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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min3270

अनुराधा कृष्ण रस्तोगी

आपन भारत के इतिहास में इनल–गिनल महान परोपकारी शासक भइल बाड़न । ओकरा में एगो शेरशाह सूरी भी रहलें । इनकर दादा इबराहीम खां सूरी आ बाबू हसन खां सूरी सुल्तान बहलोल लोदी के शासन काल 1451-1989 में अफगानिस्तान से भारत आइल रहलें । शेरशाह के जन्म  कब कहां भइल रहे एकर ठीक–ठीक पता नइखे । विसवास बा की 1472 के आस–पास बजवाड़k परगना में भा 1486 के आस–पास नारनौल भा हिसार फिरोजा में शेरशाह के जनम भइल रहे । इनकर लड़काइये के नाव  फरीद खां सूरी रहे । फरीद खां बचपन में अपना बाबू के साथ सासाराम में रहत रहलें । पहिले सासाराम बिहार के शाहाबाद जिला में रहे उ अब रोहतास में बा जेकरा आज सासाराम के नाव से जानल जाला । सासाराम में इनकर बाबू के जागीर रहे, जे में सासाराम आ खवासपुर टांडा के परगना में सामिल रहे ।

बचपन में फरीद खां के पढाई खातीर जौनपुर भेजल  गइल । ई प्रकृति से ही चल्हांक आ प्रतिभाशाली रहलें । जौनपुर में फारसी अउर अरबी  भाषा के नीमन अभेयास कर लेले रहन । शेरशाह सूरी सत्ता पा के 1538 में गौड़ बंगाल नगर में आपन ताजपोशी के जसन मनवालन । ओंह  मोका प ऊ आपन दृढ़ संकल्प के एलान कइलें  की हम मुगलन के खदेड़ के अफगान के सत्ता फिन से स्थापित करब ।आपन कुशल राजनित अउर  सैनिक नेतृत्व में उ आखिर दिल्ली के जीत लेलन । आपन दृढ़ निश्चय के मोताबिक उ 1540 में मोगल बादशाह हुमायू के गंगा आ बिलग्राम के लड़ाई में हरा देलन । इतिहास में ई लड़ाई कनौज के लड़ाई के नाव से बड़ा प्रसिद्ध बा । येह जीत के उपरांत उ दिल्ली प  कब्ज़ा कर लेलन अऊर ओकरे के राजधानी बनवलें ।

भारत के अफगान शासक शेरशाह खातिर मुगल सम्राट हुमायू के साथे सम्राज के लड़ाई में अनुपम प्राकृतिक दिरिस के बीच बिन्ध्य पहाड़ प स्थित भारत के सबसे बड़ एगो मात्र पहाड़ी किला, सत्यवादी हरिश्चंद्र पुत्र रोहिताश्व द्वारा निर्मित रोहतासगढ़ किला बहुते उपयोगी साबित भइल रहे जे रोहतास जिला के डेहरी ओन सोन से दखिन 60 कोस के दूरी प तूटल-फूटल अवस्था में आजो खाड़ बा । जेकरा नाव प रोहतास जिला के नाव भईल । एगो किला पाकिस्तान में भी झेलम नदी के जरी लाहौर के 60 कोस के दूरी प खुरासान मार्ग प मौजूद बा । ऐह किला के शेरशाह जीर्णोधार क के मजबूती प्रदान कइलन अउर ऐह दुर्ग के असमिता  के कायम कईलें । रोहतास फोर्ट के सम्मान में पाकिस्तान 25 सितम्बर 1984 में 10 पै० के डाकटिकट जारी रहलें ।

शेरशाह सूरी बड़ उत्कृष्ट शासक रहलें । उनकर शासन बहुत ही छोट 1541-1545 पांच बरीस से कुछ अधिक रहे बुत कम उमिर में ही आपन उदारता अउर कर्मठता के परिचय देहलन । उ आपन शासन में जनता के हित में कईगो सुधार कइलें  जेकरा में राजस्व, मुद्रा अउर शुल्कदर दर के सुधार प्रमुख बाटे । उ केंद्रीय अउर प्रांतीय शासन के भी पुनर-गठन क के डाक व्यवस्था के मजबूत बनवलन अउर सेना के पुनरगठन कइलन । शेरशाह उपेक्षित अउर शोषित किसानन  के भलाई के कामो  में भी बहुते रूचि लेख । शेरशाह के शाही फरमान के वजह से राजस्व अधिकारी निर्धारण के समय काफी उदारता से काम लेत रहन।

उ चानी के नया सिक्का चलवलें जेकरा के ‘रुपिया’ कहल जात रहे ई सिक्का तांबा के चालीस पइसा के बराबर रहे । एकरा पाहिले उ बंगाल में जवन सिक्का चलवले रहन ओकरा में सबसे पहिले  सिक्का प देवनागरी अउर फारसी लिपि में उनकर नाव ‘सिरी सैर साहि’ (श्री शेरशाह) अंकित बा । शेरशाह सड़क के बहुते बड़ निर्माण कर्ता के रूप में बहुते प्रसिद्ध बाड़े । उनकर आदेश से बनल सबसे बड़ सडक ‘शाहराह-इ-आजम’ कहलात रहे । ग्रांड ट्रंक रोड के नाम से चर्चित एह सड़क के आधुनिक नाम राष्ट्रीय राज मार्ग – 2 बा । बंगाल से सुनार गाँव से शुरू होके आगरा, दिल्ली अउर लाहौर होखते सिंध नदी तक जाला । उनकर बनावल दूसर सड़क आगरा, बुरहानपुर के सड़क जवन ओकरा से आगे मांडू तक जाला । आगरा से जोधपुर अउर चितौड़ के सड़क अउर लाहौर से मुल्तान के सड़क प्रसिद्ध बाटे ।

शेरशाह आपन शासन काल में राष्ट्रीय आधार प सुसंगठित डाक व्यवस्ता के नींव रखलें । उत्तर भारत के कइगो भाग के बीच राजपथ के भी निर्माण से यातायात में जवन सुधार भइल ओकरा से एह काम में बहुते मदद मिलल । ग्रांड-ट्रंक रोड के निर्माण करइलें बुत जगह-जगह प सड़क के बीच में डाक चौकी, सराय भी बनवलें  जेकरा से डाक देश के एक भाग से दूसरा भाग में पहुंचात रहे । हर सराय प दुगो घोड़ा तैयार रहत रहे, जेमें डाक (चिठ्ठी) के आवा जाही आसानी से होत रहे । ओहीजे से भारत में मुख्य रूप से डाक व्यवस्था के विकास भइल ।

एहिसे शेरशाह सूरी के भारतीय डाक के जनक कहल जाला । कालिंजर के चढ़ाई में शेरशाह के जीत भइल रहे । बारूद खाना में बिस्फोट भइला से घायल होखे 22 मई 1545 में शेरशाह के मृत्यु हो गइल ।

सन्-1146 में बगदाद के खलीफा सुल्तान नारदिन अपना पूरा राज्य में नियमित रूप से कबूतर से खबर भेज के व्यवस्था कइले रहन ।

बलुक भारत में डाक व्यवस्था सन-1296 में चालू रहे , सेना के समाचार निरंतर पावे खातीर पठान शासक अलाउदीन खिल्जी घोड़ा अउर पैदल डाक व्यवस्था कायम कइले रहन । अकबर के शासन काल में 1556-1605 परिवहन के व्यवस्था में एगो अउर सुधार भइल रहे । अब घोड़ा के अलावा ऊँट के भी परयोग भइल रहे । कहल जाला की मैसूर के राजा चिक्कदेव सन–1672 में अपना पूरा राज्य में नियमित डाक सेवा में व्यवस्था देले रहन । आज के जिनगी में डाक के बहुत बड़ स्थान बा । एह समय भारतीय डाक के नेटवर्क में सबसे बड़ प्रणाली बा । शेरशाह सूरी के शासन काल में भारतीय डाक व्यवस्था के एगो नया स्फूर्ति अउर दिशा मिलल ।

 


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2790

सुरेन्द्र कृष्ण रस्तोगी

आपन देश भारत के इतिहास में शेरशाह सूरी के एगो बिशेष स्थान बा। सासाराम  (रोहतास) में इनकर बाबू हसनशाह  सूरी के जागीर रहे । शेरशाह लड़कईयें से आपन बाबू के साथ रहत रहलें । समय के ऊतार-चढ़kव के दौरान शेरशाह सन् 1538 में बंगाल के गौड़ नगर में आपन ताजपोसी के जशन मनइलन । ऊ कइगो बड़ लड़kई लड़लन आ जितलें । बिहार के शासक जमाल खां के हरा के बिहार के शासक बनलें आ फिन हुमायू के हरा के  दिल्ली के बादशाह बनलें जेकरा के आपन राजधानी बनवलें । शेरशाह के सम्राज चारो दिशा में फैइलल रहे, आपन कृतित्व अउर व्यक्तित्व के बल प हमेशा आगे बढ़त रहलें । ऊ बहुते बड़ उत्कृष्ट शासक रहलें । पांच साल के उमिर में आपन उदारता आ कर्मठता  के परिचय देलन । जनता के हित में कईगो एतिहासिक काम कईलें । केंद्रीय अउर प्रांतीय शासकन के प्रति भी ढेरे रुचि लेतरहन । आपन काम काज के दौरान सासाराम में तलाब के बीचो-बीच एगो सुग्घर, निक मकबरा बनवलें जे ताजमहल से तेरह फुट ऊँच बा । लड़ाई के दौरान सैनिकन  के सही स्तिथि के पता करे आ सूचना के आदान-प्रदान करे खातिर कइगो मीनार के निर्माण करवलें । जेमें  औरंगाबाद, भभुआ (कैमूर), बारे के आस-पास मौजूद बा आ केतना टूट फूट के इतिहास के पन्ना में दफ़न हो गइल। सरकार के एकरा प ध्यान राखेके चाहीं।

शेरशाह सड़क के बहुते बड़ निर्माण करता के रूप में परसिद्ध बाड़न।  आपन शासन काल (1541-45) में हजार कोस में खूबे लमहर ग्रैंड ट्रंक रोड बनवलें। एकरा साथे सड़क के बीच में डाक चौकी आ 1700  सराय के निर्माण करवलें, जवना से चिठ्ठी-चपाठी के आदान–प्रदान अउर आराम घर खातिर उपयोग होत रहे । ई पहिला सम्राट रहलें जे ‘माउन्टेड पोस्ट’ के शुरूआत कइलें । घोड़सवार डाकिया कायम क के एक मजबूत आ कुशल प्रशासन  के तहत एकर सुरक्षा सुनिश्चित होखला से डाक व्यवस्था के संचालन में खूबे मदद मिलल । एहिजे से भारत में मूल रूप से डाक व्यवस्था के विकास भइल। एहिसे शेरशाह सूरी के भारतीय ‘डाक के जनक’ कहल जाला ।

आज के दउर में भले मोबाईल अउर इंटरनेट आदि के फइलाव भइल होखे  बाकिर डाक के नेटवर्क के दुनिया में सबसे बड़ प्रणाली बा । आज के जीनगी में डाक के बहुत बड़ भूमिका बाटे । शेरशाह भारतीय डाक व्यवस्था के एगो नया दिशा देलें  जेकरा के भुलावल न जा सके ।

भारत सरकार के संचार मंत्रालय के डाक बिभाग एह राष्ट्रीय सेवा के अग्रदूत आ क्रांतिकारी जोधा अउर लोकप्रिय कुशल शासक शेरशाह शूरी के सम्मान में डाक टिकट, कवर आदि जारी क के अपना के सौभाग्यशाली समझत बाटे ।

सबसे पाहिले  भारत सरकार शेरशाह सूरी प 22 मई 1970 में 20  पइसा  के एगो डाक टिकट जारी क के सरधा सुमन अरपित कइलस । एह टिकट में शेरशाह के गद्दी  प बइठल छबिचित्र छपल आ एगो आवरण (लिफाफा) निकलल जेकरा प शेरशाह के मकबरा अंकित बा । 29 अक्तूबर 1976 में बिपेक्स 76 के मोका प विशिष्ट आवरण प्रकाशित भइल जेपर मकबरा के  फोटो  के साथे प्राचीन घोड़ा  डाक के टिकट प डाक हरकारा  के मोहर लगावल गइल जे डाक व्यवस्था के जनक  के याद के ताजा करता ।

सन् 1989 में एगो हवाई पत्र  (पोसकाड) 4 रूपया के निकलल जे पर शेरशाह समाधि सासाराम छपल बा।

करीब साड़े चार सौ वारिस पहिले शेरशाह सूरी के ओरि से शुरु  भइल डाक व्यवस्था के स्मृति में डाक विभाग एगो विशिष्ट आवरण जारी कइलस। आवरण पत्र के डाकिया घोड़ सवार रातो रात सासाराम से  पटना रवाना भइल ।

जइसे शेरशाह के समय में डाक घोड़ा एक स्थान से दूसरा स्थान प चिठ्ठी लेके जात रहे। ठीक ओंसही  डाक के थइला औपचारिक रूप से भेजल गइल जे राज्यपाल शरीफ  कुरैशी के सउपलस । एह आवरण प कबूतर डाक सेवा के टिकट लगा के अश्वरोही सम्वाहक के मुहर लगावल गइल जेकरा प पूर्व मंत्री लालू प्रसाद के दस्खत बा ।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत 28 जनवरी 2012 में एगो आवरण जारी भइल। कइगो धरोहर के साथे शेरशाह के मकबरा के भी  दरसावल गइल बा। फिन  एही साल 2 फरवरी 2012 में एगो विशेष आवरण बिहार के डाकटिकट प्रदर्शनी के मोक़ा प जारी भइल जेकरा प शेरशाह के फोटो के साथे शुरू से अब तक के डाकियन के बदलत भेष-भूषा, लेटर बॉक्स, कइगो डाक घोड़सवारन के चित्र अउर पृष्टभूमि में मकबरा के देखावल गइल बा अउर प्रदर्शनी के मोहर लगावल गइल


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2760

अजय कुमार पाण्डेय

साल 1939 ,
बेतिया ( प. चंपारण ) बिहार ,
बेतिया के बड़ा रमना मैदान
मैदान में भारी जन सैलाब
जोश में भरल युवा ।

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के बेतिया आगमन आ उहां के भाषण सुने  खातिर  भारी भीड़ उमडल रहे ।

नेता जी के जिंदाबाद के नारा गुंजल आ उहां के मंच पर अइनी। भीड़ हर्ष आ जोश के अतिरेक में चीखे लागल आ ” नेता जी जिन्दाबाद , भारत माता के जय , वन्देमातरम ” के नारा लागे लागल ।

नेता जी हाथ हिला के सबकर अभिवादन कईनी आ शांत रहे के इशारा कईनी । लोग शांत हो के एक टक उहां के निहारे लागल ।
नेता जी के चेहरा हजार वाट के बल्ब लेखा चमकत रहे आ कपार त साफा बुझात रहे कि सीसा ह ।

नेता जी के नस – नस में गरम लावा दौउडावे वाला भाषण शुरू भइल । बीच – बीच में लोग के जोश ना माने आ जिंदाबाद , वन्देमातरम के नारा गूंजे लागे ।

जब भाषण ओराये पर आइल त नेता जी आपन चिरपरिचित नारा बुलंद कईनी ,

” तुम मुझे खून दो , मैं तुम्हे आजादी दूंगा ।”

लोग फेर नारा लगावे लागल ।

अचानक नेता जी हाथ से सबका के शांत रहे के इशारा क के भीड़ से मुख़ातिब भइनी आ पूछनी ,

” तुममें से कौन देश की आजादी के लिये अभी इसी मंच पर मुझे खून देगा ?”

भीड़ में सन्नाटा छा गइल आ सभे एक – दूसरा के मुंह देखे लागल ।

ताले , पीछे से भीड़ के चीरत एगो हट्ठा – कट्ठा नौजवान आगे अइलन आ सीना तान के चिलइले ,

” हम खून देंगे नेता जी , हम खून देंगे ।”

सब लोग उ युवक के जोश आ हिम्मत देखे लागल ।
नेता जी उ युवक के मंच पर बोलावले आ पीठ थपथपा के नाम पुछलें । उ नौजवान आपन नाम ” धनराज पुरी  ” बतवलें ।

बिहार के वर्तमान पश्चिमी चंपारण जिला के रामनगर प्रखंड स्थित सिकटा – बेलवा गांव के ” महंथ धनराज पुरी  ” के नेता जी ओकरा बाद कबो ना छोड़नी ।

प्राप्त जानकारी के अनुसार जब नेता जी अंगरेजन के आँखी में धूल झोंक के कलकत्ता से पलायन कईनी त महंथ जी के सिकटा – बेलवा स्थित घर पर आपन कुछ विश्वस्त सहयोगी लोग के साथ रात्रि में कुछ समय खातिर आइल रनी । नेता जी के साथे महंथ जी के  ओ समय के बड़ी पुरान फोटो मिलल बा जेमें नेता जी के साथे महंथ जी खड़ा बानी ।

नेता जी जब आपन पार्टी ” फारवर्ड ब्लॉक ” बनवनी त महंथ धनराज पुरी जी के पार्टी के  राष्ट्रीय  उपाध्यक्ष बनवनी । नेता जी के देश से पलायन आ गुमनाम हो गइला तक महंथ जी सक्रिय रूप से ” फॉरवार्ड  ब्लॉक ” पार्टी के क्रिया कलाप में रहनी आ गुप्त रूप से देश के आजादी खातिर काम कईनी ।

महंथ जी के घर देश के आजादी मिले तक विभिन्न राजनीतिक आ साहित्यिक गतिविधि के केंद्र भी रहल ।

महंथ जी हिंदी , संस्कृत , अंग्रेजी आ उर्दू के उद्भट विद्वान रहनी आ बेहतरीन कवि आ लेखक भी रनी ।

सन 1938 – 40 के दौरान जब साहित्यिक आ काव्यात्मक अभिव्यक्ति पर भी ब्रितानी हुकूमत के पहरा रहे , महंथ जी रामनगर में एगो विराट कवि सम्मेलन के आयोजन कईनी जेमे देश भर के क्रांतिकारी कवि लोग आइल रहे । महंथ जी उ कवि सम्मेलन में आपन ” ओस ” नामक काव्य – संकलन एगो कविता पढ़ले रनी , जेकर कुछ पंक्ति बा ,

” डमरू आज बजे , वीणा न बजाएं
गीत न गायें आज
आज तो गीता गायें
भभके ज्वाला
जाल व्योम तक
पहुँच जाए “.

बाकी कवि लोग भी आपन कविता आ गीतन के माध्यम से लोग के जगावे के प्रयास कइल लोग ।

महंथ जी चंपारण में पहिला बार कविता के माध्यम से क्रांति के बिगुल  फुकले रनी जेकर आंच ब्रितानी हुकूमत तक पहुँच गइल  ।  महंथ जी भूमिगत हो गइनी । अंगरेज उहां के पकड़ पवलsस कि ना , एकर कौनो पुष्ट प्रमाण नइखे उपलब्ध हो सकल लेकिन अंत – अंत तक उहां के अंग्रेजन के आंख के किरकिरी बनल रनी ।

महंथ जी नेता जी के लागातार सम्पर्क में रहनी आ अपुष्ट सूचना के अनुसार कुछ समय तक ” आजाद हिन्द फ़ौज ” के अति गोपनीय शाखा ख़ातिर बर्मा ( वर्तमान म्यांमार ) में भी रहनी ।

दुर्भाग्य से उहां के कौनो चिट्ठी – पत्री भा दस्तावेज उहां के वारिस लोग सहेज के ना रख सकल । जौन फोटो भी उपलब्ध भइल उ बहुत हीं खराब अवस्था में बा ।

महंथ जी के साहित्यिक पक्ष भी बहुत विराट रहे । ओम्हर के बहुत उच्च कोटि के कवि आ साहित्यकार रनी । विशेष रूप से उहां के शिकार कथा बहुत लोकप्रिय बाड़न स । उहां के देश भर के जंगल आ पहाड़न के बड़ी भ्रमण कइले रनी आ शिकार के शौकीन रनी ।
शिकार कथा लेखक स्व. वृंदावन लाल वर्मा आ स्व. श्री राम शर्मा जी के साथे शिकार कथा लेखक के रूप में ओम्हर के राष्ट्रीय पहचान रहे ।

महंथ जी के ” इला ” खण्ड काव्य उहां के मशहूर किताबन में बा ।
इला उहां के आपन बेटी के याद में लिखले रनी , जे युवावस्था में हीं विधवा हो गइली आ खुद भी कुछ दिन बाद चल बसली ।

महंथ जी के सामाजिक आ खोजपूर्ण कार्य भी बहुत उल्लेखनीय बा ।
उहां का आदि कवि महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के खोज कईनी आ उहें के शोध आ अथक प्रयास से वर्तमान पश्चिमी चंपारण के काश्मीर ” भैसालोटन ” के नाम ” वाल्मीकिनगर ” पड़ल ।  ये खातिर महंथ जी के बहुत भाग – दौड़ आ लिखा – पढ़ी करेके पड़ल ।

जंगल में भ्रमण के दौरान सीमावर्ती नेपाल के घनघोर जंगल में उहां के एगो आश्रम जइसन जगह पवनी , जहां यज्ञशाला , हवन कुंड , कुंआ , प्राचीन काला पत्थर के मूर्ति आ अनेक अइसन प्रमाण पवनी जे उ स्थान के महर्षि वाल्मीकि के आश्रम सिद्ध करत रहे जहां सीता माता रहल रनी । ये खातिर महंथ जी बहुत सा प्राचीन ग्रन्थ आ साहित्य के अध्ययन कईनी आ आपन शोध के सम्बंध में दु गो किताब लिखनी , ” महर्षि वाल्मीकि का आश्रम कहां था ?” आ ” वाल्मीकि आश्रम – वाल्मीकि नगर ” ।

उहां के प्रयास रंग लाइल आ 14 जनवरी ‘ 1964 के ” भैसालोटन ” के नाम सरकारी आ आधिकारिक स्तर पर ” वाल्मीकिनगर ” हो  गइल । एकर घोषणा बिहार के तत्कालीन राज्यपाल स्व. अनंत स्थानम  आयंगर , नेपाल नरेश आ दुनु देश के अधिकारियन के उपस्थिति में भइल । वाल्मीकि आश्रम के भी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के रूप में मान्यता मिलल आ आज देश भर के लोग वाल्मीकिआश्रम के देखे आवेला ।

दुर्भाग्य के बात ई बा कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के अनन्य सहयोगी आ उहां के पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष स्व. महंथ धनराज पुरी जे राष्ट्रीय स्तर के कवि आ कथाकार के आज लोग भुला गइल बा ।
उहां के गृह जिला में भी उहां के जन्म या मृत्यतिथि पर कौनो आयोजन ना होला ।

हमरा त ई शेर अब एकदम अप्रासंगिक बुझाला ,

” शहीदों के चिताओं  पर लगेंगे हर बरस मेले ,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ”

स्व. महंथ धनराज पुरी जी के उपलब्ध साहित्य इहे बा ।

1- अविरल आंसू ( आंचलिक उपन्यास )
2- आखेट ( शिकार कथा )
3- इला  ( काव्य )
4- ओस ( काव्य
5- उच्छ्वास ( रचना – संग्रह )
6- आओ सुनो कहानी ( बाल साहित्य )
7- टुनमून                   ( बाल साहित्य )
8- लेफ्टिनेंट               ( कहानी संग्रह )
9- मौत की मांद में  ( शिकार कहानियां )
10-महर्षि वाल्मीकि का आश्रम कहाँ था ?
11-वाल्मीकिआश्रम ; वाल्मीकिनगर ( शोध प्रबंध )
12- मृत्यु से मुठभेड़ ( शिकार कहानियां )
13 -तमुरा               ( बाल साहित्य )
14-जंगल में दंगल    ( बाल साहित्य )

( परिचय- अजय कुमार पाण्डेय सिविल कोर्ट, बगहा, पश्चिमी चंपारण, बिहार में सहायक बानी. 


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2280

डाॅ० भोला प्रसाद आग्नेय

११ मई १८५७ के अभी भोर के किरिन दिल्ली के सड़कन पे उतरहीं वाली रहे तवले मेरठ से आइल सिपाहियन के एगो दल जमुना पार क के दिल्ली में घुस गइल. एक दिन पहिले इहे दल मेरठ में आपन अंग्रेज अफसर के आदेश माने से इनकार करत ओकर हत्या क देले रहे.ई दल लालकिला में जा के मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर से रहनुमाई करे खातिर अपील कइलन. अपील स्वीकार करत बहादुर शाह जफर खुद के शहनशाह-ए- हिंदुस्तान घोषित क दिहलन.

ईस्ट इंडिया कम्पनी के पाले कुल २ लाख ३२ हजार २२४ सिपाही रहलन जवना में से तकरीबन आधा सिपाही रेजिमेंट छोड़ के विद्रोही हो गइल रहलन. आ ३४ वीं नेटिव इन्फैन्ट्री के जवान बलिया निवासी मंगल पांडे त अपना सार्जेंट मेजर के गोली मार दिहलन जवना के कारण अंग्रेज उनके फांसी दे दिहलन स  . ए तरे दिल्ली पे कब्जा होते विद्रोह के लहर कानपुर, लखनऊ, बनारस , इलाहाबाद, बरेली, जगदीश पुर, पूणे, झांसी तक ले फइल गइल. अंग्रेजन के गोड़ के नीचे से धरती सरके लागल. स्थानीय सामन्त, नवाब भा राजा लोग नेतृत्व के जिम्मेदारी ले लिहल लोग. अंग्रेजी हुकूमत के हाथे ई लोग बहुते सतावल जा चुकल रहे लोग. एसे सभे असंतुष्ट रहे लोग. मोका मिलते सभे विद्रोहियन के साथे आ गइल.

कानपुर में अंतिम मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक बेटा लखनऊ में बेगम हज़रत महल आ बरेली में रुहेलखंड के पहिले के शासक के उत्तराधिकारी खान बहादुर रहनुमाई कइलन. झांसी में सिपाहियन के नेतृत्व रानी लक्ष्मीबाई अपना हाथ में ले लिहलिन. विद्रोह के ई लहर उत्तर भारत, पश्चिम आ मध्य भारत के कुछ हिस्सन में चल पड़ल. खाली दक्षिण भारत एसे अलग थलग रहल. ओने के सिपाही अपना के अंग्रेजन के प्रति निष्ठावान बनवले रहलन.

ए विद्रोह के कारण ई रहल कि अंग्रेजन के जवन सेवा शर्त रहल ओसे हिन्दू मुस्लिम दूनों के धार्मिक भावना के ठेस पहुंचत रहे. एकरे अलावे वेतन आ पदोन्नति में गोरा काला के भेद रखल जात रहे. टैक्स के वसूली में जनता पे तरह तरह के अत्याचार होत रहे. एसे आम जनता अंग्रेजन के विरोधी हो उसेउ हो गइल रहे.

बिहार के जगदीशपुर के जमींदार बाबू कुंवर सिंह के अंग्रेज अपना कूटनीति के जरिये दिवालियेपन के कगार पर पहुंचा देले रहलन. इनकर मय सम्पत्ति छीन लेले रहलन स, इनके बार बार अपील कइलो पर उन्हनीं पे कवनो असर ना पड़त रहे. एसे बाबू कुंवर सिंह भीतरे भीतर अंग्रेजन के विरोधी हो गइल रहलन आ मोका के तलाश में रहलन ओ घरी इनके उमिर अस्सी साल रहे.

१२ जून १८५७ के बिहार रेजिमेंट के तीन गो सिपाही कमांडर के आदेश माने से इनकार क दिहलन. ओ तीनों सिपाहियन के अंग्रेज हाथी के पीठ पे बइठा के नीचे ढकेल के मुआ दिहलन. एकरे जवाब में ०३ जुलाई १८५७ के पटना में सेना के एगो टुकड़ी कैप्टन डी० आर० लायल के हत्या क दिहलस. एसे खिसिया के अंग्रेज १६ गो देश भक्तन के फांसी दे दिहलन स एकर नतीजा ई भइल कि २५ जुलाई १८५७ के दानापुर सैनिक छावनी में विद्रोह हो गइल आ अइसने मोका के तलाश में बाबू कुंवर सिंह रहलन.

वीरवर बाबू कुंवर सिंह के नेतृत्व में आजादी के दीवाने वीर सैनिक जगदीशपुर से आरा आ के खजाना लूट लिहलन आ बंदी गृह के नष्ट क दिहलन. पूरा शाहाबाद बाबू कुंवर सिंह के अधीन हो गइल. २९ जुलाई १८५७ के कैप्टन डनवर के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना आरा पहुंचल बाकिर बाबू कुंवर सिंह वृकयुद्ध शैली अपना के अपना के बचा लिहलन. आधी रात में आक्रमण क के कैप्टन डनवर के साथे अनेक अंंग्रेजी सिपाहियन के मौत के घाट उतार दिहलन. एकरे बाद बंगाल से अंग्रेजी सेना के मेजर विसेंट आयर आपन सेना के साथे आरा पहुँच गइलन. बाबू कुंवर सिंह के साथे मेजर आयर से घमासान युद्ध भइल आ २-३ अगस्त के आरा पर फिनु अंग्रेजन के कब्जा हो गइल.

मेजर आयर के जीत से बाबू कुंवर सिंह हतोत्साहित ना भइलन. अपने सेना के नया आयाम देवे खातिर सासाराम, रोहतास, मिर्जापुर, रीवां, बांदा, कालपी आ कानपुर होत मार्च १९५८ में लखनऊ पहुँच गइलन. अवध के नवाब आजमगढ़ के शासनाधिकार के साथे आजमगढ़ भेज दिहलन. २२ मार्च १९५८ के बाबू कुंवर सिंह कोलोनल मिलमैन के सेना के पराजित क के आजमगढ़ के अंग्रेजन से मुक्त करा दिहलन.१५ अप्रैल १९५८ के घात लगा के जनरल लुगाई बाबू कुंवर सिंह पे आक्रमण क दिहलस बाकिर ओहू के कुंवर सिंह भारी शिकस्त दिहलन.

अगिला दिने बाबू कुंवर सिंह अपना गृह जनपद आरा आवे के प्रोग्राम बनवलन. बलिया जनपद के नगरा, सिकंदर पुर होत मनियर आ के आपन पड़ाव डललन. २० अप्रैल १९५८ के कैप्टन डगलस जवन नगरा से इनकर पीछा करत रहे आक्रमण क दिहलस. ओइजो बाबू कुंवर सिंह ओके पराजित करत अपना सेना के साथे शिवपुर घाट के ओर चल दिहलन. रास्ता में पचरुखी देवी मंदिर पे कुंवर सिंह के ताक में अंग्रेजी सेना बइठल रहे. ओइजो घमासान युद्ध भइल. ए युद्ध में बाबू कुंवर सिंह अपना साथी सिद्धा सिंह के साथे १०६  गो अंग्रेज सिपाहियन के मूड़ी काट काट के एगो नाला में फेंकत गइलन. ओह नाला ओही से आजुवो मूड़ कटला नाला कहल जाला.

२१ अप्रैल १९५८ के बाबू कुंवर सिंह शिवपुर घाट से गंगा पार करत नाय से जात रहलन तवले अंग्रेजन के सेना नाय पर गोली चलावे शुरू क दिहलस. बाबू कुंवर सिंह के बायां हाथ में गोली लाग गइल. अंग्रेजन के गोली के जहर पूरा शरीर न फइले पावे एसे भारत माँ के वीर आ साहसी सपूत बाबू कुंवर सिंह आपन बायां हाथ काट के गंगा मइया के समर्पित क दिहलन.आ ओह पार जा के हाथी से अपन गांवे जगदीशपुर पहुँच गइलन.

बाबू कुंवर सिंह के घायल जान के कैप्टन ली ग्रैंड २३ अप्रैल १९५८  के जगदीशपुर पर आक्रमण क दिहलस बाकिर अंग्रेजी सेना के पराजित होखे के पड़ल आ कैप्टन ली ग्रैंडो मरा गइलन. भारत माता के अइसन वीर सपूत बाबू कुंवर सिंह अपने बीमारी से २६ अप्रैल १९५८ के सदा के नींद सुत गइलन. उनके वीरता के अइसन अमिट छाप पड़ल बा कि आजुवो भोजपुर आ ओकरे आस पास के लइका खेल खेल में गावेलन स  – चल कबड्डी आरा जहाँ कुंवर सिंह मरदाना.

सुप्रसिद्ध कवि मनोरंजन प्रसाद सिन्हा अपना कविता में कहले बाडन—

अस्सी वर्ष की हड्डी में जागा जोश पुराना था.

सब कहते हैं कुंवर सिंह बड़ा वीर मरदाना था.

( परिचय- डाॅ० भोला प्रसाद आग्नेय, कवि, कथाकार, नाटककार, निबंधकार एवं कलाकार, आकाशवाणी व दूरदर्शन तथा पूर्व प्रवक्ता, मुरली मनोहर टाउन इंटर कॉलेज बलिया उ०प्र०)


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min3070

लेखक – मनोज भावुक

बिहार से सटल पूर्वी उत्तरप्रदेश के एगो जिला बा, बागी बलिया। आधिकारिक नाम त बलिया ही ह बाकिर लोग शान से बागी बलिया कहेला। एकर कई गो कारण बा, पहिला त इहें 1857 के संग्राम के क्रांतिकारी मंगल पांडे जनमलें आ दुसरका कि आजादी से 5 साल पहिले 1942 में ही 14 अगस्त के लगभग 300 आजादी के मतवाला मिलके बैरिया थाना पर तिरंगा फहरा दिहलें। बलिया के माटी में सनाइल देशभक्ति के खूने ह कि 1857 में ब्रिटिश सेना में सिपाही के पद पर तैनात एगो सामान्य आदमी के अंदर अंग्रेजन के क्रूरता अउरी गुलामी के खिलाफ बगावत के आग धधक गइल। मंगल पांडे के बग़ावत के बाद जवन चिनगारी चारू ओर भड़कल, उ सम्पूर्ण भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी आ ब्रिटिश राज के खिलाफ राजा, नवाब, जमींदार, सिपाही, युवा, किसान, रैयत, मजदूर सभके लामबंद कर देलस आ 1857 के भीषण क्रांति भइल। हालांकि अंग्रेज भारतीय लोगन के आपसी फूट आ अपना कूटनीति के चलते 1858 के मध्य आवत-आवत ई क्रांति के दमन कर देहलsसन बाकिर आजादी के बिआ त ओहि बेरा बोआ गइल रहे जवन 1947 में पूर्ण स्वतंत्रता के फल के रूप में मिलल।

1857 क्रांति के बम के सुतली में आगि लगावे वाला मंगल पांडे के जन्म 19 जुलाई 1827 में भइल रहे। उनके पिता जी के नाम दिवाकर पांडे रहे अउरी माई के नाम अभय रानी। युवा मंगल के 18 साल के उम्र में आजीविका चलावे खातिर ईस्ट इंडिया कंपनी के सेना में भर्ती होखे के पड़ल। ओह बेरा अंग्रेजन के कब्जा भारत के अधिकतर हिस्सा में हो गइल रहे आ ओकनी के अत्याचार दिन पर दिन बढ़ल चालू हो गइल रहे। पैदावार से ज्यादा लगान आ कठोर नियम कानून के चलते भारतीय लोग के मन में अंग्रेजन के प्रति गुस्सा बढ़े लागल रहे। मंगल पांडे के नियुक्ति बैरकपुर सेना छावनी में भइल रहे। उ 34वीं बंगाल नेटिव इंफॅन्टरी के पाँचवा कंपनी में सिपाही रहलन।

ओ बेरा देसी सैनिकन में अफवाह उड़ल रहे कि बहुते अंग्रेज सैनिक समुद्री मार्ग से आवत बाड़े सन आ इहाँ के भारतीय सैनिकन के मार दिहे सन। ओहि बेरा सैनिक के बीच बाइबल बँटला के अउरी ईसाई धर्म अपनवला पर विशेष सुविधा अउरी भत्ता देहला के भी खबर फइलल रहे। मंगल पांडे जइसन हजारों सिपाही ई सब के चलते ब्रिटिश राज से नाखुश रहलें। तबे सिपाहियन के नया राइफल एनफील्ड पी 53 के इस्तेमाल करे के फरमान आइल। एह राइफल में कागज के बनल कारतूस के फाड़ के ओकरा भीतर के बारूद राइफल में भर के चलावे के रहे। ई खबर फइलल कि ओह कारतूस में गाय अउरी सूअर के चर्बी से बनल ग्रीज लगावल बा। हालांकि ग्रीज ओह कागज के हर मौसम में नरम बनावे खातिर आ कारतूस के खराब होखे से बचावे खातिर लगावल गइल रहे। अब बात ई रहे कि एनफील्ड राइफल के एक हाथ पकड़े के पड़े, दूसरा हाथ से कारतूस धर के दांते से फार के नाली में भरे के पड़े। इहे बात सिपाहियन के खटक गइल। अधिकांश सिपाही हिन्दू-मुसलमान संप्रदाय के रहलें आ सबमें ई राय बन गइल कि अंग्रेज हमनी के धर्म भ्रष्ट करे खातिर ई खेल रचले बाड़ें सन। एने ईसाई में धर्मान्तरण के हल्ला सुनाते रहे।

हिन्दुस्तानी सिपाही लामबंद होखे लगलs सन। कुछ इतिहासकार के इहो मान्यता बा कि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़त दबदबा के खिलाफ बगावत करे खातिर देश के राजा, जमींदार, धार्मिक नेता एकजुट होके के तैयारी करत रहलें। सभे के योजना रहे कि 31 मई 1858 के महाक्रांति होई आ एक साथे सगरो देश में अंग्रेजन के ऊपर धावा बोलाई जेकरा चलते ओकनी के पाँव उखड़ जाई। सच कहल जाव त जदि अइसन भइल रहित त देश 90 साल पहिलही आजाद हो जाइत। केतन मेहता त अपना फिलिम मंगल पांडे – द राइज़ींग में इहो देखवले बाड़ें कि मंगल पांडे कुछ अइसन नेता से मिलबो कइलें जे महा-क्रांति के योजना में शामिल रहे।

अकेले बोल देहलें अंग्रेज अफसरन पर धावा

29 मार्च 1857 के दुपहरिया में बैरकपुर में नियुक्त लेफ्टिनेंट बाग के पता चलल कि उनके कंपनी के कुछ सिपाही जे के मंगल पांडे अगुवाई करत रहलें, क्वार्टर बिल्डिंग के ओर आ रहल बाड़ें। सगरी परेड ग्राउन्ड में जमा बाड़ें आ भांग के नशा में धुत्त बाड़ें। मंगल पांडे सबसे विद्रोह करे के कहत बाड़ें आ जवन भी अंग्रेज सिपाही लउकी ओकरा के मार देबे के कहत बाड़ें। अबे इहे होत रहे तले लेफ्टिनेंट बाग घोड़ा पर चढ़ के परेड ग्राउन्ड में आ गइल। मंगल पांडे अकेले ओकरा से भिड़ गइलें आ ओकरा पर गोली चला देहलें। बाग बाँच गइल बाकिर ओकरा घोड़ा के गोली लाग गइल एही से घोड़ा आ बाग नीचे गिर गइलें। बाग अपना पिस्तौल से मंगल पर गोली चलवलस। मंगल पांडे खुद के बचा लेहलें अउरी तलवार लेके बाग पर हमला कर देहलें। कई जगह ओकर के काट के खूनम खून कर देहलें। ओहिजा सर्जेन्ट मेजर ह्यूसन भी पहुँच गइल आ मंगल पांडे ओकरो पर तलवार से वार करे लगलें। ह्यूसन जमादार ईश्वरी प्रसाद से मंगल पांडे के गिरफ्तार करे के कहलस। ईश्वरी पहिले से मंगल के पार्टी में रहलें, उ माना कर देहलें।

एतने में एगो सिपाही शेख पलटू मंगल पाण्डेय के डाँड़ में बांह डाल के पीछे से पकड़ लेहलस। मंगल पांडे तभियो तलवार चलावते रहलें। उहाँ बहुते देसी सिपाही रहलें लेकिन सब मूक दर्शक बनल रहलें। तब तक जनरल हीअरसे के एकर खबर लाग गइल रहे आ उ अपना दू गो अफसर बेटा के साथे अइलस आ सब सिपाहियन के धमकवलस कि मंगल पांडे के तुरते पकड़sलोग। जे ऑर्डर ना मानी, ओकर जान जाई। मंगल पांडे के जब लागल कि अब हम पकड़ा जाएब त उ खीस में अपना साथी सिपाहियान के गरीअवलें आ आपन बंदूक के नली छाती पर लगा के गोड़ के अंगूठा से ट्रिगर दबा देहलें। गोली फायर हो गइल, मंगल पांडे घायल होके धरती पर गिर गइलें। हालांकि कुछ दिन बाद जब उ ठीक भइलें त उनका पर मुकदमा चलल आ 18 अप्रैल के फांसी के दिन तय भइल। बाकिर एह घटना के बाद से चारु ओर मंगल पांडे के बग़ावत के चर्चा आगि लेखां फइलल आ उनका बहादुरी के तारीफ होखे लागल। एह से घबरा के अंग्रेजी हुकूमत मंगल पांडे के 8 अप्रैल के ही सरेआम फांसी पर लटका देहलस कि एगो नजीर पेश होखो आ फेर से कवनो सिपाही भा क्रांतिकारी बगावत करे से डेराव।

बाकिर भइल एकरा उल्टे। इतिहास गवाह बा कि मंगल पांडे के फांसी भारतीय दिल-दिमाग़ में आजादी के आग धधका देहलस आ ओकरा बाद पूरा भारत में जवन धमाका भइल, ओह से लंदन ले हिल गइल।


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2510

डॉ. अमित कुमार मुन्नू

आज़ादी के लड़ाई में भोजपुरी माटी के बड़हन योगदान रहल बा l भोजपुरी के ई क्षेत्र वीर-बाँकुड़न के जन्मभूमिये रहल बा l भारत के पहिला राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, चंपारण आन्दोल के मुख्य यजमान बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद, बिहार के पहिलका ग़ैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा, आज़ादी पावे खातिर काला पानी के सजाय काटेवाला श्यामदेव नारायण, पटना सचिवालय पर तिरंगा झण्डा फहरावे के क्रम में शहीद उमाकांत सिंह, शहीद शिरोमणि फुलेना प्रसाद श्रीवास्तव, शहीद शुभलाल महतो, सीवान के शहीद सराय गोलीकांड में शहीद बच्चन विद्यार्थी, शहीद छट्ठू गिरि, टमटम हाँकेवाला शहीद झगड़ू साह l एकरे साथे सीवान ज़िला में शहीद सीताराम, बोधा बरई, रामसेवन राय, रामदेनी कुर्मी, मेवालाल पासवान, खखन डोम आ सीवान ज़िला के पहिला शहीद गंगा प्रसाद राय के साथे ‘बाबू’ (राजेन्द्र बाबू) के बड़ भाई महेन्द्र प्रसाद, श्रीमती प्रभावती देवी, वीरांगना तारा रानी श्रीवास्तव, श्रीमती राजवंशी देवी पर त बहुत लोग लिखल-पढ़ल आ एह लोगन के विषय में सब केहू जानेला, लेकिन आज़ादी के लड़ाई में सीवान के कई गो घटना, परिवार आ आदमी अइसनों बा जेकर जमीन पर काम आ योगदान त बहुत रहे बाकिर ओकरा के इतिहास के पन्ना में स्थान ना मिल सकल l एह से ओह लोगन के समर्पण के जानकारी क्षेत्रीय स्तर पर सिमट के रह गइल l काहेकि कवनों मन्दिर के चमकत कँगूरा त सबके ध्यान अपना ओर सहज ही आकृष्ट कर लेला l बाकिर ओह मन्दिर के नींव के मजबूती देबे खातिर ओह अँधकार के जवन ईंट आत्मसात कर लेले ओह ईंटन पर केकर ध्यान जाला ?

सन् 1921 में असहयोग आंदोलन के रचनात्मक पक्ष में दूगो काम बड़ा महत्त्व के करे के रहे-

1- राष्ट्रीय विद्यालय खोलल आ सरकारी स्कूलन के बहिष्कार

2- गाँव के झगड़न के अंगरेजन के कचहरी में ना भेज के पंचायत में ही ओकर निबटारा करावे के l

एही दूनू बातन पर आपन ध्यान केंद्रित करके सीवान ज़िला के कई लोग एह कामन में लाग गइल l सीवान में कई गो स्कूल खोलल गइल l जवना में ‘सीवान एकैडमी’ आ ‘कर्मयोगी स्कूल’ रहे l ‘सीवान एकैडमी’ स्कूल के अस्तित्व त आज नइखे l बाकिर ‘कर्मयोगी स्कूल’ आजो सरकारी स्कूल के रूप में चलता l

‘सीवान एकैडमी’ के संस्थापक आ सारण ज़िला परिषद के सदस्य बाबू बिलास बिहारी सहाय, वकील सन् 1921 में एह विद्यालय के राष्ट्रीय विद्यालय में परिणत कर देहनीं आ अपना उदेश्य के पूरा करे खातिर एह विद्यालय के प्रधानाचार्य अपना अनुज श्री रसिक बिहारी शरण, प्लीडर के बनवनीं l

बाबू रसिक बिहारी शरण देश-सेवा के काम में सुविधा होखे, एह खातिर उहाँ के छपरा के आपन चमकत वकालत के छोड़ के सीवान आ गइनीं आ उहईं वकालत करे लगनीं l इहाँ आके भी उहाँ के चैन से आपन वकालत ना कइनीं आ लगनीं देश के काम में गाँवा-गाईं के चक्कर लगावे l उहाँ के सीवान ज़िला के रघुनाथपुर थाना के पंद्रहियन गाँवन में ग्राम-पंचायत के काम खड़ा करे के बीड़ा उठवनीं l उहाँ के बड़ी लगन आ मेहनत से ओह काम के कइनीं आ ओह में सफल भी भइनीं l एतने भर ना उहाँ के दिघवलिया-सैचानी के पहिलका सरपंच भी भइनीं l ओह समय में इहाँ एतना पढ़ल-लिखल (एम. ए., एल. एल. बी.) सरपंच शायदे कोई दोसर बिहार में होखस l रसिक बाबू कांग्रेस के ‘मुठिया; (एक मुट्ठी अनाज कुल घर से) इकट्ठा करे में लोगन के हौसला बढ़ावनीं l कहल त इहाँ तक जाला कि इहाँ के जन-सम्पर्क एतना बेजोड़ रहे कि खाली सात-आठ गाँवन में पाँच महीना के भीतर चार-चार मन चाउर,आटा-दाल आदि ‘मुठिया’ के रूप में इहाँ के जमा क लेहनीं l जवना खातिर सारण ज़िला कांग्रेस कमिटी अपना सम्मेलन में इहाँ के विशेष धन्यवाद-पत्र देहलस l नमक-सत्याग्रह में रसिक बाबू आपन चमकत वकालत के छोड़ गाँव-गाँव में घूम-घूम के विदेशी वस्त्रन के बहिष्कार आ खादी के प्रचार के काम कइनीं l लोगन के खादी के इस्तेमाल करे खातिर प्रेरित कइनीं आ ओकरा पक्ष में जबरदस्त रूप से जनमत खड़ा कइनीं l इहाँ के एह कुल कामन में सर्वश्री रघुनाथ प्रसाद, धर्मनाथ मिश्र, बबन सिंह, गया दूबे आ वैदेही शरण दूबे के भरपूर सहयोग मिलल रहेl

एही तरह से राजेन्द्र बाबू के राष्ट्रपति के पद से सेवा-निवृत भइला पर सदाकत आश्रम में उहाँ के साहित्यिक-सचिव संत कुमार वर्माजी नमक आंदोलन के समय चैनपुर बाजार पर नमक बनावत, धरना देत बारह लोगन के साथे धरा गइनीं l पुलिस एह सब लोगन के बारह माइल उत्तर हसनपुरा बाजार पर अपना गाड़ी में बइठा के ले आइल आ एह बाजार में पहुँचला के बाद गाड़ी खराब के बहाना से गाड़ी ढकेले खातिर सबका के गाड़ी से उतार देहलस l एह लोगन के गाड़ी से उतरला के बाद एह लोगन के ओही जा छोड़ के पुलिस गाड़ी लेके भाग गइल l संत बाबू 13 अगस्त 1942 के जे पुलिस के डरे सीवान से भगनीं त अपना गाँवे दिघवलिया आ ओकरा बाद बलिया में जून 1943 तक फरारी के जिनगी बितवला के बादे सीवान लउकनीं l

सीवान में पटना कॉलेज जरवला के समाचार पढ़के विक्टोरिया मेमोरियल हाई इंग्लिश स्कूल आ डी. ए. वी. हाई स्कूल जरावे के काम युवा छात्रन के गुप्त संगठन ‘सिक्रेट सोसायटी’ के सदस्य लोग कइलस l एह दूनू स्कूलन के जरावे में सर्वश्री गोपीकृष्ण लाल दास, महेन्द्र कुमार, मोख्तार सिंह, विपिन बिहारी वर्मा, रामाधारप्रसाद अंशुमाली, रामचन्द्र प्रसाद, रवीन्द्रदत्त शुक्ल, श्याम किशोर तिवारी, नन्द कुमार उपाध्याय, परमानन्द यादव आ रमाकांत पाण्डेय के प्रमुख भूमिका रहे l

एह संगठन के संस्थापक सदस्य- गोपी कृष्ण लाल दास, महेन्द्र कुमार, रामचन्द्र प्रसाद, मोख्तार सिंह आ विपिन बिहारी वर्मा के सफल अगुआई में वी. एम. एच. इंग्लिश स्कूल में दू दिन ले हड़ताल करावे के काम अपना अंजाम तक पहुँचलl जवना के सफलता के उत्साह में आके ई लोगबबुनिया रोड के नीम के गाछ पर पुलिस के झाँसा देके झण्डा फहरवलसlओकरा बाद फौजदारी कचहरी पर झण्डा फहरावल गइल l जवना में श्री एस. सी. मुखर्जी एस. डी. ओ. साहेब राष्ट्रगान गइनीं आ ओकरा बाद उहाँ के लइकन पर लाठी चार्ज करा देहनीं l जवना में शंकर दास के गम्भीर चोट आइल l

एह संस्था के संस्थापकमहेन्द्र बाबू के अगुआई में पचरुखी आ सीवान में रेल लाइन आ ओकर खम्मा तुड़े के काम कइल गइल l एह काम में इहाँ के सहयोगी श्री रामनारायण प्रसाद रहनीं l सीवानजं. स्टेशन पर महेन्द्र बाबू आ श्याम किशोर तिवारी मिल के मढ़ौरा पुलिस के जवानन से रिवाल्वर छीन लेहलस आ भागे में सफल भी हो गइल l एह गुप्त संगठन के बइठक सीवान ज़िला के गाँवन में हमेशा होत रहे l बाद में एह संगठन के दिशा-निर्देश क्रांतिकारी नेता विद्या भूषण शुक्ल, वासुदेव नारायण सिन्हा, राजवंशी सिंह, जंगबहादुर सिंह (लाट साहेब) आ बिहार के टाइगर के रूप में चर्चित योगेन्द्र शुक्ल से मिले लागल l एही क्रम में सीवान के पंचमंदिरा के एह संगठन के एक गुप्त बइठक में जिलाभर के क्रांतिकारी लोग भाग लेहलस l जवना में योगेंद्र शुक्ल के देहल डायनामाइट से रेल पुलिया उड़ावे के काम के अंजाम तक पहुँचावे में रवीन्द्र नाथ शुक्ल, रामाधार प्र. अंशुमाली आ महेन्द्र कुमार सहित कुछ आउर लोग जान के बाजी लगा के पूरा कइलस l रवीन्द्र शुक्ल जी के पुलिस गिरफ्तार कइलस l अभी ई काम सेराइलो ना रहे कि सीवान थाना में राजेन्द्र गुप्ता के अगुआई में बम फेंक के ज़िला प्रशासन के चूल हिला देहल गइल l एह काण्ड में राजेन्द्र गुप्ता के बाकी सहयोगी श्याम किशोर तिवारी, महेन्द्र कुमार आ गोपीकृष्ण लाल दासत राजेन्द्र गुप्ता के साथ ही भाग गइल लोग l बाकिर थोड़े देर के बाद गुप्ता जी के घर से पुलिस उनका के धर दबोचलस आ ढंग से उनकर मरम्मत कइलस l गुप्ता जी पुलिस के ओतना मार बरदाश्त कर गइले l बाकिर अपना एह साथी लोगन के नाम ना बतवले l

एह संगठन के बाकी लोग भी अपना-अपना स्तर से सक्रिय रहे l जवना लोगन के नाम रहे-सर्वश्री वीरेन्द्र आज़ाद, रमा रमण, रामायण प्रसाद वर्मा, कपिलदेव श्रीवास्तव, पारसनाथ प्रसाद, बद्रीनाथ प्रसाद, रघुनाथ तिवारी, ललन प्रसाद, वीरेन्द्र, उमाशंकर द्विवेदी, सुरेन्द्र नाथ वर्मा, सूर्य नारायण सिंह (भोला बाबू), गणेश प्रसाद, नन्द किशोर, नारायण, विद्यानन्द दूबे, परमा यादव, किशोरी प्रसन्न सिंह, शुकदेव प्रसाद अग्रवाल, पुण्यदेव मिश्र, बद्री प्रसाद उर्फ बाबा, दीनानाथ, विश्वनाथ कलवार, राम अवतार प्रसाद, नगीना लोहार आ कौलेश्वर लोहार l एह में ई सब लोग राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ के स्वयं–सेवक भी रहे आ राष्ट्रीय-आंदोलन में भी सक्रिय रहे l

एह तरह से सीवान ज़िला स्वतंत्रता-आन्दोलन के क्रम में आपन भूमिका बखूबी निभवले बा l

(परिचय-  डॉ. अमित कुमार मुन्नू l एम ए., एल. एल. बी., पीएच. डी., स्वतंत्र पत्रकार )


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2080

भगवती प्रसाद द्विवेदी

जब 1857 में भोजपुरिया जवान मंगल पांडे के अगुवाई में सिपाही विद्रोह भइल, त सउंसे भोजपुरियन के लोहू उफान मारे लागल रहे आ जे जहवां रहे उहंवें से खिलाफत के सुर बुलंद कइल शुरू कऽ देले रहे। जन-जन में राष्ट्रीय चेतना के बोध करावे का गरज से देश के इतिहास, भूगोल, कुदरत, संस्कृति से लबरेज़ रघुवीर नारायण के ‘बटोहिया’ के सिरिजना भइल, जवन ‘भोजपुरी के वंदेमातरम्’ साबित भइल। बाकिर मुलुक के गौरवशाली इतिहास प पानी फेरेवाला अंगरेजन के करतूत प मनोरंजन बाबू के ‘फिरंगिया’ जब लिखाइल, त देश के-का छोट,का बड़-सभ केहुए के खून खौलि उठल आ घर-अंगना से खेत-खरिहान ले ओके गायन होखे लागल रहे। गांवागाईं भोजपुरी के कविताई गूंजि उठल रहे आ देश खातिर आपन जान तरहत्थी पर धऽके सभे मरि मिटे बदे तइयार हो गइल रहे। ‘बटोहिया’ आउर ‘फिरंगिया’ के तर्ज पर एगो अउरी गीत सिरिजाइल रहे ‘लुटेरवा’ आ ओकरा रचनिहार के नव महीना के कठोर जेहल के सजाइयो भुगुते के परल रहे।

‘लुटेरवा’ के अमर कवि रहलन गुंजेश्वरी मिश्र ‘सुजस’,जेकर जनम बिहार में ओह घरी के सारन जिला (अब सीवान) के बसंतपुर थानान्तर्गत गांव सैदपुर में भइल रहे। लरिकाइएं से कविताई में दिलचस्पी देखिके बाबूजी पंडित राजकुमार मिश्र उन्हुकर दाखिला छपरा के संस्कृत कॉलेज में करवा दिहलन। बाकिर गान्हीं बाबा के असहजोग आंदोलन में भागीदारी निभावत ‘सुजस’ जी पढ़ाई छोड़ि दिहलन। बाबूजी देशभक्ति से धियान भटकावे आ घर-परिवार से जोड़ेके दिआनत से शिवपुर सकरा थाना दरौली के केदारनाथ पाण्डेय के बेटी से उन्हुकर बियाह करवा दिहलन।

बाकिर गुंजेश्वरी मिश्र ‘सुजस’ त खुद के जंगे-आजादी खातिर समर्पित कऽ देले रहलन। सन् 1921 शुरू हो चुकल रहे।

‘सुजस’जी एगो नया गीत के सिरिजना कऽ दिहलन आ बेगर केहू से किछु बतवले छपरा के कमला प्रेस में जाके रातोरात आपन गीत ‘लुटेरवा’ के एक हजार कॉपी छपवा लिहलन। गीतकार का रूप में ऊ आपन नांव ना डललन आ छद्मनांव छापिके रेलगाड़ी में गा-गाके जनता के सुनावे लगलन। ऊ गांव-गांव में जासु आ ‘लुटेरवा’ गावत जनजागरन के अभियान चलावसु। उन्हुका गीत आ गायकी सुनि-पढ़िके सुननिहारन के करेजा फाटे लागत रहे। लोग मातृभूइं खातिर तन-मन-धन अर्पित करे आ सर्वस्व होम करे के किरिया खात रहे।

बाकिर ‘सुजस’ जी के गीत अंगरेजी शासन के नींन हराम कऽ दिहलस। भलहीं ओह पर उन्हुकर नांव ना रहे, बाकिर पुलिस के असलियत के भनक मिलि गइल। उन्हुका घरे जब पुलिस के छापा परल,त गीत के मूल पांडुलिपि आ छपल प्रति बरामद भइल। ‘सुजस’जी के गिरफ्तार कऽ लिहल गइल। गांव-जवार के तमाम नामी-गिरामी संभ्रांत लोग जमानत लिहल। छपरा के जिलाधीश के इजलास में मोकदिमा चलल।

आखिरकार ‘सुजस’ जी के सश्रम कारावास के सजाइ सुनावल गइल-उहो नौ महीना के कठोर सजाइ। बाकिर उहवों कवि जी ‘लुटेरवा’ गीते के गायन करत रहलन।

दरअसल ‘लुटेरवा’ में देश में कारोबार करे आइल गोरन के लुटेरा साबित कइल गइल रहे। सांच बात कहला प सोझे जेहल के हवा खिआवल जात रहे। ‘लुटेरवा’ के शुरुआती पांती प अखियान कइल जाउ-

मक्का ओ मदीना अइसन जहान रहे,

पुन्न भूंइ भीत में मिलवले, लुटेरवा!

हमनी गरीब जब कुछ मंगलीं त

झट से तें जेहल देखवले,लुटेरवा!

कवि के कहनाम रहे कि लूट-खसोट करे का संगहीं अबोध लरिकन के जान लीहल आ संतसुभाव लोगन पर बर्बर अतियाचार भला केकर दिल ना दहला दी?

सब कोई मिलके दुखवा रोवत रहे

ताहि बीचे गोलवा गिरवले लुटेरवा।

चूनवा के गड़हा में साधुन के खड़ा कके 

ऊपर से पनिया गिरवले लुटेरवा।

छोट-छोट बालकन के घमवा में खेदि-खेदि 

सभनी के जमपुर भेजवले,लुटेरवा।

सुजस जी गीत में ओह घरी के किछु वारदातो के दिल के घवाहिल करेवाला चित्र उकेरत लिखले रहलन-

उहवां जो बृधा अरु सुशील सुदेव रहें 

लंगटहीं खाड़ तें करवले,लुटेरवा।

रायबरेली में दुखिया प्रजा के ऊपर

नाहक में गोलिया चलवले, लुटेरवा।

भारत के भाई-भाई के लड़वाके राज करेवाला ई लुटेरवा कतने कलाकारन के हाथ काटिके, आंखि फोरिके चउपट बना दिहलस। आगा के पांती में कवि कहत बा-

भाई में झगड़ा लगाइ ओ रिझाइकर 

पराधीन नामवा धरवले,लुटेरवा।

जहवां के लोग रहे ब्रह्मॠषि,राजॠषि,

सभनी के गदहा बनवले,लुटेरवा।

इहवां के शिक्षित सुजन शिल्पकार रहे,

पकड़ के भांड़ में झोंकवले,लुटेरवा।

कतना के हाथ काटि,कतना के आंखि फोरि

बिलकुल तें चउपट बनवले,लुटेरवा।

कपड़ा में चमड़ा के पालिस लगाइकर

साथहीं पलेगवा भेजवले,लुटेरवा!

 

बाकिर एकरा के विडंबने कहल जाई कि ‘बटोहिया’ आ फिरंगिया के गीतकार के जवन प्रसिद्धि मिलल, ऊ ‘लुटेरवा’ के गीतकार के ना मिलि पावल। बाकिर ना त कविवर गुंजेश्वरी मिश्र ‘सुजस’ जी के देश का प्रति सच्चा समरपन के भुलाइल जा सकेला, ना एह ‘लुटेरवा ‘ के यादगार पांती के। ‘सुजस’जी के सुजस जंगे-आजादी के इतिहास में दर्ज रही।


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2260

आनन्द सन्धिदूत

पहिला स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर प्रदेश का गाजीपुर जिला आ पड़ोसी बिहार राज्य का अविभाजित आरा जिला शाहाबाद का रणभूमि में मैगर सिंह एगो अप्रतिम योद्धा हो चुकल बाड़न। कहल जाला कि ई महान स्वतंत्रता सेनानी वीरवर कुंवर सिंह के विश्वसनीय सरदार रहलन आ कुंवर सिंह बलिया, आजमगढ़ आ मिर्जापुर में अंगरेजन से युद्ध में जब व्यस्त रहलन तब उनका अनुपस्थिति में आरा जिला का कई गो मुठभेड़ में अंगरेजन से लोहा लेले रहलन आ ओमे विजयो हासिल कइलन। गाजीपुर गजेटियर में मैगर सिंह के जिला के आतंक (Terror of District) लिखल बा।

मैगर सिंह का बारे में ढ़ेर जानकारी उपलब्ध नइखे। उनका माता-पिता के नाम, विवाह वगैरह पारिवारिक जीवन के जानकारी उनकर जन्म तिथि आ निधन तिथि का बारे में कुछ साफ नइखे। उनका बारे में एतने मालूम बा कि मैगर सिंह के जनम गहमर गांव में भइल रहे। ऊ जाति से सिकरवार राजपूत रहलन आ पेशा से खेतिहर किसान रहलन। गहमर का अठारह-बीस गो पट्टी में एक पट्टी के नाम मैगरो सिंह का नाम से बा आ एह तरह ऊ गांव का अठारह-बीस गो नम्बरदारन में एगो नम्बरदार रहलन। कहल जाला कि उनकर फोटो लंदन का संग्रहालय में बा। एहर हाल का बरिसन में उनकर एगो तस्वीर गूगल एप पर डाल दिहल बा। इच्छुक व्यक्ति गूगल से तस्वीर निकाल सकेलन।

मैगर सिंह सांवर रंग आ गठीला बदन के युवक रहलन। ओह जमाना में गांव का नवयुवकन में शारीरिक ब्यायाम, कुश्ती, दण्ड बैठक वगैरह के सवख रहे। एक साथ शरीरिक अभ्यास कइले युवकन में एगो संगठन बन गइल रहे जेकर नेता मैगर सिंह रहलन। ई दल तीर धनुष तलवार आ गुरदेल का लड़ाई में माहिर रहे। एह दल का गुरदेल के कइल आक्रमण के सामना अंगरेज अपना बन्दूक से करे में असमर्थ रहलन स।

मैगर सिंह के अंगरेजन से निर्णायक युद्ध अविभाजित आरा जिला का खीरी गांव में भइल। एह लड़ाई के निर्णायक तत्व ई रहे कि खीरी गांव आ आसपास के जनता दिल खोल के मैगर सिंह का दल के साथ दिहलस। अगर मैगर सिंह के दल अंगरेजन का सैनिक टुकड़ी के बहका के गांव का गलियन में ले आइल त गांव के मेहरारू तसला में पानी खउला के मकान का खपड़ा-मड़ई का ऊपर से अंगरेजन पर फेंके सुरु कइली स। जवना अंगरेज आ ओकरा घोड़ा पर ई खउलत पानी पड़े ऊ घायल हो जात रहलन स। अगर कवनो तरह ऊ भागे के कोशिश कर स त गली का मोहाना-कोनचा मैगर सिंह के सैनिक गुरदेल आ तीर-धनुष से आक्रमण करत हालत बेदिन कइ द स। मैदान में अइलो पर अंगरेजन के खैर ना रहे। मैदान में पतलो (सरपत) के जंगल रहे जवना में स्वतंत्रता सैनिक छिपल बइठल रहसन आ मोका पवते अंगरेजन पर टूट पड़ सन। एह लड़ाई में अंगरेजन के बुरी तरह हार भइल आ मैगर सिंह का टुकड़ी के भारी मात्रा में लड़ाई के हरबा-हथियार आ अउरी युद्ध सामग्री हाथ लागल। लड़ाई का बाद मैगर सिंह गहमर वापस लवटि अइलन।

तब तक स्वतंत्रता संग्राम धीमा पड़त नजर आइल। बहादुर शाह जफर गिरफ्तार हो चुकल रहलन। लक्ष्मीबाई वीरगति के प्राप्त हो चुकल रहली। नाना साहब पेशवा कहां गइलन पता ना चलत रहे। कुंवर सिंह घायल अवस्था में सोन नदी का किनारे-किनारे मिर्जापुर जिला से चल के अपना गांव जगदीशपुर आके जीवन का अन्तिम पड़ाव पर रहलन। देश के अधिकांश राजा-रजवाड़ा अंगरेजन का पक्ष मे रहलन ओह में डुमरांव नरेश भी रहलन जेकर कुंवर सिंह से खून के रिश्ता रहल। गोरखा आ सिख सैनिकन के अंगरेजन का साथ दिहला से स्वतंत्रता संग्राम दिन पर दिन कमजोर होत जात रहे। अइसन में ना त मैगर सिंह के कहीं से दिशा निर्देश मिलत रहे ना कवनो उत्साहजनक खबर आवति रहे। ई जान के कि जिला के आतंक मैगर सिंह गहमर में छिपल बाड़न गहमर का जनता पर उनके गिरफ्तार करावे के दबाव बढ़ल जात रहे। जिला के पुलिस गहमर में रात दिन चौकसी में लागल रहे।  गांव के हरबा-हथियार सेना-पुलिस द्वारा जब्त करावल जात रहे। हालत ई रहे कि भाला-गंड़ासा जइसन लड़ाई के औजार त जब्त भइबे कइल, गांव में केहू का घरे पहसुल, हंसुआ आ चाकू-छुरी तक सब्जी-तरकारी काटे के ना रहि गइल। अंगरेज गांव में डुग्गी पिटवा के एलान करत रहलन स कि अगर मैगर सिंह के सेना-पुलिस का सुपुर्द ना कइल गइल त पूरा गांव के जरा के राख कइ दिहल जाई। लेकिन गांव के जनता हर जुल्म सहे के तइयार रहे मगर मैगर सिंह के अंगरेजन का सुपुर्द करे के तइयार ना रहे।

मैगर सिंह से ई स्थिति बरदास ना भइल। जवना क्षेत्र के स्वतंत्रता का कारन ऊ हथियार उठवले रहलन ओही क्षेत्र में उनका कारन अग्नि संहार हो ई आशंका उनकर अन्तरमन स्वीकार ना कइलस। ऊ तय कइलन कि कलकत्ता में गवर्नर जनरल विलियम वेन्टिंग का सामने ऊ आत्म समर्पण करिहन। अपना हरबा हथियार आ अश्व का साथ ऊ पनरह दिन यात्रा कइ के गहमर से कलकत्ता गइलन आ सीधे गवर्नर जनरल का बइठका में जाके खड़ा हो गइलन। विलियम बेंन्टिंग साधु स्वभाव के दयालु शासक रहे ऊ मैगर सिंह से उनकर परिचय पुछलस। मैगर सिंह शान्त भाव से आपन नांव बतावत कहलन कि ऊ आत्म समर्पण करे आइल बाड़न। मैगर सिंह के नाम सुनके बेन्टिंग के बीवी भीतर का कमरा से दउर के बइठका में आइलि। जेकरा आतंक से पश्चिमोत्तर प्रान्त (यू.पी. के पुरान नाम) के अंगरेज त्राहि-त्राहि करत रहलन स ओके ऊ अपना आंख से देखे चाहति रहे।

सारी कार्रवाई पूरी कर के मैगर सिंह के आजीवन कारावास के सजा भइल आ उनके बर्मा (अब म्यामार) भेज दिहल गइल। कहल जाला कि उनका मिलनसार व्यवहार आ सहयोगात्मक रवैया से प्रभावित होके सरकार उनके समय से पहिले छोड़ देले रहे। उनकर निधन गहमर में आके भइल। गहमर में उनकर स्मारक बनल बा जेकर उद्घाटन सन् 1961 में तत्कालीन रेलमंत्री बाबू जगजीवनराम द्वारा भइल रहे।


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2190

ज्योत्स्ना प्रसाद

ब्रजकिशोर तुम रहे हमारे, ब्रजकिशोर तुम रहे हमारे

राष्ट्रपिता के सहकर्मी हे मातृभूमि के प्यारेs !

स्वतंत्रता की रंगीनी में रंग तुम्हारा रंगा हुआ था

इंक़लाबी इतिहास तुम्हारे कर-कमलों का गढ़ा हुआ है

तेरी प्रतिभा से भास्वर है नीले नभ की सीमा पार

ब्रज किशोर तुम रहे हमारे, ब्रजकिशोर तुम रहे हमारे l’

प्राचार्य स्व. रामचन्द्र त्रिपाठी के एही पंक्तियन से हम ब्रजकिशोर बाबू के स्मरण करत आपन बात आगे बढ़ावे के चाहेब l जब कई दशकन से भारत माता अंगरेजन के गुलामी के जंजीर में बंधल छटपटात होखस तब ब्रजकिशोर बाबू जइसन एक संवेदनशील आ कर्मठ बेटा हाथ पर हाथ रख के कइसे बइठल रह सकेला ? जबकि स्वतंत्रता-आन्दोलन के यज्ञ में औकातभर आपन कर्म-समिधा डाले खातिर भारतमाता के हर विवेकी संतान छटपटा रहल होखे l

भारतीय स्वतंत्रता–संग्राम के दौरान वर्तमान सीवान ज़िला स्वतंत्रता-संग्राम के प्रमुख केन्द्रन में से एक रहे l इहाँ के किशोर-युवा ‘सिक्रेट सोसायटी’ के तहत सुभाषचन्द्र बोस आ भगतसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद से प्रभावित हो अपना काम के अंजाम देत रहले त अधिकांशत: सयान आ अनुभवी लोग गाँधीजी से प्रभावित रहे l सीवान ज़िला के उल्लेखनीय नामन में से बा- सर्वश्री डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, महेन्द्र प्रसाद (राजींदर बाबू के बड़ भाई), मौलाना मज़हरुल हक़ आ फुलेना प्रसाद इत्यादि l

ब्रजकिशोर प्रसाद के जन्म वर्तमान सीवान जिला के श्रीनगर में 14 जनवरी 1877 में एगो कायस्थ परिवार में भइल रहे l इहाँ के बाबूजी के नाम रहे रामजीवन लाल आ माई के नाम रहे समुद्री देवी l इहाँ के माई बहुत ही सरल आ सात्विक प्रवृति के महिला रहनीं l ब्रजकिशोर बाबू के परिवार अपना इलाक़ा के सम्पन्न परिवार में गिनल जात रहे l जमीन-जायदाद के साथ ही इहाँ के बाबूजी नौकरी भी करत रहनीं l एह से इहाँ के शिक्षा में कभी कवनों आर्थिक व्यवधान ना आइल l

ब्रजकिशोर बाबू के प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही भइल l जहाँ उहाँ के उर्दू, फ़ारसी, हिन्दी आ संस्कृत भाषा के शिक्षा ग्रहण कइनींl उहाँ के ओह घड़ी के प्रचलन के मोतबिक सन् 1888 में, यानी बहुत कमे उमिर में फूल देवी से बिआह हो गई l बाकिर उहाँ के बिआह से पढ़ाई में कोई व्यवधान ना पड़ल l

ब्रजकिशोर बाबू के बाबूजी गया में नौकरी करत रहनीं l एह से ब्रजकिशोर बाबू के माध्यमिक शिक्षा गया के ज़िला स्कूल से भइल l कलकत्ता प्रेसीडेंसी कॉलेज से उहाँ के बी. ए. आ एम. ए. कइनीं l एकरे बाद उहाँ के बाबूजी के स्वर्गवास हो गइल l बाकिर एह से उहाँ के घबड़इनीं ना बल्कि ओह विपरीत परिस्थिति में भी आपन आगे के पढ़ाई जारी रखनीं आ सन् 1898 मे क़ानून के पढ़ाई पूरा कइनीं l

जवना घड़ी ब्रजकिशोर बाबू के पढ़ाई-लिखाई चलत रहे ओह घड़ी बिहार में आधुनिक शिक्षा के अर्थ रहे जमींदार लोगन द्वारा खोलल ऊ स्कूल-कॉलेज, चाहे ओह तरह के स्कूल-कॉलेज जवना केमाध्यम अँग्रेज़ी होखे l चाहे शिक्षा में अँग्रेज़ी भाषा पर बल देहल जात होखे l जवना के मूल उद्देश्य ई रहे कि जमींदार लोगन के बच्चा अइसन पढ़ाई पढ़े जवना से ओह लोगन के अँगरेजी सम्राज्य आ शासन-पद्धति से परिचय हो सके आ ओकरा के ठीक-ठीक समझे के परिस्थिति उत्पन्न हो सके l ताकि ऊ लोग ब्रिटिश सरकार के सही-सही आंकलन करते हुएसोच-विचार के ई निर्णय ले सके कि ओह परिस्थिति में ओह लोगन के ब्रिटिश सरकार से आपन सम्बंध कइसन बनावे के चाहीं ? ओकरा खातिर कइसन रणनीति बनावल जाव ? इत्यादि-इत्यादि l

ब्रजकिशोर बाबू अपना दूरदृष्टि के परिचय देत स्त्री आ पुरुष दूनू के अँग्रेज़ी पढ़े खातिर प्रोत्साहित करत रहनीं आ उच्च शिक्षा खातिर लोगन के विदेश जाये के बढ़ावा देत रहनीं l एकरा खातिर उहाँ के संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठके जे लोग विदेश से आपन पढ़ाई पूरा करके वापस आवत रहे ओह लोगन के सम्मान में भारत लौटला पर रात्रिभोज के आयोजन भी करत रहनीं आ एह तरह के  आयोजन में शामिल भी होत रहनीं l

ब्रजकिशोर बाबू एक ओर विद्वान, उदार, परोपकारी, न्यायविद्, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी रहनीं उहईं दोसरा ओर उहाँ के एक न्यायप्रिय आ निर्भीक सेनानी भी रहनीं l एह से गाँधीजी के चंपारण आवे के पहिले से ही उहाँ के क़ानून के माध्यम से चंपारण के किसानन के दुख-दर्द ब्रिटिश सरकार तक पहुँचावे के भरसक कोशिश करत रहनीं l हालाँकि ओह कोशिश से किसानन के कवनों बहुत लाभ ना भइल l बाकिर एतना त जरूरे भइल कि किसानन के दुख आ शिकायत ब्रिटिश सरकार के नजर में आ गइलl एतने भर ना जवना घड़ी लोग अंग्रेजन के नाम लेबे से डेरात रहे ओह घड़ी भी उहाँ के आपन बात रखे के साहस रखत रहनीं l

ब्रजकिशोर बाबू के समय छपरा वकालत खातिर बहुत मशहूर रहे l एह से ब्रजकिशोर बाबू भी आपन वकालत छपरा से ही शुरू कइनीं आ देखते ही देखते काफी प्रसिद्ध हो गइनीं l बाकिर डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के सुझाव पर छपरा छोड़ के दरभंगा में वकालत करे लगनीं l एही बीच इंपीरियल कौंसिल के चुनाव में दरभंगा महाराज के विरुद्ध सिन्हा साहेब खड़ा भइनीं l एह चुनाव में ब्रजकिशोर बाबू खुलके सिन्हा साहेब के साथ देहनीं l एही घटना के बाद से ब्रजकिशोर बाबू सियासी जीवन के ओर आपन क़दम बढ़वनीं आ खुलके सियासत में दिलचस्पी लेबे लगनीं l एकर परिणाम ई भइल कि उहाँ के सन् 1910 ई. में दरभंगा नगर परिषद के सदस्य निर्वाचित भइनीं आ एही साले बंगाल विधान परिषद के निर्वाचित सदस्य भी बन गइनीं l ई बात तब के ह जब बिहार एक अलग राज्य ना रहे आ बिहार के अलग राज्य के दर्जा दिलावे खातिर ज़ोर-शोर से आन्दोलन चलत रहे l ओह आन्दोलन के ब्रजकिशोर बाबू एगो प्रमुख नेता रहनीं आ बिहार प्रांतीय सम्मेलन में लगातार हिस्सा लेत रहनीं l ई आन्दोलन लम्बा चलल आ सन् 1912 में बिहार के अलग राज्य के दर्जा मिलल l ब्रजकिशोर बाबू बिहार आ उड़ीसा विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित भइनीं l एही साले बांकीपुर में कांग्रेस पार्टी के सलाना अधिवेशन भइल, जबना के कामयाब बनावे खातिर ब्रजकिशोर बाबू बहुत मेहनत कइनीं l ई बात जवना घड़ी के ह ओह घड़ी भारत के बॉयसराय रहले लॉर्ड हार्डिंग l संयोग से ऊ बिहार के अलग राज्य के दर्जा दिलावे में व्यक्तिगत तौर से दिलचस्पी लेहले रहले l एह से बिहार राज्य के स्थापना खातिर संघर्षरत लोगन के मन मे ई विचार आइल कि लॉर्ड हार्डिंग के एह सहयोग खातिर उनका सम्मान में एगो स्मारक के स्थापना कइल जाव l सन् 1913 में हार्डिंग मेमोरियल समिति बनावल गइल l जेकरा द्वारा हार्डिंग पार्क के स्थापना भइल l एह कमिटी के ब्रजकिशोर बाबू एगो महत्वपूर्ण सदस्य रहनीं l

ब्रजकिशोर बाबू किसानन के स्थिति से बहुत दुखी रहनीं l एह से उहाँ के 10 अप्रैल सन् 1914 में बिहार प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्षीय भाषण में भी किसानन के मुद्दा पर ही बल देहनीं l सन् 1916 में लखनऊ में कांग्रेस के सलाना बैठक भइल l जवना में पटना यूनिवर्सिटी के स्थापना के लेके चर्चा भइल l एह चर्चा में ब्रजकिशोर बाबू बढ़-चढ़ के हिस्सा लेहनीं आ रामचन्द्र शुक्ल के साथे गाँधी जी के चंपारण के किसानन के स्थिति बतावत चंपारण आवे के निवेदन भी कइनीं l

गाँधीजी जब चंपारण में सत्याग्रह शुरू कइनीं तब ओह सत्याग्रह के कामयाब बनावे खातिर ब्रजकिशोर बाबू, राजेन्द्र बाबू आ अनुग्रह नारायण के साथे बहुत मेहनत कइनीं l ब्रजकिशोर बाबू ओह आन्दोलन के समय गाँधीजी के साया के तरह रहनीं l कई बार त एने गाँधीजी अंगरेज अधिकारी से बात करत रहनीं आ ओने ब्रजकिशोर बाबू ओही सिलसिला में पटना, राँची आ कलकत्ता के लगातार दौरा करत रहनीं l एकरा साथ ही उहाँ के एह विषय पर कईगो लेख भी लिखनीं l सन् 1918 में सच्चिदानंद सिन्हा आ हसन इमाम मिलके जब ‘सर्चलाइट’ अख़बार निकललस लोग तब ओकर हिन्दी संस्करण ‘देश’ के जिम्मेदारी ब्रजकिशोर बाबू अपना ऊपर ले लेहनीं आ ओकर संपादक बन गइनीं l

सन् 1920 में असहयोग आ ख़िलाफत आन्दोलन में भी ब्रजकिशोर बाबू बड़ा मनोयोग से हिस्सा लेहनीं आ अपना देश के आज़ादी खातिर आपन चलत वकालत के त्याग के पूर्ण कालिक आंदोलनकारी बन गइनीं l

गाँधी जी जब अंगरेजन के खिलाफ़ असहयोग आंदोलन शुरु कइनीं तब गाँधी जी के आह्वान पर छात्रन-द्वारा अंग्रेज़ी–शिक्षा के भी बहिष्कार भइल l एह छात्रन के भारतीय पद्धति से शिक्षा दिलावे खातिर पूरा देश में तीनगो विद्यापीठ- काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ आ बिहार विद्यापीठ के स्थापना भइल l बिहार के राजधानी पटना में 6 फरवरी सन् 1921 में स्वतंत्रता सेनानी ब्रज किशोर बाबू, मौलाना मज़हरुल हक़, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आ स्वयं गाँधी जी मिलके एकर स्थापना कइनीं l एकरा उद्घाटन में गाँधी जीकस्तूरबा गाँधी आ मोहम्मद अली के साथे पटना आइल भी रहनीं आ बिहार विद्यापीठ के विधिवत उद्घाटन भइल lगाँधी जी मौलाना मज़हरुल हक़ के बिहार विद्यापीठ के प्रथम चांसलर बनवनीं आ ब्रज किशोर बाबू के प्रथम वाइस चांसलर के पद के शोभामान कइनीं l एकरा साथ ही ब्रज किशोर बाबू काशी विश्वविद्यालय आ पटना यूनिवर्सिटी के सीनेट के सदस्य भी रहनीं l

सन् 1922 में गया में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन भइल जवना के ब्रजकिशोर बाबू स्वागताध्यक्ष रहनीं l ओह अधिवेशन के सफल बनावे में उहाँ के बहुत परिश्रम कइनीं l हालाँकि एही अधिवेशन में कांग्रेस के अंतर्विरोध खुल के सामने आ गइल आ कांग्रेस दू भाग में बँट गइल l बावजूद एकरा ब्रजकिशोर बाबू देश के प्रति आपन सकारात्मक भूमिका निभावत सदा सेवारत रहनीं l सन् 1928-29 में बिहार प्रांतीय कांग्रेस समिति के जब गठन भइल तब उहाँ के दीप नारायण आ शाह मो. ज़ुबैर के साथे ओह समिति के उपाध्यक्ष चुनल गइनीं l

सन् 1930 में गाँधीजी के नमक आन्दोलन के बिहार में कामयाब बनावे खातिर ब्रजकिशोर बाबू बहुत प्रयत्न कइनीं l जब 26 जनवरी सन् 1931 में सम्पूर्ण भारत में स्वतंत्रता दिवस मनावल गइल तब पटना के भँवरपोखर पार्क में बाबू अनुग्रह नारायण राष्ट्रीय झण्डा फहरवलन l ओही झण्डा के नीचे उहाँ उपस्थित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, ब्रजकिशोर बाबू, प्रो. अब्दुल बारी आदि सभे क़सम खइलस कि भारत के स्वतंत्रता मिले तक ऊ लोग संघर्षरत रही l

3 जनवरी सन् 1932 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा सदाक़त आश्रम में एगो मीटिंग बुलावल गइल l ओही मीटिंग के दौरान सदाक़त आश्रम में छापा पड़ गइल आ ब्रजकिशोर बाबू सहित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जगत नारायण लाल, मथुरा प्रसाद, प्रजापति सिंह, कृष्ण वल्लभ सहाय के गिरफ़्तार कर लेहल गइल आ सरकार द्वारा सदाक़त आश्रम पर आपन क़ब्ज़ा करके यूनियन जैक फहरा देहल गइल l

ब्रजकिशोर बाबू के पहिले बांकीपुर जेल मे रखल गइल फेर उहाँ के हज़ारीबाग़ भेज देहल गइल l उहाँ के पाँच महीना के क़ैद के सज़ा भइल l जेल के सज़ा में उहाँ के शरीर टूट गइल रहे l एह से जेल से बाहर अइला के बाद भी सेहत में सुधार ना आइल l अपना ओही स्थिति में आपन क़सम भी निभावे के रहे l एह से उहाँ के स्वास्थ्य में सुधार ना हो पावत रहे l आज़ादी खातिर संघर्ष करे वाला ब्रज किशोर बाबू आज़ादी के सवेरा देख ना पइनीं आ अपना आँखन में भारत के आज़ादी के सपना लेहले सन् 1977 में एह दुनिया से विदा ले लेहनीं l

सन् 1934 में बिहार में भयंकर भूकम्प आइल l अइसन समय में ब्रजकिशोर बाबू अपना शरीर के चिंता छोड़ के भूकम्प पीड़ित लोगन के सेवा में जुट गइनीं l बाकिर उहाँ के शरीर उहाँ के साथ ना दे पावत रहे l एह से रह-रह के उहाँ के बीमारी पटक देत रहे l उहाँ के अपना जीवन के अन्तिम दस बरिस ले बीमारी से बड़ा कष्ट भइल l

ब्रजकिशोर बाबू के चारगो संतान रहे l जवना में दूगो बेटा रहले आ दूगो बेटी रहली l उहाँ के बेटा लोगन के नाम रहे- विश्वनाथ प्रसाद आ शिवनाथ प्रसाद l बेटी लोगन के नाम रहे- प्रभावती देवी आ विद्यावती देवी l विद्यावती देवी के बिआह डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बड़ बेटा मृत्युंजय बाबू से भइल रहे l एह तरह से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद उहाँ के समधी रहनीं l ब्रजकिशोर बाबू के बड़की बेटी प्रभावती देवी के नाम त इतिहास में दर्जे बा l

ब्रजकिशोर बाबू अपना ज़िंदगीभर सिर्फ़ स्त्री शिक्षा आ परदा-प्रथा के विरोध ही ना करत रहनीं बल्कि अपना बेटीयन के भी एकर महत्त्व समझवनीं आ अपना एक काम में आगे बढ़े खातिर अपना बड़ बेटी प्रभावती जी के भी लगवनीं l

प्रभावती देवी ब्रजकिशोर बाबू के पद चिन्ह पर चलत स्वयं एगो स्वतंत्रता सेनानी रहनीं l उहाँ के बिआह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता आ जेपी आन्दोलन के पुरोधा जयप्रकाश नारायण जी से भइल रहे l इहाँ के चंपारण में गांधीजी के प्रथम सहयोगी ब्रजकिशोर बाबू के पुत्री त रहबे कइनीं साथ ही गाँधीजी के मानस-पुत्री के गौरव भी इहाँ के प्राप्त रहे l

चंपारण के किसान आंदोलन, जेकर ब्रजकिशोर बाबू के यजमान कहल जाला, ऊ आंदोलन गाँधीजी के भारत में लोकप्रियता दिलावे में बहुत योगदान कइले बाl सन् 1917 के ई चंपारण सत्याग्रह गाँधी जी के साथ एह तरह से जुड़ गइल बा कि गाँधी जी के जीवनी एकरा बिना पूर्णता ना पा सकेला l काहेकि ई भारत में गाँधी जी के दक्षिण अफ्रीका में आजमावलसत्याग्रह के पहिला प्रयोग रहे l एकर महत्त्व एही से समझल जा सकेला कि गाँधी जी के जीवनी चंपारण सत्याग्रह के बिना पूरा ही ना हो सकेला आ गाँधी जी के बिना चंपारण सत्याग्रह के त कल्पना भी ना कइल जा सकेला l एही सत्याग्रह के बाद गाँधी जी के लोकप्रियता के ग्राफ में काफी उछाल आइल l तत्कालीन समाचार पत्रन में गाँधी जी के एह सफलता के काफी प्रमुखता से स्थान मिलल l जवना के बाद ब्रिटिश शासन के

गाँधी जी अपना आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ के पाँचवा भाग के बारहवाँ अध्याय ‘नील का दाग’ में लिखतानीं- ‘लखनऊ कांग्रेस में जाने से पहले तक मैं चंपारण का नाम तक न जनता था l नील की खेती होती है, इसका तो ख्याल भी न के बराबर था l इसके कारण हज़ारों किसानों को कष्ट भोगना पड़ता है, इसकी भी मुझे कोई जानकारी न थी l’ एही किताब में गाँधी जी आगे लिखतानी- ‘राजकुमार शुक्ल नाम के चंपारण के एक किसान ने वहाँ मेरा पीछा पकड़ा । वकील बाबू (ब्रजकिशोर प्रसाद, बिहार के उस समय के नामी वकील और जय प्रकाश नारायण के ससुर) आपको सब बतायेंगे, कहकर वे मेरा पीछा करते जाते और मुझे अपने यहाँ आने का निमंत्रण देते जाते l’ ओही अधिवेशन में ब्रजकिशोर बाबू चंपारण के दुर्दशा पर आपन बात रखनीं l चूँकि गाँधी जी चंपारण के दुर्दशा से अनभिज्ञ रहनीं एह से ब्रजकिशोर बाबू ही उहाँ के सामने चंपारण के परिस्थिति के चित्र उकेरनीं l ब्रजकिशोर बाबू के संगठनात्मक क्षमता, कानूनी कौशल से गाँधी जी के किसानन के दुख दूर करे में मदद मिलल l

गाँधी जी के उहे चंपारण सत्याग्रह जवना के ब्रज किशोर बाबू के यजमान कहल जाला ऊ सिर्फ़  भारतीय इतिहास में ही ना बल्कि विश्व इतिहास में भी आपन नाम दर्ज क लेहलस l काहेकि इतिहास के ई घटना ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खुलल चुनौती रहे l ई घटना से गाँधी जी के ‘महात्मा’ बने के मार्ग भी प्रशस्त भइल l एह घटना से गाँधी जी के एक ओर लोकप्रियता बढ़त गइल उहईं दोसरा ओर ब्रिटिश सरकार पर जीत के ओर उहाँ के एक-एक सीढ़ी चढ़त गइनीं l पहिला जीत रहे निलहन के जाँच कमिटी के गठन, ओह कमिटी में गाँधी जी के सदस्य बनना दूसरा जीत रहे आ तीसरा जीत ‘तीन कठिया-प्रथा’ के समाप्त कइल रहे l किसान अपना जमीन के मालिक बन गइले l ई सब एक-एक कड़ी मिलके भारत में गाँधी जी के सत्याग्रह के पहिला विजय-शंख फूँकाइल आ देखते-देखते चंपारण गाँधी जी के भारत में सत्याग्रह के जन्म-स्थली बन गइल l गाँधी जी के एह सत्याग्रह में कानून से लेके ज़मीन तक में ब्रजकिशोर बाबू के साथ मिलल l उहाँ के गाँधी जी के साथे साया नाहिंन लागल रहनींl जवना से प्रभावित होके गाँधी जी अपना आत्मकथात्मक किताब ‘द स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरीमेंट्स विथ ट्रूथ’ में ‘द जेंटल बिहारी’नाम से एओ पूरा अध्याय ही लिख देले बानीं l दोसरा ओर एह घटना के ओह क्षेत्र खातिर दूरगामी परिणाम भी निकलल l क्षेत्रीय-विकास के पहल भइल जवना के अन्तर्गत पाठशाला, चिकित्सालय, खड़ी संस्था, आश्रम आदि के स्थापना भइल l

ब्रज किशोर बाबू के कर्मयोग के ऋणी बिहार समय-समय पर उहाँ के अपना तरह से श्रद्धांजलि भी अर्पित करेला l 21 अगस्त, 2016 में पटना बीट्स स्टाफ द्वारा ‘ब्रजकिशोर प्रसाद द फॉर्गाटन हीरो ऑफ बिहार’ के नाम से एगो किताब छपल बा जवन एक तरह से सिर्फ़ एगो ऐतिहासिक दस्तावेज ही ना ह बल्कि एक शोधात्मक ग्रंथ भी हl ‘द नेशनल बुक ट्रस्ट,’ इण्डिया द्वारा हाल ही में सचिदानंद सिन्हा द्वारा ब्रजकिशोर बाबू पर लिखल पुस्तक ‘द हीरो ऑफ द बैटल’ प्रकाशित भइल बा l देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साहित्यिक सलाहकार संत कुमार वर्मा द्वारा ब्रजकिशोर बाबू के जीवनी ‘बाबू ब्रज किशोर प्रसाद’ के नाम से दशकों पहिले छप चुकल बा l ब्रजकिशोर स्मारक संस्था द्वारा भी ब्रज किशोर बाबू के जीवनी प्रकाशित भइल बा l

चूँकि ब्रज किशोर बाबू के ई मत रहे कि शिक्षा के अभाव में ही चंपारण के किसानन के अधिक दुरगती भइल l एह से उहाँ के स्कूल के जरूरत पर आ गाँवा-गायीं बालक-बालिका के शिक्षा पर भी बहुत बल देत रहनीं l एह से उहाँ के स्मृति में भी पुरनका सारण ज़िला में कई गो शैक्षणिक संस्था खोलल गइल बा l उहाँ के जन्मस्थली श्रीनगर में सीवान के स्वतंत्रता सेनानी महेन्द्र कुमार (सीवान ज़िला के पहिला डब्बल एम. ए. आ शिक्षाविद् ) ब्रज किशोर बाबू के आकांक्षा आ शिक्षा के महत्त्व के ठीक-ठीक पहचानत रहनीं l एह से ब्रज किशोर बाबू के स्मृति में उहाँ के प्राइमरी से लेके इण्टर मीडिएट तक दू गो स्कूल खोलले बानीं l उहें के प्रयत्न आ स्थानीय लोगन के सहयोग से ब्रज किशोर बाबू के जन्म शताब्दी के बहुत बड़ा पैमाना पर मनावल गइल l ओह समारोह के मुख्य अतिथि रहनीं अनेक बार केन्द्र सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुकल जगजीवन राम, जेकरा प्रथम दलित उपप्रधान मंत्री के गौरव भी प्राप्त बा l

अंत में हम स्व. शैलजा कुमारी के कविता के चंद पंक्तियन से ब्रज किशोर बाबू के श्रद्धांजलि देत आपन बात खत्म करतानीं l-

‘वे थे स्वतंत्रता के अग्रदूत भारत के वीर सपूतों में

नव भारत भाग्य-विधाता थे, स्वराष्ट्रव्रती उद्भूतों में l

हे जन-मानस के राजहंस अब भी उठती मन में हिलोर

कैसे दर्शाएँ भाव-विमल शत-नमन तुम्हें हे ब्रज किशोर l’

 


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1920

डॉ. ब्रजभूषण मिश्र

राष्ट्रीयता के भाव एतना प्रबल होले कि ओकरा आगे आन स्थायी भाव फीका पड़ जाला। बाकिर ई भाव स्थायी ना होखे,कुछ समय खातिर होला। राष्ट्रीयता सर्वकालीन आ सार्वलौकिक भाव ना ह। बाकिर क्षणे भर खातिर काहे ना होखे, ई भाव पैदा होके भगत सिंह जइसन नवही के एसेम्बली में बम फेके खातिर प्रेरित कर सकत बा, चन्द्रशेखर आजाद से डाका डलवा सकत बा, उधम सिंह से गोली चलवा सकत बा।

सवाल इहो उठत बा कि राष्ट्रीयता के कवना रस के अंन्तर्गत स्थान दिआई। उत्तर में कवनो एक रस के नाम लिहल कठिन बा। जब राष्ट्र खातिर प्रेम के भाव उमड़ी, त एकरा के ‘श्रृंगार’ के अंन्तर्गत मानल जाई। जब देश के दुर्दशा से मन दुखित हो जाई, त ई ‘करुण रस’ के अन्तर्गत आई। जब देश माता रूप में लउकी त ‘भक्ति रस’; राष्ट्र खातिर लड़े-भिड़े के भाव जनमी, त ‘वीर रस’ आ ओही तरह ‘भयानक ‘,’वीभत्स’ आ ‘रौद्र ‘ सबके अंन्तर्गत एकर समावेश हो सकत बा। एकरा जड़ में आत्म-रक्षा, आत्म-गौरव के रक्षा, आपन राष्ट्र आ जाति का रक्षा के भाव लागल रहेला, एह से ई वीरे रस के अन्तर्गत मुख्य रूप से आई आ एह ‘वीर रस’ के भाव अधिका बाहरीये संकट से आवेला।

विद्वान लोग के मत बा कि राष्ट्रीयता का भावना के आधुनिक रूप के विकास यूरोप में भइल। बाद में ई धीरे-धीरे सँउसे संसार में फइल गइल। यूरोप में एकरा उद्भावना के कारण रहे। ऊहां छोट-छोट राज्य बहुत रहे। आपन धर्म, सभ्यता, संस्कृति के बरकरार राखे खातिर इहाँ बराबर प्रयास होत रहल। एही से राष्ट्रीयता का भावना के विकास भइल।

कुछ लोग के इहो मान्यता था कि एह भावधारा के सूत्र वैदिको साहित्य में मिलत बाटे-

“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या:।” ऊ लोग जे फ्रांस के राज्यक्रांति से राष्ट्रीयता के जनम मानत बाड़े,का एह बैदिक ॠचा में राष्ट्रीयता के भाव नइखन पावत। संध्या उपासना करेवाला लोग एगो श्लोक से जल शुद्ध करेलन-

गंगे च यमुने चैव गोदावरी! सरस्वती!

नर्मदे! सिन्धु! कावेरि! जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।

का एह श्लोक में राष्ट्रीयता के अभाव लउकत बा?

एह तरह से ई कहल जा सकत बा कि हमनी किहाँ आज के साहित्य भा कविता में जे राष्ट्रीयता के भाव आइल बा ओकर परम्परा वैदिक साहित्य से आइल बाटे, ऊ भाव खाली यूरोप के देखा-देखी नइखे पैदा भइल।

×    ×     ×    ×     ×

भोजपुरी कविता में जब राष्ट्रीयता का भाव के बात उठत बा, त एकर उद्भव अंग्रेजी राज्य के  प्रतिक्रिया के रूप में सामने आइल बाटे। बीसवीं सदी के प्रथम चरण में रघुवीर नारायण आ प्राचार्य मनोरंजन बाबू भोजपुरी में देश-प्रेम आ देश के दुर्दशा के वर्णन कइलें। जन सामान्य के जगावे खातिर ई लोग के राष्ट्रीयता के स्वर मुखर कइल। सन् 1912 ई० में रघुवीर नारायण जी के लिखल आ प्रसिद्धि पावल गीत ‘बटोहिया’ के प्रकाशन 1917 ई० में हो गइल रहे। ई गीत भोजपुरी राष्ट्रगीत के रूप में सनमान पवलस। एह गीत में सउँसे भारत के मन हर लेवे वाला प्रदेश के चित्र खिंचाइल बाटे। एह में राष्ट्रीय एकता के स्वर प्रमुख रूप से गूँजल बाटे। भारत के नक्शा खींच के, ओकरा विशेषता के वर्णन कइल गइल बा। पर्वतराज हिमालय, गंगा, यमुना, सोन के प्राकृतिक दृश्य देखे लायक बा-

सुन्दर सुभूमि भइया भारत के देसवा से,

मोरा प्राण बसे हिमखोह रे बटोहिया।

एक द्वार घेरे रामा हिम कोतवालवा से,

तीन द्वार सिन्धु घहरावे रे बटोहिया।

×       ×        ×

गंगा रे जमुनवां के झगमग पनिया से,

सरजू झमकि लहरावे रे बटोहिया।

ब्रह्मपुत्र पंचनद घहरत निसिदिन,

सोनभद्र मीठे स्वर गावे रे बटोहिया।

एतने ना, एह गीत में बुद्ध, विक्रमादित्य, शिवाजी, व्यास, वाल्मीकि, गौतम,  कपिल, रामानुज, रामानंद, विद्यापति, कालिदास, कबीर, सूर, तुलसी, जयदेव के इयाद कराके, एह धरती के प्रति भक्ति-भाव जगा के, एगो प्रेम पैदा करे के सफल प्रयास बाटे।

जब महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन शुरु भइल, तब मनोरंजन बाबू ‘फिरंगिया’ के रचना कइलन। एकर तर्ज बटोहिया वाला बाटे बाकिर भाव-भूमि अलग राष्ट्रीयता के भाव इहाँ करुण रस के माध्यम से प्रकट भइल बाटे-

जहँवा थोड़े ही दिन पहिले ही होत रहे

 लाखोमन गल्ला ओ धान रे फिरंगिया

ऊहें आज हाय रामा, मथवा पर हाथ हरि

बिलखि के रोवेला किसान रे फिरंगिया।

आगे चल के एह कविता में जालियाँवाला बाग में भइल अत्याचार के मार्मिक वर्णन कवि एह प्रकार से करत बा-

भारते के छाती पर भारते के बचवन के

बहल रकतवा के धार रे फिरंगिया

छोटे-छोटे लाल सब बालक मदन सब

तड़पि-तड़पि देवे जान रे फिरंगिया।

फेर कवि आगे अंग्रेज शासकन के चेतावत बा-

चेति जाउ चेति जाउ भइया रे फिरंगिया

छेड़ि दे अधरम के पंथ रे फिरंगिया।

×           ×         × 

दुखिया के आह तोर देहिया के भरम करी

जरि भूनि होई जइबे छार रे फिरंगिया।

ई फिरंगिया गीत एतना प्रसिद्ध होखे लागल कि कवि का जेल मिलल आ कविता जपत हो गइल।

बाबू कुँवर सिंह के राष्ट्र-प्रेम के भावना आ ओकरा मर्यादा खातिर अंग्रेजन के लड़ाई पर केतना फुटकर रचना के प्रणयन त भइलहीं बाटे, कई एक प्रबंध काव्यन के रचना भइल बाटे। एह काव्यन में श्री हरेन्द्र देव नारायण आ पंडित चन्द्रशेखर मिश्र के महाकाव्य ‘कुँवर सिंह’ नाम से बहुत मशहूर भइल।

स्व. प्रसिद्ध नारायण सिंह जी के ‘बलिदानी बलिया’ (दूसर संस्करण-भोजपुरी वीर काव्य) में सन् 42 के राष्ट्रीय आन्दोलन में बलिया जिला के योगदान के बरनन आइल बाटे।

भारत के संगे चीन के एगो लड़ाई आ पाकिस्तान के सन् 65 आ 71 में लड़ाई पर आ राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत सैकड़न रचना सामने आइल बाड़ी स। एह में से त कुछ के बाद में संग्रहो प्रकाशित भइल, जइसे चीन के साथ लड़ाई पर आचार्य महेन्द्र शास्त्री के ‘धोखा’। रधुवंश नारायण सिंह जी के ‘भोजपुरी के ललकार’, त्रिलोकी नाथ उपाध्याय के ‘समय की पुकार ‘, लक्ष्मण पाठक प्रदीप  सम्पादित ‘जागरण के स्वर ‘, बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव के ‘वतन का तराना’, डा०मुक्तेश्वर तिवारी ‘बेसुध ‘(चतुरी चाचा) के ‘हिमालय ना झुकी कबहूँ ‘, मणीन्द्र भूषण त्रिपाठी ‘मधुर ‘के ‘बिगुल’, दूधनाथ शर्मा श्याम के ‘हिमगिरि के नेवता’, कृष्ण मुरारी शुक्ल गोरखपुरी के ‘बलिदान की बारी ‘ आ गणेश दत्त किरण के ‘बावनी’ अइसने संग्रह बा जवना में चीन के साथ लड़ाई के अवसर पर रचाइल रचनन के समावेश बा।

एह रचनन में गणेश दत्त किरण के ‘बावनी ‘ त बहुते प्रसिद्ध भइल। बानगी रूप में ‘बावनी’ के एगो कवित्त सोझा बाटे-

धई के कचरा, लथारबि हम पटकि-पटकि

बान्हब मुसुक दुनों बाहिन से चउर-चउर

छरपट छोड़ाई देबि, हुमच-हुमच ठउर-ठउर

हिन्द महासागर में चीन के दरोरबि जब

बाँची तब जान ना लुकाइला से दउर-दउर।

भोजपुरी के प्रतिभावान युवा कवि कुमार विरल के ‘वंदना भारती’ नामक रचना के कुछ  पाँति देखल जाय-

ऊँच बा तिरंगा धज झूम रहल आदमी

सुरखुरा रहल हिया, उतान भइल आदमी

हमार देश ह हमार ई रही

करोड़ हाथ आरती उतारते रही।

अइसन कतेक उदाहरण बा जे भोजपुरी में राष्ट्रीयत के प्रतीक बा। ई कहल जा सकत बा कि भोजपुरी में राष्ट्रीयता के भाव से भरल-पूरल कवितन के कमी नइखे। भोजपुरी कवि राष्ट्रीय संकट आ समस्या से मुँह नइखे मोड़ले।



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भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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