तिरबेनिया

तिरबेनिया

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Posted: October 12, 2021
Category: कहानी
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सूर्येन्दु मिश्र

तिरबेनी नाम रहे उनकर लेकिन गांव के लोग उनके तिबेनिया के नाम से ही जाने। तिरबेनी लरिकाईये से गाँव के बाकी लड़िकन से अलगे बुझात रहलें। कवनो काम होखे चाहे खेलकूद उनकर मुकाबिला उनकरी उमिर के लड़िका लो ना क पावे।

उनकर बाबू जी छबीला पांडे सरकारी महकमा में एगो अच्छा पद पर काम करत रहलें। वो घरी अंग्रेजन के राज रहे आ उहे देश के मालिक रहलें कुल। पांडे जी के इच्छा रहे कि उनकर कुल के चिराग खूब पढ़-लिख के कौनो ऊंच ओहदा पर नौकरी करें...लेकिन पूत के पांव पलनवे में नूं लउक जाला।

तिरबेनी जब कुछ बड़ भइले त कबो कबो  गोरून के चरवाही में भी जाये लगलें। एक दिन जब सब चरवाहा लोग बांधी पर बइठ के बतियावत रहले त तिरबेनी भी उनकर बात सुनें लगलें। एक जाना बुजुर्ग कहल शुरू कइलें...

" देख लोग ई अंगरेजन के हुशियारी सरवा अइलें सन बयपारी बन के घिघिआत आ आजु उहे ए देश के राजा बनिके पूरा देश के अपनी अंगूरी पर नचावत बाड़े सन।"

दूसरा जाने बोललन- "ठीक कहs तारs भाई, अब त ई हाल बा कि जे ई गोरन के खिलाफ बोलता ओकरा के उ तुरंते फांसी पर लटकवा दे तारेसन। पंजाब में त उ क्रांतिकारी लोग के तोपे के मुंह में बान्हि के उड़ा दिहलन ह सन।"

इन्हन के एतना अत्याचार बढ़ गइल बा कि ढाका में अपने देश के कारीगरन के हाथे कटवा देलेसन। ओ लोगन के हाथ से बनल मलमल के पूरा थान एगो अंगुठी से निकल जात रहे ।

तिरबेनी चरवाहा लोगन के बात बड़ी ध्यान से सुनत रहलें। उनका से ना रोकाइल तब पूछ लिहलें ....

"काका, ई कारीगर लोग के हाथ काहे कटवा दिहले? उनके त बहुत खून निकलल होई ?

दुखी काका -"आरे तोरा ना बुझाई रे बबुआ.... उ कारिगरन के रहते अंगरेजी कंपनी के माल बिकईबे ना करित।"

तिबेननी कहलन-" एम्मे कौन बात रहे, सब लोग मिलके कंपनी के माल ख़रीदबे ना करी त कंपनी खुदे बन्द हो जायी।"

दुखी काका - उ त ठीक बा लेकिन अपनिये देश के लोग जब गद्दार बा त का करबा ?"

"काका एकर मतलब हमरा ना बुझाईल"

दुखी काका- " तहरा ना नू बुझाई, तू त बड़ा बाप के बेटा हउवs, तहार बाप अंग्रेजन के नौकरी करेलन। उ अंग्रेजन के खिलाफ कबो जा सकेलेन ? एहितरे सबके आपन आपन सवारथ बा। कुछ लोग विरोध में जाला त बहुत लोग गोरन के तलुआ चाटे खातिर लाइनी में खाड़ रहेला।"

तिरबेनी के ई बात भीतर जा के समा गइल। दूसरे दिन जब उनकर बाप नौकरी पर जाये खातिर तैयार होत रहलन त उ उनसे पूछलें - "बाबूजी रउवा अंग्रेजन के गुलामी करेनी का ?

उनकर बाबूजी अपनी बेटा के मुंह से ई बात सुनके भौचक्का हो गइले ।

पूछे लगलें- "तोहरा से ई के कहल ह, हम नौकरी करेनी त तनख्वाह पावेनी, नौकरी गुलामी थोड़े ना होला।"

.... लेकिन तिरबेनी उनके ए बात से संतुष्ट ना भइले।

कहे लगनें...." लेकिन बाबू जी जवन अंगरेज अपने देश के लोग के हाथ कटवा दे तारें सन, तोपे से उड़ा दे तारे सन आ भारतमाता के नाम लिहला पर फांसी पर चढ़ा दे तारे सन उनहन के नौकरी त देश के साथे गद्दारी कहल जाई।"

तिरबेनी के मुंह से अइसन बात सुन के  बाबूजी कुछ बोलले बिना घर से बाहर निकल गइलें  बाकी एतना त उनके नीमन से बुझा गइल रहे कि त्रिवेणी के मन में गोरन के खिलाफ विद्रोह के चिंगारी सुलुग रहल बा।

समय के साथ तिरबेनी जब कुछ और बड़ा हो गइलें तब उनकर दाखिला स्कूल में हो गइल। तिरबेनी तेज दिमाग के रहले, उनकर पढाई अपनें क्लास में आगे आगे चले।  धीरे-धीरे जब उ हाईस्कूल में पहुंच गइले....ओहि समय उनके हाथ कुछ अइसन किताब हाथे लागल जेकरा के पढला के बाद उनके मन में अंग्रेजन के खिलाफ विद्रोह के चिंगारी धधके लागल। अब त उनकर मन पढ़ाइयो से उचाट हो गइल रहे। त्रिवेणी के बात-बेवहार में परिवर्तन देख के उनकर बाबूजी चिंतित रहे लगलें। कवनो बाप अपनी बेटा के खुशहाल जीवन देखल चाहेला ..एकरा खातिर उ समाज के नियम-नेत के भी ताक पर रख देला। तिरबेनी के बाबूजी उनके कई बार ई समझावे के कोशिश कइले कि अंग्रेजन के खिलाफ बगावत सोचल शेर के मुंह में हाथ डलला अस बा लेकिन तिरबेनी के ऊपर उनकी बात के कवनो असर ना भइल।

एहि बीचे, एक दिन अपने स्कूल में एगो समारोह में तिरबेनी के कुछ बोले के मौका मिल गइल।  जब उ बोले खातिर खड़ा भइलन त आपन संबोधन वंदे मातरम से शुरू कइलन। जब उ ब्रिटिश हुकूमत के बघिया उघारल शुरू कइलन त वो समारोह में आइल अंग्रेज अधिकारी बौखला गइल आ मंच से उतरे के संदेशा भेजववलस लेकिन उ आपन बात कहिए  के उतरलन। उनके आवाज में इतना जोश रहे कि उनकर कुछ सहपाठी लोग भी बीच-बीच मे उनके वंदे मातरम आ भारत माता की जय के नारा खूब लगावल लो।

बाद में अफसर के आदेश पर तिरबेनी  के साथे उनके पांच गो और साथिन के नारा लगावे खातिर स्कूल से निकाल दिहल गइल।

तिरबेनी के स्कूल निकलला के खबर जब उनके बाबूजी के मिलल त उ आपन माथा पीटे लगलें। उनके समझावे के एगो कोशिश फेरु कइलें लेकिन तिरबेनी अपनी इरादा से टस से मस ना भइलन।

पढ़ाई छुटला के बाद तिरबेनी पर देशभक्ति के नशा अउर गहिरा गइल। अब उ धीरे-धीरे क्रांतिकारिन के मीटिंग में भी जाए लगले। उनकर जोशीला भाषण आ लगन देखि के उनका के एगो गुट के मुखिया बना दिहल गइल।

एही बीचे तिरबेनी के बाप ओ समय फइलल प्लेग के महामारी में स्वर्गवासी हो गइले। ए प्लेग के महामारी आ साथे पड़ल अकाल दुनों में अंग्रेजन आ जमीनदारन के करिया चेहरा उजागर हो गइल रहे।

धीरे-धीरे समय के साथे तिरबेनी के साथ कुछ नामी विद्रोही लोगन से हो गइल रहे। उनके गुट के लोग हथियार खरीदे खातिर आ पार्टी के काम की खातिर छोट-मोट डकैती भी डाले लागल रहे।

उनकी गुट के ई नियम रहे कि धनी आ जमींदार लोग देशद्रोही बनके जवन धन दौलत बटोर के रखता, ओईमे गरीब के भी हिस्सा होखे के चाहीं।

अब, एक के बाद एक डकैती लूट में उनकर नाम आवे लागल। पुलिस कई बेर गांव में छापा मरलस लेकिन तिरबेनी के परछाइयों ना पवलस। तिरबेनी के ना पकड़इला के कारण इहो रहे कि उ कबो अपनी इलाका में लूटमार ना करस। दूसरे, गरीबन के बेटी के कन्यादान उ खुद आ के करें। उनकरी पैसा से उनकर महतारी कबो अपनी खातिर कुछ ना लिहली बहुत गरीबी में आपन गुजर बसर करस।

एहि बीच में उनके बारे मे पुलिस के पक्का सूचना मिलल कि उनकी गुट के लोग के मीटिंग एगो उखि के खेत मे चलता। एगो तेज तर्रार अफसर मय फोर्स लेके उ खेत के घेर लिहलस आ तिरबेनी के गिरफ्तार क लिहलस। तिरबेनी के गिरफ्तारी से जवार के लोग बहुत दुखी रहे लेकिन अंग्रेजन की शक्ति के आगे सब लोग डेरइबो करे।

जब एगो अफसर उनसे पूछलस कि डकैती के समान कहाँ छुपवले बाड़s? त उ अपने पिछुआरे के खेत बता दिहलन। पुलिस मय फोर्स वो खेत के कई बेर खोदववलस बाकी उहवाँ से एगो फुटल कौड़ी भी ना मिलल।

जब उ अंगरेज अफसर खिसिया के  फेर पूछलसि--  "जब कुछ खेते में ना रहे त बेकार में खेते के खोदाई काहे करववल ह।"

"सरकार, हमार दू गो महतारी बाड़ी, एगो जवने ख़ातिर हमरा के फांसी होखे जाता। दूसर, जवन हमके जनम देले बिया। हमरी ना रहले के बाद उ ओहि खेत में कुछ बो-उपराजके खा सकी। एहि से हम अइसन कहनीं ह। हम जवन धन लुटले बानी ओके देश आ मजलूम लोग के सेवा में खर्च क देले बानी।"

उ अफसर के लगे अब कौनो सवाल ना रहे आ जबाब लोर बनके उनकी आंख से  टपके लागल।

आज भी जवार के लोग तिरबेनिया के बुध्दिमानी आ देशप्रेम के याद करेला।

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