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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min1500

 मनोज भावुक

सोरह साल हो गइल। सोरह साल सुन के त बहुत लोग के मन बासंती हो जाला। सोरहवा साल पर त ना जाने केतना फ़िल्मी गीत बा। बॉलीवुड में गीत गूँजल कि ‘’सोलह बरस की बाली उमर को सलाम’’ त भोजीवुड में गाना बनल, ‘’सोरहे में सुन्नर सामान भइलू’’ ..

सोरह पर हमरो एगो शेर बा –

भउजी सोरह के बाड़ी आ साठ बरिस के भईया
बाज के चोंच में देखीं अंटकल बिया एक गौरइया

त हमरा कबो-कबो लागेला कि हमार भोजपुरी कई गो अइसने बाज के चोंच में अंटकल बिया।

एक बेर हिंदी के एगो महापंडित गरियावत रहलें, रे भोजपुरी के कुछ बा? आपन कवनो शब्दावली नइखे। खाली हिंदी में क्रिया पद लगा के भोजपुरी थोड़े बनेला? बहुत देर ले गप्प चलत रहल। हम लइका रहनी। लइका त आजो बानी, बुद्धि से। तब उमिरो से रहनी। चुपचाप सुनत रहनी।

पंडित जी नोकर पर चिचिअइनी- रे, चाह अभी ले ना बनल ?

बन गइल बा ए मलिकार बाकिर गिलसवा में गिलसवा अड़स गइल बा।

हमरा हँसी छूटल कि कादो भोजपुरी में कुछु नइखे। पंडी जी हमरा के खिसिया के देखनी।

बाकिर बड़ भइनी। तनी आँख खुलल त लागल कि साँचो, आपन भोजपुरी कहीं अड़स गइल बा।

फेर लागल कि ना ई हमार लड़िकबुद्धि बा। हमरा ठीक से भोजपुरी बुझाते नइखे। जेकरा बुझाता-बुझsता, उ खेलsता-खाता। ओकरा घर में रेड कार्पेट बा। हम चटाई पर के चटाइये पर रह गइनी। केतना लोग के ई नायक-महानायक, सांसद-विधायक बना दिहलस आ भावुक आदमी हम, हमरा  भोजपुरी अड़सल लागsतिया ? .. अड़सल त हम बानी?

हमहीं ना, उ सब लोग अड़सल बा जे भोजपुरी खातिर अपना के होम कइले बा, स्वाहा कइले बा।

त सोरह साल पहिले गइल त रहनी प्लांट मैनेजर बन के बाकिर भोजपुरी के कीड़ा भी हमरा साथे लंदन पहुंचल रहे। अब किड़वा के कवन बीजा-पासपोर्ट लागे के रहे कि ना जाव। लंदन पहुंचते गीत लिखनी-

बदरी के छतिया के चीरत जहजवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया
लन्दन से लिखऽतानी पतिया पँहुचला के,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया

 

दिल्ली से जहाज छूटल फुर्र देना उड़ के,
बीबी बेटा संगे हम देखीं मुड़ मुड़ के।
पर्वत के चोटी लाँघत, बदरी के बीचे,
नीला आसमान ऊपर, महासागर नीचे
लन्दन पँहुच गइल लड़ते पवनवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया

हीथ्रो एयरपोर्टवा से बहरी निकलते,
लागल कि गल गइनी थोड़ दूर चलते।
बिजुरी के चकमक में देखनी जे कई जोड़ा,
बतियावें छतियावें जहाँ तहाँ रस्ते।
हाल चाल पूछनी हम अपना करेजवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया

खैर, गीत लम्बा बा। फेर कबो सुनाएम। मेन मुद्दा प आवssतानी। भोजपुरी में लिखे-पढ़े आ कार्यक्रम करे के जवन कीड़ा रहे उ अउर तेजी से काटे लागल। हमरा किताब ‘’ चलनी में पानी’’ में के अधिकांश गीत लंदने में लिखाइल बा। चूंकि लंदन में भोजपुरी के भा भोजपुरी खातिर कुछु रहे ना त हम यूके हिंदी समिति, लंदन आ गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक समुदाय, बर्मिंघम से जुड़ गइनी बाकिर भोजपुरी के साथे लेके, छोड़ के ना। लंदन से प्रकाशित पत्रिका ‘पुरवाई’ के कभर पेज पर हमार भोजपुरी गजल छपल। ई बात 2006 के ह। फगुआ के आसपास हम लंदन पहुंचल रहनी।

देखीं, फगुनी बयार बहssता त याद के पुरवाई मन के छू-छू के निकल जाता। हमार फैक्ट्री लंदन से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर हादम में रहे। हम सपरिवार गइल रहनी उहाँ। पत्नी अनिता सिंह अउर ढाई महिना के बेटा हिमांशु के साथे। बेटा अब इन्टर में पहुँच गइल बा अउर पत्नी सफ़र में हमसफ़र बन के सोरहवां साल में।

त साल 2006 में हम पत्नी आ बेटा के साथे भोजपुरी के भी लेके लंदन पहुंचल रहनी। ओकरा पहिले युगांडा, पूर्वी अफ्रीका में रहनी। उहाँ भी ई बेमारी रहे त 2005 में भोजपुरी एसोसियेशन ऑफ़ युगांडा के स्थापना कइनी। स्थापना में हमरा साथे आजमगढ़ के अजय सिंह भी रहलें। हम त युगांडा से भाया लंदन इण्डिया आ गइनी बाकिर स्वामी नारायण के भक्त अजय भाई त उहाँ जमीन-जायदाद खरीद के बसिये गइल बाड़न। खैर, भोजपुरी एसोसियेशन ऑफ़ युगांडा के स्थापना के बाद उहाँ तमिल, तेलगू, गुजराती, मराठी विंग के साथे भोजपुरी के भी एगो विंग खुलल। फगुआ-चइता उहवों गूँजल। दियरी-बाती आ छठ शुरू हो गइल। कई गो स्वीमिंग पूल आ विक्टोरिया लेक के किनारे छठ भइल। हम कई लोग के भोजपुरी पत्र-पत्रिकन के सदस्यो बनवनी।

मन बढ़ल रहे त लंदन में भी भोजपुरी समाज के स्थापना भइल। दरअसल 2006 में हमरा भोजपुरी गजल-संग्रह ‘ तस्वीर जिंदगी के ‘ के पर सिनेहस्ती गुलजार आ ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी के हाथे भारतीय भाषा परिषद सम्मान मिलल। ई खबर बीबीसी समेत तमाम अखबारन आ वेबसाइटन के सुर्खी बनल। बीबीसी लंदन, रेडियो खातिर मुकेश शर्मा जी (जे अभी बीबीसी दिल्ली के संपादक बानी ) हमार इंटरव्यू कइनी। ओकरा बाद हम लाइम लाइट में आ गइनी। फेर यूके के भोजपुरिया लोग हमरा संपर्क में आवे लागल आ अंततः हम भोजपुरी समाज, लंदन के स्थापना कइनी अउर लंदन के हाईड पार्क में एगो कार्यक्रम रखाइल। तय ई भइल कि सब केहू अपना-अपना घर से एगो भोजपुरिया डिश बना के ले आई त लंदन में केहू किहाँ पुआ पाकल, केहू किहाँ ठेकुआ बनल, केहू दाल में के दुलहा बना के ले आइल रहे त केहू लिट्टी त केहू मकुनी त केहू फुटेहरी .. माने अजबे-गजब हाल रहे। सितम्बर के महीना रहे। हाइड पार्क में जब गुनगुनी धूप में गीत-गजल के साथे लोक राग छिड़ल त ब्रिटेन में आरा-बलिया-छपरा लउके लागल आ पूस के देहसुख वाला घाम जइसन लागे लागल।

अब नू जेके देखीं, सेही लंदन पहुँच जाता शूटिंग करे भा प्रोग्राम करे। 15-16 साल पहिले अइसन ना रहे। एह से लोग में उत्साह ज्यादा रहे अउर अफ्रीका आ यूके में भइल भोजपुरी गतिविधि के भारतीय मीडिया में भी अच्छा कवरेज मिलल।

तीन साल पहिले 2018 में हमरा के गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक समुदाय, बर्मिंघम द्वारा भोजपुरी नाइट्स खातिर आमंत्रित कइल गइल। भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद द्वारा हमरा के यूके भेजल गइल अउर एक बेर फेर यूके के भोजपुरियन के भारी जुटान भइल। ई हमरा खातिर आनंद आ गर्व के पल रहे। उहाँ हमरा के गीतांजलि साहित्य व संस्कृति बर्मिंघम सम्मान से नवाजल गइल।

अइसे त युगांडा, यूके के अलावा दुबई, मॉरिशस आ अउर कई गो देश में जाए आ भोजपुरिया लोग से मिले-जुले-जोड़े-जुड़े के अवसर मिलल लेकिन एगो सवाल बरिसन से सालत आ रहल बा कि भोजपुरिया लोग त आगे बढ़ गइल, जे मजदूर बनके गइल, उहो मालिक बन गइल। मॉरिशस में सरकारी मान्यता भी मिल गइल बाकिर अपना देश में भोजपुरी खातिर अभी पचरे गवाता। भोजपुरी एगो सियासी मुद्दा बन गइल बा आ भोजपुरिया लोग के बतावे-जतावे के पड़sता कि भाई हो जनगणना में आपन मातृभाषा भोजपुरिये बतइहा। माई आ मउसी में फरक होला ए चनेसर .. बाकी सम्मान त सभकर बा। सवाल पहचान के बा आ पहचान अपने मातृभाषा से होला। ना त अधभेसर बन जाए के पड़ी। सवाल अस्मिता के भी बा। जेतना रोटी जरुरी बा ओतने इज्जत।

देखीं, अड़सल आ छटपटात भोजपुरी के कब खुला आकाश मिलsता ?


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min940

डॉ. ( प्रोफेसर) अनिल प्रसाद

बहुत उत्साहित आ भयभीत। अनजान जगह आ अनजान लोग, नया परिवेश, नया देस, नया भेस आ बोली, एक अलग संस्कृति। बाबा के खुशी, आँख  में चमक, चेहरा पर मुस्कराहट – हमरा मन में उहाँ के कहल बात – हथुआ राज के कचहरी के घंटाघर के लेखा बाजत रहे – ‘लागल रहा कहीं ना कहीं होइए जाई!’

हम नवंबर 1991 में पटना छोड़नी आ दिल्ली पहुँच गइनी। एक हफ्ता रहला के बाद जरूरी  कागज-पत्तर लेके  मुंबई आ उहाँ से टिकट लेके सना’, यमन के राजधानी। नौकरी करे, कालेज में पढ़ावे के नौकरी, अंग्रेजी भाषा आ साहित्य के सहायक प्राध्यापक!

हम 29 नवंबर के भोर में सना’ एयरपोर्ट पर पहुँचनी, साथ में 13-14 लोग के जत्था रहे, सभे शिक्षक, सबका अपना अपना गंतव्य पर जायेके रहे। हमनी के यूनिवर्सिटी गेस्ट हाउस में ले जाइल गइल । हमार प्राचार्य (डीन) फोन कइले कि चार बजे शाम के अइहें, आ हमरा के अपना साथे ले जइहें। ठीक चार बजे शाम के एक हंसमुख आ तेज तर्रार आदमी गेस्ट हाउस के लाबी में दाखिल भइल आ हमार नाम पुछल, अब हमार एक दूसर यात्रा के शुरुआत होखे के रहे !

हम अभी यमन के राजधानी सना’ में रहनी, सना’ जे शायद समुद्र तल से  2,300 मीटर (7,500 फीट ) के ऊँचाई  पर बसल दुनिया के अनूठा राजधानी बा । इहाँ से हमरा जहां तक हमार अनुमान रहे दक्खिन के तरफ जायेके रहेl हमनीके यात्रा फेर शुरू भइल, पहाड़ से घीरल शहर, शाम के गुनगुनी धूप के बीच, फिलिप लारकिन के कविता इयाद परल जब हम देखनी की ‘मकानन के शांत लीलार पर शाम के धूप पड़ रहल बा ।‘ एह कविता में  उ मन  में बसंत के आगमन के बात करsतारें जब आदमी अपना पिछला दुख के सांत्वना के,आवे वाला समय से मिले के उम्मीद हो जाला  । हमहूँ आपन पिछला संघर्ष के दिन भुला के नया जीवन में प्रवेश करत रहनी, अइसन लागत रहे ।

पहाड़ी रास्ता, पहाड़ में बसल गाँव, आ चौड़ा सड़क पर लोग आ विदेशी गाड़ियन के अनवरत आना जाना के बीच हमनी के बात करत आगे बढ़त रहनी । प्राचार्य, डॉ अहमद अलवान अल-मदहगी (जे अब इ संसार में नइखन) के आत्मीय बात-चित से नया परिवेश-जनित हमार डर धीरे-धीरे कम होत गइल । अब हमनी के अपना गंतव्य से कुछ दूरी पर रहनी । हमरा लागल जइसे देहरादून से मसूरी जा रहल बानी । सना’ से 154 किलोमीटर (driving distance करीब 198किलोमीटर) दूर  इब्ब शहर, हमार गंतव्य, एक खूबसूरत शहर, चारों ओर से पहाड़ी से घीरल, इ जनपद के हरीतिमा देख के एकर उपनाम ‘अलोआल अखदर’ बा  जेकरा के अंग्रेजी में ‘The Green Governorate’ कहल जाला । जेतना सुंदर मनमोहक जगह ओतने सुंदर, सहज, सरल आ सभ्य लोग । प्रवासी खातिर मन में बहुत आदर सत्कार के भाव, ओहुमे भारतीय खातिर सबका से ज्यादा !आज एक दशक से ज्यादा समय हो गइल इब्ब से वापस अइले  लेकिन अभी भी ओहिजा के लोग, सहकर्मी  आ लड़ीका (students) हर मौका पर हमनीके इयाद करेला l

इब्ब शहर पहुँचत पहुँचत साँझ  हो गइल। डॉ अल-मदहगी शहर में एगो अपार्टमेंट बिल्डिंग के सामने आपन गाड़ी रोकले आ हमार सामान उतारे में मदद कइले, आ हमरा हाथ में चाभी देके इशारा से बतवले कि नीचे वाला अपार्टमेंट में हमरा रहे के व्यवस्था बा।  दूसरा दिन हम कॉलेज गइनी आउर हमार बहुत गर्मजोशी से स्वागत भइल। हम कॉलेज में पहिला भारतीय शिक्षक रहनी। कुछ समय  के बाद के बाद  आउर भारतीय लोग के नियुक्ति भइल।

कॉलेज में दूसरा देस के लोग भी रहे जेहिमे, सूडानी, मस्री, इराक़ी, टूनिशियन, कूबन, ब्रिटिश आ अमेरिकन लोग भी रहे। यमनी विद्यार्थी के शिक्षक के प्रति आदर भाव आ ओह लोग के अभिप्रेरणा के स्तर देख के अपना इहाँ के पुरनका गुरु-शिष्य परंपरा के इयाद आवे। शिक्षक लोग में  आपस में काफी आत्मीय आ सामाजिक संबंध रहे। बाजार में अचानक केहु सामने आके ‘नमस्ते’ कह के अभिवादन कर के मुस्कुरात आगे बढ़ जाई। अच्छा लागी कि घर से एतना दूर एह देस में कुछ अइसन बा जे मन के छु लेता।

जनवरी- फरवरी 1992 में हम अपना परिवार के साथे रहे लगनी। ज्योत्स्ना जी इब्ब शहर में कुछ दिन तक अकेली भारतीय महिला रहली। ओह समय में टीवी चैनल ना रहे। मनोरंजन के साधन में वीसीआर पर भारतीय फिल्म देखल जा  सकत रहे। कुछ दूरी पर अमेरीकन अस्पताल रहे जेहिमे कुछ भारतीय नर्स आ डॉक्टर लोग रहे, ओह लोग से परिचय भइल। उ लोग इब्ब से 6 किलोमीटर दूर जिबला में रहत रहे लोग जेकर काफी ऐतिहासिक महत्व बा। एक समय में इ यमन के राजधानी रहे आ इहाँ के रानी रहली रानी अरवा बिंत अहमद  अस्सुलेही। आज भी भारत से बोहरा लोग ओहिज जाला लोग।

यमन के प्राचीन समय से ही रोमन लोग Arabia Felix (The Fortunate Arabia/Happy, or Flourishing Arabia) कहे जेकरा  के अरबी में ‘यमन अल-साईद’ कहल जाला । खुशहाल, सम्पन्न, धर्मपरायण आ दानिशमंद लोग जहाँ रहल लोग । जहाँ बिलकिस आ अरवा जइसन रानी लोग भइल । जहां जबीद में Classical Arabic के केंद्र रहे, जहाँ के कॉफी (मोचा/मोका कॉफी – अल-मखा के नाम पर ) आज भी विश्व में प्रसिद्ध बा, उ देस में इब्ब शहर आ ओकर अगल बगल में काफी घूमे वाला जगह रहे । हमनी हर सप्ताह के अंत में कहीं ना कहीं घूमें निकाल जाईं । जबल (= पहाड़ी ) अररब्बी, जबल बादान, जबल सबर ( Taiz Governorate में ) वादी (=valley ) बना, वादी अल-जन्नl, अल-मशवरा आदि कइ जगहन पर प्रकृति के बहुत मनोरम दृश्य देखे के मौका मिलल । बादान के हमार साथी शेख अमीन नो’मान ( पिछला बर्ष के स्वर्गवासी हो गइलन) के आदर सत्कार आ स्नेह अभूतपूर्व रहे !

कॉलेज ऑफ एजुकेशन जहाँ हम कार्यरत रहनी आउर जे सना’ विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रहे 1996-97 में इब्ब विश्वविद्यालय बना दिहल गइल। एकर पहिलका प्रेसीडेंट भइले डॉ नासेर  अल-औलकी (पिछला महीना  उनकर स्वर्गवासी भइला के दुखद खबर आइल रहे )। डॉ अल-औलकी, यमन के पूर्व कृषि मंत्री,  एक  सरल, सहज आ सजग व्यक्तित्व के मालिक रहले, सही अर्थ में एक  अनुभवी शिक्षाविद। उनका डॉ अब्दुसलाम अल-जऊफी जइसन तेज आ प्रो–ऐक्टिव आदमी ( जे बाद में यमन के स्कूल  एजुकेशन के शिक्षा मंत्री भइले ) के सहयोग मिलल आ दूनू आदमी मिल के इब्ब इनिवर्सिटी के बहुत विकास कइल लोग । ओहलोग के टीम में डॉ हसन अब्दु अल-मलिक जइसन उच्च शिक्षा प्राप्त अनुभवी आ डॉ अब्देल शाफी ( अब स्वर्गवासी ) जइसनअनुभवी प्रशासक  लोग रहे । एह लोग के साथ हमरा भी एक दशक से ऊपर अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष के रूप में काम करे के अवसर मिलल।

अगर एह लेख में हम यमन के शहर अदन के चर्चा ना करीं त उ उचित ना होई। यमन के खूबसूरत शहर अदन ब्रिटिश कालोनी रहे जेकर के बाम्बे से कंट्रोल कइल जात रहे। जब हमार बाबूजी आ ससुरजी यमन घूमे आइल लोग त एडन जाएके के कहल लोग! ओहलोग स्कूल में अदन के बारे में पढ़ले रहल लोग। बहुत लोग जे E M Forster के  A Passage to India पढ़ले होई ओकर जानकारी होई कि ओह उपन्यास के एगो पात्र Mrs. Moore के मौत इंग्लैंड  जात में अदन में हो जाता। जे भी भारत से इंग्लैंड जात रहे ओकरा अदन होके ही जाएके रहे। हमनीके अदन गइनी आ उहाँ गाँधी जी से संबंधित सब जगह देखनी आउर हमनी के देखावे वाला रहनी प्रो जयराम सिंह जी जे अभी नई दिल्ली में रहिले । अदन में भारतीय मूल के रहेवाला  लोग के जनसंख्या काफी बा । उहाँ हिन्दू देवी देवता के मंदिर भी बा । जहाँ बाबूजी लोग के जाके बहुत खुशी आ संतोष भइल । आज भी अदन में ‘सीधा’, ‘चटनी’, ‘अचांर’, ‘खिछुरी’ ‘धोबी’, ‘जलेबी’, ‘बनिया’, ‘बनियानी’ (अदन में एगो मोहल्ला के नाम )  आदि शब्द ओहिजा  के अरबी भाषा के हिस्सा बा !

यमन प्रवास हमरा आ हमरा परिवार के जीवन  यात्रा के एक अहम मुकाम बा। यमन से वापस अइला के बाद हम लीबिया आ सऊदी अरबिया में एक दशक तक काम कइनी लेकिन जवन आदर आ स्नेह भारतीय आउर भारतीय संस्कृति से जुड़ल चीजन से यमन में रहे उ कहीं दुसर जगह ना देखे में आइल। वइसे भारतीय शिक्षक के आदर सब जगह बा । आउर मध्य-पूर्व के देशन के अपेक्षा यमन आर्थिक दृष्टि से बहुत समृद्ध नइखे (आज यमन के स्तिथि आउर खराब हो गइल बा ) लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से उ बहुत उत्कृष्ट देस ह। प्राचीन समय से skyscrapers(माटी के बनावल ) यमन के ही शिबाम तरीम में ही बा !अरबी कविता आ संगीत इहाँवा के आम लोग के जबान पर रहेला । यमन के पहाड़ी एलका में सीढ़ीनुमा खेती पर्यटक खातीर अभूतपूर्व दृश्य बा । इहाँके मकान बनावे के तरीका वस्तु-कला के एक अनूठा उदाहरण बा।

स्मृति में बहुत बात बा लेकिन समय आ स्पेस के सीमा बा ! आपन संस्मरण के अंत हम एह बा से करे के चाहब की सरहद त हमनी बाँट लेले बानी लेकिन हवा, बादल, बरखा, बूनि, चिरई-चुरुङ के केहु अभी ले नइखे  बाँट सकल। हमनी नौकरी के खोज में (as a part of work diaspora )धरती के कोना-कोना छानमारतानी  सन। दूर  से दूर गइला पर इ बुझाता कि उहाँ भी आपने लोग बा, उहे अपनापन, उहे स्नेह बा जे दू देस, भाषा, परिवेश आ संस्कृति के आदमी के नजदीक कर देता । जेतना लोग हमरा 17 – 18 बरिस के यमन के प्रवास में हमरा संपर्क में आइल ओह लोग के हम इयाद करीले, उ लोग हमरा स्मृति में इब्ब शहर के हरियाली अइसन हमेशा ताजा रहेला लोग । काहे ना रही ? आखीर ओ जमीन के टूकड़ा पर के सुरुज तs आपने रहले!


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20213min1490

मनोज भावुक

भूमध्य रेखा पर बसल पूर्वी अफ्रिका के एगो छोट देश युगाण्डा (UGANDA ) अपना पूर्व राष्ट्रपति इदी अमीन के क्रूर, खौफनाक, तानाशाही आ आदमखोर चरित्र के चलते विश्व के मानस पटल पर ओही तरे छा गइल, जइसे हिटलर के चलते जर्मनी आ ओसामा बिन लादेन के चलते अफगानिस्तान।

इदी अमीन के चलते युगाण्डा के छवि पर जवन दाग लागल वर्तमान राष्ट्रपति वाई. के. मुसेवनी अपना उदार स्वभाव आ दूरदर्शी व्यक्तित्व से काफी हद तक ओकरा के धो देले बाड़न, जवना के सुफल बा कि विश्व के तमाम देशन के लोग, जवना में भारत सबसे आगे बा, आपन बिजनेस आ इण्डस्ट्री लगाके बहुत शांति आ सुकून के जिन्दगी जी रहल बा।  हमरा ई कहे में तनिको गुरेज नइखे कि युगाण्डा में एगो छोट गुजरात बसल बा। सब कइल-धइल ओही लोग के ह। उहे लोग सबसे पहिले आइल इहाँ। बाद में तमिल आ तेलुगु भाषी लोग भी पसर गइल। अब त राजस्थानी, पंजाबी, मराठी आ मलयालयी लोग भी नीमन संख्या में बा। बस, मुठ्टीभर अगर केहू बा त ऊ भोजपुरिया लोग (उत्तर-प्रदेश आ बिहार के लोग)। एह लोग के खोजल मरूथल में पानी खोजला लेखा बा। ‘ईद के चाँद’ लेखा कौनो खासे मौका पर एह लोग के दीदार होला। मंदिर में, क्लब में या कवनो सभा समारोह मे एह लोग (भोजपुरिया लोग) के पहचानलो  मुश्किल बा। दोसरा कवनो भाषा के लोग के आप आसानी से पहचान लेब, बाकिर इहाँ भोजपुरिहा के खोजल अन्हार मे सूई खोजला लेखा बा। दूगो मराठी, दूगो बंगाली, दूगो पंजाबी या दूगो गुजराती होइहें त ऊ अपना-अपना भाषा में बतिअइहें, खट से पहचान हो जाई। बाकिर दूगो भोजपुरिहा होइहें त या त हिन्दी बोलिहें या अंगरेजी छटिहें। रउरा पासे में खड़ा रहिहें बाकिर रउरा  हवा ना लागी कि ई हमरा घर के सवाँग हउएँ। ‘लगही पियवा परिचय नाहीं’। हिन्दी त हिन्दुस्तान के हरके राज्य के लोग बोलेला, एह से ई कहल मुश्किल बा कि पास में खड़ा आदमी जे हिन्दी में बतिया रहल बा, उत्तर प्रदेश या बिहारे के होई। अइसना में भोजपुरी एसोसिएसन के बारे में सोचल पागलपने होई। बाकिर बिना पागलपन के कवनो चुनौती भरल काम होखबो ना करे।

आज से साल भर पहिले ठीक 21 अगस्त के ऑल इण्डिया एसोसियसन ऑफ युगाण्डा के तत्वाधान में ‘स्वतंत्रता दिवस’ पर एगो सांस्कृतिक कार्यक्रम (INDIA DAY CELEBRATIONS-2004 ) होत रहे। दर्शकदीर्घा में हमहूँ रहनी। केरला समाज, मराठा मण्डल, राजस्थानी ग्रुप, पंजाबी समाज सभे अपना-अपना क्षेत्र के लोकगीत, लोकनृत्य प्रस्तुत कइलस। हमरा मन में टीस उठल कि का उत्तर-प्रदेश आ बिहार से केहू फगुओ गावे वाला नइखे। हमनी के एतना कंगाल बानी जा कि हमनी के पास देखावे खातिर कुछुओ नइखे?  हमनी के पास आपन कल्चर नइखे कि गीत-संगीत नइखे? आ जब सब बा त हम इहाँ का करत बानी?….हमरा भीतर के भोजपुरी के कीड़ा काटे लागल हमरा के। …. साँच पूछीं त ओही समय हमरा  मन के भीतर  Bhojpuri Association of Uganda  के बीजारोपण हो गइल।….. आ फेर तलाश शुरू हो गइल युगाण्डा में भोजपुरियन के। नगरे-नगरे, द्वारे-द्वारे। बाकिर हमरा कवनो खास सफलता ना मिलल। …..हँ, एने मई महिना में कुछ भोजपुरिया परिवार समेत कम्पाला के सुप्रसिद्ध( S.D.M. Temple) हनुमान मन्दिर में एक-दूसरा से मिलल जरूर रहलें आ हमरा विचार के कुछ बल मिलल रहे।  तबो हम भीतर से सशंकित रहनी।

हमरा सपना के ठोस धरातल मिलल आजमगढ़ के रहनिहार बाबू अजय सिंह से मुलाकात के बाद। अजय बाबू बहुते मिलनसार आ सामाजिक आदमी। ऊ कहलें कि ‘बाबू साहेब अब हमनी के एक से दू हो गइनी जा, ई काम जरूर होई।   2  जुलाई के रात हमनी दूनू आदमी भोजपुरिहा लोगन के एगो लिस्ट बनइनी जा। संस्था के नाम ( जवन कि हम अपना मन में पहिलहीं से सोच के रखले रहनी) धराइल- भोजपुरी एसोसियसन ऑफ युगाण्डा (BAU)।  BAU के पहिला मेम्बर हम (मनोज ‘भावुक’) बननी। दूसरा अजय सिंह। तीसरा हमार पत्नी अनिता सिंह आ चउथा अजय बाबू के पत्नी संध्या सिंह।   ऊ एसोसियसन के पहिला मीटिंग रहे। स्थापना समारोह खातिर भोजपुरियन के खोज-बीन शुरू हो गइल।

संयोग देखीं आज से साल भर पहिले जवना तारीख के ( 21 August ) INDIA DAY CELEBRATION- 2004 के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भोजपुरियन के भागीदारी ना रहला से हमरा मन में टीस उठल आ ओह टीस से  (BAU) के स्थापना के बीजरोपण भइल, ठीक ओही तारीख के यानी 21 अगस्त 2005 के BAU के स्थापना के घोषण हो गइल।

21 अगस्त 2005 दिन रविवार, कोलोलो, युगाण्डा में ‘भोजपुरी एसोसियसन ऑफ युगाण्डा के ‘स्थापना समारोह’  के अवसर पर उमड़ल भीड़ देख के हमार आँख छलक गइल। ढेर लोग के जुबान पर इहे बात रहे कि ‘ हम त जानत रहनी ह कि इहाँ हमहीं अकेले भोजपुरिहा बानी’।    समारोह में कुल 41 आदमी शिरकत कइलें। 10-12 आदमी फोन कइल कि आज हमार ड्यूटी बा, बहुत जरूरी काम पेण्डिग बा। हम आ ना सकब, एकर अफसोस बा, बाकिर हम मन से कार्यक्रम मे शामिल बानी। घरी-घरी ऊ लोग पूछे कि अभी का चल रहल बा। केतना लोग आइल बा। कहाँ-कहाँ से लोग जुटल बा। हमरा जिला के केहू बा कि ना?  कुछ लोग ड्यूटी छोड़ के भाग आइल। कुछ लोग नाइट ड्यूटी कइले रहे, आँख लाल रहे, तबो आइल रहे। कार्यक्रम के शुरू होखे से पहिलहीं पीट-पीट के बरखा होखे लागल शायद भोजपुरियन के ई प्रेम, उत्साह आ उमंग देख के भगवानो के आँख झरे लागल। भोजपुरिया जवान बरखा-बूनी के परवाह ना कइलें। भींज-भींज के लोग-बाग आइल।   समारोह में शामिल 41 आदमी हमरा खातिर 41लाख आदमी रहलें। हम खुशी से पागल रहनी। 41 में एगो भाई उतरांचल के, एगो मिथिलांचल के आ एगो कानपुर के रहलें। शेष 38 खाँटी भोजपुरिया, जवना में सात जानी भउजाई रहली आ एगो हमार पत्नी। यानी 8 गो मेहरारू आ 30 गो मरदाना। अभी हम बाल-बच्चा के गिनबे ना कइली ह। एहू लोग के संख्या आधा दर्जन से कम ना रहे।   कार्यक्रम के शुरूआते मे हम कहनीं कि आज त मन करता कि भाई लोग फागुवा-चइता गावे आ भउजाई लोग कजरी-झूमर। सभे ठठा के हँसल। हँसी के एह फुलझड़ी से कार्यक्रम के शुरूआत हो गइल। दोपहर के एक बजत रहे। लंच के टाइम रहे। भोजन समारोह से कार्यक्रम के शुरूआत भइल। खा-पी के सभे आपन-आपन सीट धके जमके बइठ गइल। सभे चकचिहाइल रहे कि अब का होई?  एह युगाण्डा के धरती पर ई कवन करिश्मा हो रहल बा। भोजपुरियन के मिलन हो रहल बा। ई मिलन समारोह ह। अंग्रेजी में कादो एकरे के गेट-टुगेदर कहल जाला। बाकिर हम सोच लेले रहनी कि हम एकरा के खाली गेट-टुगेदर ना रहे देब। एकरा के एगो यादगार समारोह बनाएब। जे मिलल बा ओकरा के बिछड़े ना देब। सब कोई बकायदे फार्म भरके सदस्य बनल, सदस्यता शुल्क जमा कइलस यानी कि संस्था के फाइल में सबकर नाम, पता, गाँव,जिला, फोन, ई-मेल दर्ज हो गइल। अब केहू कहाँ जाई आ जाये खातिर ई संस्था थोडे बनता। इ त आवे खातिर बनत बा। आवत जाईं जुटत जाईं…. दोसरों के जोड़त जाईं। ई त युगाण्डा के भोजपुरियन खातिर एगो कामन प्लेटफार्म बनत बा, जवना के सख्त जरूरत रहल ह।

घीव के दीया जराके भगवान के पूजन भइल आ ठीक दू बजे महफिल पर भोजपुरिया रंग चढ़े लागल। सभा के संचालन मनोज ‘भावुक’ स्वागत भाषण शुरू कइलें। (BAU) यानी कि ‘भोजपुरी एसोसिएसन आफ युगाण्डा’  के स्थापना खातिर मन मे परल बीज के अँखफोर होखे के कहानी सुनवलें। सबके हार्दिक स्वागत कइलें आ फेर आज के कार्यक्रम के अध्यक्षता खातिर Mukwano group of companies  के जनरल मैंनेजर आजमगढ़ के रहनिहार श्री वी.पी.त्रीपाठी आ मुख्य अतिथि के रूप में  Polysac Industry के मैंनेजर श्री  अखिलेश मिश्रा के मंच पर आमंत्रित कइलें। एकरा बाद अजय सिंह सभा में आइल सब भोजपुरियन के एक-दोसरा से परिचय करवलें। लोग जान गइल कि के कवना जिला से आइल बा, कवना कम्पनी में आ कवना पोस्ट पर काम करेला वगैरह-वगैरह आ फेर ऊ मंच मनोज ‘भावुक’ के सुपुर्द कर देले। एकरा बाद ‘भावुक’ के लमहर भाषण भइल।  ‘भावुक बतवलें कि (BAU) के स्थापना के का जरूरत बा।

  1. कॉमन प्लेटफार्म
  2. ऑल इण्डिया एसोसियसन ऑफ युगाण्डा के कार्यक्रम में भोजपुरियन के उपस्थिति।
  3. तीज त्यौहार पर एकजुट होके गावल-बजावल, मिलल-जुलल।
  4. विश्व के तमाम देशन मे बनल भोजपुरी संगठन से जुड़ल। सूचना, योजना, विचार आदि के आदान-प्रदान।
  5. विश्वजाल(internet) पर फइलल भोजपुरी में युगाण्डा के भी एगो अध्याय जोड़ल।
  6. भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन से जुड़ल आ जोड़ल। (हरेक भोजपुरिया के कम से कम एगो भोजपुरी पत्रिका, खरीद के मंगावे के चाहीं, पढ़े के चाहीं आ चिट्ठी-पत्री करेके चाहीं। एह से ज्ञान आ मनोरंजन के अलावा भोजपुरी पत्रकारिता के बल मिली, भोजपुरी के प्रचार-प्रसार होई)।

भोजपुरी साहित्य के चर्चा करत ‘भावुक’ कहलें कि भोजपुरी क्षेत्र के दिग्गज साहित्यकार लोग माई के फाड़ में से निकाल-निकाल मउसी के आँचर भरत रहल लोग। एकरा के अइसे समझीं कि ऊ लोग यशोदा मइया( हिन्दी) के सेवा में अइसे अझुराइल लोग कि देवकी मइया( भोजपुरी) एकदम से बिसर गइली। ना त आज भोजपुरी के कुछ दोसरे तस्वीर रहित। एकरा बावजूद भोजपुरी में जवन साहित्य-सृजन हो रहल बा, ओकरा के लेके हमनी कवनो भाषा के समकक्ष खड़ा होखे में समर्थ बानी। हिन्दी खातिर जौन हमनी के कुर्बानी देहनी जा आ दे रहल बानी जा, ओकर कवनो अफसोस नइखे। ओकरा खातिर हमनी के छाती उतान बा। बाकिर मातृभाषा के भूलल-बिसरावल या ओकरा प्रति ना सोचल शर्म के बात बा। मातृभाषा महतारी लेखा होले आ महतारी के स्थान देवता-पीतर से ऊपर बा। पहिले घर में दीया बार के मन्दिर में दीया जराईं। घर में अन्हार रही त ओह में दलिदर घुस जाई। भाई हो एही दलिदर ले भगावे के बा। एकरे खातिर (BAU) के स्थापना कइल जा रहल बा।  भोजपुरी देश-विदेश पर चर्चा के अंतर्गत खास क के दूगो देश मारिशस आ गुयाना में भोजपुरियन के स्थिति पर बड़ी विस्तार से चर्चा भइल।  मारिशस के नाम ‘मारिच द्वीप’ कइसे पड़ल। इहाँ भोजपुरिया कइसे अइलें। 12 लाख आबादी वाला मारिशस में आठ,साढ़े आठ लाख आबादी वाला भोजपुरी भाषा के आज का स्थिति बा। भोजपुरी बहार (मारिशस टी.वी के कार्यक्रम ), मारिशस में भोजपुरी के किताब, नाटक प्रतियोगिता आदि पर रोचक ढंग से चर्चा करत सरिता बुधु (महात्मा गाँधी संस्थान), श्रीमती सुचिता रामदीन, श्रीमती सीतारामयाद आ श्री दीमलाला मोहित आदि के योगदान के भी चर्चा भइल।  एह तरे गुयाना के राष्ट्रपति भरत जगदेव जे कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हउवन, के चर्चा करत बतावल गइल कि केह तरे  169 साल पहिले गुयाना पहुँचल गिरमीटिया शासन-सत्ता पर आपन कब्जा जमा लेले बाड़न।  भोजपुरी के पढ़ाई-लिखाई के बारे में बात-चीत करत मनोज ‘भावुक’  कहलें कि भोजपुरी अब इनार-पोखरा, खेत-खलिहान आ बँसवारी-घोंसारी से यूनिवर्सिटी आ पार्लियामेंट तक में पहुँच गइल बिया। एह में एम.ए. आ पी.एच.डी. हो रहल बा। लगभग हरेक विधा-कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, यात्रा वृतांत, गजल, संस्मरण, व्याकरण, शब्दकोष, मुहावरा-कोष आदि पर उच्च श्रेणी के किताब उपलब्ध बा। भोजपुरी के आठवीं अनुसुची में शामिल करे खातिर संसद में माँग उठावल गइल बा। इहो दुनिया के एगो अचरज बा कि एगो भाषा (भोजपुरी) दुनिया के 14 गो देश में 16 करोड़ लोग बोलेला, तबो एकरा के 8 वीं अनुसुची में शामिल नइखे कइल गइल।   भोजपुरी पत्रकरिता के चर्चा कई बेर भइल। एह बात पर बहुत जोर देहल गइल कि हरेक भोजपुरिया के ई नैतिक जिम्मेवारी बा कि उ कम से कम एगो भोजपुरी पत्रिका खरीद के जरूर पढ़ो। भोजपुरी के लगभग सब महत्त्वपूर्ण पत्रिकन के चर्चा भइल आ साथही विश्व भोजपुरी सम्मेलन, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद, भोजपुरी संस्थान, रंगश्री आदि भोजपुरी के कई गो महत्त्वपूर्ण संस्थान के योगदान पर भी मनोज भावुक प्रकाश डललन।   एकरा बाद चर्चा भइल इलेक्ट्रानिक मीडिया के- भोजपुरी के कैसेट, भोजपुरी सिनेमा, धारावाहिक आ टेलिफिल्म के।   ‘भावुक’ कहले कि भोजपुरी के बर्बाद करे में भोजपुरी के अलूल-जलूल कैसेटन के सबसे बड़ हाथ बा। एह कुकुरमुत्ता नियर फइलत भकचोन्हर गीतकारन के बियाइल कैसेटन में लंगटे होके नाचत बिया भोजपुरी संस्कृति। एहनिये के चलते भोजपुरी के नाम पर लोग नाक-भौंह सिकोड़ेला। एह पर रोक लागल जरूरी बा, आ साथ ही जबाब में भोजपुरी के उच्च श्रेणी के गीत जवना में भोजपुरिया संस्कृति के दुलहिन सज-धज के आवस आ सबकर मन मोह लेस, अइसन गीतन के कैसेट बाजार में आवे के चाहीं।  भोजपुरी सिनेमा पर चर्चा करत ‘भावुक’ जानकारी दिहलें कि भोजपुरी सिनेमा के विकास-यात्रा’ नामक उनकर एगो शोध-पुस्तक बा, जवना में लगभग दौ सौ (200) भोजपुरी फिल्म के कथा, गीत-संगीत, कलाकार आदि के डिटेल्स बा, साथ ही भोजपुरी सिनेमा के इतिहास, भोजपुरी धारावाहिक, टेलीफिल्म आ सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक-अभिनेता जइसे कि अमिताभ बच्चन, सुजीत कुमार, राकेश पाण्डेय, कुणाल सिहं, निर्माता मोहन जी प्रसाद, अशोक जैन, विनय सिन्हा, आदि के साक्षात्कार भी शामिल बा।  साथ ही एह घरी के कुछ नया फिल्मन के चर्चा भइल जइसे कि ‘पण्डी जी बताई ना बियाह कब होई’। ई फिल्म एह घरी पश्चिम बंगाल में खूबे धूम मचवले बा।  के डी एम प्रोडक्शन के शिवम श्याम त्रिपाठी के फिल्म ‘दुलहिनिया चलल ससुराल’ में हिन्दी मूवी के मशहूर हिरोइन जूही चावला एगो विधवा के रोल में बाड़ी। ‘पण्डीजी बताई ना बियाह कब होई’ में भी हिन्दी हिरोइन नगमा काम कर रहल बाड़ी।   बिग बी के भी एगो भोजपुरी फिल्म में आवे के खबर सुनाता।   एकरा अलावा ‘नइहर के चुनरी’ पिया के साड़ी’ जवना के शूटिंग बलिया में भइल आ श्री उमेश कुमार सिंह (नई दिल्ली) के देख-रेख में निर्माणाधीन फिल्म ‘सती-बिहुला’ के भी चर्चा भइल। भोजपुरी सिनेमा खातिर कहानी के बारे मे ऊ कहलें कि सोरठी वृजाभार, सीत-वसंत या आचार्य पाण्डेय कपिल के उपन्यास ‘फुलसुंघी’ मे एतना फिल्मी मटेरियल बा कि अगर एह पर ढंग से फिल्म बने त एह में कवनो शक नइखे कि ऊ भोजपुरी सिनेमा खातिर मील के पत्थर साबित होई। ‘फुलसुघीं’ त भोजपुरी के एगो अइसन उपन्यास बा, जेके जेतने पढ़ी, कम बा। हम एकर नाट्य रूपांतर कइले बानी, मंचन भी भइल बा। एह पर फिल्म या धारावाहिक जरूर बने के चाहीं।  भोजपुरी सिनेहस्ती से भेंटवार्ता आ फिल्म शूटिंग के रोचक आ हास्य संस्मरण भी सुनवलें ‘भावुक’, जवना के सुन के लोग लोट-पोट हो गइल।   आ सबसे अंत में चर्चा भइल (Internet ) पर। ‘भावुक’ सूचित कइले कि भोजपुरी के एगो बेवसाइट ( www.bhojpuri.org) अभी निर्माणाधीन बा, तबहूं ओह पर बहुत सामग्री उपलब्ध बा। देश-विदेश के भोजपुरियन से बात-चीत करे के त ई एगो बहुत बढ़िया प्लेटफार्म बा। एही प्लेटफार्म के जरिये यू-एस ए, यू.के, सिंगापुर, मलेशिया, दक्षिण अमेरिका, मारिशस  आ दुबई जइसन जगह से (BAU) के स्थापना समारोह पर शुभकामना आ बधाई से भरल कई गो चिट्ठी आइल बा। (BAU) के स्थापना के घोषणा के ई असर भइल कि अमेरिका में भी एगो भोजपुरी एसोसिएसन (Bhojpuri association of America) के निर्माण शुरू हो गइल। लेकिन ई प्रयास अभी इण्टरनेटी बा, लोग सिर्फ (e-mail) से  ही एह ग्रूप (Bhojpuri-usa) से जुड़ल बा। भोजपुरी के मुख्य बेवसाइट (www.bhojpuri.org) के (A apna log- Database of Bhojpuri) पेज मे आप जाईं आ जवना देश के भोजपुरिया से बात-चीत करे के बा या आप ओह देश में जात बानी आ सम्पर्क करे के बा त आप इहाँ ओह देश में रहे वाला भोजपुरी भाई-बहिन के नाम, पता, इमेल फोन आदि एह (Database) पेज पर खोज सकत बानी। एह साइट से जुड़ल सिंगापुर के भाई शाशिभूषण राय के भी एगो साइट बा ‘भोजपुरी नालेज कल्चर। एहू पर भोजपुरी के कुछ सामग्री बा। … हम सिंगापुर से ही जुड़ल एगो ताजा खबर सुनावत बानी कि भाई नीरज चतुर्वेदी के नेतृत्व में सिंगापुर गर्वनमेण्ट के खाता में ‘सिंगापुर भोजपुरी रजिस्टर्ड हो गइल। ई हमनी खातिर एगो अच्छा खबर बा। एकरा वास्ते (BAU) के तरफ से नीरज भाई के बधाई। त कहे के मतलब कि इण्टरनेट पर बहुत काम हो रहल बा। लोग छटपटाता आपस में बतियावे खातिर, एक दूसरा के जाने खातिर। इहाँ तक कि कुछ लोग जे सौ-दू सौ साल पहिले भारत छोड़ के दोसरा देश गइल ( गिरमिटिया) ऊ अपना पूर्वज के पता लगावे खातिर तड़प रहल बा। अइसन कई गो चिट्ठी हमरा पास आइल बा। भोजपुरी बेवसाइट पर एह समस्या के निदान के भी उपाय हो रहल बा।….. भोजपुरी साहित्य के इण्टरनेट पर ले आवल जरूरी बा ताकि दुनिया के लोग एकर लाभ उठा सके। भोजपुरी बेवसाइट पर मात्र एगो साहित्यिक किताब मनोज ‘भावुक’ के गजल-संग्रह ‘तस्वीर जिन्दगी के’ उपलब्ध बा, उहो रोमन में। दरसल भोजपुरी में एगो पूर्णत साहित्यिक बेवसाइट के जरूरत बा।   ‘भावुक’ आपन भाषण एह अनुरोध के साथ खतम कइलें कि हमनी इहाँ एकजुट होके  BAU  के  मजबूत करीं जा। एकरा के विश्वजाल(Inaternet) पर फइलल भोजपुरियन से जोड़ीं जा, कम से कम एगो भोजपुरी पत्रिका अवश्य पढ़ीं जा। आज जवन कामन प्लेटफार्म बनता, समय-समय पर आके फगुआ,कजरी, चइता गाईं जा। आन्नद मनाईं जा। … हमनी में केहू गायक या कलाकर निकले त युगाण्डा के कार्यक्रम में भोजपुरी के भी उपस्थिति दर्ज कराई जा। समय-समय पर विचार गोष्ठी करी जा। … (BAU) के सुचारू रूप से संचालन खातिर जुझारू आ दुधारू यानी कि श्रम देवे वाला आ धन देवे वाला दूनू तरह के लोगन के अधिक से अधिक संख्या में जोड़ी जा। अगिला समारोह में संस्था के एगो समिति बने, एगो कमेटी बने, एगो रणनीति बने… आ हमनी के भोजपुरी के मशाल जरा के चल पड़ीं जा। ….. जै भोजपुरी….. जै भोजपुरी संसार।

एक-डेढ़ घण्टा के ई लमहर भाषण कइसे खतम हो गइल लोगन के पते ना चलल। दरअसल युगाण्डा के भोजपुरिया खातिर ई सब बातचीत एकदम नया रहे। सभे अपना के एक नया अनुभव से गुजरत महसूस कइल। एकरा बाद कार्यक्रम के विराम दिहल गइल। लोग चटनी आ समोसा के साथे कोकोकोला के चुसकी लिहल। फेर मनोज ‘भावुक’ (BAU)  स्थापना समारोह पर देश-विदेश से आइल कुछ चुनिन्दा चिट्ठियन( शुभकामना आ बधाई) के पढ़ के सुनवलें।…. देश से आइल चिट्ठियन में भोजपुरी संस्थान, सम्मेलन आ परिषद के अध्यक्ष आ नामी-गिरामी साहित्यकार लोग के आशिर्वाद रहे त विदेशन से विभिन्य देश के भोजपुरी संगठन के अध्यक्ष, साइट के माडरेटर आ भोजपुरी के खोजबीन करें वाला भाई बहिन के उद्गार आ विचार रहे।

मारिशस से श्रीमती सुचीता  रामदीन त अपना चिट्ठी में (BAU) खातिर एगो बड़हन लेख भेजे के वादा कइली। साथही ईहो सूचना देली कि मारिशस में भी अगिला भोजपुरी सम्मेलन के विचार बा। रंगश्री, दिल्ली अध्य्क्ष श्री महेन्द्र सिंह सास्कृतिक कार्यक्रम करत रहे के सुझाव भेजनी। विदेश से एगो भाई सतीश उपाध्याय सवाल कइले कि हम दार-ए-सलाम आ तंजानिया में भोजपुरी एसोसियशन बनावल चाहत बानी, कुछ रास्ता बतावल जाय कि हम कइसे का करीं। मलेशिया से श्री रमांशकर सिंह ई. मेल कइले कि भाई तू लोग कइसे एसोसियशन बना ले ल लोग, हम त खूब कोशिश के बावजूद 5 आदमी से बेसी ना जुटा सकनी। पिछला साल होली मनइनी जा बाकिर ओमे खाली भोजपुरी ना पूरा उत्तर भारतीय रहले। बाकिर हमनी पूरा प्रयास में बानी जा। सिंगापुर से भाई नीरज चतुर्वेदी के पत्र गौर करें लायक बा- (Manoj Bhai, that Graet work done by you in Uganda. I was just thinking if we can replicat this “Bhojpuri Group” across  world  e.g. we have already  Bhojpuri Group in Singapore, Bangalore, and Delhi and it easily replicated to Guyana, Surinam ,south Africa, Thailand,Malaysia, Canada etc. ) श्री दीपेन्द्र सिन्हा के प्रयास सराहनीय बा-( It is interesting to know that these is a Bhojpuri samaj in Uganda. I run a Bihari organization in San Francisco Area and invite all bihari People and Bhojpuri group to join me at the following-group. yahoo.com/group dipendra sinha ). अमेरिका से शैलेश मिश्रा (USA) में रहे वाला भोजपुरियन खातिर एगो ग्रुप बनवले बाड़न । Group name- Bhojpuri- USA Group home page – group.yahoo.com/group/bhojpuri-USA Group Email-bhojpuri-usa@yahoogroups.com  एही तरे युनाइटेड किंगडम(U.K.) में भोजपुरी के एगो ग्रुप बनवले बाड़न राजेश पाण्डेय।      bhojpuri_ukgroup@yahoo.com     दक्षिणी अमेरिका से एगो बहिन के ग्रिटिंग्स आइल बा- (Pranam, Manoj Bhaiya. Greetings from a Bhojpuri bahan from south America. I am 4th generation PIO. I see that you are from Uganda are you a descendant of immigrants (girmitya) like myself or are you all just Indian who have there to live/work? I am Searching for descenants of Girmityas around the Globe. with kind rigands- Nanda.  कोलकाता से पहरूवा के सम्पादक भाई विमल राय फोन से हमरा के बधाई आ शुभकामना देहले।  करीब 30-35 गो मेल हमरा पास आइल बा, सबसे समेटल संभव नइखे। दरअसल हम डाक या फोन से केहू के BAU  के स्थापना के सूचना ना देले रहीं । भारत से कुछ साहित्यिक मित्र लोग के शिकायत आइल बा कि तू हमरा के खबर ना देल। हम क्षमा चाहब। ई सूचना ओही लोग के दीहल गइल रहे जे (Internet) से हमरा सम्पर्क में बा। डाक विभाग के कछुआ चाल के चलते पत्राचार के मन ना बनल पर आगे से हम ध्यान राखब।   मनोज भावुक चिट्ठी पढ़ला के बाद कहले कि आप सब देखत हई कि केह तरे दुनिया भर में भोजपुरी के ग्लोबलाइजेशन हो रहल बा। एही सिलसिला में एगो कड़ी के रूप में BAU के स्थापना कइल जा रहल बा। BAU एगो कामन प्लेटफार्म बा युगाण्डा के भोजपुरियन खातिर। Internet पर Bhojpuri website  एगो कामन प्लेटफार्म बा दुनिया भर के भोजपुरियन खातिर। हम एगो बात इहाँ कहल चाहब कि पत्र-पत्रिका भी एगो कामन प्लेटफार्म ही होला। हमनी ( BAU) आज जवन कर रहल बानी,  पत्रिका में छपी, भारत के लोग जान जाई। दुनिया भर के लोग जवन करता, ऊ पत्रिका में छ्पता त हमनी के जान जात बानी। एह से पत्र-पत्रिका से जुड़ल त अनिवार्य बा। हम विश्व के तमाम भोजपुरी संगठन के एगो ई-मेल करे जा रहल बानी, जवना में भोजपुरी के समस्त पत्र-पत्रिकन के सूची(आ पता) जारी करब आ सबसे निहोरा करब कि एह पत्रिका से, प्रिंट मीडिया के एह कामन प्लेटफार्म से अवश्य जुड़ीं, ना त हमनी के (Organisation) अधूरा रह जाई आ हम आप सबसे भी उम्मीद करत बानी कि आप बहुत जल्दी भोजपुरी पत्र-पत्रिकन के सदस्य बनब ।….Internet पर एगो भोजपुरी पत्रिका निकालल बहुत जरूरी बा। हम भोजपुरी पत्रिकन के सम्पादक लोग के भी एगो चिट्ठी लिखे जा रहल बानी कि अगर सम्भव होखे त आपन पत्रिका के  Internet से अवश्य  जोड़ी।   एकरा बाद मनोज भावुक सभा में उपस्थित भाई लोग के आपन उद्गार व्यक्त करें खातिर आमंत्रित कइलें। मात्र दूगो नाम आइल। अधिकांश लोग के इहे कहनाम रहे कि अगिला बार। कुछ लोग इहो कहत सुनाइल कि हम त सोचनी कि खाली दाल-भात यानी कि भाई के भवधी होई, बाकिर इहाँ आके त आँखे खुल गइल। उद्गार व्यक्त करें वाला दूगो भाई लोग दुइये शब्द में बहुत बड़ बात कह गइल-‘आपन भोजपुरी एतना ऊपर उठ गइल आ हमनी सुतले बानी जा।… अब हमनी के जाग जाये के चाहीं। एह दूनू भाई लोग के बोलला के बाद कुछ लोग अउर जोशिआइल। ऊ लोग मंच पर आके भोजपुरी के नाम के नारा लगावल, प्रणाम कइल आ संकल्प लीहल कि हमनी भोजपुरी खातिर कुछ करब ।

स्थापना समारोह के दूसरा चरण सांस्कृतिक कार्यक्रम रहे। बहुत जोर लगावल गइल कि भाई लोग में से केहू कुछ कढ़ावे खातिर राजी हो जाय। बाकिर सभे इहे कहल कि ‘अगिला बार ढोलक-झाल आई।…हमनी के का मालूम रहल ह कि एतना महफिल जमीं, एतना भीड़ होई’।…अंत में कुछ करीबी मित्र लोग के जिद्द आ अध्यक्ष जी के विशेष आग्रह पर सभा के संचालक मनोज ‘भावुक’ के ही एकल काव्य-पाठ खातिर तइयार होखे के पड़ल । ‘काचर-कूचर कउवा खाई, घीव के लोदा बबुआ खाई’ से ‘भावुक’ आपन काव्य-पाठ शुरू कइलें।… फेर गजल के दौर चलल- ‘शेर जाल में फँस जाला त सियरो आँख देखावेला’।…… ‘मुहब्बत खेल ह अइसन कि हारो जीत लागेला’।…..आ… ‘जिनिगी के जख्म,पीर जमाना के घात बा’,… के बाद एगो गीत ‘बबुआ भइल अब सेयान कि गोदिये नू छोट हो गइल’।  लोग त भुलाइये गइल रहे कि हम देश से बहुत दूर ……सात समुन्दर पार युगाण्डा में बानी। लागल कि सभे अपना घर-अँगना में बइठल गावत-बजावत बा।…. बाहर के टिप-टिप बन्द हो गइल रहे। घड़ी के सुई टिक-टिक करत शाम के साढ़े चार पर पहुँच गइल रहे। हम जनता-जनार्दन से इजाजत लेके आपन काव्य-पाठ बन्द क देनी। अब बारी रहे आज के मुख्य अतिथि आ अध्यक्ष के।

मुख्य अतिथि श्री अखिलेश मिश्रा आपन भाषण में अत्यंत ‘भावुक’ होके बस अतने कह पवनी कि ‘आज के कार्यक्रम देख के हमरा त अचरज होता कि जब मनोज ‘भावुक’ टेक्निकल फिल्ड में होके,एगो इंजीनियर होके आपन एतना प्रभाव डाल रहल बाड़न कि मन नइखे करत कि कार्यक्रम खतम होखे, बात खतम होखे…. त जे भोजपुरी के योद्धा होई, जे दिन-रात भोजपुरी खातिर काम करत होई, ऊ सामने आई त का हाल होई। धन्य बा भोजपुरी। हम एह भोजपुरी के शत-शत प्रणाम करत हईं।   अध्यक्षीय भाषण करत श्री वी.पी. त्रिपाठी जी कहनी कि युगाण्डा में रहत हमरा एगारह साल हो गइल। हम आइल रहनी त हम अकेला रहनी, आज हमनी 41 बानी, काल्ह 100 होखीं आ फेर हजार। ई संख्या धटो मत, जोश कम मत होखे। जइसे आज BAU के स्थापना पर देश-विदेश से बधाई आइल बा, हमनी के अइसन काम करी जा कि देश-विदेश के लोग हमनी से प्रेरणा लेबे।

श्री अजय सिंह धन्यवाद ज्ञापन कइलें। कार्यक्रम समाप्त हो गइल। लोग पर्दा हटा के खिड़की से झाँकल। आकाश साफ हो गइल रहे। बदरी छट गइल रहे। सभका चेहरा पर रौनक, उमंग आ खुशी झलकत रहे। लोग सभागार से निकल के पहिले भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन आ पोस्टरन के अवलोकन कइल। हम भोजपुरी के कई गो पत्र-पत्रिका के कवर पेज, भारत आ विश्व के भोजपुरी क्षेत्र के मानचित्र, आ इण्टरनेट से डाउनलोड कइल भोजपुरी के कई गो महत्वपूर्ण सूचना दीवार पर चिपका देले रहीं। लोग पढ़ल। कुछ लोग कुछ नोट कइल। लोग के जिज्ञासा ओराते ना रहे। सवालन के झड़ी लाग गइल। बाहर के खुला मैदान में हम अपना लोगन से घिरल रहनी। कुछ लोग अपना-अपना कार के सीसा पोछे में लागल रहे। कुछ भउजाई लोग अपना-अपना मरद के चिन्हावत रहे। एगो भउजाई हमरा ओर इशारा क के हमरा मेहरारू के मटकियावत रहली। धीरे-धीरे चुप्पी आ सन्नाटा पसरे लागल। कार गेट से बहरी निकले लगली सन। गेट के एगो कोना पर हम आ दूहरा पर अजय भाई हाथ जोड़ के खड़ा रहलें। धीरे-धीरे सभे निकल गइल। हमनी दूनो आदमी एक दोसरा के मुँह निहारे लगनी जा। केहू-केहू  से कुछ बोलल ना। वापस सभागार में अइलीं जा। भीतर घुसे के मन ना करत रहे। भीतर साँय-साँय, भाँय-भाँय के आवाज रहे। अचानक आँख जाके सामने के बोर्ड पर टँगा गइल -भोजपुरी एसोशिएसन आफ युगाण्डा स्थापना समारोह 21 अगस्त 2005


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min870

ज्योत्स्ना प्रसाद

जवाना घड़ी हमार शादी भइल, ओह घड़ी हमार पासपोर्ट अभी बनल ना रहे। पासपोर्ट खातिर अप्लाई कइला से पासपोर्ट हाथ में अइला तक करीब-करीब दू महीना के समय लाग गइल। पासपोर्ट बनते हमार पति छुट्टी लेके अइलन आ हम उनके साथे रिपब्लिकन ऑफ यमन आ गइनीं। जब कभी कवनों अइसन प्रसंग चलेला त ऊ आजो बहुत गर्व से कहेलन कि हम त तहरा के हनीमून खातिर विदेश लेके आ गइनीं।

हमरा यमन अइला के रउआ हनीमून कह लीं, पति के नौकरी पर आवल कह लीं या फिर मजबूरी ही कह लीं। काहेकि जवना घड़ी हमार बिआह भइल, ओह घड़ी हमरा ससुराल में कोई अपनहिअन में के औरत घर में स्थाई रूप से रहत ना रहे। सब लोग शादी में आइल रहे। शादी के सब विधि समाप्त होते ही सबका अपना-अपना मंजिल पर लौट जायेके रहे। कारण हमरा सास के देहावसान बहुत पहिले ही हो गइल रहे। ननद अपना ससुराल से शादी खातिर आइल रहली। हमार जेठानी भी शादी में ही आइल रहली, जिनका कुछ दिन हथुआ में रहके वापस लौट जायेके रहे। ई सब बात त हम जानत ना रहनीं। एह से एह बात पर कभी सोचले भी ना रहनीं। बाकिर एक दिन हमार ससुर जी, हमरा के बुलाके कहनीं कि दुलहिन अभी ई जे अपना घर में चहल-पहल देखतारु ई सिर्फ चन्द दिन के ही मेहमान बा। एकरा बाद घर में सन्नाटा छा जाई। काहेकि मिट्ठन अपना पति के पास लौट जइहें आ बड़की दुलहिन अपना पति के पास। अब बचलू तू। तहार पति त इण्डिया में बाड़न ना जे तू उनका लगे चल जइबू। एह से, अब तहरा सोचे के बा कि तहरा एइजा रहे के बा कि अपना नइहर? अपना ससुर जी से अचानक ई बात सुनके हम बड़ी असमंजस में पड़नी कि हम उहाँ से का कहीं आ का ना? काहेकि हमरा सामने अकस्मात अइसन परिस्थिति उत्पन्न हो गइला रहे जवना के चलते हमरा कुछऊ समझ में ना आवत रहे। हमरा अपना सपना में भी एह बात के एहसास ना रहे कि अपना ससुराल पहुँचते ही हमरा अइसन परिस्थिति से सामना करे के पड़ी। एतने भर ना, हमरा अइसन आदमी त एकर कभी कल्पना भी ना कर सकत रहे। दोसर बात ई भी रहे कि एह तरह के कौनो बोल्ड निर्णय लेबे के हमरा कभी जरूरत ही ना पड़ल रहे। संस्कार भी अइसन रहे कि अपना बाबूजी से भी कभी खुलके अपना मन के बात ना कइनीं त अपना ससुर जी से भला का करतीं? एह से चुप रहल ही श्रेयस्कर समझनीं। सोचनी वइसे भी हमरा कहला-ना-कहला से फर्क भी का पड़े के बा? जइसन होई देखल जाई। जब जइसन घर के बड़-बुजुर्ग लोगन के निर्णय होई, ओइसन कइल जाई। खैर, दू-ढाई महीना के समय रहे, नइहर-ससुरा करत गुजर गइल।

हमरा पति के ईब्ब यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी विभाग में यूनिवर्सिटी टीचर के नौकरी रहे। वैसे शुरू में ईब्ब स्वतंत्रत यूनिवर्सिटी ना रहे बल्कि सना यूनिवर्सिटी के पार्ट रहे। बाद में स्वतंत्रत यूनिवर्सिटी भइल। ईब्ब रिपब्लिकन ऑफ यमन के एगो गवर्नरेट के हेड क्वाटर ह, जवना के नाम पर ओह गवर्नरेट के नाम पड़ल बा। ई एगो हिल स्टेशन ह। जे काफी उँचाई पर बा। एह शहर के विशेषता ई बा कि एह शहर में एके समानान्तर में कइगो सड़क बा। बाकिर कवनों सड़क एक लेबल में नइखे। कवनों पाँच फीट ऊँचा बा त कवनों चार फीट नीचा।

हम फरवरी के अंत में यमन गइल रहनीं। जून के अंत ले कॉलेज में इम्तिहान खत्म होखे के रहे। काहेकि जुलाई से काॅलेज में साठ दिन के सलाना छुट्टी होखे के निश्चित रहे। एह से जून के अंतिम सप्ताह में हमनी अपना सामान के पैकिंग आ घर के लोगन खातिर उपहार आदि के खरीदारी में व्यस्त हो गइनीं सन।

भारत लौटला पर एक सप्ताह भी अस्थिर से ना रह सकनी सन। नइहर-ससुरा आ रिश्तेदारे लोगन से मिलत-जुलत पूरा छुट्टी खत्म हो गइल। बाकिर एह बीच एक काम अच्छा भइल कि हम अपना पीएचडी के रजिस्ट्रेशन खातिर पटना यूनिवर्सिटी में अप्लाई क देहनीं आ अपना टॉपिक के अनुरूप किताब आदि भी अपना साथे लेते गइनीं।

हमरा अपना शोध के दौरान पूरा सत्र् स्थाई रूप से पटना में ना रहला के कारण, अपना शोध के समय स्वयं ही अधिक मेहनत करे के पड़ल। एकर नतिजा ई भइल कि हमरा कवनो कठिन चीज़ समझे खातिर ओकरा के बार-बार पढ़े के पड़े। इहे आगे चलके हमरा खातिर वरदान साबित भइल। हम बड़ा मनोयोग से आपन थीसिस पूरा कइनीं। हमार थीसिस  सन् 1999 में समिट हो गइल। थीसिस लिखत समय हमार स्वाभाविक रूप से व्यस्तता रहे। बाकिर ओकरा जमा भइला के बाद एक रिक्तता सा आगइल। हमरा बुझइबे ना करे कि हम आपन समय के सही तरीका आ सृजनात्मक ढंग से कइसे व्यतीत करीं ? एह से एक-के बाद एक कइगो प्रोजेक्ट पर काम करे लगनीं। जवना में अरबी भाषा के सीखला से लेके ‘रिपब्लिकन ऑफ यमन’ पर किताब के पाण्डुलिपि तइयार करे तक के काम शामिल हो गइल। हमार ‘रिपब्लिकन ऑफ यमन’ पर लिखल किताब के पाण्डुलिपि हमार आदरणीय गुरु आ मार्गदर्शक स्व. नंदकिशोर नवल के बहुत पसंद रहे। उहाँ के ओकरा खातिर बहुत शुभ कामना भी देहले रहनीं। बाकिर दुर्भाग्य से ऊ पाण्डुलिपि अभी तक पुस्तकाकार में ना आ सकल। बाकिर ओही पाण्डुलिपि के आधार पर हम रउआ लोगन से यमन के कुछ जानकारी शेयर करतानीं।

रिपब्लिकन ऑफ यमन विश्व के प्राचीन देशन में से गिनल जाला। ई क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से सऊदी अरबिया के बाद दूसरा सबसे बड़ा अरब देश ह। प्राचीन काल के ज्ञात इतिहास में यमन के अधिकांश हिस्सा पर देशी राज्य शबा के अधिकार रहे। जेकर राजधानी रहे माऽरीब। यमन के एह शबा राज्य आ माऽरीब राजधानी के बहुत नाम रहे। ओह राज्य के भग्नावशेष आ पुरातात्त्विक साक्ष्य कई जगह मिलल बा। जवना के देखले से ई पता चल जाला कि यमन के इतिहास बहुत गौरवशाली रहे। बाइबिल के कई परिच्छेद में दसवीं शती B.C. के King Solomon आ माऽरीब के रानी शिवा के जिक्र बा। कुरान में भी Queen of Sheba के King Solomon से मिले के घटना के उल्लेख बा। इहाँ तक कि Queen of Sheba के प्रसंग में कुरान में सबसे ज्यादा यमन के ही चर्चा बा।

सिर्फ यमन में ही ना, ओकरा आस-पास के देशन में भी रानी शिवा के नाम आजो बहुत सम्मान से लेहल जाला। हालाँकि कुछ इतिहासकारन के रानी शिवा के मूल स्थान पर मतभेद बा। बाकिर अरब परम्परा में उनका के माऽरीब के ही मानल जाला, जे यमन के ही एगो भाग ह। ‘Qeen of Sheba’ के अरब परम्परा में Bilqis कहल जाला। ई ऐश्वर्य आ धन के प्रतीक रहली। उनकर राज्य सुख-संपदा आ वैभव से परिपूर्ण रहे। काहेकि उनका शासन काल में यमन महत्त्वपूर्ण वैपारिक-मार्ग रहे। जवना से होके ही धूप,लोहान,बखूर जइसन सुगंधित पदार्थ दूसरा अरब देशन में जात रहे। एह से एह मार्ग के  सुगंधित मार्ग कहल जात रहे। एह मार्ग पर रानी शिवा के ही अधिकार रहे। एह से ‘कर’ के रूप में राज्य के काफी आमदनी हो जात रहे।

सैकड़ों बरिस बाद, काॅफी यमन के आय के मुख्य साधन हो गइल। यमन के जवना बंदरगाह से काॅफी के निर्यात होत रहे, ओह बंदरगाह के नाम ह मोखा (Mukha) ।  इहे बंदरगाह यूरोपियन खातिर मोचा (Mocha) हो गइल। विश्व प्रसिद्ध मोचा काॅफी यमन के एही मोखा बन्दरगाह से निर्यात होत रहे। एही से एह बंदरगाह के नाम पर मोचा काॅफी कहाये लागल।

यमन एगो प्रायद्वीप ह। एकर जलवायु भी बहुत बढ़िया बा। जे एकरा के संपन्नता प्रदान करेला। अन्य खाड़ी देशन के विपरीत यमन के कुछ हिस्सा प्राकृतिक रूप से काफी हरा-भरा बा। कवनो-कवनो क्षेत्र में त साल में दू बार बरसात के मौसम आवेला। जवना के चलते पूरा यमन के ही ‘Green Yemen’ कहल जाला। खासकर ओह क्षेत्रन के जहाँ बहुत हरियाली बा, ओकरा के पूरा खाड़ी देशन में ‘लोआल अखदर’ यानी ‘ग्रीन बेल्ट’ के नाम से पुकारल जाला।

यमन के एगो प्रसिद्ध नगर ह Aden. ई नगर अरब सागर के तट पर बसल बा। इहाँ बहुत अधिक गर्मी पड़ेला । एह से Aden के ‘White man’s grave’ भी कहल जाला। बावजूद एकरा, एकर भौगोलिक स्थिति के देखते हुए ब्रिटिश साम्राज्य एकरा के आपन ‘colony’ बना लेहलस। काहेकि समुद्र-मार्ग से एडेन से इण्डिया आइल-गइल बहुत आसान बा। एह से ई इण्डिया आवे खातिर सेतु के काम करत रहे।

यमन पहाड़ आ रेत के देश ह। एह से इहाँ आवा-गमन के समुचित साधन ना रहे। विज्ञान के एतना तरक्की भइला के बावजूद आज भी यमन के कइगो अइसन क्षेत्र बा जहाँ पहुँचल बहुत कठिन बा। एह से ई दुनिया के नज़र में ओइसन ना आइल जइसन आवे के चाहीं। फिर भी कई जाबांज खोजी प्रकृति के लोग यमन के खोज में लागल। जवना में कई अरब भी रहलन। जवना में इब्बन रूस्ता आ इब्बन बतूता के नाम प्रसिद्ध बा। बाद में इंग्लैंड, डेनमार्क आ जर्मन यात्री भी यमन आइल।

यमन के इस्लामिक इतिहास में Queen Arwa bint Ahmad के नाम बहुत सम्मान से लेहल जाला।  उनका के लोग सम्मान से अल सइदा अल-हुरा अल मलिका कहेला। रानी अरवा के पति, सन् 1086 में अपना पत्नी पर आपन सारा राज-काज छोड़ के, स्वयं अपना के संगीत आ शराब में डूबा लेहले। सत्ता पर काबिज होते ही रानी अरबा अपना राज्य के संवृद्धि आ शान्ति खातिर, आपन राजधानी जिबला बनवली। ई एक कुशल आ योग्य शासिका रहली। जिबला के इलाका पहाड़ी ह। जबना के कारण बरखा के चलते इनका राज्य के खेती चौपट हो जात रहे। एह से ई अपना सूझ-बूझ के परिचय देत अपना राज्य में ‘terrace farming’ शुरू करववली। जवना के चलते उनकर राज्य आउर समृद्ध होत गइल। एह से उनका के second Qween of Sheba कहल जा सकेला।

हमनी के यमन के राजकुमार हातिमताई के किस्सा त अपना बचपने से ही सुनत आवतानी सन। उनका पर हिन्दी में फिल्म भी बनल बा। उनकर नेकी के किस्सा त जग-जाहिर बा। फिर भी ई बात अलग बा कि पहिले ई बात ना बुझाइल रहे कि ई कहानी केहू व्यक्ति के जीवन के सत्य घटना पर आधारित बा कि कोरा कल्पना भर ह। वास्तविकता जे भी होखे बाकिर यमन के लोग एकरा के सत्य घटना पर आधारित मानेला।

हमनी किहाँ के बच्चा-बच्चा ‘अली बाबा अरबाइन हरामी’ यानी ‘अली बाबा चालीस चोर’ के किस्सा जानता। एह विषय पर हिन्दी में एक ना अनेक फिल्म बन चुकल बा। रउआ लोगन के ई बात जानके आश्चर्य होई कि इहो किस्सा यमन के ही ह। हमरो बहुत आश्चर्य भइल रहे,  जब हमनी के ड्राइवर हमनी के अली बाबा के किस्सा के ‘अलबाब’ यानी दरवाजा के प्रत्यक्ष देखवलस। साच पूछी त पहिले हमरा विश्वास ना भइल। बाकिर हमरा विश्वास कइला भा ना कइला से सचाई बदल त  जाये के ना रहे। एह से विश्वास करहीं के पड़ल।

ईब्ब आ ताईज़ के रास्ता में हरियाली विहीन पहाड़ के ऊपरी हिस्सा में हल्का नीला रंग से रंगल एगो सामान्य आकार के दरवाज़ा रहे, जे दूर से थोड़ा छोटा ही लउकत रहे। उहे अली बाबा के अलबाब रहे। हमनी के ड्राइवर ही बतवलस कि एह दरवाज़ा में ई लोहा के बनल मजबूत अलबाब(दरवाज़ा) के पल्ला पहिले ना लागल रहे। एह से धन के लोभ में लोग ओह खुलल दरवाज़ा से अंदर चल जात रहे। बाकिर जे एक बार ओह दरवाजा के अंदर प्रवेश कर जात रहे, ऊ वापस लौट के ना आ पावत रहे। एह से सरकार के ओर से ओह दरवाज़ा के अंदर जायेके सबके मनाही रहे। बाकिर लोग सरकार के रोक के बावजूद अपना लालच से बाज कहाँ आवत रहे ? एह से अंत में हार के सरकार के ओर से ओह खुलल अलबाब में लोहा के बनल मजबूत पल्ला लगा के, ओकरा में  ताला लगा देहल गइल। आजो ऊ ओही स्थिति में बा।

यमन के इतिहास के प्राक् ऐतिहासिक काल से, यानी Bronze आ Stone  काल से जोड़ के देखल जाला। वइसे यमन के ज्ञात इतिहास के रानी शिवा के समय से  मानल जाला। ई उहाँ के बहुचर्चित रानी रहली। इनका शासन काल में यमन बहुत विकसित रहे। उनकर भी समय 1000 बी. सी. रहे।

यमन के क्षेत्र में इस्लाम धर्म के आगमन के पहिले उहाँ के लोग मूर्ति पूजक रहे। आज भी उहाँ माऽरीब के इलाका में कइगो मंदिर के अवशेष मौजूद बा। एतने भर ना उहाँ बलि प्रथा के भी रिवाज़ रहे। एह से एगो बलि-वेदी भी मिलल बा।

अइसे त यमन में अपना-अपना रुचि के अनुसार बहुत कुछ अइसन बा जे आदमी के आकर्षित करेला। बाकिर हम इहाँ उहे स्थान के चर्चा करेब, जे अधिकांश लोगन के पसन्द आवेला। एह में हम सबसे पहिले यमन के राजधानी सनांऽ ( Sana’a) से आपन बात शुरू करतानी। ई संसार के सबसे पुरान महानगर में से एगो ह। समय समय पर एकर कइगो नाम पड़ल जवना में एकर एगो नाम ह अज़ाल। ई ऊँचाई पर बसल एगो महानगर ह जे अपना उत्कृष्ट वास्तुकला खातिर प्रसिद्ध बा। Sana’a के ओल्ड सीटी के इतिहास इस्लाम के पहिले के ह। ई पूरा शहर एगो चहारदीवारी के अंदर बा। एह चहारदीवारी में सातगो दरवाज़ा बा, ओह महानगर में प्रवेश करे खातिर। जवना में सबसे प्रसिद्ध बा ‘बाब अल यमन’ यानी यमन के दरवाज़ा। एही महानगर से करीब-करीब 15 किलो मीटर दूर वादी धार में एगो ‘राॅक पैलेस’ बा । जे उहाँ के पूर्ववर्ती राजा के एगो महल ह । ई सात मंजिला महल बा । एह महल के खासियत ई बा कि ई महल सिर्फ पहाड़ पर बनल ही नइखे बल्कि एह महल के कई फ्लोर के कुछ हिस्सा मानव-निर्मित बा आ कुछ हिस्सा प्रकृति निर्मित। यानी पहाड़ के हिस्सा ही ओह महल के कई कमरा आदि के दीवार भी ह।

शाबाम आ कवकाबान नगर भी सना’ऽ के करीबे बा। ई नगर पुरातात्त्विक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण बा। काहेकि एकरा बारे में कहल जाला कि एकर निर्माण एगो प्राचीन मंदिर के अवशेष पर भइल बा।

एडेन (Aden) यमन के सबसे महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह ह। चूँकि व्यापारिक दृष्टि से एकर बहुत महत्त्व बा,एह से एकरा समय-समय पर कई साम्राज्यवादी राष्ट्रन के उपनिवेश बने के पड़ल। जवना में सबसे प्रमुख रहे- तुर्क आ ब्रिटिश। 19 वीं शदी में ई संसार के तीसरा सबसे व्यस्त बंदरगाह रहे। इहाँ के दर्शनीय स्थल में से महत्त्वपूर्ण बा- प्राकृतिक एलिफैंट रॉक आ कृत्रिम गुलमोहर बीच, हौज़ पार्क। एह हौज़ में प्राकृतिक रूप से बरखा के पानी इकट्ठा होला आ एक हौज़ से दूसरा हौज़ में चल जाला। साचो मानी, ई मन के मोह लेला। ई कोई आम हौज़ ना ह, बल्कि कई लेयर में बा। ई हौज़  कब बनल रहे, एकर केहू के जानकारी नइखे। बाकिर ई बहुत बढ़िया बा आ अभी भी अच्छा स्थिति में बा। अंग्रेज एकरा के ढूँढलस लेकिन केकर बनावल ह एकर ठीक-ठीक जानकारी अभी ले नइखे भइल। कुछ इतिहासकार लोग एकर संबंध  रानी शिवा के समय से जोड़ेला।

एडेन चूँकि ब्रिटिश कॉलोनी रहे। एह से इहाँ अपेक्षाकृत अधिक खुला समाज बा। हालाँकि पूरा खाड़ी देशन में सिर्फ यमन ही ‘रिपब्लिकन ऑफ यमन’ के नाम से जानल जाला। जबकि शेष खाड़ी देशन में राजतंत्र बा। एह से इहाँ सिर्फ कॉलेज आदि में ही को-एजुकेशन नइखे बल्कि शिक्षिका से लेके कुलपति या मंत्री तक के पद पर औरत के कार्यरत देखल जा सकेला। ई सब संभव एह से भइल बा, काहेकि इहाँ स्त्री-पुरुष दूनू के मताधिकार के बराबर के अधिकार बा।

पूरा खाड़ी देशन में एकमात्र एडेन ही अइसन स्थान बा जहाँ हिन्दू के मरला के बाद लाश जलावे के व्यवस्था बा। इहाँ आधा दर्जन से ऊपर मंदिर भी बा । जवना में अधिकांश में पूजा-पाठ नियमित रूप से होला। इहाँ एगो गाँधीजी के नाम पर हॉल भी बा।

ताईज़ (Taiz)- ताईज़ यमन के राजधानी रह चुकल बा। जवना घड़ी ई यमन के राजधानी रहे, ओह घड़ी यमन के बहुत विकास भइल रहे। ई महानगर भी एक चौड़ा दीवार से घिरल बा। जवना में चारगो दरवाज़ा बा।

ईब्ब (Ibb)- ईब्ब ‘The capital of the fertile province’ के नाम से जानल जाला। एकरा आस-पास के भूमि बहुत उपजाऊ बा। ईब्ब से 10 किलोमीटर के दूरी पर ऐतिहासिक स्थान जिबला बा। ई रानी अरवा बिंत अहमद अल-सुलायही के राजधानी रहे। एह रानी के किला भूकम्प में अब खण्डहर जइसन हो गइल बा। बाकिर ओह किला में 365 कमरा रहे। कहल जाला कि ओह किला के प्रत्येक कमरा से अलग-अलग दिन के सूर्योदय देखल जा सकत रहे।

ज़बीद ( Zabid)-  ज़बीद भी बहुत पुराना नगर ह। एकरा, विश्व के प्रथम इस्लामिक विश्व विद्यालय के गौरव भी प्राप्त बा। एह विश्व विद्यालय के देश से बाहर भी बहुत नाम रहे । कहल जाला कि अलजबरा के आविष्कार भी एही जा भइल रहे आ शून्य के भी।

हादरामउत (Hadramaut)- हादरामउत के भारत से बहुत पुराना आ मजबूत संबंध रहल बा। इहाँ के लोगन के कहनाम बा कि जवना घड़ी हैदराबाद के निजाम के ई बुझाइल कि ऊ जहाँ शासन करतारे ऊ हिन्दू बहुल क्षेत्र ह आ ऊ मुसलमान हउअन त कही भविष्य में उनका कौनो तरह के परेशानी ना हो जाय। एह से ऊ लगले जहाँ-तहाँ से मुसलमान लोगन के बुलाके हैदराबाद में बसावे। वइसे भी उनका मुसलमान लोगन पर अधिक विश्वास रहे। एह से ऊ अपना सेना में मुसलमान के ही प्राथमिकता देत रहले आ उनका शासन-क्षेत्र में ओतना मुसलमान रहे ना। एह से ऊ दोसरा मुस्लिम देशन से लोगन के बुलाके अपना सेना में भर्ती करे लगलन। एह से हैदराबाद से यमन के लोगन के भी निमंत्रण रहे। एह से यमन के हादरामउत से निजाम के सेना में बहुतायत में लोग भर्ती भइल। आज भी हादरामउत के लोग उहाँ अधिक संख्या में बा। कुछ लोग त उहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी से रहता। हादरामउत के खजूर,शहद आ प्राकृतिक सौंदर्य भी सबके आकृष्ट करेला।

शहारात अल-अमीर आ शहारात अल-फिश ( Shaharat Al-Amir and Shaharat Al-Fish) सहारा क्षेत्र के दूगो अइसन पहाड़ बा जवना के मध्य भाग के आपस में जोड़े वाला पैदल चले वाला पुल सबके अचम्भित कर देला।

अल-उदयन के काॅफी आ प्राकृतिक सौंदर्य भी सबके सहज ही अपना ओर खींच लेला। ई सब त चन्द उदाहरण ही बा। केतना ले गिनाई? बस ई समझ लीं कि एह सब के संजो के रखल भी यमन खातिर एक चुनौती बा। बाकिर अधिकांश प्रचीन धरोहर यूनिसेफ के कवनों ना कवनों तरह के संरक्षक में बा।

घर हो चाहे देश, आन्तरिक कलह ओकर नींव हिला के रख देला। यमन भी आज आन्तरिक कलह के शिकार  हो गइल बा। पता नइखे कि ऊँट कवना करवट बइठी।ऊँट चाहे कवनों करवट बइठे, बाकिर एह खींच-तान में नुकसान त देशे के हो रहल बा । विश्व इतिहास एह तरह के घटनाक्रम से भरल बा। ओकरा नतिजा से भी हम भली-भाँति अवगत बानीं। फिर भी हम इतिहास से सबक ना लेनी । काहेकि हमरा ज्ञान आ विवेक के हमार स्वार्थ आ अहंकार अइसन कसके दबइले बा कि ओह दूनू के उर्ध्व साँस चल रहल बा। पता ना कब प्राण-पखेरू उड़ जाय ?

हमरा यमन छोड़ला करीब-करीब दस-ग्यारह साल हो गइल । बाकिर आज भी हम ओह लोगन से मिलल आदर आ स्नेह के मिठास के महसूस करेनीं। हम यमन से आवत घड़ी अपना भाव के अभिव्यक्त करत आपन विचार लिखले रहनीं –

” कल हम यहाँ नहीं रहेंगे

चले जायेंगे दूर, बहुत दूर

पीछे मुड़कर देख नहीं पायेंगे

इस धरती पर लौट नहीं पायेंगे

पर सहेज लूंगी मैं ढेरों यादें –

कुछ धुंधली कुछ मान- सम्मान

छोड़ जायेंगी जो मेरे हृदय पर

इस धरती के अमिट निशान ।”

 


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min1060

डॉ० ब्रज भूषण मिश्र

      –  ” हई देखबे नू काबुल के मोरचावालू के चटकवाही!
अइसन मरद त देखबे ना कइनी।”

–  ” तू का जानो बड़का इमदी कइसन होखता है।
तोहरा नइहर में एको गो बड़का इमदी पैदे नहीं
हुआ।”

– ” आ मार बढ़नी रे ! बड़का अदमी रउआ इहाँ पैदा
होखत होइहें। हमरा नइहर के गाँवे त सिसोदिि पैदा
लेवेला।”

ई ह अपना समय के बड़ा प्रसिध्द आ कहीं त विश्व प्रसिद्ध नाटक  ‘ लोहा सिंह ‘ के पात्र ‘ खदेरन के मदर ‘ आ ‘ लोहा सिंह ‘ के संवाद। एह रेडियो नाट्य श्रृंखला के लेखक, निदेशक आ मुख्य पात्र लोहा सिंह के किरदार निबाहेवाला रहीं ‘ पद्मश्री प्रोफेसर रामेश्वर सिंह ‘ काश्यप ‘। काश्यप जी के नाम के बड़ा शोर रहे, सोहरत रहे। बाकिर ई शोहरत रहे ‘ लोहा सिंह ‘ के नाम से। पटना रेडियो पर रोजे साँझ के साढ़े छव बजे आवे वाला  कार्यक्रम ‘ चौपाल ‘ में एतवार के दिन एह नाटक के  प्रसारण होत रहे आ ओही के मंगर के रात में नाटक कार्यक्रम में दोहरिआवल जात रहे। हम होश सम्हरनी त एह नाटक के प्रति लोग में गजब के आकर्षण रहे। गाँवा गाँई रेडियो त कम रहे। जेकरा दुआर पर रहे, सुने खातिर भीड़ लागत रहे। अपना भोजपुरिआवल अंगरेजी आ हिंदी के फेंट-फाट से बनल सिपहिया भाषा से लोहा सिंह के पात्र त प्रभाव छोड़ते रहे; खदेरन के मदर, खदेरन, बुलाकी, भगजोगनी, फाटक ( पाठक ) बाबा आ कवि जी के पात्र निखालिस भोजपुरी में चुटिला संवाद से सीधे जन साधारण से जुड़ जात रहे। भारत – चीन युद्ध के पृष्ठभूमि में श्रृंखला बद्ध नाटक अलग मोर्चा बना के लड़ल रहे, आ पेकिंग रेडियो कई बेर ई कह चुकल रहे कि नेहरू पटना रेडियो में एक भैंसा पाल रखा है जो चीन की दिवार को सिंह से टक्कर मारकर गिरा देना चाहता है। आम जनता चीन युद्ध के जानकारी खातिर समाचार से बेसी लोहा सिंह नाटक पर विश्वास करत रहे। आगे चल के जनता के जागरूक बनावे खातिर एह नाटक के प्रसारण होत रहल आ अपना भाव-भाषा-शैली से संवाद करके संदेश देवे में कामयाब रहल। कबहीं-कबहीं चौपाल कार्यक्रम में काश्यप जी तपेसर भाई के नाम से भोजपुरी के कम्पीयरर बन के आवत रहीं। ओह समय हम का जानत रहीं कि आगे चल के काश्यप जी के सम्पर्क में आवे आ आशीर्वाद पावे के अवसर भेंटाई।

 

काश्यप जी के सही से आ साक्षात दर्शन हमरा अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के नौंवा अधिवेशन राँची ( 25-26 अक्तूबर, 1985 ई.) में भइल। हमार पहचान ओह तरह के ना रहे पहिले से, बाकिर राँची अधिवेशन के अध्यक्ष पं० गणेश चौबे जी के घर से ले के राँची ले जाए के आ साथे रहे के जिम्मेवारी मिलला के बाद लोग कुछ कुछ हमरो के जाने लागल। राँची अधिवेशन में कवि सम्मेलन के अध्यक्षता काश्यप जी कइलीं। काश्यप जी काव्यपाठ कइलीं आ व्यापक प्रभाव छोड़लीं। अधिवेशन के दुसरका रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम रहे, जवना में गीत-गवनई-नृत्य-धोबिया नाच आ नाटक रहे। एक से बढ़ के एक कार्यक्रम। ओही में अनुरोध पर काश्यप जी द्वारा लोहा सिंह नाटक के प्रसंग आ संवाद अविस्मरणीय बन गइल। हमरा के सम्मेलन के कार्य समिति में संगठन मंत्री बनावल गइल। एक तरह से हमार पहिचान तनि मनी बने लागल रहे। मानीं त काश्यप जी से जुड़े के शुरुआत ओतहीं से हो गइल।

बात 1988 ई. के ह। मार्च के महीना रहल होई। समस्तीपुर जिला के अनुमंडल रोसड़ा में भोजपुरी कवि सम्मेलन आ सांस्कृतिक कार्यक्रम रहे। आयोजक रहीं अनुमंडलीय जन संपर्क अधिकारी विश्वनाथ सिंह। सिंह जी गोपालगंज निवासी रहीं आ भोजपुरी के बढंती के भाव से भरल रहीं। मैथिली लोग एह कार्यक्रम के विरोधी रहे, बाकिर कार्यक्रम भइल त एगारे बजे दिन से बइठल लोग एगारह बजे रात ले बइठल रहल। दिन के कवि सम्मेलन में अक्षयवर दीक्षित, अनिरुद्धजी, अंजनजी, सोमेशजी, कुबोध जी, सतीश जी, डॉ. रिपुसूदन श्रीवास्तव, कुमार विरल जइसन मंच जमाऊ कवि लोग रहे। हमहूँ रहीं। कवि सम्मेलन समाप्त होखते सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरुआत भइल। काश्यप जी रहीं आ ब्रजकिशोर दूबे के टीम गवनई खातिर। ( ब्रजकिशोर दूबे का भारत के राष्ट्रपति जी के हाथे संगीत नाटक अकादमी अवार्ड मिल चुकल बा)। कार्यक्रम शुरु होखते जम गइल। हमनी त सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरु भइला पर लवट गइल़ीं। बिहान भइला काश्यप जी मुजफ्फरपुर आ गइलीं आ रिपुसूदन श्रीवास्तव जी के इहाँ ठहरलीं। साँझ के हमरा आवास पर काश्यप जी के सम्मान में एगो गोष्ठी भइल, जवना में दीक्षित जी, अनिरुद्ध जी, सतीश्वर सहाय वर्मा सतीश जी, नागेन्द्रनाथ ओझा, विरल जी वगैरह सामिल रहीं। अध्यक्षता रिपुसूदन बाबू कइनी। एह गोष्ठी में भोजपुरी के ले के बात बतकही भइल। हमरा त मन में एही बात के उछाह रहे कि काश्यप जी हमरा आवास पर अइलीं। काश्यप जी हमरा बहिन प्रियंवदा के निहोरा पर लोहा सिंह के संवाद सुना के मन जीत लेहनी। एगो संवाद के कुछ पाँति हमरा आजुओ इआद बा –

” जानते नू हैं फाटक बाबा ! मरद दिन भर अपना दिमाग का इस्तेमाल करके मगजमारी करती है, एही से ओकरा माथा के बार उड़िया जावता है आ मेहरारू सब अपने मुँहवा का इस्तेमाल कर दिन भर चर-चर-चर-चर करती रहती है, एही से उसको दाढ़ी मोछ नहीं होखता है।”

ओह दिन हमरा इहाँ सम्मान गोष्ठी के बाद अक्षयवर दीक्षित के आ काश्यप जी के महाकवि आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री आ प्रख्यात आलोचक कामेश्वर सिंह शर्मा से मिले के कार्यक्रम बनल आ हम साथे गइनी। झुलफुलाह साँझ रहे, बिजुरी गायब रहे। पहुँचते बात बतकही से जे  रोचक प्रसंग बनल, जवन भुलइले ना भुलाए। पहिले शास्त्री जी के इहाँ पहुँचलीं जा। शास्त्री जी पूछलीं – ” कौन ” ? काश्यप जी उत्तर देलीं – “काश्यप “। शास्त्री जी — “आइये, आइये, हमारे यहाँ की कुरसी में अँट सकिये तो बैठिये। ” काश्यप जी — ” गुरुदेव ! कुरसी में अँटने की बात  कहाँ से आ गई ? ” शास्त्री जी फेर व्ंयग्यात्मक बोललीं- ” आप प्राचार्य हैं ओर मेरे यहाँ तो प्राचार्य की कुर्सी नहीं है।”

बइठला के साथे हाल-चाल, कुशल-क्षेम भइल। आ लगले शास्त्री जी पत्नी के हाँक लगवनी- ” भाई साहब कहाँ है? (शास्त्री जी पत्नी के बड़े चाहे भाई साहेब ही कहत रहीं) आइये, देखिए तो भला कौन आया है? आप दिन भर कान से रेडियो लटकाये चलती हैं। देखिये देखिये लोहा सिंह जी आये हैं। ” तब तक हाथ में लालटेन लिहले शास्त्री जी के पत्नी छायादेवी निकलली आ लालटेन के अँजोर काश्यप जी के चेहरा ओर करके झुक के अभिवादन करत कहली – “आप लोहा सिंह कह रहे हैं, ये तो बिल्कुल सोना सिंह लग रहे हैं। ” कहे के बात ना बा कि रौशनी में काश्यप जी के गोर भभूका चेहरा सचहूँ सोना लेखा दमक उठल रहे। कुछ देर तक पुरान-पुरान बात के इआद कइल जात रहल। हँसी ठहाका लागत रहल। बेकतीगत बात होत रहल। शास्त्री जी पूछनी कि कहाँ ठहरे के बा, त काश्यप जी बतवनी कि रिपुसूदन बाबू के इहाँ। शास्त्री जी एहू पर चुटकी लिहनी कि इस शहर में तो भोजपुरी के ठिकेदार रिपुसूदन जी ही हैं। ” ठहाका लागल। ओकरा बाद कामेश्वर सिंह शर्मा किहाँ काश्यप जी के ले के गइनी। दुनों लोग बैचमेट रहलें। घर परिवार से लेके नौकरी-चाकरी, लेखन-प्रकाशन के बारे में बात होखल। उहाँ से लेके विश्वविद्यालय परिसर, रिपुसूदन बाबू के आवास पर। आठ बजे से रात एगारह बजे रात तक कवि गोष्ठी। काश्यप जी के अलावे सतीश जी, अनिरुद्ध जी, दीक्षित जी, विरल जी, हम आ दू चार लोग हिन्दी-उर्दू वाला। बिहान भइला काश्यप जी पटना बस से वापस भइलीं। बस में शारदा सिन्हा के गीत बाजत रहे। सासाराम वापस भइला पर रिपुसूदन बाबू किहाँ सकुशल वापसी के चिट्ठी लिखनी आ लिखनी– ” बस में शारदा सिन्हा के गीत सुनत अइनी ह, क्या गाती है, मुआ घालती है।”

विश्वविद्यालय सेवा से निवृत्ति के बाद बिहार सरकार के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा स्थापित भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष बनावल गइलीं, काश्यप जी। आ ओह पद पर रहते उहाँ के निधन भइल। एह कालावधि में उहाँ से चार पाँच बेर भेंट भइल आ संगे रहे आ जतरा करे के अवसर भेंटाइल। सन् 1990 ई. के बात होई। एक बेर भोरे-भोर हम प्रसिद्ध कवि-कथाकार-लोक गायक भाई ब्रजकिशोर दूबे जी के संगे पटना से उहाँ के सासाराम आवास पर पहुँचनी, विश्वविद्यालय के चिट्ठी देके, पी-एच० डी० के परीक्षक बने के स्वीकृति लेवे खातिर। उहाँ से भेंट भइल। हल्का-फुल्का खाये खातिर आ चाय लेके उहाँ का खुद अइनी। दूबे जी उहाँ के विद्यार्थी रह चुकल रहीं, आ लोहा सिंह नाटक में कवि जी के भूमिका निबाहत रहीं। तनिक खुलल रहीं। पूछनी जे गुरुदेव अपनहीं कष्ट काहे उठावत बानी। काश्यप जी कहनी, मेहरारु इहाँ नइखी। दाइए से काम चलत बा आ लगवनी ठहाका। हमनिओ का आपन हँसी ना रोक सकनी। एही जतरा में काश्यप जी के कलम प्रेम के अँखियान कइलीं। कई-कई खाना वाला दू गो रैक में ट्रे में सजा के राखल सैकड़न तरह के सैकड़न कलम। बैठकी में आनंद आइल। तरह तरह के बात आ बीच-बीच में ठहाका। अविस्मरणीय रहल।

1991 ई. के गरमी के दिन में पटना में उहाँ के निजी आवास पर फेर भेंट भइल। हम कवनो काम से पटना गइल रहीं। दूबे जी से पता चलल कि काश्यप जी पटना में बानी। दुनों भाई उहाँ पहुँचनी। प्रणाम करके बइठ गइनी। मामला गम्हीर बुझात रहे। काश्यप जी कवनो संचिका में डूबल रहीं। अकादमी के निदेशक विक्रमादित्य मिश्र के चेहरा पर तनाव झलकत रहे। दू तीन अउर लोग रहे। उहो लोग चुपचाप बइठल रहे। हमनियो मौन बइठ गइलीं। काश्यप जी के मकान भाड़ा पर लागल रहे आ किरायादार रहत रहे। कुछ हिस्सा काश्यप जी अइला गइला पर अपना उपयोग लागि रखले रहीं। ऊ किरायादार किरायादार कम, परिवार जइसन रहे आ काश्यप जी के रहला पर अभिभावक सरूप धेयान राखत रहै। राखो काहे ना, काश्यप जी त धरोहर रहीं। हँ त एह गम्हीर वातावरण में खलल डरलस एगो तरकारी बेचेवाली- ” सब्जी लिआई, सब्जी? गोभी, टमाटर, भींडी, करैला, धनिया पत्ता, मिरचाई।”  केहू कुछ ना बोलल। सब्जी वाली हल्ला करत बरामदा के गेट तक आ गइल। तब ले घर के भीतर से एगो लरिका तेजी से निकलल आ चुप रहे के इशारा करत कहलस- ” ना लिआई।”  सब्जीवाली चुप रहे के इशारा पर धेयान ना देत ओतने तेज आवाज में बोलल- ” काहे ना लिआई ? इहाँ त बरमहल लिआला।”  ऊ माथ के टोकरी नीचे उतार के रखलस। लरिकवा धीरहीं खिसिया के बोलल- ” जा तारू कि ना। ”  काश्यपजी के धेयान भंग हो चुकल रहे। उहाँ का फाइल टेबुल पर राखत कहनी- ” ई मानी ना।” अब बिना ठहाका के रह सकत रहे। गम्हीर वातावरण हल्लुक हो गइल।

हमरा पी-एच० डी० के मौखिकी रहे 21 सितम्बर, 1991 ई. के। हमरा छुट्टी के अभाव रहे। हम परीक्षा के एक दिन पहिले पटना से सुपर फास्ट पकड़ के राँची साँझ में पहुँचनी। बूथ से अपना गाइड आ राँची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के आचार्य आ अध्यक्ष डॉ० दिनेश्वर प्रसाद जी के फोन कइनी, त उहाँ का होटल के नाम बतवनी, जवना में उहाँ का कवनो शिष्य के भेज के बुकिंग करवा देले रहीं। उहाँ का बतवनी कि काश्यपो जी ओही ट्रेन से आ रहल बानी आ ओही होटल में बुकिंग बा। ई डॉ० दिनेश्वर प्रसाद जी के सहजता, सरलता आ अपना शिष्यन के प्रति ममत्व रहे कि ओकरा काम के हल निकालत रहीं। खैर उहाँ के प्रति अउर कबहीं। होटल पहुँचनी त स्वागत काउन्टर पर ही काश्यप जी, उहाँ के पत्नी आ भाई ब्रजकिशोर दूबे मिल गइनी। काश्यप जी ओह घरी दूबे जी के साथ लेके कतहीं आवत-जात रहीं। प्रणामा पाती भइल आ आपन-आपन रूम पकड़ाइल। बिहने सबेरे उठ के तैयार भइनी आ दिनेश्वर बाबू के इहाँ गइनी। उहाँ का कहनी कि दुपहर में हिन्दी विभाग में परीक्षा होई। 30-35 आदमी जुट सकत बा। छात्र लोग के वर्ग नइखे चलत एह से जादे लोग ना जुटी। हम छोट भाई के जे पतरातू से  उहाँ के हमरा साहित्यिक मित्र लोग के साथ आइल रहस पैंतीस लोग के बढ़िया नाश्ता के पैकेट के आर्डर देवे के कहनी आ होटल लवट गइनी। दूबे जी से पता चलल काश्यप जी बेटी के आवास पर पत्नी के छोड़े गइल बानी। जल्दीए आइब। भोजन एतहीं करब। काश्यप जी अइनी, उहाँ का भोजन अपना रूम में मँगा के करत रहीं त हम गइनी, त उहाँ का कहनी कि ‘ भोजन विजय ‘ कर रहल बानी। उहाँ के बतवनी कि भोजन के आज्ञा आ बीजे असल में आज्ञा लेके भोजन तैयार करावल ह आ बिजे करावल के मतलब भोजन विजय खातिर अनुरोध कइल ह। उहाँ के कहनी भोजन विजय सब लोग ना कर सके, ओह में मैथिली लोग पारंगत होला आ एह संदर्भ के एगो किस्सा सुनवलीं कि पटना विश्वविद्यालय के उहाँ के एगो प्रोफेसर मित्र कइसे कवनो होटल के साढ़े तीन ट्रे चंद्रकला मिठाई खा गइल रहस।

खैर, हमरा शोध निदेशक आ हिंदी के हेड दिनेश्वर बाबू के उमेद से अधिका, लगभग साठहन लोग मौखिकी कक्ष में उपस्थित रहलें। जेकरे पता चलल कि भोजपुरी के विषय पर वाइवा बा आ काश्यप जी परीक्षक बानी, ऊ जुम गइल। जेकर नाम हमरा इआद बा, ओह में विभाग के अध्यापकगण- डॉ. सिद्धनाथ कुमार, डॉ. बालेन्दुशेखर तिवारी, प्रो. सिद्धेश्वर आ दोसरा दोसरा कॉलेज के कई लोग, जेह में डॉ. श्रवण कुमार गोस्वामी, डॉ. ऋता शुक्ला आदि नाम प्रमुख रहे। एह लोग के उपस्थिति हमरा मन में डरो पैदा करत रहे आ गरिमो भरत रहे। हम नावाकिफ रहीं कि मौखिकी कइसे होला। हमरा ई रहे कि परीक्षक के अलावहूँ अउर लोग पूछ सकत बा। बाकिर कागजी औपचारिकता पूरा कइला के बाद काश्यप जी चार गो सवाल कइनी। तीन सवाल के हम आसानी से जवाब देनी। चउथा सवाल समझे में कठिनाई भइल त उहाँ का फरिअवनी। हमार जवाब सुनला के बाद उहाँ के कहनी कि उहाँ का संतुष्ट बानी, अउर केकरो पूछे के होखे त पूछे। दिनेश्वर बाबू कहनी कि इहाँ ई परिपाटी नइखे। तब उहाँ का कहनी – ” तो मिश्र जी को बधाई दी जाए, आज से डॉ. मिश्र।”  दिनेश्वर बाबू हमरा से कहनी- ” सबसे आशीर्वाद लीजिए।” हमरा सबकर आशीर्वाद मिलल। ब्रजकिशोर दूबे के बारे में कई लोग जानत रहे। अनुरोध भइल त काश्यप जी के आदेश पर दूबे जी भोजपुरी के दू गो गीत सुनवलीं। पहिला गीत रहे महेन्दर मिसिर के पूरबी – ‘ अंगुरी में डँसले बिया नगीनिया ‘ आ दोसर गीत रहे भिखारी ठाकुर के जँतसार – ‘ डगरिया जोहत ना ‘। ई दूनों गीत दूबे जी के पहचान बनावेवाला गीत रहे। लोग गद्-गद् हो गइल। तब सभे एक सुर में काश्यप जी से लोहा सिंह के कवनो प्रसंग आ संवाद सुनावे के निहोरा कइलस। उहाँ का सुना के माहौल के खुशनुमा बना देहलीं। उहाँ के सुनवलीं –

धान के बिकरी करके जे रोपेया मिलल बा, कोठरी में बइठ के लोहा सिंह बेर-बेर गिन रहल बाड़न। खदेरन के माई पूछत बाड़ी त भगजोगनी बतावत बिया कि मलिकार कोठारी में बइठ के रूपया गिनत बानी। खदेरन के माई जा के टोकत बाड़ी- ” अजी सुनब कि ना रउआ। आ मार बढ़नी रे।”  लोहा सिंह खिसिआइले बोलत बाड़न- ” काहे अतिना हल्ला करके हमरा हिसाब-किताब के ममिला में गड़बड़ेसन मारती है खदेरन को मदर।”  खदेरन के माई जवाब देत बाड़ी- ” हम काहे हाला करत बानी, ई रउरा बुझात नइखे ? आ मार बढ़नी रे। ”  तब लोहा सिंह बोलत बाड़न-  ” हम कौनो अगमजानी है जे तोहरा मन के बात बूझ जाएगी। हमको त बुझइबे नहीं करता है कि तुम मेम है कि मेमिन है, टेलिफूँक है कि फेनूगिलास है। काबुल के मोरचा पर हम एक से एक मेम अउर मेमिन देखा, बाकिर तुम्हारा डिजैन का एको नहीं था। लगता है नू कि भगवान तुमको बनाने के बाद सँचवे तूड़ दिया जवना से कि तुम्हारा डिजैन का जनाना पैदे नत होखे।”

लागल ठहाका पर ठहाका। ताली पर ताली। आखिर में लगले काश्यप जी ई कहे में ना चुकलीं – ” मिसिर जी, ई राउर ‘ भाइभा ‘ ना, ‘ भा – भा ‘ भइल ह।”  फेर से लागल ठहाका। ओतहीं ई जानत कि तेईस तारीख के वापसी के टिकट बा,  तेइस के दुपहर में अपना आवास पर अभिज्ञान परिषद के एगो कार्यक्रम कै योजना डॉ० ऋता शुक्ला बना देहली। दोसरा दिन बाइस तारिख के काश्यप जी का बेटी किहाँ बितावे के रहे। हम दूबे जी के संगे पतरातू के प्रोग्राम बना दिहलीं।

मौखिकी के बाद हमनी का होटल वापस हो गइनी। अभी पूरी तरह आराम ना मिलल रहे कि राँची एक्सप्रेस, प्रभात खबर, आज वगैरह के पत्रकार लोग जुट गइल। बतिआवे के चाहत रहे। केहू के हिम्मत ना होत रहे जगावे के। आखिर कार दूबे जी जगवनी आ बतवनी कि पत्रकार लोग आइल बा त उहाँ का तैयार ना भइलीं। दूबे जी कहनी कि असरा लगा के आइल बा लोग, लवट जाई त अच्छा ना लागी। हम बइठावत बानी। अपने इत्मिनान से फ्रेस होके सबका संगही चाय पिअल जाई आ इंटरव्यू दिआई। काश्यप जी सहमत हो गइलीं। फ्रेस होके बइठनी
त सबका खातिर चाय मँगावल गइल। सवाल आ जवाब से काश्यप जी के जिनिगी के परत दर परत खुलत गइल। कइसे उहाँ का कोलकाता में नाटक करे के सीखनी। ओह समय के मुजफ्फरपुर के नाट्य कलाकार ललित सिंह नटवर से संपर्क भइल। कइसे जब आकाशवाणी, पटना में बिहार के लोकभाषा में कुछ रोचक लिखे के निर्णय भइल त उहाँ का ‘ तसलवा तोर कि मोर ‘ शीर्षक रेडियो रूपक लिखलीं। ओह नाटक के मुख्य पात्र लोहा सिंह रहे, जवना के भूमिका खुद काश्यप जी कइलीं। ऊ श्रोतालोग का बहुते पसन पड़ल। रिकार्डेड नौ सै से बेसी चिट्ठी प्रशंसा के आइल पटना रेडियो में। एह चिट्ठिया मे बेसी लोग इहे लिखले रहे कि ‘लोहा सिंह  नाटक फिर से सुनवाया जाए ‘। इहे कारण भइल कि लोहा सिंह नाटक के सिलसिला शुरु हो गइल। एह बीचे भारत पर चीनी आक्रमण भइल। चीन के करतूत के पोल खोलेवाला आ भारत के पक्ष के मजबूती से राखेवाला रूपकन के प्रसारण हर हफ्ता होखे लागल। ई पूछला पर कि लोहा सिंह के किरदार रउरा कहाँ से आ कइसे सूझल, त उहाँ का बतवनी कि उहाँ के पिता जी मुंगेर में डी. एस. पी रहीं त उनके अधीन एगो हवलदार रहे जे सेना से रिटायर्ड रहे। ऊ धोती के ऊपर कमर में बेल्ट बान्हत रहे। ऊपर वर्दीवाला खाकी कमीज पेन्हत रहे। माथे मुरेठा बान्हत रहे आ हाथ में भर पोरसा के लाठी लेके चलत रहे। ऊ टूटल-फूटल अंगरेजी आ हिन्दी के भोजपुरिया के बोलत रहे। बाते-बात में मोर्चा के कहानी भा दृष्टांत सुनावत रहे। ऊ चरित्र भावल आ हम ओकर किरदार लिखनी। ई बात पूछला पर कि जिनगी में कवनो बात के अफसोस बा। उहाँ का बतवलीं कि उहाँ के एह बात के अफसोस बा कि ‘ लोहा सिंह ‘ के प्रभाव में रामेश्वर सिंह काश्यप के पहचान दब गइल। साँचहू ई बात सोचे पर मजबूर करेला कि हिंदी के आलोचना आ ललित निबंध लेखन आ भोजपुरी कवि-कथाकार काश्यप जी के कम चरचा भइल बा। पत्रकार लोग के पूछला पर उहाँ का बतवलीं कि पटना से प्रिंसपल रूप में सासाराम आ गइला आ कार्यभार बढ़ला से लोहा सिंह वाला सिलसिला भी कमजोर पड़ल, काहे से कि रिहर्सल्स वगैरह खातिर पटना में हफ्ता दस दिन रुकल जरूरी होला। उहाँ का बतवनी कि दूरदर्शन नेशनल चैनल खातिर तेईस एपिसोड बनावे पर बात चल रहल बा, कुछ औपचारिकता पूरा करके ओह में हाथ लागी।

बाइस तारीख के सबेरे हम आ दूबे जी पतरातू गइनी आ काश्यप जी अपना बेटी के आवास पर। उहाँ के पत्नी बेटिए किहाँ रहस। हम आ दूबे जी साँझ पहर राँची वापस हो गइलीं। तेइस तारीख के साँझ में साउथ बिहार एक्सप्रेस से पटना खातिर टिकट रहे। दिन में डॉ० ऋता शुक्ला जी के आवास पर काश्यप जी के सम्मान में अभिज्ञान परिषद के ओर से कार्यक्रम रहे, जवना में दूबे जी के गवनई तय रहे। तेइस के सबेरे हमनी तैयार होके होटल में बइठल रहीं। काश्यप जी अइलीं। भोजन पत्तर के बाद थोड़ा आराम। ऋता दीदी के इहाँ जाये के तैयारी। घनघोर वर्षा भइल। हमनी के दिनेश्वर बाबू के लेके ऋता दीदी किहाँ जाए के रहे। खैर विलम्ब हो गइल उहाँ पहुँचे में। काश्यपजी के सम्मान आ दूबे जी के गवनई कार्यक्रम के कमे समय में निबटावे के पड़ल। लिट्टी चोखा के बेवस्था रहे। छव बजे ट्रेन रहे, हमनी के दीदी के इहाँ से सीधे स्टेशन खातिर प्रस्थान कइनी। दीदी आपन गाड़ी निकलववली जे में काश्यप जी, दिनेश्वर बाबू आ दीदी, बालेन्दुशेखर जी, सिद्धेश्वर जी दोसरा सवारी से। हम दूबे जी ऑटो से। घर से निकले के पहिले ऋता दीदी आग पर के सेंकल लिट्टी, चोखा, अँचार आ मिठाई के झोरा थमा दिहली आ कहली कि रास्ता में खइह लोगन। चाचा जी खातिर ठीक रही। उहाँ का चीनी बा। लिट्टी से हरज ना होई। काश्यपजी ऋता दीदी के पिता जी प्रो. रामेश्वरनाथ तिवारी के बैचमेट रहीं। एही से चाचा भतीजी के रिश्ता रहे। स्टेशन पर दामाद के साथ काश्यपजी के पत्नी पहुँचली। विदाई के बेरा डाँ दिनेश्वर प्रसाद, डॉ. बालेन्दुशेखर तिवारी, प्रो० सिद्धेश्वर, डॉ० श्रवण कुमार गोस्वामी के अलावे अउर कई लोग रहे। ट्रेन से सफर करेवाला कई लोग प्लैटफॉर्म पर काश्यप जी से भेंट घाट कइल। कइसे कवनो धरोहर बेकती के सम्मान मिलेला देखते बनत रहे।

ट्रेन आइल। घुसला पर बर्थ पर डबल नम्बर देख के माथा चकराइल। हेर-फेर रहे, नयका चढ़ गइल रहे, पुरनका मेटल ना रहे। हमरा हिसाब से जे काश्यपजी के दू गो बर्थ रहे, एगो महिला कूपा में आ एगो अलग। महिला कूपा वाला बर्थ पर केहू औरत बइठल रहे। हम उहाँ से बतवनी त उहाँ का कहनी कि ना पूछनी ह कि रउए काश्यप जी के मेहरारू हईं का? लागल ठहाका। खैर सही बर्थ भेंटाइल, सामान सरिआवल गइल। अदमी अहथिर भइल। तबले दू गो संभ्रात महिला बोगी में घुसली आ महिला कूपा में बर्थ पकड़ली। ऊ दुनों जनी रहली- आकाशवाणी पटना के प्रोग्राम एग्जेक्यूटिव सरिता शर्मा आ लोकगायिका सिसोदिनी सिंह। सब एक दोसरा के पहचान वाला। नमस्कार अभिवादन, जतरा के बारे में एक दोसरा के बतावल। दुनों जनी शिष्टाचारवश काश्यप जी से मिलली। आकाशवाणी के बारे में बात चीत चलत रहल। ओही में चाय के दौर चलल। काश्यप जी पान के शौकीन रहनी ह। पनबट्टा राखत रहलीं ह।  चाय के बाद पान के तलब भइल। पान बना के पहिले सरिता शर्मा आ सिसोदनी जी के तरफ बढ़वलीं। सिसोदिनी जी पान ले लिहली। सरिता शर्मा कहली कि ऊ ना खाली। काश्यप जी कहनी कि हर चीज कबहीं ना कबहीं पहिल बेर खाइल जाला। आज पहिल बेर पान खा लीं। तब सरिता जी पान ले लिहली। एही बीच बोकारो स्टील सीटी कॉलेज के प्रिंसपल पहुँचनी। उहाँ के पता चल गइल रहे कि काश्यप जी एही ट्रेन से जतरा कर रहल बानी त ढूढ़ँत पहुँच गइनी आ बोकारो तक बातचीत करत गइनी। काश्यप जी के दृष्टि बड़ा खोजी रहे। कवनो एगो स्टेशन पर गाड़ी रूकल। दोसरका प्लेटफार्म पर नजर गइल आ उहाँ का चिहाइले बोलनी- ” हउ देख रहे हैं, मेहरारू मरद को छनौटे-छनौटे मार रहा है। ” साँचहू कवनो मजदूरनी रहे जे कुछ रीन्हत-पकावत रहे आ कवनो बात पर मरद के छनौटा से दू चार छनौटा लगा देलस।

काश्यप जी के पत्नी काश्यप जी के बड़ा खेयाल राखत रहली। एकर प्रमाण मिलल एह बात से कि काश्यप जी के चेहरा पर कुछ लाग गइल रहे। ऊ अपना अँचरा से पोंछ दिहली। काश्यप जी मधुमेह के रोगी रहीं। उहाँ के भोजन-पत्तर संयमित रहे आ समय पर होत रहे। भोजन के कुछ समय पहिले इन्सुलिन के इंजेक्शन उहाँ के लेत रहीं। ऊ इआद करवली की खाये के बेर हो रहल बा, इंजेक्शन ले लिहीं। काश्यप जी इंसुलिन ले लिहनी। थोड़े देर बाद कहली कि इंजिनियर साहेब, इहाँ के दुइये गो लिट्टी दीं। इहाँ के रात में हम दुइए गो रोटी दीहिले खाये के। काश्यप जी के पत्नी हमरा के इंजिनियर साहेब कहत रहस, काहे से कि हम थरमल में कार्यरत रहीं। हम दूगो लिट्टी, चोखा, अचार प्लेट में निकाल के देनी। काश्यप जी कहनी कि रउओ लोग खाईं आ प्रिंसपल साहेब, सरिता जी अउर सिसोदनी जी के भी लिट्टी खिआईं। हमनी कहनी कि अपने खा लिहल जाव त हमनी खायेब। काश्यप जी का लिट्टी बढ़िया लागल। कहनी कि ऋता लिट्टी त बढ़िया बनववले रहली ह। दू गो लिट्टी खतम होखते हम पूछनी कि अउर लिआव त उहाँ का कहनी कि दीं। उहाँ के पत्नी कहली- ” ना – ना, अब ना। इहाँ का दू गो से बेसी नइखे खाये के।”  काश्यप जी कहलीं कि आरे एगो खाये द नीक लागत बा। ऊ कहली कि अच्छा इंजिनियर साहेब एगो दे दीं। हम लिट्टी उहाँ का प्लेट में डलनी। उहो खइला के बाद काश्यप जी कहनी- ” मिसिर जी, एगो अउर दीं।” हम लिट्टी निकालतहीं रहीं कि काश्यपजी के पत्नी तनि तेजे आवाज़ में बोलली- ” ना ना इंजिनियर साहेब, बेलकुल ना। इहाँ का पहिलहीं तीन गो खा चुकल बानी।”  हमार लिट्टी लिहल हाथ बढ़ल रह गइल, स्टैचू लेखा। ना बुझाए का करीं। खाएवाला माँगत बा, खाएवाला के खेयाल राखेवाला मना करत बा, हम का करीं ? किंकर्तव्यविमूढ़ हो गइनी। काश्यप जी पत्नी से कहनी – ” ए, लिट्टिया बढ़िया नू लागत बा, एगो अउर खाये ना द।” पत्नी साफ मना कइली- ” ना इंजीनियर साहेब, मत दीं।” आ काश्यप जी के ओर ताकत मना कइली- ” अब मत खाईं, हरज कर जाई। ” काश्यप जी के लोहा सिंह अतना सुनते जाग गइल रहे, बोलनी – ” हई देखते हैं नू , ई हमारा मेहरारू है कि थाना का हवलदार? ” पड़ल ठहाका। जतना लोग सुनत रहे सभे हँसे लागल आ आखिरकार आधा लिट्टी पर समझौता भइल। ओकरा बाद हमनियो खा लेनी। बोकारो स्टेशन नियराइल रहे। प्रिंसिपल साहेब कहनी कि अब बोकारो आ रहल बा, एह से उतरब। दूबे जी कहनी कि आखिर बोकारो के मतलब का होई ? काश्यप जी के जवाब  हाजिर रहे — “जहाँ बोका लोग रो (row ) में रहेला। ” फेर ठहाका लागल। ओकरा बाद सभे सुत गइल। भोरे पटना पहुँचल। काश्यप जी दुनों बेकती अपना आवास पर गइनी। दूबे जी अपना आवास पर आ हम जतरा के सुखद स्मृति लिहले मुजफ्फरपुर खातिर बस पकड़नी। आगे चल के फेर कबो पटना में भेंट भइल त उहाँ का कहनी कि नेपाल जाए के मौका मिले त उहाँ कवनो खास तरह के पेन मिलेला, ले ले आइब। हम कहनी कि हम बीरगंज जा के ले आइब आ अपने के पहुँचा देब। ई हमरा खातिर सौभाग्य के बात रहे। बाकिर अवसर ना मिलल। कुछुए दिन बाद उहाँ के निधन हो गइल। अगर उहाँ का जीवित रहतीं त वीरकुँवर सिंह विश्वविद्यालय के वाइसचांसलर भइल रहितीं। उहाँ के प्रतिउत्पन्नमतित्व के जवाब ना रहे। उहाँ का जवन शैली इजाद कइनी, लोग लाख कोशिश कइल, आगे ना बढ़ा सकल। काश्यप जी के इआद कबहीं भोराए ना।


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Hum BhojpuriaOctober 22, 20214min2350

लेखक: पांडे कपिल

पत्र-पत्रिकन में भोजपुरी के प्रवेश के स्थिति तब बनल, जब कि भारतेन्दु मंडली के कुछ भोजपुरी भाषी साहित्यकार भोजपुरी में रचना करे लगले। रामकृष्ण वर्मा ‘बलवीर’, तेगअली ‘तेग’, खड्ग बहादुर मल्ल आ फेर, आगे चलके, दूधनाथ उपाध्याय, रघुवीर नारायण जइसन कवियन के भोजपुरी रचनन के प्रकाशन से लोगन के ध्यान भोजपुरी साहित्य का ओर आकृष्ट भइल। सन् 1886 के आसपास काशी से प्रकाशित पत्रिका ‘गोरस’ में राधाकृष्ण सहाय के भोजपुरी नाटक ‘दाढ़ के दरद’ प्रकाशित भइल। सितम्बर 1814 में महावीर प्रसाद द्विवेदी ‘सरस्वती’ जइसन हिन्दी के प्रतिष्ठित पत्रिका में ‘अछूत की शिकायत’ शीर्षक से हीरा डोम के भोजपुरी कविता प्रकाशित कइले। हिन्दी के पत्रिकन में जब-तब भोजपुरी के रचना प्रकाशित करेके सिलसिला तबे से चलत आइल। आगे चलके कुछ द्विभाषिओ पत्रिका निकलली स, जवना में हिन्दी का साथे-साथे भोजपुरिओ के रचना प्रकाशित होत रहली स। आजो अइसन कुछ द्विभाषी पत्रिका प्रकाशित हो रहल बाड़ी स।

भोजपुरी में पत्रिका प्रकाशित करे के पहिलका प्रयास जयपरगास नारायण ‘बगसर समाचार’ नाम के पत्रिका से कइले। सरस्वती पुस्तकालय, बगसर से प्रकाशित ई पत्रिका पहिले कैथी अक्षर में छपल। दू अंकन के बाद ई भोजपुरी पत्रिका देवनागरी अक्षर में प्रकाशित होखे लागल। ई पत्रिका 1918 तक निकलला के बाद बन्द हो गइल।

भोजपुरी के पत्रिका निकाले के अगिला प्रयास आचार्य महेन्द्र शास्त्री द्विमासिक पत्रिका ‘भोजपुरी’ के सम्पादन करके कइले। भोजपुरी-कार्यालय कदमकुआँ, पटना से प्रकाशित एह पत्रिका में प्राय: हर विधा के रचनन के समावेश भइल रहे। बाकिर, सिर्फ एक अंक के प्रकाशन के बाद ई पत्रिका बंद हो गइल।

सन् 1949 में अवध बिहारी ‘सुमन’ के सम्पादन में ‘कृषक’ नाम के एगो साप्ताहिक पत्र भोजपुरी भाषा में प्रकाशित भइल! इहे अवध बिहारी ‘सुमन’ आगे चलके संन्यासी होके दण्डिस्वामी विमलानन्द सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध भइले, जे ‘बउधायन’ नाम के महाकाव्य भोजपुरी में लिखले। ‘कृषक’ असल में भोजपुरिया किसान-मजदर के पत्रिका रहे। एकर लोक-गीत विशेषांक एह पत्रिका के उल्लेखनीय उपलब्धि रहे। एक साल तक निकलला का बाद ई पत्रिका बन्द हो गइल।

कुछ बरिस के चुप्पी का बाद, सन् 1952 में आरा से ‘भोजपुरी’ नाम के मासिक पत्रिका के प्रकाशन शुरू भइल। एकर प्रवेशांक अगस्त, 1952 में निकलल। क्राउन आकार के चालीस पृष्ठ के एह पत्रिका के पूर्ण साहित्यिक पत्रिका होखे के गौरव मिलल। एकरा पहिलका पाँच अंकन के सम्पादन प्रो. विश्वनाथ सिंह कइले रहले, बाकिर एह पत्रिका के प्रबन्ध सम्पादक आ कर्ता-धर्ता रघुवंश नारायण सिंह से वर्तनी के बारे में कवनो बिन्दु पर विवाद हो गइला का वजह से प्रो. विश्वनाथ सिंह एकर सम्पादन छोड़ दिहले आ रघुवंशे नारायण सिंह एकर सम्पादक हो गइले। एक सौ पृष्ठ के एकर लोक साहित्य अंक बहुते पुष्ट विशेषांक रहे, जवना का चलते एह पत्रिका के साहित्यिक स्वीकृति मिले लागल। सन् 1958 तक ई नियमित प्रकाशित होत रहल। भोजपुरी साहित्य के विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान मानल जाई।

आठ बरिस तक नियमित प्रकाशन के बाद, आर्थिक कठिनाई का चलते एकरा प्रकाशन में गतिरोध होखे लागल, आ आखिरकार, ई बन्द हो गइल।

कुछ बरिस बाद, पटना से सन् 1963 से 1965 तक एकर फेर से प्रकाशन होत रहल, बाकिर आर्थिक कठिनाई से एकरा प्रकाशन में फिर रुकावट हो गइल।

फेर, रघुवंश नारायण सिंह, तिसरका झोंक में एकर प्रकाशन 1973 से 1974 तक कइले। बाकिर, आखिरकार, समुचित साधन का अभाव में एकर प्रकाशन बन्दे हो गइल। भोजपुरी साहित्य के विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान मानल जाई। ई भोजपुरी के अनेक अइसन लेखक पैदा कइलस, जेकरा योगदान से भोजपुरी भाषा के अनुपम साहित्यिक समृद्धि सुलभ भइल।

आरा से ‘गाँव-घर’ नाम के पाक्षिक पत्रिका के नियमित प्रकाशन भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव ‘भानु’ के सम्पादन में दू बरिस ले होत रहल। ओकरा बाद, ई पत्रिका अनियमित होखत-होखत, आखिरकार, बन्दे हो गइल|

सन् 1960 में पटना में ‘भोजपुरी परिवार’ नाम के संस्था बनल, जवना के आचार्य शिवपूजन सहाय के आशीर्वाद प्राप्त रहे। एही भोजपुरी परिवार’ के तत्वावधान में त्रैमासिक ‘अँजोर’ के प्रकाशन सन् 1960 से शुरू भइल। एकर सम्पादक रहले पाण्डेय नर्मदेश्वर सहाय आ सहायक सम्पादक रहले अविनाश चन्द्र विद्यार्थी। डिमाई आकार के चालीस पृष्ठ के ई पत्रिका 1969 ई. तक लगातार प्रकाशित होखत रहल, बाकिर एकर प्रधान सम्पादक आ ‘भोजपुरी परिवार’ के अध्यक्ष पाण्डेय नर्मदेश्वर सहाय के निधन के बाद एकर प्रकाशन बन्द हो गइल। भोजपुरी साहित्य के सर्वतोमुखी विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान मानल जाई।

आनन्द मार्ग के सामाजिक संगठन ‘प्रोग्रेसिव फेडरेशन ऑफ इंडिया’ 1964 में गाजीपुर से ‘भोजपुरी समाचार’ नाम के एगो समाचार साप्ताहिक के प्रकाशन शुरू कइलस, जेकर सम्पादक रहले जरदारी। ईहे पत्रिका आगे चलके ‘भोजपुरी वार्ता’ नाम से गोरखपुर से प्रकाशित होखे लागल, जेकर सम्पादक रहले आचार्य प्रतापादित्य। कुछ समय बाद, एकर प्रकाशन मोतिहारी से अर्ध-साप्ताहिक रूप में होखे लागल आ तब एकर सम्पादक भइले देवदत्त। बाद में, पटना से एकर प्रकाशन दैनिक पत्र का रूप में होखे लागल। बाकिर, आनन्द मार्ग पर प्रतिबन्ध लाग गइला से प्रकाशन में गतिरोध आ गइल आ एकरा के बन्द कर देबे के पड़ल। कुछ साल बाद, 1993 ई. में, एकर फेर से प्रकाशन विनोद कुमार देव का सम्पादन में शुरू भइल, बाकिर साल-भर से आगे एकरा के चलावल सम्भव ना हो सकल।

वाराणसी के सुप्रसिद्ध भोजपुरी संस्था ‘भोजपुरी संसद’ 1964 ई. में ‘भोजपुरी कहानियाँ’ नाम से मासिक पत्रिका के प्रकाशन शुरू कइलस। पहिले एकर सम्पादक रहले डॉ. स्वामीनाथ सिंह। बाद में, प्रो. राजबली पाण्डेय आ गिरिजाशंकर राय ‘गिरिजेश’ एकर सम्पादक भइले। ‘गिरिजेश’ के सम्पादन में ई पत्रिका एक-से-एक कहानीकार त पैदा कइबे कइलस, भोजपुरी के पाठको-वर्ग तइयार कइलस। भोजपुरी के ई पहिलकी पत्रिका रहे, जवना के अपेक्षित मार्केटिंग भइल आ जवना के वितरण के बीड़ा ए.एच.ह्वीलर जइसन नामी कम्पनी उठवलस। सन् 1966 तक ई पत्रिका लोकप्रिय बनल रहल, बाकिर आगे एकर प्रकाशन कईएक वजह से बन्द हो गइल।

भोजपुरी संसद, वाराणसी सन् 1968 में त्रैमासिक ‘पुरवइया’ के प्रकाशन शुरू कइलस, जेकर सम्पादक रहले राजबली पाण्डेय। बाकिर उचित व्यवस्था के अभाव में ई पत्रिका एक साल बाद बन्द हो गइल।

सन् 1964 में, दूगो आउर मासिक पत्रिकन के प्रकाशन शुरू भइल- छपरा से ‘माटी के बोली’ आउर आरा से ‘भोजपुरी साहित्य’। ‘माटी के बोली’ के सम्पादक रहले सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’, बच्चू पाण्डेय आ विश्वरंजन। दू अंक निकलला का बाद ‘माटी के बोली’ के प्रकाशन बन्द हो गइल, त 1969 में एकर प्रकाशन विश्वनाथ प्रसाद का सम्पादन में फेर शुरू भइल, बाकिर कुछ अंकन के बाद एकरा के आउर आगे चला सकल आर्थिक कारण से सम्भव ना हो सकल।

आरा से डॉ. जितराम पाठक के सम्पादन में भोजपुरी साहित्य’ 1968 ई. तक प्रकाशित भइल। आगे चलके, भोजपुरी साहित्य मंडल, बक्सर के मुखपत्र के रूप में एकर प्रकाशन सन् 1975 से 1977 तक जितरामे पाठक के सम्पादन में होत रहल। ई पत्रिका भोजपुरी साहित्य के रचनात्मक स्तर के ऊँच उठावे में महत्वपूर्ण योगदान कइलस, जेकर श्रेय एकरा विद्वान् सम्पादक डॉ. पाठक के देवे के होई।

‘हमार बोल’ नामक बत्तीस पृष्ठ के पत्रिका मासिक रूप में निकलल रहे, जे दू-तीन अंक निकलला का बाद बंद हो गइल।

जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् के अनियतकालिक पत्रिका ‘लुकार’ के प्रकाशन सन् 1965 में शुरू भइल। अंक-1 से 19 तक, विभिन्न व्यक्तियन के सम्पादन में, एकरा के चक्रमुद्रित करके प्रकाशित कइल गइल। ओकरा बाद, अंक 20 से ई पत्रिका प्रेस में छपे लागल, जेकर सम्पादन गंगा प्रसाद ‘अरुण’ करे लगले। अट्ठाइसवाँ अंक से एकरा सम्पादन के भार अजय कुमार ओझा उठा रहल बाड़े आ गंगा प्रसाद ‘अरुण’ प्रधान सम्पादक के भूमिका निभा रहल बाड़े। सन् 2008 तक ‘लुकार’ के चौंतीस अंक प्रकाशित हो चुकल रहे। ओकरा बाद ई पत्रिका बन्द हो गइल।

सन् 1966 में आरा से हरेराम तिवारी ‘चेतन’ के सम्पादन में ‘आँतर’ नाम के पत्रिका निकलल रहे, जवना के पाँच अंक प्रकाशित भइल रहे। फेर सन् 1999 में ‘चेतने’ के सम्पादन में राँची से एकर एगो अंक हस्तलिखित रूप में निकलल, जवना के सौ गो हस्तलिखित प्रति तइयार करा के वितरित कइल गइल रहे।

सन् 1968 में सर्वानन्द के सम्पादन में ‘जागल पहरुआ’ नाम के एगो पत्रिका, छपरा से, प्राउटिस्ट फोरम ऑफ इंडिया का ओर से प्रकाशित भइल रहे, जे कुछे अंक निकल के बन्द हो गइल।

‘भोजपुरी जनपद’ नामक पत्रिका के प्रकाशन सन् 1968 में भोजपुरी साहित्य मंदिर, वाराणसी से राधामोहन ‘राधेश’ के सम्पादन में शुरू भइल रहे। सन् 1970-72 के दौरान एह पत्रिका के नियमित प्रकाशन होत रहल। कुछ बरिस बंद रहला का बाद, 1977 से 1981 तक ले एकर चार-पाँच अंक निकल सकल। शुरुआत में, एकरा सम्पादन से सिपाही सिंह ‘श्रीमंत’ भी जुड़ल रहले।

सन् 1971-72 के दौरान ‘राधेश’ जी ‘पहरुआ’ नाम के साप्ताहिक अपना सम्पादन में निकलले रहले। भोजपुरी साहित्य मन्दिर जइसन प्रकाशन संस्थान आ ‘भोजपुरी जनपद’ आउर ‘पहरुआ’ जइसन पत्रिकन के संचालक राधामोहन ‘राधेशे’ जी रहले, जे आपन पैत्रिक सम्पत्ति बेंच-बेंच के एह प्रकाशनन के आगे बढ़ावत गइले। इहाँ तक ले कि ऊ अपना गाँव के पैत्रिक घर तक ले बेंच दिहले आ भोजपुरी साहित्य के आपन जिनिगी समर्पित करत परलोकवासी हो गइले।

सन् 1969 में विनोदचन्द्र सिनहा के सम्पादन में वाराणसी से ‘काशिका’ नाम के पाक्षिक बड़ आकार में निकलल रहे। ओही साले, छिन्दवाड़ा (मध्यप्रदेश) से क्राउन आकार में अड़तालीस पृष्ठ के पत्रिका ‘भोजपुरी समाज’ भोलानाथ सिंह के सम्पादन में आ डॉ. रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’ के सम्पादन में ‘हिलोर’ नाम के पत्रिका आरा से प्रकाशित भइल रहली स। एह तीनों पत्रिकन के कुछुए-कुछ अंक निकल सकल, आ ई पत्रिका बन्द हो गइली स। हँ, ‘हिलोर’ के कुछ अंक 1979 में गयो से (गया से भी) निकलल रहे।

सन् 1971 में पटना से ब्रह्मानन्द मिश्र के सम्पादन में ‘भोजपुरी टाइम्स’ नाम के समाचार साप्ताहिक-प्रकाशित भइल, बाद में जवना के नाम ‘भोजपुरी संवाद’ कर दिहल गइल रहे। एक-डेढ़ बरिस ले अनियमित रूप में प्रकाशित होखत-होखत, आखिरकार, ई साप्ताहिक बन्द हो गइल। सन् 1972 में आरा से ‘टटका’ नाम के पाक्षिक रमाशंकर पाण्डेय के सम्पादन में निकलल। सन् 1976 से एकर नाम ‘टटका राह’ हो गइल रहे। कुछ समय बाद बन्द हो गइल।

सन् 1992 ई. में ‘सरायकेला अनुमंडल भोजपुरी समाज’ (अब झारखंड में) के मुखपत्र के रूप में ‘ललकार’ के प्रकाशन रामवचन तिवारी के संचालन में शुरू भइल, जेकर सम्पादक रहले डॉ. बच्चन पाठक ‘सलिल’ । सन् 1978 से एह पत्र के नाम ‘जनता ललकार’ हो गइल। 1982-83 तक ई पत्र निकलत रहल, बाकिर रामवचन तिवारी के निधन के बाद बन्द हो गइल।

सन् 1982-83 में बीरगंज (नेपाल) से श्री दीपनारायण मिश्र के सम्पादन में त्रैमासिक ‘सनेस’ के प्रकाशन शुरू भइल। ओही घड़ी हुगली (पश्चिम बंगाल) से राममूर्ति पराग आ चन्द्रकान्त के सम्पादन में ‘अँजोरिया’ (द्विमासिक) के प्रकाशन शुरू भइल। ‘सनेस’ दू बरिस ले निकलत रहल, त ‘अँजोरिया’ के दुइये अंक निकल सकल।

भोजपुरी साहित्य सदन, सीवान से पहिले त्रैमासिक आ बाद में मासिक रूप में प्रकाशित ‘माटी के गमक’ विमल कुमार सिंह ‘विमलेश’ के सम्पादन में सन् 1973 से प्रकाशित होत रहल। दू-तीन बरिस के उमिर वाला ई त्रैमासिक/मासिक जबतक निकलल, नियमित निकलल। सन् उनइस सौ तिहतरे में चितरंजन के सम्पादन में आरा से ‘चटक’ निकलल। 1974 में कांचरापाड़ा (पश्चिम बंगाल) से रवीन्द्र कुमार शर्मा के सम्पादन में मासिक ‘भिनसार’ निकलल, जेकर उमिर दू अंक के प्रकाशन तकले सीमित रहल।

सन् 1975 में पाण्डेय कपिल आ नागेन्द्र प्रसाद सिंह के सम्पादन में ‘लोग’ त्रैमासिक के प्रकाशन भइल। तीन अंक निकलला का बाद पाण्डेय कपिल एकरा सम्पादन से अलग हो गइले, त नागेन्द्र प्रसाद सिंह 1979 से ‘भोजपुरी उचार’ नाम से एकर प्रकाशन आगे बढ़वले आ कुछ अंक के प्रकाशन के बाद ई बन्द हो गइल। एही साले, ‘गोहार’ नामक पत्रिका राकेश कुमार सिंह के सम्पादन में आरा से निकलल। आगे चलके एकर दूगो अंक लखनऊ से प्रकाशित भइल।

सन् 1976 के साल भोजपुरी में पत्र-पत्रिका के प्रकाशन का दिसाई विशेष महत्व के रहल, काहे कि एह साल कईगो पत्रिका कई जगह से निकलली स। एह समय तक अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के गठन हो चुकल रहे आ एकर पहिलका अधिवेशनो प्रयाग में, हिन्दी साहित्य सम्मेलन के मंच पर, डॉ. उदय नारायण तिवारी के अध्यक्षता में आयोजित हो चुकल रहे। बिहार विश्वविद्यालय के लंगट सिंह कॉलेज में भोजपुरी के पढ़ाइओ शुरू हो चुकल रहे। एह सब वजहन से भोजपुरी के साहित्यकार लोगन में नया उत्साह आइल रहे।

एही साल (1976) से पटना से भोजपुरी संस्थान के तत्वावधान में ‘उरेह’ त्रैमासिक पाण्डेय कपिल का सम्पादन में प्रकाशित होखे लागल, जवना का माध्यम से भोजपुरी में नवलेखन के बढ़ावा मिलल। पाँच बरिस ले नियमित निकलला का बाद एकर प्रकाशन अर्थाभाव का चलते बन्द हो गइल।

अनियतकालिक पत्रिका ‘अहेरी’ के प्रकाशन अवधेश नारायण आ शंभुशरण राम के सम्पादन में मुजफ्फरपुर से भइल। वीरगंज (नेपाल) से दीपनारायण मिश्र के सम्पादन में ‘समाद’ प्रकाशित भइल। मुजफ्फरपुर से ओमप्रकाश सिंह के सम्पादन में मासिक ‘भोजपुरिहा’ के प्रकाशन शुरू भइल। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक मुखपत्र ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ डॉ. वसन्त कुमार के सम्पादन में प्रकाशित भइल। वार्षिक रूप में एह पत्रिका के दू अंक निकलल, जवना से भोजपुरी में शोध के प्रवृत्ति के बढ़ावा मिलल।

सन् 1980 से ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ के त्रैमासिक रूप में निकाले के आउर शोध-समीक्षा का अलावे एकरा में रचनात्मको साहित्य के बढ़ावा देवे के निर्णय लिहल गइल। एकर प्रधान सम्पादक ईश्वरचन्द्र सिनहा आ सम्पादक पाण्डेय कपिल भइले। सन् 1984-85 का दौरान एकर चार गो अंक निकलल आ ई पत्रिका आपन पहचान कायम कर लिहलस। फेर, दिसम्बर, 1986, दिसम्बर, 1987 आ अक्टूबर, 1988 में एकरे एक-एक विशेषांक-क्रमश: रघुवीर नारायण जन्मशताब्दी विशेषांक, भिखारी ठाकुर जन्म शताब्दी विशेषांक आ सम्मेलन-अध्यक्ष-विशेषांक का रूप में प्रकाशित भइल।

जनवरी, 1990 से ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ मासिक रूप में नियमित निकले लागल, जेकर प्रकाशन आजो जारी बा। जनवरी, 1990 से दिसम्बर, 2001 तक ले एह पत्रिका के सम्पादन पाण्डेय कपिल कइले। एह बारह बरिस का दौरान एह पत्रिका के अनेक महत्वपूर्ण विशेषांक निकलल, जइसे- राहुल सांकृत्यायन रचनावली-विशेषांक, हाइकू-विशेषांक, लघुकथा-विशेषांक, गीत- विशेषांक, दोहा-विशेषांक, भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका संदर्भ-विशेषांक।

जनवरी, 2002 से एह पत्रिका के सम्पादन प्रो. ब्रजकिशोर कर रहल बाड़े आ सह-सम्पादक बाड़े डॉ. जीतेन्द्र वर्मा। प्रो. ब्रजकिशोर के सम्पादन-काल में अबतक एह पत्रिका के कई गो महत्वपूर्ण विशेषांक प्रकाशित भइल बा, यथा- डॉ. विवेकी राय-विशेषांक, डॉ. आंजनेय-विशेषांक, संत दुनिया राम-विशेषांक। भोजपुरी के रचनात्मक सक्रियता के आगे बढ़ावे में ई पत्रिका महत्वपूर्ण योगदान करत रहल बा।

सन् 1977 में लगभग नौ गो भोजपुरी पत्रिकन के शुरुआत भइल। जमशेदपुर से माधव पाण्डेय ‘निर्मल’ के सम्पादन में ‘भोजपुरी संसार’ के दू अंक निकलल। पटना में अवस्थित गैर-सरकारी भोजपुरी अकादमी का ओर से समाचार बुलेटिन का रूप में भोजपुरी समाचार’ के कई अंक निकलल, जेकर सम्पादन हवलदार त्रिपाठी ‘सहृदय’ आ भैरवनाथ पाण्डेय कइले रहले। कलकत्ता से ऋषिदेव दूबे आ अनिल ओझा ‘नीरद’ के सम्पादन में ‘भोजपुरी मिलाप’ के तीन अंक निकलल। आरा से डॉ. रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’ के सम्पादन में मासिक ‘कलश’ निकलल, जे आगे चलके अनियतकालिक हो गइल। ब्रजकिशोर दीक्षित ‘ब्रजेश’ के सम्पादन में सीवान से ‘मोजर’ के प्रकाशन भइल, जे तीन अंक के बाद बन्द हो गइल। पटना से प्रो. तैयब हुसैन ‘पीडित’ के सम्पादन में ‘डेग’, मोतिहारी से रजनीकान्त ‘राकेश’ के सम्पादन में ‘डगर’ (बाद में जेकर नाम ‘डहर’ हो गइल रहे), आ इलाहाबाद से शशिभूषण लाल के सम्पादन में ‘चोट’ जइसन प्रगतिशील विचारधारा के पत्रिका निकललीसन, जे कुछ-कुछ अंक निकल के बन्द हो गइलीसन।

एही साल (1977 ई.) कलकत्ता के पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद् का ओर से त्रैमासिक ‘भोजपुरी माटी’ के प्रकाशन शुरू भइल, जेकर सम्पादक रहले कृष्णबिहारी मिश्र। सन् 1980 से ई पत्रिका प्रो. शिवनाथ चौबे के सम्पादन में मासिक रूप से प्रकाशित होखे लागल। भोजपुरी साहित्य के रचनात्मक विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान भइल। ई मासिक पत्रिका लगभग लगातार निकलत जा रहल बिया। पिछला कई बरिस से एह पत्रिका के सम्पादन अनिल ओझा ‘नीरद’ करत रहले। कई बरिस बाद, अब ई पत्रिका सभाजीत मिश्र के सम्पादन में प्रकाशित हो रहल बा। भोजपुरी में रचनात्मक साहित्य के श्रीवृद्धि में एह पत्रिका के अनुपम योगदान के नकारल नइखे जा सकत।

सन् 1978 में भोजपुरी के चार गो नया पत्रिकन के प्रकाशन शुरू भइल। पटना से प्रो. ब्रजकिशोर के सम्पादन में ‘भोजपुरी कथा-कहानी’, बिहार सरकार द्वारा गठित भोजपुरी अकादमी के पत्रिका ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’, जेकर सम्पादक आचार्य विश्वनाथ सिंह भइले, लखनऊ से राकेश कुमार सिंह के सम्पादन में त्रैमासिक ‘सनेहिया’, आउर ढोंढस्थान (सारन) से प्रो. वैद्यनाथ विभाकर के सम्पादन में अनियतकालिक ‘पपीहरा’। ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’ कुछ समय तक अकादमी के कार्यकारी निदेशक चित्तरंजन के सम्पादन में, फिर आगे चल के अकादमी के उपनिदेशक नागेन्द्र प्रसाद सिंह के सम्पादन में प्रकाशित भइल आ फेर बंद हो गइल। एकर अंतिम कुछ अंक काफी दबीज आ विशिष्ट रहले स। नागेन्द्र प्रसाद सिंह के सेवा-निवृत्ति के बाद एकर प्रकाशन बंद रहल ह, बाकिर, एह साल 2008 में फेर से एकर प्रकाशन डॉ. शिववंश पाण्डेय के सम्पादन में शुरू भइल रहे। अबहीं ई पत्रिका बन्द बा।

सन् 1979 में दू गो नया पत्रिका अइली स- दिघवा दुबौली (गोपालगंज) से गौरीकान्त ‘कमल’ के सम्पादन में पाक्षिक ‘लाल माटी’ आ बलिया से डॉ. अशोक द्विवेदी के सम्पादन में ‘पाती’ । शुरू में ‘पाती’ के चार अंक निकलला का बाद गतिरोध आ गइल आ पत्रिका बन्द हो गइल। फेर अगिला साल 1992 से नया कलेवर में एकर प्रकाशन होखे लागल। डॉ. अशोक द्विवेदी के सम्पादकीय ऊर्जा ‘पाती’ के जे विशिष्टता प्रदान कइले बा, ऊ भोजपुरी साहित्य खातिर महत्वपूर्ण अवदान साबित भइल बा। अबतक प्रकाशित ‘पाती’ के पचास-साठ अंक भोजपुरी के अनेक प्रतिभाशाली रचनाकारन के उजागर कइले बा।

जनवरी, 1980 से अप्रैल, 1987 तक नोखा (रोहतास) के साहित्य-कला-मंच के तत्वावधान में ‘झनकार’ नाम के पत्रिका के प्रकाशन जवाहर लाल ‘बेकस’ के व्यवस्था में भइल रहे, जेकर सम्पादक रहले फणीन्द्रनाथ मिश्र। ई हिन्दी आ भोजपुरी के मिलल-जुलल पत्रिका रहे। ओकरा बाद एह मासिक के प्रकाशन पटना से ‘पनघट’ के नाम से, जवाहर लाल ‘बेकस’ के सम्पादन में, होखे लागल आ एकरा में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खण्ड होखे लागल। सन् 1996 में ‘पनघट’ के प्रकाशन बंद हो गइल रहे। बाकिर, जनवरी, 1999 से त्रैमासिक रूप में फेर से एकर प्रकाशन ‘बेकस’ के सम्पादन में होखे लागल, जवना में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खंड पहिलहीं जइसन रहे लागल। एही त्रैमासिक रूप में ‘पनघट’ के नियमित प्रकाशन इनके सम्पादन में आजो जारी बा।

सन् 1980 में भोजपुरी के कुछ आउर नया-नया पत्रिका प्रकाश में अइली स- मुजफ्फरपुर से वाल्मीकि विमल के सम्पादन में पाक्षिक ‘भोजपुरी के गमक’; पटना से शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी के सम्पादन में भोजपुरी समाचार’; कुल्हड़िया (भोजपुर) से महेन्द्र गोस्वामी के सम्पादन में मासिक ‘आपन गाँव’; मोतिहारी से साँवलिया विकल के सम्पादन में मासिक ‘जोखिम’ आ जमशेदपुर से परमेश्वर दूबे शाहाबादी के सम्पादन में अनियतकालिक ‘साखी’ । एक-दू अंक निकल के ई सब पत्रिका बन्द हो गइली सन। ‘साखी’ के ‘परमेश्वर दूबे शाहाबादी स्मृति विशेषांक’ के सम्पादन डॉ. रसिक बिहारी ओझा ‘निर्भीक’ कइले रहलें।

सन् 1981 में छपरा से डा. धीरेन्द्र बहादुर चाँद के सम्पादन में ‘झकोर’, मठनपुरा (सीवान) से श्रीवास्तव प्रदीप कुमार ‘प्रभाकर’ के सम्पादन में ‘कचनार’ आउर दिनारा (भोजपुर) से अरुण भोजपुरी के सम्पादन में ‘तरई’ नाम के पत्रिका निकललीसन, जिनकर कुछ-कुछ अंक निकल पावल आ ई सब प्रत्रिका बन्द हो गइली सन।

सन् 1982 में छपरा से रामनाथ पाण्डेय आ डॉ. वीरेन्द्र नारायण पाण्डेय के सम्पादन में कहानी-पत्रिका ‘चाक’ के कुछ अंक निकलल, जवना से भोजपुरी में कहानी-लेखन के गतिविधि में सकारात्मक हलचल भइल बाकिर कुछए अंक के प्रकाशन का बाद ई विशिष्ट पत्रिका बन्द हो गइल।

एही साल (1982 में) गोरखपुर से मैनावती देवी श्रीवास्तव ‘मैना’ के सम्पादन में त्रैमासिक ‘सोनहुला माटी’, भलुनीधाम (रोहतास) से डॉ. नंदकिशोर तिवारी के सम्पादन में त्रैमासिक ‘माई के बोली’ आउर बडकी नैनीजोर (भोजपुर) से महेश्वराचार्य के सम्पादन में त्रैमासिक ‘दियरी’ के प्रकाशन शुरु भइल। बाकिर ई तीनू पत्रिका अल्पजीवी साबित भइली स। एही साल, पतरातू थर्मल पावर के वार्षिकी ‘भोजपुरी परिवार पत्रिका’ के प्रकाशन भइल रहे, जवना के सम्पादक रहले अनिरुद्ध दूबे, विपिन बिहारी चौधरी आ ब्रजभूषण मिश्र।

सन् 1983 में बीरगंज (नेपाल) से ‘सगुन’ नाम के पत्रिका विजय प्रकाश बीन के सम्पादन में निकलल, बाकिर आगे ना चल सकल। एही साल, छपरा से प्रो. हरिकिशोर पाण्डेय के सम्पादन में ‘कसौटी’ नाम के समीक्षा-पत्रिका निकलल। एह पत्रिका के सिर्फ चारे-पाँच अंक त निकल सकल, बाकिर भोजपुरी में समीक्षा के विकास का दिसाईं आपन अमिट छाप छोड़ गइल। एही साल, छपरा से अर्द्धन्दु भूपण के सम्पादन में बालोपयोगी त्रैमासिक ‘नवनिहाल’ के प्रकाशन शुरू भइल, जवना के उमिर कुछुए अंक ले सीमित रहल।

हरिद्वार (उत्तरप्रदेश) से डॉ. सच्चिदानन्द शुक्ल के सम्पादन में ‘भोजपुरी सनेस’ के प्रकाशन 1984 में शुरू भइल। एक अंक के बाद एकर नाम बदल के भोजपुरी आँगन’ कर दिहल गइल। तीन-चार अंक के बाद ई पत्रिका बन्द हो गइल। उनइस सौ चौरासिये में आरा से डॉ. रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’ के सम्पादन में ‘आपन भाषा’ के त्रैमासिक प्रकाशन शुरू भइल, बाकिर एकर दुइये अंक निकल सकल। एह पत्रिका के महिलांक निकाले के योजना रहे, जे कार्यान्वित ना हो पावल।

सन् उनइस सौ तिरासिये में, पटना से कुशवाहा कुसुम के सम्पादन में त्रैमासिक ‘पुजारिन’, दिघवारा (सारन) से प्रियव्रत शास्त्री ‘प्रीतेश’ के सम्पादन में ‘भोजकंठ’ आउर पटना से शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी आ रासबिहारी पाण्डेय के सम्पादन में भोजपुरी भाषा सम्मेलन पत्रिका’ के प्रकाशन शुरू भइल, बाकिर दू-तीन अंक निकलत-निकलत ई तीन पत्रिका बंद हो गइलीसन। बाद में, सन् 1993 में रासबिहारी पाण्डेय देवघर से ‘भोजपुरी भाषा सम्मेलन पत्रिका’ के फेर से शुरूआत कइले आ उनका जिनिगी-भर ई पत्रिका नियमित निकलत रहल, हालाँकि एकर भाषा-नीति विवादास्पद बनल रहल।

सन् 1985 में हरविलास नारायण सिंह के सम्पादन में पटना से ‘लटर-पटर’ आ विश्वनाथ भोजपुरिया के सम्पादन में ‘दिआ’ मासिक के प्रकाशन होखे लागल, बाकिर एह पत्रिकन के उमिर कुछुए अंक ले सीमित रहल।

सन् 1986 में बरौली (गोपालगंज) से दिनेश कुमार पाण्डेय ‘दिवाकर’ के सम्पादन में मासिक ‘आरती’, ढोंढस्थान (सारन) से प्रो. वैद्यनाथ विभाकर के सम्पादन में ‘भोजपुरी भारती’ आउर अरदेवा (सारन) से रामाज्ञा प्रसाद सिंह ‘विकल’ के सम्पादन में त्रैमासिक ‘कलेवा’ के प्रकाशन शुरू भइल, बाकिर एह सब पत्रिकन के उमिर कुछ-कुछ अंक तकले रहल।

सन् 1987 में साहेबगंज (मुजफ्फरपुर) से डॉ. ब्रजभूषण मिश्र के सम्पादन में ‘कोइल’ के मासिक प्रकाशन शुरू भइल। डॉ. धीरज कुमार भट्टाचार्य के आर्थिक सहयोग से ई पत्रिका अप्रैल, 1992 तक नियमित निकलत रहल।

एह अवधि में पटना से पशुपतिनाथ सिंह के सम्पादन में भोजपुरी कलम’ नाम के पत्रिका निकलल। प्रगतिशील विचारधारा आ तेवरदार भाषा-शैली का वजह से ई पत्रिका चर्चा में रहल, बाकिर आर्थिक वजहन से एकर प्रकाशन कुछुए अंक के बाद रुक गइल। सन् 1989 में मुजफ्फरपुर से कुमार विरल के सम्पादन में ‘हिरामन’ नाम के पत्रिका के दू अंक निकलल। एकरा बन्द भइला पर कुमार विरले के सम्पादन में ‘भोजपुरी आवाज’ नाम के पत्रिका निकलल, जें एके अंक ले सीमित रह गइल।

मई 1988 में लखनऊ से ‘भोजपुरी लोक’ नाम के मासिक पत्रिका डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य के सम्पादन में निकलल आ बारह बरिस ले निरन्तर निकलत रहल। ई हिन्दी आ भोजपुरी के द्विभाषी पत्रिका रहे, जवना में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खण्ड रहत रहे। हिन्दीओ खण्ड में भोजपुरी भाषा-साहित्य-संस्कृति विषयक सामग्री छपत रहे।

सन् 1988 में छपरा से बैकुण्ठ नारायण के सम्पादन में ‘पाँति-पाँति’ आउर जमालपुर से अशोक ‘अश्क’ के सम्पादन में ‘बटोहिया’ के प्रकाशन शुरू भइल। ‘बटोहिया’ के कथा-अंक बहुत सफल आयोजन रहे। अनियतकालिक रूप में ‘बटोहिया’ के कुछ अंक जब-तब निकले, बाकिर, आखिरकार, ई पत्रिका बंद हो गइल। 1989 में बेतिया (पश्चिमी चम्पारण) से चतुर्भुज मिश्र के सम्पादन में ‘हालचाल’ निकलल, बाकिर दू-तीन अंक से आगे ना चल सकल।

सन् 1990 में गोरयाकोठी (सीवान) से सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ के सम्पादन में ‘बिगुल’ के प्रकाशन शुरू भइल आ बरिसन ले निकलत रहल। एकर कविता-अंक आ लघुकथा-अंक विशेष चर्चित भइले सन। श्री अक्षयवर दीक्षित पर एकर विशेषांको बहुत अच्छा निकलल। ‘बिगुल’ का प्रकाशन से सैकड़न लेखक प्रकाश में अइलन। एही साल, साहेबगंज से ‘भोजपुरी त्रैमासिक’ नाम के पत्रिका कमलेश्वर प्रसाद पाठक का सम्पादन में निकलल रहे, जवना के उमिर दू अंक ले सीमित रहल।

सन् 1991 में बक्सर से विजयानन्द तिवारी के सम्पादन में त्रैमासिक ‘जगरम’ के प्रकाशन शुरू भइल, जे काफी अरसा ले जारी रहल। एह पत्रिका के ‘खोलकदास’ शीर्षक स्थायी स्तम्भ खूब चर्चित रहल। एह पत्रिका के लोक-साहित्य अंक बहुत पुष्ट आ स्तरीय रहे।

सन् 1991 में ही, बोकारो स्टील सिटी से ‘इंगुर’ नाम के त्रैमासिक रामनारायण उपाध्याय के सम्पादन में प्रकाशित भइल रहे। ई त्रैमासिक अल्पजीवी त जरूर रहे, बाकिर जवने दू-तीन अंक निकलल, ऊ साहित्यिक दृष्टि से स्वस्थ आ पुष्ट रहे।

सन् 1992 में बक्सर से प्रभंजन भारद्वाज के सम्पादन में ‘लहार’ आ 1993 में लखनऊ से सत्येन्द्रपति त्रिपाठी के सम्पादन के भोजपुरी के बोली’ नाम के पत्रिका प्रकाशित भइली स, जे कुछ अंक निकलला का बाद बंद हो गइली सन।

सन् 1994 में बरौली (गोपालगंज) से सच्चिदानन्द श्रीवास्तव के सम्पादन में त्रैमासिक ‘बायेन’ के प्रकाशन भइल, जेकर दू गो अंक निकलल। एही साल, आशापड़री (बक्सर) से चन्द्रधर पाण्डेय ‘कमल’ के सम्पादन में ‘भोजपुरी लहर’ के प्रकाशन शुरू भइल, जेकर सात गो अंक निकलल रहे।

सन् 1995 में बीरगंज (नेपाल) से गोपाल ‘अश्क’ के सम्पादन में ‘गमक’ के प्रकाशन भइल रहे, जेकर चार-पाँच अंक निकलल रहे। एही साल, हीरालाल अमृतपुत्र, मदन प्रसाद आ जयकान्त सिंह ‘जय’ के सम्पादन में ‘उगेन’ नाम के पत्रिका के कईगो अंक निकलल रहे।

सन् 1996 में सेतु न्यास (मुम्बई) द्वारा संचालित विश्व भोजपुरी सम्मेलन, देवरिया (उत्तरप्रदेश) के त्रैमासिक पत्रिका ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ के प्रकाशन डॉ. अरुणेश ‘नीरन’ के सम्पादन में शुरू भइल। सुन्दर, सुभेख आ पृथुलकाय एह विशिष्ट त्रैमासिक के सन् 2008 तक अट्ठाईस गो अंक प्रकाशित हो चुकल बा, जवना में कहानी-विशेषांक, धरोहर-विशेषांक, स्त्री-विशेषांक, कविता-विशेषांक आउर संस्मरण-विशेषांक अतिशय महत्व के बाटे। भोजपुरी भाषी क्षेत्र के हिन्दी आ संस्कृत के विद्वान आ साहित्यकार लोगन के कलम से भोजपुरी के रचना लिखवावे में एकर सम्पादक का बहुते सफलता मिलल बा, जेकरा खातिर ऊ बधाई के पात्र बाड़े।

एही साल, कॉलेज शिक्षकन के भोजपुरी संस्था ‘भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद’ का ओर से एही नाम के एगो पत्रिका डॉ. प्रभुनाथ सिंह का सम्पादन में प्रकाशित भइल रहे। बाकिर आगे एकर प्रकाशन ना हो सकल।

1997 में भगवान सिंह ‘भास्कर’ के सम्पादन में सीवान से ‘बयार’ नाम के पत्रिका निकलल रहे, जेकर छव गो अंक प्रकाशित भइल रहे।

सन् 1998 में दिल्ली से महेन्द्र प्रसाद सिंह के सम्पादन में नाटक आ रंगमंच पर केन्द्रित एगो अनियतकालिक पत्रिका ‘विभोर’ के प्रकाशन शुरू भइल, जेकर सात-आठ अंक सन् 2008 तक प्रकाशित हो चुकल बा।

सासाराम (रोहतास) से डॉ. नन्दकिशोर तिवारी के सम्पादन में ‘सुरसती’ नाम के पत्रिका सन् 1999 से ही प्रकाशित हो रहल बा। सन् 2008 तक एकर लगभग पचीस अंक प्रकाशित हो चुकल रहे। अबो जब-तब एकर अंक देखे में आवेला।

एह अवधि में निकलेवाली एगो विशिष्ठ मासिक पत्रिका रहे बलिया से प्रकाशित होखे वाली ‘भोजपुरी विकास चेतना’, जेकर सम्पादक रहले डॉ. राजेन्द्र भारती। अइसे त ई पत्रिका बरिसन पहिले शुरू भइल रहे, बाकिर तुरन्ते बंद हो गइल आ फेर कई बेर शुरू आ बन्द होत रहल। बाकिर राजेन्द्र भारती के सम्पादन में एकर निरन्तरता एगो लम्बा समय तक बनल रहे आ एकर साहित्यिक स्तरो श्लाघनीय बनल रहल।

जुलाई, 1999 से ‘कविता’ नाम के त्रैमासिक पत्रिका भोजपुरी साहित्य प्रतिष्ठान, पटना से नियमित रूप में प्रकाशित होत रहल बा, जेकर सम्पादक हवे कविवर जगन्नाथ आ सह-सम्पादक हवे भगवती प्रसाद द्विवेदी। अबतक एकर बावन गो अंक प्रकाशित हो चुकल बा। वित्त-पोषण के अभाव का चलते 52 अंक के लोकार्पण का बाद, एकर त्रैमासिक प्रकाशन बंद कर दिहल गइल बा, एह संकल्प का साथे कि एकर वार्षिक प्रकाशन कइल जाई। विविध भावबोध आ विविध शिल्प-शैली के उत्कृष्ट कवितन का अलावे कविता-विषयक लघु निबन्ध आ कविता-पुस्तकन के समीक्षा से लैस ई पत्रिका भोजपुरी कविता के उत्कर्ष के प्रति समर्पित रहल बा।

अगस्त, 2000 में सीवान से भगवान सिंह ‘भास्कर’ के सम्पादन में ‘उड़ान’ नामक पत्रिका प्रकाशित भइल रहे, मगर दू अंक से आगे ना बढ़ सकल। जनवरी-मार्च 2001 में ‘महाभोजपुर’ नाम के पत्रिका विनोद कुमार देव का सम्पादन में सज-धज से निकलल, बाकिर आगे ओकर प्रकाशन ना बढ़ सकल।

विश्व भोजपुरी सम्मेलन के राष्ट्रीय इकाई के तत्वावधान में पटना से ‘भोजपुरी विश्व’ नाम के पत्रिका के प्रकाशन कई बरिस ले रहल बा, जेकर प्रधान सम्पादक रहले डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय आ सम्पादक बाड़े डॉ. लालबाबू तिवारी। डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय के निधन के बाद ई पत्रिका देखे में ना आइल।

जमशेदपुर से अजय कुमार ओझा के सम्पादन में ‘निर्भीक संदेश’ नामक त्रैमासिक पत्रिका सन् 2002 से प्रकाशित हो रहल बा। ई द्विमासिक पत्रिका ह, जवना में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खण्ड रहेला। सुरुचिसम्पन्नता आ नियमितता एह पत्रिका के विशेषता बा।

सन् 2006 से लखनऊ से ‘भोजपुरी संसार’ नामक त्रैमासिक के नियमित प्रकाशन होत रहल। श्रीमती आशा श्रीवास्तव एकर सम्पादक बाड़ी आ मनोज श्रीवास्तव एकर समन्वयक सम्पादक बाड़े। सुरुचिसम्पन्नता आउर सुन्दर गेटअप-मेकअप के ई मनोहारी पत्रिका आम लोगन में बहुत लोकप्रिय रहल बा। भोजपुरी के कुछुए पत्रिका अइसन बाड़ी सन, जवना के उत्तर भारत के विभिन्न शहरन के पत्रिका का स्टालन पर देखल जा सकेला। ‘भोजपुरी संसार’ अइसन कुछ पत्रिकन में से एगो रहे। बाकिर अब ई पत्रिका देखे में नइखे आवत।

सन् 2007 में मुजफ्फरपुर से ‘भोर’ नाम के एगो त्रैमासिक के प्रकाशन शुरू भइल, जवना के चार गो अंक निकल सकल। एह पत्रिका के प्रधान सम्पादक रहले डॉ. ब्रजभूषण मिश्र आ सम्पादक रहले डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’। एकरा प्रकाशन में तत्काल गतिरोध हो गइल बाकिर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर में भोजपुरी के पढ़ाई होखे का चलते एह पत्रिका में छात्रोपयोगी सामग्री के समावेश से उमेद कइल जा सकेला कि एकर प्रकाशन में आइल गतिरोध जल्दिए खतम हो जाई।

जुलाई-सितम्बर, सन् 2008 से ‘परास’ नाम के एगो त्रैमासिक के प्रकाशन तेनुघाट (झारखण्ड) से होत रहल। निबन्ध, कहानी, कविता आदि सब विधन से लैस एह पत्रिका के सम्पादक बाड़े डॉ. आसिफ रोहतासवी। एकर स्तरीय प्रकाशन जारी बा, जेकर श्रेय एकरा सम्पादक के बा।

एह पत्र-पत्रिकन का अलावे, भोजपुरी के सम्मेलनन के अवसर पर प्रकाशित स्मारिको सभन अनियतकालिक पत्रिकन खानी बढ़िया सामग्री पाठकन खातिर परोसत रहल बाड़ी सन।

हिन्दी के दैनिक पत्र ‘आज’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘राँची एक्सप्रेस’, ‘नवभारत’, ‘प्रभात खबर’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘जनसत्ता’, ‘दैनिक जागरण’, ‘भोजपुरी फोरम’ जइसन अखबार समय-समय पर भा धारावाहिक रूप से भोजपुरी भाषा-साहित्य-संस्कृति विषयक ज्ञानवर्धक आ रोचक सामग्री परोस के भोजपुरी के पत्रकारिता के आ भोजपुरी के साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्कर्ष के प्रोत्साहित कइले बाड़े स। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के बिलासपुर (मध्यप्रदेश) में आयोजित आठवाँ अधिवेशन के अवसर पर ‘बिलासपुर टाइम्स’ नामक दैनिक पत्र आपन विशेषांक त निकललहीं रहे, पूरा-के-पूरा विशेषांक भोजपुरिए- भाषा में निकलले रहे।

एह पत्र-पत्रिकन के अलावा नवंबर, 2008 से श्री विनोद कुमार तिवारी के संपादन में जमशेदपुर से मासिक समाचार-पत्रिका ‘गाँव-घर’ के प्रकाशन हो रहल बा। एगो आउर नया तिमाही ‘भोजपुरिया अमन’ के भी प्रकाशन उहें से होत रहल, बाकिर अब ओकर अंक देखे में नइखे आवत।

भोजपुरी पत्रकारिता के विवेचन से एक बात साफ बा कि भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन में साहित्यिके सामग्री प्रस्तुत करे पर विशेष ध्यान दिहल जात रहल बा। साहित्येतर समाचार, सूचना, रपट आदि के समावेश भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन में कमे होत रहल बा। कुछेक समाचारप्रधान पत्रिका निकललो बा, त ओह में भोजपुरी के साहित्यिके प्रगति भा गतिविधि के स्थान मिलल बा। देश-दुनिया के साहित्येतर खबरन के समावेश इन्हनी में ना के बराबर होत रहल बा।

बाकिर, एह अभाव के पूर्ति का दिसाईं एगो अत्यन्त महत्वपूर्ण डेग एही साल 2008 में अरिन्दम चौधरी उठवले बाड़े ‘द संडे इंडियन’ के भोजपुरी संस्करण प्रकाशित कइके। ई समाचार-साप्ताहिक पत्रिका अंग्रेजी, हिन्दी, उर्द, बंगला, तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयानम, गुजराती, मराठी, असमिया, उड़िया आ पंजाबी का साथे-साथे भोजपुरिओ में प्रकाशित होखे लागल बा। ‘द संडे इंडियन’ जइसन समाचार-साप्ताहिक के भोजपुरीसंस्करण प्रकाशित करके भारत के संविधान-स्वीकृत भाषा सभन का पाँत में भोजपुरी के प्रकारान्तर से प्रतिष्ठित करेके जे महत्कार्य कइल गइल बा, ओकरा खातिर भोजपुरीभाषी जनता सदैव आभारी रही। उमेद कइल जा सकेला कि एह से प्रेरणा पाके भोजपुरी में कुछ समाचार-साप्ताहिक आउरो प्रकाशित होइहेंसन। भोजपुरी में कवनो दैनिको समाचार पत्र प्रकाशित होखे, एकर कल्पना त आउरो सुख देबेवाला बा।

(सभारलेखाञ्जलिसे )


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Hum BhojpuriaOctober 12, 20211min2400

आकृति विज्ञा अर्पण

जब भारत क सुराज क सपना अकुलाहट के संघरी जन जवार के बीचे एठो आंदोलन के रूप में आइल त अंग्रेजन के भी भीतर मने बुझाइये गइल रहे कि अब दाल ढेर दिन ना गली।

ओह बेरी पूरे भारत में अलग अलग नायक लोग उभरत रहो ताकि माटी के पूतन के एक जोड़े सुराज क नींव रखास आ गुलामी क दिन बीतस।

मेहरारु स चाकी जाता चरखा सब पे सुराजी गीत गावे जां, सुराजी गीत कहीं त ऊ गीत जवना में सुराज क सपना, सुराज क मरम और सुराज बदे लड़ाई क चरचा होखस।

सुनीले कि तर तीज मेहरारु स चूड़ी बिंदी कीनल,सजल संवरल छोड़-छोड़ के लइका मरद सब के खिआवे पीयावे में लगली ताकि जुद्ध करेके पड़ो त तइयारी कम न पड़ो।

अगर केहूं क नाम लेब आ केहूं छूटी त अपना के अंखरी एही से एह बतकही में ओह कथवन क चर्चा रख रहल बानी जवन सुराजी भाव जगावत मेहरारु स के तप जोग सामने रखी,मन भीजि जाला आ माथा सम्मान में झुकि जाला कि अस अस महतारी एह सुराजी धेय में लगल रहली स।

गोरखपुर में वनसप्ति जंगल लगे मेहरारू स बिटुरके दुपहर बाद सुराजी गीत गांवे आ जेल में बंद कैदी लोगन खातिर थईली सीअत रहें। मेहरारू स क ई गतिविधिन क भनक जब अंग्रेजन के लगल त ऊ लोग अपना मुलाजिम से सनेसा भेजवा क मेहरारुन क इकट्ठा होखला पर रोक लगा देहलस। ओकरे बाद भी ई लो चुप्पे से इकट्ठा होत रहें।  अंग्रेजन क शक भइल त ऊ सब खुदे देखे पहुंचलन। ओ कुल क गोल गुजरत देखि के मेहरारू स गोल ही घेर लेहली आ लगली गीत गावे। अंग्रेज स बूझि न पावस त ऊ लोग अपना चतुरबुद्धि से बइठा क पहिले बगले में एठो ऊंचहा जगही के लगली पूजे आ बगली के (थोड़े दूर) पंडिजी के कोठरी से पिसान आ महीया मिला के गुलगुला बनावे लगली आ लगली पिंडी पे चढ़ावे। अंग्रेज स एके कौनो पूजा समझलें। मेहरारु सब ओहू सन के ख़ूब गुलगुला खिअवली। ओह गुलगुला बनावत बेरी  में मुंशीआइन एक ठो जड़ी पिसि के मिला देहली। अंग्रेज सबके गुलगुला नीक त लागल बाकि ओही बाद ऊ लोग बेहोश हो गइलन आ ओकरे बाद मेहरारु स हाथ गोड़ बान्हि के कप्तान के घरे ले गइली। बादे  में कप्तान ओ लोग क बटुर के गीत गवनई क मांग मान लेहलन।

उहां  मेहरारु बाद में गांव गांव बटोरे लगली और ओह में कलकत्ता क एठो बैद जी क मेहरारु सबके भाला चलावल भी सीखावे लगली। बगलिये के एठो मुखबिरी के कारण मेहरारुन क गोल टूट गइल  बाकि उहां से बहुत सूत कताईल, बहुत चानी के सिक्का मेहरारु स सुराजी बैठकी क खरचा बदे देहली, जहां सेनानी लोग आपन योजना गढ़े।

रहिह कुआंर ए ननदि रनिया

करिह बीआह जो त जनिह सपूतवा

सुराज के निछार ए ननदि रनिया

एक पूत भेजिके दूसरा तू पोसिह

ऊहो रही तईयार ए ननदि रनिया………

जब ई गीत हम बचपन में रहरी क दाल दरात बेरी सुनि के गाईं त मन भीजी जात रहे कि अस त्याग तप से ई आपन धरती नसीब बा त एहके खातिर हमें भी करतब निबाहे के बा जवना बदे हम तैयार बानी।

न जाने केतना केतना कहानी स घरे घरे से जुड़ल होईहें जे लोग भारत के स्वाधीनता बदे खानदान खानदान मिट गइलन। धन्य बानी हमनी जां कि ई धरती आपन धरती ह।

जय भारत माई,वंदे मातरम्……..


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min3150

लेखक- मनोज भावुक

1857 के क्रांति के बारे में सभे पढ़ले बा, सुनले बा, जनले बा। अंग्रेज आ ओकनी से प्रभावित अधिकतर इतिहासकार एह महान क्रांति के सैनिक विद्रोह के नाम दे के भुलवावे के कोशिश कइलें बाकिर भारत के लोग एकरा के पहिला स्वतंत्रता संग्राम कहल। एह संग्राम में अइसे त एक से एक लड़ाका लोग रहे बाकिर एगो योद्धा जे अपना बुढ़ापा में भी जवान लेखां लड़ल आ अंतिम सांस तक अंग्रेजन के ग़ुलामी ना मनलस, ओकरा जीवन के आखिरी लड़ाई के जीत के उपलक्ष्य में 23 अप्रैल के विजय दिवस के रूप में मनावल जाला। ओह योद्धा के नाम रहे वीर बांकुड़ा बाबू कुँवर सिंह। कुँवर बाबू 23 तारीख के अपना कटल हाथ पर पट्टी बान्ह के युद्द मैदान में कूद गइलें, 80 बरिस के बूढ़ शरीर रहे बाकिर जोश अइसन कि अंग्रेज के एगो जाँबाज कर्नल ली ग्रांड के सेना समेत भुजरी-भुजरी काट देहलें आ जगदीशपुर के अपना कब्जा में कर के आजाद करा देहलें। कुँवर बाबू के वीरता के इतिहासकार अनदेखी कइलें, लोग उनके भुला देहलस। बाकिर, उनके शौर्य गाथा के सुनला के बाद रोआँ रोआँ फड़फड़ा जाला आ यकीन हो जाला कि उनके समकालीन आ उनका से कई बार आमना सामना के युद्ध करे वाला एगो अंग्रेज अफसर डगलस उनका बारे में साँचे लिखले बा कि “कुँवर अगर जवान होता तो उसने कब का अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेड़ दिया होता”।

कंपनी सरकार भारत व्यापार करे के बहाने आइल आ इहाँ अधिकार जमा लेहलस। देश के अधिकतर रियासत अंग्रेजी हुकूमत के अधीन रहे बाकिर कुछ रियासत अइसन भी रहे जवन अंग्रेजन के लगान देव बाकिर अपना मर्जी से राज पाट चलावे आ बाहरी हस्तक्षेप कम होखे देव। अइसने एगो रियासत रहे जगदीशपुर। जगदीशपुर के एगो जमींदार रहलें साहिबज़ादा सिंह आ उनके चार गो बेटा रहलें, कुँवर सिंह, दयाल सिंह, राजपति सिंह, अमर सिंह। साहिबज़ादा सिंह के चाचा आ चचेरा भाई लोग उनसे जगदीशपुर धोखाधड़ी से हड़प लेले रहे जवन उ बाद में अदालती लड़ाई लड़ के हासिल कइलें। ई सब घटना ह 18वीं शताब्दी के सातवाँ दशक से लेके 19वीं शताब्दी के पहिला दशक के बीच के। साहिबज़ादा सिंह के जब जगदीशपुर मिलल त उ कर्जा में नाक तक डूबल रहे। उ कर्जा भरे खातिर खूब कोशिश कइलें बाकिर ना भर पवलें। उनका मृत्यु के बाद सन 1826 ईसवी में जगदीशपुर के हुकूमत उनके सबसे बड़ बेटा कुँवर सिंह के मिलल आ फेर जगदीशपुर के भाग्य चमकल।

कुँवर सिंह व्यवहार कुशल रहलें, मृदुभाषी रहलें अउरी बहादुर रहलें जेकरा चलते अंग्रेज अफसर उनके मुरीद रहलें आ ओकर फायदा उनके ई मिलल कि कुँवर सिंह के राज के शुरुआती समय में अंग्रेज जगदीशपुर के आंतरिक मामला में कम दखल देहलsसन। पटना के कमिश्नर विलियम टेलर के साथे त उनके मित्रता भी चलल। कुँवर बाबू बड़ा परोपकारी रहलें। उ अपना जीवन में एतना दान पुण्य कइलें, सदाव्रत चलवलें कि उनके रियासत के लोग हमेशा कुँवर सिंह के आपन प्यार आ समर्थन देहलस। उनके शासन बेवस्था एह बेरा के लोकतांत्रिक शासन के जइसन रहे। सभके समान अधिकार रहे, सभके बोले के आजादी रहे, सभे खुश आ संतुष्ट रहे। कुँवर के राज से पहिले जगदीशपुर के दिन-दशा बड़ा खराब रहे, रियासत पर लगभग 18 लाख के कर्ज लदाइल रहे, सालाना मालगुजारी से कमाई होखे 6 लाख रुपया के आस पास। कुँवर अइलें, नहर तालाब, बांध के निर्माण करवलें, कृषि के सुधार भइल, लोग में जगदीशपुर के विकास खातिर उम्मीद जागल, जंगल बसावल गइल, सड़क बनल, पाठशाला बनल, पढ़ाई-लिखाई में लोग होशियार होखे लागल आ मेन बात कि अंग्रेजन के हस्तक्षेप कम रहे, एह के परिणति ई भइल कि उहे जगदीशपुर जवन बेहाली में रहे, तरक्की के राहे चले लागल। सालाना मालगुजारी से कमाई सीधे 8-9 लाख के लगे पहुँच गइल आ आज से दू-सवा दू सौ बरिस पहिले एकर मोल अरबों में रहे।

कुँवर सिंह के लोकप्रियता अइसन कि आस पास के जमींदार जरे लगलें, अंग्रेज उल्टा उनके सलामी दागे लगलें। ओह बेरा कंपनी सरकार के अत्याचार चरम सीमा पर रहे, देश भर में विद्रोह के आगि सुनुगत रहे। कुँवर बाबू भी विद्रोहियन के संपर्क में रहलें, 1845 में सोनपुर मेला में एगो बड़हन गुप्त बैठक भी कइले रहलें। जब विद्रोह के आग धीरे-धीरे उपरियाइल त ओकर गर्मी अंग्रेजन तक पहुंचल, ओकनी का चिहुंक गइलन सन। ओहू ओर से तैयारी होखे लागल। जब दक्षिण के दक्कन से लेके उत्तर के दिल्ली, पच्छिम के मराठा से लेके पुरुब के सभ क्रांतिकारी राजा, महाराज, जमींदार, देशी सैनिक में गँठजोड़ भइल कि सुराज पा लेबे के बा त एगो दिन तय भइल। 1 जून 1858 के पूरा देश में अंग्रेजन के खिलाफ जंग होई आ ओकनी के कहीं बाहर से मदद ना लेबे दिहल जाई, सभके एही भारत भूमि में गाड़ दिआई। बाकिर एगो घटना 1857 में बैरकपुर छावनी में घटल। सूअर आ गाय के चर्बी से बनल कारतूस के विरोध में मंगल पांडे नाम के सैनिक के अगुआई में ब्रिटिश आर्मी के देसी पटलन गोरन पर गोली चला देहलस। विद्रोह के ई चिंगारी रहे जवन आग बनल जब मंगल पांडे के फांसी दिआ गइल आ फेर एकाएक चारों ओर क्रान्तिकारियन के मारल जाए लागल।

एने कुँवर बाबू भी तैयारी में रहलन। उ एगो दूरदर्शी सोच के जमींदार रहन। भले उनका लगे छोट रियासत रहे बाकिर उ आपन सेना के गठन कइलें, सेना के ट्रेनिंग खातिर बाहर से ट्रेनर मंगवलें, हथियार के गुपचुप निर्माण खातिर कारखाना बनवलें। दानापुर छावनी में भी विद्रोह भइल आ 25 जुलाई 1857 के तीन गो बटालियन 7वीं, 8वीं अउरी 40वीं बटालियन कुँवर सिंह से मिल गइल। कुँवर सिंह के आपन लड़ाका दल रहबे कइल, बाकी जगदीशपुर रियासत के किसान, मजदूर, सवर्ण जाति के लोग सभ उनसे मिल गइल आ उनके लगभग 5000-8000 के संख्या में सेना बल हो गइल। कुँवर बाबू के नेतृत्व में आरा पर चढ़ाई भइल आ जेलखाना, खजाना, कलक्टर ऑफिस आ थाना सभ पर कब्जा हो गइल। उहाँ के सगरो अंग्रेज अफसर जाके बॉयल हाउस (आरा हाउस) में लुका गइलें आ 6-7 दिन से बंद रहलें। ई कुँवर सिंह के जंग में पहिला लड़ाई रहे। ओकरा बाद कुँवर सिंह डनबर के हरवलें। बाकिर हथियारन के कमी अउरी अत्याधुनिक तोप आ बंदूक के सामने उनकर सेना तितर-बितर हो गइल अउरी एगो अंग्रेज कमांडर विन्सेंट आयर से हार गइलें आ आपन युद्ध रणनीति बदल देहलें। उ बाकी क्रान्तिकारियन से मिले आ अंग्रेजन के खिलाफ लड़ाई करे खातिर दोसरा रास्ता चल देहलें।

2 अगस्त के बाद कुँवर सिंह के अपना सेना के साथे जवन मार्च निकलल त सासाराम, रॉबर्ट्सगंज, रीवा, कलिंजर, बांदा, काल्पी होत कानपुर, लखनऊ, गाजीपुर, आजमगढ़, बलिया, अतरवलिया होत फेर 21 अप्रैल के जगदीशपुर लवटल। एह बीच कुँवर सिंह लगभग 20 गो से अधिका अंग्रेज कमांडर, योद्धा आ अफसरन के नाक से चना चबववलें, कईगो के मउगत के घाट उतरलें, कईगो के जीवन दान देहलें। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अइसन कवनो बीर बलवान ना भइल जे 80 बरिस के उमिर में 9 महीना के लमहर संग्राम-यात्रा पर निकलल होखे आ एतना क्रांति के आग सभमें भड़कवले होखे। उ अइसन समय रहे कि बड़ बड़ लड़ाका लोग खाली अपने किला आ रियासत खातिर लड़ल। बाकिर एगो भोजपुरिया योद्धा जहां गइल ओकरा खातिर लड़ल। एह क्रम में उनका आँखी के सामने आपन पोता, बेटा, मित्र के जान गइल बाकिर उ लड़त रहलें एह भारत के माटी खातिर, अंग्रेजन के जुल्म मिटावे खातिर। एह लड़ाई में आरा के मशहूर नर्तकी धर्मन बाई भी उनका साथे रहली। कुँवर आ धर्मन के केमेस्ट्री अलग से फेर कबो।

21 अप्रैल के गंगा नदी पार करत बेरा डगलस नाम के एगो अंग्रेज सेना अफसर उनके दाहिना बांह में गोली मार देहलस। कुँवर बाबू बिना हिचक के उ बाँहिए काट के गंगा मइया में दहवा देहले। अगिला दिने उनके घाव पर मरहम पट्टी भइल। तले एगो स्थानीय अंग्रेज अफसर ली ग्रांड के जगदीशपुर पर चढ़ाई करे के खबर आइल। ई घायल बूढ़ शेर फेर दहड़लस आ 23 अप्रैल के अपना प्रिय भाई अमर सिंह, सेनापति हरीकिशन सिंह आ कुछ और योद्धा के लेके ली ग्रांड के मटिया मेट क देहलें। ई उनकर आखिरी लड़ाई रहे, ओह दिन ब्रिटिश झण्डा यूनियन जैक उतरल, परमार वंश के झण्डा लहराइल आ अमर सिंह नया जमींदार बनलें अउरी उनके लइका उत्तराधिकारी। कुँवर बाबू के कटल हाथ के घाव में संक्रमण बढ़ल, बूढ़ शरीर रहे, उनके तबीयत बिगड़े लागल आ ऊ 26 अप्रैल के स्वर्ग के अनंत यात्रा पर चल गइलें। बाकिर, आपन प्रण निभा गइलें कि ना अंग्रेजन के गुलामी स्वीकार करब ना ओकनी के हाथे मरब। बारम्बार नमन बा माँ भारती के सच्चा सपूत वीर बाँकुड़ा कुँवर सिंह के।


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min3890

विश्वजीत शेखर

देश के आज़ादी के पचहत्तर बरीस पूरा होखे वाला बा आ सरकार का ओर से ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ नाँव से एगो कार्यक्रम चल रहल बा। एह कार्यक्रम में इतिहास में विस्मृत आज़ादी के नायक-महानायक लोग के भी चिन्हित क के उचित सम्मान देहला के योजना बा। ए कार्यक्रम के नज़र से अगर हमनी का पूर्वी उत्तर प्रदेश आ पश्चिमी बिहार के इतिहास के देखल जाव त अठारहवीं सदी के सारण्य क्षेत्र के राजा आ राजतमकुही के संस्थापक महाराजा फ़तेह बहादुर शाही के संघर्ष गाथा बहुत प्रासंगिक लागी।

महाराजा फ़तेह बहादुर शाही के राजधानी हुस्सेपुर रहे जवन ए बेरा के गोपालगंज जिला में भोरे प्रखंड के लगे पड़ेला। इनका राज्य के चौहद्दी ए बेरा के गोपालगंज, सारण (छपरा), सिवान आ कुशीनगर जनपद में रहे। राजा साहेब के शासन काल में ए बेरा के बिहार राज्य सूबा-ए-बंगाल के हिस्सा रहे जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र सूबा-ए-अवध के अंतर्गत स्थापित रहे। महाराजा फतेह बहादुर साही द्वारा बंगाल क्षेत्र के मालगुज़ारी पटना स्थित बंगाल नवाब के कार्यालय में जबकि अवध क्षेत्र के मालगुज़ारी गोरखपुर स्थित नवाब अवध के कार्यालय में जमा करावल जाव।

बक्सर के लड़ाई में कंपनी सरकार से अवध आ बंगाल के सम्मिलित हार के बाद भइल सन 1765 ईसवी के इलाहाबाद संधि के अनुसार बंगाल क्षेत्र पर कंपनी सरकार के हुकूमत कायम हो गइल आ एइजा के मालगुज़ारी के मालिकान हक़ कंपनी सरकार के मिल गइल। महाराज फतेह बहादुर साही गजब के वीर आ स्वातंत्र्यचेता पुरुष रहनी। उहाँ के कवनो विदेशी शक्ति के मालगुज़ारी दिहल उचित ना लागल आ उहाके सन 1765 में कंपनी सरकार से विद्रोह क देहनी। महाराजा फ़तेह साही के विद्रोह ईस्ट इण्डिया कंपनी के सत्ता स्थापित होखे के बाद कइल पहिला विद्रोह रहे। अक्षयवर दीक्षित जी सहित अनेक विद्वान लोग फतेह साही के स्वतंत्रता संग्राम के पहिला नायक के रूप में वर्णित कइले बा।

जयचंद आ मीर जाफ़र से भरल भारत के इतिहास में हर स्वतंत्रता प्रेमी के अपना विद्रोह के कीमत चुकावे के पड़ल बा। महाराजा फ़तेह साही अंग्रेजन से मिलके राज चलावे के स्थान पर उनसे लोहा लेबे के ठान लिहलीं। अंग्रेज जब कवनो कीमत पर उहाँ के राज्य में मालगुज़ारी ना वसूल पवलें सन तब ऊ राजधानी हुस्सेपुर के तबाह कर दिहले सन। अवध पर कंपनी हुकूमत के अधिकार ना रहे, एकर लाभ उठाके राजा साहब अपना राज्य क्षेत्र के अवध वाला हिस्सा में झरही नदी के किनारे, बाकजोगनी जंगल में (वर्तमान तमकुही, कुशीनगर) आपन कैंप लगवलीं आ गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से कंपनी हुकूमत से लड़े लगलीं। राजा साहब सन 1790 के आसपास तमकुही के राजधानी बना के राज तमकुही के स्थापना कइलीं जवन वर्तमान में एगो नगर पंचायत, विकास खंड अउर तहसील मुख्यालय बा।

महाराजा फ़तेह शाही जी कंपनी हुकूमत के खिलाफ 23 बरिस तक लगातार संघर्ष कइलीं जेकरा चलते उहाँ का जियते कम्पनी सरकार तमकुहीराज का क्षेत्र में कर वसूली ना करे पाइल। अंगरेज अपना पत्र अउरी गजट में लिखले बाड़े सन कि “बाजीराव पेशवा जेतना परेशान हमनी के सिपाहिन के ना कइलन, ओसे कई गुना अधिका फतेह बहादुर शाही कर दिहलन। प्रसिद्ध विद्वान महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी फतेह शाही के महाराणा प्रताप के समकक्ष योद्धा लिखले बानी। ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ कार्यक्रम के माध्यम से महाराजा फ़तेह बहादुर शाही के चिन्हित कs के यथोचित सम्मान दिहल, इहाँ के गौरवशाली इतिहास अउरी महाराजा के संघर्ष के जन मानस में स्थापित करे के एगो सशक्त कदम होई जेसे आवे वाली पीढ़ी स्वतंत्रता के ए महानायक के जीवन से प्रेरणा ले सकी।

परिचय : विश्वजीत शेखर राय के मूल निवास कुशीनगर जनपद के सलेमगढ़ ग्राम ह। हैदराबाद में एगो बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी में कार्यरत बानी। भोजपुरी भाषा आ साहित्य में रूचि के कारण तमकुही समाचार इ पत्रिका के संपादक बानी। 


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min3030

भगवती प्रसाद द्विवेदी

महल के कंगूरा त अनसोहातो सभकरा के लोभावेला, बाकिर नेंव में दबल ईंटा के ना त केहू कीमत बूझेला, ना ओने निगाहे धउरावे के जरुरत महसूस करेला। इहां ले कि कंगूरो के एह तथ के एहसास ना होला कि नेंव के ईंटे के बदउलत ओकर माथ गरब से उठल बा। देश के आजादी के लड़ाई में जे आपन तन-मन-धन, सउंसे जिनगी हंसते-हंसत निछावर कर दिहल आ आखिरी दम ले गोरन के दमन-चक्र के खिलाफ जमिके लोहा लिहल, ओकरा के आजु  हमनीं के कतना जानेलीं जा! हालांकि ओह लोगन के ई मनसो ना रहे कि लोग ईयाद रखो, बाकिर हमनिओं के त कुछु फरज बने के चाहीं। चंपारण के गान्हीं पं.राजकुमार सुकुल नेंव के ओइसने ईंटा रहलन, जेकर लगातार उपेक्षे होत आइल बा। निलहा गोरन के अमानवी अनेति-अतियाचार ना खाली ऊ अपना आंखी देखलन, बलुक खुद ओकर भुक्तभोगियो रहलन। उन्हुके पहल कदमी से गान्हीं जी आ सउंसे  देश के धियान एह अमानवीयता के ओर गइल अउर तब ओह आन्दोलन के लुत्ती दुनिया-जहान में जंगल के आगी जइसन फइलल। इहे कारण बा कि अहिंसक आन्दोलन के ओह पहिलका प्रेरणास्रोत के केहू ‘चंपारण के गान्हीं’ कहेला, केहू ‘सतवरिया के संत’ संबोधित करेला, त केहू बिहार के अख्यात गान्हीं कहेला। उन्हुकरे भागीरथ प्रयास के परिणाम रहे कि गान्ही जी ना सिरिफ पहिलका बेर बिहार आ चंपारण के धरती पर अइनी बलुक उहवां अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन के अगुवाई क के शोषित किसान-मजूरन के ऐतिहासिक जीतो दियववनी। एह दिसाई लोकनायक जयप्रकाश नारायण के कहनाम रहे-‘स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में श्री राजकुमार शुक्ल का नाम अमिट रहेगा, क्योंकि इन्हीं के द्वारा गांधी जी को चंपारण में निलहे गोरों के अत्याचारों की कहानी मालूम हुई और उन्होंने चंपारण पहुंचकर सत्याग्रह छेड़ने का निश्चय किया। चंपारण सत्याग्रह गांधी जी की अहिंसक लड़ाई का पहला अध्याय राजकुमार शुक्ल की प्रेरणा से शुरू हुआ।’

चंपारण में निलहा साहेबन के दइती अनेत के पराकाष्ठा। नील के खेती करे खातिर अलचार छोड़ सभे छोट-बड़ किसान- रैयत गाहे-बगाहे किसिम-किसिम के ‘कर’ के भरपाई के भार, इचिकियों चूं-चपड़ कइला, मुंह खोलला भा अलचारी जाहिर कइला पर कठोर सजा। नील के खेती ना सिरिफ ओह उपजाऊ जमीन खातिर, बलुक सउंसे मनुजातो खातिर सराप रहे। तबे नू एह भावभूईं पर मंचित नाटक ‘नील दर्पण’ देखते ईश्वर चंद्र विद्यासागर जी अगिया बैताल हो गइल रहलन आ निलहा गोरा बनल कलाकारे के जूता से पिटाई कइले रहलन।

आगा चलिके राजकुमार सुकुल जब 1916 में 26-30 दिसंबर के आयोजित लखनऊ कांग्रेस में उहां के दुरदसा आ उत्पीड़न के दारुण दास्तान सुनवले रहलन, त शर्म-शर्म के आवाज गूंजि उठल रहे आ पहिला बेर राष्ट्रीय मंच पर ई ममिला रोशनी में आइल रहे। निलहन के आतंक के करुण कहानी पं. राजकुमार सुकुल के भाषन के जबानी-‘चंपारण के निलहों और रैयतों के बीच संबंध बहुत दिनों से सौहार्द्रपूर्ण नहीं रहा है। निलहे पहले तो रामनगर और बेतियाराज से जमीनों के ठेके प्राप्त करते है और नील की खेती आरंभ करते है। अनुबंध की शर्तों के अनुसार, किसान के प्रत्येक बीघा में तीन कट्ठा जमीन रैयतों द्वारा नील की खेती के लिए अलग कर दी जाती है, लेकिन निलहे ये शर्तें पूरी करने पर भी संतुष्ठ नहीं है। निरीह रैयतों को अपने खेतों में बेगार करवाने के लिए मजबूर करते है और जब कभी रैयत किसी कारणवश उनके किसी हुक्म का पालन नहीं कर पाते है, तो वे उनकी प्रताड़नाओं के शिकार होते है। निलहे इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि खुद ही दीवानी और फौजदारी मुकदमों के फैसलें करते है तथा जिस तरह चाहते है, गरीब रैयतों को दंडित करते है। इस बात की जांच करने के लिए सरकार को कई बार अनुरोध किया गया, लेकिन बहुत दिनों तक हमारी कोशिशे बेकार साबित हुई। निलहों के अत्याचार के कारण 1908 ई. में बहुत बड़ी अशांति हुई। बंगाल सरकार ने इस बात की जांच करने के लिए एक अधिकारी को प्रतियुक्त किया, लेकिन इस जांच का परिणाम सार्वजनिक नहीं किया गया है और सैंकड़ों की संख्या में गरीब रैयतों को जेल भेज दिया गया है। मैं चंपारण का एक रैयत हूं। मैं नहीं जानता कि जब मैं चंपारण वापस जाउंगा तो यहां आने तथा आप सबों को यह सुनाने के कारण मुझे क्या-क्या भुगतना पड़ेगा….(‘शर्म-शर्म’ के आवाज)।’

पच्छिमी चंपारण के जिला मुख्यालय बेतिया। उहां से दस बारह किलोमीटर उत्तर-पच्छिमी दिशा में मौजूद बा सतवरिया गांव। पांच हजार के आबादी वाली बस्ती। नजदीक के रेलवे स्टेशन चनपटिया। ओही सतवरिया गांव के ब्रह्मभट्ट साधारण किसान कोलाहल सुकुल के एकलउत पूत का रुप में 23 अगस्त,1875 के राजकुमार सुकुल के जन्म भइल रहे। कबों ऊ गिरहत्त परिवार धनी-मनी आ खुशहाल मानल जात रहे, जब बीस गो बैल, तीस-पैंतीस गो गाय आ सैकड़न भइंस दुआर के शोभा बढ़ावत रहली स, बाकिर निलहा सभ कुछु तहस-नहस कर के धर देले रहलन स।

होस सम्हारते राजकुमार निलहा गोरन के बर्बरता अपना खुलल आंखि से देखले रहलन आ भीतरे-भीतरे उन्हुका बालमन में बगावत के लुत्ती ज्वालामुखी बनिके दहके लागल रहे। आभाव में इस्कूली पढ़ाई कायदा से ना हो पावल। बस जइसे-तइसे लिखे-पढ़े भर के ज्ञान हासिल भइल। ब्रह्मभट्ट के कारण जजमनिको ना अपना सकत रहलन। एह से एगो मामूली किसान बनल नियति रहे।

गोर रंग, दुबर-पातर काया, मझिला कद-काठी। रुखल-सूखल बार। गाढ़ा के अंगरखा, ठेहुन ले सस्ता धोती आ कान्ह पर अंगवछा। आगा चलिके माथे पर टोपियो सोभे लागल। कुल्हि मिलाके एगो ठेठ गंवई के सूरत रहे सुकुल जी के, जेकरा टूटल-फूटल हिन्दी आ भोजपुरी के अलावा अउर कवनो भाषा ना आवत रहे।

सुकुल जी ना चहलो पर अपना पनरह फीसदी उपजाऊ जमीन प नील के खेती करे आ मनमाना ढंग से लदाइल सिंचाई, बपही-पुतही, बेंटमाफी, मड़वच, कोल्हुआवन, चुल्हियावन बेचाई फगुअही, दशहरी, अमही, कटहरी, दस्तूरी, हिसाबान, तहरीर, महापात्री नियत अनिगत कर भरे खातिर अलचार रहलन। मजबूर रैयत किसान सुकुल जी बेलवा कोठी के अधीन मुरली भरहवा में खेती करत रहलन। कोठी के मैनेजर मिस्टर ऐमन बड़ा सख्त आ क्रूर अंगरेज अफसर रहे। ओह घरी घर आ कोला के जमीन पर लगान ना लागत रहे। सुकुल जी खूब मेहनत-मशकत्त करके तैयार कइले, त मि. ऐमन के कारिन्दा के हुकुम दे दिलहन स।

‘ई त सरासर नाइंसाफी बा। जब कोला के जमीन लगान- मुक्त बा, त अइसन आदेश काहें?’ सुकुल जी हाथ जोडि़के पुछलन।

‘यह मेरा हुक्म है!’ मिस्टर ऐमन उहां पहुंचिके फरमान जारी कइलस, ‘अगर ऐसे नहीं मानता, तो इसके घर के सारे सामान नष्ट कर दो और झोपड़ी में आग लगा दो’।

सुकुल जी गलत आदेश माने खातिर कतई तइयार ना रहलन। फेरु त उन्हुका आंखिए के सोझा सभ कुछु तहस-नहस कर

दिहल गइल। पलानी के आगी त कुछु देर बाद बुता गइल रहे, बाकिर उन्हुका भीतर आक्रोश आ नफरत के आग लगातार धू-धू कर जरते गइल रहे। ओइसे त सुकुल जी के लरिकाइएं में बतावल गइल रहे कि ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए गोरन के अतियाचार 1600 ई. से चंपारण में बदस्तूर जारी रहे आ उनइसवीं सादी के पहिलहीं से उहां के रैयतन के माली हालत लगातार खस्ता होत चलि गइल रहे, बाकिर मैनेजर ऐमन के ओकरा कारिन्दन के कारगुजारी त उन्हुका के हिला के राखि देले रहे। उन्हुका आंतर में अंगरेजन के खिलाफ विदरोह के चिनगारी के बिया बोआ गइल रहे।

फेरु का रहे! सुकुल जी ‘जो घर जारे आपनो, चले हमारे साथ’ के ऐलान करत रैयत किसान-मजूरन के संगठित करे के अभियान शुरू कर दिलहन। निलहा गोरन के अमानुषिक अतियाचार-अनेति के जरी-सोरी उखाडि़ फेंकल उन्हुका जिनिगी के मकसद बनि गइल रहे। बाकिर ऐमन के एह बात के भनक मिलि गइल रहे आ ऊ खिसिया के राजकुमार सुकुल पर एगो झूठ मुकदमा दायर करके तीन महीना के जेहल के सजा दियवा दिहलस। बाकिर जेहल से राजकुमार चट्टान नियर मजबूत-दीढ़ होके बहरी निकललन। ‘याचना नहीं, अब रण होगा’ के दीढ़ संकल्प कर के।

ऊ हजारन किसानन के संगठित कइलन। अगुवाई में आपन दूगो इयार शेख गुलाब, शीतल राय के संघतिया बनवलन। एह सांगठनिक विदरोह के विस्फोट तब भइल, जब 1911 में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम नेपाल में शिकार के लुत्फ उठवला के बाद नरकटियागंज पहुंचलन। उहंवा पनरह-बीस हजार किसान उन्हुका के घेरि के दरद भरल दास्तान सुनवलन आ खुलेआम विरोध के ऐलान कइलन। जनजागरण अभियान में तेजी आवे लागल। अप्रैल,1915 में जब बिहार सूबा के राजनीतिक सम्मेलन छपरा शहर में आयोजित भइल, त राजकुमार सुकुल  उहवां चंपारण के किसानन के बदहाली आ व्यथा-कथा सुनाके सभका के मरमाहत कर दिलहन।

9 जनवरी,1915 के दक्खिन अफ्रीका से रंगभेद के खिलाफ सत्याग्रह कर के जब मोहनदास करमचंद गान्हीं भारत लवटलन, त लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन ले उन्हुका चंपारण के जनता पर निलहन के दमनचक्र के जानकारियों ना रहे। सुकुल जी अपना भाषन में ऊ हिरदय बिदारक दास्तान सुनवले रहलन, जवना पर ‘शर्म-शर्म’ के आवाज गूंजल रहे। ऊ बेरि-बेरि गान्हीं जी के धियान खींचल चहलन आ गिड़गिड़ा के एक हाली अपना आंख किसानन के दयनीय दसा देखे के विनती कइले रहलन। गान्हीं जी भरोसा दियवले रहलन कि कोलकता से लउटत, ऊ चंपारण के जातरा जरुर करिहन। अधिवेशन से बेतिया लवटि के ऊ गान्ही जी के एगो एतिहासिक चिट्ठी लिखले रहलन। 27 फरवरी,1917 के लिखल ऊ चिट्ठी एहू से एतिहासिक रहे कि ओह में सबसे पहिले आ पहिलकी बेरि ऊ मोहनदास के ‘महात्मा’ संबोधित कइले रहलन। फेरु त गान्ही जी के बिहार के भूइं पर 10 अप्रैल,1917 के उतरहीं के परल रहे। इहंवे से चंपारण का रुप में देश में पहिलका हाली गान्हीं जी अहिंसक आन्दोलन के शुरूआत कइले रहलन, जेकर प्रेरना सुकुल जी से मिलल रहे। फेरु चंपारण में गान्ही जी के देखे खातिर जब भीड़ उमड़लि रहे, त ऊ हुलसा से जनसमुदाय के संबोधित करत भोजपुरी में कहले रहलन- ‘देख लिहीं सभे! ‘महात्मा’ जी आ गइली।

कइसन अद्भुत पारखी रहलन सुकुल जी! आगा चलिके कविन्द्र के खातिर ना, सउंसे दुनिया खातिर गान्ही बतौर ‘महात्मा’ विख्यात हो गइल रहलन।

आखिरकार सुकुल जी के अथक मेहनत, निहोरा रंग ले आइल। गान्ही जी के सुकुल जी के कोलकाता बोलावन आ नौ अप्रैल,1917 के रात खा दूनों जना हावड़ा से रेलगाड़ी धइलन। दस अप्रैल के सबेरे दस बजे पटना जंक्शन पर उतरलन। ओही रात खा मुजफ्फरपुर खातिर रवानगी। उहवां चार दिन के ठहराव। पनरह अप्रैल के मोतिहारी खातिर प्रस्थान। मोतिहारी के जसौलपट्टी गांव में गान्हीं जी के जाए पर ब्रिटिश सरकार के रोक। मुकदमा बाजी गान्हीं जी के खुदे ममिला के पैरवी कइलन। नतीजन मुकदमा उठा लिहल गइल।

आखिर गान्ही जी के नजर में राजकुमार सुकुल के का अहमियत रहे? गांधी जी अपना आत्मकथा में चंपारण, उहां के अहिंसक आन्दोलन के प्रेरना-स्त्रोत राजकुमार सुकुल के विस्तार से चरचा कइले बाड़न। उन्हुकर कहनाम रहे-‘…इस अपढ़, परन्तु निश्चयवान किसान ने मुझे जीत लिया…उनका और मेरा मिलाप पुराने मित्रो सा जान पड़ा। इससे मैंने ईश्वर का, अहिंसा का और सत्य का साक्षात्कार किया, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है, बल्कि अक्षरश: सत्य है। इस साक्षात्कार में अपने अधिकार का विचार करता हूं तो लोगों के प्रति प्रेम के सिवा कुछ नहीं मिलता। प्रेम और अहिंसा में मेरी अचल श्रद्धा के सिवा कुछ नहीं। चंपारण का वह दिन मेरी जिंदगी में ऐसा था, जो कभी भुलाया नहीं जा सकता।

ई राजकुमार सुकुल के दीढ़ निश्चय आ भीस्म प्रतिज्ञा रहे कि गान्ही जी के चंपारण के जातरा करे के परल। खाली उन्हुके ना, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मजहरुल हक, जे. बी कृपलानी, महादेव देसाई वगैरह नामी-गिरामी नेतनो के चंपारण पहुंचे के परल। गान्ही जी एक-एक करके परत-दर परत किसानन के शोषन-दमन के तहकीकात शुरू कर देले रहलन। फेरु त आग-बबूला होके अंगरेज अफसर उन्हुका के चंपारण छोड़े का फरमान जारी कर दिहलन स। बाकिर गान्ही जी जब हुकुम के अवहेलना करत खुदे मोकदमा लड़े आ सजाई काटे के निरनय लिहलन, त मजबूरन सरकार के ना खाली आपन आदेश रद्द करे के परल, बलुक एगो जांच कमेटी गठित कर के गान्हियो जी के ओकर सदस्य बनावे के परल। अंतत: चंपारण के किसानन के दुरदसा के समूल खात्मा भइल, जब 4 मार्च, 1918 के विधान परिषद् से एह आशय के विधेयक पारित भइल कि फसल उपजावे के ममिला में सभ कुछु रैयतन के मरजी पर निर्भर रही। एह तरी से चंपारण में महात्मा गान्ही के पहिल सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कामयाबी राजकुमार के प्रेरना से हासिल भइल।

बाकिर सुकुल जी के गोरन के खिलाफ विदरोह त जिनिगी भर जारी रहल, काहेंकि ब्रितानी सरकार झूठा आरोप मढि़के निरीह किसानन आ आम जनता के प्रताडि़त कइल बन्न ना कइले रहे। सन् 1929 के मई महीना में ऊ साबरमती आश्रम पहुंचल रहलन आ बापू से उन्हुकर भेंट आखरी भेंट साबित भइल रहे, काहेंकि साबरमती सेवाग्राम के संत के दर्शन कर के सतवरिया के ऊ संत 20 मई,1929 के मोतिहारी के ओही ठेकाना पर हरदम-हरदम खातिर आंखि मूंदि लेले रहे, जहवां चंपारण अइला पर गान्ही जी ठहरल रहलन। चंपारण के उनइस लाख जनता ‘चंपारण के गान्ही’ के लोर भरल आंखि से

फफकि-फफकि के आखिरी विदाई देले रहे। इहां ले कि उहां के क्रूरतम अंगरेज अफसर मिस्टर ऐमन मरमाहत होके सुकुल जी के दामाद के पुलिस महकमा में बहाली की चिट्ठी आ आर्थिक मदत देत कहले रहे- ‘उस आदमी की कीमत दूसरे लोग क्या समझेंगे! चंपारण का वह अकेला मर्द था, जो मुझसे पचीस वर्ष लड़ता रहा’।

सांच त ई बा कि पं. राजकुमार सुकुल के मंशा ना त कवनो आन्दोलन के अगवाई करे के रहे आ ना राष्ट्रीय नेतृत्व सम्हारे के। ऊ त चंपारण के किसानन, रैयतन पर सदियन से बजड़त निलहन के अनेति-अतियाचार के बजरपात से घवाहिल रहलन आ ओह असह दु:ख-दरद के समूल नाश कइल-करवावले उन्हुकर एकमात्र मकसद रहे। एह काम खातिर ऊ गान्ही जी के उत्प्रेरित कइलन आ मुक्ती के सांस लिहलन। चूंकि ऊ खुदे महात्मा रहलन, एह से गान्ही जी में ऊ महात्मा के दरसन कइलन। पं. राजकुमार सुकुल जी के अमरता गान्ही जी के पहिला हाली ‘महात्मा’ के संबोधन देवे में ना, वरन चंपारण सत्याग्रह के बहाना से देश में अंगरेजन के खिलाफ सबसे पहिले अहिंसक आन्दोलन के सूत्रपात करे खातिर प्रेरना-स्रोत के भूमिका अदा करे में बा।



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