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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1160

गजब के अंक भइल बा इहो..

नजरे नजर में सउँसे पत्रिका हहुआत देख गइनीं। ‘भारतीय स्वाभिमान के प्रतीक से भी कष्ट’ सभके पढ़े जोग आलेख भइल बा।

फेर, डॉ० अनिल कुमार प्रसाद, डॉ० सुनील कुमार पाठक, डॉ० ब्रजभूषण मिश्र के आलेखन प नजर गइल, जवन विश्व साहित्य से लेले हिन्दी-भोजपुरी साहित्य में माई-बाबूजी के पात्र प विवेचना क रहल बाड़न स। ढेर कवितओ के देख लिहनीं। चाहे मनोज जी राउर रचना होखsस, भा अशोक द्विवेदी के भा भगवती प्र० द्विवेदी आदी के पद्य रचना बाड़ी स, मन मोह ले रहल बाड़ी स। ढेर कविअन के रचना के देखलहूँ प अबहीं पढ़े के बा।

गजब के दमगर बाकिर भावमय अंक इहो आइल बा। बधाई बा रउआ आ राउर टीम के।

जय-जय।। शुभ-शुभ

सौरभ पाण्डेय, वरिष्ठ साहित्यकार, प्रयागराज  

ऐतिहासिक काम हो रहल बा

बहुत-बहुत बधाई मनोज जी। ऐतिहासिक काम सरस्वती माई करवा रहल बाड़ी रउआ से।

सुनील कुमार पाठक, वरिष्ठ साहित्यकार, पटना

 

कवनो भाषा के पत्रिका के बराबरी में तनि के खड़ा बा भोजपुरी जंक्शन

“भोजपुरी जंक्शन”, के पद्य आ गद्य दुनू विशेषांक में माई-बाबूजी पर जवन सामग्री बा ऊ कवनो भाषा के कवनो पत्रिकन से सब दिसाईं बराबरी में तनि के खड़ा बा। पत्रिका के कलेवर मन मोहि लेता।

जवना समय में भोजपुरी भाषा के लेखक आ पाठकवर्ग दुनू के अकाल होखे ओ समय भोजपुरी में अइसन स्तरीय पत्रिका जवना के पृष्ठ संख्या 200 (गद्य आ पद्य भाग मिला के) होखे, पाठकवर्ग का सोझा ले आइल बहुत मेहनत के काम बा। अइसन पत्रिका खातिर ऊर्जा, जज्बा, समरपन, धीरज आ तन मन से भोजपुरी प्रेम में रत्तियो भर कमी होई त अइसन कालजयी काम नइखे हो सकत।

पत्रिका पढ़ल सुरू करते मन साहित्यगंगा में गोता लगावे लागता। जेठ की तपती दुपहरी में सीतल फुहार जइसन तनी अउरी भींजीं, तनी अउरी भींजीं जइसन आनन्द लेत केतना एकसुरुकिए पढ़ि लिहल जाता, अन्दाज नइखे लागत। रचनन के स्तर, कथ्य, शिल्प आ भाव अइसन बा कि कहीं रत्तियो भर बोरियत महसूस नइखे होत। तब हमके खुला दिल से कहे के मन करता कि भोजपुरी लिखाउ आ पत्रिका निकले त अइसने।

ए सबका पीछे पत्रिका के यशस्वी सम्पादक “श्री मनोज भावुक” जी के मेहनत, समरपन आ भोजपुरी प्रेम साफ-साफ झलकता। ई भावुक जी के भोजपुरी भाषी हिन्दी साहित्य के नामचीन लेखक सब से सम्पर्क आ सम्बंध ह जवन ओ सब से भोजपुरी में उत्तमोत्तम साहित्य रचवा लिहले बा आ आजु भोजपुरी प्रेमी लोग का सोझा बा। भावुक जी “भोजपुरी जंक्शन” का माध्यम से भोजपुरी साहित्य खातिर जेतना काम करि रहल बानीं ऊ मिसाल बनत जाता। भावुक जी, रउरा से हमनीं का सदईं अइसने पत्रिका के आसा बा आ ओ में जहाँ हमनियों के जरूरत परी, पीछे ना रहबि जा।

भोजपुरी साहित्य के आँचर उत्तमोत्तम साहित्यिक हरदी, अच्छति आ दूब से भरल रहि के मंगल मनावत रहे।

संगीत सुभाष, प्रधान सम्पादक- ‘सिरिजन’, भोजपुरी तिमाही ई पत्रिका

 


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Hum BhojpuriaSeptember 20, 20214min2080

संपादकन खातिर मिसाल पेश कइले बानीं

सचहूं एगो यादगार अंक निकालिके रउआ भोजपुरी पत्रिकन के संपादकन खातिर मिसाल पेश कइले बानीं। अबहीं काल्हे मोतियाबिंद के आपरेशन करवले बानी,एसे पढ़ल-लिखल अबहीं बंद बा।

भगवती प्रसाद द्विवेदी, वरिष्ठ साहित्यकार, पटना

 

भोजपुरिये में ना; हिन्दियो में माई-बाबूजी पs ई पहिलका अंक बा

‘भोजपुरी-जंक्शन’ के नयका अंक पढ़नी। ई पत्र दिनानुदिन भोजपुरी के श्रीवृद्धि में आगे बढ़ रहल बा। ई जून अंक ‘माई-बाबूजी’ विशेषांक विशिष्ट आ संग्रहणीय बा। शायद; भोजपुरी में माई-बाबूजी पs एह तरह के ई पहिलका अंक बा। भोजपुरिये में ना; हिन्दियो में। तीन वर्गन में- हमार बाबूजी, हमार माई आ हमार माई-बाबूजी; बाँटिके नीमन-नीमन, धराऊँ-धराऊँ सामग्री जुटावल गइल बा। सम्पादकीयो कमाल के बा।

कहल गइल बा-

‘यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।

न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं जन्मशतैरपि’।।

 

अर्थात्; बाल-बच्चन के जन्म से लेके पालन-पोषण तक माता-पिता जवन कष्ट सहेलें, ओकर भरपाई हमनीका सइ-सइ जनम लेके भी उतार ना सकींला। रचनाधर्मिता के ई एगो पुण्य कर्म भा ज्ञानयज्ञ हs जे रचनाकारन के ओर से माता-पिता खातिर कइल गइल बा।

एह आयोजन खातिर भोजपुरी-जंक्शन परिवार धन्यवाद के पात्र बा।

मार्कण्डेय शारदेय, वरिष्ठ साहित्यकार, पटना

 

कवनो पत्रिका के माई-बाबूजी पर केंद्रित पहिला विशेषांक

भावुक जी,

‘भोजपुरी जंक्शन’ के 01- 30 जून, 2021 वाला अंक डाउन लोड करके खोलते मन प्रसन्न हो गइल। माई-बाबूजी के संस्मरण वाला अंक आ उहो सै पृष्ठन के। हमरा जानते ‘भोजपुरी जंक्शन’  ऊ पहिला पत्रिका बा, जवन माई-बाबूजी पर केंद्रित विशेषांक निकलले बा। फुटकर ढंग से कविता, कहानी, लघुकथा,संस्मरण त कबहुँ-कभार हिंदी-भोजपुरी के पत्र पत्रिकन में मिल जाला, बाकिर गोटगर ढंग से एह विषय पर लिखवावे आ सामग्री प्रस्तुत करे के श्रेय रउरा मिलत बा। राउर संपादन आ संपादकीय सोच के हमार साधुवाद। हम कामना करत बानी कि पत्रिका अइसहीं आपन पहिचान बनवले राखी।

डॉ. ब्रज भूषण मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार, मुजफ्फरपुर

 

 

कपिल मामा के याद आ गइलन

बेजोड़ अंक बा। स्तरीय रचना के साथे पत्रिका के कलेवर बहुते  मनोरम आ मनमोहक बा। बहुत- बहुत बधाई मनोज जी। राउर सोच, लगन आ मेहनत देख के आज कपिल मामा ( भोजपुरी साहित्य के प्राण आचार्य पाण्डेय कपिल) याद आ गइलन।

डॉ. रंजन विकास, वरिष्ठ साहित्यकार, पटना

 

 

बेजोड़ अंक बा

एह अंक में संपादक के परिकल्पना आ प्रजेंटेशन समेत सब कुछ बेजोड़ बा। बधाई मनोज जी!

ओम प्रकाश अश्क, वरिष्ठ पत्रकार, पटना

 

 

अस्सी बरिस के उमिर में मोबाइल पर पढ़नी माईबाबूजी विशेषांक

हम भोजपुरी जंक्शन के सगरी अंक पढ़ले बानी। एक से बढ़के एक। लेकिन माई-बाबूजी विशेषांक अइसन अंक बा जवन पढ़त-पढ़त हम अपना माई-बाबूजी के संगे फेर से आपन लरिकाई जी लेनी। सब भूलल बिसरल लोग फेर-फेर याद आवे लागल लोग आ आंख में लोर लिया देलस लोग। केहू के लेख गांव-जवार घुमा देलस त केहू के लेख हँसा देलस। भोजपुरी में एतना बढ़िया काम होत देख के जिऊ जुड़ा गइल हमार। अस्सी बरिस के उमिर में मोबाइल में पढ़ला में तनी मुश्किल होला, तब्बो हम सगरी लेख कई-कई बेर पढ़ चुकनी। भावुक जी से इहे कहे के बा कि आजु के समय में अइसन पत्रिका ऊहो भोजपुरी में निकालल, एह ढंग के उत्कृष्ट सामग्री के साथ केतना मुश्किल बा एकर अंदाजा बा हमके। एही से काली माई से दुनो हाथ जोड़ के इहे प्रार्थना बा कि ई पत्रिका असहीं निकलत रहे आ भोजपुरी के इतिहास में आपन नाम दर्ज करावे।

रमा सिंह, कोलकाता  

 

अनमोल विशेषांक

मनोज जी देखनी अपनो लेखवा पढ़ के अतना आनन्द आइल कि का कहीं। एह तरीके क अनूठा प्रयास देखले में आनन्द बुझाता। राउर परयास से सबका माई बाबू सबकर फोटो देख के जइसे मन भरि आइल। मनोज जी मय टीम रउआ के आत्मीय बधाई हेइ अनमोल विशेषांक खातिर।

डॉ. मंजरी पांडेय, वरिष्ठ साहित्यकार, वाराणसी

 

ऐतिहासिक अंक

बहुत सुंदर अंक बा आ बहुतै बढ़िया सामग्री के साथ परोसल गयल बा। सबके पढ़ला के बाद एक बात जवन सब लेख में मिलल ऊ ई कि दुनिया के कवनो कोना में देखल जाय त माई बाबूजी के नेह छोह सब एके लेखा बा। एही से कहल जाला कि दुनिया में हर रिश्ता खास होला लेकिन माई बाबूजी के बराबर केहू ना हो सकेला। सबकर स्मृति अ लेख बहुत सराहनीय अ करेजा के छुवै वाला बा। सब रचनाकार लोगन के हार्दिक बधाई। भाई मनोज भावुक जी के अथक प्रयास अ लगन के नतीजा बा कि आज ई ऐतिहासिक अंक हमहन के सामने बा। बहुत-बहुत आभार भोजपुरी जंक्शन के पूरी टीम क जेकर मेहनत रंग ले आइल।

सरोज त्यागी, कवयित्री, गाजियाबाद

 

 

पानी पर लकीर त तू खींच दिहलs भाई मनोज जी!

हिन्दी-भोजपुरी के मजिगर, मंजल आ उत्साही साहित्यकार-सम्पादक श्री मनोज भावुक के सतत कुछ नया सोचे-समझे आ सिरिजे के अकूत क्षमता आ योग्यता के नायाब नमूना बा- ‘भोजपुरी जंक्शन’ के हाल में छपल माई-बाबूजी विशेषांक।

एह अंक के ‘सम्पादकीय’ में मनोज जी ठीके कहलें बाड़ें कि जेकर सृष्टि हमनीं खुदे बानीं ओकरा व्यक्तित्व के मूल्यांकन अपना शब्दन के जरिए भला कइसे संभव बा? बिल्कुल संभव नइखे आ सही कहीं त मूल्यांकन-विवेचन संस्मरण विधा के उद्देश्यो ना होला। संस्मरण में भावाभिव्यंजना, मार्मिकता, रुचिरता, तथ्यन के सच्चाई आ साफगोई बहुत जरुरी होला। साथही चरितनायक के प्रति लेखक के एगो खास तरे के निस्संगतो आवश्यक गुण ह संस्मरण विधा के, जवना के बदौलत ऊ वर्ण्य व्यक्तित्व सार्वजनीन असीम श्रद्धा भा आत्मीयता के अधिकारी बन जाला। टी.एस.एलियट एकरे के ‘निर्वैयक्तिकता के सिद्धांत’ कहके निरूपित कइले बाड़ें आ उत्कृष्ट सर्जक खातिर बहुत जरूरी मनले बाड़ें। एह वैचारिक निष्कर्ष पर एह अंक के परखला के बाद हमरा ई महसूस हो रहल बा कि अधिकतर लेखक अपना माई-बाबूजी पर लेखनी चलावे के क्रम में ना त कवनो अतिरंजना के फेरा में पड़ल बाड़ें ना बाबूजी-माई के बहाने अपने व्यक्तित्व के पनपावे-पसारे बदे आपन दबल-छिपल मनोरथ पूरा करत दिखत बाड़ें। भोजपुरी लेखक के ई प्रौढ़ता रेखांकित करे योग्य बा। माई-बाबूजी के व्यक्तित्व के मूल्यांकन कहल त तनिका बढ़िया ना होई बाकिर सांच पूछीं त ओह लोग के प्रेरणादायी रूप, महत्व, विचारन के प्रासंगिकता आदि पर जेतना बढ़िया उनकर समझदार संतान सोच सकत बिया ओइसन दोसरा से संभव नइखे। मतलब कि अपना माता-पिता पर ओकर संतति जेतना बढ़िया से कुछ सोच-समझ के रच-परोस सकत बिया अउसन दोसरा से ना हो पाई।

कवि भा कवनों रचनाकार के बारे में त इहे नू कहल गइल बा कि ऊ ब्रह्मा के समान होला-“कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभू।” ऊ आपन संसार अपना रुचि से रच लेला-“यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते।” फेर ऊ अपना माई-बाबूजी के छवि गढ़े में फेल हो जाई-ई कहाँ संभव बा।”आत्मा वै जायते पुत्रः” जे जेकर सृष्टि बा ओकर भाव-अभाव-स्वभाव-प्रभाव उहे नू सबसे बढ़िया तरे जानीं। हमनीं सभे मानव भगवान के सिरिजना बानीं त भगवत्ता के सर्वाधिक महत्व त हमनिये नू जानब।

एह विशेषांक के एक-एक रचना हमरा ऊपर के विचारन के पोख्ता करत बाड़ी सं। कैलाश गौतम जी पर सरोज त्यागी जी के संस्मरण, शारदा बाबू पर रंजन जी के आलेख, मनोज जी के अपना माई पर लिखल आलेख ‘ऊ कोरा काहे नइखे भुलात’ आ साथही सौरभ पांडेय, भालचंद त्रिपाठी,भगवती प्रसाद द्विवेदी, उमेश चतुर्वेदी, कौशल मोहब्बतपुरी,मंजरी पांडेय, आदित्य अंशु, राजेश मांझी आदि के रचनन के पढ़ि के मन अघा जात बा। सगरी रचना एक से बढ़िके एक बाटे।

तब के दुनिया आ अब के दुनिया के बीच का फरक हो गइल बा, जवन बदलाव बा ऊ सही दिशा में हो रहल बा कि कुछ-कुछ अरजत आ कुछ-कुछ बरजत चले के जरुरत बा, काल्ह आ आज में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक हर तरे के संबंध-सेतु कइसे बनल रही- ई सब दिसाईं बहुत कुछ बात मन-माथा में उमड़े-घुमड़े आ नाचे लागत बा।

सारतः ई अंक आ एकरा बाद आवे वाला एह विषय पर एकाग्र काव्य भाग- एह दूनू के ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक सार्वकालिक-सार्वभाषिक महत्व बनल रही।

भोजपुरी गद्य लिखे के दिसाईं अब भोजपुरी रचनाकार खूब सजग आ प्रभावशाली हो गइल बाड़ें, इहो बात एह अंक से जाहिर हो रहल बा। एह अंक खातिर युवा आ स्थापित सब लेखक खूब मिजाज बनाके,मन रमाके लिखले बा लोग- ई देख के बड़ी खुशी हो रहल बा। मनोज जी के काव्य में माई विषय पर लिखल विष्णुदेव जी के लेखो बढ़िया उतरल बा। बेरि-बेरि बधाई भाई मनोज जी एह अनूठा सारस्वत आयोजन खातिर। पानी पर लकीर खींचे में त बेशक अपने पूरा तरे कामयाब हो गइल बानीं।

बहुत शानदार अंक बा भाई। रउरा परिकल्पना के जोड़ नइखे।

सुनील कुमार पाठक, वरिष्ठ साहित्यकार, पटना

 

भावना के बाढ़ि लेके सोझा आइल बा भोजपुरी जंक्शन

माई-बाबूजी प एगो विशद अंक हाथे बा। ’भोजपुरी जंक्शन’ के माध्यम से मनोज भाई जवन ई कोरसिस कइले बानीं, आवे वाला समै एह कोरसिस प पन्नन लीखी आ लिखवाई। माई त माई हऽ। कवनो साहित्य में माई के लेके कथ्य आ रचना के अक्सरहाँ कमी ना भइल करे। गोर्की के ’मदर’ भलहीं उपन्यास हऽ, बाकिर कथावस्तु के अधार एगो माइये बाड़ी। हिन्दी-साहित्य में उग्र जी के लिखल एगो बहुत सशक्त कहानी ’उसकी माँ’ हमरा कबो भोर ना परे। बाकिर ईहो साँच बा जे ई सभ माई लोग अपना लेखकन के कल्पना से कथा-कहानी के रूप में जियतार बाड़ी लोग। बाकिर अबकी भोजपुरी जंक्शन में कथा आ कहानी के माध्यम से ना, बलुक आपन माई आ आपन बाबूजी प सोझ लिखे के निर्देश भइल। बाबूजी प अभिधात्मक रूप से लिखल, उहो ओह बेटा-बेटी के द्वारा जे अपना जीवन के एगो बड़हन भाग अपना बाबूजी के अनुशासन के धमक से कढ़ात महसूस कइले बा, सहज ना रहे। अइसन कोरसिस अमूमन कवनो लेखक तबले ना करे, जबले ऊ आपन कथा, मने आत्मकथा, के तैयारी नत करत होखो। बाकिर भोजपुरी जंक्शन के यशस्वी संपादक भाई मनोज भावुक अइसन सबका से करवा लेनी।

भोजपुरिया समाज आजु तनिका धन के छँवक पावते फफात बुझा रहल बा, बाकिर अछछ गरीबी भोगत आवत एह समाज के आम जीवन कबो सोझ, सीधा आ निकहा साधारन भइल करे। आ, उच्च आध्यात्मिकता भाव में सनाइल आपन दिनचर्या के निबाह करत रहे। सादा जीवन, उच्च बिचार के सूत के गाँठे बन्हले ओह लोगन के बर्ताव में नरमई त साफा लउके, बाकिर आन-बान-मान आ शान से ई समाज कबो समझौता ना करे। ’जान जाय त जाय, आन-मान ना जाय’ के भाव मन में तारी रहल करे। अकसरहाँ अस्मरनकर्ता-लेखकन के बाबूजी-माई ओही पुरनका भोजपुरिया समाज के नुमांइदगी करत सोझबक लोग बुझइले। ढेर बाबूजी-माई लोग आजु भा त अपना वार्धक्य में जी रहल बाड़े, भा पूर्वज-पितर हो के परिवार के असीस रहल बाड़े।

एह से, अबकी पत्रिका के अंक कसकत भावना के ज्वार आ उपटत आह के भाटा प लेखकन आ पाठकन के चढ़ा के आस्ते-आस्ते हलरावे के माहौल मुहैया करवले बा। कहे के नइखे, जे माई के दुलार आ भावना प भोजपुरी साहित्य में ढेर सामग्री भेंटा जाई। बाकिर, अपना बाबूजी से जुड़ल भाव प, भा उनका जीवन से जुडल कवनो इयादि, भा प्रसंग प लिखे के बात त बाद के चीझु हऽ, बाबूजी लोगन प कथा-कहानी भा कविता-गीत तक ले साहित्य में, बिसेस क के भोजपुरी साहित्य में, रचना रूप में उपलब्ध नइखे। ओह हिसाब से भोजपुरी जंक्शन के अबकी के अंक भावना के बाढ़ि लेके सोझा आइल बा।

भगवान-भगवती के हमनी में केहू नइखे देखले। बाकिर अपना शरीर के जनक के मरजादा गहिराहे भाव से बूझल जाव त, भगवान के संसार आ आपन जिनिगी के कार-बार के वाहक दूनो लोगन के सहजही सरधा से नमन करत महसूस कइल जा सकेला। जबकि एही लगले दोसर सोच माई-बाबूजी के नितांत मानव सुलभ भाव के सान प राखत परखे के कोरसिस करत लउकेले। संपादकीय में मनोज जी कहतो बाड़े – ’ई साँच बा कि उ लोग भगवान ना ह। त अगर ओह लोग से कवन भूल हो जाय त दिल बड़ा क के भुला जाये के चाहीं..’ अइसना दूनो तरहा के भावन के भँवर में बूडत-उतरात एह अंक के अक्सरहाँ हर लेखक गुजरत बुझाइल बा।

ई बतिया साँच त बड़ले बिया, जे हाँह खा ले जवन बाबूजी के ताड़त आँखि के सपाट सवालन से बाँचल जवन बेटा-बेटी के मोस्किल भइल करे, ओही बाबूजी के जियतार वजूद के एगो तस्वीर बनते ना बनत, खुद आपने वजूद खोखर फेड़ अस निरीह बुझाये लागल बा। एह ठूँठ भइल मन से करीब हर लेखक के ओह शख्शियत प लिखल अपना करेजा प छेनी खोभात, आ कपार प बर्मा से दरात महसूस भइल होखी।

पत्रिका के एह अंक में साहित्य के नजरिये से सहेजे जोग कवनो अस्मरन बड़ुये त, ऊ कैलाशजी गौतम प उनका पुत्री सरोज बहिनी के आलेख बा। कैलाश जी हिन्दी-भोजपुरी के आधुनिक साहित्य के केन्द्र प के नाँव हवे। अपना बाबूजी प बोलत मनोज भावुक जी कहत बानीं- नोकरी लागते लोग के लागेला कि जिनगी सेफ हो गइल बाकिर इहो ओतने साँच बा कि नोकरी करे वाला आदमी अपना जिनगी के बहुत संभावना के मार के बइठ जाला। एह भाव के गहिराई बुझे के जरूरत बा। मनोज भाई के कलम में रस बा, भाव बा। बलुक इहे रस, इहे भाव, इहे सरधा सभन के कलम से छलकहीं के रहे। भाव, रस आ सरधा के एकसार उछाह अनिता सिंह जी, आशा सिंह जी, अन्विति सिंह जी, उमेश चतुर्वेदी जी, डॉ आदित्य अंशु जी, राजेश्वर सिंह जी आ कनक किशोर जी, विनय बिहारी सिंह जी, सुनील कुमार पाठक जी, कृष्ण कुमार जी, बद्रीनाथ वर्मा जी, तारकेश्वर राय ’तारक’ जी जइसन ढेर भावुक आ हिरदै में सरधा राखत बेटा-बेटी लोगन के कलम से छलकल बा। हमार मूल मकसद लेखक लोगन के नाँव जतावल भर नइखे, बलुक जवन अस्मरनन के हम एह हफ्ता में पढ़ि सकल बानीं। छोटहीं में कौ-एक कृतग्य बेटा-बेटी लोग आपन-आपन अस्मरन लेके आइल बा। हमहूँ अपना पापा प सोचत-बिचारत आपन बेर-बेर ओदात आँखि सङे कलम चलवले बानीं। एह लिखल्का के बलुक पापा पढ़ सकिते। बाकिर, अपना माई के इयाद पारत भगवती प्रसाद द्विवेदी जी जवना भाव से अपना बड़की माई के चर्चा कइले बानीं, ऊ बेर-बेर लोरा देवे के तागद राखऽता। सङहीं, भोजपुरिया समाज में बाल-विधवा के लेके जवन ’आहि’ उपटि के शाब्दिक भइल बा, ऊ गागरि में सागर तरहा सोझा आइल बा। एही लगले एह अंक में साक्षात्कार के विधान में जवन बतकही सोझा ले आवल गइल बा, ओह दूनों साक्षात्कारन के तासीर दू तौर के भलहीं लउक रहल बा, बाकिर निकहा मनलग्गू बा। पढ़ि जाये खातिर धेयान घींचऽता। एही लगले, विष्णुदेव तिवारी जी के आलेख-सह-आलोचना प अलगे से धेयान जाता – ’मनोज भावुक के कवितन में माई’। ’तोर बउरहवा रे माई’ के आलोक में एह आलेख के मर्म प निकहा से निगाह जा रहल बा।

एह बेर के सौ पन्ना से ढेर में फइलल एह अंक के भावमय गमक मन-प्रान सुवासित क रहल बा। बाकिर, सङ्हीं एह अंक के अकसरे आजकाल के घटना प नजर राखत आलेख ’ब्रिक्स के कमजोर करत चीन’ प चर्चा नत कइल जाव, त वरिष्ठ पत्रकार आ प्रधान संपादक रवीन्द्र किशोर सिन्हा जी के दत्त-चित्त उतजोग सङे न्याय भइल ना कहाई। भारत के हित के सोझा राखत लेखक ब्रिक्स में चीन के खुराफात प करेड़ कलम चलवले बानीं।  संपादक आ संपादन-मंडल के एह अंक प गहन कोरसिस कइला खातिर बहुत-बहुत धन्नवाद।

सौरभ पाण्डेय, छंदशास्त्री, प्रयागराज

माई-बाबूजी के प्रति समर्पित ए ढंग के विशेषांक शायद हीं  अउरी कौनो भाषा में निकलल होई

आज भोजपुरि भाषा के सेवा, प्रचार-प्रसार आ आम जन तक पहुंचावे में जौन भूमिका ” भोजपुरी जंक्शन ” के बा, बहुत कम संस्था  भा पत्र-पत्रिका उ स्तर तक पहुंच पवले बा।

 

एगो खास विषय के लेके ओपर एगो पूरा विशेषांक निकाल के पत्रिका के और भी विशिष्ट आ ज्ञानवर्धक बना देता आदरणीय सम्पादक मंडल।

 

अबकी बेर के ” माई-बाबूजी विशेषांक ” आपन माई-बाबूजी के प्रति श्रद्धा आ आदर समर्पित करे के अवसर देलस,एसे बढ़ के और का हो सकsता। भोजपुरी के जे भी सेवक लोग बा, जी भर के माई-बाबूजी के प्रति आपन श्रद्धा सुमन एक से एक आलेख आ संस्मरण के द्वारा प्रकट कइले बा लोग।

 

सम्पादक श्री मनोज भावुक के संपादकीय ” पानी प पानी लिखे के कोशिश ” ई विशेषांक के सगरी भाव के अपना में समेट लेले बा। माई-बाबूजी के संस्कार आ पुण्य कर्म के बाल-बच्चा पर केतना असर होला, ई एगो श्लोक के माध्यम से उहां के बहुत हीं सुंदर ढंग से बतवले बानी। सम्पादकीय सम्पूर्ण विशेषांक के दर्पण होला जे विशेषांक के विशिष्टता बतावेला आ ई माने में श्री भावुक जी के  सम्पादकीय शत प्रतिशत खरा उतरता।

 

ई विशेषांक में जे भी भोजपुरी के विद्वान आपन विचार आ भावना प्रकट कइले बा लोग, एक से एक बढ़कर बा। केकरा के बेसी कहल जाव आ केकरा के कम, ई बतावल बहुत कठिन बा।

 

जनकवि कैलाश गौतम जी के सुपुत्री सरोज त्यागी जी के शब्दांजली से  कविवर के बारे में बहुत अइसन बात के जानकारी भईल जे हमनी ना जानत रनी। ओम्हर के कविता आ गीत त हमनी के संमोहित करते रहल बा, आज सरोज जी के संस्मरण बहुत कुछ दे गइल।

 

सबसे त अच्छा लागल हमनी के प्रिय मनोज भावुक जी के बाबू जी, बड़का बाबूजी आ माई के बारे में पढ़ के। अब बुझाइल ह कि मनोज जी में एतना प्रतिभा, जुझारूपन आ नम्रता कहां से आइल बा।

हिंडाल्को के मजदूर नेता के झुझारू तेवर, बड़का बाबूजी के कला आ गायकी के संस्कार आ ना भुलाए वाला माई के कोरा के आशीर्वाद के वजह से हीं मनोज जी आज ई मुकाम हासिल कइले बानी। मनोज जी माई-बाबूजी के आशीर्वाद से आज आपन भाषा के सेवा कर रहल बानी, हमनी के सभी  भोजपुरिया के भी शुभकामना आ आशीर्वाद उहां के साथे बा। मनोज जी कबो अपना के अकेल जन बुझेब, देश आ देश के बाहर के सभी भोजपुरी भाषी के मंगलकामना रउआ साथे बा।

हमार बहुत हीं प्रिय गायक आ कलाकार आदरणीय  श्री राकेश श्रीवास्तव जी के उहां के माई प्रसिद्ध लोकगायिका आदरणीय मैनावती देवी श्रीवास्तव जी के बारे में लेख पढ़के मन श्रद्धा से भर गइल। माई के संस्कार आ कला राकेश जी माई के पेटे में से ले के आइल बानी। राकेश जी के सुनल एगो अलौकिक अहसास देवे ला। आदरणीय मैनावती जी त इतना उच्च कोटि के गायिका रनी कि उहां के बारे में कुछ कहल आ लिखल हमारा बुता आ औकात के बाहर के बात बा। हम त उहां के केवल श्रद्धापूर्वक नमन कर सकतानी ।

श्री तारकेश्वर राय ” तारक ” जी के  ” अम्मा रे अम्मा “, श्री अखिलेश्वर मिश्र जी के ” माई-बाबूजी के बात कान में गूंजत रहेला ” आ बाकी सब विद्वान लोग के शब्दांजली बहुत अच्छा लागल। सब कर जिक्र भले हीं हम नइखीं क पावत, बाकी हमार प्रणाम आ आदर सबका खातिर बा जे आपन माई- बाबूजी के एतना आदर आ सम्मान के साथ स्मरण कइल। सब विद्वान लेखक लोग के गोड लागsतानी।

एगो बात अउरी कहे से हम अपना के रोक नइखी पावत। श्री विष्णुदेव तिवारी जी एगो बहुत बड़ा खजाना के दरवाजा हमनी ला खोल देहनी। हम व्यक्तिगत रूप से ना जानत रनी ह कि मनोज भावुक जी अपना कवितन में माई के केतना इआद कइले बानी।

जे माई के सम्मान देला ओकर सगरो सम्मान होला। तिवारी जी के ई आलेख पढ़ के मनोज जी के प्रति हमार सम्मान अउरी बढ़ गइल।

अंत में हम एतने कहेब कि बहुत सा भारतीय भाषा के पत्र-पत्रिका देश में निकलेली स बाकी माई-बाबूजी के प्रति समर्पित ए ढंग के विशेषांक शायद हीं  अउरी कौनो भाषा में निकलल होई।

अजय कुमार पाण्डेय, सहायक, सिविल कोर्ट, बगहा, पश्चिमी चंपारण

 

माई-बाबूजी जइसन विषय पर विशेषांक निकाले खातिर बधाई

‘माई-बाबूजी विशेषांक’ पर कुछ लिखे के पहिले हम एह पत्रिका के संपादक मनोज भावुक जी के  एह बात खातिर बधाई देतानी कि माई-बाबूजी जइसन विषय पर रउरा विशेषांक निकाले के विचार कइनी।

संतान आ माई-बाबूजी के बीच एगो पूरा पीढ़ी के अन्तर होला। एह से दूनू पीढ़ी के बीच वैचारिक मतभेद चाहे वैचारिक संघर्ष संभव बा। काहे कि दूनू पीढ़ी के बीच सिर्फ विचार-विश्वास में ही अन्तर ना होला बल्कि कार्य-पद्धति में भी बहुत अन्तर होला। एह से मतभेद स्वाभाविक बा। बाकिर ओह अंतर के मर्म के सही अर्थ में आदमी महसूस करेला तब जब ऊ स्वयं माता-पिता बन जाला।  चाहे ओकरा अइसन आपन ह्रदय बना लेला।

हमरा कहे के मतलब ई ना भइल कि संसार में हर माई-बाप अपना संतान के प्रति समर्पित ही होला। बाकिर अपवाद से नियम भी त ना बनावल जा सके। अपना सुख के बिसरा के संतान के सुख में ही आपन सुख के ढूँढल का ह ?

एह अंक में कुल 36 गो रचना छपल बा। जवना में पहिला राजनीति से सम्बंधित बा त अंतिम समीक्षा ह। बाकी 34 रचना में 13 गो बाबूजी से सम्बंधित बा, 10 गो माई से त 11 गो दूनू आदमी से। अब एही से बुझा जाई कि हमनी के अपना माई-बाबूजी पर कुछ लिखे खातिर केतना उत्सुक बानी सन । एकर सबसे बड़का कारण ई बा कि हमनी के अपना माई-बाबूजी के चरणन में आपन भावांजलि अर्पित करेके चाहत रहनी ह सन बाकिर अवसर ना मिल पावत रहल ह। जब अवसर मिलल त आपन उद्गार प्रकट कर देहनी सन। बाकिर भावुक जी के शब्दन  में ‘पानी प पानी लिखे के कोशिश’ में का हमनी के अपना रचना से न्याय कर पइले बानी? जे हमरा के संस्कार आ आकार देहलस ओकरा के हम अपना शब्दन से आकार का देब?

हम ढाई दिन में सब रचना पढ़ गइनी ह। बाकिर रउआ साच मानी प्रायः हर रचना में भोजपुरी साहित्य के साथ भी वफादारी भइल बा। एक से एक रोचक कथा के साथ ही भोजपुरी के कइगो रूप जहाँ एक ओर देखे के मिलल उहईं दोसरा ओर भोजपुरी भाषा आ संस्कृति के संजोये के बेचैनी भी दिखल।

डॉ. ज्योत्स्ना प्रसाद, वरिष्ठ लेखिका, पटना

मुंहजबानी रट लिहल जाओ लइकन नियर !

जइसहीं माई बाबूजी विशेषांक पढ़ के उठनी हं, लिखे खातिर कलम उठ गइल ह। सोच रहल बानी कि भगवान त माईए बाबू के रुप में एह धरती पर हमनी के सङ्गे बाड़न, जेकरा एह बात के भान बा से पूज रहल बा, आ जेकरा नइखे बुझात सेकरा भाग के दोष बा।

संपादकीय एतना नीमन लागल ह कि मन करSता कि मुंहजबानी रट लिहल जाओ लइकन नियर! ‘पानी प पानी लिखे के कोशिश’ अइसन शानदार आ क्लासिक शीर्षक,कि हम खाली लिख के नइखीं बतावे सकत! रउरा के विशेष बधाई एह खातिर मनोज भैया!

माई बाबूजी प एक से बढ़के एक लेख पढ़ के अलगे संतोष के अनुभव कर रहल बानी। ब्रिक्स पर बेहतरीन आलेख पढ़ला के बाद, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के कवनो पुस्तक भोजपुरी में पढ़े के मन करSता। आदरणीय विष्णुदेव तिवारी जी के समीक्षा बहुते नीमन लागल ह। अन्त में इहे कहेम कि जून के ई संयुक्तांक सहेज के रखे जोग बा। भोजपुरी साहित्य के उपवन रउरा प्रयास के सुवास से सदा गमकत रहो!

डॉ. कादम्बिनी सिंह, कवयित्री, बलिया 

 

अब तक अइसन विशेषांक देखे के नइखे मिलल

भोजपुरी जंक्शन के टटका अंक में जंक्शन के वास्तविक स्वरूप के दर्शन होता।एक तरफ सामयिक, साहित्य आलेख वहीं दूसरा तरफ माई बाबूजी विशेषांक में संग्रहित संस्मरण के संकलन संपादक के दूर दृष्टि के परिचायक बा। भोजपुरी साहित्य में एह तरह के विशेषांक माई बाबूजी,जे जीवन के आधार होला,जे पग पग पर मार्गदर्शक होला आ जेकरा से ताउम्र उऋण ना हो पावे, पर अब तक अइसन विशेषांक देखे के नइखे मिलल। अनूठा आ अनुपम बा ई संकलन। भावुक जी के भोजपुरी साहित्य सेवा आ नया-नया प्रयोग सराहनीय आ अनुकरणीय बा। भोजपुरी जंक्शन परिवार के खूब खूब साधुवाद।

कनक किशोर, वरिष्ठ साहित्यकार, रांची

ऐतिहासिक प्रयास

भोजपुरी जंक्शन में ईश्वर तुल्य माई-बाबूजी के संदर्भ में संस्मरण पढिके हृदय भाव-विह्वल हो गइल। एकरा प्रति सब लेखकन के प्रणाम बा। भावुक जी के ऐतिहासिक प्रयास सबके भावुक बना देहलस। माई बाबू के पद-चिन्ह पर चलल इहे सन्तान के कर्तव्य बा।

अनुराधा कृष्ण रस्तोगी,  कुदरा, कैमूर, बिहार

 

जियरा अघा गइल

भोजपुरी जंक्शन के ‘माई-बाबूजी’ विशेषांक पढ़ के जियरा अघा गइल। बूढ़ पुरनिया के प्रति  आदर-सम्मान देहल हमनी के सनातनी परंपरा हऽ जवना के जिंदा रख के, बल्कि ई कहीं कि आगे बढ़ावे खातिर श्री मनोज सिंह भावुक जी के जतना प्रशंसा कइल जाए कम बा। जिनगी के कवनो भरोसा नइखे रह गइल। कब के साथ छोड़ जाई कहल नइखे जा सकत। अइसन में ई नवका पीढ़ी के मन में आपन  बुजुर्गन के प्रति भाव व्यक्त करे के  सोनहर मउका मिलल जवना के एगो धरोहर मान के भविष्य में संजो के रखे लाएक अंक के परिकल्पना कइनी, एह खाती उहां के साधुवाद आ भोजपुरी जंक्शन के उत्तरोत्तर बढ़ंती के पुरहर सुभकामना देतानी।

 गीता चौबे गूँज, कवयित्री, रांची

 

जज्बा के सलाम

रउरा मेहनत, लगन आ जज्बा के सलाम। ई सब भोजपुरी जंक्शन में झलकत बा। मां सरस्वती से विनती बा लेखनी के स्याही कभी ना सूखे। मां हंसवाहिनी के आशीर्वाद बनल रहे भाई पर।

राजेश मांझी, जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली

 

मनवा भाव बिभोर

माई बाबूजी के अंक पढ़ि, मनवा भाव बिभोर
सांच कहीं ई अद्भुत करनीं हऊंवें भाउक तोर
भइया मनोज हे भाउक बा,
कर जोरि प्रनाम तुहें मोर भाई।
सांच तs ई बा मोबाइल में,
भोजपुरियन के लेहलs तूं जुटाई।।
उनके मुंह से उन कर गितिया,
बाड़s धन्नि की तूं दिहलs सुनवाई।
एहि कारन बानें प्रनाम प्रनाम,
प्रनाम तुहें मोर सीस नवाई।।

एहि पुनीत कारे खातिर भगवान राउर जीऊ जांगंर बनवले रहें।

ओम प्रकाश आचार्य, वरिष्ठ कवि, गोरखपुर

 

संपादकीय बहुत बढ़िया लागल हs

संपादकीय ( हर बेर की तरह ) बहुत बढ़िया लागल हs … बाकी सामग्री का बारे में भी पढि के राय देत बानीं।

शाशि प्रेमदेव, वरिष्ठ कवि, बलिया 

 

लमहर काम भइल बा

भोजपुरी जंक्शन के “माई-बाबूजी” विशेषांक हाथ में बा। कई बेरी पढ़ गइनी आ मन इहे सोच के गदगद होता कि आज के समय मे जहाँ अधिकांश लइका लोग बिरधासरम खोजता लोग, ओह माहौल में, ओह परिवेश में मनोज भावुक जी अतना लमहर काम के बीड़ा उठावे के हिम्मत कइनी आ सभका सोझा रखियो देहनी। आज खाली उहें के ना ,बलुक कतना माई-बाबूजी के आसिरवाद  उहाँ के मिलता, कहल कठिन बा। लमहर काम भइल बा। मनोज जी के साथे पूरा संयोजक लोगन के बधाई बा। एक से बढिके एक माई-बाबूजी के संस्मरण रउआ सँजोअले बानी। बधाई बा, क्रम बढ़त रहे, भोजपुरी के माथ चमकत रहे।

डॉ. मधुबाला सिन्हा, कवयित्री, चंपारण  

एह तरह के विशेषांक पढ़े के ना मिलेला

‘भोजपुरी जंक्शन के ‘माई-बाबूजी विशेषांक’ के समाज में बहुत सराहल जा रहल बा। साधारणतया एह तरह के विशेषांक जल्दी पढ़े के ना मिलेला।

माई-बाबूजी के, घर-परिवार आ लइका-लइकी के जीवन में, केतना महत्व बा, इ पत्रिका पढ़ला पर समझ में आ रहल बा। सब लेख में अमूमन एके बात सामने आ रहल बा कि माई-बाबू जी पर लिखल आसान नइखे। ये बात के पुष्टि संपादक मनोज भावुक जी के सम्पादकीय, ‘पानी प पानी लिखे के कोशिश’ से हो जाता जेमे सम्पादक महोदय विचार के ताकत में परवरिश आ परिवेश के भूमिका के वर्णन कइले बानी।

पत्रिका में प्रकाशित सब आलेख नवही पीढ़ी खातिर रोचक आ प्रेरणा के स्रोत बा। सभे रचनाकार माई-बाबूजी के साथे बितावल आपन स्नेहिल एक-एक पल  बड़ा बारीकी से प्रस्तुति कइले बा आ ई सब खट्टा-मीठा अनुभव नइकी पीढ़ी के जीवन में परिपक्वता के साथ अहम ऊँचाई प्रदान करी।

विष्णुदेव तिवारी जी के समीक्षा, ‘मनोज भावुक के कवितन में माई’ बड़ा ही मनभावन बा।
पत्रिका में माई-बाबूजी प लिखल एक-एक दृष्टांत आपन अमिट छाप बना चुकल बा। बेशक ई अंक संग्रहणीय आ जोगावे लायक बा। ये अनोखा अंक खातिर संपादक महोदय के बहुत-बहुत धन्यवाद, शुभकामना आ बधाई।

अखिलेश्वर मिश्र, कवि, प. चम्पारण, बिहार

 

पहिलका बेरा अइसन विषय पर केन्द्रित अंक

पहिलका बेरा अइसन विषय पर केन्द्रित भोजपुरी पत्रिका के कवनो अंक निकलल बा। वाकई प्रशंसनीय अंक-बधाई मनोज जी।

उदय नारायण सिंह, वरिष्ठ लोकगायक, छपरा 

 

कलेजा निकाल के परोसल दिहलs  

कलेजा निकाल के परोस दिहल ए बाबु !

रामेश्वर सिंह, अवकाश प्राप्त पुलिस अधिकारी, वाराणसी 


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Hum BhojpuriaAugust 31, 20212min1410

भोजपुरी जंक्शन पत्रिका साहित्य नभ के ऊंचाई के छू रहल बा

सम्पादक महोदय,

भोजपुरी जंक्शन के देखलीं आ पढ़लीं बहुते प्रसन्नता भ‌इल। स्तरीय रचनन के एगो अनुपम जंक्शन के रूप में ई अंक बाटे। रचनन आ सम्पादन के दृष्टि से ई पत्रिका साहित्य नभ के ऊंचाई के छू रहल बा। कवर फोटो अपने आप में अद्वितीय बा जवन पत्रिका के पूरा मैटर प्रदर्शित क रहल बा।

“मत बांटs थोक के भाव पीएचडी के डिग्री “निबंध आज के शिक्षा विभाग के आईना देखा रहल बा। निबंध ” गांव में गूंजत न‌इखे ए हो रामा ” आपन संस्कृति सभ्यता छोड़ के गांव से लोगन के पलायन बता रहल बा, गांव में अब गवन‌ई गोल कहीं ल‌उकत न‌इखे। चूंकि च‌इत शुक्ल नवमीं के भगवान श्री राम के जन्म भ‌इल ह एसे निबंध ” श्री राम अवतार के रहस्य ” एह च‌इता अंक के सार्थकता सिद्ध क रहल बा। निबंध ” भारतीय सिनेमा में भगवान राम ” में भिन्न-भिन्न भाषा में श्री राम कथा प बनल फिल्मन के चर्चा करत कहल ग‌इल बा कि श्री राम कथा प भोजपुरी में एकहू फिल्म न‌इखे बनल,एह बात से हम सहमत न‌इखीं। सन् 1960 में भोजपुरी के पहिलका फिल्म रहल “गंगा म‌इया तोहे पियरी चढ़‌इबो “ओकरे बाद ” लागी नाहीं छूटे राम ”   “बिदेसिया ” आ “सीता म‌इया ” एक के बाद एक बनल। सीता म‌इया के पटकथा भगवान श्री राम के कथानक प आधारित रहे, सीता के भूमिका में जय श्री गडकर आ श्री राम के भूमिका में आसिम कुमार के सफल अभिनय में देखल ग‌इल। ओकर एगो गीत के एक लाइन हमके इयाद आवता — सरजू के तीरे तीरे अवध नगरिया, जहां खेलें राम लखन दूनो भ‌इया।

एह च‌इती विशेषांक में लगभग 36 गो साहित्यकारन के च‌इती प्रकाशित बा। कुल्ही च‌इती एक से बढ़ के एक बाड़िन से। कुल्हनी प कुछ न कुछ कहला से प्रतिक्रिया बहुत लमहर हो जाई, आ केहू प कहीं आ केहू के छोड़ी त ई अन्याय हो जाई।

भोजपुरी जंक्शन के ई च‌इता विशेषांक अपना उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफल बा। एमे सम्मिलित कुल्ही साहित्यकारन के संगे संगे हम कुशल सम्पादक महोदय के कोटि-कोटि बधाई, शुभकामनाएं आ धन्यवाद दे रहल बानी।

डॉ. भोला प्रसाद आग्नेय, रघुनाथपुरी, टैगोर नगर, सिविल लाइंस, बलिया, उ०प्र०

भोजपुरी जंक्शन पत्रिका गुणवत्ता का दृष्टि से उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहल बा

भोजपुरी जंक्शन के चइता/चइती विशषांक स्तरीयता का दृष्टि से एह बात के प्रमाण बा कि पत्रिका गुणवत्ता का दृष्टि से उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहल बा। एकरा पहिले होली विशेषांक निकलल रहे, जवन संपादकीय कला के अद्भुत नमूना रहे।

चइता/चइती विशेषांक भी बढ़ चढ़ के विशेषता समेटले बा। एह लोक विधा पर ललित लेख त बड़ले बा, गीत-रचना सब भी जे छपल बा, बहुत ही स्तरीय बा, भोजपुरी साहित्य के समृद्ध करे वाला बा।

सुन्दर संपादकीय परिकल्पना खातिर बहुते बधाई आ शुभकामना।

दिनेश कुमार शर्मा, रिटायर्ड जज, छपरा

भोजपुरी जंक्शन टीम के हृदय से अभिनंदन !

एने हर्ष-विषाद के अझुरहट में एतना बुरी तरह से फंसि गइल रहनीं हं ( अबहिंयों मन दोचिते बा …) कि आउर कवनो चीज़ का ओर धियान ना जात रहल हs ! आवरण पृष्ठ पर अपना चैता के पंच लाइन देखि के अच्छा लागत बा।

शशि प्रेमदेव, बलिया

भोजपुरी जंक्शन खातिर राउर ई प्रतिबद्धता इयाद राखल जाई

एह संकटकालो में भोजपुरी खातिर मनोज जी राउर ई प्रतिबद्धता इयाद राखल जाई। पारिवारिक समस्यन से जूझत अपने आपन संकल्प पूरा कर रहल बानीं।  बहुत बढ़िया अंक बा। राउर सब आलेख आ सगरी कविता पढ़े जोग बाड़ी सं। संपादकीय खूब रोचक आ सामयिक बा। बधाई।

डॉ. सुनील कुमार पाठक, पटना

भोजपुरी जंक्शन के चइता विशेषांक बेजोड़ बा

भोजपुरी जंक्शन के चइता विशेषांक बेजोड़ बा। साज-सज्जा, संपादन बहुत उच्च कोटि के बा। भोजपुरी में एह तरह से लेखन के लिए सब आदरणीय विद्वान लेखक भाई सब के हम सादर अभिवादन करत बानी। भोजपुरी के विकास में संपादक मण्डल के हृदय से आभार बा

मोहन पाण्डेय, हाटा कुशीनगर

भोजपुरी जंक्शन बडहन इस्टेशन भइल बा

रउआ भोजपुरी के उद्धारक भइल बानी एह खातिर अनघा बधाई। भोजपुरी जंक्शन बडहन इस्टेशन भइल बा। भोजपुरी साहित्य खातिर बड़ काम होता। कतना लोग जागि गइलें भोजपुरी मेल क हारन सुन के। ओहिमे फगुआ चइता क खूब झाम झाम मनोरंजक के साथ ही ज्ञानवर्धक रहे। केहू असानी से सोच ना सके बाकिर चइता में कोरोना महमारी के दुःख दर्द कुलहि आइल। ई शोधपरक कार भईल राउर सौजन्य से। ई विशेषांक दस्तावेज होई आगे। चइता में हमरो रचना के शामिल कइला खातिर बहुत-बहुत आभार।

                                                                                   डाक्टर मञ्जरी पाण्डेय, शिक्षिका, लेखिका, कवयित्री, रंगकर्मी, समाजसेवी 

आदरणीय भावुक जी, हम

सादर नमन।

‘भोजपुरी जंक्शन’  चइता विशेषांक में मेरे पत्र को आपने पाती स्तंभ में स्थान दिया, हृदय से बहुत-बहुत आभारी हूँ। यह अंक भी बहुत आकर्षक, मन भावन, पूर्ण रंग बिरंगी साज सज्जा से ओत-प्रोत है, सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक अनमोल कोहिनूर हैं। सभी कलमकारों को हार्दिक बधाई। संपादक विभाग के सभी सुकर्मियों को बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं।

दरियाब सिंह राजपूत, ब्रजकण, मोदी नगर

भोजपुरी के समृद्धि में एगो अउरी नग जड़े खातिर राउर आभार   

ई पहिला अंक ह जवन हमरा के पढ़े के मिलल ह आ हम भाग्यशाली मानS तानी अपना के, कि एह चैता विशेषांक में हमरो चैती के जगहा मिलल बा।

आवरण चित्र के सङ्गे ‘हम काटब गेहूं, गोरी कटिहs तू मुस्की’ पढ़ के एगो उत्सुकता पहिलहीं पत्रिका के ले के मन में होखे लागल ह, कि कइसे हाली से पढ़ लिहल जाओ!

सम्पादकीय खूब बन्हिया लागल ह। एक से बढ़ के एक चैता! आ चइता पर आग्नेय जी के आलेखो निमन लागल ह। कोयीली तोर सहकल छोड़इबो शैलेन्द्र शैल जी के ई चइती पढ़ के एगो अलग अनुभव मिलल।

सब मिला के ई चइता विशेषांक एगो महत्वपूर्ण जगह बनाई भोजपुरी पत्रिकन के बीच में। भोजपुरी के समृद्धि में एगो अउरी नग जड़े खातिर राउर आभार!

डॉ. कादम्बिनी सिंह, बलिया  

भोजपुरी खातिर इ पत्रिका संजीवनी बा

मन गदगद भइल। भाउक जी के कलम त भाव के जीवंतता उरेहता। हमरा त भोजपुरी जंक्शन की बारे में जानकारिये ना रहल हS कि एतना सुन्दर इ बा। लेकिन ज्ञानेश्वर गूँजन जी से जानकारी भइल अउरी गूँजनजी ही हमसे आग्रह कS के एगो चैता लेहनी। अपनी भोजपुरी खातिर इ पत्रिका संजीवनी बा ए बाति के अपार खुशी बा। कब-कब इ पत्रिका निकलेला बताईं। हमहू एइमे आपन रचना भेजत रहबि। अन्त में फेरु एइसन सुंदर पत्रिका खातिर हृदय की गहराई से शुभकामना।

सत्य प्रकाश शुक्ल बाबा, भठहीं बुजुर्ग कुशीनगर उत्तर प्रदेश

 

सचमुच बहुत बढिया विशेषांक बा

बहुत-बहुत आभार जंक्शन पर स्थान मिलल एह खातिर। सचमुच बहुत बढिया विशेषांक बा। चइत माह के सब विशेषता के जोगा के विविध विधा में रचल बा। साधुवाद! भोजपुरी जंक्शन टीम के।

रजनी रंजन, जमशेदपुर

 

आपन लोक संस्कृति के बचावे के भगीरथ प्रयास बा ई चइता विशेषांक

भोजपुरी जंक्शन’ के ‘चइता विशेषांक’ देख के करेजा जुड़ा गइल। एगो भुला रहल विधा के विशेषांक बनाके फिर से स्थापित करने के भगीरथ प्रयास खाती श्री मनोज सिंह भावुक जी के जतना प्रशंसा कइल जाए ऊ थोरे होखी। एक से बढ़के एक चइता पढ़के मन अघा गइल। आपन लोक संस्कृति के बचावे खाती इहाँ के आपना हृदय से धन्यवाद देत बानी आ दिनोंदिन इहाँ के एह काम में खूब आगे बढ़े खाती ढेरे शुभकामना देतानी ।

 

गीता चौबे गूँज, राँची झारखंड

हर दिशा, हर क्षेत्र, हर विधा के जुड़ाव आ जुटान बा

भोजपुरी ई-पत्रिका भोजपुरी जंक्शन के होली विशेषांक के साथे पहली बार एह पत्रिका के दर्शन भइल। एह जंक्शन पर हर दिशा, हर क्षेत्र, हर विधा के जुड़ाव आ जुटान बा।

संपादकीय में आदरणीय मनोज भावुक जी के कलम से एकदम सामयिक चित्रण फगुनाहट आ कोरोनाहट के भइल बा। अबगे भोजपुरी जंक्शन के चइता विशेषांक मिलल ह। एह अंक के मिलला के बाद कोरोनाहट के बीच में एगो तनाव के खतम त ना कहल जा सकेला, लेकिन कम करेके साधन जरूर मिल गइल। सब रचनाकार लोग के एतना सुंदर रचना रचे खातिर बहुत-बहुत बधाई। उम्मीद रही कि आगे भी नवोदित लोग के दिशा देखावे खातिर और भी बढ़िया और प्रेरणा देबे लायक रचना मिली। साथ ही साथ एह पत्रिका के संपादक मण्डल और सब जुड़ल सदस्य, रचनाकार लोग के बहुत बहुत धन्यवाद, प्रणाम।

अजय कुमार, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश      


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Hum BhojpuriaJune 15, 20211min4010

आचार्य महेन्द्र शास्त्री संपादित पहिलका भोजपुरी पत्रिका भोजपुरी के याद दियावत बा ई अंक    

भावुक जी,

कोरोना के त्रासद काल में अपनहीं कोरोना से जुझार करके उबरते रउरा ‘ भोजपुरी जंक्शन ‘ के 01 मई से 15 मई वाला अंक निकालिये देहनी। ई रउरा संकल्प आ निष्ठा के परिचय देत बा। ई अंक देख के आचार्य महेन्द्र शास्त्री के द्वारा संपादित पहिलुका भोजपुरी पत्रिका- ‘भोजपुरी’  सोझा खाड़ हो गइल। शास्त्री जी का जब रचना पर्याप्त संख्या में ना मिलल, त उहाँ का कई गो सामग्री छद्म नाम से खुदही लिख के डार देले रहीं।

पत्रिका के नीति के अनुसार चले खातिर रउरा एह अंक में संपादकीय के अलावे अउर कई गो आलेख लिखे के पड़ल बा। पत्रिका के पत्रकारिता मानदंड पर खरा राखे खातिर ई जरूरी होला आ ओह जरूरत के संपादक पूरा करे के चाहेला। भोजपुरी में कथा कहानी से ईत्तर विषय पर लिखनिहारन के कमी बा। ओह कमी के रउरा जइसन संपादक अपना बल पर पूरा करे के चाहेला, जवन रउरा एह अंक में करके पत्रिका के स्तरीयता बरकरार रखले बानी।

हर बेर के अइसन अबकियो बेर के संपादकीय जरत विषय पर बा। कोरोना से मानसिक, शारीरिक, आर्थिक व्यवस्था कतना भयावह रूप लेत जा रहल बा आ ओकर भविष्य में आगे तक दुष्प्रभाव देखाई पड़ी, चिंता सोभाविक बा। जवना प्रकार के ठगी, कालाबाजारी आ आर्थिक शोषण कोरोना के नाम पर चल रहल बा, ओह पर तीख नजर संपादक के बा। करुणा आ संवेदनाविहिन मनई के मनई ना कहल जा सके।

‘ सुनीं सभे ‘ स्तम्भ में प्रधान संपादक सिन्हा जी बड़ा मौजूं विषय उठवले बानी। कुछ दिन पहिले छत्तीसगढ़ में उग्रवादी संगठन द्वारा घात लगा के सी आर पी एफ जवान लोग के हत्या पर उहाँ के आक्रोश सोभाविक बा। एह पर उहाँ के सही कहले बानी कि राजनीतिक हित साधेवाला दलन के बढ़ावा में पनपल एह हिंसा विश्वासी संगठनन के खातमा होखहीं के चाहीं।

आवरण कथा में बाबू कुँवर सिंह के वीरता आ शौर्य के आखयान करत तीनों आलेख बढ़िया बा। अबकी धर्मन बाई वाला प्रसंग के ले के आलेख नीक लागल। ई चर्चा में कम आवेला। कई अंकन से दिवंगत भोजपुरी सेवी वाला स्तम्भ लंबित रहल ह, ओह के बढ़ावे के काम बढ़िया भइल बा। भोजपुरी गौरव स्तम्भ में साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन, महेन्दर मिसिर अउर शहनाई के पर्याय विस्मिल्लाह खान पर आलेख दे के बढ़िया स्मृति तर्पण कइले बानी।

राउर प्रसिद्ध कहानी ‘ नेहिया के तेल ‘   पर ज्योत्स्ना प्रसाद के आलेख विमर्शपूर्ण बा। ई कहानी नाट्य रूपांतरित हो के मंचित भइल बा। हर बेर के तरह सिनेमा से जुड़ल राउर आलेख जे मनोज बाजपेयी पर केन्द्रित बा, पठनीय बा। हम विशेष रूप से ‘ राउर पाती ‘ स्तम्भ के बात करे के चाहत बानी। पाती पर तीन पृष्ठ खरच करे के पड़ल बा, ई साबित करत बा कि पत्रिका के पाठकीयता आ स्वीकार्यता बढ़ल बा।

पत्रिका असहीं आपन पहिचान कायम कइले रहे, सुभे हो सुभे।

डॉ. ब्रज भूषण मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार, मुजफ्फरपुर

इतिहास आ वर्तमान सब पर नजर बा भोजपुरी जंक्शन के

भोजपुरी जंक्शन जवन काम कर रहल बा, ओकर जेतने बड़ाई कइल जाव कम बा। भोजपुरी में गीत, कविता, कहानी ढेर भइल। अब जरुरत बा कि भोजपुरी में समाज के हर पक्ष चाहे उ शिक्षा होखे, राजनीति होखे भा ज्ञान-विज्ञान …. ओह पर स्तरीय लेख आ चिंतन विचार सबके मिले। ई पत्रिका एह कमी के पूरा करे में बहुत बड़ काम कर रहल बा। आपन थाती के सँजोअल जेतना जरुरी बा ओतने जरुरी बा कुछ नया रचल आ सभे तक पहुँचावल, एहू काम में ई पत्रिका बाजी मार रहल बा। इतिहास त बतावते बा, संगे-संगे वर्तमान पर भी नजर रखले बा आ ओके दर्ज कर रहल बा। सबसे बड़ बात कि भोजपुरी साहित्य के महान हस्ताक्षर लोग से भी लगातार परिचय करा रहल बा। अब तक के आपन सफर में ई पत्रिका हर विषय पर भोजपुरी में लेख उपलब्ध करइले बा। भावुक जी निश्चित तौर पर प्रशंसा आ बधाई के हक़दार बानी। एह आशा के साथ कि ई सफर जारी रही आ भोजपुरी में एगो मील के पत्थर साबित होई भावुक जी के बहुत बहुत शुभकामना।

 डॉअन्विति सिंह, रिसर्च एसोसिएट, दिल्ली

बाजारु भोजपुरी के खिलाफ अभियान बा भोजपुरी जंक्शन

भोजपुरी जंक्शन के नवका अंक पढल शुरू कर देले बानीं।

आपकs संपादकीय गागर में सागर के चरितार्थ करत बाटे। वीरवर कुंवर सिंह पर लेख ज्ञानवर्धक आउर प्रेरक लागल। धर्मन बाई आउर कुंवर सिंह जी के प्रेमकथा भी मर्मस्पर्शी बन पडल बाटे।

हं, ख्यातिलब्ध कथाकार कृष्ण कुमार जी का लेख में बाबू कुंवर सिंह के जनम क साल अनजाने में गलत छपि गइल बा। अइसने गलती महेन्दर मिसिर जी का मशहूर गीत ‘ अंगुरी में डंसले बिया…’ में भी खटकत बाटे काहें कि पहिलका आउर दोसरका अंतरा में क्रमशः ‘ विषहरिया ‘ आ ‘ सेजरिया ‘ का जगहा गलत शब्दन के रख दिहल गइल बा …

भावुक जी का बारे में बेसी ना कहि के, हम एतने कहब कि उहां क जवने काम करेलीं, ओकरा के निखारे खातिर ओह में जीव-जान झोंकि देलीं!

अइसन भोजपुरी साधक आ कर्मजोगी के भगवान दीर्घायु आउर सेहतमंद राखस ताकि बाजारु भोजपुरी के खिलाफ ऊ पूरा दम-खम का साथे लड़ के विजयी हो सकसु।

शशि प्रेमदेव, बलिया

भोजपुरी समाज खातिर मील के पत्थर साबित होई

     भोजपुरी जंक्शन के 1-15 मई वाला अंक पढ़ि के ए बात के खुशी भइल कि ए जंक्शन में खाली भोजपुरी साहित्यकारे ना बलुक भोजपुरी माटी में पैदा होखे वाला हर क्षेत्र के महापुरुषन प ध्यान दिहल जाता, जवन पत्रिका के कवर देखते बुझा जाता। सम्पादकीय में कोरोना के कहर आ असर पे चर्चा करत दृढ़ संकल्प के साथ समाज के विश्वास दियावल गइल बा —जंग जीते के बा कोरोना से, एही संकल्प के गोहरावे के बा।

माओवादी नक्सलियन के अमानवीय, संवेदनाहीन आ क्रूर कृत्यन के सजीव चित्रण करत दू गो लेख बाटे जवना से सरकार के सामने सवाल खड़ा भइल बा कि का सरकार के सेना नक्सलियन से कमजोर बा, ओके समूल नष्ट काहे नइखे क पावत।

वीरवर बाबू कुँवर सिंह पे तीन गो लेख बा जवना के पढ़ि के रोआ-रोआ फड़फड़ा जाता। श्री कृष्ण कुमार जी के लेख में उनके जन्म तिथि 23 अप्रैल 1977 लिखल बा जवन टाइप के गलती बुझाता काहें कि हमरे जानकारी से उनके जन्म तिथि 13 नवम्बर 1777 हवे। एगो हमार सुझाव बा कि 1857 में क्रांति के विगुल बजावे वाला भोजपुरी माटी के शहीद मंगल पांडे रहते उनहूं प दू चार शब्द लिखा सकेला।

भोजपुरी के दिवंगत सत्तर साहित्यकारन के बाद सात गो आउर साहित्यकारन के संक्षिप्त परिचय अगली पीढ़ी बदे प्रेरणा स्रोत के काम कर रहल बा। एही क्रम में हमार निहोरा बा कि बलिया के दिवंगत करुण रस भोजपुरी गीतकार स्व०राधा मोहन धीरज के नाम जोड़ लिहल जाव।

महेन्दर मिसिर, राहुल सांकृत्यायन, बिसमिल्ला खां आ मनोज बाजपेयी जी प लेख काफी ज्ञान वर्द्धक बाड़न स। सम्पादक मनोज भावुक जी के कहानी ” तेल नेहिया के “नाम से त एगो प्रेम कहानी बुझाता बाकिर ओमे पइसा खातिर समाज में हो रहल कर्म कुकर्म प करारा प्रहार बा जवना से समाज के एगो यथोचित दिशा मिल रहल बा।

ई पत्रिका एक दिन भोजपुरी भाषा आ साहित्य खातिर मील के पत्थर साबित होई। एह कुशल आ सफल प्रयास खातिर सम्पादक जी के कोटि कोटि बधाई आ धन्यवाद।

     डॉ.  भोला प्रसाद आग्नेय, बलिया उ०प्र०

हिम्मत आ हौसला के प्रणाम

अस्वस्थ रह के भी भोजपुरी खतीरा समर्पित, रउआ हिम्मत आ हौसला के प्रणाम बा। बहुत चीज़ के अपना कलेवर में समेटले ई अंक खतीरा बधाई बा।

मधुबाला सिन्हा, मोतिहारी,चम्पारण, बिहार

दुःख दरद भुला के एह समर्पन के प्रणाम

सबके याद समेटल, आपन दुःख दरद भुला के एह समर्पन के प्रणाम। मिसाल बा इ त। प्रेरणा मिली।

अजय यादव, युवा कवि, शिक्षक, गोरखपुर

साहित्य समाज से फिल्मी दुनिया तक कुल्ही कवर भइल बा

बहुत बहुत बधाई मनोज जी। देखनी। गजब। एक से बढ़ के एक लेख, विषय साहित्य समाज से फिल्मी दुनिया तक कुल्ही कवर भइल बा। अद्भुत जानकारियो बा। कुल्ही लेख अभी पढाइल ना। पढल जाई। बाकी जल्दीये पढ़ के खतम कइले के मन करता।

मञ्जरी पाण्डेय, शिक्षिका, लेखिका, कवयित्री, रंगकर्मी बनारस  

भोजपुरी के लिए अतुलित समर्पण है यह

भाई मनोज भावुक जी की मेहनत इस पत्रिका में स्पष्ट दिखाई देती है। भोजपुरी के लिए आपका यह अतुलित समर्पण आदर के योग्य है।

धनञ्जय राकिम, सुप्रसिद्ध शायर, रेनुकूट, सोनभद्र 

शानदार अंक बा

शानदार अंक। अचानक आपन नाम देख के खूब खुशी भइल। हमार चइता अंक के प्रतिक्रिया देख के बहुत अच्छा लागल। आभार। अभिनंदन।

रजनी रंजन, जमशेदपुर

मिठास में चीनी आ जरुरत में नमक जइसन बा भोजपुरी जंक्शन

भोजपुरी जंक्शन के मई के पहिला अंक पढ़ लेनी। शुरुआत सम्पादकीय से कइनी हं,बहुते संवेदनशील आलेख बा,जवन सब लोग के एकजुट रहे के आ अपना हीत संघतिया के साथ कवनो हाल में धइले रहे के प्रेरित कर रहल बा।
आगे ,वीरवर कुंवर सिंह ,महेंद्र मिसिर ,उस्ताद विस्मिल्लाह खान आ राहुल सांकृत्यायन के बारे में बड़ा रोचक लेख पढ़ के आनन्द आ गइल ह।एगो खास ई बात बुझाइल ह कि ननीआउर के पोसाइल लइकन के नाम (प्रसिद्धि) मिलेला। सिनेमा से, मनोज बाजपेयी के बारे में आलेख बहुत बेहतरीन लागल ह।
एतना शानदार अंक खातिर भोजपुरी जंक्शन के सगरी टीम के बधाई । भोजपुरी बोले आ बूझे वाला हर सुधी जन खातिर ई पत्रिका मिठास में चीनी आ जरुरत में नमक से इचिको कम  नइखे।

डॉ. कादम्बिनी सिंह, बलिया


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Hum BhojpuriaJune 7, 20212min3670

भोजपुरी जंक्शन पत्रिका साहित्य नभ के ऊंचाई के छू रहल बा

सम्पादक महोदय,

भोजपुरी जंक्शन के देखलीं आ पढ़लीं बहुते प्रसन्नता भ‌इल। स्तरीय रचनन के एगो अनुपम जंक्शन के रूप में ई अंक बाटे। रचनन आ सम्पादन के दृष्टि से ई पत्रिका साहित्य नभ के ऊंचाई के छू रहल बा। कवर फोटो अपने आप में अद्वितीय बा जवन पत्रिका के पूरा मैटर प्रदर्शित क रहल बा।

“मत बांटs थोक के भाव पीएचडी के डिग्री “निबंध आज के शिक्षा विभाग के आईना देखा रहल बा। निबंध ” गांव में गूंजत न‌इखे ए हो रामा ” आपन संस्कृति सभ्यता छोड़ के गांव से लोगन के पलायन बता रहल बा, गांव में अब गवन‌ई गोल कहीं ल‌उकत न‌इखे। चूंकि च‌इत शुक्ल नवमीं के भगवान श्री राम के जन्म भ‌इल ह एसे निबंध ” श्री राम अवतार के रहस्य ” एह च‌इता अंक के सार्थकता सिद्ध क रहल बा। निबंध ” भारतीय सिनेमा में भगवान राम ” में भिन्न-भिन्न भाषा में श्री राम कथा प बनल फिल्मन के चर्चा करत कहल ग‌इल बा कि श्री राम कथा प भोजपुरी में एकहू फिल्म न‌इखे बनल,एह बात से हम सहमत न‌इखीं। सन् 1960 में भोजपुरी के पहिलका फिल्म रहल “गंगा म‌इया तोहे पियरी चढ़‌इबो “ओकरे बाद ” लागी नाहीं छूटे राम ”   “बिदेसिया ” आ “सीता म‌इया ” एक के बाद एक बनल। सीता म‌इया के पटकथा भगवान श्री राम के कथानक प आधारित रहे, सीता के भूमिका में जय श्री गडकर आ श्री राम के भूमिका में आसिम कुमार के सफल अभिनय में देखल ग‌इल। ओकर एगो गीत के एक लाइन हमके इयाद आवता — सरजू के तीरे तीरे अवध नगरिया, जहां खेलें राम लखन दूनो भ‌इया।

एह च‌इती विशेषांक में लगभग 36 गो साहित्यकारन के च‌इती प्रकाशित बा। कुल्ही च‌इती एक से बढ़ के एक बाड़िन से। कुल्हनी प कुछ न कुछ कहला से प्रतिक्रिया बहुत लमहर हो जाई, आ केहू प कहीं आ केहू के छोड़ी त ई अन्याय हो जाई।

भोजपुरी जंक्शन के ई च‌इता विशेषांक अपना उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफल बा। एमे सम्मिलित कुल्ही साहित्यकारन के संगे संगे हम कुशल सम्पादक महोदय के कोटि-कोटि बधाई, शुभकामनाएं आ धन्यवाद दे रहल बानी।

 

डॉ. भोला प्रसाद आग्नेय, रघुनाथपुरी, टैगोर नगर, सिविल लाइंस, बलिया, उ०प्र०

भोजपुरी जंक्शन पत्रिका गुणवत्ता का दृष्टि से उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहल बा

भोजपुरी जंक्शन के चइता/चइती विशषांक स्तरीयता का दृष्टि से एह बात के प्रमाण बा कि पत्रिका गुणवत्ता का दृष्टि से उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहल बा। एकरा पहिले होली विशेषांक निकलल रहे, जवन संपादकीय कला के अद्भुत नमूना रहे।

चइता/चइती विशेषांक भी बढ़ चढ़ के विशेषता समेटले बा। एह लोक विधा पर ललित लेख त बड़ले बा, गीत-रचना सब भी जे छपल बा, बहुत ही स्तरीय बा, भोजपुरी साहित्य के समृद्ध करे वाला बा।

सुन्दर संपादकीय परिकल्पना खातिर बहुते बधाई आ शुभकामना।

दिनेश कुमार शर्मा, रिटायर्ड जज, छपरा

भोजपुरी जंक्शन टीम के हृदय से अभिनंदन !

एने हर्ष-विषाद के अझुरहट में एतना बुरी तरह से फंसि गइल रहनीं हं ( अबहिंयों मन दोचिते बा …) कि आउर कवनो चीज़ का ओर धियान ना जात रहल हs ! आवरण पृष्ठ पर अपना चैता के पंच लाइन देखि के अच्छा लागत बा।

शशि प्रेमदेव, बलिया

भोजपुरी जंक्शन खातिर राउर ई प्रतिबद्धता इयाद राखल जाई

एह संकटकालो में भोजपुरी खातिर मनोज जी राउर ई प्रतिबद्धता इयाद राखल जाई। पारिवारिक समस्यन से जूझत अपने आपन संकल्प पूरा कर रहल बानीं।  बहुत बढ़िया अंक बा। राउर सब आलेख आ सगरी कविता पढ़े जोग बाड़ी सं। संपादकीय खूब रोचक आ सामयिक बा। बधाई।

डॉ. सुनील कुमार पाठक, पटना

भोजपुरी जंक्शन के चइता विशेषांक बेजोड़ बा

भोजपुरी जंक्शन के चइता विशेषांक बेजोड़ बा। साज-सज्जा, संपादन बहुत उच्च कोटि के बा। भोजपुरी में एह तरह से लेखन के लिए सब आदरणीय विद्वान लेखक भाई सब के हम सादर अभिवादन करत बानी। भोजपुरी के विकास में संपादक मण्डल के हृदय से आभार बा

मोहन पाण्डेय, हाटा कुशीनगर

भोजपुरी जंक्शन बडहन इस्टेशन भइल बा

रउआ भोजपुरी के उद्धारक भइल बानी एह खातिर अनघा बधाई। भोजपुरी जंक्शन बडहन इस्टेशन भइल बा। भोजपुरी साहित्य खातिर बड़ काम होता। कतना लोग जागि गइलें भोजपुरी मेल क हारन सुन के। ओहिमे फगुआ चइता क खूब झाम झाम मनोरंजक के साथ ही ज्ञानवर्धक रहे। केहू असानी से सोच ना सके बाकिर चइता में कोरोना महमारी के दुःख दर्द कुलहि आइल। ई शोधपरक कार भईल राउर सौजन्य से। ई विशेषांक दस्तावेज होई आगे। चइता में हमरो रचना के शामिल कइला खातिर बहुत-बहुत आभार।

                                                                                   डाक्टर मञ्जरी पाण्डेय, शिक्षिका, लेखिका, कवयित्री, रंगकर्मी, समाजसेवी 

आदरणीय भावुक जी, हम

सादर नमन।

‘भोजपुरी जंक्शन’  चइता विशेषांक में मेरे पत्र को आपने पाती स्तंभ में स्थान दिया, हृदय से बहुत-बहुत आभारी हूँ। यह अंक भी बहुत आकर्षक, मन भावन, पूर्ण रंग बिरंगी साज सज्जा से ओत-प्रोत है, सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक अनमोल कोहिनूर हैं। सभी कलमकारों को हार्दिक बधाई। संपादक विभाग के सभी सुकर्मियों को बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं।

दरियाब सिंह राजपूत, ब्रजकण, मोदी नगर

भोजपुरी के समृद्धि में एगो अउरी नग जड़े खातिर राउर आभार   

ई पहिला अंक ह जवन हमरा के पढ़े के मिलल ह आ हम भाग्यशाली मानS तानी अपना के, कि एह चैता विशेषांक में हमरो चैती के जगहा मिलल बा।

आवरण चित्र के सङ्गे ‘हम काटब गेहूं, गोरी कटिहs तू मुस्की’ पढ़ के एगो उत्सुकता पहिलहीं पत्रिका के ले के मन में होखे लागल ह, कि कइसे हाली से पढ़ लिहल जाओ!

सम्पादकीय खूब बन्हिया लागल ह। एक से बढ़ के एक चैता! आ चइता पर आग्नेय जी के आलेखो निमन लागल ह। कोयीली तोर सहकल छोड़इबो शैलेन्द्र शैल जी के ई चइती पढ़ के एगो अलग अनुभव मिलल।

सब मिला के ई चइता विशेषांक एगो महत्वपूर्ण जगह बनाई भोजपुरी पत्रिकन के बीच में। भोजपुरी के समृद्धि में एगो अउरी नग जड़े खातिर राउर आभार!

डॉ. कादम्बिनी सिंह, बलिया  

भोजपुरी खातिर इ पत्रिका संजीवनी बा

मन गदगद भइल। भाउक जी के कलम त भाव के जीवंतता उरेहता। हमरा त भोजपुरी जंक्शन की बारे में जानकारिये ना रहल हS कि एतना सुन्दर इ बा। लेकिन ज्ञानेश्वर गूँजन जी से जानकारी भइल अउरी गूँजनजी ही हमसे आग्रह कS के एगो चैता लेहनी। अपनी भोजपुरी खातिर इ पत्रिका संजीवनी बा ए बाति के अपार खुशी बा। कब-कब इ पत्रिका निकलेला बताईं। हमहू एइमे आपन रचना भेजत रहबि। अन्त में फेरु एइसन सुंदर पत्रिका खातिर हृदय की गहराई से शुभकामना।

सत्य प्रकाश शुक्ल बाबा, भठहीं बुजुर्ग कुशीनगर उत्तर प्रदेश

 

सचमुच बहुत बढिया विशेषांक बा

बहुत-बहुत आभार जंक्शन पर स्थान मिलल एह खातिर। सचमुच बहुत बढिया विशेषांक बा। चइत माह के सब विशेषता के जोगा के विविध विधा में रचल बा। साधुवाद! भोजपुरी जंक्शन टीम के।

रजनी रंजन, जमशेदपुर

आपन लोक संस्कृति के बचावे के भगीरथ प्रयास बा ई चइता विशेषांक

भोजपुरी जंक्शन’ के ‘चइता विशेषांक’ देख के करेजा जुड़ा गइल। एगो भुला रहल विधा के विशेषांक बनाके फिर से स्थापित करने के भगीरथ प्रयास खाती श्री मनोज सिंह भावुक जी के जतना प्रशंसा कइल जाए ऊ थोरे होखी। एक से बढ़के एक चइता पढ़के मन अघा गइल। आपन लोक संस्कृति के बचावे खाती इहाँ के आपना हृदय से धन्यवाद देत बानी आ दिनोंदिन इहाँ के एह काम में खूब आगे बढ़े खाती ढेरे शुभकामना देतानी ।

गीता चौबे गूँज, राँची झारखंड

हर दिशा, हर क्षेत्र, हर विधा के जुड़ाव आ जुटान बा

भोजपुरी ई-पत्रिका भोजपुरी जंक्शन के होली विशेषांक के साथे पहली बार एह पत्रिका के दर्शन भइल। एह जंक्शन पर हर दिशा, हर क्षेत्र, हर विधा के जुड़ाव आ जुटान बा।

संपादकीय में आदरणीय मनोज भावुक जी के कलम से एकदम सामयिक चित्रण फगुनाहट आ कोरोनाहट के भइल बा। अबगे भोजपुरी जंक्शन के चइता विशेषांक मिलल ह। एह अंक के मिलला के बाद कोरोनाहट के बीच में एगो तनाव के खतम त ना कहल जा सकेला, लेकिन कम करेके साधन जरूर मिल गइल। सब रचनाकार लोग के एतना सुंदर रचना रचे खातिर बहुत-बहुत बधाई। उम्मीद रही कि आगे भी नवोदित लोग के दिशा देखावे खातिर और भी बढ़िया और प्रेरणा देबे लायक रचना मिली। साथ ही साथ एह पत्रिका के संपादक मण्डल और सब जुड़ल सदस्य, रचनाकार लोग के बहुत बहुत धन्यवाद, प्रणाम।

अजय कुमार, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश      


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Hum BhojpuriaMay 25, 20212min4700

धर्मयुग, साप्तिहिक-हिंदुस्तान, कादंबिनी पत्रिका के समतुल्य  है ‘भोजपुरी जंक्शन‘    

आपके कुशल एवम सफल संपादन में ‘भोजपुरी जंक्शन’ ई पत्रिका के संपूर्ण पृष्ठों को उलटने पलटने का सुअवसर प्राप्त हुआ। धर्मयुग, साप्तिहिक-हिंदुस्तान, कादंबिनी पत्रिका के

समतुल्य आपकी विशिष्ट पत्रिका एक लंबे अंतराल के पश्चात मेरी नज़रों से गुज़र गयी, जिसकी प्रशंसा में दो शब्द लिखना अति आवश्यक है।

महोदय आज के युग में पत्रिका प्रकाशन लोहे के चने चबाने के समान है, इसकी साज सज्जा, अति आकर्षक हृदय स्पर्शी रचना चयन संपादक की विद्वता का परिचायक है। जिसके

लिए आप और आपका सुकर्मी  संपादन विभाग बधाई का पात्र है।

रंग बिरंगी होली की विभिन्न रचनाओं के मन भावन रंग बिखेरता, मिठासभरी गुंजिया सी

स्वादिष्ट व दही भल्ले सी नमकींन रचनाएं पढ़कर होली की मस्ती का आनन्द चौगुना हो गया।

आपने भोजपुरी रचनाओं के मध्य ब्रजभाषा की होली रचनाओं को जो महत्ता प्रदान की

है, उसके लिए मैं आपका, और सभी सहयोगियों का हृदय से आभारी हूँ। मेरा गीत “उड़ रह्यो

रंग गुलाल ब्रज की गलियन में” “भोजपुरी जंक्शन” के सभी पाठकों को पसंद आयेगा, ऐसा

मेरा विश्वास है।

अनुदिन पत्रिका प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे, इसी मंगलकामना के साथ “भोजपुरी जंक्शन” परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं।

दरियाब सिंह राजपूत ब्रजकन,  मोदीनगर

भोजपुरी जंक्शन” में ब्रजभाषा को सम्मान देने के लिए साधुवाद

“भोजपुरी जंक्शन” का “होली विशेषांक” अपनी नवीनतम मनोहारी साज सज्जा के साथ प्रकाशित हुआ, इसके लिए “भोजपुरी जंक्शन” परिवार को हृदय से बधाई।

इस अंक में मेरा ब्रजभाषा गीत “फागुनी बयारि” प्रकाशित करने एवं ब्रजभाषा को सम्मान देने के लिए आपका सादर सहृदय साधुवाद, आदरणीय भावुक जी !

इस अंक में प्रकाशित अधिकांश रचनाएं भोजपुरी के लालित्य से परिपूर्ण है जो एक से बढ़ कर एक सुंदर, सरस एवं भावपूर्ण हैं। आपके भोजपुरी दोहे बहुत पसंद आये, इसके लिए आपको विशेष बधाई। यह होली विशेषांक बहुत सुंदर बन गया है। मां वाणी की कृपा से आगामी अंक भी इसी प्रकार सफलता पूर्वक प्रकाशित होते रहेंगे, ऐसी मंगल कामना करता हूं।

 नरेंद्र शर्मा “नरेंद्र”, गीतकार, अलीगढ़ (उ.प्र.)

ठवर-ठवर फाग क गगरी ढरकि रहलि बा

ई होली विशेषांक देख के अस लागि रहल बा कि भोजपुरी माई अपना सतरंगी अंचरा से घन मोती लुटा रहलि बाड़ी। अस लागि रहल बा के धरती अपना पूते क जनेव ठानत ए होली के मन भर जीयत बाड़ी, ठवर-ठवर फाग क गगरी ढरकि रहलि बा। सब लिखनहार लो मन भर मन से लिखले बा एकर बहुत बधाई।

एह फाग विशेषांक के विशेषता एकरे विशेषज्ञता आ विविधता में बा। मनोज भावुक जी आ उहां क टीम क जोड़ले क कला अवर विनम्रता मेहनत फैन बना देवे वाली बा।

आकृति विज्ञा ‘अर्पण’, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश 

 

फगुआ अंक देख के बुझाता कि धरती आपन अँचरा में गुलाल लेइके छितरा देहले बाड़ी

एक तरफ़ जहाँ कोरोना के भयावहता बढ़ता, उहवें फ़ाग के रंग से सजल-धजल ई पत्रिका मन के मोह लेलख. बुझाता कि धरती आपन अँचरा में गुलाल लेइके छितरा देहले बाड़ी। एक से बढ़के एक होली के खुशबू में भींगल, नीमन से शब्दन के सजावल रचना। एह अंक के देख के मन हरखित बा। मनोज भावुक जी आ उहाँ के पूरा टीम बधाई के पात्र बा।

मधुबाला सिन्हा, मोतिहारी,चम्पारण, बिहार 

मील के पाथर साबित होई भोजपुरी जंक्शन

ऐतिहासिक काम भइल बा। आवे वाला समय में मील के पाथर साबित होई। अनघा बधाई मनोज भावुक जी।

सविता सौरभ, बनारस, उत्तर प्रदेश

बेजोड़ अंक आइल बा

बेजोड़ अंक आइल ई फगुआ से जुड़ल। रुचिर आ रमणीय रचनन से भरल इहो अंक संगिरहा जोग बा। बधाई मनोज जी। राउर मिहनत रंग ले आ रहल बा।

सुनील कुमार पाठक, पटना, बिहार

होली विशेषांक के सुघराई देखे जोग बा

होली विशेषांक के सुघराई के जतना बयान कइल जा कमे बा। संपादक मंडल आ डिज़ाइनर के ढेरकी खान बधाई। परिकल्पना के धरातल पर उतारल गइल। मन गदगद बा।

चंदेश्वर शर्मा परवाना, देवरिया, उत्तर प्रदेश

होली विशेषांक में सचमुच होली कs जान-परान बा

भोजपुरी के चर्चित पत्रिका ‘ भोजपुरी जंक्शन ‘ के होली अंक देखते मन भाव विभोर हो गइल। पत्रिका के साज-सज्जा आ कलेवर काबिले तारीफ बा। अंक में संकलित एक से बढ़ के एक रचना आ लेख होली पर बा जवना में सुघर तथ्य आ पठनीयता लउकत बा, जे पत्रिका में जान डाले में कवनो कोर-कसर बाकी नइखे छोड़ले। राउर संपादकीय जानदार बा, हम रउरा से पूरे-पूरे सहमत बानी कि ” भोजपुरी जंक्शन में पूरा के पूरा फाग राग बा आ एह अंक पर कोरोना-सोरोना के कवनो असर नइखे, ई कम्प्लीट फागुन विशेषांक बा।”

एह अंक में सभई के लेख आ रचना प्रासंगिक आ प्रेरणादायक बा। “फागुन के बदलत रुप” लेख में एक ओर तारकेश्वर राय ‘तारक’ के चिन्ता कइल उचित लग रहल बा तs दूसरे ओर बादशाह प्रेमी, मनमोहन मिश्र, मिथिलेश गहमरी, प्राचार्य सुभाष यादव, संगीत सुभाष, सौदागर सिंह, जे पी द्विवेदी, निशा राय, नथूनी प्रसाद कुशवाहा, प्रतिभा गुप्ता, प्रेम नाथ मिश्र, संजय मिश्र ” संजय”, निर्भय नीर आ शम्भू कुशवाहा जइसन मानिन्द साहित्यकार लोगन के फगुआ के गीत भरोसा दे रहल बा कि फगुआ के रुप कतनो बदले जब ले गंगा-जमुना में पानी रही तब तलक फगुआ मनत रही। काहे कि फगुआ के साहित्य में एतना जान बा कि फिल्मी जगत भी एकरा बिना अधूरा बा जेकर जीवन्त गवाही भावुक जी के दमदार लेख ” हिन्दी सिनेमा में फगुआ” कर रहल बा। इहो डंका के चोट पर कहल जा सकेला कि जब तलक “भोजपुरी जंक्शन” जइसन पत्रिका मिलत रही तब तलक फगुआ मनत रही। “भोजपुरी जंक्शन” पत्रिका अपने स्वरुप आ पहिचान में काफी उच्च स्तरीय पत्रिका दिख रहल बा। भाई मनोज भावुक राउर भगीरथ प्रयास एक ना एक दिन इतिहास रची आ भोजपुरी खातिर मील के पत्थर साबित होई।

राम पुकार सिंह “पुकार” गाजीपुरी, पूर्व प्रधानाध्यापक, कोलकाता

 

मन फागुन फागुन हो गइल बा

फगुआ अंक तनी देर से आइल त का चइतो में रंग बरसा देलस। मन फागुन फागुन हो गइल बा।

फगुआ अंक बेजोड़ भावुक जी

फगुआ अंक बेजोड़।

चइत में फागुन ले आइल

रंगलस मन के कोर

अंक संग्रहणीय बनल बा

सामग्री    पुरजोर।

लेख  आलेख  कविता बा

रंग   से   भरपूर

तीत कोरोना ना छू पवलस

फगुआ के तासीर।

फलो फूलो भोजपुरी जंक्शन

बिखरत रहे सुवास

करत  रहीं  भोजपुरी  सेवा

हमरा  बा   विश्वास।

देश – विदेश  में झंडा गाड़ के

दिहनी भाषा के पहचान

भोजपुरी  के  मान  बढ़वनी

हमनी ला वरदान।

कनक किशोर जी, आरा, बिहार

भोजपुरी जंक्शन चंदन के माटी हऽ

साँच कहिले भोजपुरी के थाती हऽ

भोजपुरी जंक्शन चंदन के माटी हऽ

ताज़ा कणिका होली पर आधारित बा

पढ़ि के रचना ई मनवा आह्लादित बा

इक से बढ़ि के एक लेख कविता बाटे

जेतने पढ़ऽ ओतने मन तरसताटे

 

रंग विरंगा चित्र भाव मनभावन बा

नइखे तनिक फुहड़ता सबकुछ पावन बा

 

असहीं रउवा कवि, कविता से प्यार करीं

नेक कार्य के बदे नमन स्वीकार करीं

आकाश महेशपुरी, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

धूम मचल बा जंक्शन पर

धूम मचल बा जंक्शन पर, भाउक जी के खेला हे

देखs देखs देखs देखs, लगल कबिन के मेला हे

पत्रिका पढ़ीके नींक लगल केतना कइसे तुह॔के बतलाईं

हिया के पोर ही पोर से भावुक जी तोह॔के बा बधाई बधाई

ओमप्रकाश पांडे आचार्य जी, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

आवरण पृष्ठे रंग बरसा रहल बा

भोजपुरी जंक्शन के होली विशेषांक “फगुनहट हऽ कि कोरोनाहट” सुवहनिय प्रपत्र का रूप में मिलते मन फगुना गइल बा। काहे कि एकर आवरण पृष्ठे रंग बरसा रहल बा।

रउरा सम्पादकीय के कोरोना काल के खतियान कहाव त हमरा समझ से गलत ना कहाई। आवरण पृष्ठ से फगुआत सम्पादकीय में डूबत  अदमी जब आगा बढ़ता त; वास्तव में भारत के रत्न हईं टाटा, फगुआ के बदलत रूप, बसंत कऽ मनुहार अउर होली कऽ त्योहार, बसंत आ गइल, माने एकहु ना बतिया होली में रसिया, होली रस, आ हमार भउजी जस लेख,आलेख,संस्मरण, कहानी भरपूर साहित्यिक खोराक देता।

भोजपुरी के पचपन कवि लोगन के गीत, कविता पढ़ मन आनंदित त होइए रहल बा ब्रज भाषा के कवितो फगुआवे में कवनो कसर नइखे छोड़त।

हिन्दी सिनेमा में फगुआ नामक  राउर लेख बहुते उपयोगी बा। कुल मिलाके के कहल जाव त ई अंक हमनी ला एगो थाती का रूप में बा।

दिलीप पैनाली, सैखोवा, तिनसुकिया, असम 

भोजपुरी जंक्शनदेख के मन अगरा गइल, हरियरा गइल

स्वस्तिश्री सर्व उपमायोग्य सम्पादकजी के जय-जय।

एह बार के ‘भोजपुरी जंक्शन’ मिलल। मन अगरा गइल, हरियरा गइल। ई पत्रिका हर बार नियन एहू बार सामयिक अड़ान पs अड़ल रहलि। एह बार फागुन के खूब रंग चढ़ल रहल, शायद एहीसे ‘होली-विशेषांक’ बा। रसिक सम्पादक के होली में गोताइल आ भावुकता भरल कलम से आइल ‘फगुनहट कि कोरोनोहट’ शीर्षस्थ सम्पादकीय कोरोना के साथे लेले कोरोनाकालीन चुनावी चाल पs गभियो चला देलस। फगुआ के बदलल रूप, बसन्त के मनुहार अउर होली के त्यौहार हs, बसन्त आ गइल, माने एकहू ना बतिया होली में रसिया, होली-रस, हमार भउजी-जइसन आलेखन के साथे एक से एक कविता आ फिलिमो के होली रंग सहेजले एह अंक के पोरे पोर रसगर रहल। हँs, ‘वास्तव में भारत के रत्न हईं टाटा’ ई आलेखो एगो महनीय व्यक्तित्व के उजागर करेवाला विशिष्ट बोध के प्रतीक बा।

आवरण से लेके अन्तस् तक में मनोहर चित्रन के साथे विषय-प्रस्तुति कतहूँ से ओनइस ना लागल। भोजपुरी के विकास में सभ सवांग के साथे एह पत्रिको के योगदान गवाई। शुभमस्तु।

मार्कन्डेय शारदेय, पटना, बिहार 

अद्भुत संकलन बाटे

भोजपुरी जंक्शन के होली विशेषांक वास्तव में अद्भुत संकलन बा।

संपादक भावुक जी अपना सम्पादकीय में चुनाव के साथे कोरोना के साठगाँठ पर बहुत उत्तम व्यंग्य कइले बानीं जवना पर आम लोग के भी ध्यान आ बहुत व्यंग्य सुने आ पढ़े के मिल रहल बा। आर.के.सिन्हा साहब के आलेख में टाटा के भारतीय अर्थव्यवस्था में योगदान के बहुत सुंदर चर्चा भइल बा आ वास्तव में एकरा के केहू नजरअंदाज नइखे कर सकत।

तारक जी ‘फगुआ के बदलल रूप’ आलेख के माध्यम से फगुआ के पहिले के स्वरूप आ फगुआ  के सार्थकता के बहुत सुंदर चित्रन कइले बानी। एही तरे रामपुकार सिंह जी, मार्कण्डेय शारदेय जी,सम्पादक भावुक जी, डॉक्टर एस. के. पाठक जी आ डॉ. शंकर मुनि राय सरीखे रचनाकार सबके आलेख ये विशेषांक में चार चाँद लगा दिहले बा। सही में सब आलेख एक से बढ़कर एक बा।

काव्य खंड में भी होली के रंगीन मिजाजी साफ-साफ छलकत-छलकत बा। एक से बढ़के एक गीतकार अउर कवि सबके गीत आ कविता पढ़के मन होलीनुमा हो गइल बा। ये अंक में हिंदी सिनेमा में फगुआ के महक देखे के मिल रहल बा। फिल्मी दुनिया में होली के रंग केतना चटकदार आ असरदार बा ये विशेषांक में साफ-साफ लउकता।

अखिलेश्वर मिश्र, बेतिया, प. चम्पारण, बिहार


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Hum BhojpuriaMay 3, 20211min3870

समै के शब्द-चित्र खींच रहल बा कोरोना विशेषांक

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।

लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥

कर्म के महत्ता बतावत एह श्लोक के अंतर्निहित महीनी जदी बूझल जाव त मालूम होखी जे जनक जइसन निर्लिप्त, निर्विकार कर्मयोगी अगर परम सिद्ध भइले आ कहइले, त अपना कर्म में निरत भइला में बिचार के लगातार होत उच्चता के कारन। लोक भा जन-मानस के उदारता से जोरला के भाव लोक-संग्रह कहाला। लोक-संग्रह खलसा लोकवे के ना, बलुक लोक के कइल्को के जोगावल आ ओकरा सइँत के राखल सुगढ़ संग्रह के मान होला।

अपना कइल्का के दोहरियावल बाउरो हो सकेला, त ऊ कर्म-संकलन के एगो अन्यतम उदाहरन के तौर प होखो त आवे वाला समय में आजु के कइल्का के थाती ले हो सकेला। लोक-संग्रह हऽ, लोगन के जोरल, लोगन के कइल्का के सँजोवल, लोगन के कइल्का के मानल आ ओकरा अपेक्षा के अनुरूप भाव दीहल। ई प्रक्रम खलसा आत्मप्रशंसा के उतजोग ना, बाकिर सगरे फइलल-पटाइल कूल्हि कइल्का के निकहा क्रम बनावत ओकरा इतिहास के कोरा में रखला के काम हऽ।

पर साल के महा भारी छुआछूत फइलल। तन से दूरी बनाइ के रखला के भरपूर प्रोत्साहन दियाइल। अपना समाजे ले ना बलुक परिवार-कुटुम्ब के लोगन से मिलल-जुलल, आइल-गइल, मेल-मुलाकात कइल, भेंट कइल सभ प पाबंदी लागि गइल। लोगन के आपसी बर्ताव-बेवहार में भारी बदलाव हो गइल। कारन रहे, चीन से उठल, भा उठावल, नोबल-कोरोना-19 नाँव के वाइरस जवन गाँवहीं सूबा भर में ना पटाइल, देस-बिदेस में पटात अबादी के अबादी चाटत गइल। अपना देस में लॉकडाउन के लमहर काल चलल। सउँसे संसार में लोग छोड़ीं, परिवार के परिवार, मोहल्ला के मोहल्ला लोगन के प्रान निकलल, जान गइल। देसन के आर्थिक दसा बिगड़ गइल। देसन के नतीजा निकल गइल।

लोक आ समाज से साहित्य के बड़ा गहीर रिश्ता होला। साहित्य लोक के सत्ता के माने बुझवावेले। साहित्य समाज में घटल आ घटल रहल दसा के लेके चर्चा करवावेले। भोजपुरिया समाज के लोग देसे ना बिदेसन में आपन मौजूदगी से उन्नती के गाथा लिखे में माहिर रहल बाड़े। कोरोनाकाल के दसा-दुर्दसा के सोझ प्रभाव एह लोगन प परल बा। पर साल के भोजपुरी जंक्शन के अंकन में कोरोना के लेके लगातार कुछ ना कुछ छपत रहल। कोरोना के रौद्र रूप घटत-बढ़त रहल, आ सङहीं अंक में संपादकीय, आलेख, कहानी, कविता, छंद, गजल के विधा में लोक-भावना शब्द-रूप में जगहि पावत रहल। ओही सभ रचनन के गद्य आ पद्य प्रारूप के संकलन भा संग्रह सोझा आइल बा भोजपुरी जंक्शन का ओर से। 1 से 15 फरौरी’21 के अंक गद्य रचनन के संग्रह बा, त 1 से 15 मार्च’21 के अंक में पद्य रचनन के संग्रह हऽ। कहे के ना, ई दूनो अंक संग्रहनीय बन गइल बाड़न स।

गद्य रचनन के संग्रह के अंक के संपादकीय में भाई मनोज भावुक ओह काल के इयादे नइखन पारत, बलुक ओह समै के शब्द-चित्र खींच रहल बाड़न – पिछला साल मार्चे में कोरोना के चलते लॉकडाउन के सिलसिला शुरू भइल। आदमी जे सोशल रहे, सोशल डिस्टेंसिंग बनावे लागल। लोग कंगारू लेखा लइका-बच्चा के करेजा से सटले

मुम्बई-दिल्ली से पैदल गाँवे भागे लागल। मुँह प जाबी (मास्क) लगा के जरूरतमंद के पूड़ी-तरकारी बँटाये लागल। जे जहाँ फँसल ओहिजे भगवान के गोहरावे लागल। गाय अलगे हँकरऽतिया, बछरू अलगे। रोजी-रोजगार गइल। चैन-सुख गइल। सगरो दहशत पसरे लागल। एही अंक में जहँवाँ ’सुनी सभे’ के कालम के पहिला भाग में श्री रवींद्र

किशोर सिन्हा के कलम सार्क देसन के समूह का ओर से भारत के मुँह जोहला के कारन बता रहल बाड़न, त ’सेहत’ कॉलम के तहत डाँ० राजीव कुमार सिंह ’कइसे जान बाँची कोरोना से’ सभ का सोझा ले आइल बाड़न। एही अंक के ’सुनी सभे’ कॉलम के दोसरा भाग में रवींद्र किशोर सिन्हा में कोरोना के लेइ के चीन के धुर्तई उजागर कऽ

रहल बाड़न। त एही कॉलम के तीसर भाग में उहाँ का तब्लीगी जमात के घोर लापरवाही प आपन चर्चा रखले बानीं। तब्लीगी जमात के भर संसार से बिटुराइल सदस्यन के खतरनाक लापरवाही कतना कस के कोरोना-रोगी के आँकड़ा बढ़ा दिहलस, एह बिन्दुअन प खुल के चर्चा कइल जरूरी बा। रवींद्र किशोर जी के ’सुनी सभे’ कॉलम से आगा

दूगो अउरी आलेख संकलित भइल बाड़न स। ई पाँचो आलेख कोरोना आ एकरा भइला आ फइलला के कारन प बिना ढेर लाज-लिहाज कइले चर्चा क रहल बा। आगा संपादकीय के कड़ियन में कोरोना के कारन आ निवारन गहिराह चर्चा भइल बा। एह कड़ियन का बाद से आलेख सभ के प्रकाशन भइल बा।

 

’अपना आलेख में डॉ० ब्रजभूषण मिश्र जी कोरोना के वैश्विक महामारी बतावत भारतीय सनातन परंपरा सभ के अर्थ बतौले बाड़न – जहाँ तक भारतीय आचार-बेवहार के बात बा, रोजनामचा में शारीरिक शुचिता बनवले रखला के प्रावधान रहल बा। कहीं से अइला-गइला प हाथ-गोड़-मुँह धोवल, जूता-चप्पल बहरी छोड़ल, हाथ ना मिलाके कर जोर परनामा-पाती, जूठ ना खाइल आ ना केहू के खिआवल, अनजान जगह पर सूते बइठे में आपन आसनी, गमछा के उपयोग कइल, माँसाहार से परहेज आदि छुत-छात से बचावत रहल हऽ। एह आलेख में ब्रजभूषण मिश्रजी कोरोना के रोशनी में सनातन परंपरा के वैज्ञानिकता का ओर इशारा कइले बाड़े

कहे के माने ई, जे अंक के आलेखन के माध्यम से कोरोना-काल में आदमी के एगो जाती के तौर प ओकर जिजीविषा के रूप समुझल जा सकेला। आदमी आपदा में जवना ढंग से अपना जीये के अवसर निकाल लेला, ओकर दस्तावेज बा ई गद्य रचनन के अद्भुत संग्रह। एही कड़ी में ’वर्क फ्रॉम होम’ प एगो हमरो आलेख सम्मिलित भइल बा। ई आपदा में अवसर खोजला के भाव त कहिये रहल बा। तवना प ’माई’ के माध्यम से मनोज भावुक परंपरा के निबाहत औरतन के निकहा दर्द समुझे के गेट-वे प्रस्तुत कइले बाड़न – गँउवाँ में त लइकी ससुरा जाते लॉकडाउन में आअ जाली स ! भारतीय समाज में ठोपे-ठोपे चुआवल आ बसावल मूल्यहीनता के बूझे के नमूना बा ’माई’।

एही लगले कोरोना-काल में भोजपुरी जंक्शन के अंक सभ में कविता हर तरह के विधा में छपल। हालाँकि, गीतन प रचनाकार लोगन के अधिके जोर बनल बा। भोजपुरिये ना भारत के हर समाज के श्रमजीवी समाज के स्वर गीत रहल बाड़न स। एह अंक के संपादकीय में मनोज भावुक जी खुल के सँकारत सोझा आ रहल बाड़न – कोरोना कवितावली खातिर हम कविता के शिल्प के लेके बहुत लचीला रुख अख्तियार कइनीं। हालाँकि, भोजपुरी भासा के रचनाकारन में गीत-कविता के लेके उत्साह तनिका अधिके रहेला। बाकिर आउर भारतीय भासा के पद्य-रचना प जवना अस्तर से काम होला, शिल्प के मूलभूत विधान के आलोक में जवना ढंग से रचनाकर्म होला, ओह हिसाब से भोजपुरी के रचनाकारन लोग के ढेर सीखे के होई। तबहूँ एह अंक के सम्मिलित भइल रचनन में कोरोना के जियल-भोगल, जानल-जुटाअवल हर पहलू के जगहि मिलल बा। एह अंक में कविता के आत्मा के आजु के समै से जोरे के प्रयास भइल बा। कुल मिला के कविकर्म में रत अड़लालिस लोगन के रचना के अस्थान मिलल बा।

ई दूनो बिसेस अंक आवे वाला समै, जब कोरोना सचकी ना रहि जाई, में बेर-बेर पढ़ल जाई। लोग अपना घर-आङन के लइकन से काथा कहिहें – ’एगो कोरोना रहे… ’

****

सौरभ पाण्डेय

‘ भोजपुरी जंक्शन ‘ के हर अंक विशेष अंक बा

देखल जाय त भोजपुरी जंक्शन ( पहिले के ‘ हम भोजपुरिआ ‘ )  के हर एक अंक , अपने आप में विशेष अंक बा आ संग्रहणीय बा । काहे से कि ई कवनो ना कवनो विषय पर केन्द्रित बा ।

‘ हम भोजपुरिआ ‘  से ले के  ‘ भोजपुरी जंक्शन ‘  के 11वाँ अंक तक में छपल एह  अड़तालिस कवियन के कवितन के एक साथ 13वाँ अंक में एक साथ संकलित करके रउरा बड़हन काम कइले बानी । एह में कुछ सिद्धहस्त कवियन के सङे – सङे

कुछ नयो लोग के रचना छपले बानी ।

ई अच्छा कदम बा । एह से ई त जरूर पता चलत बा कि पुरनकी पीढ़ी के सोच में आ नयकी पीढ़ी के सोच समझ में का साम्य आ वैषम्य बा ।

कविता खाली मनोरंजन के चीज ना ह , ई औजार ह , जे आदमी के विचार बदल देवेला , ओकरा के संबल देवेला , दुख आ सुख बाँटेला । राउर संपादकीय जे कवितात्मके बा , एह बात के नीके रेखांकित करत बा – ” कविता से कोरोना भागी ना , ई सभका पता बा बाकिर कविता से आदमी जागी , जागेला एकर इतिहास साक्षी बा । देश आ दुनिया पर जब – जब संकट आइल बा , कविता आदमी के जगवले बा । दर असल कविता आदमी के आदमी बनावेला । आदमी के अंदर के सूतल आदमी के जगावेला । सचेत करेला । ” साँचहू कोरोना केन्द्रित सब कविता ओकरा कारण , निवारण आ भविष्य में ओकर पड़ेवाला प्रभाव के रेखांकित करत बा । कोरोना के इतिहास ,भूगोल के सङे – सङे , व्याप्त भय , भय के निवारण आ भयातुर के भय भगावत हास्य – व्यंग्य परोसत कविता सोझा आइल बाड़ी स । एह खातिर राउर संपादकीय सोच साधुवाद के पात्र बा । राउर संपादकीय के शीर्षक – ‘ एगो कोरोना रहे ‘ । बड़ा लाजवाब बा । लोककथा अइसहीं नू कहाले । कोरोना कथा कहाई आ कहे खातिर भोजपुरी जंक्शन पत्रिका के सहारा लिआई ।

हम एह चिट्ठी के सहारे ओह सब लोग के जे भोजपुरी पढ़े पढ़ावे आ शोध करे करावै से जुड़ल लागल बा , ई सलाह देवे के चाहत बानी कि पत्रिका

के अंकन के अपना पास जोगावे , भविष्य में ओकरा कामे आई ।

एगो धरोहर अंक खातिर रउरा

के साधुवाद ।

– ब्रजभूषण

 


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Hum BhojpuriaFebruary 15, 20211min4200

अइसन पत्रिका त बुक स्टालो प रहे के चाही

‘हम भोजपुरिया’ पत्रिका पढ़ि के मन मुद्रित हो गइल आ हम भावुक हो गइलीं। महतारी भाषा भोजपुरी के सैकड़ों पत्रिका पढ़े के मिलल बाकिर एकरा लेखा नीमन, उहो मल्टीकलर में आ बापू के शोधपरक रचना से भरल साहित्य के एक-एक पन्ना कीमती बा आ दिल के छू देबे वाला बाटे। विशेषांक देखिके हदय हुलास से भर गइल। बधाई के पात्र बानी श्रद्धेय भगवती प्र0 द्विवेदी जी, जे हमरा मो० प भेजले रहीं तब मालूम भइल एकरा बारे में। बुत अगते जानकारी भइल रहित त हमहूं एकरा से जुड़ गइल रहतीं।

मनोकामना बा कि ई संग्रहणीय अंक अविरल गति से दिनों दिन उच्च शिखर प पहुंचे। अइसन पत्रिका त बुक स्टालों प रहे के चाही। एह से जुड़ल सभे व्यवस्थापक, संपादक अउर सहयोगी जन के हार्दिक अभिनन्दन बा।

राउर अपने, सुरेन्द्र कृष्ण रस्तोगी, कुदरा (कैमूर) बिहार

 

भोजपुरी जंक्शन कवनो भी भाषा के स्तरीय पत्रिका के बारबार बा

भावुक जी,

हर बेर के अइसन एहू बेर पत्रिका के अंक महत्वपूर्ण सामग्री लेके सोझा आइल बाटे। सामयिक आ ज्वलंत विषयन पर संपादकीय आ अग्रलेख देके रउआ पत्रिका के कवनो भाषा के स्तरीय पत्रिका के बराबरी में भोजपुरी जंक्शन के खड़ा कर देत बानी। भोजपुरी साहित्य के पुरोधा लोग के बारे में विमर्शपूर्ण लेख देके ,ओह लोग के अवदान से नवकी पीढ़ी के परिचय करावे के लमहर काम हो रहल बा । सीनेमा के दुनिया आज समाज के बड़ा प्रभावित करेला आ लोग ओकरा बारे में जाने खातिर उत्सुक रहेला। रउआ ओहू पर सामग्री दे के एगो लमहर जमात के जिज्ञासा के शांत करत बानी। पत्रिका निकले आ कीर्तिमान स्थापित करे ,एह शुभकामना के साथ साधुवाद।

            डॉ. ब्रजभूषण मिश्र, मुजफ्फरपुर

 

संकीर्ण मानसिकता के बदले के कोशिश बा ‘’ कहानी के प्लॉट ’’

मनोज जी के लिखल “कहानी के प्लॉट” 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वस्त भइला के पृष्टभूमि पर लिखल हिन्दू मुस्लिम प्रेम कथा पर आधारित बा। लेखक के लिहाज से भले ही एगो प्लॉट होइ पर एगो पाठक के नजर से ई वास्तविक  घटना बा। खाली इहे घटना नाही जुग-जुग से इ घटना चलल आवsतिया, जेकर अंत शायदे कब्बो सुखांत भइल होई।

इ कहानी पढ़ला से साफ परिलक्षित होला कि प्रेम त्याग के दोसर रूप ह। कहानी के नायिका मुस्लिम होते हुए भी आपन हिन्दू प्रेमी खातिर शबनम से श्वेता बन गइली आ राहुल सरफ़राज़ बन गइले। मुस्लिम होते हुए भी शबाना मंदिर जाए में तनिको ना हिचकिचइली। इ कहानी असल प्रेम के   पराकाष्ठा आ प्रमाण ह।

इ प्लॉट सदियन से आपन समय, नाव आ जगह बदल के समाज के सोझा आवत रहल बा जेकर ज्यादातर परिणाम हत्या अऊर दंगा के रूप में प्रकट भइल बा। इ जानते हुए भी कि सब धर्म आ जाति से बढ़ के प्रेम के धरम बा तब्बो हमनी का एके स्वीकारे मे कोताही बरतेनी जा।

हमनी का समाज मे अंतरजातीय विवाह खातिर कमोबेश सहमति बनल बा बाकी जहां हिन्दू-मुसलमान के बात आवेला उहां तेवर बदल जाला। आज के हिन्दू अभिभावक बडा  शान से कहेला कि “कवनो जाति में बियाह करs परहेज नइखे बाकी उ मुस्लिम, ईसाई भा छोट जात ना होखे ठीक मुस्लिम परिवार के साथ भी इहे मानसिकता बा।

ई सोच बदले में अभी बहुत समय लागी अऊर इ कहानी संकीर्ण मानसिकता के बदले के एगो जरिया बा।

एह कहानी के नायक नायिका जदि चाहित लोग त प्रेम के स्वार्थ में वशीभूत होके भाग के बियाह कर सकत रहे लोग मगर आपन परिवार समाज के मान मर्यादा सर्वोपरि मान के आपन पाक प्रेम के आहुति दे देहलस लोग। इहे त्याग इ कहानी के गरिमा बा।

लेखन एतना क्रमबद्ध आ दृश्यात्मक बा कि पाठक एक सांस में कहानी खत्म करे के बाध्य हो जाई। मन के झंझोरत एक संदेशात्मक कहानी खातिर लेखक के साधुवाद।

श्रीमती सरोज सिंह, लेखिका, लखनऊ   


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Hum BhojpuriaJanuary 1, 20211min4100

गिरमिटिया अंक एगो ऐतिहासिक अंक बा

भोजपुरी जंक्शन के  ‘ गिरमिटिया ’  अंक एगो ऐतिहासिक अंक बा। साँच कही त  गिरमिटिया प्रथा मनई सभ्यता के इतिहास में एगो करिया दाग बा। आपन खून-पसीना बहा के गिरमिटिया लोग मॉरीशस के धरती के आबाद कइल. जब फूल खिलल तब मॉरीशस बहार से भर गइल। गिरमिटिया लोगन के यात्रा के सगुण केतना नीक रहे की गिरमिटिया लोगन मजदूर बन के गइलन आउर उनकर संतान बनलें सरकार आउर देश के बागडोर बढ़िया से संभललेँ। संपादक जी! राउर गीत के लाइन हमरा बहुते पसंद आइल ह –

हम तो मेहनत को ही हथियार बना लेते हैं / अपना हँसता हुआ संसार बना लेते हैं मॉरीशस, फिजी, गुयाना कहीं भी देखो तुम / हम जहाँ जाते हैं सरकार बना लेते हैं मनोज भावुक

वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्धिवेदी जी “गिरमिटिया ” कविता में गिरमिटिया लोगन के विस्थापन के पीड़ा के बहुते नीक ढंग से उकेरले बानी जइसे कोई चित्रकार अपना पेंटिंग में चित्र के हु- बहु उतार देला। मॉरीशस के डॉ. सरिता बुद्धु मॉरीशस आउर भारत के भोजपुरी के बीच एगो सेतु बाड़ी। आपन आलेख “गिरमिटिया प्रथा” में सरिता जी गिरमिटिया लोगन के इतिहास, बिरह-वेदना, मुसीबत आउर सांस्कृतिक विरासत के बढ़िया सलीका से जिक्र कइले बानीं। प्रो. ह्यूग तिनकर के किताब ‘A New System of Slavery ’ के नाम लेत गिरमिटिया के इतिहास बखूबी बतवले बाड़ी। मॉरीशस के ही श्रीमती नर्वदा खेद्ना जी अपना आलेख “मॉरीशस में शर्तबन्ध मजदूर के आगमन के 186वीं  वर्षगॉंठ (1834-2020)” में अपना गिरमिटिया दादा-परदादा के संघर्ष, पीड़ा, मेहनत आउर कामयाबी के काबिले तारीफ बयान कइले बाड़ी। अपना पूर्वज के विरासत, परंपरा, पर्व-त्योहार आदि के मान-सम्मान देत बाड़ी। साँच कही त सरिता जी आउर नर्वदा खेद्ना जी के लेख में गंगा के अविरल धारा बह रहल बा।

 डॉ. सत्येन्द्र प्रसाद सिंह, प्रभारी प्राचार्य, हरिराम महाविद्यालय मैरवा, सिवान             

रजिन्दर बाबू विशेषांकदस्तावेज बा

भोजपुरी जंक्शन के 1-15 दिसम्बर के ‘रजिन्दर बाबू विशेषांक’ देशरत्न डॉo राजेन्द्र पर एक दस्तावेज के रूप में देखल जा सकsता।

अपना संपादकीय में मनोज भावुक जी डॉo राजेंद्र प्रसाद जी के संविधान निर्माण में योगदान आ संविधान के मुख्य बातन के जवन जानकारी दे के ये अंक के जीवंत बना दिहले बानी, ऊ गागर में सागर से कम नइखे। आर.के.सिन्हा साहब अपना ‘सुनीं सभे’ में गोवा के भूतपूर्व राज्यपाल मृदुला सिन्हा जी के सरल-सहज स्वभावगत विशेषता के जानकारी बहुत ही आकर्षक रहल।

बद्रीनाथ वर्मा जी के बिहार के नया सरकार पर समीक्षात्मक आलेख में बिहार के राजनीतिक हालात के सुंदर चर्चा बा। हरेंद्र कुमार पाण्डेय जी के आलेख ‘ जड़ से जुड़ल राजेंद्र बाबू’ बहुत ही सारगर्भित बा जेमे राजेन्द बाबू के विलक्षण प्रतिभा के भरपूर चर्चा बा। राजेन्द्र बाबू के सोमनाथ मंदिर पर दिहल गइल भाषण के जानकारी, आलेख के अउर जीवंत बना देता। राजेन्द्र बाबू के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका पर ज्योत्स्ना प्रसाद जी के आलेख बहुत सराहनीय बा।

भोजपुरी सिनेमा के प्रति डॉo राजेन्द्र प्रसाद के आत्मिक लगाव के खुलासा सम्पादक मनोज भावुक जी के आलेख ‘डॉo राजेन्द्र प्रसाद- दिहनीं भोजपुरी फिल्म बनावे के आइडिया’ से भइल। कुल मिला के ई विशेषांक संग्रहणीय बा। सम्पादक महोदय के राजेंद्र बाबू पर विशेषांक निकाले खातिर हार्दिक धन्यवाद।

अखिलेश्वर मिश्र, कवि अउर साहित्यकार, शांति नगर, बेतिया, पश्चिम चंपारण,बिहार


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Hum BhojpuriaDecember 17, 20201min16260

भोजपुरी जंक्शन  के ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक दस्तावेज

‘भोजपुरी जंक्शन’ के एने दूगो अइसन अंक आइल बा, जवन खास तौर से चरचा के मांग करत बाड़न स। पहिलका गिरमिटिया आ दोसरका दियरी-बाती-छठ अंक। एगो इतिहास रचे वाला, त दोसरका सांस्कृतिक चेतना जगावे वाला। इन्हनीं के अगर ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक दस्तावेज कहल जाउ, त अतिशयोक्ति ना कहाई।

गिरमिटिया विशेषांक में सरिता बुद्धू, नर्वदा खेदना, पवन उपाध्याय आ मनोज भावुक के आलेख शोध-विश्लेषण करत परत दर परत गिरमिटिया मजदूरन के जद्दोजहद, अमानवीय उत्पीड़न आ सांसत सहत आस्ते-आस्ते खुद अपना हाथे तरक्की के इतिहास गढ़े आ ओह मरुभूंइ के सोनहुला बनावे के लोमहर्षक कथा कहत बाड़न स। कबो मरम के बेधे वाली दास्तान, त कबो ‘कर बँहिया बल आपनो छाड़ि विरानी आस’ के हकीकत में बदलत भोजपुरिया सुभाव के कामयाबी के कथा। ओही श्रृंखला में हरेन्द्र कुमार पाण्डेय के ‘परसागढ़’ के कहानी। कुल्हि मिलाके भोजपुरिया मनई के मन-बल आ सांस्कृतिक थाती के बदउलत एगो अजगुत दुनिया सिरिजे के ऐतिहासिक सच्चाई। आजुओ महोत्सव का जरिए ओह दिन के इयाद। नवकी पीढ़ी के त ई परीलोक के कथा लागी। सचहूं के ई यादगार अंक बनल बा, जवन पढ़े-गुने आ सहेजिके राखे लायक बा।

एकरा बाद वाला अंक लोक संस्कृति के जियतार छवि पेश करत बा आ सांस्कृतिक चेतना जगावे का दिसाईं अगहर भूमिका निबाहत बा। दियरी-बाती-छठ पर केन्द्रित एह अंक में एक ओरि छठ पर ज्योत्स्ना प्रसाद, सौरभ पाण्डेय आ मनोज भावुक के आलेख विवेचनात्मक आउर गवेषणात्मक बनि परल बाड़न स, उहवें दियरी-बाती प अखिलेश्वर मिश्र के लेख के जवाब नइखे। गीत-ग़ज़ल आउर कहानियो के मार्फत खास विषय के मद्देनजर दमदार रचनन के चयन भइल बा। संगीत सुभाष, डॉ सुनील कुमार पाठक, सुमन कुमार सिंह के गीत आ मनोज भावुक के ग़ज़ल पढ़निहारन के अभिभूत करेवाली रचना बाड़ी स। ‘तेल नेहिया के ‘(मनोज भावुक),’घर के संस्कार’ (सूर्येन्दु मिश्र)अंक के अनुरूप सकारात्मक सोच के कहानी बाड़ी स। दूनों विशेषांक के संपादकीयो सहजता आ जीवंतता से लबरेज़ बा। बिसवास बा, भोजपुरी साहित्य-संस्कृति के जंक्शन ‘भोजपुरी जंक्शन ‘के ई रचनात्मक अभियान आगहूं जारी रही आ पुरनकी-नवकी पीढ़ी के एक-दोसरा से जोड़े का दिसाईं सशक्त सिरिजना के सेतु बनत रही। हँ, एने ललित निबंध के सिरिजन कम हो रहल बा बाकिर परिचय दास जी के जवन लालित्यपूर्ण निबंध आ रहल बाड़न स, ऊ अद्भुत बाड़न स। ओही शृंखला में दीया का बहाना से उहां के ललित निबंध विशेष रूप से रेघरिआवे-जोग बा। एह किसिम के उम्दा ललित निबंध हर अंक में आवे के चाहीं ।

दूनों विशेषांक के तमाम रचनिहार आउर संपादक के दिल से बधाई!

भगवती प्रसाद द्विवेदी, शकुन्तला भवन, सीताशरण लेन, मीठापुर, पटना-800 001(बिहार)



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भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति  के सरंक्षण, संवर्धन अउर विकास खातिर, देश के दशा अउर दिशा बेहतर बनावे में भोजपुरियन के योगदान खातिर अउर नया प्रतिभा के मंच देवे खातिर समर्पित  बा हम भोजपुरिआ। हम मतलब हमनी के सब। सबकर साथ सबकर विकास।

भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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