के रूप में मान्यता मिलल। सोवियत संघ इतिहास हो गइल। करीब-करीब ओइसहीं जइसन 1947 में भारत के टुकड़ा-टुकड़ा हो गइल रहे।

अलग भइला पर भी यूक्रेन तटस्थ रहल आ रूस से करीबी संबंध बनवले रहल। बाकी ओकर नीति रहे कि सबसे दोस्ती कर के चले के बा। एही चलते यूक्रेन 1996 से 2001 तक ले आपन सब न्यूक्लियर हथियार भी रूस के लौटा दिहलस जवन विभाजन के समय ओकरा खाता में आइल रहे। एकरा खातिर अमेरिका, इंग्लैंड, रूस आ यूक्रेन में एगो अंतर्राष्ट्रीय समझौता भइल आ यूक्रेन के सभ केहू मिल के सुरक्षा के गारण्टी दीहल। यूरोपियन यूनियन से भी यूक्रेन के बढ़िया सम्बन्ध बनल।

लेकिन अमेरिका आ नाटो ई चक्कर में रहल कि कइसे कर के रूस से अलग भइल छोट-छोट देशन के अपना पाले क लिहल जाव ताकि रूस फेर से पहिले जइसन एकीकृत आ शक्तिशाली ना होखे पावे।

अगर पिछला सदी से देखल जाव त नज़र आई कि दुनिया के दर्जनों देश में अमेरिका आ इंग्लैंड नाटो के संगे ले के कवनो ना कवनो बहाना से सैन्य कारवाई कइले बा। 1945 में अमेरिका हिरोशिमा आ नागासाकी पर एटम बम गिरा के अइसन नेस्तनाबूद कइलस जे आपन परभाव-क्षेत्र में कई पीढ़ीयन ले अपंग आ विकृत मानुस पैदा करत जात बा। फेर क्यूबा, ग्वाटेमाला, ईराक, निकारागुआ, ईरान, लीबिया, सीरिया पर हमला, यूगोस्लाविया के दू टुकड़ा कोसोवो आ सर्बिया आ फेर विध्वंसक शस्त्र जमा करे के झुठ्ठा बहाना बना के ईराक के तहस-नहस कर देलस। दोसर इयोर अगर रूस के इतिहास पर नज़र डालल जाव त आपन बृहद रूस क्षेत्र के एकीकृत करे के अलावे रूस कवनो दोसरा देस पर बहुते कम हमला कइले बा। अफ़ग़ानिस्तान में हस्तक्षेप रूस के बहुत भारी पड़ल रहे। लेकिन तुलना कइला से रूस आ अमेरिका-गुट के सोभाव में मौलिक अंतर नजर आई। ई अंतर एकरा में बा कि दोसरा के नष्ट कर के आपन कल्याण होई ई नीति रूस के नइखे रहल। ई त अमेरिका के नीति ह। ना जाने का बात रहेला कि अमेरिका आपन सुरक्षा के ले के हमेशा घबराइले रहेला। एगो सुपरपावर से केहू अइसन बेवहार के आसा ना करे।

अब नाटो रूस काऊर गोड़ पसारे के चक्कर में यूक्रेन पर डोरा डाले लागल। एन्ने यूक्रेन में 2010 में यानुकोविच राष्ट्रपति के पद संभलले। इनकर नीति भइल कि आपन मूल देस रूस से घनिष्ठता बना के रहे के काहे कि बृहद रूस के टुकड़न सब एके संयुक्त परिवार के हिस्सा ह से सब मिलजुल के शांति से रहे। इहे बात अमेरिका के अखर गइल। अमेरिका आपन खेला अउर तेज क दिहलस।

होने काऊर स्थिति ई भइल कि भले बाप-दादा पूर्वज लोग एक्के रहे पर ई बात के त हजारन साल गुजर गइल बाटे। जब एक्के परिवार में लठ्ठ चल जाता त पूर्वज के के पूछे जाई !! अपना-अपना के भिन्न डिक्लेयर क के लाठी तना गइल। युक्रेनियन लोग अपना के रूसी लोग से अलग राष्ट्र कहे लागल। अब यूक्रेन में बहुतायत यूक्रेनियन के बा जेकरा में तुर्क, मंगोल आदि के रक्त मिश्रण भइल बा, आ रूसी भासा के लोग पूर्वी यूक्रेन के दोनेत्स्क आ लुहांस्क क्षेत्र में बहुसंख्यक बा। ई दूनो समुदाय में भिड़न्त हो गइल।

2014 में दोनेत्स्क आ लुहांस्क के रूसी भाषी आ यूक्रेनियन समुदाय में जबरदस्त लड़ाई सुरु भइल आ बहुत लोग मरे लागल। एक इयोर से अमेरिका के खेला आ दोसर इयोर से राष्ट्रपति पुतिन रूसी भाषी के समर्थन में। वर्चस्व के लड़ाई जमीन पर उतर आइल।

पुतिन के सोझा कहल रहल कि यूक्रेन के नाटो के मेम्बर ना बने के होई आ तटस्थ देश के रूप में बनल रहे के होई। काहे कि अगर नाटो आपन लाव-लश्कर आ न्यूक्लियर हथियार लेके यूक्रेन में आ जाई त ई रूस के अस्तित्व पर बहुत बड़ा खतरा हो जाई, आ रूस एकरा के कवनो कीमत पर ना होखे दी। एकरा के लेके रूस, अमेरिका, इंग्लैंड, नाटो, यूक्रेन में कई बेर बातचीत भइल पर ढाक के उहे तीन पात ! यूक्रेन के तटस्थता के गारण्टी पुतिन लिखित मंगले कि हमरा के बस ई लिख के दे द लोनी कि यूक्रेन नाटो में शामिल ना होई। पर यूक्रेन आ अमेरिका दूनो एकरा से कन्नी काटत चल गइल।

पुतिन जब देखले कि अमेरिका आ यूक्रेन उनकर बात के महटियावे में लागल बा त दोनेत्स्क आ लुहांस्क के रूसी लोगन के लड़ाई में सहयोग देबे लगले। यूक्रेन के दक्षिण भाग में क्रीमिया प्रायद्वीप आ सेवस्तोपोल नगर क्षेत्र में भी रूसी लोग बहुसंख्यक बा। उ लोग के पोटिया के पुतिन जी 18 मार्च 2014 के गते से क्रीमिया आ सेवस्तोपोल के रूस में मिला लेहले। अमेरिका आ यूरोप में बड़ी चिचियाहट मचल लेकिन पुतिन उ लोग के बात एक कान से सुनके दोसरा कान से निकाल देले।

होने जब राष्ट्रपति यानुकोविच रूस का इयोर झुके के संकेत करे लगले त यूक्रेनियन समुदाय उनका पर खिसिया गइल आ जबरदस्त फेर बदल में मई 2014 में पेट्रो पोरोशेन्को राष्ट्रपति बनले।

पोरोशेन्को मेहनत करे लगले कि सब विवाद हल कइल जाव, दोनेत्स्क आ लुहांस्क के विद्रोह शांत होखो आ रूस से सम्बंध के भी सुधारल जाव। लेकिन उनकर झुकाव स्पष्ट रूप से यूरोपियन यूनियन में मिल के नाटो के मेम्बर बने के रहे।

एही सब के बीच 2019 के चुनाव में पोरोशेन्को के हार हो गइल जेलेन्सकी से। जेलेन्सकी एगो कॉमेडियन रहले आ एगो टीवी सीरियल में राष्ट्रपति के भूमिका खूब बढ़िया निभवले रहले। जनता में बड़ा लोकप्रियता मिलल त चुनाव जीत के राष्ट्रपति हो गइले। एकरे के कहल जाला भाग के खेल !जेलेन्सकी यहूदी हउएँ। शायद उनका के पश्चिमी शक्ति सब गुप्त रूप से सपोर्ट कइल चुनाव में।

जेलेन्सकी के नाटो के मेम्बर बने के बड़ी जोर के बोखार चढ़ल रहे। होने पुतिन लगातार बोलत जास कि यूक्रेन ई गलती कबो मत करे आ तटस्थ रहे। आपन बात के असर ना होत देख के पुतिन रूसी सेना के यूक्रेन सीमा काऊर बढ़ावे लगले। ई बात से दुनिया में हल्ला मचे लागल।

दोनेत्स्क आ लुहांस्क के नेता लोग अपना-अपना राज्य के स्वतंत्र देश घोषित कर दीहल आ रूस के लिखित चिठ्ठी भेजल कि यूक्रेन के सेना ओजा बहुते अत्याचार करत जात बा से सेना भेज के मदद चाहीं। पुतिन उ दूनो के स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दे देहले आ 22 फरवरी 2022 के विशेष सैन्य हस्तक्षेप के रूप में आपन फौज के पहिले दोनेत्स्क आ लुहांस्क में आ बाद में बेलारुस काऊर से यूक्रेन में ढुका देहले।

पुतिन कहले कि यूक्रेन पर उ कवनो आक्रमण नइखन करत। उनकर उद्देश्य खाली दोनेत्स्क आ लुहांस्क के यूक्रेन के अत्याचार से बचावे के, यूक्रेन सेना के शस्त्रहीन करे के आ यूक्रेन से नाटो में शामिल ना होखे के लिखित गारण्टी लेबे के बा। एकरे खातिर उ संयुक्त राष्ट्र संघ के आर्टिकल 51 के हवाला देत कहले कि आर्टिकल 51 के तहत कवनो देश उनका से सैन्य सहायता माँगs ता त विशेष सैन्य हस्तक्षेप करे के उनकर अधिकार बा।

अमेरिका इहे आर्टिकल 51 के दर्जनों बार दुरुपयोग कर के दुनिया भर में हस्तक्षेप करत रहल बा बाकि एह बेर उहे फँस गइल बा एकरा में।

अब कुल मिला के देखल जाव त असली युद्ध होत बाटे नाटो आ रूस के बीच में। मूलतः अमेरिका आ रूस के बीच में। इंग्लैंड के भूमिका अमेरिका के खलासी के बाटे। बाइडेन के त उमर हो गइल बा त उनकर बोलियो कँपकँपात निकलेला, बाकी बोरिस जॉनसन आपन केस में बिना ककही कइले खूब गरजेले। जर्मनी के तनिको मन ना रहल ह रूस से भिड़े में पर बात उठ गइल बा नाटो के सम्मिलात के। फ़्रांस के भी मोटा-मोटी इहे हालात बा।

(यशेन्द्र प्रसाद: अन्वेषक आ लेखक, फिल्मकार आ भू।पू। लेक्चरर (भूगोल))


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Hum BhojpuriaMay 2, 20221min850

ज्योत्स्ना प्रसाद

हमनी के पीढ़ियन से ई बात सुनत चलल आवतानी सन कि कवनों भी बड़ लड़ाई के मूल में- ज़र,जोरू आ ज़मीन एही तीनों चीज़न में से कवनों ना कवनों के प्रधानता रहेला। आजो कमोबेश ज़र आ ज़मीन ही युद्घ के मूल रूप से कारण रहेला। एकरा साथ ही समय के एह दौर में ‘ज़र’ के अर्थ में अगर हम तनि विस्तार करके देखीं त ओकरा में आज के परिस्थिति के अनुसार कुछ आउर बिन्दु भी बहुत आसानी से जोड़ल जा सकेला। जवना में हमरा हिसाब से परस्पर प्रतिस्पर्धी आ विरोधी देशन के आपन स्वार्थ, आपन व्यापार, आपन वर्चस्व, आपन अहंकार के हम बहुत आसानी से जोड़ सकेंनी।

अब बात रहल कभी युद्ध के कारण बनल ‘जोरू’ शब्द के। समय के एह दौर में कई देशन में गृहयुद्ध त होता, चाहे ओकर संभावना भी बनता। बाकिर देशी राज्यन के युग खत्म हो गइला से एकेगो देश में अपना अलग-अलग ध्वज के साथे आपन अलग-अलग अस्तित्व के एहसास करावत राजा लोगन के भी युग खत्म हो गइल बा। आज विश्व के ज्यादातर देशन में राजतंत्र के भी कब्र खोदा गइल बा। एह से ‘जोरू’ के वज़ह से कवनों दू देशन के बीच में लड़ाई के संभावना भी दूर-दूर तक लउकत नइखे। चूँकि एह काल-खण्ड में ‘जोरू’ कवनों भी युद्ध के कारण नइखे बनत। एह से ई भाव भी अब इतिहास-पुराण में ही सिमट के रह गइल बा।

अब चलीं अपना असली मुद्दा पर। यानी रूस-यूक्रेन युद्ध पर। यूक्रेन आ रूस दूनू ही देश पहिले सोवियत संघ के अंग रहे। सोवियत संघ के पूरा नाम रहे ‘सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ’ जेकरा के संक्षेप में USSR कहल जात रहे। ‘सोवियत’ शब्द श्रमिकन के परिषद के नाम से आइल बा आ लाल झंडा पर हथौड़ा आ दरांती प्रतीकात्मक रूप से देश के श्रमिकन के श्रम के प्रतिनिधित्व करेला।

कभी एह सोवियत संघ के दुनिया पर बहुत प्रभाव रहे। एकरा स्थापना के दशक के साथे अनेक देशन में महत्त्वपूर्ण सरकार उभरल। जवना में चीन, क्यूबा आ उत्तर कोरिया जइसन कई देशन में आजो अइसन सरकार मौजूद बा।

रूस USSR के सबसे प्रमुख गणराज्य रहे। ओकरा बाद के ओह महाद्वीप के दोसर बड़ देश रहे यूक्रेन। सोवियत संघ (USSR) विश्व के पहिला साम्यवादी देश रहे। एकर स्थापना रूस के ही एगो गृहयुद्ध के बाद भइल, जे सन् 1917- 1921 तक चलल। सोवियत संघ एक विशाल क्षेत्र के नियंत्रित कइलस आ शीत युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका के साथे प्रतिस्पर्धा भी कइलस। जवना कारण कई बार त ई बुझाव कि दुनिया अब एक परमाणु युद्ध के कगार पर आके खड़ा हो गइल बा।

ई बात अब जरूर बा कि सोवियत संघ के पतन के बाद से रूस में कम्युनिस्ट सरकार नइखे। हालाँकि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सोवियत संघ के पतन के 20 वीं शताब्दी के सबसे बड़ा भू-राजनीतिक तबाही मानेलन।

यूक्रेन 1918-20 में स्वतंत्र रहे। बाकिर दूगो विश्व युद्ध के बीच के अवधि में पश्चिमी यूक्रेन के कुछ हिस्सा पर पोलैण्ड, रोमानिया आ चेकोस्लोवाकिया के अधिकार हो गइल। बाद में यूक्रेन, यूक्रेनी सोवियत समाजवादी के रूप में सोवियत संघ के हिस्सा बन गइल।

रूस के सीमा एक दर्जन से अधिक देशन से मिलेला, जवना में अनेक देश पहिले सोवियत संघ के ही हिस्सा रहे। बाकिर आज ऊ सब देश ‘उत्तर अटलांटिक संधि संगठन’ यानी नाटो के सदस्य बन गइल बा।

यूक्रेन के सीमा पश्चिम में यूरोपियन देशन से आ पूरब में रूस के साथे लागल बा। हालाँकि यूक्रेन सोवियत संघ के सदस्य रह चुकल बा आ आजो यूक्रेन के आबादी के करीब छट्ठा हिस्सा रूसी मूल के भइला के कारण यूक्रेन के रूस के साथे गहरा सामाजिक आ सांस्कृतिक जुड़ाव भी बा। एकरा साथ ही रूस सन् 19 94 में एगो समझौता पर हस्ताक्षर करके यूक्रेन के स्वतंत्रता आ संप्रभुता के सम्मान देबे पर आपन सहमति जता भी चुकल बा। बावजूद एकरा सन् 2014 में यूक्रेन के लोग रूस समर्थक अपना राष्ट्रपति के ओकरा पद से च्युत क देहलस। जवना के चलते रूस यूक्रेन से नाराज हो गइल आ ऊ दक्षिणी यूक्रेन के क्राइमिया प्रायद्वीप के अपना क़ब्ज़ा में ले लेहलस। एकरा साथ ही रूस यूक्रेन के अलगाववादीयन के आपन समर्थन भी देहलस। जवना के चलते ऊ लोग पूर्वी यूक्रेन के एगो बड़ा हिस्सा पर आपन क़ब्ज़ा क लेहलस। तब से रूस समर्थक विद्रोहियन आ यूक्रेन के सेना के बीच चलत लड़ाई में अबले 14 हज़ार से अधिक लोग मरा चुकल बा।

रूस यूक्रेन के क्राइमिया पर सन् 2014 में ई कहत क़ब्ज़ा क लेहलस कि ओह प्रायद्वीप पर रूस के ऐतिहासिक दावा रहल बा। काहेकि यूक्रेन सोवियत संघ के हिस्सा रह चुकल बा। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के कहनाम बा कि चूँकि यूक्रेन के गठन ही कम्युनिस्ट रूस कइले रहे। एह से सन् 1991 में सोवियत संघ के विघटन के अर्थ ऐतिहासिक ‘रूस’ के टूटला जइसन ही भइल। हमरा कहे के तात्पर्य ई बा कि सोवियत संघ के अंग के रूस आजो अपना ही देश के अंग समझेला।

यूक्रेन के वर्तमान राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की के झुकाव पश्चिमी देशन के ओर रहल ह। एह से रूस के अपना सुरक्षा खातिर चिंतित भइल वाजिब बा। रूस के ई लागता कि ओकरा सुरक्षा-संबंधी चिंता के पश्चिमी देश आ विशेष रूप से अमेरिका द्वारा नज़र अंदाज़ कइल जाता। संभवतः अमेरिका आ पश्चिमी देशन के भी ई बुझात रहल ह कि अब रूस ओतना शक्तिशाली नइखे कि ऊ नाटो के साथे अमेरिका के जब सहयोग रही तब ऊ कवनों तरह के कोई कड़ा विरोध कर पायी। एह से अमेरिका के सह पर जइसे नाटो सन् 1994 में एक-एक करके हंगरी, रोमानिया, स्लोवाकिया, लातविया, लिथुवानिया जइसन देशन के धीरे-धीरे करके नाटो के सदस्य बना लेहलस। ओइसही यूक्रेन के भी नाटो में ऊ शामिल क ली।

अब जब कवनों तरह से यूक्रेन नाटो के सदस्य बन जाई तब नाटो बहुत आसानी से यूक्रेन के मदद से अपना सेना के रूस के मुहाने पर खड़ा क दी। एह तरह से नाटो के रूस पर आक्रमण कइल आसान हो जाई। ई सब सोच के रूस चिंतित बा। हालाँकि यूक्रेन के रूस के ई चिंता समझे के चाहीं। काहेकि कभी दूनू देश सोवियत संघ के हिस्सा भी रह चुकल बा। बाकिर यूक्रेन अमेरिका आ पश्चिमी देशन के बहकावा में आके रूस के ई चिंता ना समझ सकलस आ आज ओकर परिणाम भुगतत अपना पूरा देश के युद्ध के आग में झोंक देले बा।

रूस चाहता कि यूक्रेन नाटो के सदस्य ना बने। एकरे साथ ही ऊ कवनों यूरोपियन संस्था से भी ना जुड़े। नाटो के सेना सन् 1997 के पहिले के स्थित में लौट जाय आ पूरब में सेना के ना ही कवनों विस्तार होखो आ ना ही पूर्वी यूरोप में ओकर कोई सैन्य गतिविधि ही होखे। एकरा खातिर रूस क़ानून के पुख़्ता भरोसा चाहता।

फिलहाल नाटो के 30 देशन के सदस्यता बा। बाकिर ओकर नीति ह-“हर केहू खातिर दरवाज़ा खुला रखे के”। नाटो अपना एह नीति से पीछे हटे के तइयार नइखे। रूस-यूक्रेन युद्ध के हमरा अनुसार इहे असली कारण बा। काहेकि नाटो के एही नीति से यूक्रेन के आस रहे कि ऊ बहुत आसानी से नाटो के सदस्य बन जाई।

यूक्रेन के वर्तमान राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेस्की यूक्रेन के नाटो में शामिल करे खातिर बेचैन बाड़न। एह से ऊ यूक्रेन के नाटो में शामिल होखे खातिर एगो तय समय-सीमा आ संभावना स्पष्ट करे के माँग करत रहल बाड़ें। बाकिर जर्मनी के चांसलर द्वारा निकट भविष्य में एह तरह के संभावना से साफ इनकार कइल जात रहल बा।

यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेस्की के एह युद्ध के पहिले उनका अपना देश में भी ओतना लोकप्रियता ना रहे। बाकिर एह युद्ध के समय स्वाभाविक रूप से अपना देश से प्रेम रखे वाला लोगन के नज़र में उनकर महत्त्व बढ़ गइल बा। चूँकि ऊ यूक्रेन के कमाण्डर इन चीफ भी हउअन, एह से ओह दृष्टि से भी रूस-यूक्रेन युद्ध में उनकर काम सराहनीय रहल बा। ऊ एक ओर जहाँ अपना सेना के मोराल बढ़ावे में कामयाब होत दिखाई दे तारन उहईं दोसरा ओर अमेरिका आ नाटो से अपना तरह से मदद के गुहार भी लगावतारन।

24 फरवरी से रूस-यूक्रेन के बीच लड़ाई शुरू भइल। ऊ लड़ाई बा दस्तूर आज यानी 12 मार्च आ युद्ध के 17 वाँ दिन भी ज़ारी बा। एह दूनू देशन के बीच कई दौर के बातचीत भी भइल बाकिर कवनों ठोस नतीजा अभी ले ना निकल। कबो-कबो त हमरा ई बुझाता कि रूस-यूक्रेन के बीच जवन वार्ता जहाँ से शुरू भइल रहल ह ऊ वार्ता घुम फिर के ओही जगह पर जा पहुँचता। ह, ई बात जरूर कहल जा सकेला कि कई दौर के वार्ता के बाद भी जे ज़ेलेस्की के तेवर कड़ा लउकत रहल ह, ऊ अब तनिमनी नरम पड़ल बा। ऊ अब यूक्रेन के नाटो आ रूस के बीच तटस्थ रहे के बात भी करतारन।

यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेस्की नाटो के सदस्य देशन से भी बहुत खुश नइखन लउकत। काहेकि ऊ यूक्रेन के मदद जवना तरह से नाटो के सदस्य देशन से चाहत रहले ह ओह तरह से उनका नइखे मिलत। ऊ रूस खातिर नाटो के सदस्य देशन से ‘नो फ्लाई जोन’ के घोषणा चाहत रहले ह। बाकिर यूक्रेन खातिर कवनों देश रूस जइसन शक्तिशाली देश से दुश्मनी मोल लेबे के तइयार नइखे ।

जर्मनी ई घोषणा त कइये चुकल बा कि ऊ रूस से गैस, तेल के आयात पर रोक ना लगाई। बाकिर यूके रूस पर प्रतिबंध लगावे के घोषणा कइले बा। एह घोषणा के अर्थ हो गइल कि एह मद में ओकरा अपना बजट के आठ गुना खर्च बढ़ावे के पड़ी।

अमेरिका भी पहिले कहले रहे कि यूक्रेन के संप्रभुता सुरक्षित करे खातिर ऊ प्रतिबद्ध बा। बाकिर यूक्रेन पर आक्रमण भइला के बाद ऊ रूस पर प्रतिबंध लगावे, यूक्रेन तक हथियार पहुँचावे जइसन मदद ही करता। बाकिर यूक्रेन के मदद में आपन सेना नइखे उतारत। पोलैण्ड यूक्रेन के हथियार देबे के एवज़ में अमेरिका से सौदाबाजी करे के चाहता।

रूस-यूक्रेन युद्ध विश्व के ई बता देहले बा कि अपना देश के हर परिस्थिति से जूझे खातिर सबसे पहिले अपना देश के ही मजबूत आ आत्मनिर्भर बनावल जरूरी बा। दोसर जरूरी बात ई कि कवनों लड़ाई अपने बूते पर ही लड़े के चाहीं। दोसरा के भरोसा पर कवनों युद्ध ना लड़ले जा सकेला आ ना जीतले जा सकेला। एह बात के समझ अब यूक्रेन के भी हो गइल बा कि अभी ओकर हैसियत अइसन नइखे कि ऊ रूस जइसन महाशक्ति से युद्ध खुल के लड़ या जीत सके।

हमरा डर बा कि अपना ज़िद्द में आके ज़ेलेंस्की अपना हरा-भरा देश के खण्डहर में तबदील ना कर देस। वैसे रूस चाहित त ई युद्ध कबे समाप्त हो गइल रहित। बाकिर उहो अपना रणनीति के तहत यूक्रेन के खेला रहल बा। रूस के रणनीति के ई हिस्सा रहल बा कि ऊ पहिले चारो ओर से घेरेला तब ओकरा पर आपन चाँप चढ़ावेला। कीव के साथ आज ऊहे हो रहल बा। वैसे पुतिन के तरफ़ से ई बात निकल के आइल ह कि यूक्रेन के टार्गेट पूरा हो गइल। पुतिन के वक्तव्य बा कि उनका यूक्रेन के सत्ता बदले में रुचि नइखे। ऊ सिर्फ रूस के सुरक्षा के लेके चिन्तित बाड़न। बाकिर हमरा बुझाता कि युद्ध के आग अभी आउर धधकी। एकरा लपेट में कुछ आउर देश आई। बाकिर कब आ कइसे ई समय बतायी।

रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव

  • पूरब में नाटो के विस्तार-योजना अब खटाई में पड़ गइल। अइसे त नाटो के सदस्य बने खातिर ज्यादातर देशन के आकर्षण आ लालच रहेला कि ओकरा देश पर अगर कवनों देश आक्रमण कइलस तब ओह आक्रमण के समय ओह सदस्य देश के मदद खातिर नाटो के सदस्य देशन के सामूहिक कार्यवाई होई। बाकिर नाटो के अनुच्छेद पाँच के तहत सामूहिक कार्यवाई खातिर गठबंधन के सब सदस्यन के कवनों सामूहिक कार्यवाई खातिर सहमत भइल जरूरी बा। बाकिर नाटो के 71 साल के इतिहास में अनुच्छेद पाँच के प्रयोग सिर्फ एक बार ही 9/11 के समय भइल बा। जब अमेरिका में आतंकी हमला भइल रहे।

2- यूक्रेन के रूस से युद्ध ठान के जे ओकर स्थिति भइल बा ओकरा के देखत आ साथ ही अमेरिका आ यूरोपीय देशन के समर्थन के आश्वासन पर अब ओह इलाका के कोई भी देश हाल-फिलहाल में मास्को से बैर मोले के हिम्मत ना करी। अमेरिका आ पश्चिमी देशन के बहकावा में आके यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेस्की के बोली के जे तेवर रहल ह ओहमे अब तनि नरमी आइल बा। ऊ कहतारन – “हम अपने देश के लिए सुरक्षा गारंटी जैसे अन्य मुद्दों पर रूस से चर्चा करने से नहीं डरते। हमें तटस्थ स्थिति के बारे में बातचीत करने से भी कोई भय नहीं है।” ऊ इहो कहतारन कि नाटो यूक्रेन के सुरक्षा-गारण्टी आ सदस्यता देबे के अभी तइयार नइखे। ज़ेलेंस्की के कहनाम बा- “मैंने आज 27 यूरोपियन नेताओं से पूछा कि क्या यूक्रेन नाटो का सदस्य बन जायेगा— उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।”

3- द्वितीय विश्वयुद्ध के खत्म भइला पर अमेरिका आ सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध के शुरुआत होत रहे। ओही बीच सन् 1949 में नाटो के गठन भइल। शुरुआत में एह संगठन में 12 देश शामिल भइल। बाकिर धीरे-धीरे नाटो के सदस्य देशन से संख्या बढ़े लागल। अब एकर संख्या 30 हो चुकल बा। एहमें से कइगो देश सन् 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद नाटो में शामिल भइल। सबसे अंत में नार्थ मैसेडोनिया गणराज्य मार्च 2020 में नाटो में शामिल भइल। एह सबसे प्रेरणा लेते कुछ आउर देश जइसे बोस्निया, हर्जेगाविना, जार्जिया आ यूक्रेन भी नाटो में शामिल होखे के इच्छा जतवलस। हालाँकि एह देशन के नाटो के ओर से अभी तक कोई समय-सीमा नइखे देहल गइल। बाकिर यूक्रेन के साथे जवन भइल ओकरा के देखत रूस के प्रभाव आ दायरा वाला क्षेत्र से कवनों देश के फिलहाल नाटो के सदस्यन में शामिल होखे के कवनों संभावना नइखे दीखत।

4- नाटो में शामिल होखे के पीछे सबसे बड़ा लोभ ई बा कि सदस्य देशन के ई विश्वास रहेला कि अगर ओकरा देश पर हमला भइल तब गठबंधन में शामिल देशन के सेना ओकरा मदद खातिर आगे आई। बाकिर नाटो के वास्तविकता त ई बा कि अपना कवनों सदस्य देश के अनुरोध पर शायद ही कभी नाटो ओकरा के ओह तरह से मदद कइले होखे। नाटो यूक्रेन के भी मदद ना कइलस। यूक्रेन के बारे में त ई सोचल जा सकेला कि अभी नाटो के सदस्य नइखे। बाकिर नाटो त तुर्की के मदद के अनुरोध के भी ठुकरवले रहे। जबकि ऊ सन् 1952 से ही नाटो के सदस्य बा। नाटो चार्टर के अनुच्छेद पाँच ई गारंटी देता कि अगर कवनों सदस्य देश पर हमला होई तब ऊ आपन सामूहिक सैन्य प्रतिक्रिया तंत्र के सक्रिय कर दी। बाकिर फरवरी 2020 में जब सीरिया के इदलिव प्रांत में रूस के वायु शक्ति से लैस सीरिया के सरकारी जवान तुर्की के 34 सैनिकन के मार देहलस। ओह घड़ी नाटो ओकरा के समर्थन ना कइलस।

रूस-यूक्रेन युद्ध के तात्कालिक आ दूरगामी परिणाम

कवनों भी युद्ध के तात्कालिक आ दूरगामी दूनू परिणाम निकलेला आ ऊ दुनिया पर आपन असर भी डालेला। कारण विज्ञान आ तकनीकि के प्रभाव से आज समूचा दुनिया एक वैश्विक गाँव में बदल गइल बा। जवना के चलते कवनों जगह के वास्तविक दूरी अब कवनों मायने नइखे रखत। आज हम ई देखतानी कि पूरा संसार के व्यवस्था, आर्थिक आ व्यापारिक आधार पर ध्रुवीकरण आ पुनर्संघटन के प्रक्रिया से गुज़र रहल बा। एह से विश्व के कोई भू-खण्ड के घटना दोसरा भू-खण्ड के प्रभावित कइला बिना रह ना सकेला। एह से विश्व के कवनों कोना में अगर युद्ध होला त ओकर तात्कालिक प्रभाव त पड़बे करेला, ओकरा साथ ही ओकर दूरगामी प्रभाव भी पड़ेला। एही बात के प्रसिद्ध अर्थ शास्त्री प्रो. अरूण कुमार एह तरह से कहतारन कि वैश्वीकरण के कारण कवनों भी जंग के दुनिया के हर हिस्सा पर प्रभाव त पड़बे करेला ऊ युद्ध खाड़ी देशन में होखे चाहे अफ्रीका में। बाकिर रूस-यूक्रेन के युद्ध दू देशन के सामान्य युद्धन से अलग बा। काहेकि ई युद्ध दो देशन के बीच के साधारण युद्ध ना ह बल्कि विश्व के दू महाशक्तियन के बीच के टकराहट ह। एक ओर त प्रत्यक्ष रूप से रूस के सेना दिखाई देता। बाकिर दोसरा ओर अमेरिका आ नाटो द्वारा परोक्ष रूप से समर्थित यूक्रेन के सेना बा। जवना में तनातनी अपना देश पर भी प्रभाव छोड़ सकेला।

तत्कालिक रूप से वैश्विक कारोबार, पूँजी प्रवाह, वित्तीय बाज़ार आ तकनीकी पर भी प्रभाव पड़ी। कारण रूस के यूक्रेन पर हमला के कारण रूस पर प्रतिबंध लागू हो गइल बा।

फिलहाल दुनियाभर में रूस गैस, तेल के बहुत बड़ा आपूर्तिकर्ता ह। एह से रूस पर प्रतिबंध लगावे से एह सब चीजन के दुनिया में बेतहाशा कीमत में बढ़ोतरी होई। यूक्रेन भी कवनों कमज़ोर देश ना रहल ह। ऊ विश्व के गेहूँ आ खाद्य तेलन के बड़हन निर्यातकन में से एगो ह।

जब प्रत्यक्ष चाहे परोक्ष रूप से दो ताकतवर देशन के बीच संघर्ष होई तब एक अलग तरह के बाजार में अनिश्चितता के दौर आ जाई। जवना के चलते आपन पूँजी कहीं डूब ना जाय एह डर से विदेशी निवेशक बाज़ार से आपन पूँजी वापस निकाले लागेलें। जवना के चलते प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफ.डी.आई. आ विदेशी संस्थागत निवेश यानी एफ.आई.आई. के कवनों देश में आवल कम हो जाई। युद्ध के स्थिति में कोई भी निवेशक अपना पूँजी के अपने ही देश में निवेश करे के चाहेला। ताकि ओकरा देश के अर्थ व्यवस्था में मजबूती बनल रहो।

रूस-यूक्रेन युद्ध आज सतरहवॉं दिन में प्रवेश कर गइल। युद्ध आज ना काल खत्मे हो जाई। बाकिर शीत युद्ध थमे वाला नइखे। काहेकि ई लड़ाई वैचारिक लड़ाई ना ह। ई लड़ाई त दू महाशक्तियन के बीच के वर्चस्व के लड़ाई ह। एह से एह युद्ध से नतीजा सिर्फ दुइयेगो देश ना भुगती बल्कि दुनियाभर में मंदी आ महँगाई आपन रंग देखावे लागी। रूस के कंपनियन पर प्रतिबंध लगला से वैश्विक कारोबार प्रभावित होई। हालाँकि पश्चिमी देश एह कोशिश में बा कि पेट्रो उत्पादक आपन उत्पाद बढ़ा देव। ओपेक (OPEC) देशन से भी ई अनुरोध कइल जा सकेला। बावजूद एकरा पेट्रो उत्पादन के घरेलू कीमत बढ़ल तय बा। पेट्रो के दाम बढ़ला से स्वाभाविक रूप से सब चीजन के दाम बढ़ जाई।

रूस-यूक्रेन युद्ध के भारत पर प्रभाव

रूस-यूक्रेन युद्ध के जे प्रभाव अन्य देशन पर पड़ी ऊ सब कमोबेश भारत पर भी पड़ी। बाकिर भारत खातिर तत्काल प्राथमिकता बा यूक्रेन में फँसल भारतीय छात्रन के सकुशल देश वापस ले आवल। अभी तक 15-16 हजार छात्र मिशन गंगा के तहत अपना देश वापस आ चुकल बाड़ें। कुछ पड़ोसी देशन के लोग के भी मदद कइल गइल बा। बाकिर जले ले भारत के एक भी छात्र यूक्रेन में फँसल रहीहे ई मिशन चलत रही। एकरा साथ ही ओह छात्रन के भविष्य के भी चिंता भारत सरकार के करे के पड़ी जेकरा युद्ध के कारण अपना पढ़ाई के मझधार में ही छोड़ के अपना देश लौटे के पड़ल बा।

बाज़ार में अभी ओतना पूँजी नइखे एह से महँगाई आपन रंग देखइबे करी। आयात अधिक आ निर्यात कम भइला से भुगतान में संतुलन बिगड़े के अधिक संभावना रहेला। विदेशी निवेशक के बिकवाली के दबाव से बाज़ार कमज़ोर होई। एह से लोग अभी से ही अपना पइसा के सोना में निवेश करे लागल बा। जब सोना के माँग भारतीय बाजार में बढ़ी तब सोना के अधिक से अधिक आयात होई। सोना के माँग अधिक भइला से अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में सोना महँगा होई आ रूपिया टूटी। स्थानीय बाज़ार में सोना महँगा होई। जवना के चलते अपना देश के ही ना दुनिया भर के बजट बिगड़ी। एकर नतिजा ई होई कि देश के वास्तविक विकास में तुलनात्मक कमी आई। युद्ध के आशंका से सेना आ हथियार पर अधिक पइसा खर्च होई। राजस्व में भारी कमी आई। जवना के चलते राजस्व घाटा बढ़ी आ तब सरकार सामाजिक क्षेत्र के कामन से आपन हाथ खींचे लागी। जवना से देश के गरीब जनता प्रभावित होई। वैश्वीकरण के अवधारणा से जब विश्व समुदाय पीछे हटे लागी तब एकर सबसे ज्यादा नुकसान भारत जइसन विकासशील देश के ही होई।

भारत बहुत हद तक खाद्य तेल खातिर यूक्रेन पर निर्भर बा। भारत उहाँ से 1.5 विलियम डॉलर के सूरजमुखी के तेल, ऊर्जा, धातु आ खाद्य पदार्थ मँगवावेला।

रक्षा के क्षेत्र में भारत रूस पर निर्भर बा। रूस पर प्रतिबंध लगवला से भारत के कई रक्षा संबंधित सौदा अधर में लटक सकेला। एकरा साथ ही रूस के पेमेण्ट खातिर भारत के नया तरीका खोजे के पड़ी। भारत के लद्दाख पर चीन के गिद्ध दृष्टि के देखत भारत के अपना रक्षा-संबंधी भंडार के बढ़ावल जरूरी हो जाई। जबकि रूस पर CAATSA के तहत पाबंदी लगवला से हथियार के सप्लाई पर बहुत असर पड़ी।

एह तरह से हम समझ सकेनी कि युद्ध विश्व के कवनों खण्ड में काहे ना होखे बाकिर ओकर प्रभाव विश्व के हर देश में कवनों ना कवनों रूप में पड़ेला। एकरा साथ ही ओह क्षेत्र विशेष के आदमी त आदमीए ह युद्ध के प्रभाव उहाँ के जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सब पर पड़ेला। चारो ओर त्राहि-त्राहि मच जाला। बसल बसावल घर उखड़ जाला। करोड़ों में खेले वाला लोग शरणार्थी बने खातिर मजबूर हो जाला। बम के धमाका खाली इमारते के खण्डहर में ना बदले बल्कि उहाँ के लोगन के मानसिक स्थिति पर भी असर डालेला। एह से भरसक युद्ध के विभीषिका से बचे के चाहीं।


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Hum BhojpuriaMay 2, 20221min720

बद्रीनाथ वर्मा

यूक्रेन पर धुआंधार मिसाइल बरसा के रूस के लागल कि बस दु चार दिन में यूक्रेन घुटना के बल आ जाई लेकिन ई ओकर गलतफहमी साबित भइल। लड़ाई लगातार लंबा खिंचात जात बा। कब खतम होई आज के तारीख में केहू भी बतावे में समर्थ नइखे। उल्लेखनीय बा कि यूक्रेन के दुगो प्रांत के स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दिहला के अगिला ही दिन रूस ओजहां आपन सेना भेज दीहलस आ एही के साथे दुनों देशन के बीच बाकायदा युद्ध शुरू हो गइल। एकरा साथ ही यूक्रेन पर रूस के हमला, जेकरा बारे में खुद पुतिन एगो सीमित सैन्य कार्रवाई बतावत रहलन उ एगो अइसन युद्ध के रूप में देखल जाये लागल बा जेकर प्रभाव के व्यापकता केहू के काबू में नइखे रह गइल।

अब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन परमाणु हथियार के इस्तेमाल के संभावना क जिक्र करके अचानक सबका के सकता में डाल देले बाड़न। दुनिया शीत युद्ध के दौरान ये तरह के परिस्थिति के गवाह रहल बा। अमेरिका आ ओकर सहयोगी देशन के पास भी एकरा जवाब में अपना सेना के परमाणु हमला खातिर तैयार रहे के आदेश देबे क ऑप्शन रहे, लेकिन ऊ लोग अइसन ना कइल। अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र में राजदूत सुरक्षा परिषद के भरोसा दिहलन कि रूस पर उनका ओर से कवनो खतरा नइखे। ऊ ई भी कहलन कि पुतिन क ई कदम गैरजरूरी बा आ एसे सबका सुरक्षा के खतरा हो सकेला। वाइट हाउस के तरफ से भी स्पष्ट कइल गइल कि ओकरा ओर से अलर्ट के स्टेटस में कवनो बदलाव नइखे कइल गइल। एकरा बावजूद पुतिन के बयान के बाद परमाणु युद्ध के आशंका दुनिया के सामने एगो वास्तविक खतरा के रूप में मुंह बा के खड़ा हो गइल बा।

सवाल बा कि हमला के बाद के समय में आखिर अइसन का हो गइल कि खुद पुतिन अपना शुरुआती दावा के उलट संकेत देबे के मजबूर हो गइल बाड़न। जवाब चाहे जो भी हो, एसे एतना त स्पष्ट हो ही जाता कि यूक्रेन के खिलाफ शुरू उनकर सैन्य कार्रवाई ओतना आसान साबित ना भइल जेतना उनके लागत रहे। पुतिन के आह्वान के बावजूद यूक्रेनी सेना में फूट, विभाजन या बगावत के कवनो संकेत अभी तक नइखे लउकत बल्कि आम यूक्रेनवासियन में ये हमला के खिलाफ जवना तरह के जज्बा देखात बा ओसे लागत नइखे कि आगे के राह भी रूसी सेना खातिर आसान रहे वाला बा। येह बीच नाटो देश यूक्रेन के पक्ष में सेना भले नइखे भेजले लेकिन हथियार के सप्लाई में कमी नइखे रखले लोग। यूरोपियन यूनियन इतिहास में पहिला बार कवनो युद्धरत देश के हथियार के आपूर्ति करे के फैसला कइले बा। लेकिन रूस खातिर एसे ज्यादा चिंताजनक बा आर्थिक प्रतिबंध के एलान।

बहरहाल, ई युद्ध यूक्रेन समेत पूरी दुनिया खातिर चाहे जेतना भी परेशानी ला रहल बा, खुद रूस खातिर भी कम बड़ आफत नइखे साबित हो रहल। यूक्रेन के अंदर जवना तरह के प्रतिरोध रूसी सेना के झेले के पड़ रहल बा, ऊ त अप्रत्याशित बटले बा लेकिन ओसे भी बड़ मुसीबत बा आर्थिक प्रतिबंध। अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, फ्रांस, ब्रिटेन और जापान आदि के साझा मोर्चाबंदी आर्थिक मोर्चा पर रूस के सामने मुश्किलन के पहाड़ खड़ा कर दिहले बा। पूरा विश्व जनमत रूस के खिलाफ बा आ रूस बिल्कुल अकेला पड़ गइल बा। जहां तक बात भारत के बा त ऊ तटस्थ बा। न केहू के समर्थन ना केहू के विरोध। हं युद्ध रुक जाव भारत ई जरूर चाहत बा।

ए संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन के बीच भइल बातचीत भी मायने रखत बा। बातचीत में पूतिन प्रधानमंत्री मोदी के ताजा स्थिति के बारे में जानकारी दिहले त प्रधानमंत्री पूतिन से तत्काल युद्धविराम करे आ बातचीत के जरिए विवाद सुलझावे के अपील कइलन। असल में ई पूरा मामला में भारत बेहद जटिल स्थिति में बा। एक तरफ ऊ अमेरिका के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र खातिर बनल क्वाड जइसन संगठन का अहम मेंबर बा। ई संगठन चीन के विस्तारवादी नीति के रोके के मकसद से बनावल गइल बा। वास्तविक नियंत्रण रेखा के लेके चीन भारत के खिलाफ आक्रामक रूख अख्तियार कइले बा। भारत के लागत बा कि चीन के रोके में क्वाड से मदद मिली। दूसरा तरफ रूस जानल परखल दोस्त ह। भारत के हर मुश्किल में रूस साथ दिहले बा। सामरिक तैयारी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण सहयोगी ह। भारत के 60 फीसदी हथियार के आपूर्ति रूस से ही होला। अइसन स्थिति में अमेरिका, फ्रांस आ दूसरा यूरोपीय सहयोगियन के साथ रूस के भी जरूरत बा। भलही अमेरिका आ यूरोपियन देश रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगवले बा लेकिन भारत रूस से तेल क निर्यात करे जात बा। ई भारत के मजबूत विदेश नीति के प्रमाण बा कि रूस से तेल के निर्यात के निर्णय के बावजूद अमेरिका या अन्य यूरोपीय देश के तरफ से कवनो विरोध के स्वर ना उठल। वैश्विक समुदाय के बीच भारत के आज का हैसियत बा इ बात एके भी प्रमाणित करत बा।

बहरहाल, यूरोपियन यूनियन कमिशन आ अमेरिका के ओर से रूसी केंद्रीय बैंक पर प्रतिबंध आ रूस के स्विफ्ट सिस्टम से आंशिक तौर पर निकाले के फैसला बेहद गंभीर बा। स्विफ्ट एगो मेसेजिंग प्लैटफॉर्म ह जेकरा जरिए तमाम देश वित्तीय लेन देन के निर्देश देवेलन आ एसे 11 हजार बैंकिंग आ वित्तीय संस्थान जुड़ल बा। प्रतिबंध से रूस खातिर आयात-निर्यात बिल के भुगतान त मुश्किल हो ही सकेला ओकर पूरा वित्तीय व्यवस्था के बइठ जाये के भी नौबत आ सकत बा। एही से रूस ब्याज दर में भारी बढ़ोतरी के साथ कैपिटल कंट्रोल जइसन कदम उठवले बा। इ सब घटना एक बार फिर साबित कर रहल बा कि आज के दौर में युद्ध केहू खातिर भी आसान विकल्प ना होला। हालांकि ई संकेत दुनों पक्ष के युद्ध विराम के ओर ले जाके शांति क कवनो सम्मानजनक राह ढूंढ़े के प्रेरित करी? मौजूदा स्थिति में हमनी के बस एकर उम्मीद ही कर सकीला जा।

 



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